भानगढ़ जो भूतिया किले के नाम से भी जाना जाता है, अलवर जिले में स्थित है. सरिस्का के जंगल से 50 किमी दूर है. जयपुर से लगभग दो घंटे में और दिल्ली से चार साढ़े चार घंटे में पहुंचा जा सकता है. इंटरनेट पर इस किले के बारे में बहुत पढ़ा था की 'देश का सबसे डरावना किला', 'भयानक किला' जहाँ शाम को जाना मना है, 'most haunted fort of India' वगैरह वगैरह। जयपुर से दिल्ली आते हुए सोचा की भूतों का डेरा भी देखते चलें तो फिर कार उधर मोड़ ली. भूत होंगे तो भूतनी भी तो होंगी! किसी ना किसी से तो मुलाकात हो ही जाएगी ?
भानगढ़ अरावली की पहाड़ियों के अंदर ग्रामीण इलाके में है और आने जाने की आड़ी तिरछी सड़कें भी गांव-खेड़े और खेतों में से होकर गुजरती हैं. जीपीएस की मदद से आसानी से पहुँच सकते हैं. किला पुरातत्व विभाग के आधीन है और रात को किले में जाना मना है. चलिए दिन में ही चलते हैं. अंदर जाने के लिए टिकट लगता है और कार पार्किंग के भी पैसे लगते हैं. सरकारी गाइड एक दो ही हैं गैर सरकारी गाइड ज्यादा हैं जो आपको तरह तरह के किस्से सुना कर किले में भूत प्रेत होने का दावा करते हैं.
किला सुन्दर है और भारी पत्थर और ईंटों से बनाया गया है. पहाड़ी की ढलान पर बना है और अभी तक किले को ज्यादा नुकसान नहीं हुआ है. किले के द्वार थे लाहोरी गेट, अजमेरी गेट, दिल्ली गेट और फुलबारी गेट. किले में पांच सुन्दर मंदिर हैं गोपीनाथ मंदिर, केशव राय मंदिर, सोमेश्वर मंदिर, मंगला देवी मंदिर और गणेश मंदिर। किले में पुरोहित की हवेली, नाचन की हवेली और महल भी है.
भूतिया किले का एक किस्सा तो ये है की एक साधु बालू नाथ यहाँ अकेले रहते थे और ध्यान लगाते थे. जब माधो सिंह ने यहाँ किला बनवाना शुरू किया तो साधु ने कहा की अगर तेरे किले या किले के किसी हिस्से की छाया मेरी कुटिया पर पड़ी तो तेरा किला बर्बाद हो जाएगा। माधो सिंह ने हामी भर ली पर बाद में उसका पोता अजब सिंह मुकर गया. साधू के श्राप से भानगढ़ सुनसान हो गया.
दूसरा किस्सा ये था की भानगढ़ की सुन्दर राजकुमारी रत्नावती अपनी सहेलियों के साथ जौहरी बाज़ार आई. राजकुमारी एक इत्तर की शीशी ले रही थी. एक जादूगर जो उस राजकुमारी को लगातार निहार रहा था, उसने चुपके से उस इत्तर पर वशीकरण मन्त्र फेर दिया। पर रत्नावती की सहेली ने राजकुमारी को बता दिया। राजकुमारी ने इत्तर की शीशी तुरंत पत्थर पर दे मारी। पत्थर लुढ़कता हुआ जादूगर पर जा गिरा। मरने से पहले जादूगर ने भानगढ़ को श्राप दे दिया। श्राप के कुछ समय बाद मुग़लों ने भानगढ़ पर हमला कर दिया जिसमें राजकुमारी भी मारी गई और भानगढ़ सुनसान हो गया.
कुछ फोटो प्रस्तुत हैं:
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| किले का निर्माण सन 1573 कराया गया था. बनवाने वाले थे आमेर ( अम्बेर ) के राजा भगवंत दास कुशवाहा ( इंटरनेट में कई जगह नाम भगवंत सिंह भी लिखा है) |
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| भगवंत दास ने ये किला माधो सिंह के लिए बनवाया था. माधो सिंह राजा मान सिंह के भाई थे जो अकबर के दरबार में दीवान थे. भान सिंह कुशवाहा माधो सिंह के दादा थे इसीलिए इस किले का नाम भानगढ़ रखा गया. |
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| भानगढ़ का नक्शा |
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| भानगढ़ में मकान, बाज़ार और महल भी हैं परन्तु इनमें छतें नहीं हैं |
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| जौहरी बाज़ार |
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| जौहरी बाज़ार का एक भाग |
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| जौहरी बाज़ार की सुरक्षा चौकी |
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| जौहरी बाज़ार की दुकानों में छतें नहीं हैं |
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| किले का द्वार जहाँ से महल में जा सकते हैं |
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| नागर शैली में बना सुन्दर गोपीनाथ मंदिर। गाइड ने बताया यहाँ पांच मंदिर हैं पर किसी में भी मूर्ति नहीं हैं |
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| अपना अपना महल! |
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| कहाँ जाना है ? |
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| महल का रास्ता |
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| महल के गेट पर बनी ड्योढ़ी |
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| शायद नाचन या नर्तकी की हवेली है ये |
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| बरगद का पेड़ की नीचे खाली कोठरी |
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| बरगद के घने पेड़ों में से गुजरता रास्ता |
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| केशव राय मंदिर |
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| किले की दीवार |
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| किले के बीच में एक मकबरा |
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| पेड़ों के झुरमुट के पास छोटा ताल है जहाँ पहाड़ी से आता पानी जमा हो जाता है. यहाँ सुन्दर हरियाली और ठंडक है और एक मंदिर भी है |
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| पर्यटकों के पीछे महल है |
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| जौहरी बाज़ार का दूसरा सिरा |
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| मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं? |
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| ये तीन फोटो 'Rajasthan Gazeteer 1880 के कुछ पन्नों में से हैं. इसके अनुसार सम्वत 840 में भानगढ़ में अकाल पड़ा था और भानगढ़ खाली हो गया था. तब से खाली ही पड़ा है ( ये तारीख ठीक नहीं लगती है. विक्रमी सम्वत आज के अंग्रेजी कैलेंडर से 57 साल आगे चलता है. इस तरह से तो यह सम्वत 840 सन 743 बनता है जबकि किला 1573 के आसपास बना था ). |
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| राजस्थान गैज़ेटीयर से |
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राजस्थान गैज़ेटीयर से
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शाम लगभग पांच बजे तक वहां रहे भूत प्रेत तो कोई मिला नहीं। अगर आप को मिले तो जरूर बताएं दोबारा आ जाएंगे उस भूत से मिलने के लिए!
बैराट, राजस्थान
बैराट या विराट नगर एक प्राचीन शहर है जो अब राजस्थान के कोटपूतली-बहरोड़ जिले में है. जयपुर से विराट नगर लगभग 60 किमी की दूरी पर है. इसे बेरट या बैराठ भी कहा जाता था और ये स्थान ( विराट नगर ) प्राचीन मत्स्य जनपद की राजधानी था. किसी समय यहाँ विराट नाम के राजा का राज हुआ करता था.
2. एक किवदंती प्रचलित है जब पांडवों को जब बारह साल का वनवास और दो साल का अज्ञात वास दे कर निष्कासित कर दिया गया था तो उन्होंने यहाँ एक वर्ष याने तेरहवां वर्ष गुप्त रूप से व्यतीत किया था. बाद में महाभारत के युद्ध में राजा विराट और उनके पुत्र अपनी सेना के साथ पाण्डवों की ओर से शामिल हुए परन्तु राजा और पुत्र मारे गए. राजा विराट की पुत्री उत्तरा से अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु का विवाह हुआ था. अभिमन्यु और उत्तरा का पुत्र परीक्षित था जिसने महाभारत युद्ध के बाद राजकाज संभाला।
3. यह ऐतिहासिक जगह की चर्चा अब इसलिए भी होती है क्यूंकि यहाँ पुरातत्व विभाग की खुदाई में बुद्ध कालीन गोल मंदिर और बौद्ध विहार के पुरातन अवशेष मिले हैं और साथ ही सम्राट अशोक का एक अभिलेख यहाँ प्राप्त हुआ है. 250 BCE अर्थात सामान्य काल से 250 वर्ष पूर्व मौर्य कालीन अवशेषों के अलावा मुग़ल और राजपूत राजाओं से सम्बंधित अवशेष भी मिले हैं. मुग़ल समय में अकबर ने यहाँ ताम्बे के सिक्के ढालने की टकसाल भी लगाई थी. यहाँ बड़ी मात्रा में ताम्बे के सिक्के भी मिले हैं. यहाँ की पहाड़ियों में बड़े बड़े हलके गुलाबी रंग की चट्टानें और पत्थर हैं. इन पहाड़ियों में ताम्बे की खानें भी थीं.
4. पुरातत्व विभाग ने विराट नगर की पहाड़ी में खुदाई की थी जिसमें बौद्ध मंदिर, अशोक का शिलालेख और बौद्ध विहार के अवशेष मिले थे. सम्राट अशोक का अभिलेख कोलकाता के म्यूजियम में रखा हुआ है. जिस पहाड़ी पर यह अवशेष पाए गए उसे बीजक की पहाड़ी कहते हैं ( बीजक = अभिलेख ).
5. बुद्ध कालीन भारत में अर्थात सामान्य युग से 600 वर्ष पहले वाले युग में, उत्तर भारत में सोलह जनपद हुआ करते थे जिनमें से एक था मत्स्य जनपद या मत्स्य देश। इस मत्स्य जनपद में अलवर, जयपुर और भरतपुर के कुछ हिस्से शामिल थे. इस जनपद की राजधानी विराट नगर हुआ करती थी और इस जनपद की एक सीमा एक ओर कुरु देश की राजधानी इंद्रप्रस्थ से और दूसरी ओर शूरसेन जनपद से मिलती थी. शूरसेन जनपद की राजधानी मधुरा ( आजकल मथुरा ) थी. मत्स्य जनपद का नाम भगवान् बुद्ध के प्रवचन 'जनवसभ सुत्त' ( दिग्घ निकाय सुत्त 18 ) में भी आया है.
6. बैराट के बारे में चीनी बौद्ध यात्री हुएन त्सांग ने भी अपने संस्मरण The Great Tang Dynasty Record of the Western Regions में बैराट का जिक्र किया है. वह मथुरा जाते हुए सन 634 के आसपास यहाँ आया था. उसने लिखा है की यहाँ आठ बौद्ध विहार थे जो खस्ता हाल में थे और कुछ भिक्खु यहाँ रह रहे थे जो हीनयान बौद्ध धर्म का अध्ययन कर रहे थे. इसके अलावा हुएन त्सांग ने लिखा है की यहाँ दस देव मंदिर भी थे और एक हजार से ज्यादा देव भक्त भी रहते थे.
7. एक और ऐतिहासिक जिक्र अबू रशीद का है जिसने बताया की 1009, 1014 और 1022 में महमूद गज़नी के हमले यहाँ भी हुए और उसके सिपहसालार आमिर अली ने 1022 में खूब लूटपाट की और शहर हथिया लिया। ये बात एलेग्जेंडर कन्निंघम ने 1862-63-64 और 65 की रिपोर्ट में दर्ज की है.
8. बीजक पहाड़ी दो सौ फ़ीट ऊँची है जिस पर दो सपाट तल बनाए गए हैं. इनमें से एक तल पर गोल बौद्ध मंदिर या चैत्य बनाया गया और आसपास भिखुओं के रहने के लिए कमरे बनाए गए थे. कमरे और दीवारों के लिए बड़े साइज की पकाई हुई ईंटें इस्तेमाल की गई हैं.
9. यहाँ मिले अशोक अभिलेख को कोलकाता में रखा गया है और उसका नाम Kolkata-Bairat Minor Rock Edict III है. अभिलेख का अनुवाद इस प्रकार है जो कि इस किताब से लिया गया है:
'The Edicts of King Asoka' by Ven. S. Dhammika.
'Piyadasi, King of Magadha, saluting the Sangha and wishing them good health and happiness, speaks thus: You know, reverend sirs, how great my faith in the Buddha, the Dhamma and the Sangha is. Whatever, reverend sirs, has been spoken by Lord Buddha, all that is well-spoken. I consider it proper, reverend sirs, to advise on how the good Dhamma should last long.
'These Dhamma texts- Extracts from the Discipline, the Noble Way of Life, the fears to Come, the Poem on the Silent Sage, the Discourse on the Pure Life, Uptisa's Questions, and the advice to Rahula, which was spoken by the Buddha concerning false speech - these Dhamma texts, reverend sirs, I desire that all the monks and nuns may constantly listen to and remember. Likewise the laymen and laywomen. I have had this written that you may know my intentions'.
10. इस अभिलेख की खोज कप्तान बर्ट ने 1840 में की थी. इस अभिलेख को भब्रु या भाबरा अभिलेख भी कहा जाता था. अभिलेख की नक़ल और अनुवाद मरख़म किट्टो ने पंडित कमल कांत की सहायता से किया था. बाद में इस अनुवाद को एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल के जर्नल में भी प्रकाशित किया गया था. यहाँ पुरातत्व विभाग की खुदाई में मिट्टी के दिये, घड़े और बर्तन भी प्राप्त हुए थे. अभिलेख की भाषा प्राकृत है और लिपि ब्राह्मी।
ऐतिहासिक स्थान होते हुए भी यहाँ बहुत कम सैलानी यहाँ आते हैं. बीजक पहाड़ी ग्रामीण इलाके में है और आसपास कोई रेस्तरां नहीं है बस एक चाय की टपरी है. वैसे आप दिन में कभी भी जा सकते हैं पर कोई गाइड नहीं है. पहाड़ी पर एक मंदिर भी बना है. बनावट देख कर लगता है की बाद में बनाया गया होगा। जब हम पहुंचे तो वहां भी कोई पुजारी या अन्य व्यक्ति नहीं था. चढ़ाई चढ़ने के लिए एक रैंप - रास्ता- बना दिया गया है. दोपहर में तीखी धूप और गर्मी हो जाती है. जाने से पहले पानी की व्यवस्था कर लें.
कुछ फोटो प्रस्तुत हैं.
झालरा पाटन
झालरापाटन या पाटन एक रियासत थी जो हाड़ौती क्षेत्र, राजस्थान में आती थी. हाड़ौती में झालावाड़, कोटा, बारां और बूंदी शामिल थे. झालरा पाटन और झालावाड़ जुड़वां शहरों की तरह हैं. झालरा पाटन के पूर्व में चंद्रभागा नदी है और ये शहर पहले बड़ा व्यापारिक केंद्र हुआ करता था.
झालावाड़ की स्थापना 1791 में झाला ज़ालिम सिंह ने की थी जो कोटा रियासत के दीवान थे. उस वक़्त ये जगह छावनी उम्मेदपुरा कहलाती थी. 1838 में झालावाड़ को कोटा से अलग कर दिया गया. उसके बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी झालावाड़ से सालाना आठ हज़ार रूपए की चौथ या ट्रिब्यूट की वसूली करती थी! इस छोटी सी रियासत में झाला मदन सिंह, झाला पृथ्वी सिंह और राणा भवानी सिंह ने राज किया।
आस पास के इलाके में काफी बारिश होती है इसलिए यहाँ ताल तल्लैय्या हैं और चंद्रभागा नदी के अलावा छोटी नदियां जैसे कालीसिंध और आहु भी हैं. इसलिए सारा क्षेत्र हरा भरा रहता है और ख़ास तौर पर मानसून में बहुत सुन्दर हो जाता है. पाटन बहुत बड़ा नहीं है और ऑटो ले कर घुमा जा सकता है. पतन और झालावाड़ में बहुत से दर्शनीय स्थान हैं जिनमें से कुछ की फोटो प्रस्तुत हैं.
