Sunday, October 11, 2026

राजस्थान डायरीज

 

मध्य प्रदेश के खजुराहो का प्रतिबिंब राजस्थान में; ओसियां!

Tripti Verma

भारत ही एक ऐसा देश है जिसने संस्कृति को परिभाषित करते हुए सत्य और शिव के साथ सुन्दर भी जोड़ा है। भारतीयों का सौंदर्य-बोध अत्यंत उच्च श्रेणी का रहा है और जहाँ भी अवसर मिला है इसे समुचित तौर पर दर्शाया भी गया है। हमारे प्राचीन मंदिर तो शिल्प के जिस अद्भुत सौन्दर्य को समेटे हुए हैं उसे देखने पूरी दुनिया से लोग आते हैं। इन्हीं विभिन्न प्रकार के सौन्दर्यों के बीच स्थित है, राजस्थान का 'ओसियां'।

ओसियां, यह नाम ही हमारी जिज्ञासा को जगाता है। सबसे बड़ी बात तो सोचने वाली यह है कि क्या यह जगह भी अपने नाम की तरह दिलचस्प है? तो हम आपको बताये देते हैं, कि इसमें कोई शक नहीं है। यह जगह आपको अंदर तक आश्चर्य से भर देगी। वास्तव में यह ऐसी जगह है जो हमें भारत के बीते युग की भव्यता की सैर कराती है। प्रांतीय राज्यों का प्रभाव इतना महान है कि वह आज आधुनिक समय में भी अपना आकर्षण साफ़ दर्शाते हैं।

तो तैयार हो जाइये राजस्थान के ऐसी ही अनजान और ऐतिहासिक यात्रा के लिए। जोधपुर शहर से 68 किलोमीटर तक की यात्रा आपको ओसियां में ले जाएगी, थार मरुस्थल के बीचों बीच बसा एक ऐसा अंजान नगर जो अपने इतिहास को दोहराता हुआ आज भी अपनी ऐतिहासिक शान के साथ खड़ा है।

ओसियां

ओसियां

कभी ऐसा भी समय हुआ करता था जब आज का यह धार्मिक स्थल एक व्यापारिक केंद्र हुआ करता था। आज भी गुप्ता राजवंश का महा योगदान यहाँ देखा जा सकता है।

Image Courtesy:Schwiki

ओसियां

ओसियां

पहले भी यह सिर्फ एक व्यापारिक केंद्र ही नहीं हुआ करता था, यह एक ऐसा स्थल था जो ब्राह्मणों और जैन धर्म के लोगों के लिए सबसे पवित्र स्थलों में से एक था।

Image Courtesy:Schwiki

ओसियां

ओसियां

बाद में जब घोर के मुहम्मद ने यहाँ हमला किया, कई लोगों ने अपना धर्म जैन धर्म में परिवर्तित कर लिया। अब ओसियां राजस्थान के प्रमुख जैन तीर्थ स्थलों में से एक है।

Image Courtesy:Schwiki

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

ओसियां विरासत प्रेमियों और इतिहास प्रेमियों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है। यहाँ के मुख्य आकर्षण हैं, यहाँ के सदियों से स्थापित प्राचीन मंदिर।

Image Courtesy:Schwiki

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

यहाँ की आकर्षक वास्तुकला और शैलियाँ आपको अपनी और खींच ले जाएँगी। इन मंदिरों के ऐसे भव्य और शालीन योजना से बनाये गए रूप निश्चित तौर से राज्य के अन्य मंदिरों को कड़ी प्रतियोगिता देते है।

Image Courtesy:Schwiki

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

Shri Ram's Connection With Sri Pattabhirama Swamy Temple, Vayalpadu, Andhra Pradesh | Oneindia News

Shri Ram's Connection With Sri Pattabhirama Swamy Temple, Vayalpadu, Andhra Pradesh | Oneindia News

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

यहाँ की प्रभावशाली मूर्तियां जो कई अलग-अलग पौराणिक कथाओं को दर्शाती हैं हर बार पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती हैं। इसलिए ओसियां को 'राजस्थान का खजुराहो' भी कहा जाता है।

Image Courtesy:Schwiki

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

गुर्जर प्रतिहार राजवंश के शासनकाल के प्रारम्भ होने के बाद ही जैन धर्म इतना प्रसिद्द हुआ। कई जैन भगवानों के बीच, ओसियां जैन धर्म के नाग देवता के लिए प्रसिद्द है।

Image Courtesy:Schwiki

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

ओसियां के नाग देवता की जैन धर्म में एक खास महत्ता है। इस प्रकार से यह प्राचीन नगर राजस्थान में जैन धर्म का एक प्रसिद्द जैन तीर्थस्थल है।

Image Courtesy:Schwiki

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

ओसियां के मंदिरों की सैर आपको और भी आश्चर्य से भर देगी, क्यूंकि यहाँ के हर एक खम्बे और दीवार उस समय कला और वास्तुकला के प्रति जूनून को बखूबी दर्शाते हैं।

Image Courtesy:Schwiki

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

यहाँ स्थित सूर्य मंदिर, महावीर मंदिर, सच्चिया माता मंदिर ओसियां के प्रमुख मंदिरों में से एक हैं।

Image Courtesy:Schwiki

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

ओसियां का पुराना नाम उपकेशपट्टन है और यह ओसवालों के इतिहास का पहला अध्याय है।

Image Courtesy:Schwiki

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

खूबसूरत शिल्प को संजोये हुए ओसियां के ये जैन मंदिर श्रद्धा के साथ-साथ कला-प्रेमियों के भी आकर्षण का केंद्र हैं।

Image Courtesy:Schwiki

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

ओसियां के सच्चियाय माता मंदिर में मां सच्चियाय का आलौकिक स्वरूप श्रद्धालुओं के मन को सदैव ही लुभाता आया है।

Image Courtesy:Schwiki

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

हर साल नवरात्र के शुभ उपलक्ष्य पर पूरे देश से भक्तों की भीड़ उमड़ती है। मंदिर के चारों तरफ नौ देवियों के मंदिर बने हुए हैं।

Image Courtesy:Schwiki

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

महोत्सव के दौरान पूरे नौ दिन अलग-अलग देवियों की विशेष पूजा-अर्चना व अभिषेक किया जाता है।

Image Courtesy:Schwiki

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

मंदिर का भव्य रूप एक बहुत बड़े किले सा देखते ही बनता है।

Image Courtesy:Schwiki

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

यहाँ के लोगों के अनुसार यहाँ बने ये मंदिर लगभग 3000 साल पुराने हैं।

Image Courtesy:Schwiki

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

इनका निर्माण करीब 8वीं से 11वीं शताब्दी के बीच किया गया था।

Image Courtesy:Schwiki

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

मंदिरों के चारों तरह बनाई गई ऐतिहासिक मूर्तियां पत्थर को खोद कर बनाई गई हैं जो हूबहू खजुराहो की वास्तुशैली से मेल खाती हैं।

Image Courtesy:Schwiki

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

कई मूर्तियां तो मोहम्मद गजनवी के आक्रमणों व कार्यकाल के समय तोड़ दी गई थीं। यहाँ की हर मूर्ति कहीं न कहीं से खंडित है।

Image Courtesy:Schwiki

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

यहाँ स्थित माता के मंदिर के लिए कहा जाता है कि यहाँ स्थापित मूर्ति अपने आप ही यहाँ गठित हुई थी। किसी ने भी इस मूर्ति का स्थापन नहीं किया था।

Image Courtesy:Schwiki

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

मंदिरों और मूर्तियों की वास्तुकला में की गई बारीकियां उस समय के शिल्पकारों की कार्य कुशलता को पूरी तरह से दर्शाते हैं।

Image Courtesy:Schwiki

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

आखिर ऐसा क्या है ओसियां में?

आज ओसियां एक ओएसिस या राजस्थान के रेगिस्तान में झरने की तरह है।

Image Courtesy:kikumjy

ओसियां में और क्या करें?

ओसियां में और क्या करें?

ओसियां कलात्मक मंदिरों के अलावा, ऊंट की सवारी के लिए भी प्रसिद्ध है। पर्यटकों के पास मंदिरों और उनकी वास्तुकला के सुंदर दृश्य का आनंद लेते हुये ऊंट की सवारी का भी मज़ेदार विकल्प है।

Image Courtesy:kikumjy

ओसियां कैसे पहुँचें?

ओसियां कैसे पहुँचें?

सड़क यात्रा द्वारा: जोधपुर से कई बस सुविधाएँ ओसियां तक के लिए उपलब्ध हैं। आप अपनी निजी टैक्सी या कैब बुक करा कर भी यहाँ तक पहुँच सकते हैं।

Image Courtesy:Schwiki

ओसियां कैसे पहुँचें?

ओसियां कैसे पहुँचें?

रेल यात्रा द्वारा: यहाँ का सबसे नज़दीकी रेलवे स्टेशन जोधपुर रेलवे स्टेशन है।

Image Courtesy:L T Gandhi

यात्रा पर पाएं भारी छूट, ट्रैवल स्टोरी के साथ तुरंत पाएं जरूरी टिप्स. Subscribe to Hindi Nativeplanet 

 

hindi.livehistoryindia.com

मंदिरों की नगरी ओसियां

नरेंद्र सिंह जसनगर

-केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देश— जैसी सरस एवं भावपूर्ण अभिव्यक्ति के साथ राजस्थान सदैव से पर्यटकों के स्वागत में पलक-पांवड़े बिछाता आया है।

राजस्थान का नाम आते ही खड़कते खाँडे, घाटियों और पहाड़ो में घोड़ों की टापों की गूंज, मेघ गर्जना सी प्रतीत होती है। जहाँ धधकते आग के शोलों में सर्वस्व होम करने वाली सौभाग्यवती रानियाँ और केसरिया बाना धारण किये मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राण निछावर करने वाले सैकड़ों वीरों के स्मारक, गढ़, क़िले, दुर्ग और मंदिर पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। राजस्थान की स्थापत्य कला अत्यन्त प्राचीन, समृद्ध, अद्वितीय एवं गौरवपूर्ण रही है। इस कला के माध्यम से मानव के अव्यक्त भाव अधिक स्पष्ट होते हैं।

यहाँ राजपूत काल की स्थापत्य कला विश्व विख्यात रही है। जिसके कारण यहाँ के दुर्ग, मंदिर, परकोटे, राजाप्रासाद, जलाशय, स्तम्भ, छतरियां आदि चारों ओर विद्यमान हैं। मुख्य रूप से 7वीं से 13वीं सदी का काल स्थापत्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है। जहाँ-जहाँ राजधानियां बनीं वहाँ नगर विन्यास की भूमिका रही है। इस दृष्टि से भीनमाल, चन्द्रावती, लौद्रवा, चित्तौड़, रणथम्भौर, आमेर, मंडोर तथा ओसियां जैसे नगर विकसित हुए। विश्व पर्यटन दिवस के अवसर पर शैव, शाक्त, वैष्णव और जैन धर्म की त्रिवेणी संगम स्थली ओसियां नगरी के धरोहरों से रूबरू होते हैं।

सच्चियाय माताजी मंदिर का द्वश्य

ओसियां:-‘‘क्षत्रि हुआ साख अठारा उठे ओसवाल बखाणा,
इक लाख चैरासी सहस्रधर राजकुली प्रतिबोधिया,
श्री रत्नप्रभु ओस्यों नगर आसवाल जिणा दिन किया,
प्रथम साख पंवार सेस सिसोदिया सिंगाला,
रणथम्बा राठौड़ वंश चंवाल बचाला,
दया भाटी सोनगरा कछाहा धन गौड़ कहीजै,
जादम झाला जिन्द लाज मरजाद लहीजै,
खखारा पाट औ पेखरा लेणा पटा ज लाख रा,
इक दिवस हता महाजन हुवा सूर बड़ा भिड़ साख रा,,

स्थापत्य कला एवं संस्कृति का अनूठा संगम मारवाड़ की अति प्राचीन ओसियां नगरी में देखा जा सकता है। इस नगरी को प्रसिद्ध तीर्थ स्थल के रूप में जाना जाता है। यही वह नगर है जहाँ पर जैनाचार्य रत्नप्रभ सुरि जी महाराज द्वारा क्षत्रियों की अठारह खापों को जैन धर्म में दीक्षित इसी ओसिया नगरी में होने के कारण ये सभी ‘‘ओसवाल’’ कहलाये। इन्हीं ओसवालों की उद्गम स्थली ओसियां मंदिर स्थापत्य और ओसवालों के कारण विश्व विख्यात है।

यह क़स्बा वर्तमान में पश्चिमी राजस्थान का प्रमुख पर्यटन केन्द्र बना हुआ है। यहां प्रतिदिन देश-विदेशी पर्यटकों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है। यहाँ के प्राचीन इतिहास और प्रमुख स्थलों की जानकारी देते हुए पृथ्वीराज सारस्वत बताते हैं कि 8वीं से 12वीं शताब्दी में निर्मित ओसियां के ये भव्य मंदिर क्रमशः श्री सच्चियाय माता, भगवान महावीर स्वामी, विष्णु भगवान, हरिहर, सूर्य, शिव के अलावा देवी पीपलाज माता के है जो अपनी विशेष स्थापत्यकला के कारण बरबस ही पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षिंत करते हैं। यह क़स्बा जोधपुर से 65 कि.मी. दूर जैसलमेर सड़क मार्ग पर बसा हुआ है।

Support Live History India

अगर आपको लिव हिस्ट्री इंडिया का काम पसंद आता है, तो अपने सहयोग से हमें प्रोत्साहित करें। कोई भी योगदान छोटा नहीं होता और इसमें आपका ज़्यादा समय भी नहीं लगेगा। आपके योगदान के लिए धन्यवाद।

सच्चियाय माताजी की प्राचीन प्रतिमा | नरेन्द्रसिंह

ओसियां का इतिहास:-1

यह पौराणिक नगरी किसी काल में सरस्वती नदी के किनारे बारह योजन लम्बी और नौ योजन चैड़ाई में बसी हुई थी। यहां की दंतकथा, मंदिरों का समूह, यहां वहां बिखरे पड़े भग्नावशेष जो अपनी गौरवशाली संस्कृति और प्राचीन सभ्यता की कहानी बयां करते हैं। इस सम्बन्ध में डा.महेन्द्रसिंह खेतासर बताते हैं कि ओसियां में ब्राह्मण और वैश्य जातियों की प्रधानता रही है। वैष्णव और जैन धर्मों का यह समन्वय भी इस नगर के विकास में सहायक रहा है। इस नगर पर अनेक इतिहासकारों ने शोध एवं सर्वेक्षण किया है। जैन ग्रन्थों में ओसियां के उपकेशपुर, उपकेश पट्टन और भेलपुर पट्टन नाम मिलते हैं। लोक कथा में भीनमाल के राजकुमार उप्पलेव परमार ने अपनी नई राजधानी यहाँ स्थापित की थी।

प्रतिहार कालीन मंदिर हरिहर | लेखक

ओसियां के प्राचीन मंदिर:-

ओसियां अपने मंदिर स्थापत्य कला के कारण विश्व विख्यात है। इन मंदिरों के निर्माणकाल को विद्धानों ने दो काल खण्डों में बांटा है। मंडोर के प्रतिहार शासकों के द्वारा निर्मित यह भव्य मंदिर उनकी कला के प्रति प्रेम को दर्शाता है। 8वीं से 12वीं सदी के मध्य नागर शैली में निर्मित जैन, शैव और वैष्णव धर्मों के लगभग 16 मंदिर यहाँ मौजूद हैं। यह मंदिर ऊँची जगती पर स्थित हैं जिनकी रथिकाओं में देवता सुशोभित किये गये हैं। इनमें कुछ पंचायतन शैली के मंदिर भी बने हुए हैं। इनमें देवी-देवताओं, गणों, दिक्पालों की मूर्तियों में अद्भूत अलंकरण हुआ है। वहीं मूल प्रासाद पर लतिन, जातक, शिखर आच्छादित है। क़स्बे के मध्य ऊँचाई वाली जगह पर स्थित सच्चियाय माता जी का मंदिर 12वीं सदी का माना गया है। इसके मण्डप में आठ तोरण अत्यन्त आकर्षक वितान और वृक्षिका-मदल दिये गये हैं। यह बड़ी ही सुन्दर रचना विधान है। इसमें लतिन शिखर का उपयोग हुआ है।

यहां के मंदिरों की कला में पदम, घटपल्ल, कीर्ति मुख आदि रूपांकनों से अलंकरण हुआ है तथा पत्थरों में विविध रूपांकरण उकेर ने से यहां के हस्तशिल्प कलाकारों की क्षमता पर भी आश्चर्य होता है।

ओसियां का मुख्य भगवान महावीर स्वामी मंदिर रत्न प्रभ सूरि महाराज के आगमन के पश्चात् बनाया गया था। इसका निर्माण राजा वत्सराज (770-800 ई.) के शासन काल में हुआ। यह मंदिर एक परकोटे में स्थित है। कालान्तर में इसका जीर्णोद्वार भी हुआ है। अन्य मंदिरों पर संवत् 1013, 1236 व 1245 के शिलालेख अंकित हैं। पंचायतन शैली में निर्मित हरिहर मंदिर सर्वधर्म समन्वय का प्रतीक है। इस मंदिर में भगवान विष्णु और शिव की संयुक्त मूर्तियां उकेरी गई हैं। क़स्बे में सूर्य, पीपलाज माता मंदिर के अलावा विशाल कातन और मूँग की बावड़ी भी स्थापत्य कला के बेजौड़ स्मारक है।

हरिहर मंदिर | लेखक

यहां मंदिरों में शिव, पार्वती की अर्धनारीश्वर तथा हरिहर हिरण्यगर्भ स्वरूपों की संयुक्त मूर्तियां भी मिलती हैं।

प्रतिहार कालीन मंदिर हरिहर | लेखक

ओसियां में भगवान गणेश का अलग से कोई मंदिर नहीं है। इसके बावजूद गणेशजी की मूर्तियां अधिक संख्या में हैं। लाल पत्थरों से निर्मित यह सभी मंदिर इतने वर्षों बाद भी अपने वैभव को बयां करते हुए खड़े हैं।

मुग़लकाल में इन पर भी कई बार आक्रमण हुए थे जिससे भारी क्षति भी हुई। प्रतिवर्ष रेगिस्तानी बालू के टीलों पर पर्यटन विभाग द्वारा ‘‘मारवाड़ समारोह’’ के दौरान विभिन्न रंगारंग कार्यक्रम में ऊँट की सवारी पर्यटकों को आकर्षित करती है। यहां अंतराष्ट्रीय अतिथि गृह, धर्मशाला, गेस्ट हाउस, थार कैम्प और होटल बने हुए हैं। यहां आस-पास तिवरी, घटियाला, फलौदी, मंडोर सहित अन्य कई पर्यटन स्थल भी मौजूद हैं।

हम आपसे सुनने को उत्सुक हैं!

लिव हिस्ट्री इंडिया इस देश की अनमोल धरोहर की यादों को ताज़ा करने का एक प्रयत्न हैं। हम आपके विचारों और सुझावों का स्वागत करते हैं। हमारे साथ किसी भी तरह से जुड़े रहने के लिए यहाँ संपर्क कीजिये: contactus@livehistoryindia.com

 

ओसियां माता मंदिर, राजस्थान

जोधपुर से लगभग साठ किमी दूर एक जगह है ओसियां. आजकल यह एक तहसील है और वैसे थार रेगिस्तान का बहुत ही पुराना व्यापारिक और धार्मिक केंद्र रहा है. यहाँ शैव, वैष्णव और जैन मंदिर एक साथ ही बने हैं. पहाड़ी पर बने सच्चियाय माता का प्राचीन मंदिर है. सच्चियाय माता का दूसरा नाम साची या सचिया माता भी है और समाज के सभी वर्गों में इनकी मान्यता है. जोधपुर जिले का सबसे बड़ा मंदिर माना जाता है. यहाँ महिषासुर मर्दिनी, शिव, विष्णु, कृष्ण, अर्धनारीश्वर आदि की  सुंदर मूर्तियाँ हैं. मंदिर की लाल पत्थर वाली दीवारों पर खुबसूरत काम है. जालियां और छतों पर कमाल की कारीगरी है.

जैन मुनि श्रीमद् विजय रत्नप्रभा सुरी जी के कथानुसार चामुंडा देवी का दूसरा नाम सच्चियाय माता ही था. कहा जाता है की उनके कारण ही राजा उत्पल देव ( उपल देव ) ने जैन धर्म स्वीकार कर लिया और बलि प्रथा समाप्त हो गई. राजा उत्पल देव ने (सन 900 - 950) स्थान का काफी सुधार किया और यहाँ सौ से ज्यादा जैन मंदिरों की स्थापना हुई जिनमें से कुछ ही बचे हैं. उस समय इस स्थान का नाम उपकेसपुर था.

मंदिर सुबह पांच बजे से शाम आठ बजे तक खुला रहता है. मंदिर में मिठाई, कुमकुम, केसर धुप और चन्दन का प्रसाद चढ़ता है जो वहीँ मिल जाता है. पार्किंग की व्यवस्था है. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:


मुख्य शिखर 

हर इंच पर कारीगरी 

पत्थर पर सुंदर काम  

बीच बीच में बैरिकेड लगाकर सुन्दरता घट गई है 

सुंदर जाली और नक्काशी 

सुंदर जाली और नक्काशी 
चामुण्डा देवी को समर्पित 

प्रवेश के लिए सीढ़ियाँ और आठ सुंदर तोरण 

सजीव मूर्तियाँ 

जगती या चबूतरे की नक्काशी 

इन मूर्तियों के कारण थार का खजुराहो भी कहा जाता है 

सुंदर द्वार 

राजा रानी 

महिषासुरमर्दिनी 

कमाल की मुस्कराहट 

कहानी कहते पत्थर 

अर्धनरनारीश्वर 




 https://jogharshwardhan.blogspot.com/2018/02/blog-post_18.html

 

 जयवाण

जयवाण नाम है एक भीमकाय ऐतिहासिक तोप का जो आजकल जयपुर के किले जयगढ़ में खड़ी है.

इस तोप की ढलाई 1720 में राजा जय सिंह द्वितीय ने कराई थी. मजेदार बात ये है की इसे केवल एक ही बार ही चलाया गया. उस वक़्त राजा जय सिंह द्वितीय और दिल्ली के मुग़ल सुलतान मुहम्मद शाह भी वहां मौजूद थे.

भारी होने के कारण इस तोप को घुमाना मुश्किल था. इस काम के लिए चार हाथियों का इस्तेमाल होता था. तोप की बैरल की लम्बाई 6.15 मीटर है और तोप का वजन 50 टन है. इस में इस्तेमाल किये जाने वाला गोला 50 किलो का था और उसे फेंकने के लिए लगभग सौ किलो बारूद की जरूरत पड़ती थी. कहते हैं की पहियों पर चलने वाली ये तोप विश्व की सबसे बड़ी तोप है पर इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई.

इसका गोला जब पहली और अंतिम बार जब फेंका गया तो लगभग 35-40 किमी दूर गिरा था. हालांकि कुछ लोगों का कहना 11 किमी और कुछ का कहना 22 किमी दूर गिरा था. गोला चाकसू नामक गाँव में गिरा जो 35 किमी दूर था और वहां बड़ा गड्ढा बन गया. बाद में बारिश के पानी से तालाब बन गया 'गोला ताल'. बहरहाल गोला दागने वाला तोपची, आठ अन्य सिपाही और एक हाथी धमक या शॉकवेव से ही मर गए. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

भारी भरकम तोप जयवाण. कई जगह इसका नाम 'जय बाण' या 'जय बान' भी लिखा गया है.   

इन बड़े पहियों का व्यास 9 फुट है 

पहियों के आकार का अंदाजा इस फोटो से भी लग सकता है. अगले दो पहिये काफी ऊँचे हैं और पिछले नीचे. तोप की पूरी लम्बाई 31 फीट और 3 इंच है   

जयवाण तोप का मुहाना 11 इंच का है और मोटाई 8.5 इंच है 

राजस्थान डायरी : उदयपूर

 http://vmashwini.blogspot.com/2024/01/

उदयपूर - कॅपिटल ऑफ मेवाड - City of lakes, झिलों का शहर असलेल्या राजस्थान मधील या सुंदर ऐतिहासिक शहराला भेट देणं म्हणजे कला, राजस्थानी स्थापत्य, तिथला पराक्रमी इतिहास आणि शौर्य गाथा या सगळ्याची अनुभूती देणारा एक सुरेख अनुभव. Every corner of this city has some kind of historic significance and beauty.

उदयपूर मधील सगळ्यात जुना तलाव म्हणजे पिचोला तलाव. १३६२ साली कृत्रिम रित्या तयार केलेल्या या लेक पिचोलाच्या एका किनाऱ्यावर असलेले एक हॉटेल म्हणजे हॉटेल लेक पिचोला, जिथे आम्ही उदयपूर मधले दोन दिवस मुक्काम केलेला. या अतिशय सुंदर आणि भव्य हेरिटेज हॉटेल मध्ये पाऊल ठेवल्या पासून प्रत्येक क्षणाला आम्हाला राजपुताना थाट, कला, वैभव आणि वास्तुकलेची प्रचिती येत होती. हे शाही हॉटेल म्हणजे खूप जुना ऐतिहासिक वारसा असलेली एक भव्य, सुंदर हवेली.

अठराव्या शतकात उदयपूरच्या जहागीरदारांनी त्यांचे खाजगी शाही निवासस्थान म्हणून बांधलेली पिपलीया हवेली म्हणजे हे आत्ताचे हॉटेल लेक पिचोला. १९८५ मध्ये पिपलीया घराण्याचे वंशज ठाकूर चंद्र भानू सिंग यांनी या भव्य हवेलीच्या काही भागाचे हॉटेलमध्ये रूपांतर करून ती पर्यटकांसाठी उपलब्ध करून दिली आणि उरलेला भाग राजघराण्यासाठी राखीव ठेवला जिथे आत्ताही त्यांचे पुढचे वंशज वास्तव्यास आहेत. अशा या राजघराण्याशी संबंधित ऐतिहासिक वास्तूमधल्या दोन दिवसाच्या मुक्कामात उदयपूरचा राजपुताना शाही थाट अनुभवणं ही एक जपून ठेवावी अशी आठवण. म्हणून या हवेली बद्दल थोडं विस्तारून सांगावं असं वाटलं.

Hotel Lake Pichola 
  

हॉटेल लेक पिचोलाचा तलावा किनारीचा भाग 

या हॉटेल मध्ये आम्ही जिथे राहिलो ती Lakeview असलेली एक प्रशस्त मोठी रूम होती ज्यामध्ये एका भागात सुंदर सुशोभित भारतीय बैठक आणि दुसऱ्या भागात मोठा झुला होता. शिवाय तलावाच्या बाजूने सूर्योदय, तेव्हाचं केशरी आकाश दिसेल अशी रूमची मांडणी होती. हॉटेल मधल्या प्रत्येक खांबांवर, दरवाजांवर, छोट्या मोठ्या कमानींवर केलेलं नक्षीकाम, उंच छतांवरून खाली दिसणारी मोठमोठी झुंबरं, सुशोभित भिंती, नाजूक एम्ब्रॉयडरी केलेल्या पडद्यांच्या उंच कमानी अगदी नजर हटवता येऊ नये अशा कलाकुसरीने भरलेली तिथली प्रत्येक गोष्ट जुन्या काळाच्या राजपूत वैभवाची साक्ष देत होती.

आमच्या रूमच्या एका भागात असलेली ही बैठक खोली 

दुसऱ्या भागात असलेला सुंदर झोपाळा

Dressing area 

पिचोला हॉटेल रुफटॉप रेस्टॉरंट 

ब्रेकफास्ट हॉल

या हॉटेल मधल्या पहिल्या दिवशीच्या इतक्या सुंदर स्वागता नंतर आता उदयपूर शहर बघण्याची आमची उत्सुकता वाढली.
Beautiful arch 

पुढच्या दोन दिवसात आम्ही महाराणा उदयसिंग-२ यांनी सोळाव्या शतकात बांधलेला सिटी पॅलेस जो भारतातला दुसऱ्या क्रमांकाचा मोठा पॅलेस आहे तो पाहिला. तिथली ऐतिहासिक घटनांच्या वर्णनाने भारावून टाकणारी detailed guided टूर तिथल्या ऐतिहासिक घटनांचे साक्षीदार असलेले राजमहालाचे भाग पाहणं फार सुंदर वाटलं. उदयसिंग-२ यांचे पुत्र म्हणजे शूर, पराक्रमी योद्धा महाराणा प्रताप, हळदी घाटची ऐतिहासिक लढाई, अठराव्या शतकात तयार केलेला फतेहसागर तलाव, राणा संग्रामसिंग यांनी त्यांच्या राणीसाठी बांधलेली सहेलियों कि बाडी, सूर्यास्ताच्या सुंदर छटा दाखवणारा गुंगुर घाट, जवळच असलेला (उदयपूर पासून १०० कमी) कुम्भलगडचा किल्ला जिथे महाराणा प्रताप यांचा जन्म झाला. महाराणा कुंभा यांच्या पराक्रमाच्या अनेक कथा या सगळ्या गोष्टी जाणून घेताना, त्यावेळेचे राजपुती वैभव बघताना फार भारावून जायला झालं.

उदयपूर पॅलेस

शीश महल 



राजस्थान मधल्या इतर भागांच्या तुलनेत हा मेवाड भाग माझ्यासाठी जास्त उत्सुकता वाढवणारा होता. खरंतर जयपूर, जोधपूर, जैसलमेर इथल्या आणि जवळपासच्या इतर राजपूत राजांनी मुघल किंवा इंग्रज यांच्याशी मैत्री साधून युद्धे व त्यातली हानी टाळली आणि त्यांच्याच अधिपत्याखाली स्वतःची राज्ये चालवली आणि राजेशाही ऐश्वर्य उपभोगले, जोपासले.

पण त्या तुलनेत मेवाड हा भाग मात्र त्या त्या वेळच्या राजांनी आधी खिलजी मग मुघल आणि नंतर इंग्रज या कुणाच्याही अधिपत्याखाली कधीही येऊ नये यासाठी आटोकाट प्रयत्न केला, युद्धे केली. मोडेन पण वाकणार नाही हा बाणा राखत मेवाडच्या या स्वाभिमानी राजपुतांनी शेवटपर्यंत प्रयत्न केले पण हार पत्करली नाही. चौदाव्या शतकात असलेली मेवाडची राजधानी म्हणजे भव्य असा पसरलेला चित्तोडगड म्हणजे चित्रकूट पर्वत तिथला रंजित इतिहास जाणून घेणे म्हणजे स्तिमित व्हायला झाले. बाजूने भलामोठा पसरलेला अरवली पर्वत, गीरचे घनदाट जंगल, आजूबाजूची इतर अरण्ये अशी सुंदर नैसर्गिक सुबत्ताही लाभलेला राजस्थानचा हा देखणा भाग.