सुख महल और रुडयार्ड किपलिंग
बूंदी से कुछ ही दूर सुख महल है. ये छोटा सा महल या शिकारगाह जैत सागर झील के किनारे है जिसे राजा विष्णु सिंह ने 1776 में बनवाया था. बूंदी राज्य के दीवान और वास्तुविद सुखराम की देख रेख में महल बनवाया गया था इसलिए इसका नाम सुख महल रख दिया गया. सुन्दर, शांत और मनोरम जगह है ये. आस पास के घने जंगल में शिकार करने शाही परिवार आया करता था. ऑटो वाला लगभग बीस मिनट में पहुंचा देगा और कार में कुछ ज्यादा समय लगेगा।
सुख महल की प्रसिद्धि का एक और कारण रुडयार्ड किपलिंग भी हैं. रुडयार्ड किपलिंग ( 1865 - 1936 ) ब्रिटिश लेखक, कवि, लघु कथाकार और पत्रकार थे और इस सुख महल में 1899 में दो दिन रहे थे. किपलिंग का जन्म मुंबई में हुआ था और पढ़ाई लिखाई इंग्लैंड में. उनकी लघु कथाएं काफी लोकप्रिय हुईं थीं और 'जंगल बुक' उनकी लोकप्रिय पुस्तक है. वाल्ट डिसने ने इस किताब पर फिल्म भी बनाईं वो भी खूब पसंद की गई. कुछ लोगों का ख्याल है की यहाँ किपलिंग ने 'जंगल बुक' लिखी और कुछ का कहना है की यहाँ 'किम' लिखी जिस पर बाद में हॉलीवुड में फिल्म भी बनी. बहरहाल किपलिंग को यहाँ सुख महल में राजा रजवाड़ों और शिकार के बारे में काफी किस्से कहानियां सुनने को मिली होंगी।
सुख महल परिसर में एक संग्रहालय भी बनाया गया है जिसमें बूंदी और आस पास से मिली मूर्तियाँ और हथियार औज़ार भी रखे गए हैं. ज्यादातर वस्तुएं दसवीं शताब्दी से लेकर सत्रहवीं शताब्दी से सम्बंधित हैं. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
जैसलमेर किला
बख्तर कीजे लोहे का,
पग कीजे पाषाण !
घोड़ा कीजे काठ का,
तब देखो जैसान !
याने यात्री कपड़ों के बजाए लोहे का बख्तर पहन लें जो ना मैला हो और ना फटे, पैर पत्थर के बना लें जो तपती रेत में झुलसे नहीं और ना ही थकें, घोड़ा लकड़ी का ले लें जो ना कभी थके और ना पानी मांगे और तब जैस्सल राजा का स्थान देखने निकलें ! अब बख्तर और घोड़ा तो पुरानी बात हो गई पर आप जैसलमेर जाते समय अपनी गाड़ी का कूलैंट और ए.सी. जरूर चेक कर लें !
अठारहवीं सड़ी तक इराक, ईरान, अफगानिस्तान, चीन जैसे देशों से व्यापारी ऊँटों के कारवां लेकर चलते थे और जैसलमेर सिल्क रूट के व्यापारियों का एक पड़ाव था. अफीम, सोने, चांदी, हीरे जवाहरात, सूखे मेवों वगैरा का व्यापार हुआ करता था. यहाँ के राजा इन व्यापारियों से टैक्स वसूला करते थे.
त्रिकुटा पहाड़ी पर बने किले की चौड़ाई 750 फुट है और लम्बाई 1500 फुट. त्रिकुटा पहाड़ी की ऊंचाई जमीन से लगभग 250 फुट है. किला बनने के बाद 1276 में और फिर 1306 में किले की मरम्मत हुई और कई बदलाव किये गए. किले की सुरक्षा के लिए चारों ओर तीन ऊँची और चौड़ी दीवारों का घेरा है. चार बड़े दरवाज़े हैं और पचास से ज्यादा बुर्जियां और परकोटे हैं. इनमें साढ़े तीन हज़ार से ज्यादा सैनिक रहते थे.
किले के अंदर महल हैं, दुकानें हैं, सात जैन मंदिर हैं, पचास के करीब रेस्तरां हैं और लगभग 4000 लोग अब भी रहते हैं. इसलिए ये किला 'जीता जागता' किला है! 2013 में इसे World Heritage Site बना दिया गया है. किले में स्थानीय हलके पीले पत्थर का खूब प्रयोग किया गया है. सुबह और शाम के सूरज की किरणों में ये पत्थर सुनहरे लगते हैं जिसके कारण इस किले को सोनार किल्ला भी कहा जाता है.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
मेहरानगढ़, जोधपुर - 1
शहर से 125 मीटर ऊँची पहाड़ी पर किला है जिसका नाम मेहरानगढ़ है. पुराना शहर इसी किले के तलहटी में बसा हुआ है. इस किले की नींव राव जोधा द्वारा 12 मई 1459 को रखी गई थी. यह भीमकाय किला लगभग पांच वर्ग किमी में फैला हुआ है. इसकी ऊँची, चौड़ी और मज़बूत दीवारों की लम्बाई लगभग 10 किमी है. महाराजा जसवंत सिंह (1638 - 1678) के समय किले का काम पूरा हुआ था.
किले के आठ बड़े गेट या पोल हैं इनमें से एक गुप्त है और चार घुमावदार पहाड़ी सड़कों से जुड़े हुए हैं. जयपोल महाराजा मान सिंह ने 1806 में जयपुर और बीकानेर पर जीत के बाद बनवाया था. फ़तेहपोल महाराजा अजीत सिंह ने 1707 में मुग़लों को हराने के बाद बनवाया था.
किले के अंदर कई सुंदर महल हैं जैसे मोती महल, फूल महल, शीश महल. साथ ही दौलत खाना, सिलेह खाना, तोप खाना वगैरा भी हैं. बहुत बड़े भाग में म्यूजियम है जहां अपने समय के सुंदर और शानदार शाही कपड़े, फर्नीचर, कालीन, हथियार, पालकियां, हौदे आदि रखे गए हैं. किले के अंदर की ऊँचाई सात आठ माले के बराबर है. लिफ्ट का भी इन्तेजाम है और अंदर ही बहुत सुंदर दस्तकारी की दुकानें भी हैं. लिफ्ट और म्यूजियम के प्रवेश के लिए टिकट हैं.
भारत के प्राचीन किलों में सबसे सुंदर रख रखाव शायद इसी किले का है. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
मेहरानगढ़ जोधपुर - 2/3
शहर के बीच एक ऊँची पहाड़ी है जिसका पुराना नाम भोर चिरैय्या था. इस 125 मीटर ऊँची पहाड़ी पर एक किला है जिसका नाम मेहरानगढ़ है. इस किले की नींव राव जोधा द्वारा 12 मई 1459 को रखी गई थी. यह भीमकाय किला लगभग पांच वर्ग किमी में फैला हुआ है. इसकी ऊँची, चौड़ी और मज़बूत दीवारों की लम्बाई लगभग 10 किमी है. महाराजा जसवंत सिंह (1638 - 1678) के समय किले का काम पूरा हुआ था.
किले के आठ बड़े गेट या पोल हैं इनमें से एक गुप्त है और चार घुमावदार पहाड़ी सड़कों से ऐसे जुड़े हुए हैं की दूर से किले के गेट या पोल दिखते ही नहीं हैं. फ़तेहपोल महाराजा अजीत सिंह ने 1707 में मुग़लों को हराने के बाद बनवाया था जबकि जयपोल महाराजा मान सिंह ने 1806 में जयपुर और बीकानेर पर जीत की खुशी में बनवाया था.
किले के अंदर कई सुंदर महल हैं जैसे मोती महल, फूल महल, शीश महल. साथ ही दौलत खाना, सिलेह खाना, तोप खाना वगैरा भी हैं. बहुत बड़े भाग में म्यूजियम है जहां अपने समय के सुंदर और शानदार शाही कपड़े, फर्नीचर, कालीन, हथियार, पालकियां, हौदे आदि रखे गए हैं. किले के अंदर की ऊँचाई सात आठ माले के बराबर है. लिफ्ट का भी इन्तेजाम है और अंदर ही बहुत सुंदर दस्तकारी की दुकानें भी हैं. लिफ्ट और म्यूजियम के प्रवेश के लिए टिकट हैं.
किले की व्यवस्था और रख रखाव बहुत सुंदर है. कुछ फोटो प्रस्तुत हैं:
मेहरानगढ़ पर फोटो ब्लॉग का पहला भाग इस लिंक पर उपलब्ध है:
http://jogharshwardhan.blogspot.com/2017/06/1.html
मेहरानगढ़ जोधपुर - 3/3
शहर के बीच एक ऊँची पहाड़ी है जिसका पुराना नाम भोर चिरैय्या था. इस 125 मीटर ऊँची पहाड़ी पर एक किला है जिसका नाम मेहरानगढ़ है. इस किले की नींव राव जोधा द्वारा 12 मई 1459 को रखी गई थी. यह भीमकाय किला लगभग पांच वर्ग किमी में फैला हुआ है. इसकी ऊँची, चौड़ी और मज़बूत दीवारों की लम्बाई लगभग 10 किमी है. महाराजा जसवंत सिंह (1638 - 1678) के समय किले का काम पूरा हुआ था.
किले के आठ बड़े गेट या पोल हैं इनमें से एक गुप्त है और चार घुमावदार पहाड़ी सड़कों से ऐसे जुड़े हुए हैं की दूर से किले के गेट या पोल दिखते ही नहीं हैं. फ़तेहपोल महाराजा अजीत सिंह ने 1707 में मुग़लों को हराने के बाद बनवाया था जबकि जयपोल महाराजा मान सिंह ने 1806 में जयपुर और बीकानेर पर जीत की खुशी में बनवाया था.
किले के अंदर कई सुंदर महल हैं जैसे मोती महल, फूल महल, शीश महल. साथ ही दौलत खाना, सिलेह खाना, तोप खाना वगैरा भी हैं. बहुत बड़े भाग में म्यूजियम है जहां अपने समय के सुंदर और शानदार शाही कपड़े, फर्नीचर, कालीन, हथियार, पालकियां, हौदे आदि रखे गए हैं. किले के अंदर की ऊँचाई सात आठ माले के बराबर है. लिफ्ट का भी इन्तेजाम है और अंदर ही बहुत सुंदर दस्तकारी की दुकानें भी हैं. लिफ्ट और म्यूजियम के प्रवेश के लिए टिकट हैं.
किले की व्यवस्था और रख रखाव बहुत सुंदर है. कुछ फोटो प्रस्तुत हैं:
करणी माता मंदिर, बीकानेर
बीकानेर से देशनोक जाने के लिए सड़क अच्छी है और बसें, टैक्सी आसानी से उपलब्ध हैं. मंदिर की बड़ी मान्यता है इसलिए बहुत से भक्त और साधक आते जाते रहते हैं. रुकने के लिए मंदिर के आस पास धर्मशालाएं भी हैं. साल में दो बार नवरात्रों में यहाँ मेले भी लगते हैं.
सफ़ेद संगमरमर से बना मंदिर आकर्षक है और राजस्थानी / मुग़ल शैली में की गई नक्काशी बहुत सुंदर हैं. मंदिर का निर्माण कार्य बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने पंद्रहवीं शताब्दी में शुरू कराया था. मंदिर में चांदी के पत्रे वाले दरवाज़े हैं उन पर भी चूहे बने हुए हैं. मंदिर में चूहों के लिए चांदी की प्लेटें हैं जिनमें पीने के लिए दूध डाल दिया जाता है. मजेदार बात ये है कि मंदिर के बाहर चूहे नजर नहीं आते. मंदिर के चूहों को काबा कहा जाता है. प्लेग जैसी कोई दुर्घटना भी यहाँ कभी नहीं हुई जबकि ये चूहे प्रशाद में भी घुसे रहते हैं!
करणी माता को माँ जगदम्बा का अवतार माना जाता है. कहा जाता है की करणी माता के आशीर्वाद से बीकानेर और जोधपुर रजवाड़ों की स्थापना हुई. बीकानेर राजघराने की कुलदेवी भी करणी माता ही हैं.
करणी माता का जन्म 1387 में चारण राजपूत परिवार में हुआ और इनका बचपन का नाम रिघुबाई था. इनकी शादी दीपोजी चारण से हुई जबकि इनकी वैवाहिक जीवन में रूचि नहीं थी. इन्होनें अपनी छोटी बहन गुलाब की शादी अपने पति से करवा दी ताकि पति का वैवाहिक जीवन चलता रहे. दो साल ससुराली गाँव में रहने के बाद बंजारों का जीवन शुरू कर दिया. पशुओं और कुछ भक्तों के साथ जंगलों में चरवाहों की ज़िन्दगी व्यतीत करने लगी. पशु चराते चराते जहां रात हुई वहीं छावनी डाल दी जाती थी.
एक बार इनका काफिला जांगलू नामक गाँव में पहुंचा. इस इलाके का शासक राव कान्हा था. शासक के कारिंदों नें पानी पीने और पशुओं को पिलाने से मना कर दिया. करणी माता ने अपने एक अनुयायी राव रिदमल को वहां का शासक नियुक्त कर दिया. राव कान्हा और उनके सैनिकों ने करणी माता का विरोध किया और भला बुरा कहा. करणी माता ने एक रेखा खिंची और राव कान्हा से रेखा पार ना करने के लिया कहा. पर वो ना माना और वह परलोक सिधार गया.
सन 1453 में राव जोधा ने करणी माता के आशीर्वाद से अजमेर, मंडोर और मेड़ता के इलाकों को जीत लिया था. राव जोधा के बुलावे पे करणी माता ने जोधपुर किले का नींव पत्थर 1457 में रखा.
वैसे तो करणी माता का पहला मंदिर उनके जीवन काल में अमर चारण द्वारा 1472 में ही बना दिया गया था. इसी साल में करणी माता ने राव बिका ( जिन्होनें बीकानेर बसाया ) की शादी रंग कुंवर से करवा दी. रंग कुंवर राव शेखा की बेटी थी जो भाटियान राजपूत थे. ऐसा करने से बहुत देर से चली आ रही राठोड़ - भाटियान परिवारों की दुश्मनी समाप्त हो गई. 1485 में करणी माता ने बीकानेर किले का नींव पत्थर रखा.
मंदिर में चूहे होने का एक किस्सा आसपास के दुकानदारों ने बताया कि किसी लड़ाई में हार के कारण 20000 सैनिकों का एक जत्था मैदान छोड़ कर भाग कर करनी माता की शरण में आया. जंगी मैदान छोड़ने की सजा तो मौत थी और ये लोग बचना चाहते थे. करणी माता ने कहा कि बचना है तो चूहे बन कर रहना होगा. तभी से यहाँ चूहे घूम रहे हैं और मंदिर परिसर के बाहर नहीं दिखते हैं.
मार्च 1538 में करणी माता महाराजा जैसलमेर से मिलकर बीकानेर की ओर वापिस आ रही थीं. रास्ते में कोलायत तहसील के गडियाला गाँव के पास पानी पीने के लिए पड़ाव डाला गया. इस पड़ाव के बाद वे ज्योतिर्लीन हो गईं और फिर कभी देखी नहीं गईं. उस वक़्त उनकी उम्र 151 साल बताई जाती है. तब से ही लगातार उनकी पूजा अर्चना की जा रही है.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो :
थार की सड़कों पर - 2
पानी कम है इसलिए खेती कम है और इसलिए जनसँख्या भी कम है. सड़क पर मीलों तक कोई दिखाई नहीं पड़ता और गाँव भी बहुत दूर दूर हैं. उत्तर प्रदेश में हर पचास किमी पर शहर आ जाता है. केरल की ड्राइव और भी धीमी है क्यूंकि आबादी के साथ साथ पहाड़ी इलाका भी ज्यादा है. जबकि राजस्थान के इस रेगिस्तानी भाग में 250 - 300 किमी से पहले कोई बड़ी आबादी नहीं मिलती.
थार मरुस्थल के मुख्य शहर हैं झुंझनु, नागौर, बीकानेर, जैसलमेर और जोधपुर. सड़कें ज्यादातर अच्छी हैं और उनकी चौड़ाई बढ़ाई जा रही है. मुख्य हाईवे से अंदर गाँव की ओर जाने वाले रास्ते उतने अच्छे नहीं हैं. अपनी गाड़ी से जाएं तो हवा, तेल, पानी जरूर चेक कर लें. कुछ खाने का सामान और पीने का पानी साथ रखें क्यूंकि ढाबे बहुत दूर दूर मिलेंगे और हो सकता पानी खारा मिले. खाली सड़कों पर स्पीड जल्द ही 100 के पार हो जाती है पर गाय, भेड़, बकरी, नीलगाय और जंगली ऊँटों का ध्यान रखना होगा. जोधपुर और जैसलमेर के आसपास हिरन और चिंकारा भी नज़र आ जाते हैं.
हमने अपनी यात्रा नीचे दिए गए नक़्शे के मुताबिक 11 दिन में पूरी की. फोर्ड ईको डीज़ल गाड़ी इस्तेमाल की और कोई दिक्कत नहीं आई. सड़कों पर साइन बोर्ड काफी हैं और मोबाइल का GPS भी इस्तेमाल किया हालांकि कई जगह मोबाइल के सिग्नल नहीं आते. पूछने पर स्थानीय लोग प्यार से रास्ता और किले वगैरा की जानकारी दे देते हैं. अतिथि देवो भव: लागू है!
नीचे पेश की गई ज्यादातर फोटो चलती गाड़ी में से मोबाइल से ली गई हैं. इनमें कोई समय या विषय का क्रम नहीं है याने random हैं. जहां भी कोई चीज़ अच्छी लगी फोटो खींच ली. उम्मीद है पसंद आएंगी.
जैसलमेर की हवेलियाँ
पग कीजे पाषाण !
घोड़ा कीजे काठ का,
तब देखो जैसान !
ये पुरानी कहावत जैसलमेर की दशा बताती हैं. थार रेगिस्तान की भयंकर गर्मी या फिर कड़ाके की सर्दी और तेज़ धूल भरी हवाओं के थपेड़े यात्रियों को परेशान करते हैं. इसलिए यात्रियों को सलाह दी गई कि कपड़ों के बजाए लोहे का बख्तर पहन लें जो ना मैला हो और ना फटे, पैर पत्थर के बना लें जो तपती रेत में झुलसे नहीं और ना ही थकें, घोड़ा लकड़ी का ले लें जो ना कभी थके और ना पानी मांगे और तब जैस्सल राजा का स्थान देखने निकलें ! अब बख्तर और घोड़ा तो पुरानी बात हो गई पर आप जैसलमेर जाते समय अपनी गाड़ी का कूलैंट और ए.सी. जरूर चेक कर लें !
जैसलमेर शहर भाटी राजपूत महाराजा जैसल द्वारा 1178 में बसाया गया था. थार रेगिस्तान में बसा ये शहर जयपुर से लगभग 560 किमी दूर है और दिल्ली से 780 किमी. रेगिस्तान होने के कारण गर्मियों में तापमान 50 के नज़दीक पहुँच जाता है और सर्दियों में शून्य के नज़दीक पहुँच सकता है.
काफी लम्बे समय तक इराक, ईरान, अफगानिस्तान जैसे देशों से व्यापारी ऊँटों के कारवां लेकर चलते थे और जैसलमेर व्यापारियों का एक पड़ाव था. अफीम, सोने, चांदी, हीरे जवाहरात, सूखे मेवों वगैरा का व्यापार हुआ करता था. जैसलमेर के समृद्ध व्यापारियों ने अपने रहने के लिए सुंदर हवेलियाँ बना रखी थी. इन हवेलियों को अपने समय के सबसे सुंदर साजो सामान से सजाया जाता था. हर हवेली का डिजाईन, नक्काशी और रूप रंग अलग अलग था. तेज़ गर्मी और कड़ाके की ठण्ड को ध्यान में रखते हुए इनका निर्माण किया गया था. खम्बे, दरवाज़े, खिड़कियाँ, झरोखे सभी पर सुंदर और मनोहारी कारीगरी दिखाई पड़ती है. ज्यादातर स्थानीय हल्का पीला पत्थर इस्तेमाल किया जाता था. इसके अलावा मकराना का सफ़ेद संगमरमर और जोधपुर का हल्का गुलाबी बालू पत्थर भी काफी इस्तेमाल किया गया है.
दीवान नथमल की हवेली 1885 में बनी और अभी भी उनके वंशजों के पास ही है. पटवा हवेलियाँ 1805 में बनना शुरू हुई. सेठ घुम्मन चंद पटवा का ज़री याने ब्रोकेड का काम खूब चलता था. उन्होंने अपने पांच बेटों के लिए दस लाख रुपए की लागत से पांच हवेलियाँ बनवाई जो लगभग 50 सालों में बन कर तैयार हुईं. इन पांच हवेलियों में से पहली हवेली में संग्रहालय है और बाकी चार बंद पड़ी हैं. संग्रहालय में जाने के लिए टिकट लगता है और गाइड फीस देने पर उपलब्ध हैं. गाइड ने बताया की बंद हवेलियाँ सरकार ने ले ली हैं. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
* मंडावा की हवेलियाँ पर एक फोटो-ब्लॉग इस लिंक पर देख सकते हैं :
http://jogharshwardhan.blogspot.com/2017/01/blog-post_20.html
* रामपुरिया हवेलियाँ, बीकानेर पर एक फोटो-ब्लॉग इस लिंक पर देख सकते हैं :
जोधपुर
दिल्ली से जोधपुर की दूरी 600 किमी है और जयपुर से 340 किमी. जोधपुर रेल, सड़क औऱ हवाई रास्ते से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है. रेगिस्तान में होने के कारण गर्मी में तापमान 50 के नज़दीक पहुँच सकता है और सर्दी में एक दो डिग्री तक. बारिश 15 - 20 दिन ही होती है. बारह महीने तीख़ी और चटक धूप खिली रहती है जिसकी वजह से जोधपुर को सूर्य नगरी भी कहा जाता हैै. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो :
जसवंत थड़ा, जोधपुर
जसवंत थड़ा मेहरानगढ़ से 2 - 3 किमी दूर बाईं ओर एक बड़ी झील के किनारे है. मौसम अच्छा हो तो गढ़ से पैदल वर्ना ऑटो से जसवंत थड़ा पहुँचा जा सकता है. इस स्मारक की नींव 1900 में रखी गई और 1904 में रेजिडेंट गवर्नर ने थड़ा बनाने की मंज़ूरी दी थी. स्मारक सफ़ेद मकराना संगमरमर, लाल बालू पत्थर और गुलाबी रंग के पत्थर से मंदिर के रूप में बना हुआ है. आम तौर पर इसे जोधपुर का ताजमहल भी कहा जाता है. इस स्मारक का नक्शा मुंशी सुखलाल कायस्थ ने बनाया था और वास्तु कार थे बुद्धमल और रहीम बक्श. मंदिर के हॉल में पूर्व राजाओं और परिवार जनों की पेंटिंग्स लगी हुई हैं. इस स्मारक पर सितम्बर 1921 तक 2,84,678 रूपए की लागत आई थी. मंदिर की दीवार में कई सफ़ेद पत्थर इतने पतले लगाए गए हैं कि हॉल के अंदर में उजाला रहता है.
आम तौर पर स्मारक या पुराने मंदिरों में गाइड तरह तरह के किस्से कहानियां जरूर सुना देते हैं परन्तु स्मारक से जुड़े पूरे तथ्य कम ही बताते हैं. मसलन इमारत का क्षेत्रफल, लगाया गया पत्थर या लकड़ी, मूर्तिकार के नाम, कितना समय लगा वगैरा वगैरा. ऐसी जानकारी अगर प्रवेश टिकेट के पीछे छाप दें या अलग से किसी बोर्ड पर लिखवा दें तो स्मारक में और रूचि बढ़ जाए. पुरातत्व विभाग ऐसे प्रमाणिक तथ्य की जानकारी देना जरूरी कर दे तो अच्छा रहे. ज्यादातर ट्रस्ट ही इन जगहों को चलाते हैं. और बिना प्रशिक्षण के गाइड द्वारा दी गई जानकारी ही प्रमाणिक माननी पड़ती है.
स्मारक सुबह नौ से शाम पांच तक खुला रहता है. प्रवेश पर शुल्क है और कैमरा शुल्क देकर फोटो खिंची जा सकती हैं. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो.
भूत प्रेतों का गाँव - कुलधरा, जैसलमेर
यह किस्सा सुनकर तो कुलधरा देखने जाना जरूरी हो गया था. आने जाने के लिए जैसलमेर से सवारियां आसानी से मिल जाती हैं. हम तो अपनी ही गाड़ी में आधे घंटे में लगभग 11 बजे पहुँच गए थे. वहां दिन में ना तो कोई भूत मिला और ना ही किसी मिस या मिसेज़ चुड़ैल से बात हुई.
कुलधरा गाँव काफी बड़ा है और गाँव में मंदिर, कुएँ, तालाब, शमशान, स्मारक या देवली भी हैं. इन स्मारक पत्थरों पर अंकित लेखों के अनुसार दो निवासियों की मृत्यु 1235 और 1238 में हुई जिससे लगता है की गाँव 1200 या उस से भी पहले बस गया होगा. मंदिर विष्णु और महिषासुर मर्दिनी का है साथ ही कुछ घरों के प्रवेश द्वार पर गणेश की मूर्तियाँ भी मिली हैं. कुछ घरों में तहखाने भी मिले हैं जहां सम्भवता खज़ाना रखा जाता हो. यहाँ सोने की चिड़िया रहती थी उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है की महाराजा गज सिंह के समय 1820 और 1821 में 14 लाख रूपए के बराबर कैश या काइंड में टैक्स की वसूली हुई! दो दशक पहले कुछ लोग खजाने की खोज में खंडहरों में खुदाई करते पकड़े गए थे. तब से राज्य सरकार ने इस गाँव को कब्जे में कर लिया है.
इतिहासकारों का कहना है कि पाली जिले से आये ब्राह्मण व्यापारीयों ने कुलधरा गाँव बसाया था. कुलधरा के अतिरिक्त ऐसे 83 और गाँव थे जो पालीवालों द्वारा जैसलमेर के आसपास बसाए गए. इनमें से एक मशहूर और बड़ा गाँव है खाभा फोर्ट जिसके बारे में अगले ब्लॉग में चर्चा करेंगे. ये गाँव जैसलमेर में दूर दूर तक फैले हुए हैं और बड़े व्यवस्थित ढंग से बसाए गए थे. कुलधरा गाँव में 400 से ज्यादा मकान थे और गाँव से कुछ दूर 200 मकान अलग से बने हुए थे. मकान बड़े बड़े थे और उत्तर-दक्षिण जाने वाली गलियां लम्बी, चौड़ी और सीधी सीधी थी. पूर्व-पश्चिम वाली गलियां पतली और छोटी थीं याने लिंक और सर्विस लेन का काम करती थी. गाँव के दक्षिण में 2.5 किमी लंबा और 2 किमी चौड़ा तालाब या खड़ीन भी था. इसमें बारिश का पानी संचित किया जाता था. और उसके सूखने पर जवार या चने की फसल लगाई जाती थी.
कुलधरा और आसपास के इन गाँव वासियों का काम था मवेशी पालना, खेती करना, अनाज, नील, सोने और चांदी के जेवर, सिल्क, हाथी दांत और अफीम का व्यापार. ये व्यापार कराची, सिंध के रास्ते इरान, इराक, अफगानिस्तान से ऊँटों द्वारा हुआ करता था. इन गाँव से कर वसूली का काम जैसलमेर राज दरबार के दीवान सलीम सिंह ( या सालेम सिंह ) बड़ी सख्ती से किया करते थे इसलिए जनता ने उनका नाम ज़ालिम सिंह रख दिया था. सालेम सिंह की सात पत्नियाँ बताई जाती हैं पर फिर भी 1825 के शुरू में वसूली के दौरान एक पालीवाल ब्राह्मण कन्या उन्हें भा गई और गाँव प्रधान को हुक्म दिया गया की लड़की को शादी के लिए उनके पास पहुंचा दिया जाए. रात को पंचायत बैठी और फैसला हुआ की 84 गाँव के सभी पालीवाल तुरंत जैसलमेर राज छोड़ कर चले जाएं. रातों रात सारे गाँव खाली कर दिए गए.
इस कहानी का एक और मोड़ भी है की उस लड़की को मार दिया गया (?) और उसके खून से हर मकान के दरवाज़े पर तिलक लगा दिया गया. गाँव वालों ने जाते हुए श्राप दे दिया कि ये गाँव दुबारा नहीं बसेगा और वहां से निकल गए. यहाँ से निकल कर ये पालीवाल लोग मध्य प्रदेश, गुजरात के दूर दराज़ के इलाकों में चले गए. राजा ने बदनामी और वसूली के घाटे से बचने के लिए इन्हें वापिस लाने का प्रयास किया गया. 82 गाँव में कुछ परिवार आ भी गए परन्तु कुलधरा और खाभा में कोई वापिस नहीं आया. बताया जाता है की कुछ समय पहले सिंध, पकिस्तान से आये कुछ हिन्दुओं को यहाँ खाभा में बसाया गया है.
खाभा फोर्ट, जैसलमेर के बारे में इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है : http://jogharshwardhan.blogspot.com/2017/03/blog-post_11.html
कुछ इतिहासकारों का कहना है कि कुलधरा के दक्षिण में केकनी ( केकणी / काकनी / ककनी ) नाम की नदी थी थी जो धीरे धीरे सूखती गई और निवासियों का पलायन होता गया. संख्या घट जाने के बावजूद टैक्स वसूली में कमी नहीं की गई और सख्ती जारी रही इस कारण से लोग गाँव छोड़ कर चले गए ( वित्त मंत्री कृपया ध्यान दें!). पर इतने समृद्ध गाँव एक साथ खाली क्यूँ और कैसे हो गए कहना मुश्किल है. इतिहास की पहेली शायद अनबूझ ही रहेगी.
पर हर पर्यटक को ज़ालिम सिंह के अत्याचार और रातों रात गाँव का खाली होना कौतुहल और अचरज भरा लगता है और गाँव देखने की इच्छा भी होती है. इसीलिए देसी और फिरंगी पर्यटक काफी संख्या में खंडहर देखने आते हैं. सरकार ने कुलधरा को पर्यटन स्थल घोषित कर दिया है और गाँव को ठीक ठाक करवाने का काम जारी है. आसपास निजी रिसोर्ट वगैरा भी बन रहे हैं. प्रवेश शुल्क देकर सुबह से शाम तक खँडहर देखे जा सकते हैं पर रात को जाने पर मनाही है कौन जाने रात को भूत प्रेत घूमते रहते हों?
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
श्री तनोट माता मंदिर, जैसलमेर
भाटी राजपूत राजा केहर के पुत्र तन्नू राव तनोट माता के भक्त थे और उन्होंने विक्रमी सम्वत 828 याने सन 771 में मंदिर की स्थापना की थी. मंदिर का नाम और मान्यता 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद बहुत बढ़ गई. तब से तनोट मंदिर हर जैसलमेर आने वाले पर्यटक की लिस्ट में शामिल हो गया है.
इस मान्यता की कहानी कुछ इस प्रकार है कि 1965 में तनोट के तीन ओर से पाक सेना ने भारी आक्रमण किया. तनोट की सुरक्षा के लिए 13 ग्रेनेडियर की एक कंपनी और BSF की दो कम्पनियाँ थी जिसके मुकाबले दुश्मन की ब्रिगेड थी ( एक कम्पनी में आम तौर पर 100 से 300 जवान हो सकते हैं और एक ब्रिगेड में 1000 से 3000 तक ). कहा जाता है कि तनोट और उसके आसपास 3000 बम गिराए गए जिनमें से 20% तो फटे ही नहीं और ज्यादातर सुनसान रेगिस्तान की रेत में फटे जिससे जान माल का कोई नुक्सान नहीं हुआ. 450 गोले मंदिर परिसर में या आसपास गिरे पर फिर भी मंदिर का कोई नुकसान नहीं हुआ. इससे सैनिकों में और जोश भर गया और मनोबल ऊँचा हो गया. तीसरे दिन पस्त दुश्मन की बैरंग वापसी हो गई. 1965 के इस युद्ध के बाद मंदिर का इंतज़ाम BSF ने ले लिया.