सहेलियोंकी बाडी

Fatehsagar lake

असे हे सुंदर उदयपूर शहर पर्यटन क्षेत्र म्हणून शासनानेही खूप छान विकसित केले आहे. फ्रेंच, जर्मन, डच, अमेरिकन आणि आणखी बऱ्याच देशातले लोक पर्यटनासाठी इथे फिरताना आढळले. इथल्या सगळ्या तलावांची स्वच्छता अतिशय उत्तम राखली आहे. सिटी पॅलेस अजूनही ट्रस्ट स्वरूपात इथल्या राजघराण्याच्याच ताब्यात आहे. इथले राजघराणे कुठल्याही राजनैतिक पक्षाशी जोडलेले नाही. पर्यटक हेच इथले महत्वाचे उत्पन्नाचे साधन. कला कुसरीच्या वस्तूंनी बाजारपेठा गच्च भरलेल्या दिसल्या. संपूर्ण राजस्थान हे कलाकुसरीच्या असंख्य वस्तू (handycrafts), नैसर्गिक रंगांनी काढलेले paintings, पिचवई paintings, हातानी विणलेले कॉटन, लोकर आणि सिल्कचे सुंदर rugs, लहरीया आणि बांधणी साड्या आणि मार्बल यासाठी का प्रसिद्ध आहे हे तिथे गेल्यावर, तिथल्या लोकल आर्टिस्ट्सला भेटल्यावर त्यांची कला प्रत्यक्ष पाहिल्यावर लगेच लक्षात येते. ताजमहाल बांधण्यासाठी लागलेले संपूर्ण मार्बल हे याच भागातून नेले गेले होते, हे नव्यानेच कळले. 

निवांत वेळ काढून नक्की भेट द्यावे असे हे कलात्मकतेने सजलेले, ऐतिहासिक वारसा लाभलेले सुरेख शहर - उदयपूर.


 राजस्थान मधील पहिले १५ किमी महामार्ग अतिशय भयानक स्थितीत होता. मोठ्या झाडांचे वृक्षारोपण करता येईल इतके मोठे खड्डे होते काही ठिकाणी. नंतर मात्र रस्ता उत्तम होता. मोठमोठी मशिनरी घेऊन जाणारे ट्रक सोबतीला होतेच. काही ट्रक तर इतके मोठे होते की त्यांना ५०-६० च्या आसपास चाके असावीत. ८:१५ च्या सुमारास एका धाब्यावर चहा पिण्यासाठी थांबलो. ढाब्याच्या मागे एक पांढरा पर्वत दिसत होता. हा एक प्रकारचा दगड असून त्याच्या मुर्त्या बनवतात अशी माहिती एकाने दिली.

पांढरा पर्वत

ढाब्यावरच्या बरणीत गठीया नामक वेगळाच पदार्थ होता. चहा गठीया खाऊन प्रवास पुढे सुरु झाला. आजचा आमचा प्रवास खूपच थांबत थांबत चालला होता. कारण एकच. राजस्थान म्हणजे प्रचंड मोठे राजवाडे किंवा वाळूचे वाळवंट आणि प्रचंड ऊन असे मला अपेक्षित होते. पण इथे राजस्थानात प्रवेश केल्यापासून आम्हाला दिसणारे दृश्य एकदम वेगळे होते. रस्त्याच्या बाजूने छोट्या छोट्या टेकड्या, त्यावर खुरटे हिरवेगार गवत आणि ह्या सर्वांच्या जोडीला प्रचंड स्वच्छता. त्यामुळे आम्ही दर ५ मिनिटांनी थांबत होतो. प्रत्येक वेळी एखाद्या जागी थांबलो की 'आता हा शेवटचा स्टॉप. मग डायरेक्ट उदयपूर' असे स्वतःला बजावायचो. पण इतका सुंदर निसर्गरम्य परिसर पाहून आपोआप थांबले जात होते. राजस्थान मध्ये इतका हिरवागार भाग देखील आहे हे मला माहीतच न्हवते.

९ वाजता एका हॉटेलवर नाष्टा केला.
'राजस्थान में तो बहुत हरियाली है और काफी साफ सुथरा है' मी हॉटेलच्या मालकाला बोललो. तो खुश झाला.
'यहां ऐसे ही हरियाली होती है. आप बारिश के मौसम मे आये है इसलिये बहुत खूबसूरत है नजारा. यहां से आगे उदयपूर तक नजारा और भी अच्छा होगा. हमको कभी भी पाणी की कमी नहीं होती. १५ फीट पर पाणी मिल जाता है. रेगिस्तान उधर जैसलमेर साईड. इधर रेगिस्तान नहीं.' - इति हॉटेल मालक. मग कुठून आलाय, कुठे निघालाय वगैरे चौकश्या झाल्या. पुण्याहून लडाखला कारने निघालोय हे ऐकून त्याने कौतुक केले. हॉटेल मालकाचा निरोप घेऊन प्रवास सुरु केला आणि उदयपूर गाठले. शामलजी ते उदयपूर ह्या प्रवासासाठी तब्बल साडेतीन तास घेतले होते आम्ही. वास्तविक हे अंतर विनाथांबा गेले तर जेमतेम २ तासात पार होऊ शकते. काल रात्री उदयपूरला न येता शामलजी मध्ये राहण्याचा घेतलेला निर्णय योग्य ठरला होता. नाहीतर हे सर्व निसर्गसौंदर्य रात्रीच्या अंधारात दिसलेच नसते.

उदयपूर जवळ आम्ही चुकीचा बायपास घेतला. फक्त २ लेनचा आणि ट्रकची प्रचंड वाहतूक असलेला हा रस्ता पार करण्यात अर्धा तास गेला. त्या रस्त्याने सुखेरला आलो. सुखेर, नाथद्वारा, राजसमंद पटापट ओलांडले. नाथद्वाराच्या पुढे मशिनरी वाहून नेणारे ट्रक जाऊन त्याजागी प्रचंड मोठे संगमरवरी दगड खाणीतून घेऊन जाणारे ट्रक दिसू लागले.

संगमरवरी दगड घेऊन जाणारा ट्रक

ह्या ट्रकच्या चालकाशी दोन शब्द बोललो. 'ह्या भागात संगमरवराच्या खाणी आहेत. हा दगड किशनगडला कारखान्यात पाठवला जातो. तिथे त्यापासून फारशी बनवतात' अशी माहिती ट्रक चालकाने दिली. प्रवास पुढे चालू. उदयपूरच्या पुढे हिरवळ कमी झाली होती, रखरखाट जाणवत होता आणि प्रचंड ऊन होते. राजसमंदच्या पुढे एका पूर्णपणे बांबूपासून बनवलेल्या धाब्यावर जेवणासाठी थांबलो. दुपारची जेवणाची वेळ असून देखील ढाब्यावर अजिबात गर्दी न्हवती आणि आम्ही एकमेव ग्राहक होतो. त्यामुळे ढाबा चांगला नसेल अशी शंका आली. पण नंतर जे चवदार जेवण समोर आले त्यावरून ती खोटी ठरली. जेवण आणून देणाऱ्या मुलाला आम्ही जेवण चांगले होते असे सांगितले. तो खूप खुश झाला. 'हमारा कूक है ही बढिया.' असे म्हणून त्याने जेवणानंतर बिलाबरोबर बडीशेपच्या ऐवजी जी चोकोलेट्स आणली होती ती सगळी जबरदस्ती मुलाच्या खिशात कोंबली. ह्या भागात पाण्याची वगैरे परिस्थिती कशी असते असे विचारल्यावर 'हम बहुत सोच समझकर इस्तेमाल करते है. इसलिये कभी कम नहीं पडता'असे म्हणाला. जेवण आटोपून पुढे निघालो. भीम नामक गाव आले. इथे जत्रा भरली होती आणि त्यासाठी निम्मा हायवेच वाहतुकीला बंद करून टाकला होता. कसलेतरी झेंडे घेऊन लोक नाचत होते. अरुंद रस्त्यावरून प्रचंड वाहतूक चालू असल्याने इथे थोडा वेळ वाया गेला. भीम मधून बाहेर आलो आणि लगेच अजमेर, जयपूरला उजवीकडे वळा असे दर्शवणारा बोर्ड दिसला. पण गूगल मॅप मात्र सरळ जा असे दर्शवत होते. आम्ही उजवीकडचा रस्ता घेतला तर 'Take a U -Turn' असे प्रेमळ आवाजात गूगल मॅप मधली महिला बजावू लागली. आता कुणाचे खरे समजावे हा प्रश्न होता. मग तिथल्या एका हॉटेल मालकाकडे चौकशी केली. जुन्या हायवेवर खूप गर्दी असते. हा नवीन हायवे (NH -१४८ D) आहे. ह्यावरून गेल्यास ब्यावर आणि अजमेर वाटेत लागत नाही. आणि सरळ किशनगडला जात येते अशी माहिती हॉटेलमालकाने दिली. मग गूगल मॅप्सला बंद केले आणि NH -१४८ D वरून निघालो.

NH -१४८ D

जवळपास ७० किमीचा हा दुपदरी रस्ता कल्पना करता येणार नाही इतका गुळगुळीत होता. वाटेत फारशी लोकवस्ती नाही आणि वाहतूक देखील नगण्य. अंदाजे ७० किमी जाऊन लांबा गावाजवळ किशनगडला जाण्यासाठी डावीकडे वळलो. ४:१५ च्या दरम्यान किशनगड ओलांडले. दुदू जाऊन पिंक सिटी जयपूर आले. पिंक सिटीला बायपासनेच बाय बाय केले तेव्हा ६ वाजून गेले होते. चांदवाजीच्या थोडे अगोदर एक वालुकामय टेकडी दिसली. तिथे जवळ जाऊन बघितले तर ती एकदम मऊ अशी वेगळ्याच प्रकारची माती होती. वाळू वाटत न्हवती. आमच्या प्लॅन प्रमाणे आज आम्ही चांदवाजीमध्ये राहणार होतो. पण आज आपण अजून थोडे अंतर जाऊ शकतो असा विचार करून पुढे जाऊ आणि शाहपुरा मध्ये मुक्काम करू असे ठरवले. शाहपुरा येताच महामार्गावरून शहरात शिरलो. तिथल्या एका काकांना विचारले तर त्यांना लॉजची काहीच माहिती नव्हती. ते मला तिथल्या एका दुकानदाराकडे घेऊन गेले.
'गांव में कुछ लॉज नही है. आप फ़िरसे हायवे पर जाईये. ३ किलोमीटर की बाद मिलन लॉज आयेगा. वो अच्छा है.' - दुकानदार काका
जवळपास ३० हजार लोकसंख्येच्या ह्या शहरात लॉज नाही हे ऐकून नवल वाटले. काकांचे आभार मानून परत महामार्गावर आलो. ३ किमी झाले, ४ झाले, ५ झाले तरी मिलन लॉज काही दिसलाच नाही. 'कुठे नेऊन ठेवलाय मिलन लॉज ?' असे वाटले. रस्त्याच्या कडेने इतका भयाण अंधार होता की त्यामुळे लॉज येऊन गेलेला आपल्याला दिसलाच नसेल असे वाटून आम्ही निराश झालो. बघू आता पुढे काय मिळतेय का असे ठरवून पुढे निघालो आणि अचानक मिलन लॉज दिसला. काकांनी ३ किमी सांगितले होते पण प्रत्यक्षात ते अंतर जवळपास ८ किमी होते. असो. लॉज ठीक होता. बाहेर व्यवस्थित गवत, झोपाळे, थोडी खेळणी देखील होती. प्रचंड उकाडा असल्याने ए.सी. रूम घेतली. फक्त १२००/- रु. सामान रूमवर टाकून खाली जेवायला गेलो. मेनू कार्ड मध्ये सगळ्या पंजाबी डिश. दाल बाटी सोडून तुमची कुठली स्पेशल डिश आहे का इथली असे विचारल्यावर 'हमारा स्पेशल सिर्फ दाल बाटी. और दाल बाटी तो अब हमारे लोग भी नहीं खाते तो आप क्या खाओगे. सबको पंजाबी ही चाहिये.' असे लॉजच्या मॅनेजरने प्रांजळपणे सांगितले. मग पंजाबी जेवण करून लॉजच्या लॉनवर अर्धा तास फेऱ्या मारल्या. शामलजी ते उदयपूर आरामात प्रवास करून देखील आज ६२० किमी अंतर कापले होते. आता उद्याचे डेस्टिनेशन होते चंदीगड.

मेवाड्प्रांताच्या मोहीमेवर...

Submitted by स_सा on 18 February, 2009 - 23:57

भटकंती किल्ले रणथंम्भोर, चितोडगड, आणी कुंम्भालगडाची.....

दिवाळीला मिळणा-या सलग सुट्टीचा फायदा घेत थोड्या लांबच्या अंतरावरील किल्ल्यांना भेट देण्याची योजना आखली होती. २५ ऑक्टोबर ते ३० ऑक्टोबर ला फोलिएज ह्या संस्थेने रणथंम्भोर च्या राष्ट्रीय उद्यानात जंगल सफारीचे आयोजन केले होते. रणथंम्भोर हे खास वाघांसाठी संरक्षीत करण्यात आलेले उद्यान आहे. आजून दोन दिवसांची सुट्टी काढून आम्ही राजस्थानातील तेथुन जवळ असलेल्या चितौडगड, आणी उदयपुर ह्या ठिकाणी जाण्याची योजना आखली.

२५ ला पुणे ते मुंबई / बान्द्रा आणी तेथुन बान्द्रा-जयपुर एक्सप्रेस ने २६ तारखेला सवाई माधवपुर ह्या रणथंम्भोर पासून जवळाच्या स्थानाकावर निर्धारीत वेळेपेक्षा फक्त एक तास उशीराने पोहोचलो. दिवाळीच्या सुट्ट्यांमुळे गाडीला मात्र प्रचंड गर्दी होती. ह्या रणथंम्भोर जंगलसफारीचे संपुर्ण मार्गदर्शन राहुल राव (फोलिएज चा सदस्य)हा त्याच्या दोन सहका-यांच्या मदतीने करणार होता. जंगल सफारीसाठी येथे छत नसलेला २०-२५ लोक आरमात बसू शकतील असा लष्करी पद्धतीचा ट्रक ( कँटर ) उपलब्ध आहे, तसेच केवळ ५-६ लोक बसतील अश्या मारूती जिप्सीने सुद्धा जंगलात जाता येते. सवाई माधवपुर पासून ४ किमी अंतरावरील साध्या पण चांगल्या अश्या हमीर नावाच्या हॉटेल मधे आमची सर्व व्यवस्था करण्यात आली होती. हॉटेल ला पोहोचलो तोपर्यंत १०.३०-११ वाजले होते. राहुलने दुपारी दोन वाजता तयार राहाण्यास सांगीतले. आज रणथंम्भोर च्या किल्ल्यावर जायचे होते.

तिथे डॉ. धर्मेद्रजी ह्यांचा परिचय राहुलने करून दिला. धर्मेद्रजी हे त्या भागातील एक सामाजीक कार्यकर्ते, जंगलाचे संरक्षण, जंगलामुळे त्यावर अवलंबुन असणा-या समाजाचा त्यांनी सखोल अभ्यास केला आहे. धर्मेंद्रजीनी दिलेल्या माहीतीनुसार १९९६ च्या सुमारास जंगलाच्या आतमधे तब्बल २० गावे होती. त्यांची जनावरे तिथेच चरत, तसेच जंगलाच्या भोवताली मोंगया समाजाची वस्ती होती, वन्या प्राण्यांची शिकार करणे त्यांची विक्री करून त्यापासून मिळणा-या उत्पन्नावरच त्यांचा उदरनिर्वाह चालतो. नंतरच्या काळात वाघांची बेसूमार शिकार झाली त्याचे कारण म्हणजे चिन च्या बाजारपेठे मधे भारतीय वाघांना असलेली प्रचंड मागणी आणी त्याप्रमाणे मिळणारी किंमत, चिन मधे वाघांचा प्रत्तेक अवयवाचा उपयोग वेगवेगळी औषधे बनवण्यासाठी केला जातो. तेथील निवृत्त वन अधिकारी फतेसिंहजी ह्यांच्या मदतीने धर्मेद्रजींनी अनेक शिकारी पकडल्या आहेत. चा-यासाठी होणारी घुसखोरी रोखण्याच्या प्रयत्नात धर्मेंद्रजींना गंभीररीत्या मारहाण करण्यात आली होती. जंगलातील २० पैकी आत्ता पर्यंत १६ गावांचे जंगलाच्या बाहेर पुनर्वसन करण्यात आले आहे. मोंगया शिकारी समाजाच्या पुनर्वसनाच्या कामात धर्मेन्द्रजींचे मोठे योगदान आहे.

आरवली पर्वत रांगेमधील आणी घनदाट जंगलाच्या मध्यभागी हा किल्ला आहे. एका खिंडीमधे बांधलेला दरवाजा पार करुन मुख्य जंगल भागात येऊन पोहोचलो, त्याच बरोबर राहुलने तिथे दिसलेले पक्षी, प्राणी ह्यांची माहीती देणास सुरवात केली होती. किल्ल्यापासुन चारी दिशांनी उंच अश्या डोंगररांगांची नैसर्गीक तटबंदी आणी मधल्या मोकळ्या रांगेत बिबट्या, वाघ, अस्वले, मगरी आदी हिंस्त्र श्वापदांनी युक्त असे जंगल आहे. किल्ल्याची उंची तशी फरशी नाही पण किल्ल्याला चारी बाजुने बांधून काढलेली तटबंदी, अनेक बुरुज बांधून हा किल्ला अधिक संरक्षीत करण्यात आला आहे. कोण ह्या किल्ल्याच्या वाटेला जाईल अशी शंका नक्की आपल्या मनात येतेच. पण किल्ल्याचा इतिहासात डोकावून पाहील्यास ह्या किल्ल्यासाठी अनेक लढाया झाल्याचे दिसते. किल्ल्यातील फलाकावर लावलेल्या माहीतीनुसार ११९२ मधे चौहानांच्या ताब्यात आला, १२८२ मधे हमीर नावचा चौहान वंशीय राजा इथे राज्य करीत होता. तर १२९० मधे जलालुद्दीन खिलजी ने तिन वेळा हा किल्ला जिंकण्याचा असफल प्रयत्न केला. १३०१ मधे अल्लाउद्दीन खिलजी ने स्वतः १ वर्ष किल्ल्याला वेढा देऊन हा किल्ला जिंकुन घेतला आणी किल्ल्याची मोठ्या प्रमाणात तोड-फोड केली. त्यानंतर १६ व्या शतकात हा किल्ला मालवा च्या राणा सांगा च्या ताब्यात होता. त्यानंतर तो मुघलांच्या ताब्यात गेला आणी त्यानंतर परत १७ व्या शतकाच्या शेवट हा किल्ला जयपुर नरेषांच्या ताब्यात आला. १७ व्या शतकानंतर तसेच इंग्रज शासनकाळात ह्या किल्ल्याचा वापर शिकारी करण्यासाठी छावणी म्हणुन झाला. किल्ल्यावर अनेक हिंदु / जैन मंदिरे, एक मशिद आणी एक दर्गा आहे, पाण्याची तळी आणी विहिरी आहेत. अनेक महालांचे अवशेष आजून तग धरुन आहेत. तटबंदीत एका मागे एक असलेले नौलखा दरवाजा, हाथी दरवाजा, गणेश दरवाजा असे भव्य आणी भक्कम चिलखती दरवाजे पार करताना किल्ल्याच्या भव्यतेची कल्पना येते. किल्ल्याच्या वरील भागात सुद्धा वन्य जीवांचा मुक्त संचार आहे. किल्ल्याच्या तटबंदीवरून दिसणारा जंगल परीसर बराच वेळ निरखत बसलो. किल्ल्याच्या पायथ्याशी भले मोठे राजबाग नावाचे तळे आहे, त्यासभोवतालच्या कुरणांचे निट निरीक्षण केल्यावर तेथे काही हरणे चरताना दिसली. संध्याकाळ होत आलेली पाहून तिथूनच परत फिरलो.

हॉटेल वर पोहोचल्यावर सगळ्या मंडळीची बैठक भरवण्यात आली. उद्यापासुन आमची जंगलसफारी चालू होणार होती. आयत्यावेळेस तिथे जाऊन सफारीचे बुकिंग मिळणे अशक्य असते, तसेच त्या बरोबर प्रत्तेकाला आपली वैयक्तीक माहिती विहीत नमुन्यात जितक्या वेळा सफारीला जायचे तितक्या प्रतींमध्ये भरून द्यावी लागते. राहुलने भडक रंगाचे कपडे वापरू नका, कोणत्याही प्रकारचे सुगंधी द्रव्य आंगाला / कपड्याला लावू नका, आणी महत्वाचे म्हणजे सकाळी ६ वाजता निघण्यासाठी तयार रहाण्यास सांगितले. त्याच बरोबर त्याने ह्या जंगलाची माहीती सांगितली. जंगलाचे मुख्यत्वे दोन भाग असतात एक म्हणजे त्याचा गाभा ( कोअर एरिया) आणी बाहेरील भाग ( बफर एरिया) रणथंम्भोर च्या गाभ्याचा विस्तारच सुमारे ४०० चौ कि.मी चा आहे. त्या भागातील केवळ २५% भाग हा पर्यटकांसाठी खुला असुन तो पहाण्यासाठी सुद्धा तिन दिवस कमी पडतात. २००४ मधे वाघांची संख्या ही केवळ १३ वर आली होती पण सध्या ती २५-३० च्या दरम्यान असावी असे सांगितले जाते. राहुल ला राना-वनांचे प्रचंड आकर्षण आहे, हे जंगल तर त्याला पाठ झाले आहे. वन खात्याच्या टायगर मॉनिटरींग प्रकल्पात त्याने भाग घेतला होता. त्यात त्याला जंगलचा तसेच वाघाच्या जीवनाचा अतिशय जवळून आभ्यास करता आला. जेव्हा बाहेरचे गवताचे रान कमी होऊ लागते तेव्हा जंगलाच्या बाहेरील गावतले धनगर / मेंढपाळ त्यांची जनावरे चा-यासाठी जंगलात घुसवतात. त्यांना रोखण्यासाठी जंगलाच्या सिमा भागात अधिक प्रमाणात बंदोबस्त ठेवावा लागतो तेव्हा जंगलाच्या आतल्या भागात काम करणारे कर्मचारीच हे काम करतात आणी त्यांच्या जागेवर जंगलाची आवड असणा-या कार्यकर्त्यांवर ही जबाबदारी देण्यात येते, दोन कार्यकर्ते आणी एक वनखात्याचा कर्मचारी मिळून १५-१५ दिवस हे काम करतात. राहुलने उद्या आजुन लवकर उठायचे आहे अशी सुचना केली, त्यामुळे जेवण करून लगेच झोपी गेलो.

दुस-या दिवशी पहाटे ५.३० ला राहुलच्या जोडीदाराने आमची झोपमोड केली, त्याच्यावरच ही खास जबाबदारी सोपवण्यात आली होती. ६.३० ला कँटर आला आणी वाघाच्या शोधात आमची जंगलसफारी सुरु झाली. पर्यटकांची एका जागी गर्दी होऊ नये म्हणुन जंगलाचे ५ विभाग करण्यात आले आहे. सफारीच्या त्यावेळेस ठरलेल्या वेळेत ठरलेल्या विभागातच त्या त्या वहानाने प्रवास केला पाहीजे. तसेच ह्या जंगलात प्रवेशाची आणी बाहेर पडण्याची वेळ काटेकोर पणे पाळली जाते. संध्याकाळी सहा नंतर पर्यटकांना आत प्रवेश मिळत नाही तसेच तिथे थांबताही येत नाही. आज सकाळी आम्हाला झोन क्र. १ मधे जाण्याची परवानगी दिली होती. आतल्या प्रवेशद्वारावर रोजच ट्रिपाय नावाचा देखणा पक्षी आमचे स्वागत करायचा. चढ उतार तर काही ठिकाणी तिव्र वळणे असलेला आणी एका वेळेस एकच कँटर जाऊ शकेल इतक्याच रुंदीचा कच्चा रस्ता आहे. मधे मोकळ्या कुरणांमधे काही हरणं आणी सांबर चरताना दिसले. थोडे पुढे गेल्यावर डोंगरावरील भागातून वानराने दिलेला हकारा ऐकू आला. गाडी जागेवर बंद केली आणी सगळे जण त्या दिशेने पाहू लागले. परत एक दोन वेळा तसाच इशारा मिळाला ह्या वेळेस सांबरानेही इशारा ( कॉल ) दिला होता, पण वाघोबा काही समोर यायला तयार नव्हते. राहुल तो पर्यंत सतत दिसणा-या वेगवेगळ्या पक्ष्यां बद्दल सतत माहीती पुरवत होताच. जंगलाच्या ह्या भागात अस्वले दिसू शकतात. तासभर तिथेच रेंगाळलो आणी मागे फिरलो. हॉटेलवर जेवण करून परत एकदा जंगलात शिरलो दुपारच्या फेरीसाटी झोन ५ मधे गेलो. हा रस्ता जंगलातील राजबाग तलावाच्या बाजूने गेलेला आहे. ह्या तलावामधे मगरींचा वावर आहे. काही मगरी, एक मोठ्या आकाराचे कासव दिसले. तर विविध प्रकारचे पाण पक्षी पहायला मिळाले. त्या फेरीमधे सुद्धा वाघ काही दिसला नाही. उलट ५ मिनिटे बाहेर पडण्यास उशीर झाल्याने वन अधिका-यांची बोलणी खावी लागली. पण जंगलाचे जे काही दर्शन घडले ते सुद्धा काही थोडके नव्हते.

नंतरच्या दिवशी सकाळी ५ वाजता झोपमोड करण्यात आली होती, पटापट आवरून कँटर मधे जाऊन बसलो. मुख्य प्रवेशद्वार पार केले, पुढचे द्वार मात्र आजुन बंदच होते काही मिनिटातच तेही उघडले. पहिली आमचीच गाडी त्या विभागात शिरणार होती. आज झोन क्र. ४ मधे फिरण्याची परवानगी मिळाली होती. थोडे आत गेल्यावरच इशारतीचा आवाज झाला. तिथे थांबुन थोडा अंदाज घेतला आणी आजून थोडे पुढे गेल्यावर चालकाने गाडी थांबवली. खाली मातीमधे वाघाच्या पावलांचे उमटलेले ठसे त्याने दाखवले आणि ते काही वेळांपुर्वीचेच असावेत असे त्याने सांगितले. पुढे अनेक ठिकाणी वाघाच्या पावलांचे ठसे दिसले. ह्या झोन मधे एका तलावाच्या बाजुला एक चौकी आहे, फक्त तिथेच तुम्हाला कँटर मधून खाली उतरण्याची परवानगी आहे. त्या तलावाचे पाणी एकदम स्तब्ध होते. तळ्याचे त्यातील प्रतिबिंबांचे काही फोटो काढले व परत पुढचा प्रवास सुरू केला. काही अंतर गेलो असेल तोच चालकाने गाडी बंद केली. गाडीच्या मार्गातच एक वाघीण बसली होती. तिच्या मागील बाजूने आजून एक गाडी आल्याने ती वाघीण तेथून उठली आणी आमच्या दिशेने चालत येऊन झाडीमधे घुसली. झाडामधे त्या वाघीणीचे दोन बछडे सुद्धा दिसले, बघताना ते बछडे आहेत असे कधीही वाटले नसते. वन अधिका-ने सांगितले की त्यांचे वय केवळ दिड वर्षाचे आहे. वाघीण साधारण पणे दोन वर्षापर्यंत त्यांचा संभाळ करते. इथे जंगलात प्रत्तेक वाघाचे स्वतंत्र साम्राज्य असते, त्याचा विस्तार १५ ते ३० चौ. किमी. इतका किंवा त्यापेक्षाही अधीक असू शकतो. वाघाचे ते रुप डोळ्यात साठवून घेत हॉटेलवर परतलो. राहुलने फतेसिंगजी ह्याच्याबरोबर एका बैठकीचे आयोजन केले होते. फतेसिंगजी हे निवृत्त शासकिय वन अधिकारी. निवृत्ती नंतरही जंगलाशी असणारे त्यांचे नाते जरा देखील कमी झाले नव्हते. ब्रिटिशांच्या काळात इंग्लंडच्या राणीला जेव्ह्या शिकार करायची होती तेव्ह्या फतेसिंहजी तेथे व्यवस्था पहायला होते. राजे लोकंची शिकारीची पद्धत त्यांनी सांगितली. जंगलात रुजू झाल्यावर त्यांचा सामना ज्या वाघिणी बरोबर झाला त्या पद्मिनीची त्यांनी आठवण सांगितली, तिच्या नावावरून त्यांनी त्यांच्या मोठ्या मुलीचे नाव पद्मिनी ठेवले. त्यांचावर गुदरलेला भयानक प्रसंग कोणता असा प्रश्न विचारला असता त्यानी सांगितले की हे जो काही मी दिसतो आहे हा माझा पुनर्जन्मच म्हणावा लागेल. जंगलात घुसखोरी करणा-या शेतक-यांना जेंव्हा फतेसिंहजीनी रोखण्याचा प्रयत्न केला तेव्हा त्यांना जीव जाई पर्यंत मारहाण करून बेशुद्ध अवस्थेत जंगलामधे फेकून दिले, पण त्यातुनही ते अश्चर्यकारकरीत्या वाचले. ज्यावेळेस जंगलातील गावं हलवण्याचे काम फतेसिंहजी ह्यांनी केले, पण स्थालांतरीत करण्यात आलेल्या प्रत्तेक कुटूंबाचे पुनर्वसन योग्य पद्धतिने केले जाते आहे ह्या कडे त्यांनी स्वतः लक्ष दिले होते. जंगलात फिरण्यासाठी जो कच्च्या स्वरुपाचा रस्ता तयार केला त्याचा विस्तार सुमारे १२५ किमी असून त्याचीही संपूर्ण रचनेमधे पत्तेसिंहजीचा मोठा सहभाग आहे. त्याचबरोबर वाघांच्या संरक्षण पुनर्वसन ह्यामधे त्यांचा मोठा हात आहे. जंगलाच्या होत चाललेल्या पर्यटन स्थळ ह्या प्रकाराबद्दल त्यांचा मनात प्रचंड चिड आहे. त्यांचा निरोप घेउन हॉटेलवर परतलो. दुपारी सुद्धा असेच लवकर जायचे आहे त्यामुळे २.३० ला सगळ्यांना तयार रहाण्याचा आदेश राहुलने दिला. आजून बराच मोकळा वेळ हातात होता. मग त्या वेळात सवाई माधवपुर गावात फेरफटका मारला. दिवाळी निमित्ताने ह्या छोट्याश्या गावातील बाजारपेठ गर्दीने फुलून गेली होती. मुख्य रस्त्यावर फटाके, सजावटीचे साहीत्य, कपडे, नविन वर्षाच्य रोजमेळ वह्या, इत्यादीचे स्टॉल लागले होते. गोविंदने इथे इथल्या मेवाडच्या इतिहासावर माहिती देणारी काही पुस्तके विकत घेतली. रेल्वे स्थानकावर जाऊन पुढच्या प्रवासाच्या द्रुष्टीने चौकशी केली आणी परत हॉटेलवर परतलो.