1971 में तनोट से लगभग 50 किमी दूर लोंगेवाला में पकिस्तान ने टैंकों, बख्तर बंद गाड़ियों और एक पैदल ब्रिगेड लेकर दुबारा हमला किया. वहां भी मुकाबले पंजाब रेजिमेंट की 23 वीं बटालियन की केवल 120 जवानों की कम्पनी थी. इस कम्पनी और चार हंटर विमानों ने 36 टैंक और सैकड़ों गाड़ियां को तहस नहस कर दिया और दुश्मन तीसरे दिन वापसी पर मजबूर हो गया. लोंगोवाला स्मारक में दुश्मन के रेत में धंसे बर्बाद टैंक और गाड़ियाँ जस की तस देखी जा सकती हैं.
जैसलमेर से तनोट > लोंगेवाला > जैसलमेर सड़कें बढ़िया है और ट्रैफिक बहुत ही कम. अपनी गाड़ी हमने 100 से ऊपर खूब दौड़ाई हालांकि भेड़ बकरियों का ध्यान रखना पड़ता है. सुबह तनोट मंदिर जाकर लोंगेवाला स्मारक देखते हुए शाम तक जैसलमेर वापिस आया जा सकता है. बसें, जीपें और टैक्सी जैसलमेर में उपलब्ध हैं. मंदिर परिसर में चाय पानी की सुविधा भी है. पर रास्ते के लिए पानी जरूर रख लें. रेगिस्तानी धूप बड़ी तीखी होती है और वहां हवा भी बहुत तेज़ चलती है इसलिए धूप का चश्मा और सर ढके रखना जरूरी है. पूरे रास्ते में पीली रेत के टीले और छोटी छोटी झाड़ियाँ ही नज़र आती हैं. कहीं कहीं कोई चरवाहा भेड़ बकरियों के साथ दिख जाता है. हो सकता है की हिरन या सांभर दिख जाए पर ज्यादातर इलाका सुनसान बियाबान है.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
बड़ा बाग, जैसलमेर
जैसलमेर शहर भाटी राजपूत महारावल ( राजा याने रावल और महाराजा याने महारावल ) जैसल द्वारा 1178 में बसाया गया था. तब से लेकर जैसलमेर राज के भारत में विलय होने तक यहाँ महारावल जैसल के वंशजों का ही राज रहा है. यह भी एक रोचक तथ्य है की इस लम्बे समय के दौरान अरब, तुर्क, मुगल, फिरंगी या किसी पड़ोसी राज्य का जैसलमेर पर कभी कब्ज़ा नहीं हो पाया. हमलों के कारण सीमा रेखाएं जरूर बदलती रहीं.
शहर से 6 किमी दूर बड़ा बाग़ है जिसे महारावल जय सिंह, द्वितीय ने सोलहवीं शताब्दी में बनवाया था. कहा जाता है की आम जनता की राहत के लिए राजा ने पानी का तालाब बनवाया और आसपास बाग़ लगवाया. 21 सितम्बर 1743 को महाराजा जय सिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र ने पास वाली पहाड़ी पर पिता की याद में छतरी बनवा दी. उसके बाद राजघराने के कई लोगों की छतरियां या स्मारक या cenotaph यहाँ बनाए गए. गाइड द्वारा बताया गया कि इन छतरियों की कुछ विशेषताएं हैं:
- सभी छतरियां स्थानीय पीले पत्थर की बनी हुई हैं. जो छतरियां पिरामिड-नुमा हैं वो हिन्दू कारीगरों द्वारा बनाई गई हैं और गोल गुम्बद की तरह छतरियां मुस्लिम कारीगरों द्वारा बनाई गई हैं.
- हर छतरी के नीचे तीन चार फुटा एक खड़ा पत्थर लगा है जिस पर घोड़े पर बैठे हुए राजा की नक्काशी है और साथ ही संक्षिप्त जीवनी लिखी हुई है. राजा के पत्थर के साथ एक पत्थर पर पटरानियों और तीसरे पत्थर पर छोटी रानियों के बारे में लिखा हुआ है.
- पत्थर पर उकेरे चित्र पर अगर घोड़े के अगले दोनों पैर उठे हुए हैं तो राजा की मृत्यु युद्ध में हुई थी. अगर घोड़े का एक पैर उठा हुआ है तो राजा किसी युद्ध में घायल हुआ होगा और अगर घोड़े के चारों पैर धरती पर हैं तो जानिये की सामान्य मृत्यु हुई थी.
- अंतिम संस्कार के बाद पुत्र द्वारा एक चबूतरा बना दिया जाता है और पौत्र द्वारा छतरी बनाई जाती है. अगर शादी से पहले ही मृत्यु हो जाती है तो बिना छतरी का केवल चबूतरा ही रह जाता है.
- एक ही परिवार की छतरियों को साथ साथ बनाया गया है और आपस में जोड़ दिया गया है.
सुबह से शाम तक बड़ा बाग़ खुला रहता है. प्रवेश और कैमरे के लिए फीस लगती है. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
रामपुरिया हवेलियां, बीकानेर
इस पुराने शहर में बहुत सी हवेलियाँ हैं जैसे की रिखजी की हवेली, सम्पतलाला की हवेली, भैरों की हवेली वगैरा. 1925 की बनी भंवर निवास हवेली तो अब एक होटल है. परन्तु बीकानेर की हवेलियों में से रामपुरिया हवेलियों का बड़ा नाम है. इस समूह की हवेलियों में छोटी बड़ी कई हवेलियां हैं और ये सभी लाल पत्थर की बनी हुई हैं. ये हवेलियां 100 से लेकर 400 साल तक पुरानी हैं और चित्रकारी से भरपूर हैं. पुरानी हवेलियों के वास्तुकार थे बालूजी चलवा. प्रसिद्ध लेखक, दार्शनिक अल्डस हक्सले - Aldous Huxley भी यहाँ आये थे और उन्होंने रामपुरिया हवेलियों को बीकानेर की शान कहा था.
ड्योढ़ी, झरोखे, छज्जे, कंगूरे, छतें और दीवारें सभी पर सुंदर नक्काशी है. लकड़ी के दरवाज़े, खिड़कियाँ भी कलाकारी से भरपूर हैं. कुछ चित्र प्रस्तुत हैं :
भांडा शाह जैन मंदिर, बीकानेर
यह जैन मंदिर भांडासर मंदिर के नाम से ज्यादा प्रचलित है. इस मंदिर के शिल्पी थे गोदा. इसमें लाल बालू पत्थर और सफ़ेद संगमरमर का इस्तेमाल किया गया है. मंदिर के फर्श, छत, खम्बे और दीवारें मूर्तियों और चित्रकारी से सजे हुए हैं. ऐसा लगता है कि चित्रकारी बाद में की गई है. ऐसा कहा जाता है की मंदिर के निर्माण में पानी की जगह 40,000 किलो घी का इस्तेमाल किया गया था.
मंदिर अब एक राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक है पर यहाँ कोई गाइड उपलब्ध नहीं था. इसलिए अंदर के चित्रों और मूर्तियों से जुड़ी कहानियों की जानकारी नहीं मिल पाई. मंदिर दिन में खुला रहता है और कोई टिकट नहीं है. फोटो खींचने की मनाही भी नहीं है. मंदिर की स्थापना से अब तक पूजा अर्चना जारी है. मंदिर परिसर बड़ा तो नहीं है पर बहुत साफ़ सुथरा है. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
थार की सड़कों पर - 1
पानी कम है इसलिए खेती कम है और इसलिए जनसँख्या भी कम है. सड़क पर मीलों तक कोई दिखाई नहीं पड़ता और गाँव भी बहुत दूर दूर हैं. उत्तर प्रदेश में हर पचास किमी पर शहर आ जाता है. केरल में भी ड्राइव धीमी है क्यूंकि आबादी के साथ साथ पहाड़ी इलाका भी ज्यादा है. जबकि राजस्थान के इस रेगिस्तानी भाग में 250 - 300 किमी से पहले कोई बड़ी आबादी नहीं मिलती.
थार मरुस्थल के मुख्य शहर हैं झुंझनु, नागौर, बीकानेर, जैसलमेर और जोधपुर. सड़कें ज्यादातर अच्छी हैं और उनकी चौड़ाई बढ़ाई जा रही है. मुख्य हाईवे से अंदर गाँव की ओर जाने वाले रास्ते उतने अच्छे नहीं हैं. अपनी गाड़ी फिट रखें और गाड़ी का हवा, तेल, पानी जरूर चेक कर लें. कुछ खाने का सामान और पीने का पानी साथ रख लें क्यूंकि ढाबे बहुत दूर दूर मिलेंगे और हो सकता पानी खारा मिले. खाली सड़कों पर गाड़ी की स्पीड जल्द ही 100 के पार हो जाती है पर गाय, भेड़, बकरी, नीलगाय और जंगली ऊँटों का ध्यान रखना होगा. जोधपुर और जैसलमेर के आसपास हिरन और चिंकारा भी नज़र आ जाते हैं.
हमने अपनी यात्रा नीचे दिए गए नक़्शे के मुताबिक 11 दिन में पूरी की. फोर्ड ईको डीज़ल गाड़ी इस्तेमाल की और कोई दिक्कत नहीं आई. सड़कों पर साइन बोर्ड काफी हैं और मोबाइल का gps भी इस्तेमाल किया हालांकि कई जगह सिग्नल नहीं आते. पूछने पर स्थानीय लोग प्यार से रास्ता और किले वगैरा की जानकारी दे देते हैं. अतिथि देवो भव: यहाँ पूरी तरह लागू है!
यहाँ दी गई ज्यादातर फोटो चलती गाड़ी में से मोबाइल से ली गई हैं. इनमें कोई समय या विषय का क्रम नहीं है याने random हैं. जहां भी कोई चीज़ अच्छी लगी फोटो खींच ली. उम्मीद है पसंद आएंगी.
दो कूबड़ वाले ऊंट
दो कुब्बे ऊंट को जीव विज्ञान में camelus bactrianus कहते हैं और आम भाषा में बैक्ट्रियन ऊंट कहते हैं. यह लगभग 40 - 50 साल तक जीता है. वयस्क ऊंट की कूबड़ तक की ऊंचाई दो मीटर से ऊपर भी जा सकती है. सिर्फ कूबड़ ही 30 इंच तक का हो जाता है. इसका वजन सात सौ से लेकर एक हजार किलो तक हो सकता है. रेगिस्तान का ये जहाज 60 - 65 किमी प्रति घंटे की दौड़ भी लगा लेता है. सामान्यत: इस की चाल 30 - 35 किमी प्रति घंटे की रहती है.
नुब्रा घाटी लगभग 10,000 फीट की ऊंचाई पर लद्दाख में स्थित है. घाटी में पहुँचाने के लिए लेह से खार्दुन्ग-ला होते हुए जाया जा सकता है. घाटी के मुख्य स्थान या बड़े गाँव हैं डिस्किट और हुन्डर. डिस्किट लेह से 150 किमी दूरी पर है. यहाँ शयोक नदी और नुब्रा नदी की घाटियाँ हैं. हुन्डर के आस पास रेत के बड़े बड़े टीले हैं. घाटी में नदी के किनारों पर हरियाली है जहां ये दो कुब्बे ऊंट चरते हुए देखे जा सकते हैं.
कुछ तस्वीरें मुकुल वर्धन के सौजन्य से :
पुष्कर
पुष्कर एक ऐतिहासिक जगह है जिस से बहुत सी कथाएँ जुड़ी हैं:
- भगवान शिव ने अपनी पत्नी सती के देहांत पर इतने आंसू बहाए की दो झीलें बन गईं पुष्कर और कटास( जो अब जिला चकवाल, पाकिस्तान में है ),
- भगवान ब्रह्मा ने महायज्ञ के लिए पुष्कर को चुना. आहुति के समय उनकी पत्नी सावित्री उपस्थित नहीं हुई तो उन्होंने स्थानीय गुर्जर कन्या गायत्री से विवाह करके यज्ञ पूरा किया. इसपर सावित्री ने गुस्से में श्राप दे दिया कि ब्रह्मा की पूजा केवल पुष्कर में ही होगी और कहीं नहीं.
- पांडवों ने कुछ समय यहाँ बिताया था. सुभद्रा हरण के बाद अर्जुन ने यहीं कुछ समय विश्राम किया था.
- गौतम बुद्ध ने यहाँ दीक्षा दी थी,
- अगस्त्य, जमदाग्नि, वामदेव और भृतहरि मुनियों ने यहाँ तपस्या की थी. पाराशर ऋषि का जन्मस्थान भी यहीं है.
- सरस्वती नदी पुष्कर के आसपास ही लुप्त हो गई थी.
- औरंगजेब के समय बहुत से मंदिरों को गिरा दिया गया जो धीरे धीरे फिर से बनाए गए.
- 1705 में गुरु गोबिंद सिंह ने यहाँ गुरु ग्रन्थ साहिब का पाठ किया.
- 1911 में महिलाओं के लिए अलग घाट बनवाया गया.
- महांत्मा गाँधी की अस्थियां भी यहाँ प्रवाहित की गईं थी .
वर्तमान में यहाँ तीर्थ यात्रियों के अलावा फिरंगी सैलानी भी बहुत आते हैं. शायद यहाँ का शांत वातावरण और दोस्ताना माहौल काफी पसंद आता होगा. इसीलिए कॉफ़ी से लेकर पिज़्ज़ा तक यहाँ सभी कुछ मिल जाता है.
पुष्कर पहुँचने के लिए सड़कें अच्छी हैं. रेल अजमेर तक और हवाई सुविधा जयपुर तक उपलब्ध है. यहाँ का मशहूर मेला है - पुष्कर पशु मेला जो विश्व के सबसे बड़े मेलों में से एक है. यह अक्टूबर-नवम्बर में पांच दिन लगता है. सैर सपाटे के लिए अक्टूबर से मार्च का समय अच्छा है.
पुष्कर का मुख्य बाज़ार झील के साथ साथ चलती सड़क पर है. बाज़ार में पूजा पाठ सम्बंधित सामान ज्यादा है. वैसे तो पुष्कर 2 - 4 घंटों में पैदल देखा जा सकता है. पर रुकना हो तो धर्मशालाएं और होटल उपलब्ध हैं.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
जैसलमेर वार म्यूजियम
जैसलमेर जिले की सीमा पाकिस्तान से मिली हुई है. यहाँ लोंगेवाला में 4 दिसम्बर 1971 की रात में पाकिस्तान ने 2000 सैनिक, 45 टैंक और 500 गाड़ियों लेकर आक्रमण किया. और मुकाबले में थे 120 जवान, M-40 तोप से लैस एक जीप, 4 हंटर लड़ाकू विमान और एक कृषक विमान. तीन दिन तक चले युद्ध के नुकसान का स्कोर - भारत : 2 जवान शहीद और एक एंटी-टैंक गन नष्ट, पाकिस्तान : 179 सैनिक मारे गए, 37 टैंक और 100 से ज्यादा गाड़ियां नाकारा. इन्हीं में से टैंक, रिकवरी ट्रक और कुछ हथियार म्यूजियम में रखे हुए हैं.
इस म्यूजियम का उद्घाटन 20 अगस्त 2015 को ले.जन. अशोक सिंह GOC-in-C, दक्षिणी कमान ने किया. यहाँ दो बड़े हाल हैं - इंडियन आर्मी हाल जिनमें सेना के ऐतिहासिक फ़ोटो, सैनिकों की वर्दियां और हथियार वगैरा प्रदर्शित किये गए हैं और दूसरा है लोंगेवाला हॉल जिसमें दिसम्बर 1971 के युद्ध की फोटो और इस्तेमाल किये गए कुछ हथियार भी रखे हुए हैं. एक दीवार है 'वेलोर वाल' जिस पर काले पत्थर पर सुनहरे अक्षरों में सम्मानित वीरों के नाम है. इसके आलावा एक छोटे से थिएटर में फिल्म दिखाने की व्यवस्था है, सुवेनिर शॉप और कैफ़े भी है. म्यूजियम सुबह 9 बजे से शाम 7 बजे तक रोज़ खुला रहता है.