दुपारी झोन क्र.३ मधे जायची परवानगी मिळाली होती. आतले फाटाक उघडण्यपुवीच आम्ही तिथे दाखल झालो. थोडे पुढे गेलो तोच समोरून एक वाघीण आमच्या दिशेने चालत येताना दिसली. आमच्या पुढे एक जिप्सी होती तीच्या पासून केवळ तिन फुट अंतरावरून ती झाडीत घुसली, आणी रस्त्याला समांतर चालु लागली. चालकाने जलदपणे आमची गाडी मागे घेतली आणी त्यामुळे आम्हाला बराच वेळ निरीक्षण करायची संधी मिळाली. ती वाघीण बेफिकिर पणे चालत होती, काही अंतरावरून कॉल देणारे सांबार, झाडावरून विसिष्ठ आवाजात ओरडणारी माकडे याकडे पुर्ण दुर्लक्ष करत ती चालत होती. ह्या वाघीणीच्या गळ्यामधे रेडिओ ट्रान्समिटर चा पट्टा अडकवला होता, आणी तिला पकडून लवकरच दुसरीकडच्या जंगलात स्थानांतरित करणार होते. ह्या वेळेस चिंकारा जातीचे हरीण पहायला मिळाले तर न चमकणा-या शिल्लक राहिलेल्या काळ्या पिसांचा फुलोरा करुन नाचत असलेला मोर दिसला. घुबडाच्या काही प्रजाती पहायला मिळाल्या. हरणांचे एकदम जवळून निरीक्षण केले असता त्यांच्या शिंगांवर वाढलेली लव स्पष्टपणे दिसून आली. संध्याकाळी हॉटेलवर परतल्यावर रणथंम्भोर च्या जंगलात चित्रीत करण्यात आलेले दोन माहितीपट दाखवण्यात आले. एक वाघाच्या दैनदिन जीवनावर आधारीत होता तर दुसरा डॉ. धर्मेद्रजीनी जंगल व्यवस्थापन आणी सरकारी कामकाज ह्यावर तयार करण्यात आला होता.

लक्ष्मीपुजना निमित्त हॉटेल मधे राजस्थानी नाचगाण्यांचा कार्यक्रमाचे ठेवला होता. उद्या रणथंम्भोर मधला आमचा शेवटचा दिवस होता. सकाळी निसर्गात जंगलाच्या बाजुने पदभ्रमण व पक्षी निरिक्षणाचा कार्यक्रम होता. तसेच थोडे उशिराने म्हणजे ६ वाजता झोपमोड केली जाईल असे राहुलने सांगितले.

हॉटेलच्या समोरच्या बाजूस फतेसिहजी ह्यांच्य घराच्या मागील बाजूने आम्ही गेलो होतो. तिथे आम्हाला मातीत बिबट्याचे ठसे आढळले. मनुष्यवस्तीच्या इतक्या जवळ एखादे श्वापद नेहमी येउन जाते हा विचारच आमच्या सारख्या शहरी मनाला न पटणारा होता. पांढरा / काळ्या रंगाचा कोतवाल, वेडा राघु, असे वेगवेगळे पक्षी राहुल दाखवत होता आणी आम्ही त्यांचे फोटो काढण्याचा आणी त्यांची नावे लक्षात ठेवण्याचा प्रयत्न करत होतो. एका बांबुच्या झाडावर बसलेला एक साप दिसला हा ब्रॉंझ बॅक स्नेक होता. तो बिनविषारी आहे असे सांगुन राहुलने त्याला झाडावरून काढून हातात घेतले. पुढे हॉटेलवर जरा घाईनेच परतलो. गोविंद, आरती, मी आणी आजुन तिघे जण तर इथे आमचा मित्र झालेला अनिरुद्ध असे एकूण सात जण मिळून चितौडगड ला जाणार होतो. तर बाकिचे १२ लोक दुपारच्या गाडिने लगेच परतीचा प्रवास सुरु करणार होते.

सगळ्यांचा निरोप घेउन हॉटेल सोडले जाताना एके ठिकाणी थांबुन मोंगया जमातीच्या लोकांनी तयार केलेल्या वस्तूंच्या दुकानात जाउन खरेदी केली. चितौड ला जाण्यासाठी थेट गाडी सकाळी आहे, तर अंतर साधारणपणे २०० कि.मी. च्या आसपास असेल. सकाळची गाडी पकडणे शक्य नसल्यामुळे दुपारी कोट्याला रेल्वेने व पुढे दुस-या पर्यायी व्यवस्थेचा शोध घेउन पुढचा प्रवास करायचा होता. तसेच इथून पुढच्या प्रवासाची जबाबदारी पुर्णतः आमच्यावर होती, तर उदयपुर-पुणे प्रवासाचे तिकीट व उदयपुर इथले हॉटेलचे बुकिंग फोलिएज मार्फत केले होते. सवाई माधवपुर दुपारी १२.३० ला सोडले अवध एक्सप्रेस ने दुपारी २ पर्यंत कोटा गाठले. तिथे एका रिक्षावाल्याच्या मदतीने ट्रॅक्स गाडी ठरवून घेतली, त्याने आमच्याकडून परतीच्या भाड्यासहीत २७००/- इतके भाडे आकारले. मिळालेली गाडी इतकी सजवलेली होती की तिचा फोटो काढल्याशिवाय मला रहावलेच नाही. इथे बहुतांश गाड्या अश्याच आहेत. रा.म. क्र. ७९ वरून आम्ही प्रवास सुरुवात केला. इथले रस्त्यावर त्यामानाने वर्दळ आगदीच तुरळक होती ३-४ कि.मी. अंतर पार केल्यावर दुसरे एखादे वहान दिसायचे. ह्या वहातुकीसाठी जर इथे चौपदरी रस्ते आहेत तर आपल्या पुणे मुंबई रस्त्यावरिल वहातुक पाहील्यास तो कमीत कमी आठ पदरी असायला हवा. रस्त्याच्या बाजुने भले मोठे माती राडा-रोडयाचे ढिग दिसले, सुरवातीला ते हा महामार्ग तयार करताना झालेल्या खोदकामाचा प्रताप आहे असे वाटले. पण आजु-बाजुच्या प्रदेशात असे प्रचंड मोठे डोंगर दिसले मग कळले की आपण वापरतो त्या कोटा दगडाच्या खाणींचा हा भाग आहे, आणी त्यात निर्माण झालेला हा दगडाचा निरुपयोगी भाग आहे. जाताना मेनाल (मेहनाल) ह्या ठिकाणी असलेल्या भगवान शंकराचे एक पुरातन मंदिर पहाण्यासाठी थांबलो. खजुराहो येथील मंदिराच्या प्रमाणे हे मंदिर बांधलेले आहे, तर बाजुला पावसाळ्यात वहाणारा प्रचंड धबधबा आहे. इथे सुर्यास्त पाहून पुढचा प्रवास सुरु केला. जेवणाचे आज तसे हालच झाले होते. सकाळी केलेली न्याहारी आणी दुपारचा फळांचा रस इतक्यावरच होतो. संध्याकाळी ७.३० च्या सुमारास चितौड मधे पोहोचलो. लखलखीत प्रकाशझोतात उजळून गेलेल्या किल्ल्याचे दर्शन घडले. चितौड शहर तर दिवाळीच्यनिमित्त केलेल्या रोषणाईमुळे झगमगत होते. जिकडे तिकडे लाईटच्या माळा, आणी विशेष म्हणजे हे सर्व तिथल्या नगरपालिकेने केलेले होते. तिथे पद्मिनी पॅलेस नावाच्या एका आलीशान हॉटेल मधे आमची राहाण्याची व्यवस्था झाली होती. हॉटेलच्या व्यवस्थापकाच्या मदतीने दुस-या दिवशी किल्ल्यावर जायची सोय केली.

आज आमची झोपमोड करायला कोणी नव्हते, तरीपण सकाळी लवकर ७ वाजता उठलो. आठ वाजता किल्ल्यावर जाण्यासाठी दोन रिक्षा बोलवल्या होत्या. सकाळची न्याहारी वगैरे उरकून किल्ल्याच्या दिशेने निघालो. गडाच्या पायथ्यापासूनच भक्कम असे दरवाजे आणी तटबंदी ह्यांच्या मधून वरपर्यंत रस्ता गेला आहे. गडाला एकूण सात मुख्य दरवाजे आहेत. आमचा रिक्षा चालक हा स्वतः अतिशय माहितीगार गाईडचे काम करणारा माणूस होता. तोच सगळ्या किल्ल्यावरुन आम्हाला फिरवणार होता. किल्ल्याच्या वर ४०० कुटूंब सध्या रहात आहेत व एक शाळाही आहे. किल्ल्यावर पर्यटकांना दाखवली जाणारी ठिकाणे म्हणजे, राज दरबाराची जागा, मिरा माहाल, दासी पन्ना जिथे रहायची ते ठिकाण, मिरा मंदिर, विजय स्थंभ, समाधी मंदिर (ज्या ठिकाणी सुमारे १३००० रजपूत स्त्रियांनी जौहर केला ते ठिकाण ) , तटबंदीचा बांध म्हणुन वापर केलेला एक तलाव, काली-माता मंदिर, तलावाच्या मधे बांधलेला पद्मिनी महाल, हाथी तलाव, सुरज पोल ( दरवाजा ), किर्ती स्थंभ आणी जैन मंदिर, हे सगळे दाखवताना गाईड त्या त्या ठिकाणची ऐतिहासिक माहिती देत होता. किल्ला पहायला आम्हाला ५ तासही कमी पडले. आज रात्रीचा मुक्काम उदयपुर ला करायचा होता. मुक्कामाची सोय झाली होती. चितौडगड ते उदयपुर ह्या ११८ किमी अंतरासाठी तवेरा गाडी त्या रिक्षचालकाच्या ओळखीने मिळाली, गाडीवाल्याने २१०० रु आकारले. जाताना वाटेत चालकाने स्वत:हून एका नविन बांधकाम चालू असलेल्या श्री सावलिया सेठ (श्रीकृष्णाच्या) मंदिरात आम्हाला घेऊन गेला. मंदिर अतिशय सुरेख होते. संध्याकाळी ७-८ च्या सुमारास उदयपुर ला पोहोचलो. उदयपुर येथे कलिका नावाच्या हॉटेल मधे आमचा मुक्काम होता. गोविंदने उद्याच्या भटकंतीची योजना सांगितली आणी त्याला एकमताने मंजुरीही मिळवली. ज्या गाडीवानाने इथे सोडले त्यालाच आमचा उद्याचा कार्यक्रम सांगितल्यावर तो लगेच तयार झाला. सकाळी ८.३० ला निघायची वेळ ठरली. हॉटेल मधे काही खोल्याच फक्त रहाण्यासाठी योग्य असल्याचे लक्षात आले तसेच तिथले रेस्टॉरंट एकदम ढिले होते.

सकाळी न्याहारी करून प्रवासाला सुरुवात केली व कोणत्या कोणत्या ठिकाणी जायचे आहे ह्याची चालकाला यादी दिली. पहिल्यांदा उदयपुर पासुन जवळच असलेले नगदा गावाजवळचे श्री सहस्त्रबाहू चे जैन मंदिर आहे तिथे गेलो. मंदिराच्या नावाचा इथे अपभ्रंश झाला असून सध्या हे मंदिर सास-बहु नावाने ओळखले जाते. त्या नंतर पुढे एकलिंगजी भगवान शंकराचे मंदिर आहे. रजपुत राजाचे हे कुलदैवत त्यालाच हे लोक राजा म्हणतात म्हणुन स्वतःच्या नावाच्या मागे राजा ऐवजी राणा म्हणुन संबोधन केले जाते. देवळात प्रचंड गर्दी होती त्यामुळे बाहेरूनच दर्शन घेऊन पुढे नाथद्वार जवळ रजसामंद ( राजसमुद्र ) येथे एका विस्तिर्ण जलाशयाला भेट दिली. जलाशयावर भला मोठा संगमरवरी घाट / बंधारा बांधला आहे. घाटावर १६ खांबी ९ चौक्या उभारण्यात आल्या असुन त्यावरचे कलाकुसरीचे काम पहाण्यासारखे आहे. दुपारच्या जेवणासाठी चालकानेच तिथले खास असे कठीयावाडी पद्धतीचे जेवण मिळणा-या हॉटेवर नेले. आजवरच्या प्रवासातले हे सगळ्यात सुंदर जेवळ जेवायला मिळाले होते. इथुन पुढे हल्दीघाटी येथे गेलो. इथल्या मातिचा रंग हळदीसारखा पिवळसर असल्याने ह्या भागाला हल्दीघाटी नाव पडले. तर अकबराच्या सैन्या बरोबर महाराणा प्रताप ह्यांच्या बरोबर झालेली लढाई ह्याच घाटातली. महाराणा प्रताप ह्यांच्या चेतक घोड्याने ह्याच घाटात आपल्या धन्याच्या प्राणासाठी स्वतःच्या प्राण सोडला होता. लढाई मधे दोन्ही बाजुंची मोठ्या प्रमाणात मनुष्य हानी झाली होती. चेतक घोड्याचे स्मारक येथे उभारले आहे, तसेच येथे महाराणा प्रताप ह्यांच्या जीवनावर एक लघुपट दाखवण्यात येतो, तर त्यांची काही शत्रास्त्रेही इथे जतन करण्यात आली आहेत. ह्या पुढे आजचे शेवटचे ठिकाण म्हणजे कुंम्भालगड. उदयपुर पासून कुंम्भालगड ८०-९० किमी वर आहे.

आरवली पर्वतरांगेच्या सगळ्यात उंच जागी ह्या किल्ल्याची बांधणी मेवाडचा राजा महाराणा कुंभा ने केली. मेवाड मधील चांगल्या म्हणुन गणल्याजाणा-या ८६ किल्ल्यांपैकी ३९ किल्ले राजा कुंभाने बांधलेले आहेत. किल्ल्याची तटबंदी तर पहाण्यासारखीच आहे . ह्या तटबंदीची लांबी ३६ किंमी असून चिनच्या भिंतीनंतरची त्यासारखी ही दुसरी भिंत असल्याचे सांगण्यात येते. गडाच्या माथ्यावर राजमहाल असून तेथे जाणारी संपूर्ण वाट ही तटबंदीने आणी मोठ्या दरवाज्यांनी संरक्षीत केलेली आहे. गडाचे अवशेष खुप चांगल्या अवस्थेत असून त्याची नीट निगा राखली जाते. गडावर अनेक मंदिरे आहेत त्यातले निलकंठेश्वराचे मंदिर आणी त्याचा सभामंडप एकदम अप्रतीमच. संपुर्ण गडाचे भ्रमण करायला किमान ३ दिवस लागतील. संध्याकाळाचे ६ वाजून गेले होते, सूर्यास्ताचे काही फोटो टिपून गड उतरायला सुरुवात केली. एका दुकानात चहा पिण्यासाठी थांबलो असता आजून फक्त अर्धा तास तुम्ही इथे थांबा असे तिथल्या कामगाराने सांगीतले. अंधार पडू लागला तसे गडावरील एक एक वास्तू लाईटच्या प्रकाशाने उजळली जाऊ लागली. गडाच्या माथ्यापासून पायथ्या पर्यंत संपूर्ण गड प्रकाशझोताने दिपला होता. गडावरील मंदिरे, राजवाडा, तटबंदी, दरवाजे नुसते प्रकाशात न्हाहून गेले होते. अक्षरश: डोळ्याचे पारणे फेडणारे ते दृश्या होते. रात्री हॉटेलवर परतलो तरी ते डोळ्यात साठलेले नजारे डोळ्यासमोरून हलत नव्हते.

आज राजस्थान मोहीमेचा शेवटचा दिवस होता. सकाळी जरा निवांतपणेच उठलो. आज उदयपूर शहर परीसराचा फेरफटका मारायचा होता. उदयसिंह राजाने वसवलेले हे शहर खरोखर पहाण्यासारखे आहे पण इथे निवांतपणे फिरायचे असेल तर सुट्टीचा हंगाम सोडून इथे यावे. सकाळी प्रथम हिल टॉप पॅलेस ला गेलो. इथून उदयपुर चे संपूर्ण दर्शन होते. हा राजमहाल शहरापासून एका अंगाला असून आरवली पर्वताच्या पुढ्यात आहे. महालाच्या सभोवतालचा परीसर अभयारण्य म्हणून राखीव ठेवला असून ह्या परीसरात प्रवेश करण्यापुर्वी प्रवेशशुल्क भरावे लागते. महालात पशु-पक्ष्याची माहीती देणारे फलक लावले आहेत. तसेच महालाचे आत फोटो काढण्यास सक्त मनाई करण्यात येते. महालाच्या मागील बाजूने दिसणारी आरवली पर्वतरांग खुप सुंदर आहे. तिथून पुढे विविध राज्यातली गाव संस्कृतीची मांडाणी केलेल्या एका रिसॉर्ट मधे गेलो. त्यानंतर सिटी पॅलेस ह्या भव्य राजवाड्यात गेलो. तिथे एक एतिहासीक वस्तुंचे भव्य संग्रहालय आहे. संग्रहालय खरोखर पहाण्यासारखेच आहे. पण आम्ही गेलो तो सुट्टीचा काळ होता त्यामुळे तुफान गर्दी उसळली होती आणी त्या मानाने राजवाड्याची दालने मात्र एकदम छोटी होती, काही ठिकाणी तर गुदमरायचीच पाळी येते. कसे बसे २ तासाने बाहेर पडलो. ह्या राजवाड्यचा आजुन एका भागात क्रिस्टल पॅलेस ही वास्तु आहे, तिथे १०० वर्षा पुर्वीचे विदेशी काचेच्या साहीत्याचे संग्रहालय आहे. क्रिस्टल पॅलेससाठी ४०० रु इतकी प्रवेश फी तर कॅमेरा वापरण्यासाठी ५०० रु. शुल्क आकारले जाते. राजवाड्याच्या मागिल बाजुस तिथले प्रसिद्ध पिचोला सरोवर आहे. सरोवर उत्कृष्ठ पद्धतिने बांधुन काढले आहे. सरोवराच्या मधे लेक पॅलेस नावाचा महाल असुन त्याच्या अर्ध्या भागात पंचतारांकित हॉटेल आहे. तिथे जाण्यासाठी ३५० रु. शुल्क आकारले जाते. पिचोला सरोवराच्या काठाने फिरताना सुद्धा काही ठिकाणी आम्हाला फोटो काढण्यास मनाई करण्यात आली.

दुपारी उदयपुर मधे एक साध्याश्या हॉटेलमधे दाल-बाटी आणी चुरमा वर मस्त ताव मारला. उदयपुर शहर त्यावेळेस देशी-विदेशी पर्यटकांनी नुसते गजबजून गेले होते. तिथल्या बाजारपेठा गर्दीने फुलल्या होत्या. आम्ही सुद्धा त्या गर्दीत सामील झालो. इथे हस्तकलेच्या वस्तु, भित्ती चित्रे, कपडे, आणी इथले राजस्थानचे खास आकर्षण म्हणजे मोझडी प्रकारची पादत्राणे. आमची खरेदी होईपर्यंत संध्याकाळचे ७ वाजून गेले होते. उदयपुर मधे महाराणा प्रतापांचे स्मारक उद्यान आहे, तिथे रात्री ७.३० ते ८ पर्यंत ध्वनी-प्रकाश योजनेद्वारे महाराणांच्या आणी मेवाडच्या इतिहासावर माहीती देणार एक कार्यक्रम असतो त्याला आम्ही तिकीटे काढून वेळेत हजेरी लावली. कार्यक्रम अर्थातच छान सादर केला होता. कार्यक्रम संपल्यावर तिथल्या पिचोलाच्या काठावरील चौपाटी नामक एके ठिकाणी बोम्बे पावभाजी स्टॉल वर पावभाजी खाल्ली. आणी खाणे पुर्ण होत नाही तोच लक्षात आले की दिवसभार खरच आपल्याकडे वाया घालवण्यासाठी भरपूर वेळ होता पण आता पुण्याला पोहोचायचे असेल तर एक मिनीट सुद्दा वेळ शिल्लक नव्हता. मुबई ला जाण्यासाठी उदयपुर-मुबई सिटी एक्सप्रेस ची सुटण्याची वेळ रात्री ९.३५ ची आहे. आमच्या चालकाने ९.१५ ला स्थानकात आणून सोडले, त्याबद्दल त्याचे आभार मानले. रात्री झोप चांगली लागली, जाग आली तेव्हा गोधरा स्टेशन मागे टाकले होते. दुपारी बरोब्बर २.३५ ला नियोजित वेळेत बांद्रा टर्मिनस ला पोहोचलो तर ९.३० पर्यंत पुण्यात सुखरूप परतलो.

Ranthambor012.jpgकिल्ले रणथंम्भोर
Ranthambor018.jpgहाथी दरवाजा
Ranthambor032.jpgराजबाग तलाव

Ranthambor146.jpgमेनाल येथील प्राचीन शिवालय

Ranthambor206.jpgसुरजपोल (दरवाजा) चितोडगड
Ranthambor175.jpgविजयस्थंभ
Ranthambor190.jpgचितोडगड परीसर

Ranthambor231.jpgराजसमंद बांधावरील घाट

Ranthambor245_0.jpgRanthambor259.jpgकुंम्भालगड तटबंदी
Ranthambor252.jpgकुंम्भालगड बालेकिल्ला
Ranthambor275b.jpgRanthambor278.jpgRanthambor283.jpgRanthambor285.jpg

प्रांत/गाव: 


puratattva-in.translate.goog

उदयपुर – परमार वास्तुकला का युग

सौरभ सक्सेना

     “…यह स्मारक जो आर्यावर्त की सबसे खूबसूरत धार्मिक इमारत है, कला की विरासत में मध्यकालीन काल के हमारे पूर्वजों से हमें मिली है। मनुष्य ने अपने भगवान के लिए इससे सुंदर निवास कहीं नहीं बनाया है।”
– के.पी. जयसल 1

उदयपुर मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में एक छोटा सा गांव है। यह गांव अपने नीलकंठेश्वर मंदिर के लिए प्रसिद्ध है, जो साल भर दूर-दूर से तीर्थयात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। यह गांव तब प्रसिद्धि में आया जब परम राजा उदयादित्य (1070-1093 ई.) ने अपनी जीत और परमार साम्राज्य को मजबूत करने की स्मृति में एक शिव मंदिर का निर्माण कराया। भोज (1010-1055 ई.) की मृत्यु के बाद परमार साम्राज्य को एक भयंकर झटका लगा । भोज के बाद जयसिंह ने राजगद्दी संभाली, जिसने संभवतः परमारों के कट्टर शत्रु कल्याणी के चालुक्यों की मदद से गद्दी संभाली थी। यह भोज 2 का भाई उदयादित्य था , जिसने जयसिंह से परमार क्षेत्र को जीत लिया था। स्थानीय परंपराएं इस शहर को धारानगर के पवार राजपूत राजा उदयजित से जोड़ती हैं साँप बहुत परेशानी में था क्योंकि वह आग से बच नहीं पा रहा था। राजा को दया आ गई और उसने साँप को आग से बाहर निकाला। साँप बहुत जल गया था और वह पानी में डालना चाहता था लेकिन आसपास पानी नहीं था। साँप ने राजा से विनती की कि वह उसका सिर उसके मुँह में डाल दे ताकि उसका दर्द कम हो जाए। राजा हिचकिचा रहा था लेकिन साँप ने न काटने की शपथ लेने के बाद राजा ने साँप को अपने मुँह में डाल लिया। साँप तेजी से मुँह से राजा के पेट में चला गया। राजा अपने महल में पहुँचा और अपने मंत्रियों को हालात बताए क्योंकि साँप उसके पेट से बाहर आने से इनकार कर रहा था। राजा और उसके मंत्रियों ने कई तरकीबें आजमाईं लेकिन सभी विफल रहीं। यह जानते हुए कि साँप बाहर नहीं आएगा और बहुत जल्द राजा की मृत्यु हो जाएगी, राजा ने अपने अंतिम दिन वाराणसी में बिताने के लिए यात्रा की। जब राजा रात में सो रहा था और रानी पंखा झल रही थी, तो उसने शोर सुना और देखा कि एक साँप जमीन के एक बिल से निकल रहा है और दूसरा साँप राजा के मुँह से निकल रहा है। दोनों साँपों ने एक दूसरे को बोलकर बताया कि उन्हें कैसे मारा जा सकता है। जमीन से निकले साँप ने कहा कि अगर राजा काली मिर्च, नमक और छाछ का मिश्रण पी ले तो पेट में पल रहा साँप मर जाएगा। 3 पेट में पल रहे साँप ने कहा कि अगर कोई इस बिल में उबलता हुआ घी डाल दे तो अंदर पल रहा साँप मर जाएगा और सारा खजाना उसी का हो जाएगा। जैसे ही रानी ने यह बातचीत सुनी, उसने सुबह होते ही राजा को ठीक कर दिया और जमीन के नीचे छिपा सारा खजाना निकाल लिया। इस घटना की याद में, राजा के नाम पर इस स्थान का नाम उदयपुर रखा गया। राजा ने इस स्थान पर अपनी नई राजधानी स्थापित की और इसे कई सार्वजनिक भवनों से सुसज्जित किया। 4 किंवदंती में वर्णित मुर्तजानगर इसी नाम का एक गाँव है जो नीलकंठेश्वर मंदिर से लगभग 3 किमी दूर स्थित है।

कैप्टन टीएस बर्ट, जो खजुराहो मंदिरों की पुनः खोज के लिए बेहतर जाने जाते हैं, अपने दौरों में उदयपुर आए होंगे क्योंकि उन्होंने मंदिर के एक शिलालेख की एक प्रति एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल को भेजी थी। यह शिलालेख पहली बार सोसायटी जर्नल के खंड VII और बाद में खंड IX में प्रकाशित हुआ था। शिलालेख का पहला विवरण बताता है कि बर्ट ने यह छाप फरवरी 1838 में ली थी इसलिए यह बहुत स्पष्ट है कि उन्होंने मंदिर का दौरा किया होगा। 5 हालांकि, उन्होंने इस मंदिर का कोई विस्तृत विवरण प्रकाशित नहीं किया। शिलालेख को पुनः प्रकाशित करने की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि पहली व्याख्या में महत्वपूर्ण त्रुटियां थीं। 6 मंदिर को विद्वान समुदाय के ध्यान में लाने का श्रेय जेम्स फर्ग्यूसन को जाता है जिन्होंने 1876 में अपने विवरण प्रकाशित किए थे। वे बताते हैं कि 1878 में, अलेक्जेंडर कनिंघम के सहायक जेडी बेगलर ने शहर का दौरा किया और इसके मंदिरों को प्रकाशित किया। बेगलर ने कई विवरण नहीं दिए हालांकि वे स्थानीय किंवदंतियों को इकट्ठा करने में सक्षम थे। 8 दो साल बाद, 1880 में, अलेक्जेंडर कनिंघम ने इस स्थान का पुनरीक्षण किया और बेगलर द्वारा किए गए कुछ नोटिस को सही किया। 9 डीआर भंडारकर ने 1914 में मंदिर का दौरा किया और किले के क्षेत्र में मंदिर और मस्जिद का संक्षिप्त विवरण प्रदान किया। 10 सिंधिया सरकार के तहत ग्वालियर पुरातत्व विभाग के गठन के बाद 1923-24 में संरक्षण गतिविधियां शुरू की गईं। रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि मंदिर तुलनात्मक रूप से संरक्षित स्थिति में था, हालांकि, इसके लिए काफी निकासी और मरम्मत की आवश्यकता थी। 11 संरक्षण गतिविधियां कुछ समय तक जारी रहीं और 1928-29 में पूरी हुईं। 12 केपी जायसवाल, जो संभवतः संरक्षण गतिविधियों के बाद इस स्थान पर आए थे, ने ग्वालियर राज्य पुरातत्व विभाग के तत्कालीन निदेशक एमबी गार्डे और सिंधिया शासक की इस बात के लिए पूरी प्रशंसा की कि उन्होंने न केवल इस मंदिर में बल्कि कई स्थानों पर उच्च गुणवत्ता वाले संरक्षण कार्य किए। उनका मानना​​है कि उत्तरी भारतीय वास्तुकला का सबसे अच्छा काल 900 से 1100 ई. है और उदयेश्वर मंदिर इस वास्तुकला के सबसे अच्छे नमूनों में से एक है। 13 हालांकि मंदिर और गांव का समर्पित अध्ययन करने का प्रयास नहीं किया गया था, हालांकि, चूंकि उदयेश्वर मंदिर भूमिज मोड के बेहतरीन उदाहरणों में से एक है, इसे इस विशिष्ट मंदिर वास्तुकला को समर्पित विभिन्न अध्ययनों में शामिल किया गया। कृष्ण देव और एमए ढाकी कुछ अग्रणी पुरातत्वविदों में से हैं जिन्होंने इस मंदिर स्थापत्य शैली का विस्तार से अध्ययन किया है। 1967 में वाराणसी में आयोजित एक सेमिनार में, देव ने भूमिज मंदिरों पर अपना पेपर पढ़ा। वह उदयेश्वर मंदिर को भूमिज शैली के सभी स्थापत्य घटकों को दर्शाने वाला सबसे पुराना और बेहतरीन मंदिर मानते हैं। वह संक्षेप में मंदिर का वर्णन करते हैं क्योंकि उनके पेपर में अन्य भौगोलिक क्षेत्रों के मंदिर भी शामिल थे। अपने आधार शिलालेख का संदर्भ लेते हुए, देव कहते हैं कि मंदिर का निर्माण १०५९ में शुरू हुआ था और १०८० ई. में इसका अभिषेक किया गया  था । उनका कहना है कि उदयेश्वर मंदिर सबसे पुराना भूमिज मंदिर नहीं है बल्कि सिन्नर के अंबरनाथ मंदिर से थोड़ा बाद का है, बाद वाला लगभग १०६० ई. में बनाया गया था। १५ १९८१-८२ में, एएसआई के डीके सिन्हा और पीके मिश्रा ने जगती (मंच)  के नीचे इसकी स्थापत्य विशेषताओं को उजागर करने के लिए मंदिर के चारों ओर खुदाई की । इससे आधारशिला तक जाने वाली ढलाई का पता चला। कुछ मूर्तियां और स्थापत्य कला के हिस्से भी बरामद किए गए। १६ खुदाई  का काम १९८३-८४ में जारी रहा जब एके पांडे और पीके मुखर्जी सिन्हा से जुड़ गए। काम मुख्य रूप से दो तरफ, पश्चिमी और दक्षिणी, पर केंद्रित था। दक्षिणी भाग में खुदाई से दोनों तरफ सीढ़ियों की एक उड़ान और एक आले का पता  चला। शोध प्रबंध 2010 में प्रस्तुत किया गया था। 18  अनूपा पांडे ने शैव सिद्धांत के साथ इसके संबंध को स्थापित करने के प्रयास में मंदिर पर एक और समर्पित अध्ययन का प्रयास किया। 19

Neelakantheshvara (Udayeshvara) Temple – This magnificent temple is among the earliest surviving examples of the Bhumija mode of Nagara temple architecture. It holds prime importance in understanding the Bhumija architectural mode. While many grand Paramara temple projects, i.e. Bhojpur temple, Bijamandal Temple, etc. were left incomplete or suffered destruction during Islamic raids, the Neelakantheshvara is one among the few finished ones that suffered no destruction except a few modifications. Withstanding the toll of time and Islamic religious zeal, the temple stands in a well-preserved state. Bhumija mode was developed in the Malwa region during the 11th century CE as one of the late developments of the Nagara Temple architecture. Though it is the earliest surviving example of Bhumija mode, the temple does not show any clumsiness in the realization of various components but instead shows mastery over the same. Therefore, it appears that it was a result of considerable research and practice. However, all those previous temples have not survived.

The temple stands over a high-rising jagati (platform) and is surrounded by eight subsidiary temples, only a few of which have survived. The presence of matrika images over the exterior of the temple and the doorways of inner chambers suggests that the eight subsidiary temples were dedicated to the ashta-matrka group.  The main entrance to the complex was in the east as the central temple faces east. However, during the 14th century CE, when the mosque screens were constructed in the west, the eastern entrance was blocked and the main entrance was provided in the west. The temple consists of a mulaprasada or garbha-grha (sanctum sanctorum), antarala (vestibule), gudhamandapa (close hall), and three mukha-mandapa (porches), one each in the east, south, and north. Mulaprasada is built over a stellate plan of 32-point star. However, it is not an accurate stellate plan as the bhadra (central) part of each side is not a pointed star but is parallel to the cardinal directions. The stellate program gives a circular appearance externally. mulaprasada is saptaratha with seven projections on each side, consisting bhadra, karna, pratibhadra, and pratikarna. The vertical components of the temple are pitha (platform), vedibandha (base), jangha (wall), and shikhara (tower). The pitha is composed of four moldings, a few carry decorations of garlands, leaves, and diamonds. The vedibandha is made of three moldings. The middle molding, kumbha, is decorated with niches resembling mini shrines. Various gods and goddesses are housed inside these niches. The jangha has pilasters arranged in saptaratha pattern. Niches have been provided on all the projections, each pilaster except the central has two niches on two sides due to the stellar plan.

North side of the shikhara
Surasenaka in the west
Surasenaka in the north
Surasenaka in the south

Bhumija temple mode is characterized by its shikhara (tower) which displays vertical rows of kutastambhas arranged in a manner that the stambhas (pillars) of the upper row are hidden by the mini-shikhara of the lower row. The shikhara of Udayeshvara Temple consists of seven bhumis (tiers). It has a central flat band, known as lata, on each side. This lata is decorated with a mesh or gavaksh pattern. Kutastambhas have been arranged on either side of this central lata, in a series of three kutastambhas on either side. The base of this lata, on the south, west, and north, contains a chaitya arch over a pillared shrine (surasenaka) housing a deity inside. Shiva as Natesha is present in the top arches of all the surasenakas, however, the deity in the below pillared shrine differs for each, six-armed seated Shiva in the south and the west, and an unidentified deity holding a bow and an arrow.

Side view of the sukanasa from the south
Side view of the sukanasa from the north

In the east, the base of the central lata is extended over the antarala space forming a sukanasa. The chaitya medallion of sukhanasa is a trefoil-shaped structure made of two parts. The lower part has a pillared shrine in the center. Inside the shrine is an image of Harihara-arka-pitamaha, a syncretic image of Vishnu, Shiva, Brahma, and Surya. He has eight hands and three faces. He is holding padma (lotus), trishula (trident), shankha (conch), chakra (discus), etc. in his various hands. He is accompanied by two dancers placed on either side. Various mounts and attendees belonging to the four gods are shown near the feet, including Danda, Pingala, Nandi, and Garuda. In the arches, on either side, of the shrine are two dancing goddesses. The image on the viewer’s left is an unidentified goddess depicted in urdhvajanu-karana, and the image on the right is of Sarasvati who also is depicted in urdhvajanu-karana with her mount, swan, is shown near her feet. The upper arch of this trefoil-shape chaitya has an image of dancing Shiva, as Natesha with his retinue. Natesha is shown in urdhvajanu-karana accompanied by two dancing goddesses, one on either side. The chaitya arch at the top is issued from two makaras integrated within a kirtimukha. On the north and south sides of the sukanasa, five different tiers have been carved. On both these sides, five images of Shiva and five images of goddesses have been arranged. The northern side has four images of goddesses and one image of Shiva. The southern side has four images of a seated Shiva and one image of a goddess. Pande20 identifies the images of goddesses, in the north are Mahalakshmi, Maheshvari, Sarvamangala, and Rambha, and in the south is Sriya. The image of Sriya shows the goddess holding an iguana and a ghost (preta) in her hand. Pande21 says the iguana is the mount of the goddess and she is generally shown seated over a preta, however, in this peculiar image she is shown holding both in her hands.

Amalaka with pointed ends

The amalaka over the griva (neck) also reflects the stellar plan with pointed edges. On the northwest face of the shikhara is a peculiar sculpture of a human figure shown in the mode of ascending the shikhara. This probably reflects the practice of hoisting a flag over the shikhara. Interestingly, the inscription from the reign of Udayaditya mentions the flag-hoisting at the temple.

Vinayaka and Vinayaki (hidden in the picture)
Virabhadra over the south bhadra

The sculptural program over the exterior walls of the garbha-grha and antarala primarily belongs to the Shaivite theme. There are three pilasters over the south kapili, the first pilaster has two dikpalas – Indra and Agni. The following pilaster has two images – both of Shiva. The third pilaster also has two images, Vinayaka and Vinayaki. Shiva as Virabhadra is present over the south bhadra and the west bhadra. Tichit identifies the figure as Natesha but not Virabhadra.22 Between the bhadra of each side are placed five pilasters. Moving south, the first pilaster in the series has an image Bhringi and Chamunda over its two facets, the next pilaster has an image of Shiva and Bhairava, the third pilaster has two dikpalas – Yama and Nrrtti, the fourth pilaster has images of Vishnu and Shiva, and the last pilaster has an image of Nandi shown with bull-head and Nadikeshvari as a bull-head goddess.

Virabhadra over the west bhadra
Kartikeya at vedibhandha on the west
Kubera at vedibandha at the west

Virabhadra on the west bhadra is shown strangling a headless figure by his right left.  Pande tellss the figure probably is Daksha whose sacrifice Virabhadra destroyed.23 Tichit identifies the deity as Shiva without providing any specifics.24 Five pilasters intervening between the west and north bhadra carry two images over two facets. Moving from west to north, the first pilaster has images of Kaumari and Kartikeya, the next pilaster has Shiva and Bhairava, the third pilaster has images of two dikpalas – Varuna and Vayu, the fourth has Shiva on both facets, and the fifth pilaster has a goddess, probably Maheshvari and an unidentified male deity. The images over the vedibandha at the west have mostly celestial couples, Kumara-Kaumari, Uma-Maheshvara, Brahma-Brahmani, Vinayaka-Vinayaki, except for Kubera and Sarasvati who are enshrined as single deities.

North facade
Chamunda
Mahishasuramardini at vedibandha at north bhadra

The bhadra in the north has an image of Chamunda. Similar to the south kapili, two pilasters are present on the north kapili. The first pilaster has an image of Parvati and Bhairava. The next pilaster has two images, both of Shiva, though the images are much mutilated. The niches over the vedibandha have various celestial couples, Lakshmi-Narayana, Uma-Maheshvara, etc. The vedibandha niche at the bhadra has an image of Mahishasuramardini.

Samvarana roof of the mandapa

The mandapa follows a stepped diamond plan and has three mukha-mandapa attached to it. Its roof is of samvarana type, a variation of phamsana (tiered pyramidal) type. A samvarana roof is characterized by a slopping roof made of bands, punctuated by small pavilions, topped by a finial bell, and displaying valabhi dormers on the cardinal projections.

Southeast view of mandapa
Bhairava in the south-east of mandapa
Surya
Indra on the left and Shiva on the right
Agni
Harihara
Ardhanareeshvara
Natesha

The sculptural arrangement and program over the jangha of the mandapa primarily constitute Shiavite images. A series of sculptures are provisioned over the five buttresses between the two arms of the east and south mukha-mandapas, starting with an image of Bhiarava in the east and ending with an image of Shiva-Natesha in the south. The terminal buttresses have only one image while the three buttresses in the middle have two images each. One side of the terminal buttresses is used as a side for the mukha-mandapa. On the terminal buttress in the east is shown Bhairava with twelve arms, most of which are broken, and in the rest, he holds a shield and a damaru. His mount, dog, is standing next to him. The next image is of Surya shown standing wearing long boots and accompanied by Danda and Pingala. The next image is of Shiva shown holding trishula and damaru. The next buttress has images of dikpalas, Indra facing east and Agni facing south. The next buttress has two images, Shiva-Ardhanareeshvara and Harihara.

View from the south
Shiva as Natesha on the right
Shiva-Andhakantaka on the left and Nrrtti on the right

The sculptural program on the southwest follows the same pattern similar to the southeast jangha. The first image is that of Shiva as Natesha who is shown with sixteen arms many of which are mostly broken. He is standing with his back to a viewer with his torso twisted to face the viewer, a stance that needs flexibility to the maximum. The following two pilasters have two images each, one on each face. The image next to Natesha is of an unidentified male deity. On the same pilaster, the following image is of a male deity holding a book. Pandey identifies the deity as Shiva-Kiranaksha, as the book held by him is a distinguished attribute of his iconography, however, Tichit does not attempt any identification.25 The next pilaster has images of two dikpalas, Yama and Nrrtti. The following image is of Shiva as Andhakanataka. He is shown standing in alidha-mudra with his right foot placed over a demon.

North-east facade of the mandapa
Shiva-Tripurantaka
Isana and Varuna
Natesha
Mahishasuramardini
Vayu
Brahma
Chamunda

The northwest side of the mandapa follows a sculptural pattern similar to the southwest side. The first image is of Shiva as Tripuantaka in a posture of drawing an arrow to shoot the three demon cities located in the sky. The three cities are shown at the top in the right corner. The next pilaster has two images of two dikpalas – Varuna and Isana. The next pilaster has an image of Agni and Kartikeya on its two faces. The identification of Agni is not certain as Tichit26 identifies him as Agni but Pandey27 as Brahma.  The deity is not shown with multiple heads and the attributes he carries in his four arms are also broken except for a lotus stalk. His mount is also much obliterated. He flaunts a prominent beard, a characteristic of both, Agni and Brahma. Tichit substantiates her identification by establishing a relationship between Kartikeya and Agni as the latter played a critical role in the birth of the former. Pandey gives much credence to the lotus stalk thus identifying him as Brahma. The last sculpture in the series of Shiva-Natesha. The northeast side of the mandapa has six sculptures spanning over three pilasters. The sculptural program starts with an image of Mahishasuramardini. The right foot of the goddess is placed over a buffalo. The image depicts an in-action fight between the goddess and the demon where the zoomorphic form of the demon depicted as buffalo is defeated and the demon Mahishasura is shown emerging out of the neck of that buffalo to continue his fight with the goddess. The next pilaster has an image of Shiva-Natesha and Shiva-Parvati. The next pilaster has two dikpalas – Kubera and Ishana, the latter is much obliterated. The next pilaster has Brahma and Sarasvati. A large image of Chamunda adorns the last pilaster in the series. Tichit says the obliterated image does not give a scope to correctly identify the deity as it could be Chamunda or an emaciated aspect of Bhairava.28 Various images are placed over a frieze sandwiched between the pilasters and shikhara. These images are aligned in the same line as the images over the pilasters. The images mostly are of Shiva and various goddesses, among a few notable ones are Chamunda, Harihara-arka-pitamaha, Yogeshvari holding an elephant and wearing a crescent moon in her hair, Bhuvaneshvari, and Bhairava. Images placed over vedhibandha mostly correspond to different aspects of Uma-Maheshvara theme.

Mukha-mandapa in the south
Chamunda
TBD
Mukha-mandapa in the north
TBD
TBD
Dancing maidens
Half-pillars supporting mukha-mandapa ceiling
Chamunda in the south mukha-mandapa
TBD

Three mukha-mandapa, one each in the east, south, and north, allow entry into the gudhamandapa. The entrances are provided with large sculptures positioned as guardians. All the mukha-mandapa follow kakshashana-type style consisting of high seats with slanting back. The exterior of these kakshashana is decorated with various friezes including a frieze carrying large sculptures of dancing maidens. Over the high seats rise half-pillars to support the roof. These half-pillars support a heavy round capital made of concentric circles.  The bracket above the capital has large bharavahakas (weight bearers). The ceiling of all the mukha-mandapa has not survived in full, from its appearance as well as from traditions, the ceiling would be of phamsana style.

Doorway of the eastern mukha-mandapa

Northern doorway
Mukha-mandapa ceiling
Northern doorway

The doorways of all the mukha-mandapa are very similar except for the figures at the bases of their jambs. The jambs are of pancha-shakha (five bands) style and are elaborately decorated with various patterns and designs. The inner three shakhas, patra-shakha, gandharva-shakha, and stambha-shakha, form the inner frame of the door with corresponding lintel and sur-lintel. The middle of the lintel has a niche housing an image of Ganesha. Above this niche is another niche of similar size at the sur-lintel housing an image of Lakshmi. The architrave supported on the stambha-shakha has a series of nine niches arranged in projections and recesses. Nine matrka figures are enshrined in these nine niches, starting from the left, Brahmani, Maheshvari, Kaumari, Vaishnavi, an unidentified matrka goddess, Varahi, Indrani, Chamunda, and Mahalakshmi holding lotuses in her upper two hands. All the goddesses are shown with four hands and seated in ardhaparyanka-mudra. The lower face of the panel is carved with a circular medallion in the center and two flying figures at either end. The last two shakhas form the external frame of the doorway and support a panel consisting of niches. The lower face of the panel has three circular medallions with two intervening flying gandharva figures. There are five niches projected outward forming four recess areas in between. These niches have, from left to right, Shiva, Brahma, Harihara-arka-pitamaha, Vishnu, and Ganesha. Nava-grhas are distributed in the four recess spaces, the first three have two grahas each and the last has three grhas, Shani, Rahu, and Ketu. The external frame encloses the inner frame where the latter takes the appearance of a torana.

Gudhamandapa with Nandi in its center

gudhamandapa ceiling

The main entrance of gudhamandapa from the east has two entrance pillars and four pillars in the center. The pillars are highly embellished and carry sculptures on all four faces. Among the sculptures are found Brahma, Ganesha, Shiva, Kubera, Parvati, etc. In one image of Parvati, she is shown holding Ganesha in one hand and in another hand a shivalinga. They have circular capital similar to the pillars of mukha-mandapa and also carry brackets with bharavahakas. The ceiling is composed of concentric circles enclosed within an octagonal frame. The octagonal frame is enclosed within a square frame and the space between the four corners of the square and octagon is decorated with kirtimukha. Female bracket figures adorn the third tier of the ceiling from the bottom. There are a total of twelve such bracket figures, except for one sculpture of a couple the rest all are single female figures.

Antarala pillars

The antarala space has two free-standing pillars standing next to wall pilasters. These pillars and pilasters are decorated in the same style and designs as those of gudhamandapa. The garbha-grha doorway is decorated in a similar style as that of the other doorways of mukha-mandapa. Inside the garbha-grha is a shivalinga mounted over a large pitha or yoni. The shivalinga is covered by a brass sheet carved with a face. This brass cover was donated by Khanderao Appaji, a general of Mahadji Scindia, in 1783 CE.29

Vedi

In front of the temple is a vedi, a square building used probably to recite Vedas. Jalis (stone grills) with ventilation space have been embedded into the walls all around. It has two entrances, one in the east and one in the west. Four pillars support the square ceiling. The pillars have decoration similar to the temple pillars except for the bottom part which does not have sculptural decoration. Traditions credit that the vedi was constructed soon after the construction of the temple and the purpose was yajna or ritual performances.

There have been a few suggestions from various scholars for explaining the sculptural program and arrangements of deities over the external walls. Tichit suggests that the sequence of images following the circumambulation, starting with fearsome Bhairava and continuing with cosmic forms of Natesha transiting through Mahishasuramardini and ending with another fearsome image of Chamunda or emaciated Bhairava, suggests proclamation of Shiva’s supremacy and its assertion.30 Pande indicates the distribution of Shaiva and Shakti images over the right and left side of the temple respectively confirming the influence of Shaiva-Siddhanta over the temple design and architecture.31 Both arguments are not strong enough to come to a definitive conclusion. However, it is very clear that the presence of various matrkas over the janghas, doorways, and eight subsidiary shrines suggests a strong influence of shakta tradition which is also attested by the statement that the temple was constructed as a victory monument by Udayaditya.

Sometime in 1338-39, the temple underwent desecration at a small scale in the hands of the Muslim army of Muhammad bin Tughlaq. The noses of many images over the temple walls were broken and faces were desecrated. However, the temple was left standing intact and did not face the fate of many others which were torn down to their bare plinths. A legend tells us that the emperor gave the orders to bring down the temple, however, in the night he had a dream where he was stopped to do so by the gods. The next morning, the order was withdrawn and two screens were constructed at the west of the temple. Many pilgrim records dating later are the proofs that the temple was in worship even after the construction of a mosque within its enclosure.

Stone Inscription samvat 1137

Inscriptions: The temple is very rich in terms of inscriptions and epigraphs. A few important inscriptions are provided below in detail. More than ninety pilgrim records have been published in the Annual Report of Indian Epigraphy 1961-62 (numbered C 1611-1690).

  1. Stone inscription of the time of Udayaditya32 – consists of six lines, written in Nagari characters, Sanskrit language – dated in vikrama samvat 1137, equivalent to 1080 CE – the inscription refers to the reign of the Paramara king Udayaditya. It mentions the hosting of a flag on the Udayeshvara temple. The inscription was composed by Pandita Mahipala, son of Pandita Sringavasa.
  2. Stone inscription prashashti of the time of Udayaditya33 – The inscription was first brought to notice by F E Hall in 1852 and edited by G Buhler in 1888. The inscription was found lying in the courtyard of the Udayeshvara temple and was later shifted to the Gujari Mahal Museum, Gwalior. Written in 24 lines in Sanskrit language and Nagari script of the eleventh century CE. The inscription starts with obeisance to Shiva and then to Parvati and Ganesha. It then records the genealogy of the Paramara dynasty stating a hero sprang from the fire-alter of Vashishtha on Mount Arbuda (Abu) and slayed enemies to bring back the cow sage Vishwamitra has taken away. As a reward, the hero was named Paramara and blessed with kinship. In the lineage of Paramara was born Upendraraja who acquired kinghood by his prowess. It next mentions Vairisimha, Siyaka, Vakpati, and another Vairisimha, all as son and successor of the respective predecessors. It then introduces Vakpati’s son Harshadeva who defeated Khottigadeva in a battle. His son was Vakpatiraja who was well-versed in shashtras and poetry. It tells his feet were colored by the jewels on the heads of Karnnatas, Latas, Keralas, and Cholas. He vanquished Yuvaraja and slaying his general, as a victor, raised on high his sword in Tripuri. Vakpati’s younger brother was Sindhuraja who won a victory over a king of Hunas. His son was Bhojadeva who is praised for his temple-building activities, dedicating temples to Kedara, Rameshvara, Somanatha, Sundira, Kala, Anala, and Rudra. He is also praised for his command over poetry and titled kaviraja. The inscription then introduces Udayaditya as another Sun dispelling darkness. It compares the restoration of the Paramara power by Udayaditya with the Premial Boar (Varaha) who restored the earth. The latter half of the inscription was found by M B Garde in 1925-26. This inscription continues describing bravery and glorious success against the lord of the Chedisa. The Paramara genealogy stops with Udayaditya and the description of the members of the Nemaka dynasty starts. The name of the ruling prince of this dynasty is not clear due to the imperfect nature of the record. The inscription tells Udaipur was placed in charge of a king who belonged to the Nemaka dynasty and he constructed a temple. The father of the king was a sudraka who had vanquished the king of Gujarat. The inscription ends with the word prashashti followed by a double danda and a flowery design.
  3. Stone inscription over a pillar in the eastern mukha-mandapa34 – refers to the reign of the Paramara king Udayaditya. Dated in samvat 1222, equivalent to 1166 CE – mentions the construction of two mandapikas called Mahastava and Talavarta and some gifts made by Chahada.
  4. Stone inscription of the time of Devapala35 – The inscription is incised on the lower part of a pillar on the proper right side of the eastern entrance of the Udayeshvara temple. It consists of fourteen lines, written in Sanskrit and in the Nagari characters of the thirteenth century CE. The inscription refers to the reign of the illustrious Paramara king Devapaladeva. The object of the inscription is to record the donation of some plots of land in the presence of the deity Udalmeshvara. The donor was Dhamadeyava, an officer in charge of the treasury of the king. The inscription is dated in samvat 1286, equivalent to 1229 CE.
  5. Stone inscription of the time of Devapala36 – This inscription is engraved on one of the left-side pillars of the eastern mukha-mandapa of Udayeshvara temple. Above this inscription are two short pilgrim records. The inscription consists of fifteen lines, written in Sanskrit and in Nagari characters. The inscription refers to the reign of the Paramara king Devapaladeva. The object is to record donations of land in some villages. The inscription is dated in samvat 1289, equivalent to 1232 CE.
  6. Pilgrim record of samvat 1434 on the doorjamb of the eastern mukha-mandapa37 – mentions the pilgrimage of Gopi, son of Sanasan was fruitful
  7. Pilgrim record of samvat 1503 on the eastern doorjamb38 – mentions the fruitful pilgrimage of Surjja and Golhana. The engraver of Chamdakara, son of Aditya.
  8. On the northern jamb39 – records the yatra festival of the god Udaleshvara
  9. On the arch near the mosque in the enclosure of the Nilkantheshvara Temple40 – Dated Hijri 739, equivalent to 1338-39 CE – refers to the reign of King Muhammad bin Tuglaq Shah. Mentions the construction of the mosque to Ahmad, son of Wajih.
  10. Another slab in the same place as above41 – Dated Hijri 739, equivalent to 1338-39 CE – refers to the reign of King Muhammad bin Tuglaq Shah. Mentions that Ahmad, son of Wajih, was in the employ of Azam Malik, the sarjamdar-i-khas, and that Fakhr, son of Muhammad Lahori supervised the work.

1 Jayaswal, K P (1932). The Udaypur Temple of Malwa and its Builder published in the Modern Review, vol. LI, No 6. p. 603
2 Dongargaon inscription, Epigraphia Indica, vol. XXVI, p. 184
3 Cunningham, Alexander (1880). Report of Tours in Bundelkhand and Malwa in 1874-75 and 1876-77, vol. X. Government Press. Calcutta. p. 65
4 Beglar, J D (1878). Report of a Tour in Bundelkhand and Malwa, 1871-72; and in the Central Provinces, 1873-74, vol. VII. Government Press. Calcutta. pp. 83-84
5 Journal of the Asiatic Society, vol. VII, no. 84, December 1838. p. 1056
6 Journal of the Asiatic Society, vol. IX, no. 101, May 1840. pp. 547-548
7 Fergusson, James (1876). Indian and Eastern Architecture. John Murray. London. pp. 456-457
8 Beglar, J D (1878). Report of a Tour in Bundelkhand and Malwa, 1871-72; and in the Central Provinces, 1873-74, vol. VII. Government Press. Calcutta. pp. 81-88
9 Cunningham, Alexander (1880). Report of Tours in Bundelkhand and Malwa in 1874-75 and 1876-77, vol. X. Government Press. Calcutta. pp. 46-56
10 Archaeology – Progress Report of the Archaeological Survey of India, Western Circle, for the year ending 31st March 1914. pp. 64-66
11 Annual Report of the Archaeological Department, Gwalior State, for samvat 1980, year 1923-24. pp. 5-6
12 Annual Report of the Archaeological Department, Gwalior State, for samvat 1980, year 1928-29. pp. 5-6
13 Jayaswal, K P (1932). The Udaypur Temple of Malwa and its Builder published in the Modern Review, vol. LI, No 6. pp. 603-606
14 Deva, Krishna (1975). Bhumija Temples. published in the Studies in Indian Temple Architecture, Pramod Chandra (ed.). American Institute of Indian Studies. Varanasi. pp. 90-113
15 Dhaky, M A (1977). The Indian Temple Forms. Abhinav Publications. New Delhi. p. 19
16 Indian Archaeology 1981-82 – A Review. p. 48
17 Indian Archaeology 1983-84 – A Review. p. 56
18 Tichit, Doria (2010). The Udayesvara Temple, Udayapur: Architecture and Iconography of an 11th century Temple in Central India, thesis submitted to Cardiff University for the degree of Doctor of Philosophy. UMI number – U564497
19 Pande, Anupa (2018). The Udayesvara Temple – Art, Architecture and Philosophy of the Saiva Siddhanta. Aryan Books International. New Delhi. ISBN 978-81-7305-561-4
20 Pande, Anupa (2018). The Udayesvara Temple – Art, Architecture and Philosophy of the Saiva Siddhanta. Aryan Books International. New Delhi. ISBN 978-81-7305-561-4. p. 18
21 Pande, Anupa (2018). The Udayesvara Temple – Art, Architecture and Philosophy of the Saiva Siddhanta. Aryan Books International. New Delhi. ISBN 978-81-7305-561-4. pp. 19-20
22 Tichit, Doria (2012). Le programme iconographique de temple d’Udayeśvara à Udayapur, Madhya Pradesh, xie siècle pubsished in Arts Asiatique, vol. 67. p. 5
23 Pande, Anupa (2018). The Udayesvara Temple – Art, Architecture and Philosophy of the Saiva Siddhanta. Aryan Books International. New Delhi. ISBN 978-81-7305-561-4. p. 60
24 Tichit, Doria (2012). Le programme iconographique de temple d’Udayeśvara à Udayapur, Madhya Pradesh, xie siècle pubsished in Arts Asiatique, vol. 67. p. 5
25 Tichit, Doria (2012). Le programme iconographique de temple d’Udayeśvara à Udayapur, Madhya Pradesh, xie siècle pubsished in Arts Asiatique, vol. 67. p. 5
26 Tichit, Doria (2012). Le programme iconographique de temple d’Udayeśvara à Udayapur, Madhya Pradesh, xie siècle pubsished in Arts Asiatique, vol. 67. p. 5
27 Pande, Anupa (2018). The Udayesvara Temple – Art, Architecture and Philosophy of the Saiva Siddhanta. Aryan Books International. New Delhi. ISBN 978-81-7305-561-4. p. 44
28 Tichit, Doria (2012). Le programme iconographique de temple d’Udayeśvara à Udayapur, Madhya Pradesh, xie siècle pubsished in Arts Asiatique, vol. 67. p. 5
29 Archaeology – Progress Report of the Archaeological Survey of India, Western Circle, for the year ending 31st March 1914. p. 65
30 Tichit, Doria (2012). Le programme iconographique de temple d’Udayeśvara à Udayapur, Madhya Pradesh, xie siècle pubsished in Arts Asiatique, vol. 67. p. 6
31 Pande, Anupa (2018). The Udayesvara Temple – Art, Architecture and Philosophy of the Saiva Siddhanta. Aryan Books International. New Delhi. ISBN 978-81-7305-561-4. p. 44
32 कॉर्पस इंस्क्रिप्शनम इंडिकारम, खंड। VII, भाग 2 - परमारों, चंदेलों, कच्छपघाटों और दो छोटे राजवंशों के शिलालेख। पीपी. 65-66
33 कॉर्पस इंस्क्रिप्शनम इंडिकारम, खंड। VII, भाग 2 - परमारों, चंदेलों, कच्छपघाटों और दो छोटे राजवंशों के शिलालेख। पीपी. 75-82
34 भारतीय पुरालेख 1961-62 पर वार्षिक रिपोर्ट की संख्या सी-1664 । पी। 171
35 कॉर्पस इंस्क्रिप्शनम इंडिकारम, खंड। VII, भाग 2 - परमारों, चंदेलों, कच्छपघाटों और दो छोटे राजवंशों के शिलालेख । पीपी. 185-187
36 कॉर्पस इंस्क्रिप्शनम इंडिकारम, खंड। VII, भाग 2 - परमारों, चंदेलों, कच्छपघातों और दो छोटे राजवंशों के शिलालेख । पृ. 187-189
37 भारतीय पुरालेखशास्त्र 1961-62 पर वार्षिक रिपोर्ट की संख्या सी-1612 । पृ. 167
38 भारतीय पुरालेखशास्त्र 1961-62 पर वार्षिक रिपोर्ट की संख्या सी-1613। भारतीय पुरालेख 1961-62 . पृ. 167
39 भारतीय पुरालेख 1961-62 पर वार्षिक रिपोर्ट की संख्या सी-1625 . पृ. 168
40 रहीम, सैयद अब्दुर (2000). मध्य भारत के अरबी, फ़ारसी और उर्दू शिलालेख - एक स्थलाकृतिक सूची. संदीप प्रकाशन, नई दिल्ली। आईएसबीएन 8175740914। नंबर 737, पृष्ठ 122 पर
41 रहीम, सैयद अब्दुर (2000)। मध्य भारत के अरबी, फ़ारसी और उर्दू शिलालेख - एक स्थलाकृतिक सूची। संदीप प्रकाशन. नई दिल्ली। आईएसबीएन 8175740914. पृष्ठ पर संख्या 738। 122

आभार:  ऊपर दी गई कुछ तस्वीरें तपेश यादव फाउंडेशन फॉर इंडियन हेरिटेज द्वारा जारी संग्रह से CC0 1.0 यूनिवर्सल पब्लिक डोमेन में हैं।






 उदयपुर : सिटी पैलेस


इस ब्लॉग यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें !
 
मेवाड़ जितना समृद्ध आज दीखता है उतना ही समृद्ध पहले भी रहा होगा ! अगर आप उनके बनाये हुए किले और महल देखें तो उस वक्त के मेवाड़ की झलक और कल्पना आँखों में तैरने लगती है ! इसी समृद्ध स्थान को देखने के लिए हमने सहेलियों की बाड़ी और सुखाड़िया सर्किल के बाद सीधा रुख किया सिटी पैलेस का ! आइये सिटी पैलेस चलते हैं और उसके विषय में जानते हैं !

उदयपुर का प्रसिद्द सिटी पैलेस लगभग 400 वर्ष बूढा हो चला है ! इसे महाराणा उदय सिंह ने 1559 में बनवाना शुरू किया और फिर उनकी मृत्यु के बाद और राजाओं ने इसके निर्माण को जारी रखा ! अरावली पहाड़ियों में लेक पिछोला के पास बने इस भव्य महल के पीछे एक किवदंती हवा में फैली हुई सी रहती है ! महाराणा उदय सिंह जब लेक पिछोला ( उस वक्त तो ये गन्दी संदी सी कोई पोखर ही रही होगी ) के आसपास शिकार के लिए गए हुए थे तब उन्हें यहां एक पहाड़ी पर साधू महाराज तपस्या करते हुए मिले ! महाराणा ने उन्हें प्रणाम कर आशीर्वाद लिया तो साधू ने उन्हें बताया कि तुम्हारे बुरे दिन शुरू होने वाले हैं इसलिए बेहतर है कि अपनी राजधानी चित्तोड़ से यहां ले आओ ! महाराणा उदय सिंह ने उनकी बात का ध्यान रखते हुए अपनी राजधानी को चित्तोड़ से उदयपुर ले जाने का फैसला कर लिया ! एक ज्ञान की बात ये भी है कि चित्तोड़ आने से पहले उनकी राजधानी उदयपुर के पास नागदा में थी। चित्तोड़ से लगभग 80 साल शासन चलाने के बाद सिसोदिया वंश के महाराणा उदय सिंह को जब लगने लगा कि वो चित्तोड़ पर मुगलों के हाथों अपना शासन गंवा सकते हैं तब उन्होंने राजधानी उदयपुर ले जाने का निश्चय कर लिया ! और वहां उन्होंने सिटी पैलेस के निर्माण की नींव रखी जिसमें सबसे पहले उन्होंने शाही आँगन " राय आँगन " बनवाया ! सन 1572 ईस्वी में महाराणा उदय सिंह की मृत्यु के बाद परमवीर महाराणा प्रताप ने शासन संभाला और सिटी पैलेस का निर्माण अनवरत जारी रहा ! उनके बाद भी इसकी भव्यता को और राजाओं ने भी चार चाँद लगाने में कोई कसर बाकी नहीं रहने दी !