जैसलमेर से आते जाते जरूर रुकें और जानकारी बढ़ाएं. शहर से म्यूजियम केवल 10 किमी दूर है. देख कर मज़ा भी आता है और दिल में जोश भर जाता है. जयहिन्द !
मंडावा की हवेलियाँ
झुंझनु और सीकर जिले किसी समय शेखावटी राज का हिस्सा थे जिसे राव शेखा ( जन्म 1433 निधन 1488) ने बसाया था. इन हवेलियों को शेखावटी हवेलियाँ भी कहा जाता है. ज्यादातर हवेलियाँ 100 से 300 साल तक पुरानी हैं. कुछ तो बहुत ही खस्ता हालत में हैं, कुछ में हवेलीदार खुद रहते हैं और कुछ को ठीक ठाक करा के होटल में बदल दिया गया है. देसी सैलानियों के अलावा फिरंगी भी यहाँ काफी आते हैं.
इन हवेलियों के मालिक ज्यादातर धनी व्यापारी थे. झुंझनू, सीकर, बीकानेर, जैसलमेर और जोधपुर अंतर्राष्ट्रीय व्यापारियों के पड़ाव थे. ऊँटों के कारवां कराची, पेशावर और काबुल वगैरा से सोना, चांदी, हीरे जवाहरात, सिल्क, अफीम वगैरा लाते ले जाते थे. 1850 के आसपास कारवां घटने लग गए और व्यापर पानी के जहाजों से होने लग गया था. स्थानीय मारवाड़ी व्यापारी कलकत्ता, मुंबई और चेन्नई बंदरगाहों की तरफ निकल गए. हवेलियाँ धीरे धीरे खाली हो गईं.
झुंझनू जिले की सड़कें बहुत अच्छी हालत में नहीं हैं और हैं भी दो लेन की. आसपास का इलाका ज्यादा विकसित नहीं है. सड़कों पर अक्सर मवेशी घुमते नज़र आ जाते हैं. यदाकदा नीलगाय या जंगली ऊंट भी रास्ता काट सकता है इसलिए गाड़ी सावधानी से चलानी होगी.
वैसे तो मंडावा एक ही दिन में देखा जा सकता है पर अगर रुकना हो तो हवेली में ठहरने की जगह मिल सकती है. अक्टूबर से मार्च तक का समय घूमने के लिए अच्छा है.
दीवारों और छतों पर सुंदर चित्रकारी मेहनत का काम है इसलिए चित्रकारों की दाद देनी होगी. साथ ही पक्के और चटक रंगों का चुनाव भी शानदार है जो दशकों तक टिका रहता है.
प्रस्तुत हैं कुछ चित्र :
अमर सागर जैन मंदिर, लौद्रवा, जैसलमेर
जैसलमेर और लौद्रवा के बीच में एक बहुत ही सुंदर मंदिर है जो जैसलमेर के पटवा सेठ हिम्मत मल बाफना ने 1871 में बनवाया था. बाफना समाज के इतिहास कुछ इस तरह से बताया जाता है: परमार राजा पृथ्वीपाल के वशंज राजा जोबनपाल और राजकुमार सच्चीपाल ने कई युद्ध जीते जिसका श्रेय उन्होंने 'बहुफणा पार्श्वनाथ शत्रुंजय महा मन्त्र' के लगातार उच्चारण को दिया. युद्ध जीतने के बाद उन्होंने जैन आचार्य दत्तसुरी जी से जैन धर्म की दीक्षा ली. उसके बाद से वे बहुफणा कहलाने लगे. कालान्तर में बहुफणा, बहुफना, बाफना या बापना में बदल गया. बाफना समाज की कुलदेवी ओसियां की सच्चीय माता हैं. इसीलिए इनके मंदिरों में जैन तीर्थंकर के अतिरिक्त हिन्दू मूर्तियाँ भी स्थापित की जाती हैं.
मंदिर में ज्यादातर जैसलमेर का पीला पत्थर इस्तेमाल किया गया है. पर साथ ही सफ़ेद संगमरमर और हल्का गुलाबी जोधपुरी पत्थर भी कहीं कहीं इस्तेमाल किया गया है. मंदिर के स्तम्भ, झऱोखे और छतों पर कमाल की नक्काशी है.
जैसलमेर से मंदिर तक आने जाने के लिए आसानी से वाहन मिल जाते हैं. प्रवेश के लिए शुल्क है और कैमरा शुल्क देकर फोटो भी ली जा सकती हैं. मंदिर सुबह से शाम तक खुला रहता है. यहाँ की रेगिस्तानी धूप बहुत तीख़ी है और हवा बहुत तेज़ जिसकी वजह से यहाँ सभी सिर ढक कर रखते हैं आप भी अपना ध्यान रखें. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
Long drive to Delhi: 43 चित्तौड़गढ़ से
चित्तौड़गढ़ की अधिक जानकारी और चित्रों के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें:
http://jogharshwardhan.blogspot.com/2015/01/long-drive-to-delhi-41-chittorgarh.html
Long drive to Delhi - 42 : Chittorgarh, Rajasthan
Folk lore mentions that Bhim started building the fort during Mahabharat. He was a disciple of sage here. Once out of impatience & anger he hit the ground hard & water sprang up to form a reservoir which is named Bhim-Lat.
Two video recordings on BlackBerry are placed below.
Long drive to Delhi : 41 - Towards Chittorgarh, Rajasthan
We passed through Dungarpur district which looked pretty green after monsoon showers. Hot & bright sun made interesting combo with green hills. Some snaps taken while moving towards Chittorgarh are here:
जैन मंदिर, लौद्रवा, जैसलमेर
लौद्रवा को लुद्र्वा या लुद्रावा भी कहते हैं. हज़ार बारह सौ साल पहले जब ईरान, इराक, अफगानिस्तान से व्यापारी ऊँटों के कारवां लेकर चलते थे उस वक़्त लौद्रवा व्यापारियों का एक छोटा सा पड़ाव था. यहाँ लोधुरवा राजपूतों का निवास था. नौवीं सदी में भाटी राजपूत देवराज ने लौद्रवा पर कब्जा कर लिया और इसे राजधानी बनाया.
व्यापारी कारवाँ का पड़ाव होने के कारण यह क्षेत्र समृद्ध था. इसी कारण यहाँ लूटपाट और हमले भी होते रहते थे. 1025 में महमूद ग़ज़नवी ने लौद्रवा की घेरा बंदी की और दूसरा बड़ा हमला 1152 में मोहम्मद गौरी ने किया. इन हमलों में मंदिर और शहर का जान माल का भारी नुक्सान हुआ. सुरक्षा को मद्दे नज़र रखते हुए महाराजा जैसल ने 1178 में राजधानी को लौद्रवा से हटा कर नई राजधानी जैसलमेर में बना दी.
हमलों में बर्बाद हुए मंदिरों को एक व्यापारी थारू शाह ने 1615 में दुबारा बनवाना शुरू किया. समय समय पर मंदिर का काम होता रहा और 1970 में इन्हें पूर्ण सुन्दरता के साथ पुनः स्थापित कर दिया गया. मंदिर में ज्यादातर स्थानीय पीला पत्थर इस्तेमाल किया गया है. पर साथ ही जोधपुर से लाया गया हल्का गुलाबी और मकराना का सफ़ेद संगमरमर भी इस्तेमाल किया गया है. मंदिर की जगती, स्तम्भ, तोरण, झरोखे और पत्थर की जालियों पर कमाल की और मनमोहक कारीगरी है.
मंदिर दिन भरे खुले रहते हैं और फीस देकर कैमरा इस्तेमाल किया जा सकता है. पास में ही जैन सात्विक भोजनालय है जहाँ संध्या से पहले कूपन पर भोजन उपलब्ध हो जाता है. जैसलमेर से आने जाने के लिए जीप और टैक्सी आसानी से मिल जाती हैं. पर थार रेगिस्तान के इस इलाके में तीख़ी धूप और तेज़ हवाएं चलती हैं ध्यान रखें. कुछ फोटो प्रस्तुत हैं:
खाभा फोर्ट, जैसलमेर
इन गाँव से टैक्स वसूली का काम जैसलमेर राज दरबार के दीवान किया करते थे. 1825 में जैसलमेर के दीवान सालेम सिंह थे जो अपनी सख्ती के कारण ज़ालिम सिंह कहलाते थे. सालेम सिंह की सात पत्नियाँ बताई जाती हैं पर फिर भी वसूली के दौरान कुलधरा के एक पालीवाल ब्राह्मण की कन्या उन्हें भा गई और गाँव प्रधान को हुक्म दिया गया की लड़की को शादी के लिए तैयार कर लें. रात को पंचायत बैठी और फैसला हुआ की 84 गाँव के सभी निवासी तुरंत जैसलमेर राज छोड़ कर चले जाएं. रातों रात सारे 84 गाँव खाली कर दिए गए.
परन्तु बाद में बदनामी और वसूली के घाटे से बचने के लिए इन्हें वापिस लाने का प्रयास किया गया. 82 गाँव में कुछ परिवार आ भी गए परन्तु कुलधरा और खाभा में कोई वापिस नहीं आया. बताया जाता है की कुछ समय पहले सिंध, पकिस्तान से आये कुछ हिन्दुओं को यहाँ बसाया गया है. बहरहाल आजकल खाभा गाँव की आबादी लगभग 300 है.
कुछ इतिहासकारों का कहना है कि पानी की कमी के कारण निवासियों का पलायन होता गया. जनसंख्या घट जाने के बावजूद टैक्स वसूली में कमी नहीं की गई जिसके कारण लोग गाँव छोड़ कर चले गए. पर इतने समृद्ध गाँव एक साथ खाली क्यूँ और कैसे हो गए यह एक पहेली है.
पर हर पर्यटक को राज दरबार के दीवान के अत्याचार और रातों रात गाँव का खाली होना कौतुहल और अचरज भरा लगता है और गाँव देखने की इच्छा भी होती है. इसीलिए देशी विदेशी पर्यटक काफी संख्या में कुलधरा और खाभा के खंडहर देखने आते हैं. कुलधरा से सम्बन्धित किस्सा इस लिंक पर देखा जा सकता है:
http://jogharshwardhan.blogspot.com/2017/03/blog-post.html भूत प्रेतों का गाँव - कुलधरा, जैसलमेर
खाभा आने जाने के लिए जैसलमेर से सवारी आसानी से मिल जाती है. धूप यहाँ बड़ी तीखी होती है और हवा लगातार बहुत तेज़ चलती है. साथ ही खाने पीने की असुविधा है इसलिये इंतज़ाम कर के चलें. किला सुबह से शाम तक खुला है और प्रवेश शुल्क देकर देखा जा सकता है. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
भूत प्रेतों का गाँव - कुलधरा, जैसलमेर
यह किस्सा सुनकर तो कुलधरा देखने जाना जरूरी हो गया था. आने जाने के लिए जैसलमेर से सवारियां आसानी से मिल जाती हैं. हम तो अपनी ही गाड़ी में आधे घंटे में लगभग 11 बजे पहुँच गए थे. वहां दिन में ना तो कोई भूत मिला और ना ही किसी मिस या मिसेज़ चुड़ैल से बात हुई.
कुलधरा गाँव काफी बड़ा है और गाँव में मंदिर, कुएँ, तालाब, शमशान, स्मारक या देवली भी हैं. इन स्मारक पत्थरों पर अंकित लेखों के अनुसार दो निवासियों की मृत्यु 1235 और 1238 में हुई जिससे लगता है की गाँव 1200 या उस से भी पहले बस गया होगा. मंदिर विष्णु और महिषासुर मर्दिनी का है साथ ही कुछ घरों के प्रवेश द्वार पर गणेश की मूर्तियाँ भी मिली हैं. कुछ घरों में तहखाने भी मिले हैं जहां सम्भवता खज़ाना रखा जाता हो. यहाँ सोने की चिड़िया रहती थी उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है की महाराजा गज सिंह के समय 1820 और 1821 में 14 लाख रूपए के बराबर कैश या काइंड में टैक्स की वसूली हुई! दो दशक पहले कुछ लोग खजाने की खोज में खंडहरों में खुदाई करते पकड़े गए थे. तब से राज्य सरकार ने इस गाँव को कब्जे में कर लिया है.
इतिहासकारों का कहना है कि पाली जिले से आये ब्राह्मण व्यापारीयों ने कुलधरा गाँव बसाया था. कुलधरा के अतिरिक्त ऐसे 83 और गाँव थे जो पालीवालों द्वारा जैसलमेर के आसपास बसाए गए. इनमें से एक मशहूर और बड़ा गाँव है खाभा फोर्ट जिसके बारे में अगले ब्लॉग में चर्चा करेंगे. ये गाँव जैसलमेर में दूर दूर तक फैले हुए हैं और बड़े व्यवस्थित ढंग से बसाए गए थे. कुलधरा गाँव में 400 से ज्यादा मकान थे और गाँव से कुछ दूर 200 मकान अलग से बने हुए थे. मकान बड़े बड़े थे और उत्तर-दक्षिण जाने वाली गलियां लम्बी, चौड़ी और सीधी सीधी थी. पूर्व-पश्चिम वाली गलियां पतली और छोटी थीं याने लिंक और सर्विस लेन का काम करती थी. गाँव के दक्षिण में 2.5 किमी लंबा और 2 किमी चौड़ा तालाब या खड़ीन भी था. इसमें बारिश का पानी संचित किया जाता था. और उसके सूखने पर जवार या चने की फसल लगाई जाती थी.
कुलधरा और आसपास के इन गाँव वासियों का काम था मवेशी पालना, खेती करना, अनाज, नील, सोने और चांदी के जेवर, सिल्क, हाथी दांत और अफीम का व्यापार. ये व्यापार कराची, सिंध के रास्ते इरान, इराक, अफगानिस्तान से ऊँटों द्वारा हुआ करता था. इन गाँव से कर वसूली का काम जैसलमेर राज दरबार के दीवान सलीम सिंह ( या सालेम सिंह ) बड़ी सख्ती से किया करते थे इसलिए जनता ने उनका नाम ज़ालिम सिंह रख दिया था. सालेम सिंह की सात पत्नियाँ बताई जाती हैं पर फिर भी 1825 के शुरू में वसूली के दौरान एक पालीवाल ब्राह्मण कन्या उन्हें भा गई और गाँव प्रधान को हुक्म दिया गया की लड़की को शादी के लिए उनके पास पहुंचा दिया जाए. रात को पंचायत बैठी और फैसला हुआ की 84 गाँव के सभी पालीवाल तुरंत जैसलमेर राज छोड़ कर चले जाएं. रातों रात सारे गाँव खाली कर दिए गए.
इस कहानी का एक और मोड़ भी है की उस लड़की को मार दिया गया (?) और उसके खून से हर मकान के दरवाज़े पर तिलक लगा दिया गया. गाँव वालों ने जाते हुए श्राप दे दिया कि ये गाँव दुबारा नहीं बसेगा और वहां से निकल गए. यहाँ से निकल कर ये पालीवाल लोग मध्य प्रदेश, गुजरात के दूर दराज़ के इलाकों में चले गए. राजा ने बदनामी और वसूली के घाटे से बचने के लिए इन्हें वापिस लाने का प्रयास किया गया. 82 गाँव में कुछ परिवार आ भी गए परन्तु कुलधरा और खाभा में कोई वापिस नहीं आया. बताया जाता है की कुछ समय पहले सिंध, पकिस्तान से आये कुछ हिन्दुओं को यहाँ खाभा में बसाया गया है.