सन 1736 ईस्वी में मराठाओं ने मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया और ज्यादातर माल लूट खसोट लिया और उसके साथ ही इस भव्य महल को तहस नहस कर दिया ! इसके बाद किसी ने भी इस महल की सुध नहीं ली ! लेकिन जब अंग्रेज़ों की नजर इस अनमोल खजाने पर पड़ी तो उन्होंने इसका पुनर्निर्माण कराया और उसे आज के समय की भव्यता प्रदान करी ! भारत जब आज़ाद हुआ और सरदार पटेल के नेतृत्व में 1949 में रियासतों को भारत गणराज्य में सम्मिलित किया गया तो मेवाड़ भी राजस्थान की अन्य रियासतों के साथ भारत में शामिल हो गया और इसके साथ ही महाराणा उदय सिंह के वंशजों ने इस महल पर अपना अधिकार खो दिया लेकिन कालांतर में उन्होंने कोर्ट के माध्यम से और ट्रस्ट बनाकर इसे वापस अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया !

सिटी पैलेस क्योंकि निजी हाथों में है और उदयपुर जाने वाला हर कोई व्यक्ति इसे अपनी लिस्ट में जरूर शामिल करता है तो मुझे लगता है इसी का फायदा उन लोगों ने उठाया है ! 115 रुपये का टिकेट है एक वयस्क का और बच्चे का 55 रुपये का ! बच्चे का मतलब 5 साल से ऊपर के बच्चे का ! तो इस तरह हमें देने पड़ते 340 रूपये ! दो वयस्क और दो बच्चे ! लेकिन थोड़ी सी चोरी कर ली ! बच्चों का टिकट नहीं लिया ! सिटी पैलेस काम्प्लेक्स में एक हायर सेकण्ड्री स्कूल भी है , और जिस समय हम वहां पहुंचे , उस स्कूल के बच्चे बाहर निकल कर आ रहे थे , स्वाभाविक है भीड़ सी हो गयी और इसी चक्कर में हम अंदर चले गए ! न हमसे किसी ने बच्चों का टिकट माँगा , न हमने बताया ! पूरे 110 रूपये बचा लिए !


अंदर जाकर बहुत सी दुकानें सजी हुई हैं ! ज्यादातर इंडियन क्राफ्ट और कपड़ों की ! लोग भी वीआईपी ही अंदर जाते हैं , न मेरी हैसियत थी इतना महंगा कुछ लेने की , न मुझे जरुरत थी ! मैं नहीं गया ! महल के अंदर ज़नाना महल , मर्दाना महल भी हैं जो निश्चित रूप से महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग अलग बनवाए होंगे ! सिटी पैलेस को अगर महलों का समूह कहा जाए तो गलत नहीं होगा ! इसमें अलग अलग समय पर अलग अलग राजाओं द्वारा बनवाए गए महल हैं ! जैसे राजा अमर सिंह ने बनवाया तो अमर महल , भोपाल सिंह ने बनवाया तो भोपाल महल आदि आदि ! इस महल में महाराणा प्रताप और उनके वंशजों और पूर्वजों की आदमकद तसवीरें लगी हैं , उनका सामान रखा हुआ है ! लेकिन कैमरे की भी टिकट लगती है ! भले ही टिकट महंगा है लेकिन आप जब एक बार अंदर जाकर इसकी खूबसूरती और इसकी भव्यता देखते हैं तो निस्संदेह टिकट भूल जाते हैं !


इसी सिटी पैलेस में घूमते वक्त एक जापानी पर्यटक से मुलाकात हो गयी ! जापानी पर्यटक स्वभाव से बड़े शर्मीले और एकांतवासी होते हैं ! इन्हें आप आसानी से पहिचान भी सकते हैं ! इनका मुंह थोड़ा चपटा सा और येल्लोयिश ( पीला सा ) होता है ! हो सकता है वो चीनी हो , मंगोलियन या कम्बोडिया का भी हो ! यानी पूर्व एशिया का ! तो मैंने सोचा इसे पहले पूछ कर पक्का कर लेता हूँ कि जापानी ही है ! भरोसा ऐसे भी था कि हिंदुस्तान में चीनी या मंगोलियन पर्यटक बहुत कम आते हैं , जापानी ज्यादा आते हैं ! भगवान की कृपा से ठीक ठाक जापानी भाषा मुझे आती है ! मैंने पूछा - अनातावा निहोंजिन देस का ? जब उसने हाई कर दिया ! फिर तो पक्का हो ही गया कि बन्दा जापानी ही है और फिर करीब 15 मिनट तक मैं उसका और वो मेरा दिमाग चाटता रहा !

आज इतना ही ! राम राम जी !!


 आइये फोटो देखते हैं  :


इस महल में "रॉयल आँगन" सबसे पहले बनवाया गया था ! नेट से फोटो उतारी है
चेतक सर्किल 

सिटी पैलेस प्रवेश द्वार

सिटी पैलेस प्रवेश द्वार

सिटी पैलेस प्रवेश द्वार

ओपन एयर रेस्तौरेंट

ओपन एयर रेस्तौरेंट
भारत की शानदार विरासत उदयपुर का सिटी पैलेस











ये महल के अंदर के दृश्य हैं
 


ये महल के अंदर के दृश्य हैं







ये महल के अंदर के दृश्य हैं


ये महल के अंदर के दृश्य हैं



ये महल के अंदर के दृश्य हैं

ये महल के अंदर के दृश्य हैं
भारत की शानदार विरासत उदयपुर का सिटी पैलेस
भारत की शानदार विरासत उदयपुर का सिटी पैलेस


भारत की शानदार विरासत उदयपुर का सिटी पैलेस

भारत की शानदार विरासत उदयपुर का सिटी पैलेस

सूरज पोल ! पोल राजस्थान में दरवाज़ों को बोलते हैं
शानदार फव्वारा 

सहेलियों की बाड़ी और सुखाड़िया सर्कल

इस ब्लॉग यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें !

उदयपुर जैसे शहर में , जहां देखने के लिए पग पग पर खज़ाना भरा हो , आपके पास समय और अपना वाहन ( किराए पर भी ) होना बहुत जरुरी हो जाता है अन्यथा आप कम जगह देखकर ही वापस लौटने को मजबूर हो जाएंगे ! मोती मगरी और फ़तेह सागर लेक देखने के बाद अब चलते हैं सहेलियों की बाड़ी और सुखाड़िया सर्कल !

पहले राजा महाराजाओं के समय में जब किसी राजकुमारी का ब्याह होता था तो उस राजकुमारी के साथ ही उसकी सेविकाओं , सहेलियों को भी दहेज़ में उसके साथ ही भेज दिया जाता था ! सहेलियों की बाड़ी भी 48 ऐसी ही सेविकाओं या सहेलियों को समर्पित एक स्मारक है ! उदयपुर शहर के उत्तर में स्थित इस बगीचे को महाराणा भोपाल सिंह ने दहेज़ में आईं  ऐसी ही 48 सेविकाओं के मनोरंजन स्थल के रूप में बनवाया था जो आज एक दर्शनीय स्थल बन चुका है ! इस बात को दोहराना चाहूंगा कि यहां भी 10 रूपये का टिकट लगता है अंदर जाने के लिए ! इस गार्डन में देखने के लिए सुन्दर से फाउंटेन और एक संग्रहालय है ! ये संग्रहालय विज्ञान और जीव विज्ञान को ज्यादा समर्पित कहा जा सकता है ! ये संग्रहालय है तो बहुत छोटा सा लेकिन इस छोटी सी जगह में उन्होंने बहुत कुछ दिखाने और इसे मनोरंजक के साथ साथ ज्ञानवर्धक बनाने की कोशिश जरूर की है ! अलग अलग तरह के मगरमच्छ , डायनासोर का विकास और पतन , लेंस के विभिन्न रूप और सबसे बड़ी बात भारत द्वारा छोड़े गए मंगलयान का एक सुन्दर मॉडल वहां रखा है जिसको लेकर उत्सुकता रहती है ! बच्चों को बहुत कुछ समझाया जा सकता है ! अंततः 10 रूपये में बुरा नहीं है !

अब आइये थोड़ा सा और आगे चलते हैं। बस पास में ही एक और जगह है देखने लायक ! ये मुफ्त है , हाहाहा ! कोई टिकट नहीं ! पहली जगह मिली है उदयपुर में , जहां टिकट नहीं लगता ! ये है सुखाड़िया सर्किल ! मोहन लाल सुखाड़िया के नाम पर बना सर्किल ! उदयपुर में या ये कहूँ कि राजस्थान में आपको ज्यादातर चौराहों के नाम ऐसे ही मिलते हैं , सुखाड़िया सर्किल , चेतक सर्किल फलां फलां और एक नजर ज़रा उत्तर प्रदेश के शहरों के चौराहों के नाम भी देखते चलें , मंदिर चौपला , हाथी पाड़ा चौराहा , गधा पाड़ा चौराहा ! अपना अपना तरीका , अपनी अपनी सोच ! सुखाड़िया सर्किल , राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री और उदयपुर के निवासी मोहन लाल सुखाड़िया के नाम पर है जिसे 1970 में बनवाया गया ! इसमें 21 फुट ऊँचा तीन स्तरीय शानदार फाउंटेन लगा हुआ है ! रात के समय अगर आप इसे देखेंगे तो एक बार लगेगा कि आप किसी भारतीय शहर के फाउंटेन को नहीं बल्कि यूरोप के किसी शहर में हैं ! बोटिंग करना चाहें तो भी ठीक है लेकिन मैंने किसी को भी बोट में बैठे हुए नहीं देखा ! शायद इस वज़ह से कि लोग फ़तेह सागर से बोटिंग का मजा लेकर आते हैं फिर इतनी छोटी सी जगह में कौन बोटिंग करना चाहेगा , दो दो बार पैसे कौन खर्च करेगा एक ही चीज के लिए ?

आइये अब भारतीय लोक कला मंदिर चलते हैं ! यहां कठपुतली डांस देखेंगे ! राजस्थान और गुजरात के कारीगरों , लोक कलाओं , नृत्यों और वहां की संस्कृति के विषय में जानेंगे ! सन 1952 में पदम भूषण देवीलाल सामर द्वारा स्थापित इस संस्थान में आप राजस्थान की ग्रामीण वेशभूषा , गहने , खेल खिलोने और उनकी संस्कृति से सम्बंधित कलाकृतियां देख सकते हैं ! टिकेट लगता है ! लेकिन 15 मिनट का कठपुतली डांस आपको ये आभास कराता है कि आपके पैसे बेकार नहीं गए ! पहले यहां के संग्रहालय में घूमिये , राजस्थान से थोड़ा परिचित होइए फिर कठपुतली डांस देखिये ! एक बात कहना चाहूंगा , अगर कोई उदयपुर से मेरा ब्लॉग पढता है तो भैया उन्हें कहिये कि संग्रहालय की दशा थोड़ी सी सुधार लें ! वर्षों से वो ही कपडे पहना रखे हैं पुतलों को और वो इतने गंदे हो चुके हैं कि अगर आप उन्हें झाड़ें तो 2-2 किलो गर्द जम पड़ी होगी उन पर ! साफ़ किया जा सकता लेकिन शायद सरकारी होने की वज़ह से कोई ध्यान नहीं देता ? मोदी जी का स्वच्छता सन्देश उधर पहुंचा नहीं है अभी शायद !


आज इतना ही , ज्यादा हो जाएगा फिर ! राम राम जी


आइये फोटो देखते हैं :


सहेलियों की बाड़ी का प्रवेश द्वार
सहेलियों की बाड़ी का प्रवेश द्वार
सहेलियों की बाड़ी का प्रवेश द्वार



फाऊन्टेन में सुन्दर कलाकृति
दोबारा से  प्रवेश द्वार की फोटो ! इस बार खाली था
सुखाड़िया सर्किल

सुखाड़िया सर्किल
सुखाड़िया सर्किल
सुखाड़िया सर्किल , रात के समय
सुखाड़िया सर्किल , रात के समय
लोक कला मंडल में कठपुतली डांस
लोक कला मंडल में कठपुतली डांस
लोक कला मंडल में कठपुतली डांस
लोक कला मंडल में कठपुतली डांस
और ये डांस प्रोग्राम के जज साब ! कभी कभी ये भी हाथ पाँव चला लेते हैं डांस के लिए 

 फतह सागर लेक


इस ब्लॉग यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें !

 मोती मगरी में अपना तो टिकट लगता ही है , जिस वाहन से जाते हैं उसको अंदर ले जाने का भी टिकट लेना पड़ जाता है ! लेकिन अन्दर पहुंचकर आप इस के विषय में भूल जाते हैं और वहां से मंत्रमुग्ध कर देने वाले दृश्यों में इतना डूब जाते हैं कि याद ही नहीं रहता कि हमने इसके लिए अलग से पैसे दिए हैं ! वैसे ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं है कि आप वाहन से ही अंदर जाएँ , मुख्य गेट के पास ही से मोती मगरी हिल तक के लिए सीढ़ियां बानी हुई हैं जिनके माध्यम से आप ऊपर जा सकते हैं और अपनी फिटनेस भी जांच सकते हैं ! मोती मगरी के ही  बिल्कुल पास फ़तेह सागर झील है ! 1680 ईस्वी में मेवाड़ के राजा महाराणा फ़तेह सिंह के नाम पर बनी इस झील के लगभग मध्य में नेहरू पार्क नाम से एक पार्क है जहां तक आप सिर्फ नौका से ही पहुँच सकते हैं और पक्की बात है कि इसके लिए भी आपको टिकट लेना पड़ेगा ! हर 15 मिनट के अंतराल पर एक नौका इस किनारे से निकलती है , ये समय और भी ज्यादा हो सकता है अगर पर्याप्त सवारियां नहीं मिलती हैं तो ! नेहरू पार्क में ऐसा कुछ भी नहीं है , जिसकी प्रशंसा करी जाए लेकिन आदमी वहां तक गया है तो सोचता है , देखते ही चलते हैं ! इतना खर्च कर रहे हैं तो थोड़ा और सही ! और इसी चक्कर में वो अंदर तक भी हो ही आता है ! लेकिन इसके ही साथ इसमें दो आइसलैंड और भी हैं ! एक है वाटर जेट फाउंटेन और दूसरा उदयपुर सोलर ऑब्जर्वेटरी ! ये दोनों देखने लायक हैं ! फ़तेह सागर झील उदयपुर की चार झीलों - पिछोला झील , उदय सागर झील , और धेबार झील में से एक है ! साफ़ सुथरी है ! 

वास्तव में फ़तेह सागर लेक का निर्माण महाराणा जय सिंह ने 1687 में शुरू कराया था लेकिन उनका निर्माण बाढ़ में बह गया और फिर सन 1889 के आसपास महाराणा फ़तेह सिंह जी ने इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के पुत्र ड्यूक ऑफ़ कनॉट की यात्रा को यादगार बनाने के लिए देवली झील के किनारे कनॉट डैम बनवाया जिसे बाद में बड़ा करके झील में परिवर्तित कर दिया गया और फिर इस झील को फतह सागर झील नाम दिया गया ! ये वही कनॉट थे जिनके नाम पर दिल्ली का प्रसिद्द कनॉट प्लेस है।  

कभी कभी दो जाने पहिचाने चेहरे कहाँ और कैसे मिल जाते हैं , अंदाजा लगाना ज़रा मुश्किल है ! इधर इस किनारे से बोट चलने में थोड़ा समय बाकी था तो अपनी फैमिली के साथ मैं बस ऐसे ही रोड साइड घूम रहा था ! किसी ने आवाज़ लगाईं -सारस्वत ! यहाँ मुझे इस नाम से कौन बुला सकता है ? मैं पीछे मुड़कर देखता उससे पहले ही वो मेरे कंधे पर हाथ मार चुका था ! राजू चौधरी ! मेरा मित्र ! झाँसी में डिप्लोमा करते समय हम हॉस्टल में साथ रहे हैं ! राजकीय पॉलिटेक्निक झाँसी के दिन , वो तीन साल , याद आ गए पल भर में ! हालाँकि राजू मेरे बेस्ट फ्रैंड में कभी शामिल नहीं रहा और उसकी ब्रांच भी इलेक्ट्रॉनिक्स थी और मेरी मैकेनिकल (हथोड़ा छाप ), लेकिन साथ पढ़े लोग हमेशा मित्र होते हैं और जब पंद्रह साल बाद मिलते हैं तो बेस्ट से भी ज्यादा बेस्ट लगते हैं ! हालाँकि डिप्लोमा के बाद डिग्री भी हो गयी और एम.टेक. भी ! लेकिन जो आनंद डिप्लोमा के उन तीन साल में आया वो दोबारा फिर कभी नहीं आ सका । हॉस्टल की यादें फिर कभी साझा करूँगा ! आज बस इतना ही ! 

फतह सागर झील के ही बिलकुल पास में एक संग्रहालय है जिसे वीर भवन कहा जाता है ! इस संग्रहालय में महाराणा प्रताप और उनके वंशजों और मेवाड़ के अनेक वीरों और योद्धों में शहीद हुए भील नायकों की आदमकद तस्वीरें लगी हैं ! यहां आप मेवाड़ के उस समय के लोगों की देशभक्ति के साक्षात दर्शन कर सकते हैं ! हमेशा पूजा पाठ और कर्मकांडों में व्यस्त रहने वाले ब्राह्मणों तक ने देश की रक्षा के लिए तलवार उठाने में गुरेज नहीं किया था ! दो मंजिल के इस संग्रहालय में आपको उस समय के कुम्भलगढ़ और चित्तौड़गढ़ के दुर्ग के मॉडल देखने को मिलते हैं जिससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उस वक्त मेवाड़ कितना विस्तृत , कितना धनी और कितना वीर हुआ करता था !

आइये कुछ फोटो देखते हैं :






​
​मोती मगरी हिल पर बनी प्याऊ और जमना लाल बजाज की प्रतिमा 








वीर भवन , फतह सागर लेक के बिल्कुल पास ही है


​कुम्भलगढ़ फोर्ट का मॉडल 
और ये दाँत दिखाता पुराना  मित्र राजू चौधरी 
फतह सागर का  शानदार नजारा ! बीच में नेहरू पार्क दिख रहा है
नेहरू पार्क
नेहरू पार्क


नेहरू पार्क में लगी एक कलाकृति
ये कौन सा वृक्ष है ?
नेहरू पार्क से दिखाई देता लक्ष्मी विलास 

 जगदीश मंदिर : उदयपुर

जगदीश मंदिर

इस पोस्ट को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें !!

सिटी पैलेस अरावली पहाड़ियों पर बना हुआ है और इसकी हल्की सी चढ़ाई जगदीश मंदिर से ही शुरू हो जाती है ! ऑटो -गाड़ियां खड़ी करने की जगह नहीं मिल पाती लोगों को तो वो यहीं छोड़ देते हैं ! और कहते हैं कि सामने ही जगदीश मंदिर है आप देख के आओ , मैं यहीं खड़ा हूँ ! मैं यहीं खड़ा हूँ के चक्कर में वो अपने ऑटो को ले जाता है कहीं और ! उसे मालुम होता है कि अब आप 2 -3 घंटे से पहले नहीं आने वाले लौटकर ! सिटी पैलेस और जगदीश मंदिर को देखने और घूमने में इतना समय लग ही जाता है !


जगदीश मंदिर उदयपुर के दर्शनीय स्थलों में गिना जाता है ! असल में आप जिस होटल में रुके होते हैं वो आपको एक बुकलेट दे देते हैं कि सर ये ये जगह हैं उदयपुर में जहां आप जाना चाहेंगे ! आपकी मर्जी , आप कहाँ जाना चाहते हैं ? सिटी पैलेस देखने के बाद हम पैदल पैदल ही जगदीश मंदिर की तरफ निकल चले ! आप देखेंगे की सिटी पैलेस काम्प्लेक्स के अंदर और बाहर इंडिया और भारत जैसा ही अंतर है ! मतलब अंदर इंडिया जैसा एकदम साफ़ और सिटी पैलेस से बाहर निकलते ही भारत जैसा गंदा माहौल ! सिटी पैलेस के बाहर की गन्दगी दिखाई दे जाती है ! दौनों तरफ बाजार सजे हैं लेकिन गाहक मुझे तो नहीं दिखे ज्यादा ! आते होंगे शाम को !

सिटी पैलेस के बड़ा पोल की तरफ भगवान विष्णु ( लक्ष्मी नारायण ) को समर्पित जगदीश मंदिर मारू गुर्जर स्थापत्य कला ( मेवाड़ की पुरानी स्थापत्य कला ) में बना हुआ है जिसे 1651 में महाराणा जगत सिंह ने बनवाया ! पूरी 32 सीढ़ियां हैं जो बिल्कुल सीधी हैं ! आप अनुमान लगाएं कि 10 मीटर की चौड़ाई में अगर आप 32 सीढ़ियां बनावायें तो लगभग एकदम सीधी होंगी ! आधा दम तो सीढ़ियां चढ़ते ही निकल जाता है !

ऐसा कहते हैं कि इस मंदिर को बनाने में 15 लाख रुपये का खर्च आया था ! इस शानदार मंदिर के शिखर में नर्तकों , संगीतकारों , घुड़सवारों के मूर्तियां लगी हैं जो इसे अद्भुत और स्थापत्य के तौर पर विशिष्ट बनाती हैं। प्रवेश करते ही पत्थर के बने दो हाथी आपका स्वागत करने को तैयार हैं ! यहाँ गरुड़ की प्रतिमा इस तरह से स्थापित करी गयी है जैसे वो भगवान विष्णु के पहरेदार के रूप में कार्यरत हों।

दर्शन करने में बिलकुल भी परेशानी नहीं होती ! मुख्य मंदिर के आसपास इतनी जगह है कि भीड़ होने पर भी उसे नियंत्रित किया जा सकता है ! मंदिर की दीवारों पर जो कलाकृतियां हैं उन्हें देखकर एक बारी लगता है जैसे हम उदयपुर में नहीं बल्कि खजुराहो के मंदिर देख रहे हों !!


आइये फोटो देखते हैं : 

जगदीश मंदिर प्रवेश द्वार
जगदीश मंदिर प्रवेश द्वार








दीवारों पर  कलाकृतियां




दीवारों पर  कलाकृतियां

दीवारों पर  कलाकृतियां
मंदिर के खंभे भी आकर्षित करते हैं








दीवारों पर  कलाकृतियां

दीवारों पर  कलाकृतियां

  उदयपुर रोप वे और दीनदयाल उपाध्याय पार्क

इस पोस्ट को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें!!


सिटी पैलेस और जगदीश मंदिर देखते हुए जब सूरज अपनी ड्यूटी पूरी करके वापस अपने घर अपने बीवी बच्चों के पास जाने की तैयारी करने लगा तब हमें भी याद आया कि अभी तो हमें रोप वे और पंडित दीनदयाल उपाध्याय पार्क भी जाना है ! ऑटो वाले ने अपना ऑटो जगदीश मंदिर के सामने वाले पोल में खड़ा कर लिया था ! उससे बात करी तो वो फोन पर ही चिल्ला चिल्ला कर कहने लगा - सर सामने देखिये , सामने ही हूँ ! कई बार देखा ! नहीं दिखा ! सर सामने , सामने वाले पोल में ! दिख गया ! मैंने पूछा -यहां ऐसे छुप के क्यों बैठे हो ? बोला सर , पुलिस वाले चालान काट देते हैं इसलिए यहां अंदर की तरफ ही हूँ ! उसने जहां अपना ऑटो लगा रखा था उसके ही बिल्कुल सामने चाय समोसे की दूकान भी थी ! खाना तो खाया ही नहीं था , बस ऐसे ही बीच बीच में कुछ खाकर काम चल जा रहा था , और सच बात तो ये है कि हमें भूख लग भी नहीं रही थी ज्यादा ! बस चाय पीने का ही मन था। अंदर घुस गए ! अंदर नमक पारे जैसी कोई चीज थी , 10 रुपये की 100 ग्राम ! ले ली ! सच में अच्छी थी ! बाहर ऑटो वाला खड़ा था उसे भी अंदर ही बुला लिया , भाई तुम भी चाय पी लो ! पहले तो कुछ सकुचाया ! जब मैंने कहा कि पी लो तुम्हारे पैसों में से कम नहीं होंगे , तब थोड़ा सा मुस्कराता हुआ अंदर आ गया और अपनी चाय बाहर ही ले गया ! चाय ख़त्म करते ही अब हमारी मंजिल सीधा मंशा पूर्ण करनी देवी मंदिर तक जाने की थी। मनसा पूर्ण करनी देवी मंदिर एक ऊँची सी पहाड़ी पर है ! जहां तक गंडोला ( रोप वे ) से जाते हैं ! हालाँकि जब तक रोप वे नहीं बना था तब तक लोग शायद सीढ़ियों से जाते होंगे। ये सीढ़ियां रोप वे की ट्राली से नजर आती है और एक आध आदमी इनपर से ऊपर जाता हुआ भी दिखाई दे जाता है ! चौड़ी लगती है और शायद एकदम साफ़ सुथरी भी ! इसका मतलब इनका उपयोग अभी जारी है !


जग मंदिर दूर से देखते हुए पिछोला झील के किनारे किनारे से ऑटो वाले ने बमुश्किल 10 मिनट में हमें रोप वे के पास पहुंचा दिया ! रोड के किनारे ही एक छोटी सी दूकान है कन्फेक्शनरी की जहां चॉकलेट वगैरह ज्यादा बिकते हैं , उसी के एक कोने में छोटा सा केबिन बनाया हुआ है रोप वे के टिकेट बेचने के लिए। वयस्क के लिए 78 रुपये का ! मैंने ढाई टिकट लिया , सोचा कि छोटे बेटे का तो शायद फ्री चल जाएगा ! अभी चार ही साल का तो है ! टिकट लेकर दुकान के बराबर से ही नीचे की तरफ से रोप वे स्टैंड तक जाने के लिए रास्ता है । नीचे पहुंचे , हमारा नंबर स्क्रीन पर आने लगा तो उसने टिकट चेक किया , बोला आधा टिकट और लेना पड़ेगा आपको। क्यों भाई ? अभी तो ये पांच साल का भी नहीं हुआ !! उसने फिर बताया कि उम्र से नहीं बच्चे की हाइट से टिकट का निर्धारण होता है , 110 सेंटीमीटर की हाइट से ज्यादा के बच्चे का आधा टिकट लगता है ! ओह ! फिर दोबारा गया टिकट लेने , और फिर दोबारा लाइन में लगा ! बच्चे का 39 रूपये टिकट लगता है , पूरे चालीस ही हो जाते हैं ! एक रुपये की टॉफ़ी पकड़ा देगा। ये अच्छा धंधा चल पड़ा है आजकल , जिसके पास खुले पैसे नहीं होते वो 1 -2 रुपये की या तो टॉफ़ी पकड़ा देता है या माचिस दे देता है ! इसी को लेकर एक सच की कहानी मेरे पड़ोस में हुई थी। आज नहीं फिर कभी सुनाऊंगा !


जून 2008 में शुरू हुआ उदयपुर का रोप वे घूमने वालों के लिए एक अच्छा स्थान बन गया है। आने जाने का दोनों तरफ का किराया इस 78 रूपये में ही शामिल है ! रोप वे इधर से ले जाकर उधर करनी माता के मंदिर तक ले जाती है ! हालाँकि मुख्य मंदिर के लिए थोड़ा सा और चलना पड़ता है ! लेकिन इस 10 मिनट के सफर में बहुत रोमांच आ जाता है ! एक ट्राली में छह लोग आ जाते हैं। सामने की सीट पर तीन और लोग बैठे थे ! थोड़ी देर बाद उनमें से एक ने मुझे पूछा - आप आई.बी. में हैं ? मैंने कहा नहीं ! मैं इंजीनियरिंग कॉलेज में हूँ ! लेकिन आप ऐसे क्यों पूछ रहे हैं ? आपकी जैकेट पर पीस ऑफिसर लिखा है ! ओह ! घंटोली आदमी था। ऐसे किसी की जैकेट पर मोदी लिखा होगा तो वो नरेंद्र मोदी हो जाएगा ?


करनी माता मंदिर ऐसे तो बीकानेर में है जो बहुत प्रसिद्द भी है किन्तु उसी का एक रूप यहां भी बन रहा है ! अभी दान की अवस्था में है ! दान की अवस्था में , मतलब दान आएगा तो काम चालू रहेगा ! करनी माता का मंदिर हो और चूहे न हों , ऐसा कैसे हो सकता ? दान की पेटी रखी हो तो धर्म के लिए कुछ दान कर भी देना चाहिए। मैंने भी कर दिया। इसी मंदिर से आगे एक दरगाह भी है ! किसकी है मालूम नहीं ! दरगाह में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं होती इसलिए मैं अंदर भी नहीं जाता। नीचे एक रास्ता और भी जाता है , इसी रास्ते के अंत में एक खँडहर सा है। दरवाज़ा तो खुला था मगर अंदर नही जा पाया लेकिन जब उसे ऊपर से देखा तो उसका आँगन दिखाई दे रहा था जो एकदम गंदा , बीट से भरा पड़ा था ! उसके बरामदे से लग रहा था कि वो शायद किसी का अधूरा महल रहा होगा ! न इसके विषय में वहां किसी को पता था और न ही कोई पट्टिका दिखाई दी जिससे कुछ पता चल पाता !


जब करनी माता मंदिर से इधर उतरकर आते हैं तो पास में ही पंडित दीन दयाल उपाध्याय पार्क है ! यहां पंडित जी की जो मूर्ति लगी है उसका उद्घाटन राजयपाल कल्याण सिंह ने किया है , इसका मतलब ये अभी हाल ही में लगी है ! क्यों अभी हाल ही में कल्याण सिंह जी राजस्थान के राजयपाल बनाये गए हैं ! अच्छी जगह है , विशेषकर बच्चों के लिए ! और बड़ी बात ये कि फ्री है ! उदयपुर में फ्री होना बड़ी बात है !

इस पोस्ट के साथ हम उदयपुर की यात्रा ख़त्म करेंगे और अब आगे एकलिंगजी चलेंगे अगले दिन :


केबल कार प्रतीक्षा स्थल
केबल कार सेट अप

केबल कार वो आई
केबल कार अभी दूर है
आ रही है



आ गयी

आ गयी


आ गयी




केबल कार से खींचे चित्र

केबल कार से खींचे चित्र

केबल कार से खींचे चित्र



बीच में दिखाई देता जगमंदिर


करणी माता मंदिर













मंदिर को पूर्ण करने के लिए और भी सामान की जरुरत पड़ेगी


वापस चलते हैं

दीन दयाल उपाध्याय पार्क

दीन दयाल उपाध्याय पार्क
सूर्यास्त के दर्शन

कुछ मौज मस्ती हो जाए

कुछ मौज मस्ती हो जाए

कुछ मौज मस्ती हो जाए









अब रात हो चली है ! होटल वापस चलते हैं 

 उदयपुर से एकलिंगजी

अगर आप उदयपुर का यात्रा वृतांत पढ़ना चाहें तो यहां क्लिक कर सकते हैं !!


पूरा एक दिन उदयपुर में व्यतीत करने के बाद जब लगा कि अब ऐसी कोई महत्वपूर्ण जगह देखे बिना नहीं रही है तो वापस होटल लौट लिए ! होटल बस स्टैंड के सामने वाली रोड पर था अम्बा पैलेस ! लौटते लौटते आठ बज गए ! अब खाने का भी समय था ! पूरा दिन इधर उधर घूमते हुए जो कुछ मिला था , वही खाकर काम चला लिया था तो अब खाना ही खाना था ! बस स्टैंड के पास में ही एक बढ़िया सा खाने का स्थान दिखाई दिया , शानदार नाम था शायद उसका ! बढ़िया जगह लगी ! हमारे लायक ! 130 रुपये की थाली ! राजस्थानी ले लो या गुजराती ! 20 रुपये का पराठा ! कुल मिलाकर सस्ता और बेहतर ! इतना थक चुके थे और इतना खा लिया था कि ऐसा लगा कि अब बस होटल पहुंच जाएँ ! यही हुआ ! जाते ही बिस्तर पर पड़ गए ! ऐसे हालत में , जब आप सुबह से ही घूम रहे हैं सबकी हालत यही हो जाती है ! लेकिन सोने से पहले कल का प्रोग्राम जरूर बना लिया था !

जैसा कि अक्सर होता है , कार्यक्रम के अनुसार हमें आठ बजे होटल से निकल जाना था लेकिन जनवरी के मौसम में बच्चों के साथ आठ बजे जागना ही बहुत मुश्किल हो जाता है , तैयार होकर निकलना तो बहुत बड़ी बात हो जाती है ! खैर जैसे तैसे 9 बजे हम होटल से निकलकर बस स्टैंड पहुंचे ! नाश्ता किया और फिर बस के विषय में जानकारी ली ! आजकल टेक्नोलॉजी ने बहुत से काम आसान कर दिए हैं ! ट्रेन के विषय में कुछ पता करना हो , ऍप्स है न ? बस के विषय में कुछ जानना हो , ऍप्स है न !! लेकिन छोटी छोटी बातों के लिए एप्प रखना मुझे पसंद भी नही और शायद जरुरत भी नही ! पूछताछ खिड़की सामने हो और आप एप्प यूज़ करें ? एकलिंगजी जाने के बारे में पता किया तो उसने तुरंत टिकेट काट दी ! दो टिकट थे ! अभी बच्चों को मुफ्त ही चला रहा हूँ ! हालाँकि एक छह साल का हो गया है ! एक टिकट 22 रुपये का और दूसरा 16 रुपये का ! अंतर इस वजह से क्योंकि राजस्थान में महिलाओं को बस में 30 प्रतिशत की छूट मिलती है !! टिकट एकलिंगजी के नाम से नहीं बनता बल्कि कैलाशपुरी के नाम से बनता है ! वहां के स्थानीय लोग भी उस जगह को कैलाशपुरी ही कहते हैं , एकलिंगजी हमारे और आपके लिए है ! उदयपुर से नाथद्वारा जाने वाली रोड पर उदयपुर से करीब 22 किलोमीटर दूर !

भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर को सिसोदिया शासकों ने सन 971 में बनवाना शुरू किया ! एकलिंगजी यानि भगवान शिव मेवाड़ राज्य के आराध्य देव माने जाते हैं ! ये एक तरह का काम्प्लेक्स है जिसमें 108 छोटे बड़े मंदिर हैं ! आज का जो रूप इस मंदिर का है वो 15 वीं शताब्दी का है ! छोटे छोटे मंदिरों को मंडप के रूप में बनाया गया है ! बाहर से देखने पर ऐसा लगेगा मानो ये कोई खँडहर होगा लेकिन जब दरवाजे से अंदर जाते हैं तो इसका एक भव्य रूप दिखाई देता है ! बाहर का दरवाज़ा ऐसा है जैसा आमतौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गाँवों में बड़े बड़े घरों में होता है यानि हवेलियों में ! लकड़ी का बहुत बड़ा सा दरवाज़ा, ऊपर की तरफ से थोड़ा सा अर्धवृत्ताकार ! अंदर का मुख्य मंदिर पुराने रूप की स्थापत्य कला का बेहद बेहतरीन नमूना है ! इस मंदिर में भगवान शिव चार चेहरे के साथ विराजमान हैं ! इसी काम्प्लेक्स में भगवान लकुलीश को समर्पित भारत का एक मात्र मंदिर भी स्थित है किन्तु उसे आजकल श्रद्धालुओं और दर्शनार्थियों के लिए बंद कर दिया गया है , क्यों ! मुझे नहीं मालुम ! ये इस काम्प्लेक्स के बिलकुल पीछे की ओर स्थित है जिसे आप देख तो सकते हैं किन्तु वहां जाकर भगवान के दर्शन नहीं कर सकते !

एकलिंगजी भगवान के दर्शन करने में तो जो आनंद आया वो बयान नहीं किया जा सकता ! भगवान की मूर्ति पांच दरवाज़ों के अंदर रखी हुई है ! पहला कमरा खाली , दूसरा और तीसरा भी खाली और चौथे में भगवान विराजमान हैं पांचवां फिर खाली ! ये शायद खाली कमरे वहां के पुजारियों के काम आते होंगे ! चौथे में भगवान को विराजमान किया हुआ है ! दर्शन करने में बहुत ज्यादा भीड़ भाड़ यानि 27 जनवरी को तो नहीं मिली ! आराम से दर्शन किये , प्रसाद लिया और थोड़ी देर बैठे भी ! मंदिर की स्थापत्य को देखने और उसकी खूबसूरती को निहारने के लिए। मुख्य द्वार पर चौखट के तीनों तरफ चांदी लगाईं हुई है जिससे उसकी खूबसूरती और भी बढ़ जाती है ! मूर्ति के ऊपर भगवान को पञ्च स्नान कराने के लिए एक छतरी लगा रखी है , ये प्रयोग मुझे बहुत ही पसंद आया ! मथुरा में बांके बिहारी मंदिर में शायद बाल्टी से भगवान को स्नान करवाते हैं !

एकलिंगजी जी के दर्शन करने के पश्चात इधर उधर के फोटो लेने लगा ! हालाँकि वहां स्पष्ट लिखा है कि फोटो लेना सख्त मना है और वो कैमरा वहीं लॉकर में रखवा लेते हैं लेकिन मैंने सिक्योरिटी वाले की नजर से बचा के छोटा कैमरा अपनी पॉकेट में रख लिया था ! मैं सिक्योरिटी वालों की नज़रों से बचके फोटो खींचता रहा और बहुत फोटो खींच भी लिए थे ! कैमरा वापस अपनी जेब में रख लिया ! सिक्योरिटी वालों ने मुझे देख भी लिया था और एक बार मना भी किया था ! लेकिन 15 फोटो खींचने के बाद जैसे ही मैंने एक फोटो और ली , एक सिक्योरिटी वाला मेरे पास आया और बोला आप मान नही रहे हैं , आप कैमरा दीजिये अपना ! मैंने उसे कहा -मेरे पास कैमरा है ही नहीं ! लेकिन वो मुझे मुन्तजिम कार्यालय ( कंट्रोल ऑफिस ) ले गया और वहां मेरे  द्वारा खींचे गए एकलिंगजी के सब फोटो डिलीट करा दिए ! नालायक !! मेरा भी लालच था अन्यथा अगर मैं एक फोटो और न खींचता तो शायद पकड़ा भी न जाता ! इसलिए एकलिंगजी के जो भी फोटो आपको यहां मिलेंगे वो सब इंटरनेट से एकत्रित किये हुए हैं या मेरी पत्नी ने लिए हैं अपने मोबाइल से ! क्षमा चाहूंगा !

इसी मंदिर के पीछे महाराणा रायमल द्वारा 1473 से लेकर 1509 तक बनवाए गए कई मंदिर और भी हैं और एक महल भी है ! इनमें से सिर्फ एक ही में भगवान शिव की मूर्ति स्थापित है !

आइये कुछ फोटो देखते हैं इसके बाद नाथद्वारा चलेंगे !!


बाहर से देखने पर एकलिंगजी मंदिर किसी ग्रामीण इलाके का मंदिर लगता है








सड़क के ऊपर महल
एकलिंग जी के पीछे भी मंदिर और खंडहरनुमा महल हैं लेकिन शायद 100 में से 10 लोग भी उधर नहीं जाते
एकलिंग जी के पीछे के  मंदिर
एकलिंग जी के पीछे के  मंदिर

ये कभी महल रहा होगा , आज खंडहर है

ये कभी महल रहा होगा , आज खंडहर है
एक नमूना ये भी देखिये!
इसे नाला कहियेगा या महल का दरवाज़ा
ये भी एक महल है और इसके बाशिंदे कभी कभी यहां आते हैं
पीछे की तरफ से खींचा गया एकलिंग जी मंदिर का चित्र
पीछे की तरफ से खींचा गया एकलिंग जी मंदिर का चित्र

और ये एक लंगूर , दिख रहा है ? 

  एकलिंगजी से श्रीनाथ जी मंदिर नाथद्वारा

इस पोस्ट को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें !



एकलिंग जी में दर्शन तो बढ़िया हुए किन्तु उन्होंने मेरे सब फोटो डिलीट कर दिए थे इसलिए थोड़ा सा गुस्सा भी था मन में ! हालाँकि गलती मेरी थी , लेकिन कोई फोटो थोड़े ही डिलीट करता है ऐसे ? अब मन नही लग रहा था वहां बिलकुल भी ! इसलिए बाहर आ गये और सीधे चाय की दुकान पर दस्तक दे दी। बिलकुल सामने ही चाय , समोसे की दुकान हैं ! मिर्ची पकोड़ा भी बढ़िया मिलता है , खाना चाहिए। कम से कम एक बार तो खाने में कोई बुराई नहीं है अन्यथा आप राजस्थान की एक फेमस चीज से वाकिफ नहीं हो पाएंगे। पेट पूजा करने के बाद अब हमारा ध्येय , हमारी मंजिल नाथद्वारा पहुंचना था।

नाथद्वारा मंदिर उदयपुर से लगभग 50 किलोमीटर दूर है और यहां एकलिंगजी से 30 किलोमीटर। पता किया कि कैसे जाया जा सकता है , बोले बस से। सरकारी बस एक दो ही निकली होगी और पूरा एक घंटा गुजर गया। किसी ने रोकी ही नही। राजस्थान में भी ऐसा होता है ? उत्तर प्रदेश ही बहुत है ऐसे कामों के लिए। फिर वहीँ के दूकानदार ने बताया कि आप ट्रेवल्स बस को हाथ देना , जगह हुई तो वो बिठा ले जाएगा। पहली ट्रेवल्स बस आई , हाथ दिया , उसने पूछा कहाँ - मैंने कहा नाथद्वारा ! बस आगे बढ़ा ले गया। एक और आई थोड़ी ही देर बाद। बिठा लिया ! लेकिन एक ही सीट खाली थी। पत्नी को बिठा दिया। मुझे बोला -आप ऊपर बैठ जाओ। ऊपर ? कहाँ ? समझ आया। वो ट्रेवल्स की बस थी और उसमें सोने वाली सीट भी होती हैं। मैं और बड़ा बेटा उसमें ही जा घुसे। पहली बार ऐसी सीट मिली है जीवन में। असल में कभी बस में बहुत लम्बी यात्रा नहीं करी है मैंने तो स्लीपर बस का ज्ञान नहीं था। लेकिन बहुत आरामदायक लगी। दो लोगों के लिए सोने के लिए पर्याप्त जगह होती है। दो लोग अगर सामान्य हों तो , असामान्य के लिए हर जगह कम पड़ जाती है।

एकदम बढ़िया चकाचक सड़क है। मुश्किल से एक घंटा लगा होगा नाथद्वारा पहुँचने में। बस स्टैंड पर उतरकर समय देखा तो ठीक दोपहर के एक बज रहे थे। मंदिर पहुंचे , मंदिर बंद मिला। अब मंदिर 4 बजे खुलेगा। यानि तीन घंटे खराब होंगे। और नाथद्वारा में ऐसा और कुछ भी नही है कि वहां दो घंटे गुजारे जा सकें। तो अब क्या करें ? तो अब सीधा हल्दी घाटी चलते हैं। ये ठीक रहेगा। लेकिन आज कुछ बदलाव होगा। घूमा हमने पहले हल्दी घाटी था लेकिन वृतांत आपको पहले श्रीनाथजी मंदिर , नाथद्वारा का पढ़वाऊंगा।

जैसा कि मैंने पहले लिखा कि दोपहर में मंदिर बंद हो जाता है सुबह 5 बजकर 45 मिनट से शुरू होकर दर्शन दोपहर में भगवान को राजभोग खिलाने तक हो सकते हैं। राजभोग का समय 12 बजकर 10 मिनट है , उसके बाद भगवान जी , अटल बिहारी वाजपेयी जी की तरह दोपहर की नींद लेते हैं। अटल जी भी दोपहर में दो घंटे जरूर सोते थे , जब प्रधानमंत्री थे तब। अब का पता नही। फिर भगवान दोपहर बाद 3 बजकर 40 मिनट पर पुनः उपस्थित होते हैं दर्शनार्थियों के लिए। सुना तो ऐसे है कि भगवान हर समय , हर जगह उपस्थित हैं फिर ऐसे लोक सभा और राज्यसभा की कार्यवाही की तरह कैसे ? भगवान ही जानें। बीच बीच में 15 मिनट के लिए "वो " लोग भगवान को दर्शन देने के लिए मुक्त करते हैं। अलग ही व्यवस्था है। पुरुषों के लिए अलग , महिलाओं के लिए अलग प्रवेश द्वार हैं लेकिन अंदर जाकर सब एक जगह मिल जाते हैं और क्या अव्यवस्था फैलती है , राम जाने। आधे लोग तो बिना दर्शन के लिए ही लौट आते होंगे। ऐसे मारामारी फैलती है। ये अव्यवस्था असल में वहां के टोपीधारी पंडितों की बनाई हुई लगती है। पहले वो बाहर भीड़ इकट्ठी होने देते हैं फिर एकदम से दरवाजा खोलते हैं जिससे भीड़ धक्का मुक्की करती हुई आगे बढ़ती है। जैसे सर्कस चालू करने वाले हैं या कोई इंटरव्यू टेस्ट लेना है। मैंने तो नही देखा लेकिन मेरी पत्नी ने शायद देखा था कि कुछ लोगों को "दक्षिणा " लेकर बैक डोर एंट्री भी मिलती है। धंधा है ? एक अलग चीज जो मैंने वहां महसूस करी , वो ये थी कि वहां प्रांगण में सीधे हाथ पर बहुत सी दुकानें हैं , जहां आप अलग अलग चीज दान कर सकते हैं ! जैसे आप चाहें तो खाना दान करें , गायों के लिए घास दान करें या उनके खाने की कोई और चीज जैसे चोकर वगैरह ! लेकिन दूकान कोई भी खुली हुई नही थी।  संभव है सुबह के समय में खुलती हों।  श्रीनाथ जी के मंदिर में गायों की सेवा का लगा से प्रावधान किया हुआ है ! ये अच्छा है !
हमें हल्दी घाटी से लौटकर पांच बजे के दर्शन मिल गए थे। पांच बजे यानि आरती के बाद के दर्शन। अब कुछ बात हो जाए भगवन श्रीनाथ जी के मंदिर के इतिहास विषय में। बनास नदी के किनारे बसे नाथद्वारा में भगवान श्री नाथ जी ( श्री कृष्णा जी ) को समर्पित मंदिर 17 वीं शताब्दी का बना हुआ है। नाथद्वारा मतलब नाथ +द्वार यानि भगवान का द्वार। विशेषकर गुजरात में इस मंदिर को श्रीनाथ जी की हवेली के नाम से भी पुकारा जाता है। इस मंदिर के निर्माण से जुडी एक बहुत प्रसिद्द कहानी है। भगवान श्री नाथ जी वृन्दावन में विराजमान थे लेकिन उस समय औरंगज़ेब ने जो कत्लेआम और मंदिरों को ध्वस्त करने का अभियान चलाया हुआ था उसे देखते हुए राणा राज सिंह ने 1672 ईस्वी में इसे वृन्दावन से कहीं दूर ले जाने का निश्चय किया ताकि वो अपने आराध्य देव की प्रतिमा को सुरक्षित बचा सकें। लेकिन रास्ते में सिंहद गांव में एक जगह उस रथ के पहिये कीचड़ में धंस गए , जिस रथ से भगवान को दूर ले जाया जा रहा था। ये देखकर मुख्य पुजारी ने राणा को सलाह दी कि भगवान यहीं स्थापित होना चाहते हैं और वो जगह नाथद्वारा (सिंहद) थी , और इस तरह नाथद्वारा के प्रसिद्ध श्री नाथ जी मंदिर का निर्माण हुआ। स्थापत्य के नजरिया से देखें तो इस मंदिर की बनावट बहुत साधारण है,  भगवान का रूप और उनके प्रति आस्था इसे विशिष्ट बनाती है। 

मुख्य मंदिर से दर्शन करने के पश्चात बाहर निकलने का अलग से रास्ता है।  ये वास्तव में एक गैलरी है जिसके दोनों तरफ बड़े बड़े हॉल नुमा कमरे बने हैं जिनमें भगवान के विभिन्न रूपों वाली तसवीरें और मूर्तियां लगी हुई हैं।  कुछ में वहां के पुजारी अपना निवास स्थान बनाये हुए हैं। इस गैलरी के आखिर में जाकर एक बहुत बड़ा खुला मंडप है जहां शायद व्यास जी अपनी कथा , अपने उपदेश भक्तों को सुनाते होंगे।  हमारे यहां व्यास जी कथा वाचकों को कहा जाता है।  मुझे यहां के पुजारी बिलकुल अलग तरह की वेशभूषा के लगे। उनके सर पर एक अलग तरह की टोपी होती है और अंगरखा शायद वृन्दावन और मथुरा के पुजारियों से ही मिलता जुलता है।  ये शायद वैषणव संप्रदाय के पुजारियों  विशिष्ट वेशभूषा है ! मैं यहां भी एकलिंगजी जैसा हाल नहीं होते देखना चाहता था इसलिए कैमरा छुपकर ले जाने की भी हिम्मत नहीं थी। 


श्रीनाथ जी मुख्य  रूप से वल्लभ संप्रदाय ( वैष्णव संप्रदाय या पुष्टि मार्गी ) के आराध्य माने जाते हैं। वल्लभाचार्य जी के सुपुत्र श्री विट्ठल नाथ जी ने नाथद्वारा में श्रीनाथ जी की पूजा शुरू करवाई और उनके चित्र भी इस मंदिर में जगह जगह विराजमान हैं। भगवान श्री कृष्णा जी की ये मूर्ति उनके बाल्यकाल के रूप की है जब उन्होंने गोवेर्धन पर्वत उठाया था। इसलिए उनका यहां प्राम्भिक नाम "देवदमन " भी था क्यूंकि उन्होंने इंद्रा का दम्भ तोडा था। लेकिन बाद में उन्हें वल्लभाचार्य जी ने गोपाला नाम दिया और इस जगह को "गोपालपुर " कहा।  उनके पुत्र श्री विट्टल नाथ जी ने भगवान का  नामकरण किया " श्रीनाथ जी " और वो ही नाम अब प्रसिद्द है। 





आइये फोटो देखते हैं :


बस की स्लीपर सीट पर हर्षित बाबू आराम फरमा रहे हैं
बस की स्लीपर सीट पर हर्षित बाबू आराम फरमा रहे हैं

कहाँ जा के कंपनी ने अपना नाम लिखा है !! लेकिन अच्छा लगा मुझे और क्लिक

कहाँ जा के कंपनी ने अपना नाम लिखा है !! लेकिन अच्छा लगा मुझे और क्लिक
 श्रीनाथ जी का द्वार
केवल पुरुष !!














 हल्दीघाटी

प्रस्तुति  : योगी सारस्वत
यात्रा दिनांक : 23 जनवरी 2015 

इस पोस्ट को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें !


नाथद्वारा पहुँचते पहुँचते एक बज गया था। श्रीनाथ जी मंदिर पहुंचे तो वो मंदिर बंद था , भगवान विश्राम कर रहे थे। अब मंदिर चार बजे पुनः खुलेगा। तब तक क्या करें ? लोगों से हल्दी घाटी के बारे में पूछा तो कुछ ने बताया कि दो घंटे लगेंगे जाने -आने में , कुछ ने कहा रास्ता बहुत खराब है , तीन घंटे तो कम से कम लगेगा। लेकिन जब एक ऑटो वाले को पूछा कि कितना पैसा लगेगा और कितना समय लगेगा ? उसने बिल्कुल स्पष्ट कर दिया , तीन सौ रूपया लगेगा और आपको पूरा घुमाकर पांच बजे तक आपको वापस यहीं मंदिर पर उतार दूंगा। भाव ताव में 260 रूपये में बात बन गयी। और बिना कोई देरी करे हमने अपना रास्ता तय करना शुरू कर दिया। सामान हमारे पास बिल्कुल नही था। अपना सारा सामन हमने उदयपुर के अपने होटल के रूम में ही रख छोड़ा था। कौन इतना सामान साथ में लेकर चले , और फिर विचार ये भी वापस लौटकर उदयपुर ही आना है। तो आइये अब श्रीनाथ जी मंदिर से लगभग 16 किलोमीटर दूर हल्दीघाटी चलते हैं।

भारत के पश्चिम में राजस्थान की अरावली पहाड़ियों में पड़ने वाली छोटी सी जगह हल्दीघाटी राजस्थान के राजसमन्द और पाली जिलों को जोड़ती है। हल्दीघाटी का ये नाम यहां पाई जाने वाली हल्दी के रंग की मिटटी के कारण , हल्दी घाटी पड़ा है। आप यहां की चट्टानें देखेंगे तो एक बारी आपको लगेगा कि ये बिलकुल उसी रंग की हैं जिस रंग की हल्दी होती है। इसी हल्दीघाटी के मैदानों में सन 1576 में मेवाड़ के राणा प्रताप और मुग़ल शासक अकबर के सेनापति मान सिंह के बाच भयंकर युद्ध हुआ था।

उदयपुर से हल्दीघाटी तक जाने के दो रास्ते हैं। एक तो नाथद्वारा से करीब छह किलोमीटर पहले उदों से निकलता है लेकिन ये रास्ता बहुत खराब बताते हैं ! खराब मतलब दो तरीके से , सड़क भी खराब है और देर होने पर लूटपाट भी संभव है । और दूसरा रास्ता है नाथद्वारा से। बस स्टैंड पर ही गाडी वालों से बात करिये , वो सही रहेगा। हालाँकि सड़क इस रास्ते पर भी बहुत बढ़िया नही है किन्तु हाईवे और ग्रामीण सड़क में कुछ तो अंतर होता ही है। ये दोनों रास्ते खमनोर पर जाकर मिल जाते हैं। हमने यही रास्ता चुना , नाथद्वारा वाला। ग्रामीण राजस्थान देखते हुए आगे बढ़ते गए ! इस रास्ते पर खमनोर से थोड़ा आगे निकालकर आपको दोनों तरफ हल्दी जैसे रंग की पहाड़ियां दिखाई देंगी और उन्हें पहाड़ियों में से हल्दी जैसे रंग की मिटटी खोदते हुए दिखाई देंगे , वो शायद इस मिटटी को मसाले बनाने वाली कंपनियों को बेचते होंगे और ये मिटटी हमारे घरों में हल्दी के रूप आती है। क्या यही सच है ? जब ये "हल्दी " की पहाड़ियां खत्म होती हैं और कुछ समतल जगह आने लगती है तब " मार्केट " बदल जाता है और अब हल्दी की जगह इत्र ले लेता है। इस क्षेत्र का आसवन विधि द्वारा तैयार किया जाने वाला इत्र बहुत प्रसिद्द है और इसका सबूत वहां रास्ते के दोनों तरफ सजी हुई दुकानें बेहतर देती हैं। इसके अलावा इसी रास्ते पर एक गाँव पड़ता है मोलेला , जहां की "मड आर्ट " विश्व प्रसिद्द है। हालाँकि मैं इस गाँव तक नही जा पाया लेकिन रोड पर लगे साइन बोर्ड का फोटो जरूर ले आया।


हल्दी घाटी पहुँचने पर मेवाड़ के प्रति श्रद्धा और वीरता का एहसास होने लगता है। वहां लड़ने वाले दोनों ही वीर , प्रताप और मान सिंह भारतीय थे , हिन्दू थे लेकिन फिर भी एक के प्रति गर्व और दूसरे के प्रति नफरत पनपने लगती है। ये होना भी चाहिए - क्यूंकि एक अपनी मातृभूमि के लिए लड़ रहा था और दूसरा मुगलों के लिए अपनी वफ़ादारी सिद्ध कर रहा था। ऐसा कहते हैं कि मेवाड़ में माताएं अपने बच्चे का नाम कभी मान सिंह नही रखती। मतलब अब भी वो रंज बाकी है ? हल्दी घाटी में राजस्थान सरकार ने बहुत सुन्दर संग्रहालय बनाया हुआ है जिसे देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। संग्रहालय के बाहर आपको ऊँट वाले , अपने ऊँटों को लेकर बैठे रहते हैं और ग्राहकों का इंतज़ार करते हैं। ऊँट पर सवारी के पैसे पूछे तो बताया 50 रुपया एक आदमी का। तभी एक और विदेश जोड़ा आया , उसने पूछा तो उसे बताया 100 रुपया। बाकायदा अंग्रेजी में कहा ऊँट वाले ने -100 रुपीज़ ओनली। मैं तो नही बैठा बच्चे भी डर से नही बैठे आखिर बस एक एक फोटो ही करवा ली 10 -10 रुपये में। अंदर आप महाराणा प्रताप और मान सिंह की लड़ाई के चित्रों , ताम्बे पर उकेरी गयी कलाकृतियों से रूबरू होते जाते हैं। फिर एक हॉल में प्रवेश करते हैं जहां आपको राणा प्रताप के पुरखों की आदमकद तसवीरें , राणा प्रताप की तलवार , उनके खंजर और अन्य हथियार रखे हुए हैं तथा तलवार से बचने के लिए पहने जाना वाला कवच भी देखने के लिए रखा है। इस हॉल के अंदर से ही एक छोटा सा दरवाज़ा और भी है जो एक पुराने जमाने के जैसे छोटे से सिनेमा हॉल में खुलता है। यहाँ 15-20 मिनट की महाराणा प्रताप के जीवन को दिखाती एक लघु फिल्म दिखाते हैं। लेकिन जब ये फिल्म खत्म होती है तो एक ऑडियो चलता है -ये लड़ाई सांप्रदायिक लड़ाई नही थी , ये लड़ाई दो धर्मों की नही थी। ये लड़ाई मातृभूमि के लिए लड़ी गयी। ऐसा बताने की वास्तव में जरुरत है क्या ?

फिल्म खत्म होने के बाद वहां का एक आदमी पीछे वाले दरवाजे से सबको अपने साथ लेकर आगे चलता है। एकदम घुप्प अँधेरा। वो लाइट ऑन करता है और सामने महाराणा प्रताप के जीवन से जुडी घटनाओं को मूर्तियों के माध्यम से दिखाने वाले दृश्य मिलते हैं। ऐसे ही वो आगे चलता जाता है और नयी नयी बातें , घटनाओं का विस्तृत वर्णन करता जाता है। हिंदी में। बाहर आकर फिर आप स्वतंत्र हो जाते हैं कहीं भी घूमने के लिए।



ये वही मौलेला गाँव है जिसकी मड आर्ट दुनियाँ भर में विख्यात है
ये हल्दी जैसे रंग की पहाड़ियां
ये हल्दी जैसे रंग की पहाड़ियां
ऐसे चित्र मेवाड़ में बहुत मिलेंगे जिनमें चेतक की मृत्यु पर महाराणा प्रताप विलाप कर रहे हैं और उनका भाई शक्ति सिंह उन्हें देख रहा है !!
​ हल्दीघाटी प्रवेश द्वार













ये कांच में थी सब चीजें , फोटो बढ़िया नही आ सके
ये कांच में थी सब चीजें , फोटो बढ़िया नही आ सके
ये कांच में थी सब चीजें , फोटो बढ़िया नही आ सके

ये महाराणा प्रताप का जीवन चित्र , फोटो बढ़िया नही आ सके



महाराणा ने बहुत दिनों तक जंगल में जीवन बिताया , उसके दृश्य
और ये मैं
इस मूर्ति में महाराणा प्रताप का घोड़ा , हाथी पर बैठे मान सिंह तक पहुँच गया था लेकिन मान सिंह बच गया और  चेतक घायल हो गया
ऐसे चित्र मेवाड़ में बहुत मिलेंगे जिनमें चेतक की मृत्यु पर महाराणा प्रताप विलाप कर रहे हैं और उनका भाई शक्ति सिंह उन्हें देख रहा है !!

पन्ना धाय का दृश्य
आगे जारी है : 

    हल्दीघाटी : चेतक समाधी

 इस पोस्ट को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें !


हल्दी घाटी के युद्ध के बाद ये क्षेत्र कभी बिल्कुल वीरान रहा होगा लेकिन वहां सरकार ने मेमोरियल बनाकर और इत्र की छोटी छोटी फैक्ट्रियां खोलकर उस जगह को एकदम बढ़िया कर दिया है। हालाँकि राजस्थान के ग्रामीण इलाकों की सी शांति और माहौल में एक मायूसी जरूर नजर आती है। नाथद्वारा की तरफ से जाते हुए ऐसा बिल्कुल भी नही लगता कि हम एक ऐतिहासिक जगह को देखने जा रहे हैं , न ज्यादा भीड़ भाड़ न वाहनों की ज्यादा आवाजाही। हाँ , खमनोर पर कुछ सन्नाटा टूटता है। और फिर थोड़ी बाद चलती हुई सी रोड मिलती है , सड़क के दोनों तरफ सजी इत्र की दुकानें रास्ते को जीवंत बनाती हैं। और जब हल्दीघाटी पहुँचते हैं तो एक अलग आभास होता है। 

हल्दीघाटी से बाहर आकर ऊँट की सवारी करी जा सकती है। एक बात ध्यान देने की है : अगर आप ने कभी गांव या गाँव की जिंदगी नहीं देखी है तो आपको यहां ग्रामीण जिंदगी के दर्शन बखूबी मिलेंगे। वहां ग्रामीण जिंदगी के विभिन्न रूपों को बेहतरीन तरीके से मूर्तियों और कलाकृतियों के सहारे समझाने , दिखाने की कोशिश करी गयी है। हल्दी घाटी से लौटकर महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का समाधी स्थल है , ये वो ही जगह है जहां चेतक ने दम तोड़ा था। हालाँकि वास्तविक नाला अब नही है लेकिन कुछ कल्पना भी आपको करनी पड़ जाती है ऐसी जगह।


आज ज्यादा कुछ नही है लिखने के लिए। हल्दी घाटी लौटकर नाथद्वारा में श्रीनाथ जी भगवान के दर्शन किये और फिर वापस उदयपुर। नाथद्वारा की कहानी आपको पहले ही बता चुका हूँ ! उदयपुर इसलिए , क्योंकि हमने अपना सब सामन वहीँ के होटल में रख छोड़ा था। अब कल चित्तौड़गढ़ के लिए निकलेंगे।

आइये फोटो देखते चलें :


भारत का ग्रामीण परिवेश
इसे रहट कहते हैं ! पहले इसी से खेतों की सिचाईं होती थी
जय शिव शंकर
ये गौधन
काम करते करते टोपी उतर गयी
क्या अब भी मुफ्त का माल मिलता है ?
राधे राधे
इसे कोल्हू या क्रशर कहते हैं

ये सच का ही कोल्हू है
ऊंट की सवारी हो जाए

ऊंट की सवारी हो जाए
हल्दी घाटी के बाहर
हल्दी घाटी के बाहर

फैमिली आपको मानसिक ताकत देती है

अब असली वाले ऊंट की सवारी हो जाए वो तो मूर्ति था पहले वाला
अब असली वाले ऊंट की सवारी हो जाए वो तो मूर्ति था पहले वाला
महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक की समाधि


महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का समाधि स्थल
ये भाईसाब मिटटी खोद रहे हैं हल्दी में मिलाने के लिए ! मेरे हाथ में कैमरा देखते ही मुंह फेर लिया था बन्दे ने लेकिन डर नाम की चीज नही


आपने ब्लोअर पर बनी चाय पी  है ? और  कब से नही पी ! खमनोर में मिल जायेगी

ऐसे स्वागत द्वार आपको राजस्थान में बहुत मिलेंगे

हमारे यहां इसे नागफनी कहते हैं ! यहां ये मेंडबन्दी  का काम कर रही है
हमारे यहां इसे नागफनी कहते हैं ! यहां ये मेंडबन्दी  का काम कर रही है


चेतक स्मारक

नकली बैलों के साथ हर्षित , बड़ा बेटा ! असली से तो बहुत डर लगता है !! 