खाभा फोर्ट, जैसलमेर के बारे में इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है : http://jogharshwardhan.blogspot.com/2017/03/blog-post_11.html
कुछ इतिहासकारों का कहना है कि कुलधरा के दक्षिण में केकनी ( केकणी / काकनी / ककनी ) नाम की नदी थी थी जो धीरे धीरे सूखती गई और निवासियों का पलायन होता गया. संख्या घट जाने के बावजूद टैक्स वसूली में कमी नहीं की गई और सख्ती जारी रही इस कारण से लोग गाँव छोड़ कर चले गए ( वित्त मंत्री कृपया ध्यान दें!). पर इतने समृद्ध गाँव एक साथ खाली क्यूँ और कैसे हो गए कहना मुश्किल है. इतिहास की पहेली शायद अनबूझ ही रहेगी.
पर हर पर्यटक को ज़ालिम सिंह के अत्याचार और रातों रात गाँव का खाली होना कौतुहल और अचरज भरा लगता है और गाँव देखने की इच्छा भी होती है. इसीलिए देसी और फिरंगी पर्यटक काफी संख्या में खंडहर देखने आते हैं. सरकार ने कुलधरा को पर्यटन स्थल घोषित कर दिया है और गाँव को ठीक ठाक करवाने का काम जारी है. आसपास निजी रिसोर्ट वगैरा भी बन रहे हैं. प्रवेश शुल्क देकर सुबह से शाम तक खँडहर देखे जा सकते हैं पर रात को जाने पर मनाही है कौन जाने रात को भूत प्रेत घूमते रहते हों?
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
झूले लाल मंदिर, जयपुर
चैत्र याने अप्रैल 1007 में झूले लाल ने नसरपुर, सिंध प्रदेश में जन्म लिया. उनकी माता का नाम देवकी और पिता का नाम रतन राय था. बालक का नाम उदेरो लाल रखा गया. झूले में ही बालक ने विलक्षण प्रतिभा दिखाई इसलिए बाद में झूले लाल या लाल साईं कहलाए. उनके अन्य नाम हैं - घोड़ेवारो, पल्लेवारो, ज्योतिवारो और अमर लाल. मुस्लिम भक्तों की ओर से नाम है पीर जिन्दाह.
बालक उदेरो की चर्चा शाह के दरबार में भी पहुंची और बालक को तलब किया गया. शाह के दरबार में सिपाहियों ने उदेरो को पकड़ने की बड़ी कोशिश की पर बालक हाथ ना आया. शाह ने चमत्कार देख बालक उदेरो से माफ़ी मांगी और सभी लोगों से अच्छा व्यवहार करने का वादा किया.
भगवान झूले लाल का अवतरण दिवस 'चेती चंड' के रूप में मनाया जाता है. इस दिन झूले लाल जी के सम्मान में शोभा यात्रा निकली जाती है, भजन गाए जाते हैं और लोक नृत्य भी होते हैं. भगवान झूले लाल का वाहन मछली है जो ताजे पानी की 'पालो' मछली है और सिन्धु नदी में पाई जाती है.
झूले लाल जी मंदिर, जयपुर की कुछ फोटो:
जसवंत थड़ा, जोधपुर
जसवंत थड़ा मेहरानगढ़ से 2 - 3 किमी दूर बाईं ओर एक बड़ी झील के किनारे है. मौसम अच्छा हो तो गढ़ से पैदल वर्ना ऑटो से जसवंत थड़ा पहुँचा जा सकता है. इस स्मारक की नींव 1900 में रखी गई और 1904 में रेजिडेंट गवर्नर ने थड़ा बनाने की मंज़ूरी दी थी. स्मारक सफ़ेद मकराना संगमरमर, लाल बालू पत्थर और गुलाबी रंग के पत्थर से मंदिर के रूप में बना हुआ है. आम तौर पर इसे जोधपुर का ताजमहल भी कहा जाता है. इस स्मारक का नक्शा मुंशी सुखलाल कायस्थ ने बनाया था और वास्तु कार थे बुद्धमल और रहीम बक्श. मंदिर के हॉल में पूर्व राजाओं और परिवार जनों की पेंटिंग्स लगी हुई हैं. इस स्मारक पर सितम्बर 1921 तक 2,84,678 रूपए की लागत आई थी. मंदिर की दीवार में कई सफ़ेद पत्थर इतने पतले लगाए गए हैं कि हॉल के अंदर में उजाला रहता है.
आम तौर पर स्मारक या पुराने मंदिरों में गाइड तरह तरह के किस्से कहानियां जरूर सुना देते हैं परन्तु स्मारक से जुड़े पूरे तथ्य कम ही बताते हैं. मसलन इमारत का क्षेत्रफल, लगाया गया पत्थर या लकड़ी, मूर्तिकार के नाम, कितना समय लगा वगैरा वगैरा. ऐसी जानकारी अगर प्रवेश टिकेट के पीछे छाप दें या अलग से किसी बोर्ड पर लिखवा दें तो स्मारक में और रूचि बढ़ जाए. पुरातत्व विभाग ऐसे प्रमाणिक तथ्य की जानकारी देना जरूरी कर दे तो अच्छा रहे. ज्यादातर ट्रस्ट ही इन जगहों को चलाते हैं. और बिना प्रशिक्षण के गाइड द्वारा दी गई जानकारी ही प्रमाणिक माननी पड़ती है.
स्मारक सुबह नौ से शाम पांच तक खुला रहता है. प्रवेश पर शुल्क है और कैमरा शुल्क देकर फोटो खिंची जा सकती हैं. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो.
लोंगेवाला युद्ध और स्मारक
श्री तनोट माता मंदिर, जैसलमेर युद्ध स्मारक और फिर लोंगेवाला युद्ध स्मारक देखकर और ये जानकर कि इस रेगिस्तान में पाक ने हमले किये थे बड़ा कौतुहल हुआ और इच्छा हुई इतिहास के पन्ने पलटने की. इन तीनों स्मारकों में जो तस्वीरें हैं, टैंक और अन्य हथियार रखे हुए हैं और जो वहां बताया गया ध्यान से सुना, देखा और फिर इन्टरनेट में भी खोजबीन की. पढ़ने में रोमांचक लगा इसलिए ये कहानी पेश है. सेना और युद्ध का बहुत ज्यादा ज्ञान नहीं है इसलिए भूल चूक के लिए क्षमा.
1. वर्ष 1971 भारतीय उप महाद्वीप के लिए ऐतिहासिक वर्ष था. '71 में नवम्बर माह ख़तम होते होते मुक्ति बाहिनी ने जेस्सोर पर लगभग कब्जा कर लिया था. वहां मौजूद पश्चिमी पाकिस्तानी फ़ौज को स्थानीय लोगों का सहयोग मिलना समाप्त हो गया था उलटे उनपर हमले हो रहे थे. पश्चिमी पाक से पूर्वी पाक में फ़ौज को रसद, हथियार और गोला बारूद तुरंत पहुंचाना संभव नहीं था. इसलिए जग जाहिर होने लगा था कि पकिस्तान का अंग भंग होने वाला था.
2. पाकिस्तान का मानना था की पूर्वी पकिस्तान की रक्षा पश्चिम से की जा सकती है. राजस्थान या पंजाब का कुछ हिस्सा अगर फुर्ती से हथिया लिया जाए तो भारत का ध्यान पूर्वी पकिस्तान से हट जाएगा. ऐसा करने से भारत की फ़ौज और संसाधन बंट जाएंगे और भारत लम्बी और फैलाव वाली लड़ाई नहीं लड़ पाएगा. ऐसे में अगर कुछ जमीन पर कब्जा हो और साथ ही अंतर्राष्ट्रीय दबाव भी हो तो भारत ज्यादा देर तक लड़ाई नहीं झेल पाएगा और पाकिस्तान की बात मानने पर मजबूर हो जाएगा.
3. अमरीका और चीन के आशीर्वाद से पकिस्तान के पास उस समय के बेहतर हथियार, लड़ाकू जहाज और साज़ो सामान उपलब्ध थे. 13 दिन चले इस युद्ध में परोक्ष रूप से जॉर्डन, सऊदी अरब और लीबिया की वायु सेना की ओर से भी पाक को मदद भी मिल रही थी. इसलिए भारत से 1965 में हुई हार का बदला लेने और सबक सिखाने के इरादे बुलंद थे. इन सब बातों को मद्दे नज़र रखते हुए जनरल टिक्का खान ने पश्चिमी सीमा पर हवाई और सैनिक हमले की जोरदार योजना तैयार की.
4. 03 दिसम्बर 1971 की शाम को पाक वायु सेना ने ऑपरेशन चंगेज़ खान आरम्भ कर दिया. पहला हवाई हमला पठानकोट एयरबेस पर हुआ और रनवे को काफी नुक्सान पहुंचा. दूसरा हवाई हमला अमृतसर एयरबेस पर हुआ. रनवे में बड़े बड़े गड्ढे बन गए. तीसरे हमले में 20 लड़ाकू हवाई जहाज शामिल हो गए. शाम 6 बजे से 10 बजे तक अम्बाला, आगरा, सिरसा और उत्तरलाई एयर बेस पर बमबारी की गई. इनमें से सिरसा और उत्तरलाई में ज्यादा नुक्सान हुआ. आगरा एयरबेस में कई बम फटे ही नहीं क्यूंकि वो पुराने हो चुके थे. उधर जोधपुर, जैसलमेर और जामनगर पर भी कई हवाई हमले हुए. जैसलमेर में जमीन के नीचे बिछी बिजली और फोन की तारें ध्वस्त हो गईं.
5. उसी रात प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी ने पाक हवाई हमलों को भारत पर आक्रमण कहा और जवाबी कारवाई शुरू हो गई.13 दिन चले इस युद्ध में पूर्वी पाकिस्तान खतम हो गया, बंगला देश बन गया और पाक फ़ौज के लगभग एक लाख सैनिक बंदी बना लिए गए.
6. 04 दिसम्बर की रात को एक बड़े हमले की तैयारी करके पाक फ़ौज का एक काफिला अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार कर के लोंगेवाला के नज़दीक पहुँच गया. इस लम्बे काफिले में थी लगभग 2000 सिपाहियों की एक ब्रिगेड, 45 टैंक और 500 से ज्यादा गाड़ियाँ. इनका प्लान था कि पहले लोंगेवाला पर कब्जा कर लिया जाए, उसके बाद 30 किमी आगे बढ़ कर रामगढ़ पर और फिर 78 किमी आगे जैसलमेर शहर कब्जा लिया जाए. चूँकि ये जगह रेगिस्तान में थीं और आबादी नहीं थी इसलिए ये काम 24 घंटों में हो जाना था. पर लोंगेवाला में तो कुछ और ही होना था.
7. भारत की सैनिक प्राथमिकता पूर्वी पाकिस्तान सीमा पर थी. वहां दिनों दिन उथल पुथल बढ़ रही थी. पश्चिमी पाकिस्तान से लगी सीमा पर भारतीय फ़ौज की स्थिति सुरक्षा या बचाव की थी. इस तरफ का फौजी जमावड़ा ख़ास ख़ास संवेदनशील जगहों पर ही रखा गया था.
8. लोंगेवाला पहुँचने वाली भारी भरकम पाक फ़ौज का मुकाबला करने के लिए पंजाब रेजिमेंट की 23वीं बटालियन की अल्फ़ा कंपनी वहां तैनात थी जिसमें 120 जवान थे. इसके अलावा एक एंटी टैंक गन, दो रेकोइल लेस गन, एक सेक्शन MMG का और एक 81 मिमी के मोर्टार का था. साथ ही जैसलमेर में 4 हंटर लड़ाकू विमान, एक कृषक विमान और एक मारुत विमान उपलब्ध थे. पर हंटर विमान में रात में आक्रमण करने की सुविधा नहीं थी. इसके अलावा बी एस ऍफ़ के 4 जवान सीमा चौकी पर तैनात थे. अल्फ़ा कम्पनी की कमान थी मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरिया के हाथ में. अन्य अधिकारी थे कप्तान धर्मवीर, कप्तान भैरों सिंह, मेजर आत्मा सिंह. वायु सेना के अधिकारी थे विंग कमांडर एम एस बावा, विंग कमांडर आर ए कोवासजी, विंग कमांडर सुरेश और विंग कमांडर शेर्विन टली.
9. ये अल्फ़ा कम्पनी ऊँचे टीलों पर थी जहाँ गाड़ियों का आना जाना नहीं हो सकता था. टीलों के इर्द गिर्द कटीली तारों की बाड़ लगी हुई थी. तार बाड़ के आसपास जल्दी जल्दी कुछ बारूदी सुरंगे बिछा दी गईं थी. सामने सपाट मैदान बिलकुल सुनसान, बियाबान था और केवल छोटी छोटी झाड़ियाँ जहाँ तहां लगी हुई थीं. 23वीं बटालियन के बाकी जवान 17 किमी दूर साधेवाला में थे. 3 दिसम्बर के हवाई हमलों के बाद मेजर चांदपुरिया ने 20 जवानों की गश्ती टोली कप्तान धर्मवीर के साथ टोह लगाने के लिए सीमा पोस्ट की ओर भेजी. कप्तान ने सूचना दी की बड़ी संख्या में दुश्मन के टैंक और गाड़ियाँ बढ़ी चली आ रही हैं. मेजर आत्मा सिंह ने अपने हवाई जहाज से उड़ान भरी और पुष्टि कर दी की लगभग २० किमी लम्बा काफिला इस ओर आ रहा है. मेजर चांदपुरिया ने तुरंत बटालियन मुख्यालय को सूचित किया और ख़ास तौर पर तोपों की सहायता माँगी. मुख्यालय ने जवाब दिया की सहायता पहुँचने में कम से कम छै घंटे का समय लगेगा. रात में जैसलमेर से हवाई आक्रमण भी संभव नहीं था. इन हालात में दो ही रास्ते थे - वहां डटे रहें और किसी तरह दुश्मन को रोकें या फिर मोर्चा छोड़ कर वापिस आ जाएं. परन्तु अँधेरी रात में वापिस जाने के लिए गाड़ियाँ नहीं थी. पैदल वापिस जाने में भी ख़तरा था और उधर दुश्मन तेज़ी से बढ़ा चला आ रहा था. परीक्षा की घड़ी आ गई थी.
10. मेजर चांदपुरिया ने मुकाबला करने का फैसला कर लिया. 4 दिसम्बर की रात 12.30 बजे हमला हो गया. मझोली तोपों के पहली बमबारी में बी एस ऍफ़ के ऊंट और पोस्ट ध्वस्त हो गयी. अब टैंकों का रुख अल्फ़ा कम्पनी की ओर हो गया. बड़े धैर्य के साथ और तैय्यारी के साथ उन्हें नज़दीक आने दिया गया और जब दूरी मात्र 15-20 मीटर की रह गयी रेकोइल लेस गन ने धाएं धाएं करके आग उगल दी. दो टैंक वहीँ के वहीँ खड़े रह गए. टैंकों पर तेल के ड्रम भी थे जो धमाके के साथ फटे और आग की लपटें उठने लगी. भारतीय सैनिक उंचाई पर थे और आग की रौशनी का फायदा उठाकर सही निशाना लगाते रहे और कामयाब होते रहे. कुछ टैंको ने दाएं बाएं से बढ़ने की कोशिश की पर बारूदी सुरंग फटने से वहां भी जाम लग गया. जिस रेत में पैदल चलना मुश्किल और गाड़ी चलाना और भी मुश्किल था वहां टैंक भी फंसने लग गए. टैंको को फुर्ती से दाएं बाएँ काटना या पीछे करना मुश्किल हो गया. ज्यादा कोशिश करने से टैंक रेत में धंसने लगे और आसान शिकार बन गए. कई टैंकों के इंजन गरम होकर सीज़ हो गए.