 बाय बाय उदयपुर

 
इस पोस्ट को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें !
हल्दीघाटी और नाथद्वारा , उदयपुर से एक दिन में आना जाना आराम से हो जाता है। इस बीच आप कुछ समय एकलिंगजी के दर्शन में भी व्यतीत कर सकते हैं। हमें क्योंकि आगे चित्तौड़गढ़ की यात्रा करनी थी इसलिए नाथद्वारा से वापस उदयपुर लौट आये ! बस स्टैंड पर उतरने के बाद सीधे "शानदार " खाना खज़ाना पर गुजराती थाली का मजा लिया और सीधे होटल। नींद कब आ गयी कुछ पता नही लेकिन पता नहीं छोटे बेटे को कैसे एकदम करीब 2 बजे उल्टी हो गयी। ओह ! 2 घंटे परेशान रहा , हालाँकि दवाइयाँ हमारे साथ थीं लेकिन जब तक वो दोबारा सो नही गया तब तक बहुत ज्यादा तनाव बना रहा। भगवान की कृपा से बहुत ज्यादा परेशान न हुआ और सुबह आठ बजे एकदम फ्रेश लग रहा था लेकिन इस चक्कर में हमारा कार्यक्रम बदल गया। पहले हमें बहुत सुबह उदयपुर से बस से चित्तौड़गढ़ जाना था लेकिन अब पैसेंजर ट्रेन से निकलेंगे।

तो आइये अब उदयपुर को बाय बाय कहते हैं और चित्तौड़गढ़ के लिए निकलते हैं। लिखना नहीं है आज की यात्रा में कुछ भी , बस फोटो देखते जाइए और यात्रा का आनंद लीजिये ! बाय बाय उदयपुर :


उदयपुर रेलवे स्टेशन से दूरियां बताता साइन बोर्ड




ये वाली तस्वीर आपको हर जगह दिखेगी ! रेलवे स्टॅटिन से लेकर हल्दीघाटी तक ! ये महाराणा प्रताप और मानसिंह की लड़ाई का एक दृश्य है जिसमें मान सिंह हाथी पर है और महाराणा चेतक घोड़े पर।  महाराणा ने चेतक को ऐड लगाकर बिलकुल मान सिंह के पास पहुँच दिया था। 










जहां जगह मिली , वहीँ सो गया ! स्टेशन की छत है है बाबू


भारतीय रेलवे की शान "पैलेस ओन व्हील्स " ! जब हम स्टेशन पहुंचे ये तभी वहां पहुंची।  क्या आवभगत होती है इसके यात्रियों की।  माला पहनाई जाती है और तिलक लगाया जाता है ! हमारी तो औकात नही इसमें बैठ पाने की तो फोटो ही खींच लेते हैं !!


इसमें हर कोच को अलग अलग नाम दिया जाता है ! डूंगरपुर सैलून , जोधपुर सैलून आदि।  ये सब राजस्थान की रियासतों के नाम रहे हैं









देबारी स्टेशन के ही पास ये महल जैसा कुछ दिखा तो क्लिक














भूपाल मेवाड़ में एक राजा हुए हैं शायद उन्हीं के नाम पर होगा






आ गया चित्तौड़गढ़ लेकिन कैमरे की बैटरी ख़त्म ! इसलिए उधार लिया है ये फोटो 

 साँवरिया जी मंदिर :चित्तौड़गढ़


प्रस्तुति : योगी सारस्वत
दिनांक : 24 जनवरी 2015


उदयपुर की बेहतरीन यात्रा के बाद हमारा अगला इरादा चित्तौड़गढ़ के फोर्ट को देखना था , हालाँकि मैं यहां कई बार जा चुका हूँ किन्तु बच्चों के साथ कभी नही गया। चित्तौड़गढ़ में मेरी बड़ी बहन रहती हैं इसलिए चक्कर लगते ही रहे हैं लेकिन इस बार बात ही कुछ थी। 

उदयपुर से चित्तौड़गढ़ तक आने वाली पैसेंजर ट्रेन अपने निर्धारित समय पर चित्तौड़गढ़ पहुँच गयी थी , वहां से ऑटो लेकर सीधे दीदी के घर। उन्होंने अभी नई गाडी खरीदी है 15 दिन पहले ही और वो अभी इसे कहीं दूर लेकर भी नही निकले। जीजा जी ने प्रोग्राम में चेंज कर दिया। बोले सुबह पहले सांवरिया जी के मंदिर चलेंगे , फिर हम तुम्हें फोर्ट छोड़ देंगे। ये भी ठीक है।

चित्तौड़गढ़ से करीब 32 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सांवरिया जी का मंदिर राजस्थान में बहुत प्रसिद्द है। चार लेन का हाईवे नंबर 76 एकदम मक्खन जैसा बना हुआ है हालाँकि भदसौड़ा चौराहे पर नया आदमी भटक जाता है , वहां ऐसे गोल गोल से चक्कर बने हुए हैं कि आदमी कंफ्यूज हो जाता है।

मुख्य मंदिर रोड से करीब आठ किलोमीटर अंदर है और प्राकट्य स्थल बिल्कुल रोड के किनारे ही है। प्राकट्य स्थल के बराबर में से ही एक ऊबड़ खाबड़ सी रोड अंदर की तरफ जाती है। अभी काम चल रहा था उधर , ये जनवरी की बात है , अब शायद सही हो गयी हो। मुख्य मंदिर का प्रांगण बहुत बड़ा है और जिस दिन इस मंदिर का निर्माण पूरा होगा , एक बेहतरीन और शानदार मंदिर बनेगा। सांवरिया जी राजस्थानियों और गुजरातियों के घरों में बहुत ऊंचा स्थान रखते हैं ! साँवरिया जी मतलब कृष्णा जी ! ये इस बात से समझा जा सकता है , वहां इस तरह के वचन लिखे रहते हैं :


                                                  सेठों में सेठ सांवरिया सेठ
                                                  बाकी सब डुप्लीकेट !!


आइये फोटो देखते हैं और सांवरिया जी का ध्यान करते हैं !! 





​
​सांवरिया जी प्राकट्य स्थल





​
​सांवरिया जी प्राकट्य स्थल







​
​सांवरिया जी प्राकट्य स्थल


​
​सांवरिया जी प्राकट्य स्थल

​मुख्य मंदिर
​मुख्य मंदिर

​मुख्य मंदिर
​मुख्य मंदिर


तुर्रेदार मूंछें
हम साथ साथ हैं

















​
                              

 चित्तौड़गढ़ किला


इस ब्लॉग को शुरू से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करिये !

सांवरिया मंदिर के दर्शन करने के पश्चात तय हुआ था कि मैं अकेला चित्तौड़गढ़ किला देखने जाऊँगा और बाकी सब लोग चन्देरिया स्थित घर चले जाएंगे। खाना मैंने सबके साथ सांवरिया जी पर ही खा लिया था तो अब भूख की चिंता नही रही थी। अब बस चिरपरिचित किले को जिसे मैंने कम से कम 10 बार पहले भी देखा है , फिर से देखना था ! पहले मैं ब्लॉग नही लिखता था इसलिए ज्यादा फोटो भी नही खींचता था और जो थोड़े बहुत फोटो खींचता भी था वो पुराने कैमरे के हैं , उनका नेगेटिव बनवाओ फिर कॉपी निकलवाओ ! कितना झंझट वाला काम था और अब डिजिटल कैमरे ने बहुत आसान कर दिया सब कुछ ! थोड़ा पैसा तो लगता है लेकिन संतुष्टि उस पैसे से ज्यादा है !

मुझे चित्तौड़गढ़ में कचहरी चौराहे पर उतार दिया। वहां से आपको फोर्ट के लिए टेम्पो आसानी से मिल जाते हैं , आप चाहें तो पूरा टेम्पो हायर कर लें या फिर शेयरिंग में चले जाएँ। मर्जी आपकी है। मुझे क्या जरुरत थी हायर करने की ? 20-25 रूपये में शेयरिंग में जाऊँगा , क्यों बेकार 300 रूपये खर्च किये जाएँ ? आइये चित्तौड़गढ़ के विश्व प्रसिद्द और अब विश्व धरोहरों में शामिल "विजय स्तम्भ " की तरफ चलते हैं।

चित्तौड़गढ़ का किला क्षेत्रफल के हिसाब से भारत का सबसे बड़ा किला माना जाता है। लगभग 280 हेक्टेयर में फैला ये किला 7 वीं शताब्दी में मौर्यंस ने बनवाया था। मेवाड़ की लगभग 834 सालों तक राजधानी रहा चित्तौड़गढ़ , पहले चित्रांगदा मोरी कहलाता था जो कालांतर में चित्तौड़गढ़ हो गया। इस किले ने तीन तीन बार आक्रमण झेले हैं और ये आक्रमण केवल लूट और सत्ता तक सीमित नही रहे बल्कि इन्होने "जौहर " के रूप में कई जिंदगियों को भी काल के गाल में पहुँचाया। पहला आक्रमण 1303 में अलाउद्दीन ख़िलजी ने किया तब राणा रतन सिंह की रानी पद्मिनी ने अपनी और साथी महिलाओं के साथ जौहर किया। ये मेवाड़ के इतिहास में पहला जौहर कहा जाता है। इसके बाद 1535 में गुजरात के शासक बहादुर शाह ने इस पर आक्रमण किया जिसके परिणामस्वरूप रानी कर्णावती को जौहर करना पड़ा। ये इतिहास में दर्ज़ आखिरी जौहर माना जाता है। लेकिन इस जौहर प्रथा ने कुल मिलाकर करीब 13000 महिलाओं और बच्चों की जिंदगी लील ली थी। और फिर 1567 ईस्वी में मुग़ल शासक अकबर ने इस पर आक्रमण कर दिया। इसके करीब 48 साल बाद जहाँगीर ने राणा अमर सिंह को ये किला वापस किया।

बेडच नदी के बाएं किनारे पर स्थित , लगभग 700 एकड़ क्षेत्रफल में फैले इस किले को सुरक्षित बनाने के लिए इसके चारों तरफ 4. 5 किलोमीटर लम्बी दीवार इस तरह से बनवाई गयी थी कि दुश्मन अंदर तक न घुस सके। इसके मुख्य प्रवेश द्वार से लेकर पहाड़ी पर स्थित महल तक पहुँचने के लिए 7 द्वार बनवाए गए थे जिन्हें राणा कुम्भा ने बनवाया। इन द्वारों पर हथियार बंद सैनिक हमेशा तैनात रहते थे। इन सात द्वारों के नाम इस तरह से हैं - पैदल पोल , भैरों पोल , हनुमान पोल , गणेश पोल , जोरला पोल , लक्ष्मण पोल और आखिर में राम पोल।


आइये एक एक करके सभी सात पोल पार करते हैं और ऊपर पहुँचते हैं।


पैदल पोल
भैरों पोल
हनुमान पोल
गणेश पोल
जोरला पोल

लक्ष्मण पोल
राम पोल











   पदमिनी​ महल : चित्तौड़गढ़


चित्तौड़गढ़ के इस यात्रा वृतांत को शुरू से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें और अगर आप उदयपुर की यात्रा पढ़ना चाहें तो कृपया यहां क्लिक करिये !


सात द्वार पार करके मैं सीधा कालिका माई मंदिर चला गया। वहाँ नारियल चढ़ाना था। 2007 में कुछ माँगा था और उसका प्रतिफल मिलने के बाद अब नारियल चढाने का नम्बर था। चित्तौड़गढ़ के किले को बनवाते समय वहां के राजा ने इसके चारों तरफ बहुत मोटी और ऊँची दीवार बनवाई थी जिससे दुश्मन पास तक न आ सके और इसीलिए सात सात द्वार बनवाए गए थे और उनपर पहरेदार बिठा दिए गए थे लेकिन जो होना होता है होता ही है , अलाउद्दीन ख़िलजी ने चालाकी से इस पर अधिकार जमा लिया था 1303 में ! कोई कुछ नही कर पाया , न दरवाजे , न द्वारपाल , न इतनी ऊँची और मजबूत दीवार। हालाँकि ये व्यक्तिगत बात है लेकिन लिखना चाहूंगा। आदमी जब परेशान होता है तो वो हर उपाय ढूंढता है , भगवान को प्रसन्न करने की कोशिश करता है। इसी राह में 2007 में मैंने पत्नी के साथ कई मंदिरों की यात्रा करी और ये भी वचन लिया कि कार्य संपादित होने के बाद फिर से जरूर आएंगे। इसी क्रम में गोवेर्धन मंदिर मथुरा , कालिका मंदिर चित्तौड़गढ़ , सांवरिया जी चित्तौड़गढ़ , नीलकंठ ऋषिकेश , बद्रीनाथ और केदारनाथ उत्तराखंड , हेमकुंड की यात्राएं करनी हैं ! वैष्णो देवी की यात्रा कर चुके हैं।

चित्तौड़गढ़ की कहानी आगे बढ़ाते हुए : अलाउद्दीन ख़िलजी ने 1303 में इस किले पर आक्रमण कर दिया था और इसे जीत भी लिया था। असल में ख़िलजी का मकसद किला जीतने से ज्यादा रानी पद्मिनी को जीतना था और उन्हें अपने हरम का हिस्सा बनाना था। राणा रतन सिंह को जब अलाउद्दीन की इस भावना का पता चला तो उन्होंने भलमनसाहत ( या शायद युद्ध से डर के ) की वजह से अलाउद्दीन को दर्पण के द्वारा रानी पद्मिनी के दर्शन कराने के लिए तैयार कर लिया लेकिन हरामखोर अलाउद्दीन की नियत बिगड़ गयी और वो रानी पद्मिनी को दर्पण में देखकर उन्हें पाने के लिए लालायित हो उठा। और जब रना रतन सिंह शिष्टाचार वश अलाउद्दीन को दरवाजे तक विदा करने आये तो उसने राणा को बंदी बना लिया और रानी तक ये पैगाम भिजवाया कि राणा को तभी मुक्त किया जाएगा जब रानी पद्मिनी उसके हरम का हिस्सा बनने को तैयार हो जाएंगी। रानी पद्मिनी तैयार भी हो गयी लेकिन इस शर्त पर कि उन्हें बिलकुल छुपा के शाही तौर तरीके से परिवारीजनों के साथ ले जाया जाए। रानी पद्मिनी ने एक चाल चल दी और छद्म वेश में अपने 700 सैनिकों को अलाउद्दीन के पास भेज दिया जो राणा को मुक्त करा लाये। लेकिन अलाउद्दीन उनके पीछे लग गया और किले के मुख्य द्वार पर भीषण युद्ध हुआ जिसमें राणा रतन सिंह की मौत हो गयी जिसके परिणाम स्वरुप रानी पद्मिनी को अपनी सहेलियों और दासियों के साथ जौहर करने को मजबूर होना पड़ा। 


जैसा मृदुला द्विवेदी कहती हैं , ये वास्तव में बहुत बड़ा किला रहा होगा कभी। लगभग 13 किलोमीटर की परिधि में फैले इस किले की एक एक चीज को गौर से देख पाना इतना आसान भी नही है। आप पहले पोल से ही कैमरा निकाल लें तो आखिर तक आप इतना थक जाएंगे कि मन करेगा अब बस।  कालिका माता के मंदिर के सामने ही कई सारी दुकानें सजी रहती हैं प्रसाद की , चुनरी की और घास की भी।  जी घास भी वहां बेचीं जाती है।  असल में वहां गायें बहुत हैं और अगर आप गाय को दान करना चाहें तो घास खिलाकर दान कर सकते हैं।  गाय भी खुश और आप भी खुश।  पांच रुपये की एक गड्डी और 10 रूपये की तीन गड्डी ।  ये दान सस्ता भी है और अच्छा भी।  कालिका माँ के दर्शन के पश्चात वहीँ सामने से एक रास्ता जाता है , मालुम नही कहाँ  ? लेकिन मुझे एक मंदिर दिखाई दिया सामने तो मैं उधर चल दिया।  मुश्किल से एक दो एक दो आदमी ही चल रहा होगा उधर।  एकदम  सुनसान सा रास्ता।  वो एक छोटा सा मंदिर था लेकिन कोई दिखाई नही दिया वहां , किसी महात्मा के कपडे सूख रहे थे।  शायद किले के मंदिर के किसी पुजारी का निवास स्थान  रहा होगा वो। 

वहां से लौटकर रानी पद्मिनी के महल की तरफ चल दिया। महल के चारों तरफ पानी भरा होता है। अंदर जाने की मनाही है लेकिन आप दूर से कितने भी फोटो खींच लें कोई रोकटोक नहीं। हाँ , महल के पास एक पार्क है। कहते हैं अलाउद्दीन ख़िलजी ने यहीं से रानी को सीसे में देखा था और उनकी सुंदरता पर मर मिटा था। इस पार्क का 10 रूपये का टिकेट लगता है। मुख्य कार्यालय से ही मिल जाता है , नही ले पाये तब भी कोई परेशानी नही। वहां टिकट चेक करने वाला आपसे 10 रुपया लेगा और अपनी पॉकेट में रख लेगा। और आपको अंदर जाने देगा ! 


आइये फोटो देखते हैं :​



कालिका माई मंदिर
कालिका माई मंदिर

कालिका माई मंदिर











​
​ये वो अट्टालिका जिस पर चढ़कर आप सीधे  पदमिनी महल को देख सकते हैं ​
​
​तीन मंजिल का पदमिनी महल , जिसके ताम्बे के दरवाज़ों को अकबर उखड़वाकर आगरा ले गया था
​
​​इसके चारों तरफ पानी रहता है ! इसी की नकल करके उदयपुर का जल महल बनाया गया था



कोई खण्डहर
कोई खण्डहर
























 http://yogi-saraswat.blogspot.com/2015/01/blog-post_30.html

 लेक सिटी उदयपुर : मोती मगरी

लेक सिटी उदयपुर : मोती मगरी

दिनांक : 22 जनवरी 2015

उत्तराखंड और हिमाचल को जैसे हम देव भूमि कहते हैं उसी तरह राजस्थान को वीरों की भूमि कहा जाता है ! उत्तर प्रदेश को क्या कहा जाता है ? मुझे नहीं मालुम !! इसी राजस्थान का मेवाड़ इलाका विश्व भर में अपने वीरों और उनकी वीरताओं की कहानियों से भरा हुआ है ! मेवाड़ का मूल नाम मेधपाट हुआ करता था जो कालांतर में मेवाड़ हो गया और इस राज्य के देवता भगवन शिव हुआ करते थे जिन्हें एकलिंगनाथ बोला जाता था , इसीलिए कभी कभी भगवन शिव को मेवाड़ में मेधपाटेश्वर भी कहा जाता है ! वर्तमान में मेवाड़ का क्षेत्रफल यूँ राजस्थान से लेकर गुजरात और इधर हरियाणा तक फैला है लेकिन मुख्य रूप से राजस्थान के चित्तौड़गढ़ , भीलवाड़ा , राजसमन्द और उदयपुर मिलाकर मेवाड़ बनाते हैं ! इसी मेवाड़ की धरती को नमन करने का मन वर्षों से दिल में था जो अब जाकर पूरा हुआ ! नए साल के अवसर पर जिस कॉलेज में मैं काम करता हूँ उसने अपने उन कर्मचारियों के लिए जिन्हें पांच साल या ज्यादा हो गए हैं , एक उपहार दिया जिसमें पांच दिन की छुट्टी और परिवार के साथ कहीं घूमने फिरने का खर्च शामिल था ! मुझे भी यहां सात साल हो गए हैं, मैं भी इसका हकदार था और मैंने बिलकुल भी देर नहीं लगाईं अपना प्रोग्राम बनाने में ! 21 जनवरी के लिए हजरत निजामुद्दीन स्टेशन , दिल्ली से उदयपुर तक मेवाड़ एक्सप्रेस ( 12963 ) में आरक्षण कराया और 26 जनवरी को उसी ट्रैन से वापसी का भी !

राजस्थान की तरफ जाने वाली ट्रेनों की एक विशेषता है कि आपको यात्रा वाले दिन से 3-4 दिन पहले तक भी कन्फर्म टिकेट मिल जाएगा जबकि बिहार , बंगाल की तरफ जाने वाली ट्रेन देखें तो 3-4 महीने पहले भी शायद कन्फर्म टिकेट न मिले ! तो 21 जनवरी को तय समय शाम को 7 :00 बजे गाडी रवाना हो गयी ! 2-3 बार पहले भी इस ट्रेन से चंदेरिया तक जाने का अवसर प्राप्त हुआ है लेकिन इस बार अंतिम स्टेशन उदयपुर तक जाना था ! मथुरा , भरतपुर निकलते निकलते नींद आ गयी और आँख खुली अपने पुराने जाने पहिचाने स्टेशन चंदेरिया पर ! चित्तौड़गढ़ से बिलकुल पहले का स्टेशन है चंदेरिया ! यहां बिरला के दो बड़े सीमेंट कारखाने BCW ( बिरला सीमेंट वर्क्स ) और CCW ( चेतक सीमेंट वर्क्स) हैं जिनमें से एक में मेरे बहनोई कार्यरत हैं ! उस वक्त सुबह के लगभग चार बजे होंगे , बारिश हो रही थी और जनवरी के महीने में अगर बारिश हो जाए तो सर्दी का क्या हाल होता है , आप जानते हैं ! जल्दी से फिर वापस आकर कम्बल में घुस गया और उदयपुर के साफ़ सुथरे स्टेशन पर ही जाकर अपने डिब्बे में से बाहर निकला ! राजस्थान में भी गजब की ठण्ड होती है यार ! स्टेशन से ऑटो कर सीधे होटल और फिर उसी ऑटो वाले को कह दिया कि भाई एक घंटे बाद फिर से आ जाना , उदयपुर के दर्शनीय स्थल दिखाने के लिए ! कुल 12 जगह दिखाने की बात थी और किराया तय हुआ 600 रूपया ! सुबह 9 बजे से शाम लगभग 7 बजे तक , ज्यादा नहीं था ! सबसे पहले उसने मोती मगरी ले जाने का तय किया ! क्यूंकि सुबह से बस एक कप चाय ही पी थी , रास्ते में उससे कहीं नाश्ता कराने के लिए कहा तो उसने नगर निगम के सामने अपना औरो रोक दिया , बोला सर - यहां बढ़िया नाश्ता मिल जाएगा आपको ! चार कचौड़ी और दो मिर्ची बड़ा ! मिर्ची बड़ा , एक फुट लम्बी हरी मिर्च के ऊपर बेसन लपेट कर बनाते हैं ! लेकिन मिर्ची बस नाम की , बिलकुल भी तीखापन नही ! इसीलिए शायद उसने उस पैकेट में आठ दस ऐसी ही मिर्च और भी रख दी होंगी ! कचर कचर गाजर की तरह खाते जाओ ! इसका नाम मिर्च न होकर हरी गाजर होना चाहिए था ! आइये मोती मगरी की सैर करते हैं और इसी रास्ते पर पड़ने वाले उदयपुर नगर निगम के अरावली पार्क को भी देखते चलते हैं :









दोनों बेटे : हर्षित और पारितोष


महाराणा प्रताप की कांस्य प्रतिमा


महाराणा प्रताप की कांस्य प्रतिमा

महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक की अंतिम सांस का मार्मिक दृश्य




महाराणा प्रताप की कांस्य प्रतिमा




महाराणा प्रताप की कांस्य प्रतिमा

मोती मगरी से उदयपुर का विहंगम दृश्य


हल्दीघाटी के युद्ध में राणा प्रताप के सेनापति रहे हकीम खां सूर की प्रतिमा









मोती मगरी के सामने भामाशाह की प्रतिमा

मोती मगरी के सामने भामाशाह की प्रतिमा

मोती मगरी से फतेहसागर झील का एक दृश्य



                                                   

                                                                                           यात्रा जारी है , पढ़ते रहिये :
 


 



आगे की पोस्ट : 

 फतह सागर लेक

                                    सहेलियों की बाड़ी और सुखाड़िया सर्कल 

        उदयपुर : सिटी पैलेस 

              जगदीश मंदिर : उदयपुर 

                                              उदयपुर रोप वे और दीनदयाल उपाध्याय पार्क 

          उदयपुर से एकलिंगजी 

                                     एकलिंगजी से श्रीनाथ जी मंदिर नाथद्वारा 

हल्दीघाटी

                हल्दीघाटी : चेतक समाधी 

बाय बाय उदयपुर 

                  साँवरिया जी मंदिर :चित्तौड़गढ़ 

चित्तौड़गढ़ किला

पदमिनी​ महल : चित्तौड़गढ़ 

                                            जयमल फत्ता महल और विजय स्तम्भ : चित्तौड़गढ़ 

         गौमुख मंदिर : चित्तौड़गढ़

   मीरा मंदिर : चित्तौड़गढ़

   कीर्ति स्तम्भ : चित्तौड़गढ़ 

                                 नगीना बाजार और रतन सिंह पैलेस : चित्तौड़गढ़

 

    











http://www.rajasthanstudy.co.in/2014/03/blog-post_2770.html

राजस्थान के वैभवशाली मूर्तिशिल्प से संबंधित उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य-

1.     राजस्थान में मूर्तिशिल्प का इतिहास आज से लगभग 4500 वर्ष पुराना है।

2.     कालीबंगा (हनुमानगढ़) से प्राप्त हड़़प्पाकालीन सांस्कृतिक पुरासामग्री में मिट्टी तथा धातु की लघु मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।

3.      कालीबंगा से प्राप्त ताम्र-निर्मित लघु आकार का वृषभ राजस्थान में प्राप्त धातु प्रतिमा का प्राचीनतम उदाहरण है। इसका आकार 7 से.मी. लंबा तथा 4 से.मी. चौड़ा है। इसका काल ईसा पूर्व 17 सदी माना गया है।

4.     कालान्तर में दूसरी शताब्दी ई. पू. की कई शुंगकालीन मूर्तियाँ नगर (टौंक) एवं रैढ़ (टौंक) से मिली हैं, जो लाल मिट्टी की पकाई हुई हैं।

5.     ब्रजमण्डल के सांस्कृतिक प्रभाव क्षेत्र में होने के कारण प्रारम्भिक मूर्तिकला के उद्भव व विकास में पूर्वी राजस्थान (भरतपुर क्षेत्र) ने विशिष्ट भूमिका निभायी। इस युग की यक्ष-यक्षी की मूर्तियाँ भरतपुर संग्रहालय में सुरक्षित हैं। नोह (भरतपुर) से प्राप्त इस युग की यक्ष-यक्षी की मूर्तियाँ उल्लेखनीय है।

6.     नोह में जाखबाबा की विशालकाय प्रतिमा शुंगकालीन कला का प्रतिनिधित्व करती है तथा यह चतुर्मुख प्रतिमा राजस्थान की भारतीय मूर्ति विज्ञान को अनुपम देन है।

7.     प्राचीन काल के शैव मूर्तिशिल्प में भी राजस्थान की अनुपम देन है। इस दृष्टि से भरतपुर क्षेत्र की विशेष भूमिका रही है।

8.     भरतपुर क्षेत्र के चौमा, भंडपुरा, गामड़ी आदि स्थानों से शुंग-कुषाणकालीन शिवलिंग मिले हैं।

9.     रंगमहल (हनुमानगढ़) से प्राप्त एकमुखी शिवलिंग की बहुचर्चित मृण्मूर्ति में शिवलिंग के मुख भाग में जटामुकुटधारी शिव को मानवाकृति प्रदान की गई हैं। यह मूर्ति वर्तमान में बीकानेर संग्रहालय में प्रदर्शित है।

10. बैराठ (जयपुर) प्राचीनकाल में राजस्थान में बौद्ध धर्म का सांस्कृतिक केन्द्र रहा है। यहाँ से प्राप्त मौर्यकालीन बौद्ध अवशेषों से बौद्ध मंदिर, मठ आदि के होने के प्रमाण मिले हैं।

11.  भरतपुर क्षेत्र से अनेक रोचक कुषाणकालीन (प्रथम शताब्दी ई0 के आस-पास) बौद्ध मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। यहीं से कुछ बोधिसत्व मूर्तियाँ भी मिली हैं।

12.  बोधिसत्व महात्मा बुद्ध के जीवन की वह अवस्था है, जब वे बुद्धत्व प्राप्त करने के मार्ग में अग्रसर हो रहे थे।

13.  बुद्ध की प्रतिमा सदैव ही करूणा, प्रेम और सौहार्द की प्रतीक मानी गई हैं।

14.  भरतपुर संग्रहालय में भगवान बुद्ध का कपर्द रूप में मंडित केश वाला बुद्ध-शीर्ष भरतपुर संग्रहालय में उपलब्ध है, जो कुषाणकालीन कला का उल्लेखनीय उदाहरण है। (महात्मा बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् केश तक मुंडित करा लिए और केवल बालों की एक लट सिर पर रहने दी, इस आशय की मूर्ति को कपर्द की संज्ञा मिली)

15.  राजस्थान में गुप्तकाल से पूर्व मूर्तिकला का विकास हो चुका था। परन्तु गुप्तकाल में लगभग सम्पूर्ण भारत में मूर्तिकला का जो विकसित रूप देखने को मिलता है, वैसा इससे पहले देखने को नहीं मिला है।

16.  गुप्तकाल की मूर्तियों में मौलिकता है। इस युग की देव मूर्तियाँ गान्धार कला से मुक्त हैं और उन पर आध्यात्मिक एवं अलौकिक भावों की अभिव्यक्ति है।

17.  गुप्तकाल की मूर्तियों की मुखाकृति सौम्य है, भाव-भंगिमा में जीवन्तता है, केश रचना में विविधता है तथा मूर्तियों के पीछे कलात्मक प्रभामण्डल दर्शाया गया है।

18.  देव परिवार का आशातीत रूप से विस्तार गुप्तयुग में देखने को मिलता है।

19.  यद्यपि राजस्थान सीधे रूप से गुप्त साम्राज्य का अंग नहीं था, परन्तु कला के क्षेत्र में हो रहे मौलिक परिवर्तनों तथा प्रयोगों का यहाँ प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था।

20.  राजस्थान में गुप्तकाल के युग के बचे हुए मन्दिरों में हाड़ौती क्षेत्र का मुकन्दरा तथा चारचौमा का शिव मन्दिर उल्लेखनीय है।

21.  इसके अतिरिक्त नगरी (चित्तौड़), गंगधार (झालावाड़), मंडोर (जोधपुर) में भव्य देवालय थे, जिनकी मूर्तियाँ गुप्तकाल के अतीत के वैभव को रेखांकित करती हैं।