पहली जवाबी कारवाई में 12 टैंक बर्बाद हो गए. दुश्मन इस अचानक जवाब से सकपका कर थम गया. भारतीय खेमे का हौसला बुलंद हो गया. दुश्मन को अब बारूदी सुरंगों को हटाने की भी चिंता लग गई. बारूदी सुरंगें हटाने वाले सेप्पर्स बुलाए गए पर उन्हें दो घंटे बर्बाद करने के बाद भी कोई सुरंग नहीं मिली. बीच बीच में छोटे हथियारों से लगातार भारतीय सैनिकों पर आक्रमण होता रहा. पर भारतीय जवानों को ऊँचाई से निचले मैदान में जवाब देने में कम दिक्कत थी और सटीक गोलीबारी से कामयाबी भी मिल रही थी इसलिए हौसले हर मिनट पर बढ़ते जा रहे थे.
11. इस बीच आसमान की रंगत भी बदलने लगी. दुश्मन का प्लान अँधेरे में मिनटों में लोंगेवाला पर कब्जा करने का था पर वहां तो घंटो निकल गए. अब दिन निकलने के साथ ही उनकी पोजीशन पूरी तरह से सामने आने वाली थी. रेगिस्तान में दूर दूर तक कोई पेड़ ना ही कोई जंगल था. गाड़ियों तो क्या वहाँ सिपाहियों के लिए भी छुपने की जगह नहीं थी. उधर जैसलमेर के एयरबेस में लड़ाकू विमान हंटर हथियारों से लैस उड़ने के लिए तैयार हो चुके थे. इनमें 30 मिमी के तोपें और मात्रा-T-10 रॉकेट लगे हुए थे.
पहली किरण के साथ ही हंटर विमानों ने उड़ान भरी और पाकिस्तानी काफिले पर बमबारी शुरू कर दी. मेजर आत्मा सिंह अपने कृषक विमान AOP में से टारगेट की सूचनाएं देते जा रहे थे. दुश्मन का पूरा का पूरा काफिला, पैदल, टैंक, ट्रक और बख्तर बंद गाड़ियाँ खुले मैदान में नज़र आ रही थीं. पाक वायु सेना कहीं और व्यस्त थी. पाक टैंकों पर लगी 12.7 मिमी की एंटी एयर क्राफ्ट फायरिंग कारगर नहीं थी. इसलिए हंटर विमानों ने जमकर 'तीतर बटेरों' का शिकार किया. बे रोक टोक उड़ान भरी और 22 टैंक और 100 से ज्यादा गाड़ियाँ तबाह कर दी.
12. सुबह तक भारतीय सेना के 20 लैंसर्स के टैंक और 17 राजपुताना राइफल्स भी लोंगेवाला पहुँच गयी और पाकिस्तान पर पलटवार कर दिया गया. आक्रमणकारी बड़ी तेज़ी से आये, थमे, मुड़े और फिर भाग लिए. लगभग छै घंटे के युद्ध में पकिस्तान के इरादे थार रेगिस्तान की रेत में मिल गए.
13. लोंगेवाला के इस निर्णायक युद्ध में भारत के दो जवान शहीद हुए, एक एंटी टैंक गन बर्बाद हो गयी. पाकिस्तान के 200 सिपाही मारे गए 36 टैंक और 500 गाड़ियां बर्बाद हुई. युद्ध के बाद मेजर चांदपुरिया को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया. यूनिट के कई अन्य लोगों को भी सम्मनित किया गया.
14. दूसरे विश्व युद्ध के बाद यह पहली ऐसी लड़ाई थी जिसमें इतने टैंक बर्बाद हुए. ब्रिटिश मीडिया में इस युद्ध की काफी चर्चा हुई. कुछ हफ़्तों बाद ब्रिटिश फील्ड मार्शल आर एम कार्वर स्वयं लोंगेवाला का जाएज़ा लेने आये और मेजर चांदपुरिया से भी मिले. इस युद्ध पर बाद में 'बॉर्डर' फिल्म भी बनी.
लोंगेवाला युद्ध स्मारक, जैसलमेर के कुछ चित्र प्रस्तुत हैं:
श्री तनोट माता मंदिर पर एक फोटो-ब्लॉग इस लिंक पर देखा
जा सकता है: http://jogharshwardhan.blogspot.com/2017/02/blog-post_25.html
जैसलमेर वार म्यूजियम पर एक फोटो-ब्लॉग इस लिंक पर देखा
जा सकता है: http://jogharshwardhan.blogspot.com/2017/01/blog-post_25.html
जूनागढ़, बीकानेर - 1 / 2
बीकानेर शहर की स्थापना राठोड़ वंशी राजा राव बिका ने 1488 में की थी. उस से पहले यह इलाका जांगलदेश या जांगलू कहलाता था और आबादी नाम मात्र की थी. धीरे धीरे राव बिका ने आसपास का इलाका जीत कर बीकानेर राज की स्थापना की. शहर का स्थापना दिवस अक्षय तृतीय के दिन मनाया जाता है. बीकानेर राज के छठे राजा राव राय सिंह( 1571 - 1611) के समय बीकानेर का नाम ज्यादा प्रसिद्द हुआ. राव राय सिंह अकबर और जहाँगीर के दरबार में ऊँचे ओहदे पर रहे और उन्हें बहुत सी जागीरें इनाम में मिली. इन जागीरों की आमदनी से जूनागढ़ किले का निर्माण 17 फरवरी 1589 के दिन शुरू कराया गया जो 17 जनवरी 1594 को समाप्त हुआ.
किला 5.28 हेक्टेयर में फैला हुआ है और किसी पहाड़ी पर ना होकर जमीन पर ही है. ज्यादातर लाल बालू पत्थर और संगमरमर का बना हुआ है. किले की दीवारों की लम्बाई लगभग 1078 गज है. दीवारें 40 फीट ऊँची और करीब 15 फीट चौड़ी हैं. किले की बाहरी दीवारों के साथ साथ 30 फीट चौड़ी झील भी हुआ करती थी जो अब नहीं नज़र आती. किले में समय समय पर आने वाले राजाओं द्वारा कुछ ना कुछ बनता रहा. ये राजा राव हैं:
करन सिंह का राज 1631 - 1639 तक रहा और उन्होंने करन महल बनवाया.
अनूप सिंह का राज 1669 - 1698 तक रहा और उन्होंने ज़नानखाना और दीवाने आम 'अनूप महल' बनवाया.
गज सिंह ने 1746 - 1787 तक राज किया और चन्द्र महल बनवाया.
सूरत सिंह ने 1787 - 1828 ने कांच और पेंटिंग के काम करवाए.
डूंगर सिंह ने 1872 - 1887 के दौरान राज किया और बादल महल बनवाया.
गंगा सिंह ने 1887 - 1943 तक राज किया और गंगा निवास महल बनवाया.
राव गंगा सिंह ब्रिटिश राज में नाईट कमांडर रहे और जिस हॉल में अपने राजकाल की स्वर्ण जयंती मनाई उसमें अब संग्रहालय है. उन्होंने एक लालगढ़ महल भी बनवाया जिसमें वे 1902 में शिफ्ट हो गए. उनके पुत्र सदूल सिंह के समय बीकानेर राज का 1949 में भारत में विलय हो गया.
किला और अंदर के महल बहुत सुंदर है और संग्रहालय पुराने हथियार, पालकियों और शाही कपड़ों से भरा हुआ है. आप चाहें तो घंटों बिता सकते हैं. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो :
जूनागढ़, बीकानेर - 2 / 2
रेगिस्तान में बसा होने के कारण वार्षिक सामान्य तापमान में काफी फर्क रहता है. गर्मी में पारा 50 तक और सर्दी में 4 डिग्री तक नीचे आ सकता है. बारिश कम होती है इसलिए खेती भी कम है. पर फिर भी इतने बड़े किले, महल और विलासिता थी. इस बारे में काफी पूछताछ की तो पता लगा की थार रेगिस्तान का ये शहर 'सिल्क रूट' पर था. ऊँटों के कारवाँ मध्य एशिया और खाड़ी के देशों से व्यापार करने आते और यहाँ टैक्स देते थे. व्यापार में सिल्क, सोने चाँदी के जेवर और अफीम भी शामिल थी. अफीम अब भी सरकारी दुकानों में यहाँ मिलती है. ऐसा सुना कि पार्टी शार्टी में थोड़ी बहुत आजकल भी चलती है. अफीम के बारे में राजस्थानी कहावत है,
ले रत्ती तो देस मत्ती,
ले मासो तो टाळे पासो,
ले तोलो तो घर घर डोलो!
याने रत्ती भर लोगे तो दिमाग ठीक रहेगा, मासे जितनी लोगे तो बदन दर्द ठीक हो जाएगा और अगर तोले जितनी किसी ने ली तो गलियों में भटकता फिरेगा!
बीकानेर शहर की स्थापना राठोड़ वंशी राजा राव बीका ने 1488 में की थी. उस से पहले यह इलाका जांगलदेश या जांगलू कहलाता था और आबादी नाम मात्र की थी. धीरे धीरे राव बिका ने आसपास का इलाका जीत कर बीकानेर राज की स्थापना की. शहर का स्थापना दिवस अक्षय तृतीय के दिन मनाया जाता है. बीकानेर राज के छठे राजा राव राय सिंह( 1571 - 1611) के समय बीकानेर का नाम ज्यादा प्रसिद्द हुआ. राव राय सिंह अकबर और जहाँगीर के दरबार में ऊँचे ओहदे पर रहे और उन्हें बहुत सी जागीरें इनाम में मिली. इन जागीरों की आमदनी से जूनागढ़ किले का निर्माण 17 फरवरी 1589 के दिन शुरू कराया गया जो 17 जनवरी 1594 को समाप्त हुआ.
किला 5.28 हेक्टेयर में फैला हुआ है और किसी पहाड़ी पर ना होकर जमीन पर ही है. ज्यादातर लाल बालू पत्थर और संगमरमर का बना हुआ है. किले की दीवारों की लम्बाई लगभग 1078 गज है. दीवारें 40 फीट ऊँची और करीब 15 फीट चौड़ी हैं. किले की बाहरी दीवारों के साथ साथ 30 फीट चौड़ी झील भी हुआ करती थी जो अब नहीं नज़र आती. किले में समय समय पर आने वाले राजाओं द्वारा कुछ ना कुछ बनता रहा. ये राजा हैं:
करन सिंह का राज 1631 - 1639 तक रहा और उन्होंने करन महल बनवाया.
अनूप सिंह का राज 1669 - 1698 तक रहा और उन्होंने ज़नानखाना और दीवाने आम 'अनूप महल' बनवाया.
गज सिंह ने 1746 - 1787 तक राज किया और चन्द्र महल बनवाया.
सूरत सिंह ने 1787 - 1828 ने कांच और पेंटिंग के काम करवाए.
डूंगर सिंह ने 1872 - 1887 के दौरान राज किया और बादल महल बनवाया.
गंगा सिंह ने 1887 - 1943 तक राज किया और गंगा निवास महल बनवाया.
राव गंगा सिंह ब्रिटिश राज में नाईट कमांडर रहे और जिस हॉल में अपने राजकाल की स्वर्ण जयंती मनाई उसमें अब संग्रहालय है. उन्होंने एक लालगढ़ महल भी बनवाया जिसमें वे 1902 में शिफ्ट हो गए. उनके पुत्र सदूल सिंह के समय बीकानेर राज का 1949 में भारत में विलय हो गया.
किला और अंदर के महल बहुत सुंदर है और संग्रहालय पुराने हथियार, पालकियों और शाही कपड़ों से भरा हुआ है. आप चाहें तो घंटों बिता सकते हैं. कुछ चित्र पहले भाग में प्रकाशित किये गए थे उन्हें इस लिंक पर देखा जा सकता है:
http://jogharshwardhan.blogspot.com/2017/08/1-2.html
प्रस्तुत हैं कुछ और फोटो :
बूंदी का किला
बूंदी राजस्थान
टोंक से बूंदी का रास्ता लगभग 120 किमी है जो शायद दो घंटे में पूरा हुआ. सड़कें अच्छी हैं राजस्थान में. पर हाँ टोल की चपत भी अच्छी खासी है जो आपकी जेब खाली करती रहती है. बूंदी पहुँचने से पहले ही किला दिखाई पड़ने लगा. पर मेन रोड छोड़ कर अंदर पुराने बूंदी शहर में सड़कें तंग हैं. गली गलियारों में दोनों ओर घर दुकानें हैं. इसलिए गाड़ी मेन रोड पर ही छोड़ के पैदल अंदर पहुंचे। दो तीन गेस्ट हाउस देखे और फिर एक हवेली में बने गेस्ट हाउस में डेरा डाल दिया.
हवेली में गेस्ट हाउस बना तो देते हैं पर गेस्ट का ध्यान काम रखते हैं. मसलन कहीं पर आपको एक दिन में एक लिटर पानी की बोतल फ्री मिलेगी, कहीं पर आधे लिटर की. राजस्थान की गर्मी में अब आप पानी की बोतलें खरीदते रहिये! कोई गेस्ट हाउस वाला ब्रेकफास्ट फ्री देगा और कोई टरका देगा। कोई चाय की केतली, चाय पत्ती और चीनी कमरे में सजा कर रख देगा बनाओ और पियो। कोई मंगाने पर देगा। कपल के लिए कोई बाथरूम में एक ही तौलिया टांग देगा ! दूसरा माँगना पड़ेगा। मांगने के लिए फ़ोन करेंगें तो इण्टरकॉम बंद मिलेगा। खैर, घुमक्कड़ी में छुटर पुटर बातें चलती रहती हैं. इस मामले में सबसे बढ़िया ताज होटल हैं हर चीज़ टिप टॉप और रेडी मिलेगी( वो भी बढ़िया तभी तक है जब आपके मोटे से बिल का भुगतान कोई और कर रहा हो 😜 )!
बूंदी जून 1242 में राव देवा सिंह ने बसाया था. पहले यहाँ ज्यादातर मीणा, गुर्जर,अहीर और आदिवासी रहा करते थे. राव देवा सिंह हाड़ा राजपूत थे इस कारण ये इलाका हाड़ोती क्षेत्र कहलाने लगा जिसमें कोटा, सवाई और आसपास का एरिया भी शामिल था. यहाँ के राजाओं में से राव उम्मेद सिंह ( 1749 से 1773 तक राज किया ) बहुत वीर, कला प्रेमी और जनप्रिय राजा थे. जीवन के अंतिम दिनों में राज-पाट बेटे को सौंप कर वो साधु बन गए थे.
यहाँ की राजस्थानी हिंदी के साथ साथ हड़ौती और मेवाड़ी भी बोली जाती हैं. गेस्ट हाउस के मालिक से बातचीत में कई हाड़ा कहावतें सुनने को मिलीं पर अब एक कहावत ही याद रह गई है - आटे में लूण समावे, लूण में आटो नहीं ! मतलब आप समझ ही गए होंगे कि आटे में नमक खप जाता है पर नमक में आटा नहीं। यहाँ दिन का मौसम गर्म है पर शाम सुहानी है. घूमने के लिए सुन्दर सुन्दर स्पॉट हैं जिनकी चर्चा आगे करेंगे। मानसून और उसके तुरंत बाद बहुत हरा भरा हो जाता है इसलिए सितम्बर से मार्च तक का मौसम घूमने के लिहाज से ठीक है.
फिलहाल शहर की कुछ फोटो प्रस्तुत हैं.
अरबी फ़ारसी इंस्टिट्यूट, टोंक, राजस्थान
राजस्थान का टोंक शहर मीठे ख़रबूज़ों और लखनऊ जैसी मीठी बोली के लिए भी जाना जाता है. ये बनास नदी के किनारे बसा हुआ है. सन् 1817 से टोंक नवाबी रियासत की राजधानी थी. यहाँ 1961 में राजस्थान ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट की शाखा खोली गई थी.
आजकल इसका नाम मौलाना अबुल कालाम आज़ाद अरेबिक पर्शियन रिसर्च इंस्टीट्यूट है. यहाँ एक म्यूजियम भी है जिसमें 3064 पांडुलिपियाँ संभाल कर रखी गई हैं. 133 नायाब किताबें भी है जो पुरानी नवाबी रियासत के पुस्तकालय से ली गई हैं. दुनिया की सबसे बड़ी क़ुरान शरीफ़ भी म्यूजियम में रखी हुई है. महाभारत और वाल्मीकि रामायण के फ़ारसी अनुवाद भी हैं. यहाँ से किताबें और शोध जर्नल भी प्रकाशित होते रहते हैं.