22.  इटालियन विद्वान टेसीटोरी ने बीकानेर के इर्द-गिर्द गुप्तकालीन मृण्मूर्तियों की अमूल्य धरोहर की खोज की, वे प्रारम्भिक गुप्तकालीन मूर्तिकला की साक्ष्य हैं।

23.  वर्तमान में ये बीकानेर संग्रहालय की धरोहर हैं। ये मृण्मूर्तियाँ पौराणिक देवी-देवताओं के साथ ही, जनजीवन की अनेक झांकियाँ प्रस्तुत करती हैं।

24.  गुप्तकाल की शैव धर्म से सम्बन्धित राजस्थान की शैव मूर्तियाँ भी अत्यंत रोचक हैं।

25.  रंगमहल से प्राप्त गुप्तकाल की एकमुखी शिवलिंग तथा उमा-महेश्वर की मृण्मूर्तियाँ विशेषतः उल्लेखनीय हैं। लिंग के मुख भाग में त्रिनेत्र एवं जटामुकुटधारी शिव की आकृति प्रदर्शित कर कुशल शिल्पकार ने लिंग तथा पुरुष विग्रह का एक साथ ही सुन्दर समावेश किया है।

26.  प्रस्तर निर्मित अनेक महत्वपूर्ण गुप्तकालीन मूर्तियाँ राजस्थान से प्राप्त हुई हैं। ये सभी विष्णु की हैं तथा विशालकाय हैं।

27.  रूपावास (भरतपुर) की चक्रधर द्विभुजी विष्णु तथा सर्पफणा बलराम की विशालकाय प्रतिमाएँ गुप्तकाल की प्रस्तर निर्मित कला की श्रेष्ठताओं से युक्त है।

28.  इसके अतिरिक्त भीनमाल (जालौर), हेमावास (पाली) से प्राप्त गुप्तकालीन विष्णु प्रतिमाएँ दर्शनीय हैं।

29.  राजस्थान में गुप्तकाल से पूर्व की जैन प्रतिमाएँ नहीं मिली हैं।

30.  गुप्तकाल की दृष्टि से भरतपुर संग्रहालय में प्रदर्शित तथा जमीना से प्राप्त तीर्थंकर आदिनाथ एवं नेमिनाथ की मूर्तियाँ विशेष महत्व की हैं। इन पर गुप्तकालीन कला परम्परा की स्पष्ट छाप है।

31.  गुप्तोत्तर एवं पूर्व मध्यकाल में राजस्थान की मूर्तिकला ने परिपक्वता प्राप्त कर ली थी। देवी-देवताओं आदि की मूर्तियों का आधार गुप्तकालीन माधुर्य तथा कोमलता तो बनी रहीं, परन्तु उनमें शक्ति, शौर्य और भावुकता का सम्पुट जोड़ा गया।

32.  गुप्तोत्तर एवं पूर्व मध्यकाल में देवी-देवताओं में विश्वास बढ़ने से उनका कई रूपों में अंकन किया गया। राजस्थान की इस युग की मूर्तियों में अलंकरण की प्रधानता, आकृतियों की बहुलता, देवरूपों की विविधता आदि देखने को मिलती हैं।

33.  गुप्तोत्तर काल में कूसमा (सिरोही) तथा झालरापाटन (झालावाड़) में चन्द्रभागा  नदी के तट पर शिव मन्दिर निर्मित हुए, जो आज भी विद्यमान है।

34.  चन्द्रभागा का शीतलेश्वर महादेव का मन्दिर राजस्थान का प्राचीनतम तिथियुक्त (689 ई.) मंदिर है।

35.  गुप्तोत्तर युग की मेवाड़ (उदयपुर) तथा वागड़ (डूंगरपुर-बाँसवाड़ा) में अनेक शिव मूर्तियाँ उपलब्ध हैं। ये मूर्तियाँ प्रायः पत्थर की हैं। देव मूर्तियाँ अलंकृत प्रभामण्डल और चौकी सहित हैं। डूँगरपुर संग्रहालय में इनका समृद्ध संग्रह हैं।

36.  इस क्षेत्र के तनेसर से प्राप्त मूर्तियाँ राष्ट्रीय संग्रहालय (नई दिल्ली) तथा अमेरिका के संग्रहालयों तक में पहुँच चुकी हैं।

37.  पूर्व मध्यकाल (8वीं से 13वीं शताब्दी) में मूर्तिकला अपने विकास की क्रमिक यात्रा करते हुए चरमोत्कर्ष को प्राप्त हुई। 

38.  पूर्व मध्यकाल में पूरे राजपूताना में मन्दिरों का जाल बिछा। राजपूताना में आज भी इस युग की कीर्ति का बखान करने वाले अनेक मन्दिर इसके प्रमाण हैं।

39.  पूर्व मध्यकाल की विरासत में मिली कला परम्पराओं ने आवश्यकतानुसार परिवर्तन एवं विकास ही नहीं किया, वरन् देवी-देवताओं के विभिन्न स्वरूपों की शास्त्रानुसार परिकल्पना कर उन्हें मूर्तियों के माध्यम से अभिव्यक्ति प्रदान की।

40.  पूर्व मध्यकाल के मंदिर के बाह्य तथा आंतरिक सम्भाग देवमूर्तियों से ही नहीं, वरन् पौराणिक आख्यानों, सुर-सुन्दरियों, प्रणयलीन मूर्तियों तथा जन-जीवन की झांकी से परिपूर्ण हैं।

41.  कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि पूर्व मध्यकाल की मूर्तियाँ पूर्ववर्ती प्रतिमाओं की अनुकृति मात्र नहीं हैं, वरन् अपने युग की धार्मिक चेतना एवं भाव-भूमि की वास्तविक प्रतिबिम्ब है।

42.  पूर्व मध्यकाल की धातु मूर्तियों ने मूर्तिकला को नये आयाम प्रदान कर कला का इतिहास रच दिया।

43.  मारवाड़ में ओसियां, बाड़मेर में किराडू,  नागौर में गोठ-मांगलोद, सीकर में हर्षनाथ, कोटा में कंसुआ, बांसवाड़ा में अर्थूणा, डूंगरपुर में देव सोमनाथ, झालवाड़ में झालरापाटन, आबू पर्वत में देलवाड़ा, पाली में केकीन्द, भीलवाड़ा में बिजौलिया एवं मेनाल आदि पूर्व मध्यकाल के ऐसे स्थल हैं, जहाँ के प्रसिद्ध मंदिरों में भव्य एवं कलात्मक ऐतिहासिक मूर्तियाँ हैं। ये मन्दिर मूर्तिकला की खान हैं।

44.  राजस्थान की मध्ययुगीन कला का प्रमुख स्वर धार्मिक समभाव तथा सौहार्द है। विभिन्न सम्प्रदायों के मध्य समन्वय यहाँ की विशिष्टता है। मन्दिर और मूर्तिकला धार्मिक समभाव के साक्ष्य हैं।

45.  ओसियां में वैष्णव, शैव, देवी तथा जैन मन्दिर साथ-साथ होना धार्मिक समभाव का द्योतक हैं।

46.  वैष्णव तथा शैव सम्प्रदायों की उदारता तथा सहिष्णुता के परिणामस्वरूप विष्णु तथा शिव के संयुक्त रूप ‘हरिहर’ लोकप्रिय बने। शिव अपनी शक्ति से संपृक्त हो अर्द्धनारीश्वर बन गये।

47.  धार्मिक समभाव के कारण ही सूर्य तथा विष्णु का संयुक्त रूप सूर्यनारायण के रूप में अवतरित हुआ। 

48.  धार्मिक समभाव के फलस्वरूप ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश को समान धरातल पर कल्पित किया तथा उनमें कोई छोटा अथवा बड़ा नहीं है।

49.  लोद्रवा (जैसलमेर), बाड़ौली (चित्तौड़), झालरापाटन (झालावाड़) तथा कटारा (भरतपुर) में त्रिदेवों का अंकन हुआ है। ये मध्यकालीन मूर्तिकला की अनुपम निधियाँ हैं।

50.  पूर्व मध्यकाल में गुर्जर-प्रतिहार शासक सभी धर्मों के प्रति उदार थे। स्वयं वैष्णव धर्मावलम्बी थे, किन्तु उन्होंने जैन धर्म को प्रश्रय दे रखा था। यही कारण रहा कि इस युग में जैन धर्म फला-फूला। अनेक सुन्दर जैन मन्दिरों का निर्माण तथा तीर्थंकरों की मूर्तियों का बहुतायत में मिलना इसका प्रमाण है।

51.  नाडोल (पाली), ओसियां (जोधपुर), देलवाड़ा (सिरोही), रणकपुर (पाली), झालरापाटन (झालावाड़), केशोरायपाटन (बूँदी), लाडनूं (नागौर), पल्लू (गंगानगर) आदि स्थलों में जैन देव-प्रतिमाएं स्थापित हैं।

52.  ओसियां के सच्चिया-माता मन्दिर के प्रांगण में स्थित प्रतिहारकालीन सूर्य-मंदिर में जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ का अंकन धार्मिक सहिष्णुता का परिचायक है।

53.  देलवाड़ा के विमलवसही तथा लूणवसही मन्दिरों में कृष्णलीला का अंकन इसी धार्मिक सहिष्णुता भावना का सूचक है।

54.  इसी प्रकार हिन्दू प्रतिमाओं में सरस्वती का जो महत्व हैं, वही वाग्देवी सरस्वती का जैन सम्प्रदाय में है।

55.  पल्लू, लाडनूं, नाडोल तथा अर्थूणा की जैन सरस्वती प्रतिमाएँ राजस्थान की मध्यकालीन कला की उत्कृष्ट कृतियाँ हैं।

56.  राजस्थान में 15 वीं शताब्दी से सांस्कृतिक पुनरुत्थान के युग की शुरुआत मानी जा सकती है।

57.  मेवाड़ में महाराणा कुम्भा का उदय सांस्कृतिक इतिहास की बड़ी घटना है।

58.  कुम्भा ने कुम्भलगढ़, चित्तौड़गढ़ और अचलगढ़ में कुम्भस्वामी नामक विष्णु मन्दिर बनवाए।

59.  कुम्भा द्वारा चित्तौड़गढ़ में निर्मित कीर्तिस्तम्भ (जिसे विजय स्तम्भ के रूप में अधिक जाना जाता है) को “भारतीय मूर्तिकला का शब्दकोष” कहा जाता है। इतिहासकार गोपीनाथ शर्मा ने ठीक ही लिखा है, ”जीवन के व्यावहासिक पक्ष को व्यक्त करने वाला यह स्तम्भ लोकजीवन का रंगमंच हैं।“

60.  16 वीं-17वीं शताब्दियों में राजपूत एवं मुगलों के मध्य जिस मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध का श्रीगणेश हुआ, उसने मंदिर व उसकी मूर्तिकला को प्रभावित किया।

61.  अकबर के शासन काल में आमेर नरेश महाराजा मानसिंह ने वृंदावन (मथुरा) में गोविन्ददेव जी का मन्दिर बनवाया, जो मुगल साम्राज्य में बना सर्वोत्कृष्ट और भव्य देवालय है।

62.  आमेर नरेश महाराजा मानसिंह की रानी कंकावती ने अपने दिवंगत पुत्र जगतसिंह की पुण्य स्मृति में आमेर में जगतशिरोमणि का भव्य वैष्णव मन्दिर बनवाया।

63.  मानसिंह ने बंगाल से पालयुगीन शिलादेवी की मूर्ति लाकर आमेर में प्रतिष्ठित करवाई।

64.  उदयपुर में 17वीं शताब्दी का निर्मित जगदीश मन्दिर एक अन्य महत्वपूर्ण वैष्णव मन्दिर है।

65.  उदयपुर के जगदीश मन्दिर की मुख्य प्रतिमा भगवान जगदीश की काले पत्थर से निर्मित 5 फीट ऊँची प्रतिमा है, जिसके चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म सुप्रतिष्ठित है।

66.  उदयपुर के जगदीश मन्दिर के गर्भगृह के सामने गरूड़ की विशाल प्रतिमा है।

67.  लगभग इसी काल की वल्लभ सम्प्रदाय से सम्बन्धित मूर्तियाँ नाथद्वारा में श्रीनाथजी, कांकरोली में द्वारिकाधीश, कोटा में मथुरेश जी, जयपुर में गोविन्ददेव जी तथा बीकानेर में रत्नबिहारी की हैं। 

श्रीनाथजी, नाथद्वारा

68.  इस प्रकार राजस्थान में मूर्तिकला की एक समृद्ध परम्परा रही। राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद भी राजस्थान में मन्दिर निर्माण होता रहा और उनमें मूर्तियाँ स्थापित होती रही।

69.  मध्यकालीन मूर्तियों में जीवन्तता, सौन्दर्य, अलंकारिता, कलात्मकता, गतिशीलता एवं समन्वयवादिता के दिग्दर्शन होते हैं।

 

Vedic Period - Early Vedic Society वैदिक काल- प्रारम्भिक वैदिक समाज

Share

Vedic Period - Early Vedic Society वैदिक काल- प्रारम्भिक वैदिक समाज

  • प्रारम्भिक वैदिक समाज कबीलाई समाज था तथा वह जातीय एवं पारिवारिक संबंधों पर आधारित था।

  • प्रारम्भिक वैदिक समाज जाति के आधार पर विभाजित नहीं था एवं विभिन्न व्यावसायिक समूह अर्थात् मुखिया, पुरोहित, कारीगर आदि एक ही जन समुदाय के हिस्से थे।

  • प्रारम्भिक वैदिक समाज में कबीले के लिए ‘जन’’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता था और ऋग्वेद में विभिन्न जन का उल्लेख है।

  • विभिन्न कबीलों में पारस्परिक संघर्ष सामान्य थे, जैसे ऋग्वेद में ‘‘दशराज युद्ध’’ का वर्णन हुआ है और इसी युद्ध के वर्णन से हमें कुछ कबीलों के नाम प्राप्त होते हैं जैसे भरत, पुरु, यदु, द्रहयु, अनू और तुरवासू।

  • प्रारम्भिक वैदिक समाज में कबीलों के युद्ध जैसे कि पहले भी कहा गया है पशुओं के अपरहय एवं पशुओं की चोरी को लेकर होते रहते थे।

  • ‘‘राजा’’ या ‘‘गोपति’’-

  • कबीले का मुखिया ‘‘राजा’’ या ‘‘गोपति’’ होता था। वह युद्ध में नेता तथा कबीले का रक्षक था। ‘‘राजा’’ या ‘‘गोपति’’ का पद अन्य व्यावसायिक समूहों की भांति ही पैतृक नहीं था बल्कि उसका जन के सदस्यों में से चुनाव होता था।

  • ‘राजन्य’- योद्धा को ‘राजन्य’ कहा जाता था।

  • विश- कबीलाई इकाई को ‘‘विश‘‘ कहा जाता है। विश एक गाँव या ग्राम में बसते थे।

  • कुल - कुल या परिवार समाज की प्राथमिक इकाई था।

  • कुलप - परिवार का सबसे बड़ा पुरुष परिवार का मुखिया ‘‘कुलप’’ कहलाता था। कुलप परिवार की रक्षा करता था।

  • पितृसत्तात्मक समाज- प्रारम्भिक वैदिक समाज पितृसत्तात्मक था।

  • प्रारम्भिक वैदिक समाज में लोगों की सामान्य इच्छा पुत्र की प्राप्ति थी। पुरुष को महत्त्व दिया जाता था और श्लोकों से पता लगता है कि उन श्लोकों का प्रार्थना में लगातार प्रयोग पुत्र प्राप्ति के लिए किया जाता था।

  • महिलाओं की स्थिति- यद्यपि पूरा समाज पितृसत्तात्मक था, फिर भी समाज में महिलाओं का भी काफ़ी महत्त्व था। वे शिक्षित थीं और वे सभाओं में भी भाग लेती थीं। कुछ ऐसी महिलाओं के भी दृष्टांत मिले हैं जिन्होंने श्लोकों का संकलन किया। उनको अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार था एवं वे देर से विवाह कर सकती थी। इन सबके बावजूद महिलाओं के पिताओं, भ्राताओं तथा पतियों पर सदैव निर्भर रहना पड़ता था।

  • शिक्षा का मौखिक रूप से आदान-प्रदान किया जाता था, परंतु शिक्षा की परम्परा इस काल में अधिक लोकप्रिय नहीं थी।

  • दास या दस्यु- ऋग्वेद के रचनाकारों में स्वयं को अन्य मानव समुदायों, जिन्हें उन्होंने दास और दस्यू कहा, से पृथक् रखा।

  • दास शब्द को ऋग्वेद में अलग संस्कृति के दूसरे व्यक्ति को निरूपित करने के लिए प्रयोग किया गया है।

  • दासों को काला, मोटे होठों वाला, चपटी नाक वाला, लिंग पूजक और अशिष्ट भाषा वाला कहकर वर्णन किया गया है।

  • ऋग्वेद में दासों को अनुष्ठानों का पालन नहीं करने के लिए एवं एक प्रजनन पंथ का अनुसरण करने के लिए धिक्कारा गया है। वे सुरक्षित दीवारें बना कर रहते थे और प्रचुर पशुधन के स्वामी थे।

  • पणिस् - एक अन्य वर्ग पणिस् के विषय में जानकारी मिलती है जो धन और पशुओं के स्वामी थे। कालांतर में पाणि शब्द व्यापारियों और धन संपत्ति से जुड़ गया।

  • समुदायों में आपसी झगड़े और मैत्रियाँ होती रहती थी और उन्हें विभिन्न जातियों या भाषाई वर्गों के रूप में नहीं बांटा जा सकता। उदाहरणतः ऋग्वेद का सबसे प्रमुख नेता सुदास था जिसने ‘‘10 राजाओं’’ की लड़ाई में भरत कुल का नेतृत्व किया था। उसके नाम के अंत में प्रयुक्त दास शब्द से लगता है कि उसका दासों से कुछ संबंध था। एक ही क्षेत्र में कई समुदायों की उपस्थिति के कारण ही सम्भवतः वर्ण व्यवस्था का प्रादुर्भाव हुआ।

  • विभिन्न व्यवसायिक समूहों जैसे कि कपड़ा बुनने वाले, लोहार, बढ़ई, चर्मकार, रथ बनाने वाले, पुजारी आदि का वर्णन हुआ है।

  • सारथी का समाज में विशेष स्थान था।

  • ऋग्वेद में भिखारियों, मजदूरी पर काम करने वालों या मजदूरी का कोई दृष्टांत नहीं मिलता। परन्तु समाज में आर्थिक असमानता थी और हमें ऐसे संदर्भ मिलते हैं जिनके अनुसार कुछ धनी लोग रथों, पालतू पशुओं (गायों-बैलों) आदि के स्वामी थे और इन वस्तुओं को भेंट या उपहार में देते थे।

Civilization of Kalibanga- कालीबंगा की सभ्यता-
History of Rajasthan



कालीबंगा टीला


कालीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ़ ज़िले में घग्घर नदी (प्राचीन सरस्वती नदी) के बाएं शुष्क तट पर स्थित है। कालीबंगा की सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। इस सभ्यता का काल 3000 ई.पू. माना जाता है, किन्तु कालांतर में प्राकृतिक विषमताओं एवं विक्षोभों के कारण ये सभ्यता नष्ट हो गई। 1953 ई. में कालीबंगा की खोज का पुरातत्वविद् श्री ए. घोष (अमलानंद घोष) को जाता है। इस स्थान का उत्खनन कार्य सन् 1961 से 1969 के मध्य 'श्री बी. बी. लाल', 'श्री बी. के. थापर', 'श्री डी. खरे', के. एम. श्रीवास्तव एवं 'श्री एस. पी. श्रीवास्तव' के निर्देशन में सम्पादित हुआ था। कालीबंगा की खुदाई में प्राक् हड़प्पा एवं हड़प्पाकालीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इस उत्खनन से कालीबंगा 'आमरी, हड़प्पा व कोट दिजी' (सभी पाकिस्तान में) के पश्चात हड़प्पा काल की सभ्यता का चतुर्थ स्थल बन गया। 1983 में कालीबंगा में एक पुरातत्‍वीय संग्रहालय स्‍थापित किया गया था, जिसमें इस हड़प्‍पा स्‍थल पर 1961-69 के बीच की गई खुदाई से प्राप्‍त सामग्रियों को रखा गया है। यह स्थान प्राचीन समय में चूड़ियों के लिए प्रसिद्ध था। ये चूडियाँ पत्‍थरों की बनी होती थी। इसमें मिली काली चूड़ियों की वजह से ही इसे कालीबंगा कहा गया। पंजाबी में 'वंगा' का अर्थ चूडी होता है, इसलिए काली वंगा अर्थात काली चूडियाँ।

यहाँ तीन टीले के प्राप्त हुए है, जिनमें से बीच में एक बड़ा टीला (KLB-2), इससे छोटा एक टीला (KLB -1) पश्चिम में और सबसे छोटा टीला (KLB -3) पूर्व में स्थित है।

प्राप्त टेराकोटा

सिन्धु-पूर्व सभ्यता का दुर्ग-

कालीबंगा में हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो की तरह सुरक्षा दीवार से घिरे दो टीले पाए गए हैं। कुछ पुरातत्वविज्ञों के अनुसार यदि हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो को सैंधव सभ्यता की प्रथम दो राजधानियां माना जा सकता है तो इस स्थान को सैंधव सभ्यता की तृतीय राजधानी कह सकते हैं। यहाँ के पूर्वी टीले की सभ्यता प्राक्-हड़प्पाकालीन थी। कालीबंगा में सिन्धु-पूर्व सभ्यता की इस बस्ती में दुर्ग के भी प्रमाण मिले हैं तथा यह किलेबन्दी कच्ची ईंटों से बनी थी, जो नगर की सुरक्षा का साधन थी। अन्य हड़प्पा कालीन नगरों की भांति कालीबंगा दो प्रकार के दुर्गों में विभाजित था- नगर दुर्ग (या गढ़ी) और निम्न दुर्ग। नगर दुर्ग समान्तर चतुर्भुजाकार का था। यहाँ का किला 30x20x10 सेमी की मिट्टी की कच्ची ईंटों से निर्मित है। किलेबन्दी के उत्तरी भाग में प्रवेश मार्ग था, जिससे सरस्वती नदी तक पहुँच सकते थे।

नगर नियोजन-

पुरातत्वविद् मानते हैं कि यहाँ की खुदाई ने हड़प्पा सभ्यता के महानगर का एक नक्शा तैयार किया है, जो शायद सही मायने में भारतीय सांस्कृतिक विरासत का प्रथम नगर था। कालीबंगा में हुए उत्खनन में प्राचीन नगर के अस्तित्व के प्रमाण प्राप्त हुए हैं, जिन्हें 5 स्तरों में देखा जा सकता है। ये नगर मिट्टी की चौड़ी दीवारों से बने थे। ये दीवारें मिट्टी की ईंटों से बनाई जाती थी। ईंटों की चुनाई करने के बाद इन पर प्लास्तर कर दिया जाता था। साधारणतया इन मकानों में 4-5 बड़े कमरे, एक दालान (आँगन) व कुछ छोटे कमरे होते थे। मकानों के आगे चबूतरे थे। कमरों के फर्श को चिकनी मिट्टी से लीपा जाता था। कहीं-कहीं पकी हुई ईंटों के फर्श भी प्राप्त हुए हैं। ये ईंटें शायद धूप में पकाई जाती थी। अपशिष्ट जल के निकास के लिए गोलाकार भांड थे, जिन्हें एक-दूसरे पर लगा कर रखा जाता था, जिससे पानी इधर-उधर नहीं फैलकर जमीन में सोख लिया जाता था। छतें मिट्टी और लकड़ी की बल्लियों व मिट्टी की बनाई जाती थी। छत पर जाने के लिए सीढियां थी। नगर की सड़के चौड़ी और पक्की थी। सुरक्षा के लिए नगर के चारों तरफ चौड़ी दीवार और खाइयाँ बनी थी। नगर के दूसरे किनारे पर बड़े कमरे, कुआं तथा दालान बना है, जिससे अनुमान लगता है कि नगर के आसपास सुरक्षा हेतु दुर्ग व्यवस्था थी। यहाँ पर मोहनजोदड़ो जैसी उच्च-स्तर की जल निकास व्यवस्था का आभास नहीं होता है। किन्तु यह जरुर है कि यद्यपि भवनों का निर्माण कच्ची ईंटों से किया जाता था, किंतु नालियों, कुओं तथा स्नानागारों में पकाई गई ईंटों का प्रयोग किया गया है।
भोजन पकाने की व्यवस्था-
कालीबंगा के मकानों में दो प्रकार के चूल्हे प्राप्त हुए हैं- 
1. जमीन से कुछ अन्दर 2. जमीन के ऊपर। 
नीचे वाले चूल्हों में ईंधन देने तथा धुंआ निकालने के लिए विशेष छेद बने थे। ये चूल्हे वर्तमान तंदूर के लगभग समान हैं।
बैलगाड़ी का अस्तित्व-
यहाँ प्राप्त हुए मिट्टी के खिलौनों, पहियों एवं मवेशियों की हड्डियों पर हुई शोध में पुरातत्वविद इन्हें बैलगाड़ी के अस्तित्व का अप्रत्यक्ष प्रमाण मानते हैं।
हवन कुण्डों के साक्ष्य-
कालीबंगा के दुर्ग टीले के दक्षिण भाग में मिट्टी और कच्चे ईटों के बने हुए पाँच चबूतरे मिले हैं, जिसके शिखर पर हवन कुण्डों के होने के साक्ष्य मिले हैं।
कृषि-
कालीबंगा में नगर सुनियोजित ढंग से बसाये गए थे। यहाँ के नागरिक सभ्य एवं समझदार थे। यहाँ एक टीले की खुदाई से जुते हुए खेत के अवशेष प्राप्त हुए हैं जिससे ज्ञात होता है कि यहाँ के नागरिकों के जीविकोपार्जन का साधन कृषि था। यहाँ प्राप्त जुता हुआ खेत शायद सबसे प्राचीन जुता हुआ खेत है। यहाँ प्राप्त खेत विश्व के प्राचीनतम खेतों का नमूना है। माना जाता है कि संस्कृत साहित्य में वर्णित ''बहुधान्यक क्षेत्र'' यही है। इन खेतों में दो तरह की फसलों को एक साथ उगाया जाता था। कालीबंगा में मिले 'प्राक् सैंधव संस्कृति' के एक जुते हुए खेत के कुंडों के बीच की दूरी पूर्व से पश्चिम की ओर 30 से.मी. है और उत्तर से दक्षिण की ओर 1.10 मीटर है। माना जाता है कि कम दूरी के खांचों में चना एवं अधिक दूरी के खाचों में सरसों बोई जाती थी। इनमें ग्रिड की तरह धारियों वाले निशान है।
लघु पाषाण उपकरण-
यहाँ के उत्खनन में लघु पाषाण उपकरण, मणिक्य, मिट्टी के मनके, शंख, कांच व मिट्टी की चूड़ियां, खिलौना, गाड़ी के पहिए, बैल की खण्डित मृण्मूर्ति, सिलबट्टे आदि के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
ताँबे के औज़ार व मूर्तियाँ-

ताँबे के औज़ार

इस युग में पत्थर व ताँबे दोनों प्रकार के उपकरण प्रचलित थे, परंतु पत्थर के उपकरणों का प्रयोग अधिक होता था। यहाँ से दैनिक जीवन प्रयुक्त होने वाली वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं। कालीबंगा में उत्खनन से प्राप्त पुरावशेषों में ताँबे (धातु) से निर्मित औज़ार, हथियार तथा मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं, जिससे पता चलता है कि ये मानव प्रस्तर युग से ताम्रयुग में प्रवेश कर चुका था।

ताँबे का बैल


प्राप्त मुहरें-
प्राप्त मुहरें
कालीबंगा से शैलखड़ी की मुहरें और मिट्टी की छोटी मुहरे महत्त्वपूर्ण वस्तुएं प्राप्त हुई हैं। मिट्टी की मुहरों पर सरकण्डे के छाप या निशान से यह लगता है कि इनका प्रयोग पैकिंग के लिए किया जाता रहा होगा। कालीबंगा से हड़प्पा सभ्यता की मिट्टी पर बनी मुहरें मिली हैं, जिन पर वृषभ व अन्य पशुओं के चित्र व सैन्धव लिपि से मिलती जुलती लिपि में अंकित लेख है जिन्हें अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। वह लिपि दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी। एक सील पर किसी अराध्य देव की आकृति है। कालीबंगा से प्राप्त मुहरें 'मेसोपोटामिया'  की मुहरों के जैसी है।
तौल के बाट-
तौल के बाट

यहाँ पर प्राप्त पत्थर से बने बाट से पता चलता है कि यहाँ का मनुष्य तौलने के बाट का उपयोग करना सीख गया था। मोहरों एवं तौल के बाट से पता चलता है कि यहाँ के लोग व्यापार भी करते थे।

ईटें-
कालीबंगा की प्राक्-सैंधव बस्तियों में प्रयुक्त होने वाली कच्ची ईटें 30x20x10 सेमी, 40x20x10 सेमी एवं 30x15x7.5 सेमी आकार की होती थी। यहाँ से मिले मकानों के अवशेषों से पता चलता है कि सभी मकान कच्ची ईटों से बनाये गये थे, किन्तु नालियों एवं कुओं में पक्की ईटों का प्रयोग किया गया था। यहाँ पर कुछ ईटें अलंकृत भी पायी गई हैं। कालीबंगा का एक फर्श पूरे हड़प्पा-काल का एक मात्र ऐसा उदाहरण है, जहाँ अलंकृत ईटों का प्रयोग किया गया है। इस पर प्रतिच्छेदी वृत का अलंकरण किया गया है।
मूर्तियाँ-
ताँबे या मिट्टी की बनी मूर्तियाँ, पशु-पक्षी व मानव कृतियाँ मिली हैं जो मोहनजोदड़ो व हड़प्पा के  समान हैं। पशुओं में बैल, बंदर व पक्षियों की मूर्तियाँ मिली हैं जिससे पता लगता हैकि पशु-पालन, व कृषि में बैल का उपयोग किया जाता था।
अंत्येष्ठी स्थल-
कालीबंगा के दक्षिण-पश्चिम में शवों को गाड़ने के लिए अंत्येष्ठी स्थल था। यहाँ शव विसर्जन के 37 उदाहरण मिले हैं। यहाँ अंत्येष्ठी संस्कार की तीन विधियां प्रचलित थी-
1. पूर्व समाधीकरण
2. आंशिक समाधिकरण
3. दाह संस्कार
यहाँ पर बच्चे की खोपड़ी मिले है जिसमें 6 छेद हैं, इसे 'जल कपाली' या 'मस्तिष्क शोध' की बीमारी का पता चलता है। यहाँ से एक कंकाल मिला है जिसके बाएं घुटने पर किसी धारदार कुल्हाड़ी से काटने का निशान है।
भूकम्प के साक्ष्य-
यहाँ से भूकम्प के प्राचीनतम प्रमाण मिलते हैं। यह माना जाता है कि सम्भवतः घग्घर नदी के सूख जाने से कालीबंगा का विनाश हो गया।














































































राजस्थान डायरीज २

  बैराट, राजस्थान बैराट या  विराट नगर  एक प्राचीन शहर है जो अब राजस्थान के कोटपूतली-बहरोड़ जिले में है. जयपुर से विराट नगर लगभग 60 किमी की दू...