और अधिक जानकारी के लिए maapritonk.nic.in विज़िट कर सकते हैं. म्यूजियम की कुछ फ़ोटो प्रस्तुत हैं.
नगीना बाजार और रतन सिंह पैलेस : चित्तौड़गढ़
इसी के साथ चित्तौड़गढ़ की अपनी यात्रा का समापन करता हूँ ! जल्दी ही मिलेंगे एक और नयी जगह का यात्रा वृतांत लेकर !!
आइये फोटो देखते हैं :
कीर्ति स्तम्भ : चित्तौड़गढ़
विजय स्तम्भ और कीर्ति स्तम्भ नाम से एक दुसरे के पूरक लग सकते हैं लेकिन दोनों अलग अलग समय और अलग ऊंचाई के बने हुए हैं ! कीर्ति स्तम्भ , विजय स्तम्भ से पहले का बना हुआ है। कीर्ति स्तम्भ 12 वीं सदी का बना हुआ है जबकि विजय स्तम्भ 15 वीं सदी का है। कीर्ति स्तम्भ मात्र 22 मीटर ऊँचा है जिसे जैन व्यापारी साह जीजा भगेरवाला ने रावल कुमार सिंह के शासनकाल में 12 वीं शताब्दी में जैन धर्म की शान में बनवाया था। अगर इतिहास उठाकर देखें तो पता चलता है कि चित्तोड़ किसी जमाने में जैन धर्म का बहुत प्रसिद्द केंद्र हुआ करता था।
कीर्ति स्तम्भ का आधार 30 मीटर चौड़ा है और ऊपर जाते जाते इसकी चौड़ाई 15 मीटर रह जाती है। कीर्ति स्तम्भ , प्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित है। इसमें अंदर जाने का मौका तो नही मिला क्योंकि इसमें जो एक दरवाजा दिखाई दे रहा था वो बंद था और उसके पास में एक चौकीदार भी बिठा रखा था। मालुम नही बंद दरवाजे पर चौकीदार क्या कर रहा था लेकिन थोड़ी देर बाद वहां से कहीं निकल गया। सोलंकी शैली में बने इस स्तम्भ की कुल सात मंजिलें हैं। और इसमें जो दीवारें बनी हुई हैं उन पर जैन तीर्थंकरों के चित्र लगे हुए हैं , ऐसा कहा जाता है ! मैंने अपनी आँखों से नही देखा। इसकी दूसरी मंजिल पर भगवान आदिनाथ की शानदार प्रतिमा भी लगी हुई है।
कीर्ति स्तम्भ के ही बिल्कुल पास में एक और जैन मंदिर है। उसके विषय में ज्यादा जानकारी मुझे तो नही मालुम। न वहां ऐसा कुछ लिखा है जिससे जानकारी जुटाई जा सके और न ही इंटरनेट पर इस मंदिर के विषय में कुछ लिखा गया है ! हाँ , बस उसका नाम मालुम है ! इस मंदिर का नाम है सात बीस देवरिया दात और ये जैन धर्मवलम्बियों के लिए एक प्रसिद्द स्थान माना जाता है।
आइये फोटो देखते चलते हैं :
मीरा मंदिर : चित्तौड़गढ़
मीराबाई एक राजपूत राजकुमारी थीं जिनका जन्म राजस्थान के मेड़ता में 1498 ईसवी में जोधपुर के संस्थापक राव जोधा के यहाँ हुआ था। बचपन से ही मीरा बाई भगवान की भक्ति में रमने लग गयी थीं और उनकी आवाज भी बहुत सुरीली थी। जब भी वो भगवन के भजन गाती तो राजा का दरबार भी उन्हें सुनने लग जाता था। एक दिन उनके घर के सामने से एक बारात निकल रही थी , दूल्हे को देखकर मीरा ने माँ से पूछा , माँ मेरा दूल्हा कौन होगा , माँ ने ऐसे ही कह दिया , ये बंशी वाला तेरा दूल्हा होगा ! और तब से भगवान को अपना सब कुछ मान बैठी। समय आने पर उनका विवाह चित्तोड़ के राजा भोज राज से कर दिया गया लेकिन वो भगवान को ही अपना पति मान चुकी थीं इसलिए इस विवाह में उनकी कोई रूचि नही रही फलस्वरूप उन्हें कोई संतान भी नही हुई। 1521 में राजा भोज राज की मृत्यु हो गयी तो उसके बाद उनके ससुर राणा सांगा ने उनकी हिफाज़त की। कालांतर में मीरा बाई की भक्ति और भी बढ़ती गयी और वो घर से बाहर निकलकर सत्संग में जाने लगीं। ये देखकर उनके देवर विक्रमादित्य और ननद उदा बाई को नागवार गुजरने लगा और उन्होंने मीरा बाई को कई बार मारने की कोशिश करी। उदा बाई ने मीरा को कई दिन तक भूखे प्यासे एक कमरे में बंद रखा जिससे वो स्वतः ही दम तोड़ दे लेकिन कहते हैं भगवान रोज़ उनके लिए खाना लाते और उसके बाद मीरा भगवान के भजन गाया करती। विक्रमादित्य ने मीरा को मारने के जितने भी प्रयास किये भगवान श्री कृष्णा ने वो सब असफल कर दिए ! राजस्थानी भाषा में ये लोक गीत देखिये :
शूल सेज राणा नै भेजी, दीज्यो मीरां सुलाय/सांझ भई मिरां सोवन लागी, मानों फूल बिछाय'
मीरा बाई वृन्दावन होते हुए अपने आखिरी दिनों में द्वारका चली गयी। 1546 ईस्वी में जब राणा उदय सिंह चित्तोड़ के राजा बने तो उन्होंने मीरा बाई को वापस बुलाने के लिए ब्राह्मणों को द्वारका भेजा लेकिन मीरा बाई ने आने से मना कर दिया और एक रात मंदिर में गुजारने देने की अनुमति मांगी। कहते हैं उस रात के बाद मीरा बाई अंतर्ध्यान हो गयीं और ऐसा कहा जाता है कि वो भगवान श्री कृष्णा की मूर्ति में ही समा गयी।
ये जो वर्तमान मीरा मंदिर है चित्तौड़गढ़ का , इसे मीरा बाई के ससुर राणा सांगा ने उनके लिए ही बनवाया था ताकि वो भगवान की भक्ति कर सकें। इस मंदिर के पास में ही विष्णु मंदिर है जिसे राणा कुम्भा ने बनवाया था और इसे कुम्भा मंदिर कहते हैं। इसके पास में ही मीरा मंदिर है और एक मंदिर है जिसे कुम्भा श्याम मंदिर कहते हैं। राजपुताना स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना इन मंदिरों में देखने को मिलता है। मीरा मंदिर में चार मंडप हैं जो मंदिर को घेरे हुए हैं। अंदर आपको भगवान श्री कृष्णा और मीरा बाई की सुन्दर तस्वीरें देखने को मिलती हैं !
तो आइये इंतज़ार किस बात का , दर्शन करते जाइए ! कुछ फोटो इंटरनेट से भी लिए गए हैं !
गौमुख मंदिर : चित्तौड़गढ़
व्हाट्स एप्प पर एक मैसेज देखा था ! मैसेज क्या ये एक जोक है - तुम भगवान को रोज़ रोज़ याद करते हो अगर भगवान ने भी तुम्हें एक दिन याद कर लिया तो ? सच में , हम ऐसा सोचते भी नहीं कि भगवान के यहां से कभी कॉल आ गयी तो सब कुछ यहीं धरा रह जाएगा , इसलिए जिंदगी को जितना बेहतर जी सकते हो जीने की कोशिश करिये। खुशियाँ चुनिए , खुशियाँ बाँटिये !
चित्तौड़गढ़ के विश्व प्रसिद्द विजय स्तम्भ को देखने और उसमें घुसने पर दो बार सर फुटवाने के बाद थोड़ी सी देर आराम की जरुरत महसूस होने लगी थी। मैं वहीँ एक जगह पत्थर पर बैठ गया। तभी एक चार पांच विदेशियों का ग्रुप भी वहीँ आकर खड़ा हो गया। थोड़ी देर में उनका गाइड भी आ गया। गाइड भी वहां ऐसे ऐसे हैं कि बस पूछिए मत। ज्यादातर गाइड को देखकर ऐसा लगेगा जैसे ये अभी टेम्पो चलाकर आया हो , लेकिन ये शायद उनका पहनावा है। या पार्ट टाइम काम ? जैसा विजय स्तम्भ का चौकीदार बता रहा था कि यहां रहने वाले लोगों को बहुत मुआवजा मिला है और कोई भी करोड़पति से कम नही है। इसलिए यहीं रहकर गाइड का काम करते हैं और अंग्रेजी बहुत बढ़िया बोलते हैं। अगर आप परिचित नही हैं तो पहिचान नही पाएंगे कि ये आदमी अंग्रेजी भी बोल सकता है और गाइड भी हो सकता है। वो वहीँ से खड़े होकर उन विदेशियों को कुछ बताने लगा , समझाने लगा। जब तक वो वहां रहे मैं भी बैठा ही रहा , मुझे बिना पैसे खर्च किये गाइड का ज्ञान मिल रहा था।
एक जगह का जिक्र करना चाहूंगा। वहां फोर्ट काम्प्लेक्स में बहुत से पत्थर पड़े हैं जिन्हें संभालकर रखा गया है। ये उन मंदिरों के पत्थर हैं जिन्हें मुग़ल शासकों ने तोड़ दिया था। उनके अवशेषों को यहां एकत्रित किया गया है। मुग़ल शासक सबसे पहले हिन्दू मंदिरों का शीर्ष तोड़ते थे और फिर उसमें से चोरी कर ले जाते थे। हमने भी कैसा कैसा समय देखा है ?
इसी काम्प्लेक्स में आपको कुम्भ श्याम मंदिर देखने को मिलेगा और गज लक्ष्मी मंदिर भी। ये बहुत प्रसिद्द मंदिर तो नही हैं लेकिन जब आदमी वहां तक गया है तो सोचता है एक बार अंदर जाकर तो देख ही लूँ। पीछे की तरफ चलते जाइए तो आपको गौमुख मंदिर और सरोवर मिलेगा जिसमें से पानी लगातार बहता रहता है। एक छोटा सा कमरा है , कमरा कहना गलत होगा , जीने का साइज ही होगा , उसमें पानी आता रहता है। बहुत गन्दगी और फिसलन है उधर। दो तीन महिलाएं दान प्राप्त करने के लिए बैठी होती हैं और कुछ ज्यादा आकर्षित करने वाली चीज उधर नही है। सरोवर का पानी भी बहुत गंदा है। कहते हैं पहले यहीं से महलों के लिए पानी की सप्लाई होती थी , लेकिन तब शायद इतना गंदा नहीं रहता होगा।
आइये फोटो देखते हैं :
आज पहली बार फोटो पर अपना नाम लिखना सीखा है , गलतियां हुई हैं ! लेकिन अभ्यास करते करते सब सीख जाऊँगा !
जयमल फत्ता महल और विजय स्तम्भ : चित्तौड़गढ़
विजय स्तम्भ
आज बस इतना ही , बहुत हो गया ! आइये फोटो देखते चलें :
ये बाहर से जयमल फत्ता की हवेली
जयमल -फत्ता महल ! कभी महल रहा होगा अब खण्डहर है
जयमल -फत्ता महल ! कभी महल रहा होगा अब खण्डहर है
जयमल -फत्ता महल ! कभी महल रहा होगा अब खण्डहर है
विजय स्तम्भ के सामने ही है ये ! क्या है नहीं मालूम
जयवाण
इस तोप की ढलाई 1720 में राजा जय सिंह द्वितीय ने कराई थी. मजेदार बात ये है की इसे केवल एक ही बार ही चलाया गया. उस वक़्त राजा जय सिंह द्वितीय और दिल्ली के मुग़ल सुलतान मुहम्मद शाह भी वहां मौजूद थे.
Hawa Mahal, Jaipur
The Pink City has an fortified enclosure having seven huge strong gates. It is spread over large nine rectangular blocks two of which were retained for palace, gardens & administrative buildings and rest seven blocks were allocated to the general public.
In 1799 five story high Hawa Mahal was added to the Palace complex during the reign of Maharaja Sawai Pratap Singh. It was designed by Lal Chand to facilitate royal family members to watch processions & street scenes without being seen as they had to maintain purdah. Some photos:
In Pink City, Jaipur
The city was designed by Vidyadhar Bhattacharya based on ancient Vastu Shastra. It has an fortified enclosure having seven large strong gates. It is spread over huge nine rectangular blocks two of which were retained for palace, gardens & administrative buildings and rest seven blocks were allocated to the general public.
In 1799 five story high Hawa Mahal was added to the Palace complex to enable royal ladies to watch processions & street scenes without being seen as they had to maintain purdah. The Palace & Hawa Mahal were meant for royals & the elite. All commoners now & no royals. Some photos of commoners in walled city:
सुनहरी कोठी, टोंक, राजस्थान
मेरठ-बैंगलोर-मेरठ कार यात्रा का पहला पड़ाव था जयपुर. एम आई रोड के नज़दीक राजस्थान पर्यटन होटल में डेरा डाल दिया. चार पाँच साल पहले भी इस होटल में ठहरे थे तब बेहतर था. बहरहाल होटल ने सीनियर सिटिज़न का और ऑफ सीजन का डिस्काउंट दे दिया. आप तो जानते ही हैं की सीनियर लोगों के चाँदी जैसे बाल आसानी से थोड़े ही आते हैं!
सुबह नाश्ता कर के कोटा की और कूच कर दिया. रास्ते में टोंक का नाम बार बार आ रहा था. लगभग सौ किमी पर टोंक की तरफ़ गाड़ी मोड़ ली. गूगल ने और फिर पान वाले ने भी बताया कि शहर में सुनहरी कोठी और अरब-फ़ारसी इंस्टिट्यूट देख सकते हैं. कोठी ढूँढने में समय लगा. गूगल आंटी बोली इधर से जाओ, दुकानदार बोले उधर से जाओ और स्कूली बच्चे बोले कोठी तो पीछे रह गई! गाड़ी वहीं छोड़ हम पैदल हो लिये. गली के अंदर मुश्किल से सौ मीटर गए होंगे की कोठी नज़र आ गई. कोठी की फ़ोटो दिखाने से पहले आपको टोंक का संक्षिप्त इतिहास भी बताते चलें.
टोंक जिला राजस्थान में है और जयपुर से लगभग सौ किमी दूर है. टोंक भी किसी समय नवाबी रियासत की राजधानी थी. मोहम्मद आमिर ख़ान ( 1769-1834 ) यशवन्त राव होलकर की मराठा सेना में शामिल हो गया और जल्दी ही ऊँचे ओहदे पर पहुँच गया. मराठा सेना ने 1806 में जयपुर राज्य पर हमला कर दिया और काफ़ी बड़ा इलाक़ा जीत लिया. मराठा सरदार होलकर ने खुश हो कर आमिर ख़ान को टोंक इनाम में दे दिया. तीसरे एंग्लो- मराठा युद्ध - 1817 के बाद पेशावर-भोंसले-होलकर मराठा संघ की हार हो गई ( सिंधिया तटस्थ रहे और युद्ध में शामिल नहीं हुए ). आमिर ख़ान ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ हो गया और टोंक रियासत का नवाब बना दिया गया.
उस वक़्त टोंक रियासत में निम्बाहेड़ा, छाबड़ा, पिरावा, सिरोंज और रामपुरा क़स्बे भी शामिल थे. आमिर ख़ान के बाद टोंक रियासत में छे और नवाब हुए और अप्रैल 1948 में ये रियासत भारत में मिल गई. अब टोंक शहर की मशहूर सुनहरी कोठी से आपका परिचय कराते हैं: