Sunday, October 11, 2026

राजस्थान डायरीज २

 






बैराट, राजस्थान

बैराट या विराट नगर एक प्राचीन शहर है जो अब राजस्थान के कोटपूतली-बहरोड़ जिले में है. जयपुर से विराट नगर लगभग 60 किमी की दूरी पर है. इसे बेरट या बैराठ भी कहा जाता था और ये स्थान ( विराट नगर ) प्राचीन मत्स्य जनपद की राजधानी था. किसी समय यहाँ विराट नाम के राजा का राज हुआ करता था. 

2. एक किवदंती प्रचलित है जब पांडवों को जब बारह साल का वनवास और दो साल का अज्ञात वास दे कर निष्कासित कर दिया गया था तो उन्होंने यहाँ एक वर्ष याने तेरहवां वर्ष गुप्त रूप से व्यतीत किया था. बाद में महाभारत के युद्ध में राजा विराट और उनके पुत्र अपनी सेना के साथ पाण्डवों की ओर से शामिल हुए परन्तु राजा और पुत्र मारे गए. राजा विराट की पुत्री उत्तरा से अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु का विवाह हुआ था. अभिमन्यु और उत्तरा का पुत्र परीक्षित था जिसने महाभारत युद्ध के बाद राजकाज संभाला। 

3. यह ऐतिहासिक जगह की चर्चा अब इसलिए भी होती है क्यूंकि यहाँ पुरातत्व विभाग की खुदाई में बुद्ध कालीन गोल मंदिर और बौद्ध विहार के पुरातन अवशेष मिले हैं और साथ ही सम्राट अशोक का एक अभिलेख यहाँ प्राप्त हुआ है. 250 BCE अर्थात सामान्य काल से 250 वर्ष पूर्व मौर्य कालीन अवशेषों के अलावा मुग़ल और राजपूत राजाओं से सम्बंधित अवशेष भी मिले हैं. मुग़ल समय में अकबर ने यहाँ ताम्बे के सिक्के ढालने की टकसाल भी लगाई थी. यहाँ बड़ी मात्रा में ताम्बे के सिक्के भी मिले हैं. यहाँ की पहाड़ियों में बड़े बड़े हलके गुलाबी रंग की चट्टानें और पत्थर हैं. इन पहाड़ियों में ताम्बे की खानें भी थीं. 

4. पुरातत्व विभाग ने विराट नगर की पहाड़ी में खुदाई की थी जिसमें बौद्ध मंदिर, अशोक का शिलालेख और बौद्ध विहार के अवशेष मिले थे. सम्राट अशोक का अभिलेख कोलकाता के म्यूजियम में रखा हुआ है. जिस पहाड़ी पर यह अवशेष पाए गए उसे बीजक की पहाड़ी कहते हैं ( बीजक = अभिलेख ).

5. बुद्ध कालीन भारत में अर्थात सामान्य युग से 600 वर्ष पहले वाले युग में, उत्तर भारत में सोलह जनपद हुआ करते थे जिनमें से एक था मत्स्य जनपद या मत्स्य देश। इस मत्स्य जनपद में अलवर, जयपुर और भरतपुर के कुछ हिस्से शामिल थे. इस जनपद की राजधानी विराट नगर हुआ करती थी और इस जनपद की एक सीमा एक ओर कुरु देश की राजधानी इंद्रप्रस्थ से और दूसरी ओर शूरसेन जनपद से मिलती थी. शूरसेन जनपद की राजधानी मधुरा ( आजकल मथुरा ) थी. मत्स्य जनपद का नाम भगवान् बुद्ध के प्रवचन 'जनवसभ सुत्त' ( दिग्घ निकाय सुत्त 18 ) में भी आया है. 

6. बैराट के बारे में चीनी बौद्ध यात्री हुएन त्सांग ने भी अपने संस्मरण The Great Tang Dynasty Record of the Western Regions में बैराट का जिक्र किया है. वह मथुरा जाते हुए सन 634 के आसपास यहाँ आया था. उसने लिखा है की यहाँ आठ बौद्ध विहार थे जो खस्ता हाल में थे और कुछ भिक्खु यहाँ रह रहे थे जो हीनयान बौद्ध धर्म का अध्ययन कर रहे थे. इसके अलावा हुएन त्सांग ने लिखा है की यहाँ दस देव मंदिर भी थे और एक हजार से ज्यादा देव भक्त भी रहते थे. 

7. एक और ऐतिहासिक जिक्र अबू रशीद का है जिसने बताया की 1009, 1014 और 1022 में महमूद गज़नी के हमले यहाँ भी हुए और उसके सिपहसालार आमिर अली ने 1022 में खूब लूटपाट की और शहर हथिया लिया। ये बात एलेग्जेंडर कन्निंघम ने 1862-63-64 और 65 की रिपोर्ट में दर्ज की है. 

8. बीजक पहाड़ी दो सौ फ़ीट ऊँची है जिस पर दो सपाट तल बनाए गए हैं. इनमें से एक तल पर गोल बौद्ध मंदिर या चैत्य बनाया गया और आसपास भिखुओं के रहने के लिए कमरे बनाए गए थे. कमरे और दीवारों के लिए बड़े साइज की पकाई हुई ईंटें इस्तेमाल की गई हैं. 

9. यहाँ मिले अशोक अभिलेख को कोलकाता में रखा गया है और उसका नाम Kolkata-Bairat Minor Rock Edict III है. अभिलेख का अनुवाद इस प्रकार है जो कि इस किताब से लिया गया है:

'The Edicts of King Asoka' by Ven. S. Dhammika.

'Piyadasi, King of Magadha, saluting the Sangha and wishing them good health and happiness, speaks thus: You know, reverend sirs, how great my faith in the Buddha, the Dhamma and the Sangha is. Whatever, reverend sirs, has been spoken by Lord Buddha, all that is well-spoken. I consider it proper, reverend sirs, to advise on how the good Dhamma should last long.

'These Dhamma texts- Extracts from the Discipline, the Noble Way of Life, the fears to Come, the Poem on the Silent Sage, the Discourse on the Pure Life, Uptisa's Questions, and the advice to Rahula, which was spoken by the Buddha concerning false speech - these Dhamma texts, reverend sirs, I desire that all the monks and nuns may constantly listen to and remember. Likewise the laymen and laywomen. I have had this written that you may know my intentions'.

10. इस अभिलेख की खोज कप्तान बर्ट ने 1840 में की थी. इस अभिलेख को भब्रु या भाबरा अभिलेख भी कहा जाता था. अभिलेख की नक़ल और अनुवाद मरख़म किट्टो ने पंडित कमल कांत की सहायता से किया था. बाद में इस अनुवाद को एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल के जर्नल में भी प्रकाशित किया गया था. यहाँ पुरातत्व विभाग की खुदाई में मिट्टी के दिये, घड़े और बर्तन भी प्राप्त हुए थे. अभिलेख की भाषा प्राकृत है और लिपि ब्राह्मी। 

ऐतिहासिक स्थान होते हुए भी यहाँ बहुत कम सैलानी यहाँ आते हैं. बीजक पहाड़ी ग्रामीण इलाके में है और आसपास कोई रेस्तरां नहीं है बस एक चाय की टपरी है. वैसे आप दिन में कभी भी जा सकते हैं पर कोई गाइड नहीं है. पहाड़ी पर एक मंदिर भी बना है. बनावट देख कर लगता है की बाद में बनाया गया होगा। जब हम पहुंचे तो वहां भी कोई पुजारी या अन्य व्यक्ति नहीं था. चढ़ाई चढ़ने के लिए एक रैंप - रास्ता- बना दिया गया है. दोपहर में तीखी धूप और गर्मी हो जाती है. जाने से पहले पानी की व्यवस्था कर लें. 

कुछ फोटो प्रस्तुत हैं.

गोलाकार बौद्ध चैत्यगृह 


बीजक की पहाड़ी पर बौद्ध विहार के अवशेष 

यहाँ पर शायद भिक्खुओं के रहने का स्थान होगा 

सम्राट अशोक के समय की पकाई हुई ईंटें इस्तेमाल की गई हैं 

प्राचीन ईंटों का साइज अलग है 

नोटिस बोर्ड 

ऐसा लगता है चट्टान पर की बैठने की जगह बनाई हो 

आसपास ऐसी बड़ी बड़ी चट्टानें और पत्थर हैं 

आसपास की पहाड़ियां 

नोटिस बोर्ड 

भारी भरकम चट्टान जिसे स्थानीय लोग 'तोप' चट्टान कहते हैं 

चट्टानों का एक दृश्य। यहाँ स्तूप के अवशेष मिले
 
      
सम्राट अशोक के अभिलेख की प्रति ब्राह्मी लिपि में 


'तोप' चट्टान के नीचे बना मंदिर 





झालरा पाटन

झालरापाटन या पाटन एक रियासत थी जो हाड़ौती क्षेत्र, राजस्थान में आती थी. हाड़ौती में झालावाड़, कोटा, बारां और बूंदी शामिल थे. झालरा पाटन और झालावाड़ जुड़वां शहरों की तरह हैं. झालरा पाटन के पूर्व में चंद्रभागा नदी है और ये शहर पहले बड़ा व्यापारिक केंद्र हुआ करता था.  

झालावाड़ की स्थापना 1791 में झाला ज़ालिम सिंह ने की थी जो कोटा रियासत के दीवान थे. उस वक़्त ये जगह छावनी उम्मेदपुरा कहलाती थी. 1838 में झालावाड़ को कोटा से अलग कर दिया गया. उसके बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी झालावाड़ से सालाना आठ हज़ार रूपए की चौथ या ट्रिब्यूट की वसूली करती थी! इस छोटी सी रियासत में झाला मदन सिंह, झाला पृथ्वी सिंह और राणा भवानी सिंह ने राज किया।

आस पास के इलाके में काफी बारिश होती है इसलिए यहाँ ताल तल्लैय्या हैं और चंद्रभागा नदी के अलावा छोटी नदियां जैसे कालीसिंध और आहु भी हैं. इसलिए सारा क्षेत्र हरा भरा रहता है और ख़ास तौर पर मानसून में बहुत सुन्दर हो जाता है. पाटन बहुत बड़ा नहीं है और ऑटो ले कर घुमा जा सकता है. पतन और झालावाड़ में बहुत से दर्शनीय स्थान हैं जिनमें से कुछ की फोटो प्रस्तुत हैं. 

1. सूर्य मंदिर का शिखर जिस के बाहर और अंदर दोनों तरफ सुन्दर नक्काशी है. फूल पत्तों के अलावा, यक्ष-यक्षिणी, और देवी-देवताओं का सुन्दर चित्रण है. मंदिर झालरा पाटन शहर के बीच भीड़ भाड़ वाले बाजार में बना हुआ है.

2. सूर्य मंदिर 11वीं / 12वीं शताब्दी में बना बताया जाता है. कहा जाता है कि इस मंदिर के आगे पत्थर का रथ भी बना हुआ था जो अब नहीं है

3. लाल बलुआ पत्थरों से बने खम्बों पर भी सुन्दर मूर्तियां उकेरी गई हैं. 

4. ये भाग बाद में 19वीं शताब्दी में जोड़ा गया है.
 
5. मंदिर के तीन प्रवेश द्वार हैं जिन पर सुन्दर तोरण बनी हुई हैं 

6. मंदिर के गर्भगृह में विष्णु की मूर्ति है जिसे 19वीं शताब्दी में स्थापित किया गया था 

7. खम्बे पर नक्काशी 

8. झालावाड़ में राजस्थान सरकार का संग्रहालय भी है जहाँ आस पास की खुदाई में निकलीं मूर्तियां भी रखी गई हैं. ये मूर्ति शीतला देवी की है जिनकी सवारी गर्दभ है

9. अर्धनारीश्वर की सुन्दर प्रतिमा। शिव और शक्ति का एक ही शरीर में मिलन 

10. चामुण्डा जिसे देखते ही भय उत्पन्न हो जाए. असुरों के सेनापतियों चण्ड और मुण्ड का वध करके चामुण्डा कहलाई

11. सिद्धपीठ आनंद धाम का मुख्य द्वार। यह मंदिर नौलखा किले के अंदर स्थित है

12. नौलखा किले का एक भाग 

13. नौलखा किला बहुत बड़ा नहीं है. इसे झाला पृथ्वी सिंह द्वारा 1860 में बनवाया गया था

14. नौलखा किला बनवाने में नौ लाख रूपए खर्च हुए थे इस कारण से इसका नाम नौलखा किला रख दिया गया


15. द्वारकाधीश झाला राजपूतों के कुल देवता थे. यह द्वारकाधीश मंदिर झाला ज़ालिम सिंह ने 1800 के आस पास बनवाया था. 

16. द्वारकाधीश मंदिर से लगा गोमती सागर 

 
17. चंद्रभागा नदी पर बना घाट. इस नदी को पहले चंद्रावती भी कहा जाता था. इसके किनारे बसे  शहर को चंद्रावती नगरी कहा जाता था. यहाँ आठवीं शताब्दी के कुछ मंदिर भी हैं जिन्हें मालवा नरेश ने बनवाया था 


18. आठवीं शताब्दी का शिव मंदिर 

19. मंदिर परिसर में 

20. मंदिर परिसर में प्राचीन चौखम्बा 

21. बाय बाय झालावाड़ कहने से पहले गागरों किला भी देखना है 

सुख महल और रुडयार्ड किपलिंग

बूंदी से कुछ ही दूर सुख महल है. ये छोटा सा महल या शिकारगाह जैत सागर झील के किनारे है जिसे राजा विष्णु सिंह ने 1776 में बनवाया था. बूंदी राज्य के दीवान और वास्तुविद सुखराम की देख रेख में महल बनवाया गया था इसलिए इसका नाम सुख महल रख दिया गया. सुन्दर, शांत और मनोरम जगह है ये. आस पास के घने जंगल में शिकार करने शाही परिवार आया करता था. ऑटो वाला लगभग बीस मिनट में पहुंचा देगा और कार में कुछ ज्यादा समय लगेगा।

सुख महल की प्रसिद्धि का एक और कारण रुडयार्ड किपलिंग भी हैं. रुडयार्ड किपलिंग ( 1865 - 1936 ) ब्रिटिश लेखक, कवि, लघु कथाकार और पत्रकार थे और इस सुख महल में 1899 में दो दिन रहे थे. किपलिंग का जन्म मुंबई में हुआ था और पढ़ाई लिखाई इंग्लैंड में. उनकी लघु कथाएं काफी लोकप्रिय हुईं थीं और 'जंगल बुक' उनकी लोकप्रिय पुस्तक है. वाल्ट डिसने ने इस किताब पर फिल्म भी बनाईं वो भी खूब पसंद की गई. कुछ लोगों का ख्याल है की यहाँ किपलिंग ने 'जंगल बुक' लिखी और कुछ का कहना है की यहाँ 'किम' लिखी जिस पर बाद में हॉलीवुड में फिल्म भी बनी. बहरहाल किपलिंग को यहाँ सुख महल में राजा रजवाड़ों और शिकार के बारे में काफी किस्से कहानियां सुनने को मिली होंगी। 

सुख महल परिसर में एक संग्रहालय भी बनाया गया है जिसमें बूंदी और आस पास से मिली मूर्तियाँ और हथियार औज़ार भी रखे गए हैं. ज्यादातर वस्तुएं दसवीं शताब्दी से लेकर सत्रहवीं शताब्दी से सम्बंधित हैं. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

1. सुख महल का शानदार नज़ारा। मन को शांति और ठंडक देने वाला

2. ये झील तीन तरफ से पहाड़ियों से घिरी हुई है जिन पर घने जंगल हैं इसलिए ये राजा सा की शिकारगाह भी थी 

3. झील में कमल के पौधों की भरमार है. ऋतु आने पर एक साथ खिलते होंगे तो और भी अच्छा लगता होगा 

 
4. सुख महल 

 
5. सुख महल 

 
6. सुख महल 


7. सुख महल के बगीचे में बनी सुन्दर बारादरी 

8. गणेश नृत्य करते हुए. नीचे पैरों के पास संगीतकार भी हैं - दसवीं शताब्दी   

9. इन्द्र अपनी पत्नी के साथ - बारहवीं शताब्दी 

10. सप्त मातृका पैनल का टुटा हुआ भाग - बारहवीं शताब्दी 

11. प्रेमी युगल और राजा रानियों की मूर्तियां - दसवीं शताब्दी  

12. पुरानी पिस्तौल 


13. ढाल और छोटे हथियार 


14. जैत सागर में नागरी शैली में बना मंदिर 

 जैसलमेर किला

जैसलमेर का किला भाटी राजपूत महाराजा जैसल द्वारा 1156 में बनवाया गया था. थार रेगिस्तान में बसा जैसलमेर शहर जयपुर से लगभग 560 किमी दूर है और दिल्ली से 780 किमी. रेगिस्तान होने के कारण गर्मियों में तापमान 50 के नज़दीक पहुँच जाता है और सर्दियों में शून्य के नज़दीक पहुँच सकता है. एक पुरानी कहावत जैसलमेर के हालात बयान करती है:

बख्तर कीजे लोहे का,
पग कीजे पाषाण !
घोड़ा कीजे काठ का,
तब देखो जैसान !

याने यात्री कपड़ों के बजाए लोहे का बख्तर पहन लें जो ना मैला हो और ना फटे, पैर पत्थर के बना लें जो तपती रेत में झुलसे नहीं और ना ही थकें, घोड़ा लकड़ी का ले लें जो ना कभी थके और ना पानी मांगे और तब जैस्सल राजा का स्थान देखने निकलें ! अब बख्तर और घोड़ा तो पुरानी बात हो गई पर आप जैसलमेर जाते समय अपनी गाड़ी का कूलैंट और ए.सी. जरूर चेक कर लें !

अठारहवीं सड़ी तक इराक, ईरान, अफगानिस्तान, चीन जैसे देशों से व्यापारी ऊँटों के कारवां लेकर चलते थे और जैसलमेर सिल्क रूट के व्यापारियों का एक पड़ाव था. अफीम, सोने, चांदी, हीरे जवाहरात, सूखे मेवों वगैरा का व्यापार हुआ करता था. यहाँ के राजा इन व्यापारियों से टैक्स वसूला करते थे. 

त्रिकुटा पहाड़ी पर बने किले की चौड़ाई 750 फुट है और लम्बाई 1500 फुट. त्रिकुटा पहाड़ी की ऊंचाई जमीन से लगभग 250 फुट है. किला बनने के बाद 1276 में और फिर 1306 में किले की मरम्मत हुई और कई बदलाव किये गए. किले की सुरक्षा के लिए चारों ओर तीन ऊँची और चौड़ी दीवारों का घेरा है. चार बड़े दरवाज़े हैं और पचास से ज्यादा बुर्जियां और परकोटे हैं. इनमें साढ़े तीन हज़ार से ज्यादा सैनिक रहते थे. 

किले के अंदर महल हैं, दुकानें हैं, सात जैन मंदिर हैं, पचास के करीब रेस्तरां हैं और लगभग 4000 लोग अब भी रहते हैं. इसलिए ये किला 'जीता जागता' किला है! 2013 में इसे World Heritage Site बना दिया गया है. किले में स्थानीय हलके पीले पत्थर का खूब प्रयोग किया गया है. सुबह और शाम के सूरज की किरणों में ये पत्थर सुनहरे लगते हैं जिसके कारण इस किले को सोनार किल्ला भी कहा जाता है. 
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

किले के अंदर महल 

प्रवेश द्वार 

प्रवेश से पहले पूजा 

संकरा रास्ता और ऊपर रक्षा चौकियां 

सुंदर कारीगरी - लक्ष्मी नाथ जी का मंदिर 

किले की संकरी गलियाँ 

किले की दीवार से नज़र आता शहर 

जैन मंदिर 
जैन मंदिरों की नक्काशी अद्भुत है 


जैन मंदिर की दीवार 

जैन मंदिर कमाल की कारीगरी 

नीचे एक दुकान और ऊपर ख़ास राजस्थानी शैली में छज्जा 

ऊँची नीची राहें 

किले के निवासियों की महफ़िल 

गाइड के साथ गपशप 

तोप के बगैर तो किला अधूरा है 

प्रवेश के पास किले की दीवार. ढलान पर रोड़े पत्थरों का ढेर सुरक्षा के लिए अच्छा है  

 मेहरानगढ़, जोधपुर - 1

थार रेगिस्तान में बसा जोधपुर अब दस लाख से ज्यादा आबादी वाला महानगर है. इस क्षेत्र का ऐतिहासिक नाम मारवाड़ है. दिल्ली से इस शहर की दूरी 615 किमी है और जयपुर से 354 किमी. अक्टूबर से फरवरी मौसम पर्यटन के लिए अच्छा है. जोधपुर रेल, सड़क और हवाई सेवा से भली प्रकार जुड़ा हुआ है.

शहर से 125 मीटर ऊँची पहाड़ी पर किला है जिसका नाम मेहरानगढ़ है. पुराना शहर इसी किले के तलहटी में बसा हुआ है. इस किले की नींव राव जोधा द्वारा 12 मई 1459 को रखी गई थी. यह भीमकाय किला लगभग पांच वर्ग किमी में फैला हुआ है. इसकी ऊँची, चौड़ी और मज़बूत दीवारों की लम्बाई लगभग 10 किमी है. महाराजा जसवंत सिंह (1638 - 1678) के समय किले का काम पूरा हुआ था.

किले के आठ बड़े गेट या पोल हैं इनमें से एक गुप्त है और चार घुमावदार पहाड़ी सड़कों से जुड़े हुए हैं. जयपोल महाराजा मान सिंह ने 1806 में जयपुर और बीकानेर पर जीत के बाद बनवाया था. फ़तेहपोल महाराजा अजीत सिंह ने 1707 में मुग़लों को हराने के बाद बनवाया था.

किले के अंदर कई सुंदर महल हैं जैसे मोती महल, फूल महल, शीश महल. साथ ही दौलत खाना, सिलेह खाना, तोप खाना वगैरा भी हैं. बहुत बड़े भाग में म्यूजियम है जहां अपने समय के सुंदर और शानदार शाही कपड़े, फर्नीचर, कालीन, हथियार, पालकियां, हौदे आदि रखे गए हैं. किले के अंदर की ऊँचाई सात आठ माले के बराबर है. लिफ्ट का भी इन्तेजाम है और अंदर ही बहुत सुंदर दस्तकारी की दुकानें भी हैं. लिफ्ट और म्यूजियम के प्रवेश के लिए टिकट हैं.

भारत के प्राचीन किलों में सबसे सुंदर रख रखाव शायद इसी किले का है. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

विशालकाय, मजबूत और सुंदर 

किले की पूर्वी दीवार. चट्टान पर स्थित मजबूत और भरी भरकम पत्थरों से बनी हुई 

मोरनुमा विशाल किला - मेहरानगढ़ 

किले के अंदर का एक दृश्य. अलग अलग रंग के पत्थरों का सुंदर उपयोग  

किले के अंदर की मजबूत विशाल दीवार 

तोपचियों का निवास और गोला बारूद रखने की जगह. ऊपर छत पर तोपें हैं 

किले की दीवार पर सुरक्षा के लिए तोपें 

किला भी देखिये और संगीत का भी आनंद लीजिये 

सरदार मार्किट से मेहरानगढ़ का एक दृश्य 

 मेहरानगढ़ जोधपुर - 2/3

जोधपुर अब दस लाख से ज्यादा आबादी वाला महानगर है. दिल्ली से इस शहर की दूरी 615 किमी है और जयपुर से 354 किमी. जोधपुर रेल, सड़क और हवाई सेवा से भली प्रकार जुड़ा हुआ है. थार रेगिस्तान में होने के कारण दिन में तेज़ धूप होती है और रात में ठंडक. पर्यटन के लिए अक्टूबर से मार्च अच्छा है.  

शहर के बीच एक ऊँची पहाड़ी है जिसका पुराना नाम भोर चिरैय्या था. इस 125 मीटर ऊँची पहाड़ी पर एक किला है जिसका नाम मेहरानगढ़ है. इस किले की नींव राव जोधा द्वारा 12 मई 1459 को रखी गई थी. यह भीमकाय किला लगभग पांच वर्ग किमी में फैला हुआ है. इसकी ऊँची, चौड़ी और मज़बूत दीवारों की लम्बाई लगभग 10 किमी है. महाराजा जसवंत सिंह (1638 - 1678) के समय किले का काम पूरा हुआ था. 

किले के आठ बड़े गेट या पोल हैं इनमें से एक गुप्त है और चार घुमावदार पहाड़ी सड़कों से ऐसे जुड़े हुए हैं की दूर से किले के गेट या पोल दिखते ही नहीं हैं. फ़तेहपोल महाराजा अजीत सिंह ने 1707 में मुग़लों को हराने के बाद बनवाया था जबकि जयपोल महाराजा मान सिंह ने 1806 में जयपुर और बीकानेर पर जीत की खुशी में बनवाया था.

किले के अंदर कई सुंदर महल हैं जैसे मोती महल, फूल महल, शीश महल. साथ ही दौलत खाना, सिलेह खाना, तोप खाना वगैरा भी हैं. बहुत बड़े भाग में म्यूजियम है जहां अपने समय के सुंदर और शानदार शाही कपड़े, फर्नीचर, कालीन, हथियार, पालकियां, हौदे आदि रखे गए हैं. किले के अंदर की ऊँचाई सात आठ माले के बराबर है. लिफ्ट का भी इन्तेजाम है और अंदर ही बहुत सुंदर दस्तकारी की दुकानें भी हैं. लिफ्ट और म्यूजियम के प्रवेश के लिए टिकट हैं. 

किले की व्यवस्था और रख रखाव बहुत सुंदर है. कुछ फोटो प्रस्तुत हैं:

छोटे छोटे झरोखे और सुंदर छज्जे ख़ास राजस्थानी अंदाज़ में 

महल में इस तरह की कई छतरियां या स्मारक हैं  जो उन शूरवीरों की याद में बनाई गईं जिन्होंने महल की सुरक्षा में जान दे दी 

गणेश मंदिर और एक दूसरी छतरी 

पथरीली चट्टान पर एक स्मारक 

महल के दो भागों को जोड़ता हुआ छज्जा

किला ऊपर और शहर नीचे या दूसरे शब्दों में राजा ऊपर और प्रजा नीचे 

स्थानीय पत्थर पर शानदार नक्काशी 

महल के बीच  आँगन 

ऊँचाई से शहर पर नज़र 

महल का एक और आँगन 

महल की खिड़कियाँ और नीचे नज़र आता शहर 

महल के इस हिस्से में छोटे बच्चे रहते थे. छोटे राजकुमार के लिए छोटा सिंहासन  

गढ़ के कोने में एक बुर्ज 

पर्यटक 


मेहरानगढ़ पर फोटो ब्लॉग का पहला भाग इस लिंक पर उपलब्ध है:
http://jogharshwardhan.blogspot.com/2017/06/1.html

 मेहरानगढ़ जोधपुर - 3/3

जोधपुर अब दस लाख से ज्यादा आबादी वाला महानगर है. दिल्ली से इस शहर की दूरी 615 किमी है और जयपुर से 354 किमी. जोधपुर रेल, सड़क और हवाई सेवा से भली प्रकार जुड़ा हुआ है. थार रेगिस्तान में होने के कारण दिन में तेज़ धूप होती है और रात में ठंडक. पर्यटन के लिए अक्टूबर से मार्च अच्छा है.  

शहर के बीच एक ऊँची पहाड़ी है जिसका पुराना नाम भोर चिरैय्या था. इस 125 मीटर ऊँची पहाड़ी पर एक किला है जिसका नाम मेहरानगढ़ है. इस किले की नींव राव जोधा द्वारा 12 मई 1459 को रखी गई थी. यह भीमकाय किला लगभग पांच वर्ग किमी में फैला हुआ है. इसकी ऊँची, चौड़ी और मज़बूत दीवारों की लम्बाई लगभग 10 किमी है. महाराजा जसवंत सिंह (1638 - 1678) के समय किले का काम पूरा हुआ था. 

किले के आठ बड़े गेट या पोल हैं इनमें से एक गुप्त है और चार घुमावदार पहाड़ी सड़कों से ऐसे जुड़े हुए हैं की दूर से किले के गेट या पोल दिखते ही नहीं हैं. फ़तेहपोल महाराजा अजीत सिंह ने 1707 में मुग़लों को हराने के बाद बनवाया था जबकि जयपोल महाराजा मान सिंह ने 1806 में जयपुर और बीकानेर पर जीत की खुशी में बनवाया था.

किले के अंदर कई सुंदर महल हैं जैसे मोती महल, फूल महल, शीश महल. साथ ही दौलत खाना, सिलेह खाना, तोप खाना वगैरा भी हैं. बहुत बड़े भाग में म्यूजियम है जहां अपने समय के सुंदर और शानदार शाही कपड़े, फर्नीचर, कालीन, हथियार, पालकियां, हौदे आदि रखे गए हैं. किले के अंदर की ऊँचाई सात आठ माले के बराबर है. लिफ्ट का भी इन्तेजाम है और अंदर ही बहुत सुंदर दस्तकारी की दुकानें भी हैं. लिफ्ट और म्यूजियम के प्रवेश के लिए टिकट हैं. 

किले की व्यवस्था और रख रखाव बहुत सुंदर है. कुछ फोटो प्रस्तुत हैं:



1. महल का आँगन. खुबसूरत वास्तु कला और बेमिसाल कारीगरी. गर्म और सर्द दोनों मौसमों के अनुकूल   

2. नीचे आम रास्ता और ऊपर ख़ास रास्ता 

3. चट्टानों के बीच द्वार. देखिये कैसे बड़े बड़े पत्थरों पर सात आठ मंजिलों के बराबर निर्माण किया गया  

4. किले में बहुत से मंदिरों में से एक मुख्य मन्दिर है चामुंडा माता का 

5. चबूतरे, दरवाज़े, खम्बों और छज्जों पर बारीक फूल बूटों की नक्काशी

6. ऊँचे मेहराबों से जुड़े गलियारे. ठन्डे और आरामदेह  

7. शानदार नक्काशी वाले झरोखे, खिड़कियाँ और कंगूरे 

8. किला और नीचे शहर 

9. किले की दीवारों पर बहुत सी तोपों में से एक 

10. ऊँची ऊँची दीवारें और उनसे ऊँचा महल खास राजस्थानी अंदाज़ में 

11. झरोखे 

12. धातु में बना किले का मॉडल 

 करणी माता मंदिर, बीकानेर

बीकानेर गए तो पता लगा कि लगभग 30 किमी दूर देशनोक नामक स्थान पर करणी माता का मंदिर है. ये एक ऐसा मंदिर है जहाँ हजारों चूहे घूमते रहते हैं. हम तो घर में एक भी चूहा घुस आए तो डंडा लेकर मारने दौड़ते हैं और यहाँ इस मंदिर में हजारों चूहे? मन में पहले तो अविश्वास हुआ फिर देखने की इच्छा हुई. पहले इंटरनेट पर देखा और फिर जाना तय कर लिया. वैसे करणी माता के दो और मशहूर मंदिर भी हैं एक अलवर में बाला किले के पास और दूसरा उदयपुर में माछला पहाड़ी पर. पर यह मूषक मंदिर अपने चूहों के कारण ज्यादा चर्चा में रहता है.

बीकानेर से देशनोक जाने के लिए सड़क अच्छी है और बसें, टैक्सी आसानी से उपलब्ध हैं. मंदिर की बड़ी मान्यता है इसलिए बहुत से भक्त और साधक आते जाते रहते हैं. रुकने के लिए मंदिर के आस पास धर्मशालाएं भी हैं. साल में दो बार नवरात्रों में यहाँ मेले भी लगते हैं.

सफ़ेद संगमरमर से बना मंदिर आकर्षक है और राजस्थानी / मुग़ल शैली में की गई नक्काशी बहुत सुंदर हैं. मंदिर का निर्माण कार्य बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने पंद्रहवीं शताब्दी में शुरू कराया था. मंदिर में चांदी के पत्रे वाले दरवाज़े हैं उन पर भी चूहे बने हुए हैं. मंदिर में चूहों के लिए चांदी की प्लेटें हैं जिनमें पीने के लिए दूध डाल दिया जाता है. मजेदार बात ये है कि मंदिर के बाहर चूहे नजर नहीं आते. मंदिर के चूहों को काबा कहा जाता है. प्लेग जैसी कोई दुर्घटना भी यहाँ कभी नहीं हुई जबकि ये चूहे प्रशाद में भी घुसे रहते हैं!

करणी माता को माँ जगदम्बा का अवतार माना जाता है. कहा जाता है की करणी माता के आशीर्वाद से बीकानेर और जोधपुर रजवाड़ों की स्थापना हुई. बीकानेर राजघराने की कुलदेवी भी करणी माता ही हैं.

करणी माता का जन्म 1387 में चारण राजपूत परिवार में हुआ और इनका बचपन का नाम रिघुबाई था. इनकी शादी दीपोजी चारण से हुई जबकि इनकी वैवाहिक जीवन में रूचि नहीं थी. इन्होनें अपनी छोटी बहन गुलाब की शादी अपने पति से करवा दी ताकि पति का वैवाहिक जीवन चलता रहे. दो साल ससुराली गाँव में रहने के बाद बंजारों का जीवन शुरू कर दिया. पशुओं और कुछ भक्तों के साथ जंगलों में चरवाहों की ज़िन्दगी व्यतीत करने लगी. पशु चराते चराते जहां रात हुई वहीं छावनी डाल दी जाती थी.

एक बार इनका काफिला जांगलू नामक गाँव में पहुंचा. इस इलाके का शासक राव कान्हा था. शासक के कारिंदों नें पानी पीने और पशुओं को पिलाने से मना कर दिया. करणी माता ने अपने एक अनुयायी राव रिदमल को वहां का शासक नियुक्त कर दिया. राव कान्हा और उनके सैनिकों ने करणी माता का विरोध किया और भला बुरा कहा. करणी माता ने एक रेखा खिंची और राव कान्हा से रेखा पार ना करने के लिया कहा. पर वो ना माना और वह परलोक सिधार गया.

सन 1453 में राव जोधा ने करणी माता के आशीर्वाद से अजमेर, मंडोर और मेड़ता के इलाकों को जीत लिया था. राव जोधा के बुलावे पे करणी माता ने जोधपुर किले का नींव पत्थर 1457 में रखा.

वैसे तो करणी माता का पहला मंदिर उनके जीवन काल में अमर चारण द्वारा 1472 में ही बना दिया गया था. इसी साल में करणी माता ने राव बिका ( जिन्होनें बीकानेर बसाया ) की शादी रंग कुंवर से करवा दी. रंग कुंवर राव शेखा की बेटी थी जो भाटियान राजपूत थे. ऐसा करने से बहुत देर से चली आ रही राठोड़ - भाटियान परिवारों की दुश्मनी समाप्त हो गई. 1485 में करणी माता ने बीकानेर किले का नींव पत्थर रखा.

मंदिर में चूहे होने का एक किस्सा आसपास के दुकानदारों ने बताया कि किसी लड़ाई में हार के कारण 20000 सैनिकों का एक जत्था मैदान छोड़ कर भाग कर करनी माता की शरण में आया. जंगी मैदान छोड़ने की सजा तो मौत थी और ये लोग बचना चाहते थे. करणी माता ने कहा कि बचना है तो चूहे बन कर रहना होगा. तभी से यहाँ चूहे घूम रहे हैं और मंदिर परिसर के बाहर नहीं दिखते हैं.

मार्च 1538 में करणी माता महाराजा जैसलमेर से मिलकर बीकानेर की ओर वापिस आ रही थीं. रास्ते में कोलायत तहसील के गडियाला गाँव के पास पानी पीने के लिए पड़ाव डाला गया. इस पड़ाव के बाद वे ज्योतिर्लीन हो गईं और फिर कभी देखी नहीं गईं. उस वक़्त उनकी उम्र 151 साल बताई जाती है. तब से ही लगातार उनकी पूजा अर्चना की जा रही है.

प्रस्तुत हैं कुछ फोटो :


करणी माता मंदिर, देशनोक, बीकानेर  

मुख्य द्वार के दाहिनी ओर संगमरमर पर नक्काशी 

मुख्य द्वार के बाईं ओर नक्काशी. झरोखे पर चांदी के पल्ले चढ़े हुए हैं और उस पर भी चूहे बने हुए हैं 

 द्वारपाल 

दूसरा द्वारपाल सो रहा है. सुंदर बना है पर पता नहीं सोता हुआ क्यूँ बनाया 

 मंदिर का आँगन जालियों से ढका हुआ है ताकि चील या गिद्ध जैसे पक्षी चूहों का शिकार न कर सकें  

प्रशाद बनाने के कढ़ाहे 

मंदिर के बाईं ओर का चांदी का दरवाज़ा 

बताया जाता है की लगभग बीस हज़ार चूहे मंदिर में रहते हैं. अगर आप को सफ़ेद चूहा दिखे तो आप किस्मत वाले हैं 

चांदी के परात में दूध. चूहों की बड़ी तादाद के कारण इसे चूहों का मंदिर भी कहा जाता है  

दूध पीते चूहे. मंदिर में चलते हुए ध्यान से पैर रखें. बल्कि पैर घसीट कर चलें. आप के पैर के आसपास घूम रहे चूहों में से कोई दब ना जाए. दबने का मतलब है अपशगुन. अगर दब कर मर गया तो बदले में चांदी का बना चूहा दान करना होगा 

कबूतरों से बचने के लिए जालीयां भी लगी हुई है पर फिर भी चुग्गा दाना ढूंढते ढूंढते कबूतर अंदर स्टोर में भी पहुँच जाते हैं.   

दर्शानर्थी

 थार की सड़कों पर - 2

थार रेगिस्तान का एक बड़ा भाग लगभग 60 % राजस्थान में है और कुछ गुजरात, हरयाणा और पंजाब को भी छूता है. बाकी हिस्सा बॉर्डर के पार है. यह भारत का सबसे बड़ा और विश्व का सातवें नंबर का रेगिस्तान है. बारिश बहुत कम होती है और तापमान सर्दी में 0 डिग्री या उस से भी कम और गर्मी में 50 के ऊपर भी जा सकता है.

पानी कम है इसलिए खेती कम है और इसलिए जनसँख्या भी कम है. सड़क पर मीलों तक कोई दिखाई नहीं पड़ता और गाँव भी बहुत दूर दूर हैं. उत्तर प्रदेश में हर पचास किमी पर शहर आ जाता है. केरल की ड्राइव और भी धीमी है क्यूंकि आबादी के साथ साथ पहाड़ी इलाका भी ज्यादा है. जबकि राजस्थान के इस रेगिस्तानी भाग में 250 - 300 किमी से पहले कोई बड़ी आबादी नहीं मिलती.

थार मरुस्थल के मुख्य शहर हैं झुंझनु, नागौर, बीकानेर, जैसलमेर और जोधपुर. सड़कें ज्यादातर अच्छी हैं और उनकी चौड़ाई बढ़ाई जा रही है. मुख्य हाईवे से अंदर गाँव की ओर जाने वाले रास्ते उतने अच्छे नहीं हैं. अपनी गाड़ी से जाएं तो हवा, तेल, पानी जरूर चेक कर लें. कुछ खाने का सामान और पीने का पानी साथ रखें क्यूंकि ढाबे बहुत दूर दूर मिलेंगे और हो सकता पानी खारा मिले. खाली सड़कों पर स्पीड जल्द ही 100 के पार हो जाती है पर गाय, भेड़, बकरी, नीलगाय और जंगली ऊँटों का ध्यान रखना होगा. जोधपुर और जैसलमेर के आसपास हिरन और चिंकारा भी नज़र आ जाते हैं.

हमने अपनी यात्रा नीचे दिए गए नक़्शे के मुताबिक 11 दिन में पूरी की. फोर्ड ईको डीज़ल गाड़ी इस्तेमाल की और कोई दिक्कत नहीं आई. सड़कों पर साइन बोर्ड काफी हैं और मोबाइल का GPS भी इस्तेमाल किया हालांकि कई जगह मोबाइल के सिग्नल नहीं आते. पूछने पर स्थानीय लोग प्यार से रास्ता और किले वगैरा की जानकारी दे देते हैं. अतिथि देवो भव: लागू है!

नीचे पेश की गई ज्यादातर फोटो चलती गाड़ी में से मोबाइल से ली गई हैं. इनमें कोई समय या विषय का क्रम नहीं है याने random हैं. जहां भी कोई चीज़ अच्छी लगी फोटो खींच ली. उम्मीद है पसंद आएंगी.


गडरिया और उसका विश्राम गृह 

रेत के टीले - sand dunes

थार मरुस्थल के यात्री - दिसम्बर / जनवरी में तेज़ ठंडी हवाएं चलती हैं जिससे दिन में भी गर्म कपड़ों की जरूरत पड़ती है 

हलकी से बारिश या तेज़ हवा से भी रेत के टीलों की शकल बदल जाती है 

मेरा गाँव मेरा देस - तपते रेत पर बसा एक गाँव.  

पोकरण - जैसलमेर रास्ते पर एक रेस्तरां जहाँ फिरंगी सैलानी भी थे. यहाँ लंच किया तो वेटर ने कहा कि प्लीज़ मेनू कार्ड फिरंगियों को ना दिखाएं रेट पता लग जाएगा! सबको डॉलर चाहिए   

मंडावा, जिला बीकानेर के पास एक मीठे पानी का कुआँ. इस तरह की बुर्जियां कुआँ होने का संकेत है 

लीजिये साब गाँव आ गया जिसका नाम है सोडा 

बहुत कठिन है डगर पनघट की 

पोकरण - भारत का पहला परमाणु परीक्षण 18 मई 1974 को यहीं हुआ. उसके बाद 11 और 13 मई 1998 को पांच और भूमिगत परमाणु परीक्षण यहीं हुए. एक गुमनाम गाँव अब तो विश्वविख्यात हो गया है 

सड़क के दायें बाएं, पहाड़ियों के ऊपर इस तरह के मंदिर जगह जगह मिल जाते हैं 

महिलाएं और बच्चे बस की इंतज़ार में 
जैन साध्वी जैसलमेर - बीकानेर मार्ग पर 

जैन साध्वी 

यात्रा मार्ग लगभग 2000 किमी - दिल्ली > मंडावा > बीकानेर > जैसलमेर(तनोट - लोंगेवाला) > जोधपुर > पुष्कर > दिल्ली 

 जैसलमेर की हवेलियाँ

बख्तर कीजे लोहे का,
पग कीजे पाषाण !
घोड़ा कीजे काठ का,
तब देखो जैसान !

ये पुरानी कहावत जैसलमेर की दशा बताती हैं. थार रेगिस्तान की भयंकर गर्मी या फिर कड़ाके की सर्दी और तेज़ धूल भरी हवाओं के थपेड़े यात्रियों को परेशान करते हैं. इसलिए यात्रियों को सलाह दी गई कि कपड़ों के बजाए लोहे का बख्तर पहन लें जो ना मैला हो और ना फटे, पैर पत्थर के बना लें जो तपती रेत में झुलसे नहीं और ना ही थकें, घोड़ा लकड़ी का ले लें जो ना कभी थके और ना पानी मांगे और तब जैस्सल राजा का स्थान देखने निकलें ! अब बख्तर और घोड़ा तो पुरानी बात हो गई पर आप जैसलमेर जाते समय अपनी गाड़ी का कूलैंट और ए.सी. जरूर चेक कर लें !

जैसलमेर शहर भाटी राजपूत महाराजा जैसल द्वारा 1178 में बसाया गया था. थार रेगिस्तान में बसा ये शहर जयपुर से लगभग 560 किमी दूर है और दिल्ली से 780 किमी. रेगिस्तान होने के कारण गर्मियों में तापमान 50 के नज़दीक पहुँच जाता है और सर्दियों में शून्य के नज़दीक पहुँच सकता है.

काफी लम्बे समय तक इराक, ईरान, अफगानिस्तान जैसे देशों से व्यापारी ऊँटों के कारवां लेकर चलते थे और जैसलमेर व्यापारियों का एक पड़ाव था. अफीम, सोने, चांदी, हीरे जवाहरात, सूखे मेवों वगैरा का व्यापार हुआ करता था. जैसलमेर के समृद्ध व्यापारियों ने अपने रहने के लिए सुंदर हवेलियाँ बना रखी थी. इन हवेलियों को अपने समय के सबसे सुंदर साजो सामान से सजाया जाता था. हर हवेली का डिजाईन, नक्काशी और रूप रंग अलग अलग था. तेज़ गर्मी और कड़ाके की ठण्ड को ध्यान में रखते हुए इनका निर्माण किया गया था. खम्बे, दरवाज़े, खिड़कियाँ, झरोखे सभी पर सुंदर और मनोहारी कारीगरी दिखाई पड़ती है. ज्यादातर स्थानीय हल्का पीला पत्थर इस्तेमाल किया जाता था. इसके अलावा मकराना का सफ़ेद संगमरमर और जोधपुर का हल्का गुलाबी बालू पत्थर भी काफी इस्तेमाल किया गया है.

दीवान नथमल की हवेली 1885 में बनी और अभी भी उनके वंशजों के पास ही है. पटवा हवेलियाँ 1805 में बनना शुरू हुई. सेठ घुम्मन चंद पटवा का ज़री याने ब्रोकेड का काम खूब चलता था. उन्होंने अपने पांच बेटों के लिए दस लाख रुपए की लागत से पांच हवेलियाँ बनवाई जो लगभग 50 सालों में बन कर तैयार हुईं. इन पांच हवेलियों में से पहली हवेली में संग्रहालय है और बाकी चार बंद पड़ी हैं. संग्रहालय में जाने के लिए टिकट लगता है और गाइड फीस देने पर उपलब्ध हैं.  गाइड ने बताया की बंद हवेलियाँ सरकार ने ले ली हैं. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

दीवान नथमल की हवेली. जैसलमेर के महारावल ( राजा - रावल और महाराजा - महारावल ) बैरिसाल ने 1885 में ये दो मंजिली हवेली बनवा कर दीवान को उपहार में दी. दाएं बाएँ दो हाथी खड़े हैं जो समाज में हवेलीदार का उंचा ओहदा दर्शाते हैं  

दीवान नथमल की हवेली  की ड्योढ़ी याने प्रवेश. दीवार, चबूतरे, खिड़कियों और छज्जों पर बारीक और बेहतरीन नक्काशी  

पटवा की हवेलियों में से दूसरी हवेली 

हवेलियों के बीच का दालान 

गली में निकले हुए बेहतरीन नक्काशी वाले छज्जे 

पटवा की एक हवेली का प्रवेश द्वार और तहखानों की खिड़कियाँ 

हवेली के नीचे से ऊपर तक सुंदर नक्काशी 

पतली गली के दोनों ओर हवेलियाँ होने के कारण गली में भीषण गर्मी में भी ठंडक बनी रहती है 

पटवा की चौथी हवेली 

हवेलियों के बीच की पतली गली 

हवेली का संग्रहालय - नाप तौल का सामान. तोला, मासा, रत्ती से लेकर २० सेर तक के बाट. छोटे बाट से अफीम, सोना और चांदी जैसी चीज़ तोली जाती थी  

हवेली की महिलाओं के लिए साज सिंगार के बक्से और अन्य सामान 

तीसरी मंजिल पर बने नक्काशीदार सुंदर झरोखे और पर्यटक 

दीवान खाने में बहुत सी पेंटिंग लगी हैं. जलपान में इस्तेमाल किये जाने वाले बर्तन 

हवेली जाने का रास्ता. पूरा पुराना शहर आप पैदल भी घूम सकते हैं 

हवेली के पास देसी दूकानदार और फिरंगी खरीदार. दोनों को एक दूसरे की भाषा नहीं आती पर मोल भाव खूब चलता है. पास में खड़े होकर चुपचाप देखें और सुनें तो मज़ा आता है कि कैसे इशारों और हाव भाव से खरीद बेच होती है  

पटवा की हवेली में कठपुतलियों का बाज़ार 


* मंडावा की हवेलियाँ पर एक फोटो-ब्लॉग इस लिंक पर देख सकते हैं :

  http://jogharshwardhan.blogspot.com/2017/01/blog-post_20.html

* रामपुरिया हवेलियाँ, बीकानेर पर एक फोटो-ब्लॉग इस लिंक पर देख सकते हैं :
   

 जोधपुर

थार रेगिस्तान में बसा जोधपुर, राजस्थान का दूसरा बड़ा शहर है. इसकी स्थापना राठोड़ राजपूत राजा राव जोधा ने की थी. राव जोधा मंडोर के रहने वाले थे और उन्होंने आस पास का बड़ा इलाका जीत कर मारवाड़ राज बनाया. राव जोधा ने 14 मई 1459 के दिन मंडोर से नौ किमी दूर, भोर चिड़िया नामक पहाड़ी पर मेहरानगढ़ की नींव रखी. यह किला 125 मीटर ऊँची पथरीली चट्टान पर बना एक विशालकाय किला है जो पूरे शहर पर छाया हुआ है.

दिल्ली से जोधपुर की दूरी 600 किमी है और जयपुर से 340 किमी. जोधपुर रेल, सड़क औऱ हवाई रास्ते से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है. रेगिस्तान में होने के कारण गर्मी में तापमान 50 के नज़दीक पहुँच सकता है और सर्दी में एक दो डिग्री तक. बारिश 15 - 20 दिन ही होती है. बारह महीने तीख़ी और चटक धूप खिली रहती है जिसकी वजह से जोधपुर को सूर्य नगरी भी कहा जाता हैै. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो :


मेहरान गढ़ से नीले शहर का एक दृश्य.  जोधपुर की जनसँख्या 1911 में 0.59 लाख थी और 2011 में 11.37 लाख  

ये है विशालकाय मोर-नुमा मेहरान गढ़ जिसकी छत्रछाया पूरे शहर पर है 

जसवंत थड़ा से मेहरान गढ़ का एक दृश्य 

जोधपुर के चटक रंग 

सरदार मार्किट और मेहरान गढ़ 

रंगीलो राजस्थान 

मेहरान गढ़ की तोपें और शहर 


जोधपुर की एक पुरानी  हवेली 

लाल, गुलाबी और सफ़ेद पत्थरों से बना घंटाघर 

शहर और शहर के पीछे दिख रहा है उम्मेद भवन 

जसवंत थड़ा से लिया गया एक फोटो 

किले से जसवंत थड़ा 

किले का एक और दृश्य 

 

 जसवंत थड़ा, जोधपुर

थार रेगिस्तान में बसा जोधपुर शहर राव जोधा ने 1459 में स्थापित किया था. दिल्ली से जोधपुर लगभग 600 किमी दूर है और जयपुर से लगभग 330 किमी. राव जोधा के वंशज महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय थे जिनका राज 1873 से 1895 तक रहा और जिनका देहांत 1899 में हुआ. उनके पुत्र महाराजा सरदार सिंह (1895 - 1911) ने पिता की याद में स्मारक बनाया जो जसवंत थड़ा के नाम से प्रसिद्ध है.

जसवंत थड़ा मेहरानगढ़ से 2 - 3 किमी दूर बाईं ओर एक बड़ी झील के किनारे है. मौसम अच्छा हो तो गढ़ से पैदल वर्ना ऑटो से जसवंत थड़ा पहुँचा जा सकता है. इस स्मारक की नींव 1900 में रखी गई और 1904 में रेजिडेंट गवर्नर ने थड़ा बनाने की मंज़ूरी दी थी. स्मारक सफ़ेद मकराना संगमरमर, लाल बालू पत्थर और गुलाबी रंग के पत्थर से मंदिर के रूप में बना हुआ है. आम तौर पर इसे जोधपुर का ताजमहल भी कहा जाता है. इस स्मारक का नक्शा मुंशी सुखलाल कायस्थ ने बनाया था और वास्तु कार थे बुद्धमल और रहीम बक्श. मंदिर के हॉल में पूर्व राजाओं और परिवार जनों की पेंटिंग्स लगी हुई हैं. इस स्मारक पर सितम्बर 1921 तक 2,84,678 रूपए की लागत आई थी. मंदिर की दीवार में कई सफ़ेद पत्थर इतने पतले लगाए गए हैं कि हॉल के अंदर में उजाला रहता है.

आम तौर पर स्मारक या पुराने मंदिरों में गाइड तरह तरह के किस्से कहानियां जरूर सुना देते हैं परन्तु स्मारक से जुड़े पूरे तथ्य कम ही बताते हैं. मसलन इमारत का क्षेत्रफल, लगाया गया पत्थर या लकड़ी, मूर्तिकार के नाम, कितना समय लगा वगैरा वगैरा. ऐसी जानकारी अगर प्रवेश टिकेट के पीछे छाप दें या अलग से किसी बोर्ड पर लिखवा दें तो स्मारक में और रूचि बढ़ जाए. पुरातत्व विभाग ऐसे प्रमाणिक तथ्य की जानकारी देना जरूरी कर दे तो अच्छा रहे. ज्यादातर ट्रस्ट ही इन जगहों को चलाते हैं. और बिना प्रशिक्षण के गाइड द्वारा दी गई जानकारी ही प्रमाणिक माननी पड़ती है.

स्मारक सुबह नौ से शाम पांच तक खुला रहता है. प्रवेश पर शुल्क है और कैमरा शुल्क देकर फोटो खिंची जा सकती हैं. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो.

राठोड़ राजपूत महाराजा जसवंत सिंह का सुंदर स्मारक 

मंदिर का एक और दृश्य 

स्मारक में प्रवेश राजस्थानी लोक संगीत के साथ 

छतरी 

चबूतरे, खम्बों, और जाली पर सुंदर कारीगरी 

काफी ऊँचा चबूतरा बनाया गया है 

लाल, गुलाबी, सफ़ेद और काले पत्थर का बढ़िया सामंजस्य  

दिवारों में जालीयां, झरोखे और पतले सफ़ेद संगमरमर के कारण मंदिर के अंदर उजाला सा रहता है  

कबूतरों ने कई जगह संगमरमर को बदरंग कर दिया है 

राजघराने के लोगों की छतरियां 

छतरियां या स्मारक 
एक छतरी के नीचे राजघराने का निशान 

पेड़ों के झुरमुट में छुपा जसवंत थड़ा

जसवंत थड़ा से मेहरानगढ़ का एक दृश्य 

 भूत प्रेतों का गाँव - कुलधरा, जैसलमेर

थार रेगिस्तान का एक प्रमुख शहर है जैसलमेर. दिल्ली से जैसलमेर की दूरी 770 किमी है और जयपुर से लगभग 560 किमी. जैसलमेर शहर से 18 किमी दूर एक शापित गाँव है कुलधरा जहां लगभग दो सौ सालों से कोई नहीं रहता. इस वीरान बियाबान गाँव में लगभग 400 घरों के खंडहर हैं जिनमें कहा जाता है की भूत प्रेत रहते हैं. कुलधरा नाम के इस गाँव में लोग दिन में अकेले जाने से डरते हैं रात की बात तो दूर है.

यह किस्सा सुनकर तो कुलधरा देखने जाना जरूरी हो गया था. आने जाने के लिए जैसलमेर से सवारियां आसानी से मिल जाती हैं. हम तो अपनी ही गाड़ी में आधे घंटे में लगभग 11 बजे पहुँच गए थे. वहां दिन में ना तो कोई भूत मिला और ना ही किसी मिस या मिसेज़ चुड़ैल से बात हुई.

कुलधरा गाँव काफी बड़ा है और गाँव में मंदिर, कुएँ, तालाब, शमशान, स्मारक या देवली भी हैं. इन स्मारक पत्थरों पर अंकित लेखों के अनुसार दो निवासियों की मृत्यु 1235 और 1238 में हुई जिससे लगता है की गाँव 1200 या उस से भी पहले बस गया होगा. मंदिर विष्णु और महिषासुर मर्दिनी का है साथ ही कुछ घरों के प्रवेश द्वार पर गणेश की मूर्तियाँ भी मिली हैं. कुछ घरों में तहखाने भी मिले हैं जहां सम्भवता खज़ाना रखा जाता हो. यहाँ सोने की चिड़िया रहती थी उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है की महाराजा गज सिंह के समय 1820 और 1821 में 14 लाख रूपए के बराबर कैश या काइंड में टैक्स की वसूली हुई! दो दशक पहले कुछ लोग खजाने की खोज में खंडहरों में खुदाई करते पकड़े गए थे. तब से राज्य सरकार ने इस गाँव को कब्जे में कर लिया है.

इतिहासकारों का कहना है कि पाली जिले से आये ब्राह्मण व्यापारीयों ने कुलधरा गाँव बसाया था. कुलधरा के अतिरिक्त ऐसे 83 और गाँव थे जो पालीवालों द्वारा जैसलमेर के आसपास बसाए गए. इनमें से एक मशहूर और बड़ा गाँव है खाभा फोर्ट जिसके बारे में अगले ब्लॉग में चर्चा करेंगे. ये गाँव जैसलमेर में दूर दूर तक फैले हुए हैं और बड़े व्यवस्थित ढंग से बसाए गए थे. कुलधरा गाँव में 400 से ज्यादा मकान थे और गाँव से कुछ दूर 200 मकान अलग से बने हुए थे. मकान बड़े बड़े थे और उत्तर-दक्षिण जाने वाली गलियां लम्बी, चौड़ी और सीधी सीधी थी. पूर्व-पश्चिम वाली गलियां पतली और छोटी थीं याने लिंक और सर्विस लेन का काम करती थी. गाँव के दक्षिण में 2.5 किमी लंबा और 2 किमी चौड़ा तालाब या खड़ीन भी था. इसमें बारिश का पानी संचित किया जाता था. और उसके सूखने पर जवार या चने की फसल लगाई जाती थी.

कुलधरा और आसपास के इन गाँव वासियों का काम था मवेशी पालना, खेती करना, अनाज, नील, सोने और चांदी के जेवर, सिल्क, हाथी दांत और अफीम का व्यापार. ये व्यापार कराची, सिंध के रास्ते इरान, इराक, अफगानिस्तान से ऊँटों द्वारा हुआ करता था. इन गाँव से कर वसूली का काम जैसलमेर राज दरबार के दीवान सलीम सिंह ( या सालेम सिंह ) बड़ी सख्ती से किया करते थे इसलिए जनता ने उनका नाम ज़ालिम सिंह रख दिया था. सालेम सिंह की सात पत्नियाँ बताई जाती हैं पर फिर भी 1825 के शुरू में वसूली के दौरान एक पालीवाल ब्राह्मण कन्या उन्हें भा गई और गाँव प्रधान को हुक्म दिया गया की लड़की को शादी के लिए उनके पास पहुंचा दिया जाए. रात को पंचायत बैठी और फैसला हुआ की 84 गाँव के सभी पालीवाल तुरंत जैसलमेर राज छोड़ कर चले जाएं. रातों रात सारे गाँव खाली कर दिए गए. 

इस कहानी का एक और मोड़ भी है की उस लड़की को मार दिया गया (?) और उसके खून से हर मकान के दरवाज़े पर तिलक लगा दिया गया. गाँव वालों ने जाते हुए श्राप दे दिया कि ये गाँव दुबारा नहीं बसेगा और वहां से निकल गए. यहाँ से निकल कर ये पालीवाल लोग मध्य प्रदेश, गुजरात के दूर दराज़ के इलाकों में चले गए. राजा ने बदनामी और वसूली के घाटे से बचने के लिए इन्हें वापिस लाने का प्रयास किया गया. 82 गाँव में कुछ परिवार आ भी गए परन्तु कुलधरा और खाभा में कोई वापिस नहीं आया. बताया जाता है की कुछ समय पहले सिंध, पकिस्तान से आये कुछ हिन्दुओं को यहाँ खाभा में बसाया गया है. 

खाभा फोर्ट, जैसलमेर के बारे में इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है : http://jogharshwardhan.blogspot.com/2017/03/blog-post_11.html   

कुछ इतिहासकारों का कहना है कि कुलधरा के दक्षिण में केकनी ( केकणी / काकनी / ककनी )  नाम की नदी थी थी जो धीरे धीरे सूखती गई और निवासियों का पलायन होता गया. संख्या घट जाने के बावजूद टैक्स वसूली में कमी नहीं की गई और सख्ती जारी रही इस कारण से लोग गाँव छोड़ कर चले गए ( वित्त मंत्री कृपया ध्यान दें!). पर इतने समृद्ध गाँव एक साथ खाली क्यूँ और कैसे हो गए कहना मुश्किल है. इतिहास की पहेली शायद अनबूझ ही रहेगी.

पर हर पर्यटक को ज़ालिम सिंह के अत्याचार और रातों रात गाँव का खाली होना कौतुहल और अचरज भरा लगता है और गाँव देखने की इच्छा भी होती है. इसीलिए देसी और फिरंगी पर्यटक काफी संख्या में खंडहर देखने आते हैं. सरकार ने कुलधरा को पर्यटन स्थल घोषित कर दिया है और गाँव को ठीक ठाक करवाने का काम जारी है. आसपास निजी रिसोर्ट वगैरा भी बन रहे हैं. प्रवेश शुल्क देकर सुबह से शाम तक खँडहर देखे जा सकते हैं पर रात को जाने पर मनाही है कौन जाने रात को भूत प्रेत घूमते रहते हों?
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:


स्मारक या छतरी 

खँडहर मकान और दाहिने कोने पर पुराना मंदिर 

बड़े और व्यवस्थित मकानों के बीच चौड़ी गलियां 

गर्मी और सर्दी का बचाव करने के लिए मोटी मोटी दीवारें बनाई गई हैं 

इस बालक ने भी भूतों का किस्सा दोहराया 

बड़े बड़े कमरे और रसोई घर 

पीछे ढाल में कभी ककनी नदी बहती थी 

शायद कभी ऐसा रहा होगा कुलधरा   

 श्री तनोट माता मंदिर, जैसलमेर

तनोट एक छोटा सा रेगिस्तानी गाँव है जो जैसलमेर शहर से लगभग 150 किमी दूर है. यहाँ से अंतर्राष्ट्रीय सीमा लगभग 25 किमी है. यहीं एक विख्यात मंदिर है श्री तनोट माता मंदिर. कहा जाता है कि हिंगलाज माता का ही रूप तनोट माता हैं और तनोट माता का दूसरा रूप करनी माता हैं. हिंगलाज माता का मंदिर कराची से 250 किमी दूर बलोचिस्तान में हिंगोल नदी के किनारे है और करनी माता का मंदिर बीकानेर जिले में है.

भाटी राजपूत राजा केहर के पुत्र तन्नू राव तनोट माता के भक्त थे और उन्होंने विक्रमी सम्वत 828 याने सन 771 में मंदिर की स्थापना की थी. मंदिर का नाम और मान्यता 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद बहुत बढ़ गई. तब से तनोट मंदिर हर जैसलमेर आने वाले पर्यटक की लिस्ट में शामिल हो गया है.

इस मान्यता की कहानी कुछ इस प्रकार है कि 1965 में तनोट के तीन ओर से पाक सेना ने भारी आक्रमण किया. तनोट की सुरक्षा के लिए 13 ग्रेनेडियर की एक कंपनी और BSF की दो कम्पनियाँ थी जिसके मुकाबले दुश्मन की ब्रिगेड थी ( एक कम्पनी में आम तौर पर 100 से 300 जवान हो सकते हैं और एक ब्रिगेड में 1000 से 3000 तक ). कहा जाता है कि तनोट और उसके आसपास 3000 बम गिराए गए जिनमें से 20% तो फटे ही नहीं और ज्यादातर सुनसान रेगिस्तान की रेत में फटे जिससे जान माल का कोई नुक्सान नहीं हुआ. 450 गोले मंदिर परिसर में या आसपास गिरे पर फिर भी मंदिर का कोई नुकसान नहीं हुआ. इससे सैनिकों में और जोश भर गया और मनोबल ऊँचा हो गया. तीसरे दिन पस्त दुश्मन की बैरंग वापसी हो गई. 1965 के इस युद्ध के बाद मंदिर का इंतज़ाम BSF ने ले लिया.

1971 में तनोट से लगभग 50 किमी दूर लोंगेवाला में पकिस्तान ने टैंकों, बख्तर बंद गाड़ियों और एक पैदल ब्रिगेड लेकर दुबारा हमला किया. वहां भी मुकाबले पंजाब रेजिमेंट की 23 वीं बटालियन की केवल 120 जवानों की कम्पनी थी. इस कम्पनी और चार हंटर विमानों ने 36 टैंक और सैकड़ों गाड़ियां को तहस नहस कर दिया और दुश्मन तीसरे दिन वापसी पर मजबूर हो गया. लोंगोवाला स्मारक में दुश्मन के रेत में धंसे बर्बाद टैंक और गाड़ियाँ जस की तस देखी जा सकती हैं.

जैसलमेर से तनोट > लोंगेवाला > जैसलमेर सड़कें बढ़िया है और ट्रैफिक बहुत ही कम. अपनी गाड़ी हमने 100 से ऊपर खूब दौड़ाई हालांकि भेड़ बकरियों का ध्यान रखना पड़ता है. सुबह तनोट मंदिर जाकर लोंगेवाला स्मारक देखते हुए शाम तक जैसलमेर वापिस आया जा सकता है. बसें, जीपें और टैक्सी जैसलमेर में उपलब्ध हैं. मंदिर परिसर में चाय पानी की सुविधा भी है. पर रास्ते के लिए पानी जरूर रख लें. रेगिस्तानी धूप बड़ी तीखी होती है और वहां हवा भी बहुत तेज़ चलती है इसलिए धूप का चश्मा और सर ढके रखना जरूरी है. पूरे रास्ते में पीली रेत के टीले और छोटी छोटी झाड़ियाँ ही नज़र आती हैं. कहीं कहीं कोई चरवाहा भेड़ बकरियों के साथ दिख जाता है. हो सकता है की हिरन या सांभर दिख जाए पर ज्यादातर इलाका सुनसान बियाबान है.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:


सुनसान बियाबान रेगिस्तान के बीच श्री मातेश्वरी तनोट माता मंदिर 

अंतर्राष्ट्रीय सीमा से लगभग 25 किमी दूर 

मंदिर की स्थापना विक्रमी संवत 828 ( सन् 771 ) में हुई 

मंदिर का बाहरी हॉल 

अंदरूनी हॉल 

शिव - पार्वती 

तनोट माता 

मंदिर में रखे हुए पाक बमों के खोल जो उस वक्त फटे नहीं थे 

मंदिर से जुड़े हुए पीर बाबा 

मन्नत के धागे और रुमाल 

मंदिर का रख रखाव BSF के पास है 

प्रतीक्षालय 

तनोट की ओर जाती सुनसान सड़क 

तनोट के चारों तरफ है सुनहरी नरम रेत और छोटी छोटी झाड़ियाँ 

दर्शनार्थी 
पत्थर पर लिखा मंदिर का इतिहास 

स्थानीय पीले पत्थर से बना युद्ध स्मारक - तनोट विजय स्तम्भ 

 बड़ा बाग, जैसलमेर

थार रेगिस्तान में बसा एक शहर है जैसलमेर. यह शहर जयपुर से लगभग 560 किमी दूर और दिल्ली से 780 किमी की दूरी पर है. रेगिस्तान होने के कारण गर्मी में तापमान 45 से ऊपर चला जाता है और सर्दियों में शून्य के नजदीक पहुँच सकता है.

जैसलमेर शहर भाटी राजपूत महारावल ( राजा याने रावल और महाराजा याने महारावल ) जैसल द्वारा 1178 में बसाया गया था. तब से लेकर जैसलमेर राज के भारत में विलय होने तक यहाँ महारावल जैसल के वंशजों का ही राज रहा है. यह भी एक रोचक तथ्य है की इस लम्बे समय के दौरान अरब, तुर्क, मुगल, फिरंगी या किसी पड़ोसी राज्य का जैसलमेर पर कभी कब्ज़ा नहीं हो पाया. हमलों के कारण सीमा रेखाएं जरूर बदलती रहीं.

शहर से 6 किमी दूर बड़ा बाग़ है जिसे महारावल जय सिंह, द्वितीय ने सोलहवीं शताब्दी में बनवाया था. कहा जाता है की आम जनता की राहत के लिए राजा ने पानी का तालाब बनवाया और आसपास बाग़ लगवाया. 21 सितम्बर 1743 को महाराजा जय सिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र ने पास वाली पहाड़ी पर पिता की याद में छतरी बनवा दी. उसके बाद राजघराने के कई लोगों की छतरियां या स्मारक या cenotaph यहाँ बनाए गए. गाइड द्वारा बताया गया कि इन छतरियों की कुछ विशेषताएं हैं:

-  सभी छतरियां स्थानीय पीले पत्थर की बनी हुई हैं. जो छतरियां पिरामिड-नुमा हैं वो हिन्दू कारीगरों द्वारा बनाई गई हैं और गोल गुम्बद की तरह छतरियां मुस्लिम कारीगरों द्वारा बनाई गई हैं.
- हर छतरी के नीचे तीन चार फुटा एक खड़ा पत्थर लगा है जिस पर घोड़े पर बैठे हुए राजा की नक्काशी है और साथ ही संक्षिप्त जीवनी लिखी हुई है. राजा के पत्थर के साथ एक पत्थर पर पटरानियों और तीसरे पत्थर पर छोटी रानियों के बारे में लिखा हुआ है.
-  पत्थर पर उकेरे चित्र पर अगर घोड़े के अगले दोनों पैर उठे हुए हैं तो राजा की मृत्यु युद्ध में हुई थी. अगर घोड़े का एक पैर उठा हुआ है तो राजा किसी युद्ध में घायल हुआ होगा और अगर घोड़े के चारों पैर धरती पर हैं तो जानिये की सामान्य मृत्यु हुई थी.
- अंतिम संस्कार के बाद पुत्र द्वारा एक चबूतरा बना दिया जाता है और पौत्र द्वारा छतरी बनाई जाती है. अगर शादी से पहले ही मृत्यु हो जाती है तो बिना छतरी का केवल चबूतरा ही रह जाता है.
- एक ही परिवार की छतरियों को साथ साथ बनाया गया है और आपस में जोड़ दिया गया है.

सुबह से शाम तक बड़ा बाग़ खुला रहता है. प्रवेश और कैमरे के लिए फीस लगती है. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:


बड़े बाग़ की छतरियां 

शाम के धुंधलके में बड़ा बाग़ 

पिरामिड-नुमा छतरियां 

गुम्बद-नुमा छतरियां 

शिव मंदिर से बड़े बाग़ में जाने का रास्ता 

चबूतरे जिन पर छतरियां ना बन सकीं 

कुछ गोल छतरियां मरम्मत की इंतेज़ार में  

आपस में जुड़ी हुई छतरियां 

बायाँ पत्थर राजा का, बीच वाला पटरानियों का और दाहिने वाला अन्य 6 रानियों का  
रानी की छतरी जहाँ पूजा की गई है 

स्तम्भ, मेहराब और छतों पर नक्काशी 

छतरियों को जोड़ कर बना हुआ बरामदा 

बरामदा 

छतरियों के पीछे तालाब 

 रामपुरिया हवेलियां, बीकानेर

बीकानेर थार रेगिस्तान का एक शहर है. यह शहर राव बीका द्वारा 1486 में बसाया गया था. जयपुर से बीकानेर की दूरी 330 किमी है और दिल्ली से लगभग 430 किमी है. मौसम का मिजाज़ गर्मी में पचास डिग्री तक और सर्दी में शुन्य डिग्री तक हो सकता है. मौसम, पानी की कमी और हवाओं की तेज़ी को ध्यान में रखकर मकान और हवेलियाँ बनाए जाते होंगे.

इस पुराने शहर में बहुत सी हवेलियाँ हैं जैसे की रिखजी की हवेली, सम्पतलाला की हवेली, भैरों की हवेली वगैरा. 1925 की बनी भंवर निवास हवेली तो अब एक होटल है. परन्तु बीकानेर की हवेलियों में से रामपुरिया हवेलियों का बड़ा नाम है. इस समूह की हवेलियों में छोटी बड़ी कई हवेलियां हैं और ये सभी लाल पत्थर की बनी हुई हैं. ये हवेलियां 100 से लेकर 400 साल तक पुरानी हैं और चित्रकारी से भरपूर हैं. पुरानी हवेलियों के वास्तुकार थे बालूजी चलवा. प्रसिद्ध लेखक, दार्शनिक अल्डस हक्सले - Aldous Huxley भी यहाँ आये थे और उन्होंने रामपुरिया हवेलियों को बीकानेर की शान कहा था.

ड्योढ़ी, झरोखे, छज्जे, कंगूरे, छतें और दीवारें सभी पर सुंदर नक्काशी है. लकड़ी के दरवाज़े, खिड़कियाँ भी कलाकारी से भरपूर हैं.  कुछ चित्र प्रस्तुत हैं :


रामपुरिया हवेलीयों में से एक  

समय ठहर गया लगता है यहाँ  

दीवारों पर यूरोपियन चेहरे 

गलियों में सीधी धूप कम ही आती है इसलिए ठंडक रहती है 

आर्ट और ड्राइंग के छात्रों के लिए बढ़िया जगह 

पुरानी सांकल और दरवाज़ा  

छत पर की गई सुंदर चित्रकारी 

सुंदर दरवाज़े खिड़कियाँ 

नया पुराना आमने सामने 

गलियां आड़ी तिरछी 

पत्थर हो या लकड़ी सभी पर नक्काशी 

कलाकारी वाले दरवाज़े और मेहराब 

 भांडा शाह जैन मंदिर, बीकानेर

बीकानेर शहर राव बीका द्वारा बसाया गया था. इस पुराने शहर की चारदिवारी के बीच है बड़ा बाज़ार. इस बाज़ार में भांडा शाह नामक व्यापारी ने 1468 में एक जैन मंदिर बनवाना शुरू करवाया और इसे 1541 में भांडा शाह की पुत्री ने पूरा कराया. यह मंदिर पांचवें जैन तीर्थंकर सुमति नाथ को समर्पित है.

यह जैन मंदिर भांडासर मंदिर के नाम से ज्यादा प्रचलित है. इस मंदिर के शिल्पी थे गोदा. इसमें लाल बालू पत्थर और सफ़ेद संगमरमर का इस्तेमाल किया गया है. मंदिर के फर्श, छत, खम्बे और दीवारें मूर्तियों और चित्रकारी से सजे हुए हैं. ऐसा लगता है कि चित्रकारी बाद में की गई है. ऐसा कहा जाता है की मंदिर के निर्माण में पानी की जगह 40,000 किलो घी का इस्तेमाल किया गया था.

मंदिर अब एक राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक है पर यहाँ कोई गाइड उपलब्ध नहीं था. इसलिए अंदर के चित्रों और मूर्तियों से जुड़ी कहानियों की जानकारी नहीं मिल पाई. मंदिर दिन में खुला रहता है और कोई टिकट नहीं है. फोटो खींचने की मनाही भी नहीं है. मंदिर की स्थापना से अब तक पूजा अर्चना जारी है. मंदिर परिसर बड़ा तो नहीं है पर बहुत साफ़ सुथरा है. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:


राजस्थानी शैली का द्वार 

मंदिर का प्रवेश द्वार 

गर्भगृह में मूर्ति है पांचवें तीर्थंकर सुमति नाथ की  

छत पर चित्रकारी 

दीवार पर मूर्तियाँ 

गर्भ गृह के तीनों ओर मूर्तियाँ हैं 

दरवाज़े पर चित्रकारी 

भित्ति चित्र 

ASI की घोषणा 

 थार की सड़कों पर - 1

थार रेगिस्तान का एक बड़ा भाग राजस्थान में है और कुछ हिस्सा गुजरात, हरयाणा और पंजाब को भी छूता है. बाकी हिस्सा बॉर्डर के पार है. यह भारत का सबसे बड़ा और विश्व का सातवें नंबर का रेगिस्तान है. बारिश बहुत कम होती है और तापमान सर्दी में 0 डिग्री या उस से भी कम और गर्मी में 50 के ऊपर भी चला जाता है.

पानी कम है इसलिए खेती कम है और इसलिए जनसँख्या भी कम है. सड़क पर मीलों तक कोई दिखाई नहीं पड़ता और गाँव भी बहुत दूर दूर हैं. उत्तर प्रदेश में हर पचास किमी पर शहर आ जाता है. केरल में भी ड्राइव धीमी है क्यूंकि आबादी के साथ साथ पहाड़ी इलाका भी ज्यादा है. जबकि राजस्थान के इस रेगिस्तानी भाग में 250 - 300 किमी से पहले कोई बड़ी आबादी नहीं मिलती.

थार मरुस्थल के मुख्य शहर हैं झुंझनु, नागौर, बीकानेर, जैसलमेर और जोधपुर. सड़कें ज्यादातर अच्छी हैं और उनकी चौड़ाई बढ़ाई जा रही है. मुख्य हाईवे से अंदर गाँव की ओर जाने वाले रास्ते उतने अच्छे नहीं हैं. अपनी गाड़ी फिट रखें और गाड़ी का हवा, तेल, पानी जरूर चेक कर लें. कुछ खाने का सामान और पीने का पानी साथ रख लें क्यूंकि ढाबे बहुत दूर दूर मिलेंगे और हो सकता पानी खारा मिले. खाली सड़कों पर गाड़ी की स्पीड जल्द ही 100 के पार हो जाती है पर गाय, भेड़, बकरी, नीलगाय और जंगली ऊँटों का ध्यान रखना होगा. जोधपुर और जैसलमेर के आसपास हिरन और चिंकारा भी नज़र आ जाते हैं.

हमने अपनी यात्रा नीचे दिए गए नक़्शे के मुताबिक 11 दिन में पूरी की. फोर्ड ईको डीज़ल गाड़ी इस्तेमाल की और कोई दिक्कत नहीं आई. सड़कों पर साइन बोर्ड काफी हैं और मोबाइल का gps भी इस्तेमाल किया हालांकि कई जगह सिग्नल नहीं आते. पूछने पर स्थानीय लोग प्यार से रास्ता और किले वगैरा की जानकारी दे देते हैं. अतिथि देवो भव: यहाँ पूरी तरह लागू है!

यहाँ दी गई ज्यादातर फोटो चलती गाड़ी में से मोबाइल से ली गई हैं. इनमें कोई समय या विषय का क्रम नहीं है याने random हैं. जहां भी कोई चीज़ अच्छी लगी फोटो खींच ली. उम्मीद है पसंद आएंगी.


बहुत कठिन है डगर पनघट की - दिन में दो बार पानी भरने जाना पड़ता है.  

सुनसान सड़क और जंगली ऊंट. जैसे ऊंट रेगिस्तान का जहाज है वैसे ही कीकर का पेड़ रेगिस्तान का राजा है  

भूसा भरा है ! वो भी इतना की ट्रेक्टर का चलना ही मुश्किल हो जाता है

जनता के लिए बसों की कमी लगती है इसलिए ही जीपों में ओवरलोडिंग होती है. महिलाऐं लम्बे घूँघट करती हैं और ये घूँघट धूप से भी बचाता है और कैमरे से भी! 

ऊंट ऊँची गर्दन कर के कीकर के सारे पत्ते खाना चाहता है. कीकर की कोशिश है कि और ऊपर उठ जाए ताकि पत्ते बचे रहें - दोनों का घमासान सदियों से जारी है!   

जोधपुर जिले का एक गाँव 'बाप'. बाद में पता लगा के पोकरण रोड पर एक गाँव 'चाचा' नाम से भी है!

जैसलमेर और जोधपुर में तेज़ हवाएं 24x7 लगातार चलती हैं. गर्मी में गर्म और सर्दी में ठंडी. उसी का फायदा उठा कर विंड मिलें लगा दी गई हैं  

पोकरण का नाम पढ़कर ड्राईवर खुश हुआ 

गोधूली का समय. गाय खास तरह की चाल से वापिस चल पड़ीं अपने घर को. उन्हें आपकी गाड़ी से कोई मतलब नहीं है इसलिए ब्रेक तो आपको ही लगानी पड़ेगी 

ढाणी याने ठिकाना या वास - इन्दो का निवास. राजस्थान में ढाणी के बहुत से साइन बोर्ड मिलेंगे  

तीर्थ यात्री अजमेर शरीफ की ओर जाते हुए 

स्कूली बच्चों का सफाई जागरूकता अभियान 

यात्रा मार्ग लगभग 2000 किमी - दिल्ली > मंडावा > बीकानेर > जैसलमेर(तनोट - लोंगेवाला) > जोधपुर > पुष्कर > दिल्ली  

 दो कूबड़ वाले ऊंट

कहावत है कि ऊंट रे ऊंट तेरी कौन सी कल सीधी ? इन  दो कूबड़ वाले ऊंटों को देख कर लगता है कि ये कहावत बिलकुल सही है ! भारत में ये दो कुब्बे ऊंट केवल लद्दाख की नुब्रा घाटी में ही पाए जाते हैं. वैसे भी दुनिया में दो कुब्बे ऊंट कम ही स्थानों पर पाए जाते हैं और ये सभी स्थान ठन्डे रेगिस्तान हैं - गोबी मरुस्थल मंगोलिया, अल्ताई पहाड़ियां रूस और तक्लामाकन मरुस्थल चीन. इन ऊँटों की संख्या घटती जा रही है और ये प्रजाति लुप्त होने के कगार पर है.

दो कुब्बे ऊंट को जीव विज्ञान में camelus bactrianus कहते हैं और आम भाषा में बैक्ट्रियन ऊंट कहते हैं. यह लगभग 40 - 50 साल तक जीता है. वयस्क ऊंट की कूबड़ तक की ऊंचाई दो मीटर से ऊपर भी जा सकती है. सिर्फ कूबड़ ही 30 इंच तक का हो जाता है. इसका वजन सात सौ से लेकर एक हजार किलो तक हो सकता है. रेगिस्तान का ये जहाज 60 - 65 किमी प्रति घंटे की दौड़ भी लगा लेता है. सामान्यत: इस की चाल 30 - 35 किमी प्रति घंटे की रहती है.

नुब्रा घाटी लगभग 10,000 फीट की ऊंचाई पर लद्दाख में स्थित है. घाटी में पहुँचाने के लिए लेह से खार्दुन्ग-ला होते हुए जाया जा सकता है. घाटी के मुख्य स्थान या बड़े गाँव हैं डिस्किट और हुन्डर. डिस्किट लेह से 150 किमी दूरी पर है. यहाँ शयोक नदी और नुब्रा नदी की घाटियाँ हैं. हुन्डर के आस पास रेत के बड़े बड़े टीले हैं. घाटी में नदी के किनारों पर हरियाली है जहां ये दो कुब्बे ऊंट चरते हुए देखे जा सकते हैं.

कुछ तस्वीरें मुकुल वर्धन के सौजन्य से :

दो कूबड़ वाले ऊंट 

दो कुब्बे ऊँट सवारी बैठाने के लिए तैयार 

एक कूबड़ हो या दो, इंसान सवारी के लिए हमेशा तैयार है

नुब्रा घाटी, लद्दाख 

 पुष्कर

अरावली पहाड़ियों में स्थित पुष्कर, अजमेर शहर से 12 किमी दूर है और दिल्ली से लगभग 415 किमी. इस छोटे से शहर को तीर्थराज, पुष्करतीर्थ या पुष्करराज भी कहते हैं. पूरा शहर एक झील के किनारे बसा हुआ है और यहाँ बीसियों छोटे बड़े मंदिर हैं. राजस्थान के थार मरुस्थल की शुरुआत भी यहाँ से कही जा सकती है जो आगे बीकानेर, जैसलमेर और जोधपुर की ओर बढ़ जाता है.

पुष्कर एक ऐतिहासिक जगह है जिस से बहुत सी कथाएँ जुड़ी हैं:
- भगवान शिव ने अपनी पत्नी सती के देहांत पर इतने आंसू बहाए की दो झीलें बन गईं पुष्कर और कटास( जो अब जिला चकवाल, पाकिस्तान में है ),
- भगवान ब्रह्मा ने महायज्ञ के लिए पुष्कर को चुना. आहुति के समय उनकी पत्नी सावित्री उपस्थित नहीं हुई तो उन्होंने स्थानीय गुर्जर कन्या गायत्री से विवाह करके यज्ञ पूरा किया. इसपर सावित्री ने गुस्से में श्राप दे दिया कि ब्रह्मा की पूजा केवल पुष्कर में ही होगी और कहीं नहीं.
- पांडवों ने कुछ समय यहाँ बिताया था. सुभद्रा हरण  के बाद अर्जुन ने यहीं कुछ समय विश्राम किया था.
- गौतम बुद्ध ने यहाँ दीक्षा दी थी,
- अगस्त्य, जमदाग्नि, वामदेव और भृतहरि मुनियों ने यहाँ तपस्या की थी. पाराशर ऋषि का जन्मस्थान भी यहीं है.
- सरस्वती नदी पुष्कर के आसपास ही लुप्त हो गई थी.
- औरंगजेब के समय बहुत से मंदिरों को गिरा दिया गया जो धीरे धीरे फिर से बनाए गए.
- 1705 में गुरु गोबिंद सिंह ने यहाँ गुरु ग्रन्थ साहिब का पाठ किया.
- 1911 में महिलाओं के लिए अलग घाट बनवाया गया.
- महांत्मा गाँधी की अस्थियां भी यहाँ प्रवाहित की गईं थी .

वर्तमान में यहाँ तीर्थ यात्रियों के अलावा फिरंगी सैलानी भी बहुत आते हैं. शायद यहाँ का शांत वातावरण और दोस्ताना माहौल काफी पसंद आता होगा. इसीलिए कॉफ़ी से लेकर पिज़्ज़ा तक यहाँ सभी कुछ मिल जाता है.

पुष्कर पहुँचने के लिए सड़कें अच्छी हैं. रेल अजमेर तक और हवाई सुविधा जयपुर तक उपलब्ध है. यहाँ का मशहूर मेला है - पुष्कर पशु मेला जो विश्व के सबसे बड़े मेलों में से एक है. यह अक्टूबर-नवम्बर में पांच दिन लगता है. सैर सपाटे के लिए अक्टूबर से मार्च का समय अच्छा है.

पुष्कर का मुख्य बाज़ार झील के साथ साथ चलती सड़क पर है. बाज़ार में पूजा पाठ सम्बंधित सामान ज्यादा है. वैसे तो पुष्कर 2 - 4 घंटों में पैदल देखा जा सकता है. पर रुकना हो तो धर्मशालाएं और होटल उपलब्ध हैं.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:  


पुष्कर झील 

पुष्कर झील पर बने घाट

पुष्कर के घाट

पुष्कर बाज़ार में पूजा के सामान की दुकान 

सभी का स्वागत है 

बाज़ार की गश्त 

शायद सजाने के लिए हैं ना कि चलाने के लिए 

जैन मन्दिर 

बाज़ार में छोटे छोटे कैफ़े भी हैं जो फिरंगियों में लोकप्रिय हैं 

बाज़ार भी और धर्मशाला भी 

श्री राम वैकुण्ठ मंदिर दक्षिण भारत शैली में 

बाज़ार के पीछे एक मस्जिद भी

पूजा पाठ का सामान 

होटल की बालकनी से एक दृश्य 

सुबह का कीर्तन 

पुष्कर झील का एक घाट. पीछे गुरुद्वारा नज़र आ रहा है 

पुष्कर में सांझ ढली  

 जैसलमेर वार म्यूजियम

पोकरण से जैसलमेर जाते हुए रास्ते में ऊँचा तिरंगा फहराता हुआ दिखाई पड़ा. नज़दीक जाने पर पता लगा कि वहां तो जैसलमेर वार म्यूजियम है. गाड़ी पार्क करके अंदर देखा तो तबियत खुश हो गई.

जैसलमेर जिले की सीमा पाकिस्तान से मिली हुई है. यहाँ लोंगेवाला में 4 दिसम्बर 1971 की रात में पाकिस्तान ने 2000 सैनिक, 45 टैंक और 500 गाड़ियों लेकर आक्रमण किया. और मुकाबले में थे 120 जवान, M-40 तोप से लैस एक जीप, 4 हंटर लड़ाकू विमान और एक कृषक विमान. तीन दिन तक चले युद्ध के नुकसान का स्कोर - भारत : 2 जवान शहीद और एक एंटी-टैंक गन नष्ट, पाकिस्तान : 179 सैनिक मारे गए, 37 टैंक और 100 से ज्यादा गाड़ियां नाकारा. इन्हीं में से टैंक, रिकवरी ट्रक और कुछ हथियार म्यूजियम में रखे हुए हैं.

इस म्यूजियम का उद्घाटन 20 अगस्त 2015 को ले.जन. अशोक सिंह GOC-in-C, दक्षिणी कमान ने किया. यहाँ दो बड़े हाल हैं - इंडियन आर्मी हाल जिनमें सेना के ऐतिहासिक फ़ोटो, सैनिकों की वर्दियां और हथियार वगैरा प्रदर्शित किये गए हैं और दूसरा है लोंगेवाला हॉल जिसमें दिसम्बर 1971 के युद्ध की फोटो और इस्तेमाल किये गए कुछ हथियार भी रखे हुए हैं. एक दीवार है 'वेलोर वाल' जिस पर काले पत्थर पर सुनहरे अक्षरों में सम्मानित वीरों के नाम है. इसके आलावा एक छोटे से थिएटर में फिल्म दिखाने की व्यवस्था है, सुवेनिर शॉप और कैफ़े भी है. म्यूजियम सुबह 9 बजे से शाम 7 बजे तक रोज़ खुला रहता है.

जैसलमेर से आते जाते जरूर रुकें और जानकारी बढ़ाएं. शहर से म्यूजियम केवल 10 किमी दूर है. देख कर मज़ा भी आता है और दिल में जोश भर जाता है. जयहिन्द !


म्यूजियम के गेट पर 

प्रथम विश्व युद्ध के साइकिल सवार भारतीय सैनिक का मॉडल 

बर्फानी हवाओं से बचाव के लिए वर्दी 

गैस और रासायनिक युद्ध के लिए ख़ास वर्दी 

विजयंत टैंक 

दुश्मन का शेर्मन टैंक जो शर्म से झुक गया   

दुश्मन का एक और बर्बाद टैंक T 59  

साथ लाए थे रिकवरी ट्रक पर दुश्मन की अपनी जान की रिकवरी मुश्किल हो गई    

छोटे 'हंटर' का बड़ा कमाल - दुश्मन के टैंक जहाँ थे वहीँ जाम कर दिये  

शान से लहराता तिरंगा 

The Warrior Cafe 
Life is adventure 

 मंडावा की हवेलियाँ

मंडावा एक छोटा सा ऐतिहासिक शहर है जो कि राजस्थान के झुंझनु जिले में है. दिल्ली से लगभग 250 किमी दूर है और जयपुर से 190 किमी की दूरी पर है. कहा जाता है कि 1740 में यह जगह मांडू जाट का वास या मांडू वास कहलाती थी. कालान्तर में इस जगह का नाम मंडावा हो गया. यह मंडावा आजकल अपनी छोटी बड़ी हवेलियों और उन हवेली की दीवारों पर बनी चित्रकारी fresco के लिए मशहूर है.

झुंझनु और सीकर जिले किसी समय शेखावटी राज का हिस्सा थे जिसे राव शेखा ( जन्म 1433 निधन 1488) ने बसाया था. इन हवेलियों को शेखावटी हवेलियाँ भी कहा जाता है. ज्यादातर हवेलियाँ 100 से 300 साल तक पुरानी हैं. कुछ तो बहुत ही खस्ता हालत में हैं, कुछ में हवेलीदार खुद रहते हैं और कुछ को ठीक ठाक करा के होटल में बदल दिया गया है. देसी सैलानियों के अलावा फिरंगी भी यहाँ काफी आते हैं.

इन हवेलियों के मालिक ज्यादातर धनी व्यापारी थे. झुंझनू, सीकर, बीकानेर, जैसलमेर और जोधपुर अंतर्राष्ट्रीय व्यापारियों के पड़ाव थे. ऊँटों के कारवां कराची, पेशावर और काबुल वगैरा से सोना, चांदी, हीरे जवाहरात, सिल्क, अफीम वगैरा लाते ले जाते थे. 1850 के आसपास कारवां घटने लग गए और व्यापर पानी के जहाजों से होने लग गया था. स्थानीय मारवाड़ी व्यापारी कलकत्ता, मुंबई और चेन्नई बंदरगाहों की तरफ निकल गए. हवेलियाँ धीरे धीरे खाली हो गईं.

झुंझनू जिले की सड़कें बहुत अच्छी हालत में नहीं हैं और हैं भी दो लेन की. आसपास का इलाका ज्यादा विकसित नहीं है. सड़कों पर अक्सर मवेशी घुमते नज़र आ जाते हैं. यदाकदा नीलगाय या जंगली ऊंट भी रास्ता काट सकता है इसलिए गाड़ी सावधानी से चलानी होगी.

वैसे तो मंडावा एक ही दिन में देखा जा सकता है पर अगर रुकना हो तो हवेली में ठहरने की जगह मिल सकती है. अक्टूबर से मार्च तक का समय घूमने के लिए अच्छा है.

दीवारों और छतों पर सुंदर चित्रकारी मेहनत का काम है इसलिए चित्रकारों की दाद देनी होगी. साथ ही पक्के और चटक रंगों का चुनाव भी शानदार है जो दशकों तक टिका रहता है.
प्रस्तुत हैं कुछ चित्र :

निमंत्रण देती हुई हवेली - पधारो म्हारे देस   

होटल बनी हवेली

दीवारें, मुंडेरें और छतें कैनवास मानकर सुंदर और बारीक चित्रकारी की गई है 

स्नेह राम लडिया की हवेली में एंटीक चीज़ों की सेल 

पधारो सा  

हाथी की चित्रकारी करीबन हर हवेली में है शायद शाही सवारी हुआ करती थी इसलिए. जबकि इस इलाके का मौसम हाथियों के बजाए ऊँटों के अनुकूल है

हवेलियाँ बहुत हैं और चित्रकारी भी इतनी है कि मंडावा को ओपन एयर आर्ट गैलरी भी कहा जाता है 

हवेली में स्टेट बैंक ऑफ़ बीकनेर एंड जयपुर की शाखा 

बैंक वाली हवेली की दाहिनी दीवार पर चित्रकारी - अंग्रेजी साइकिल, कार और बग्गी भी 

हवेलियों के बीच एक चौक 

होटल में तब्दील हो चुकी एक हवेली 

अंदर हो या बाहर हवेली की हर दीवार और छत पर चटक रंग बिखरे हुए  हैं


मुनीम जी का कमरा 

साफ़ सफाई वाली हवेली - या तो होटल है या फिर सेठ जी खुद रहते हैं 

हवेली की छत से मंडावा का एक दृश्य. पीछे है मंडावा किले की बुर्जी 

समय के चक्रव्यूह में फंसा मंडावा. कभी अच्छे दिन भी देखे होंगे इन गलियों ने  
ऐसा लगता है कि साफ़ सफाई की कमी ने मंडावा की टूरिज्म की संभावनाएं कुछ घटा दी हैं 

मंडावा का मुख्य मार्ग 

समय के साथ लाख की चूड़ियों का काम भी लगभग ख़त्म हो गया है 

ठण्ड के दिनों में घेवर का आनंद लें 

मंडावा किले के चोबदार 

इस तरह के खम्बों का मतलब मीठे पानी का कुआँ 

लाल निशान मंडावा दिखा रहा है. पंजाब की हरियाली के नीचे सूखी मरुस्थली धरती 

अमर सागर जैन मंदिर, लौद्रवा, जैसलमेर

थार रेगिस्तान का एक प्रमुख शहर है जैसलमेर जो कि भाटी राजपूत महाराजा जैस्सल ने 1178 में बसाया था. इससे पहले भाटी राजपूतों की राजधानी लौद्रवा हुआ करती थी. लौद्रवा जिसे लुद्रावा या लौदर्वा भी कहते हैं जैसलमेर से लगभग 16 किमी दूर है.

जैसलमेर और लौद्रवा के बीच में एक बहुत ही सुंदर मंदिर है जो जैसलमेर के पटवा सेठ हिम्मत मल बाफना ने 1871 में बनवाया था. बाफना समाज के इतिहास कुछ इस तरह से बताया जाता है: परमार राजा पृथ्वीपाल के वशंज राजा जोबनपाल और राजकुमार सच्चीपाल ने कई युद्ध जीते जिसका श्रेय उन्होंने 'बहुफणा पार्श्वनाथ शत्रुंजय महा मन्त्र' के लगातार उच्चारण को दिया. युद्ध जीतने के बाद उन्होंने जैन आचार्य दत्तसुरी जी से जैन धर्म की दीक्षा ली. उसके बाद से वे बहुफणा कहलाने लगे. कालान्तर में बहुफणा, बहुफना, बाफना या बापना में बदल गया. बाफना समाज की कुलदेवी ओसियां की सच्चीय माता हैं. इसीलिए इनके मंदिरों में जैन तीर्थंकर के अतिरिक्त हिन्दू मूर्तियाँ भी स्थापित की जाती हैं.

मंदिर में ज्यादातर जैसलमेर का पीला पत्थर इस्तेमाल किया गया है. पर साथ ही सफ़ेद संगमरमर और हल्का गुलाबी जोधपुरी पत्थर भी कहीं कहीं इस्तेमाल किया गया है. मंदिर के स्तम्भ, झऱोखे और छतों पर कमाल की नक्काशी है.

जैसलमेर से मंदिर तक आने जाने के लिए आसानी से वाहन मिल जाते हैं. प्रवेश के लिए  शुल्क है और कैमरा शुल्क देकर फोटो भी ली जा सकती हैं. मंदिर सुबह से शाम तक खुला रहता है. यहाँ की रेगिस्तानी धूप बहुत तीख़ी है और हवा बहुत तेज़ जिसकी वजह से यहाँ सभी सिर ढक कर रखते हैं आप भी अपना ध्यान रखें. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:


जैन मंदिर 

मंदिर का कुआं

सुंदर प्रवेश द्वार 

भगवान आदिनाथ

सुंदर नक्काशी 

छत पर नक्काशी

छत पर नक्काशी

मंदिर


द्वारपाल

भैरू जी

चबूतरे पर नक्काशी

ऊपरली मंजिल पर 

मंदिर की परछाई सूखे तालाब पर

गोल गुम्बद 

पटवा सेठ श्री हिम्मत मल जी बाफना का स्मारक 
 

 Long drive to Delhi: 43 चित्तौड़गढ़ से

चित्तौड़गढ़ एक ऐतिहासिक शहर है जो दिल्ली - मुम्बई राजमार्ग- 8 के लगभग मध्य में स्थित है। दिल्ली से 700 किमी और अजमेर से 112 किमी है। इस शहर का मौसम गरम ही रहता है क्यूँकि बारिश कम ही होती हैं। नवम्बर से फ़रवरी तक घुमने का अच्छा मौसम है।

इस पुराने शहर से कई नाम जुड़े हैं जिनमें से एक मीरा बाई का भी है। शहर के मुख्य चौराहे पर मीरा बाई की याद में एक सुंदर मूर्ति-समूह लगाया गया है। और इसके पास ही है डांडी यात्रा का मूर्ति-समूह। सारी मूर्तियाँ सुंदर हैं और शहर की शोभा बढ़ाती हैं। कुछ फ़ोटो :



राजवधु मीरा बाई को पालकी में बैठाकर राजमहल की ओर ले जाया जा रहा है

सामने से लिया गया चित्र 

राजमार्ग से चित्तौड़गढ़ शहर की ओर जाती सड़क 

महात्मा गांधी का नमक सत्याग्रह - डांडी मार्च का सुंदर मूर्ति-समूह। इसी तरह का परन्तु इससे ज़्यादा बड़ी रचना नई दिल्ली में भी लगाई गई है



चित्तौड़गढ़ की अधिक जानकारी और चित्रों के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें:

http://jogharshwardhan.blogspot.com/2015/01/long-drive-to-delhi-41-chittorgarh.html

 Long drive to Delhi - 42 : Chittorgarh, Rajasthan

Chittorgarh is located 112 Kms from Ajmer & approx 700 kms from Delhi. It is almost midway on Delhi - Bombay highway on NH 8. Golden Quadrilateral road network NH-76 & NH-79 intersect near Chittorgarh. Weather throughout the year is hot & rains are scanty. Best season to visit is Nov – Feb. Names of eminent people in history are associated with Chittorgarh: Rani Padmini, Meera Bai, Maharana Pratap, Rana Kumbha, Rana Hammir Singh & many others.

Meera Bai Temple

Folk lore mentions that Bhim started building the fort during Mahabharat. He was a disciple of sage here. Once out of impatience & anger he hit the ground hard & water sprang up to form a reservoir which is named Bhim-Lat.

The fort town is believed to have been constructed during 7th century AD & perhaps the name of fort is derived from Mauryan ruler Chitrangda Mori. It was capital of Mewar state established by Bappa Rawal for over eight hundred years. The fort was gifted to him in dowry!

Entry into the fort is through one mile long steep serpentine road through seven gates each having watch tower & iron spiked huge doors - Ram Pol (main gate), Laxman Pol, Jorla Pol, Ganesh Pol, Hanuman Pol, Bhairon Pol & Paidal Pol. Fort had 84 water bodies of which only 20 are functional now. Inside the forts there are 300 temples. The peripheral wall is said to be second longest to China Wall!

Victory Tower is 122 ft high & was built by Maharana Kumbha in 1440 to commemorate victory over Muslim rulers of Malwa & Gujrat. The tower stands on a 10 ft high base

Inside the Krishna Temple

Meera Temple

Krishna Temple
In 1303 Alla-u-ddin Khilji, Sutan of Dilli hearing about exceptional beauty of Rani Pamavati attacked the fort to capture her. Rana Rattan Singh & the men folk of the fort took to arms & fought to death. Rani Padmini along with all the ladies in fort committed jauhar. It was recaptured by Hamir Singh in 1326 & it rose again. 
In 1535 Bahdur Shah, Sultan of Gujrat besieged the court again & Rana Bikramjit Singh & entire men folk of fort donned saffron robes, took to arms to fight to death. Women folk led by Rani Karnavati committed jauhar.
In 1568 Akbar Udai Singh again captured the fort & mass jauhar was performed for the third time. Maharana Udai Singh II fled to Udaipur to re-establish his rule & founded Udaipur. Thus the stones of the fort are memorial to bravery, nationalism, courage & sacrifice of kings, soldiers, women & even children.
Kirti Tower is dedicated to Jain Tirthankar Rishabh


Inside the Brahma-Vishnu-Mahesh Temple


Two video recordings on BlackBerry are placed below.








 Long drive to Delhi : 41 - Towards Chittorgarh, Rajasthan

From Baroda we started towards Chittorgarh, Rajasthan bypassing Udaipur which we had already visited earlier. Roads in Gujrat & Rajasthan are good & most of the main highways have six lanes. Traffic is also thin but has lot of heavy vehicles. Truckers have their own ideas on road discipline & need to be left alone. Our Alto 800 merrily cruised along with a/c on & we had no problems. Though with heavier vehicle we could have covered the distance faster. Road side dhabas were fewer. We kept lot of snacks, water bottles & fruits for the journey.

We passed through Dungarpur district which looked pretty green after monsoon showers. Hot & bright sun made interesting combo with green hills. Some snaps taken while moving towards Chittorgarh are here:

Prior to this visit, never had heard of Dungarpur

Welcome to Rajasthan

On duty in rural Dungarpur

Humans of Dungarpur going on a pilgrimage 

Hotel on the highway

Udaipur was not far off

Let's go to school

Kesharinath Jain Mandir standing alone among the hills


                                                                                                                                                                                  





जैन मंदिर, लौद्रवा, जैसलमेर

लौद्रवा नामक जैन तीर्थ जैसलमेर से लगभग 16 किमी दूर है. यहाँ एक बहुत ही सुंदर और प्राचीन मंदिर - जिनालय है जो 23वें जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ जी को समर्पित है.

लौद्रवा को लुद्र्वा या लुद्रावा भी कहते हैं. हज़ार बारह सौ साल पहले जब ईरान, इराक, अफगानिस्तान से व्यापारी ऊँटों के कारवां लेकर चलते थे उस वक़्त लौद्रवा व्यापारियों का एक छोटा सा पड़ाव था. यहाँ लोधुरवा राजपूतों का निवास था. नौवीं सदी में भाटी राजपूत देवराज ने लौद्रवा पर कब्जा कर लिया और इसे राजधानी बनाया.

व्यापारी कारवाँ का पड़ाव होने के कारण यह क्षेत्र समृद्ध था. इसी कारण यहाँ लूटपाट और हमले भी होते रहते थे. 1025 में महमूद ग़ज़नवी ने लौद्रवा की घेरा बंदी की और दूसरा बड़ा हमला 1152 में मोहम्मद गौरी ने किया. इन हमलों में मंदिर और शहर का जान माल का भारी नुक्सान हुआ. सुरक्षा को मद्दे नज़र रखते हुए महाराजा जैसल ने 1178 में राजधानी को लौद्रवा से हटा कर नई राजधानी जैसलमेर में बना दी.

हमलों में बर्बाद हुए मंदिरों को एक व्यापारी थारू शाह ने 1615 में दुबारा बनवाना शुरू किया. समय समय पर मंदिर का काम होता रहा और 1970 में इन्हें पूर्ण सुन्दरता के साथ पुनः स्थापित कर दिया गया. मंदिर में ज्यादातर स्थानीय पीला पत्थर इस्तेमाल किया गया है. पर साथ ही जोधपुर से लाया गया हल्का गुलाबी और मकराना का सफ़ेद संगमरमर भी इस्तेमाल किया गया है. मंदिर की जगती, स्तम्भ, तोरण, झरोखे और पत्थर की जालियों पर कमाल की और मनमोहक कारीगरी है.

मंदिर दिन भरे खुले रहते हैं और फीस देकर कैमरा इस्तेमाल किया जा सकता है. पास में ही जैन सात्विक भोजनालय है जहाँ संध्या से पहले कूपन पर भोजन उपलब्ध हो जाता है. जैसलमेर से आने जाने के लिए जीप और टैक्सी आसानी से मिल जाती हैं. पर थार रेगिस्तान के इस इलाके में तीख़ी धूप और तेज़ हवाएं चलती हैं ध्यान रखें. कुछ फोटो प्रस्तुत हैं:

जिनालय  

मुख्य द्वार 

जगती या चबूतरा 

तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ का मंदिर 

छत पर सुंदर नक्काशी 

स्थानीय पीले पत्थर से बना सुंदर तोरण 

तीर्थंकर श्री ऋषभदेव का मंदिर 

चबूतरे पर की गई नक्काशी 

दीवारों के डिजाईन और फूल पत्ते 


मूर्तियाँ कम हैं और बहुत छोटी हैं 

जाली का मनमोहक काम 

परिसर में मुख्य मंदिर के अलवा तीन छोटे मंदिर भी हैं 

1950 में दी गई एक भेंट 

 खाभा फोर्ट, जैसलमेर

जैसलमेर शहर से 35 किमी दूर एक गाँव और किला है खाभा. इस गाँव खाभा से कई किस्से जुड़े हुए हैं. साथ ही किस्सों में 83 और गाँव भी हैं. इन 84 गाँव को पाली जिले से आये ब्राह्मण व्यापारियों ने 1200 के आसपास बसाया था. ये 84 गाँव जैसलमेर के बहुत बड़े इलाके में फैले हुए हैं. सभी 84 गाँव बड़े व्यवस्थित ढंग से बसाए गए थे और इनमें मंदिर, कुँए, तालाब, शमशान वगैरा भी थे. इन गाँव वासियों का काम था पशु पालन, खेती, नील, सोने और चांदी के जेवर, सिल्क, हाथी दांत और अफीम का व्यापार. ये व्यापार कराची, सिंध के रास्ते इरान, इराक, अफगानिस्तान से ऊँटों द्वारा हुआ करता था. इनमें दो प्रमुख गाँव थे खाभा और कुलधरा.

इन गाँव से टैक्स वसूली का काम जैसलमेर राज दरबार के दीवान किया करते थे. 1825 में जैसलमेर के दीवान सालेम सिंह थे जो अपनी सख्ती के कारण ज़ालिम सिंह कहलाते थे. सालेम सिंह की सात पत्नियाँ बताई जाती हैं पर फिर भी वसूली के दौरान कुलधरा के एक पालीवाल ब्राह्मण की कन्या उन्हें भा गई और गाँव प्रधान को हुक्म दिया गया की लड़की को शादी के लिए तैयार कर लें. रात को पंचायत बैठी और फैसला हुआ की 84 गाँव के सभी निवासी तुरंत जैसलमेर राज छोड़ कर चले जाएं. रातों रात सारे 84 गाँव खाली कर दिए गए. 

परन्तु बाद में बदनामी और वसूली के घाटे से बचने के लिए इन्हें वापिस लाने का प्रयास किया गया. 82 गाँव में कुछ परिवार आ भी गए परन्तु कुलधरा और खाभा में कोई वापिस नहीं आया. बताया जाता है की कुछ समय पहले सिंध, पकिस्तान से आये कुछ हिन्दुओं को यहाँ बसाया गया है. बहरहाल आजकल खाभा गाँव की आबादी लगभग 300 है.  

कुछ इतिहासकारों का कहना है कि पानी की कमी के कारण निवासियों का पलायन होता गया. जनसंख्या घट जाने के बावजूद टैक्स वसूली में कमी नहीं की गई जिसके कारण लोग गाँव छोड़ कर चले गए. पर इतने समृद्ध गाँव एक साथ खाली क्यूँ और कैसे हो गए यह एक पहेली है.

पर हर पर्यटक को राज दरबार के दीवान के अत्याचार और रातों रात गाँव का खाली होना कौतुहल और अचरज भरा लगता है और गाँव देखने की इच्छा भी होती है. इसीलिए देशी विदेशी पर्यटक काफी संख्या में कुलधरा और खाभा के खंडहर देखने आते हैं. कुलधरा से सम्बन्धित किस्सा इस लिंक पर देखा जा सकता है:

http://jogharshwardhan.blogspot.com/2017/03/blog-post.html भूत प्रेतों का गाँव - कुलधरा, जैसलमेर 
खाभा के बारे में ये भी कहा जाता है कि यह गाँव नेहड़ नाम के पालीवाल ब्राह्मण को दहेज़ में दिया गया था जिसे दोबारा व्यवस्थित ढंग से बसाया गया. खाभा गाँव और किले को पर्यटन स्थल में विकसित किया जा रहा है. किला तो छोटा सा ही है पर इसमें जियोलॉजी का संग्रहालय भी बनाया जा रहा है. यह जान कर आश्चर्य हुआ की करोड़ों साल पहले यहाँ थार रेगिस्तान के बजाए समुन्दर हुआ करता था जो धीरे धीरे सात आठ सौ किमी पीछे हट गया और इस इलाके की बहती नदियाँ भी सूख गईं. अब यहाँ रह गए हैं केवल झाड़ियाँ और सूखी पीली रेत के टीले.

खाभा आने जाने के लिए जैसलमेर से सवारी आसानी से मिल जाती है. धूप यहाँ बड़ी तीखी होती है और हवा लगातार बहुत तेज़ चलती है. साथ ही खाने पीने की असुविधा है इसलिये इंतज़ाम कर के चलें. किला सुबह से शाम तक खुला है और प्रवेश शुल्क देकर देखा जा सकता है. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

खाभा किला 

किले का बायाँ पक्ष

खाभा फोर्ट की बाँई दीवार  

पुनरुद्धार का काम जारी है 

पीला पत्थर जैसलमेर की विशेषता है 
पूरा बन जाने पर सुंदर नज़र आएगा  

तेज़ गर्मी और कड़ी सर्दी से बचाव के लिये छत के नीचे बल्लियाँ लगाईं गई हैं 

किले के मंदिर में महिषासुर मर्दिनी

खाभा गाँव का एक हिस्सा जहाँ थोड़े से लोग रहते हैं 

कारों के पीछे एक मंदिर और दो छतरियां भी देखी जा सकती हैं  

कभी सुव्यवस्थित गाँव रहा होगा खाभा 

'रण' ( जैसे कच्छ का रण )  को परिभाषित करता एक पोस्टर 

खुदाई में पाए गए तरह तरह के पत्थर 

प्राचीन बोल्डर या गोलाश्म 

गोलाश्म की परिभाषा 

किले के पिछली ओर की एक खिड़की से रेतीले टीलों का नज़ारा 

खाभा का इतिहास 

थार रेगिस्तान में खाभा फोर्ट जिस पर लाल झंडी लगी हुई है. किले से कांडला बंदरगाह लगभग 625 किमी दूर है   

 भूत प्रेतों का गाँव - कुलधरा, जैसलमेर

थार रेगिस्तान का एक प्रमुख शहर है जैसलमेर. दिल्ली से जैसलमेर की दूरी 770 किमी है और जयपुर से लगभग 560 किमी. जैसलमेर शहर से 18 किमी दूर एक शापित गाँव है कुलधरा जहां लगभग दो सौ सालों से कोई नहीं रहता. इस वीरान बियाबान गाँव में लगभग 400 घरों के खंडहर हैं जिनमें कहा जाता है की भूत प्रेत रहते हैं. कुलधरा नाम के इस गाँव में लोग दिन में अकेले जाने से डरते हैं रात की बात तो दूर है.

यह किस्सा सुनकर तो कुलधरा देखने जाना जरूरी हो गया था. आने जाने के लिए जैसलमेर से सवारियां आसानी से मिल जाती हैं. हम तो अपनी ही गाड़ी में आधे घंटे में लगभग 11 बजे पहुँच गए थे. वहां दिन में ना तो कोई भूत मिला और ना ही किसी मिस या मिसेज़ चुड़ैल से बात हुई.

कुलधरा गाँव काफी बड़ा है और गाँव में मंदिर, कुएँ, तालाब, शमशान, स्मारक या देवली भी हैं. इन स्मारक पत्थरों पर अंकित लेखों के अनुसार दो निवासियों की मृत्यु 1235 और 1238 में हुई जिससे लगता है की गाँव 1200 या उस से भी पहले बस गया होगा. मंदिर विष्णु और महिषासुर मर्दिनी का है साथ ही कुछ घरों के प्रवेश द्वार पर गणेश की मूर्तियाँ भी मिली हैं. कुछ घरों में तहखाने भी मिले हैं जहां सम्भवता खज़ाना रखा जाता हो. यहाँ सोने की चिड़िया रहती थी उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है की महाराजा गज सिंह के समय 1820 और 1821 में 14 लाख रूपए के बराबर कैश या काइंड में टैक्स की वसूली हुई! दो दशक पहले कुछ लोग खजाने की खोज में खंडहरों में खुदाई करते पकड़े गए थे. तब से राज्य सरकार ने इस गाँव को कब्जे में कर लिया है.

इतिहासकारों का कहना है कि पाली जिले से आये ब्राह्मण व्यापारीयों ने कुलधरा गाँव बसाया था. कुलधरा के अतिरिक्त ऐसे 83 और गाँव थे जो पालीवालों द्वारा जैसलमेर के आसपास बसाए गए. इनमें से एक मशहूर और बड़ा गाँव है खाभा फोर्ट जिसके बारे में अगले ब्लॉग में चर्चा करेंगे. ये गाँव जैसलमेर में दूर दूर तक फैले हुए हैं और बड़े व्यवस्थित ढंग से बसाए गए थे. कुलधरा गाँव में 400 से ज्यादा मकान थे और गाँव से कुछ दूर 200 मकान अलग से बने हुए थे. मकान बड़े बड़े थे और उत्तर-दक्षिण जाने वाली गलियां लम्बी, चौड़ी और सीधी सीधी थी. पूर्व-पश्चिम वाली गलियां पतली और छोटी थीं याने लिंक और सर्विस लेन का काम करती थी. गाँव के दक्षिण में 2.5 किमी लंबा और 2 किमी चौड़ा तालाब या खड़ीन भी था. इसमें बारिश का पानी संचित किया जाता था. और उसके सूखने पर जवार या चने की फसल लगाई जाती थी.

कुलधरा और आसपास के इन गाँव वासियों का काम था मवेशी पालना, खेती करना, अनाज, नील, सोने और चांदी के जेवर, सिल्क, हाथी दांत और अफीम का व्यापार. ये व्यापार कराची, सिंध के रास्ते इरान, इराक, अफगानिस्तान से ऊँटों द्वारा हुआ करता था. इन गाँव से कर वसूली का काम जैसलमेर राज दरबार के दीवान सलीम सिंह ( या सालेम सिंह ) बड़ी सख्ती से किया करते थे इसलिए जनता ने उनका नाम ज़ालिम सिंह रख दिया था. सालेम सिंह की सात पत्नियाँ बताई जाती हैं पर फिर भी 1825 के शुरू में वसूली के दौरान एक पालीवाल ब्राह्मण कन्या उन्हें भा गई और गाँव प्रधान को हुक्म दिया गया की लड़की को शादी के लिए उनके पास पहुंचा दिया जाए. रात को पंचायत बैठी और फैसला हुआ की 84 गाँव के सभी पालीवाल तुरंत जैसलमेर राज छोड़ कर चले जाएं. रातों रात सारे गाँव खाली कर दिए गए. 

इस कहानी का एक और मोड़ भी है की उस लड़की को मार दिया गया (?) और उसके खून से हर मकान के दरवाज़े पर तिलक लगा दिया गया. गाँव वालों ने जाते हुए श्राप दे दिया कि ये गाँव दुबारा नहीं बसेगा और वहां से निकल गए. यहाँ से निकल कर ये पालीवाल लोग मध्य प्रदेश, गुजरात के दूर दराज़ के इलाकों में चले गए. राजा ने बदनामी और वसूली के घाटे से बचने के लिए इन्हें वापिस लाने का प्रयास किया गया. 82 गाँव में कुछ परिवार आ भी गए परन्तु कुलधरा और खाभा में कोई वापिस नहीं आया. बताया जाता है की कुछ समय पहले सिंध, पकिस्तान से आये कुछ हिन्दुओं को यहाँ खाभा में बसाया गया है. 

खाभा फोर्ट, जैसलमेर के बारे में इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है : http://jogharshwardhan.blogspot.com/2017/03/blog-post_11.html   

कुछ इतिहासकारों का कहना है कि कुलधरा के दक्षिण में केकनी ( केकणी / काकनी / ककनी )  नाम की नदी थी थी जो धीरे धीरे सूखती गई और निवासियों का पलायन होता गया. संख्या घट जाने के बावजूद टैक्स वसूली में कमी नहीं की गई और सख्ती जारी रही इस कारण से लोग गाँव छोड़ कर चले गए ( वित्त मंत्री कृपया ध्यान दें!). पर इतने समृद्ध गाँव एक साथ खाली क्यूँ और कैसे हो गए कहना मुश्किल है. इतिहास की पहेली शायद अनबूझ ही रहेगी.

पर हर पर्यटक को ज़ालिम सिंह के अत्याचार और रातों रात गाँव का खाली होना कौतुहल और अचरज भरा लगता है और गाँव देखने की इच्छा भी होती है. इसीलिए देसी और फिरंगी पर्यटक काफी संख्या में खंडहर देखने आते हैं. सरकार ने कुलधरा को पर्यटन स्थल घोषित कर दिया है और गाँव को ठीक ठाक करवाने का काम जारी है. आसपास निजी रिसोर्ट वगैरा भी बन रहे हैं. प्रवेश शुल्क देकर सुबह से शाम तक खँडहर देखे जा सकते हैं पर रात को जाने पर मनाही है कौन जाने रात को भूत प्रेत घूमते रहते हों?
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:


स्मारक या छतरी 

खँडहर मकान और दाहिने कोने पर पुराना मंदिर 

बड़े और व्यवस्थित मकानों के बीच चौड़ी गलियां 

गर्मी और सर्दी का बचाव करने के लिए मोटी मोटी दीवारें बनाई गई हैं 

इस बालक ने भी भूतों का किस्सा दोहराया 

बड़े बड़े कमरे और रसोई घर 

पीछे ढाल में कभी ककनी नदी बहती थी 

शायद कभी ऐसा रहा होगा कुलधरा   

 झूले लाल मंदिर, जयपुर

झूले लाल जलदेवता वरुण के अवतार माने जाते हैं. उनका अवतरण सिन्धी हिन्दुओं का उद्धार करने के लिए हुआ था. उन दिनों सिंध में एक बेरहम राजा मिरख शाह का राज था. प्रजा पर अत्याचार हो रहे थे और धर्मंतारण कराया जा रहा था. सिन्धी समाज ने सिन्धु नदी के किनारे 40 दिन तक तपस्या की. फिर नदी में मत्स्य पर भगवान झूले लाल प्रकट हुए और आश्वासन दिया कि जल्द ही स्थिति का निवारण कर देंगे.

चैत्र याने अप्रैल 1007 में झूले लाल ने नसरपुर, सिंध प्रदेश में जन्म लिया. उनकी माता का नाम देवकी और पिता का नाम रतन राय था. बालक का नाम उदेरो लाल रखा गया. झूले में ही बालक ने विलक्षण प्रतिभा दिखाई इसलिए बाद में झूले लाल या लाल साईं कहलाए. उनके अन्य नाम हैं - घोड़ेवारो, पल्लेवारो, ज्योतिवारो और अमर लाल. मुस्लिम भक्तों की ओर से नाम है पीर जिन्दाह.

बालक उदेरो की चर्चा शाह के दरबार में भी पहुंची और बालक को तलब किया गया. शाह के दरबार में सिपाहियों ने उदेरो को पकड़ने की बड़ी कोशिश की पर बालक हाथ ना आया. शाह ने चमत्कार देख बालक उदेरो से माफ़ी मांगी और सभी लोगों से अच्छा व्यवहार करने का वादा किया.

भगवान झूले लाल का अवतरण दिवस 'चेती चंड' के रूप में मनाया जाता है. इस दिन झूले लाल जी के सम्मान में शोभा यात्रा निकली जाती है, भजन गाए जाते हैं और लोक नृत्य भी होते हैं. भगवान झूले लाल का वाहन मछली है जो ताजे पानी की 'पालो' मछली है और सिन्धु नदी में पाई जाती है.

झूले लाल जी मंदिर, जयपुर की कुछ फोटो:

जेको चवेंदो झूले लाल, तहेंजा बेड़ा पार, बेड़ा पार, सदा बहार !
इश्वर अल्लाह हिक आहे, सजि सृष्टि हिक आहे एं असां सभ हिक परिवार आहियू  
सभनी हद खुशहाली हुजे 
लाल साईं  (इन्टरनेट से लिया गया चित्र )





 जसवंत थड़ा, जोधपुर

थार रेगिस्तान में बसा जोधपुर शहर राव जोधा ने 1459 में स्थापित किया था. दिल्ली से जोधपुर लगभग 600 किमी दूर है और जयपुर से लगभग 330 किमी. राव जोधा के वंशज महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय थे जिनका राज 1873 से 1895 तक रहा और जिनका देहांत 1899 में हुआ. उनके पुत्र महाराजा सरदार सिंह (1895 - 1911) ने पिता की याद में स्मारक बनाया जो जसवंत थड़ा के नाम से प्रसिद्ध है.

जसवंत थड़ा मेहरानगढ़ से 2 - 3 किमी दूर बाईं ओर एक बड़ी झील के किनारे है. मौसम अच्छा हो तो गढ़ से पैदल वर्ना ऑटो से जसवंत थड़ा पहुँचा जा सकता है. इस स्मारक की नींव 1900 में रखी गई और 1904 में रेजिडेंट गवर्नर ने थड़ा बनाने की मंज़ूरी दी थी. स्मारक सफ़ेद मकराना संगमरमर, लाल बालू पत्थर और गुलाबी रंग के पत्थर से मंदिर के रूप में बना हुआ है. आम तौर पर इसे जोधपुर का ताजमहल भी कहा जाता है. इस स्मारक का नक्शा मुंशी सुखलाल कायस्थ ने बनाया था और वास्तु कार थे बुद्धमल और रहीम बक्श. मंदिर के हॉल में पूर्व राजाओं और परिवार जनों की पेंटिंग्स लगी हुई हैं. इस स्मारक पर सितम्बर 1921 तक 2,84,678 रूपए की लागत आई थी. मंदिर की दीवार में कई सफ़ेद पत्थर इतने पतले लगाए गए हैं कि हॉल के अंदर में उजाला रहता है.

आम तौर पर स्मारक या पुराने मंदिरों में गाइड तरह तरह के किस्से कहानियां जरूर सुना देते हैं परन्तु स्मारक से जुड़े पूरे तथ्य कम ही बताते हैं. मसलन इमारत का क्षेत्रफल, लगाया गया पत्थर या लकड़ी, मूर्तिकार के नाम, कितना समय लगा वगैरा वगैरा. ऐसी जानकारी अगर प्रवेश टिकेट के पीछे छाप दें या अलग से किसी बोर्ड पर लिखवा दें तो स्मारक में और रूचि बढ़ जाए. पुरातत्व विभाग ऐसे प्रमाणिक तथ्य की जानकारी देना जरूरी कर दे तो अच्छा रहे. ज्यादातर ट्रस्ट ही इन जगहों को चलाते हैं. और बिना प्रशिक्षण के गाइड द्वारा दी गई जानकारी ही प्रमाणिक माननी पड़ती है.

स्मारक सुबह नौ से शाम पांच तक खुला रहता है. प्रवेश पर शुल्क है और कैमरा शुल्क देकर फोटो खिंची जा सकती हैं. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो.

राठोड़ राजपूत महाराजा जसवंत सिंह का सुंदर स्मारक 

मंदिर का एक और दृश्य 

स्मारक में प्रवेश राजस्थानी लोक संगीत के साथ 

छतरी 

चबूतरे, खम्बों, और जाली पर सुंदर कारीगरी 

काफी ऊँचा चबूतरा बनाया गया है 

लाल, गुलाबी, सफ़ेद और काले पत्थर का बढ़िया सामंजस्य  

दिवारों में जालीयां, झरोखे और पतले सफ़ेद संगमरमर के कारण मंदिर के अंदर उजाला सा रहता है  

कबूतरों ने कई जगह संगमरमर को बदरंग कर दिया है 

राजघराने के लोगों की छतरियां 

छतरियां या स्मारक 
एक छतरी के नीचे राजघराने का निशान 

पेड़ों के झुरमुट में छुपा जसवंत थड़ा

जसवंत थड़ा से मेहरानगढ़ का एक दृश्य 





 लोंगेवाला युद्ध और स्मारक

जैसलमेर की यात्रा करें तो लोंगेवाला युद्ध स्मारक जरूर देखें. ये युद्ध स्मारक कुछ कमरों में ना बंद होकर खुले रेतीले रेगिस्तान में है. यह स्मारक दिसम्बर 1971 के एक ऐतिहासिक और निर्णायक युद्ध की याद दिलाता है जिसमें भारतीय सेना के थोड़े से जवानों ने एक बड़ी पाकिस्तानी ब्रिगेड को भारी नुकसान के साथ वापिस भागने पर मजबूर कर दिया. उस समय के टैंक, जीपें, बंकर वगैरा वैसे ही बरकरार रखे हुए हैं. ये स्मारक जैसलमेर से 108 किमी दूर है. आने जाने के लिए बसें और टैक्सी शहर में आसानी से उपलब्ध हैं. तीखी रेगिस्तानी धूप, तेज़ हवा और पानी का इंतज़ाम कर के चलें. वैसे जैसलमेर से पहले श्री तनोट माता का मंदिर और फिर लोंगेवाला युद्ध स्मारक देखते हुए शाम को वापिस शहर आया जा सकता है. सड़कें बहुत अच्छी हैं.

श्री तनोट माता मंदिर, जैसलमेर युद्ध स्मारक और फिर लोंगेवाला युद्ध स्मारक देखकर और ये जानकर कि इस रेगिस्तान में पाक ने हमले किये थे बड़ा कौतुहल हुआ और इच्छा हुई इतिहास के पन्ने पलटने की. इन तीनों स्मारकों में जो तस्वीरें हैं, टैंक और अन्य हथियार रखे हुए हैं और जो वहां बताया गया ध्यान से सुना, देखा और फिर इन्टरनेट में भी खोजबीन की. पढ़ने में रोमांचक लगा इसलिए ये कहानी पेश है. सेना और युद्ध का बहुत ज्यादा ज्ञान नहीं है इसलिए भूल चूक के लिए क्षमा.

1. वर्ष 1971 भारतीय उप महाद्वीप के लिए ऐतिहासिक वर्ष था. '71 में नवम्बर माह ख़तम होते होते मुक्ति बाहिनी ने जेस्सोर पर लगभग कब्जा कर लिया था. वहां मौजूद पश्चिमी पाकिस्तानी फ़ौज को स्थानीय लोगों का सहयोग मिलना समाप्त हो गया था उलटे उनपर हमले हो रहे थे. पश्चिमी पाक से पूर्वी पाक में फ़ौज को रसद, हथियार और गोला बारूद तुरंत पहुंचाना संभव नहीं था. इसलिए जग जाहिर होने लगा था कि पकिस्तान का अंग भंग होने वाला था.

2. पाकिस्तान का मानना था की पूर्वी पकिस्तान की रक्षा पश्चिम से की जा सकती है. राजस्थान या पंजाब का कुछ हिस्सा अगर फुर्ती से हथिया लिया जाए तो भारत का ध्यान पूर्वी पकिस्तान से हट जाएगा. ऐसा करने से भारत की फ़ौज और संसाधन बंट जाएंगे और भारत लम्बी और फैलाव वाली लड़ाई नहीं लड़ पाएगा. ऐसे में अगर कुछ जमीन पर कब्जा हो और साथ ही अंतर्राष्ट्रीय दबाव भी हो तो भारत ज्यादा देर तक लड़ाई नहीं झेल पाएगा और पाकिस्तान की बात मानने पर मजबूर हो जाएगा.

3. अमरीका और चीन के आशीर्वाद से पकिस्तान के पास उस समय के बेहतर हथियार, लड़ाकू जहाज और साज़ो सामान उपलब्ध थे. 13 दिन चले इस युद्ध में परोक्ष रूप से जॉर्डन, सऊदी अरब और लीबिया की वायु सेना की ओर से भी पाक को मदद भी मिल रही थी. इसलिए भारत से 1965 में हुई हार का बदला लेने और सबक सिखाने के इरादे बुलंद थे. इन सब बातों को मद्दे नज़र रखते हुए जनरल टिक्का खान ने पश्चिमी सीमा पर हवाई और सैनिक हमले की जोरदार योजना तैयार की.

4. 03 दिसम्बर 1971 की शाम को पाक वायु सेना ने ऑपरेशन चंगेज़ खान आरम्भ कर दिया. पहला हवाई हमला पठानकोट एयरबेस पर हुआ और रनवे को काफी नुक्सान पहुंचा. दूसरा हवाई हमला अमृतसर एयरबेस पर हुआ. रनवे में बड़े बड़े गड्ढे बन गए. तीसरे हमले में 20 लड़ाकू हवाई जहाज शामिल हो गए. शाम 6 बजे से 10 बजे तक अम्बाला, आगरा, सिरसा और उत्तरलाई एयर बेस पर बमबारी की गई. इनमें से सिरसा और उत्तरलाई में ज्यादा नुक्सान हुआ. आगरा एयरबेस में कई बम फटे ही नहीं क्यूंकि वो पुराने हो चुके थे. उधर जोधपुर, जैसलमेर और जामनगर पर भी कई हवाई हमले हुए. जैसलमेर में जमीन के नीचे बिछी बिजली और फोन की तारें ध्वस्त हो गईं.

5. उसी रात प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी ने पाक हवाई हमलों को भारत पर आक्रमण कहा और जवाबी कारवाई शुरू हो गई.13 दिन चले इस युद्ध में पूर्वी पाकिस्तान खतम हो गया, बंगला देश बन गया और पाक फ़ौज के लगभग एक लाख सैनिक बंदी बना लिए गए.

6. 04 दिसम्बर की रात को एक बड़े हमले की तैयारी करके पाक फ़ौज का एक काफिला अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार कर के लोंगेवाला के नज़दीक पहुँच गया. इस लम्बे काफिले में थी लगभग 2000 सिपाहियों की एक ब्रिगेड, 45 टैंक और 500 से ज्यादा गाड़ियाँ. इनका प्लान था कि पहले लोंगेवाला पर कब्जा कर लिया जाए, उसके बाद 30 किमी आगे बढ़ कर रामगढ़ पर और फिर 78 किमी आगे जैसलमेर शहर कब्जा लिया जाए. चूँकि ये जगह रेगिस्तान में थीं और आबादी नहीं थी इसलिए ये काम 24 घंटों में हो जाना था. पर लोंगेवाला में तो कुछ और ही होना था.

7. भारत की सैनिक प्राथमिकता पूर्वी पाकिस्तान सीमा पर थी. वहां दिनों दिन उथल पुथल बढ़ रही थी. पश्चिमी पाकिस्तान से लगी सीमा पर भारतीय फ़ौज की स्थिति सुरक्षा या बचाव की थी. इस तरफ का फौजी जमावड़ा ख़ास ख़ास संवेदनशील जगहों पर ही रखा गया था.

8. लोंगेवाला पहुँचने वाली भारी भरकम पाक फ़ौज का मुकाबला करने के लिए पंजाब रेजिमेंट की 23वीं बटालियन की अल्फ़ा कंपनी वहां तैनात थी जिसमें 120 जवान थे. इसके अलावा एक एंटी टैंक गन, दो रेकोइल लेस गन, एक सेक्शन MMG का और एक 81 मिमी के मोर्टार का था. साथ ही जैसलमेर में 4 हंटर लड़ाकू विमान, एक कृषक विमान और एक मारुत विमान उपलब्ध थे. पर हंटर विमान में रात में आक्रमण करने की सुविधा नहीं थी. इसके अलावा बी एस ऍफ़ के 4 जवान सीमा चौकी पर तैनात थे. अल्फ़ा कम्पनी की कमान थी मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरिया के हाथ में. अन्य अधिकारी थे कप्तान धर्मवीर, कप्तान भैरों सिंह, मेजर आत्मा सिंह. वायु सेना के अधिकारी थे विंग कमांडर एम एस बावा, विंग कमांडर आर ए कोवासजी, विंग कमांडर सुरेश और विंग कमांडर शेर्विन टली.

9. ये अल्फ़ा कम्पनी ऊँचे टीलों पर थी जहाँ गाड़ियों का आना जाना नहीं हो सकता था. टीलों के इर्द गिर्द कटीली तारों की बाड़ लगी हुई थी. तार बाड़ के आसपास जल्दी जल्दी कुछ बारूदी सुरंगे बिछा दी गईं थी. सामने सपाट मैदान बिलकुल सुनसान, बियाबान था और केवल छोटी छोटी झाड़ियाँ जहाँ तहां लगी हुई थीं. 23वीं बटालियन के बाकी जवान 17 किमी दूर साधेवाला में थे. 3 दिसम्बर के हवाई हमलों के बाद मेजर चांदपुरिया ने 20 जवानों की गश्ती टोली कप्तान धर्मवीर के साथ टोह लगाने के लिए सीमा पोस्ट की ओर भेजी.  कप्तान ने सूचना दी की बड़ी संख्या में दुश्मन के टैंक और गाड़ियाँ बढ़ी चली आ रही हैं. मेजर आत्मा सिंह ने अपने हवाई जहाज से उड़ान भरी और पुष्टि कर दी की लगभग २० किमी लम्बा काफिला इस ओर आ रहा है. मेजर चांदपुरिया ने तुरंत बटालियन मुख्यालय को सूचित किया और ख़ास तौर पर तोपों की सहायता माँगी. मुख्यालय ने जवाब दिया की सहायता पहुँचने में कम से कम छै घंटे का समय लगेगा. रात में जैसलमेर से हवाई आक्रमण भी संभव नहीं था. इन हालात में दो ही रास्ते थे - वहां डटे रहें और किसी तरह दुश्मन को रोकें या फिर मोर्चा छोड़ कर वापिस आ जाएं. परन्तु अँधेरी रात में वापिस जाने के लिए गाड़ियाँ नहीं थी. पैदल वापिस जाने में भी ख़तरा था और उधर दुश्मन तेज़ी से बढ़ा चला आ रहा था. परीक्षा की घड़ी आ गई थी.

10. मेजर चांदपुरिया ने मुकाबला करने का फैसला कर लिया. 4 दिसम्बर की रात 12.30 बजे हमला हो गया. मझोली तोपों के पहली बमबारी में बी एस ऍफ़ के ऊंट और पोस्ट ध्वस्त हो गयी. अब टैंकों का रुख अल्फ़ा कम्पनी की ओर हो गया. बड़े धैर्य के साथ और तैय्यारी के साथ उन्हें नज़दीक आने दिया गया और जब दूरी मात्र 15-20 मीटर की रह गयी रेकोइल लेस गन ने धाएं धाएं करके आग उगल दी. दो टैंक वहीँ के वहीँ खड़े रह गए. टैंकों पर तेल के ड्रम भी थे जो धमाके के साथ फटे और आग की लपटें उठने लगी. भारतीय सैनिक उंचाई पर थे और आग की रौशनी का फायदा उठाकर सही निशाना लगाते रहे और कामयाब होते रहे. कुछ टैंको ने दाएं बाएं से बढ़ने की कोशिश की पर बारूदी सुरंग फटने से वहां भी जाम लग गया. जिस रेत में पैदल चलना मुश्किल और गाड़ी चलाना और भी मुश्किल था वहां टैंक भी फंसने लग गए. टैंको को फुर्ती से दाएं बाएँ काटना या पीछे करना मुश्किल हो गया. ज्यादा कोशिश करने से टैंक रेत में धंसने लगे और आसान शिकार बन गए. कई टैंकों के इंजन गरम होकर सीज़ हो गए.

पहली जवाबी कारवाई में 12 टैंक बर्बाद हो गए. दुश्मन इस अचानक जवाब से सकपका कर थम गया. भारतीय खेमे का हौसला बुलंद हो गया. दुश्मन को अब बारूदी सुरंगों को हटाने की भी चिंता लग गई. बारूदी सुरंगें हटाने वाले सेप्पर्स बुलाए गए पर उन्हें दो घंटे बर्बाद करने के बाद भी कोई सुरंग नहीं मिली. बीच बीच में छोटे हथियारों से लगातार भारतीय सैनिकों पर आक्रमण होता रहा. पर भारतीय जवानों को ऊँचाई से निचले मैदान में जवाब देने में कम दिक्कत थी और सटीक गोलीबारी से कामयाबी भी मिल रही थी इसलिए हौसले हर मिनट पर बढ़ते जा रहे थे.

11. इस बीच आसमान की रंगत भी बदलने लगी. दुश्मन का प्लान अँधेरे में मिनटों में लोंगेवाला पर कब्जा करने का था पर वहां तो घंटो निकल गए. अब दिन निकलने के साथ ही उनकी पोजीशन पूरी तरह से सामने आने वाली थी. रेगिस्तान में दूर दूर तक कोई पेड़ ना ही कोई जंगल था. गाड़ियों तो क्या वहाँ सिपाहियों के लिए भी छुपने की जगह नहीं थी. उधर जैसलमेर के एयरबेस में लड़ाकू विमान हंटर हथियारों से लैस उड़ने के लिए तैयार हो चुके थे. इनमें 30 मिमी के तोपें और मात्रा-T-10 रॉकेट लगे हुए थे.

पहली किरण के साथ ही हंटर विमानों ने उड़ान भरी और पाकिस्तानी काफिले पर बमबारी शुरू कर दी. मेजर आत्मा सिंह अपने कृषक विमान AOP में से टारगेट की सूचनाएं देते जा रहे थे. दुश्मन का पूरा का पूरा काफिला, पैदल, टैंक, ट्रक और बख्तर बंद गाड़ियाँ खुले मैदान में नज़र आ रही थीं. पाक वायु सेना कहीं और व्यस्त थी. पाक टैंकों पर लगी 12.7 मिमी की एंटी एयर क्राफ्ट फायरिंग कारगर नहीं थी. इसलिए हंटर विमानों ने जमकर 'तीतर बटेरों' का शिकार किया. बे रोक टोक उड़ान भरी और 22 टैंक और 100 से ज्यादा गाड़ियाँ तबाह कर दी.

12. सुबह तक भारतीय सेना के 20 लैंसर्स के टैंक और 17 राजपुताना राइफल्स भी लोंगेवाला पहुँच गयी और पाकिस्तान पर पलटवार कर दिया गया. आक्रमणकारी बड़ी तेज़ी से आये, थमे, मुड़े और फिर भाग लिए. लगभग छै घंटे के युद्ध में पकिस्तान के इरादे थार रेगिस्तान की रेत में मिल गए.

13. लोंगेवाला के इस निर्णायक युद्ध में भारत के दो जवान शहीद हुए, एक एंटी टैंक गन बर्बाद हो गयी. पाकिस्तान के 200 सिपाही मारे गए 36 टैंक और 500 गाड़ियां बर्बाद हुई. युद्ध के बाद मेजर चांदपुरिया को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया. यूनिट के कई अन्य लोगों को भी सम्मनित किया गया.

14. दूसरे विश्व युद्ध के बाद यह पहली ऐसी लड़ाई थी जिसमें इतने टैंक बर्बाद हुए. ब्रिटिश मीडिया में इस युद्ध की काफी चर्चा हुई. कुछ हफ़्तों बाद ब्रिटिश फील्ड मार्शल आर एम कार्वर स्वयं लोंगेवाला का जाएज़ा लेने आये और मेजर चांदपुरिया से भी मिले. इस युद्ध पर बाद में 'बॉर्डर' फिल्म भी बनी.

लोंगेवाला युद्ध स्मारक, जैसलमेर के कुछ चित्र प्रस्तुत हैं:


1. दुश्मन का शेर्मन टैंक शर्मसार हुआ 

2. चीन में बना T 59 टैंक 

3. रिकोयल लेस गन - RCL M 40

4. बंकर में से नज़र आता दुश्मन का टैंक 

5. दुश्मन की गाड़ी बंकर के सामने 

6. एक बंकर से दूसरे बंकर जाने की खाई या ट्रेंच 

7. सिपाही जगजीत सिंह का बंकर

8. लांस नायक मथुरा दास की जीप और उसमें लगी आर.सी. एल. गन


9. पीली रेत की टीले और छोटी छोटी झाड़ियाँ. पैदल चलना मुश्किल, गाड़ी चलाना मुश्किल और टैंक को तेज़ी से दाएं बाएँ काटना और भी मुश्किल. दूर दूर तक छुपने की कोई जगह नहीं  

10. भारतीय गन 

11. युद्ध के समय की स्थिति : बॉर्डर 15 किलोमीटर, बॉर्डर पोस्ट 16, साधेवाला 20, तनोट 35, रामगढ़ 43 और जैसलमेर 108 किमी दूर. हमला लाल निशान की ओर से 4 दिसम्बर '71 की रात में 12.30 बजे हुआ  

12. Battle of Longewala in nutshell

13. लोंगेवाला स्मारक के दर्शनार्थी 

14. लोंगेवाला चौक 

15. विजयी तिरंगा 

श्री तनोट माता मंदिर पर एक फोटो-ब्लॉग इस लिंक पर देखा
जा सकता है: http://jogharshwardhan.blogspot.com/2017/02/blog-post_25.html

जैसलमेर वार म्यूजियम पर एक फोटो-ब्लॉग इस लिंक पर देखा
जा सकता है: http://jogharshwardhan.blogspot.com/2017/01/blog-post_25.html






 जूनागढ़, बीकानेर - 1 / 2

थार रेगिस्तान में बसा बीकानेर शहर जयपुर से 330 किमी और दिल्ली से 435 किमी दूर है. रेगिस्तान में बसा होने के कारण वार्षिक सामान्य तापमान में काफी फर्क रहता है. गर्मी में पारा 50 तक और सर्दी में 4 डिग्री तक नीचे आ सकता है. शहर की समुद्र तल से उंचाई लगभग 242 मीटर है. शहर में एयर पोर्ट भी हैऔर रेल भी और कई राजमार्ग भी यहाँ मिलते हैं इसलिए यात्रा करने में कठिनाई नहीं है. बीकानेर जिले की सीमा पाकिस्तान से मिली हुई है.

बीकानेर शहर की स्थापना राठोड़ वंशी राजा राव बिका ने 1488 में की थी. उस से पहले यह इलाका जांगलदेश या जांगलू कहलाता था और आबादी नाम मात्र की थी. धीरे धीरे राव बिका ने आसपास का इलाका जीत कर बीकानेर राज की स्थापना की. शहर का स्थापना दिवस अक्षय तृतीय के दिन मनाया जाता है.  बीकानेर राज के छठे राजा राव राय सिंह( 1571 - 1611) के समय बीकानेर का नाम ज्यादा प्रसिद्द हुआ. राव राय सिंह अकबर और जहाँगीर के दरबार में ऊँचे ओहदे पर रहे और उन्हें बहुत सी जागीरें इनाम में मिली. इन जागीरों की आमदनी से जूनागढ़ किले का निर्माण 17 फरवरी 1589 के दिन शुरू कराया गया जो 17 जनवरी 1594 को समाप्त हुआ.

किला 5.28 हेक्टेयर में फैला हुआ है और किसी पहाड़ी पर ना होकर जमीन पर ही है. ज्यादातर लाल बालू पत्थर और संगमरमर का बना हुआ है. किले की दीवारों की लम्बाई लगभग 1078 गज है. दीवारें 40 फीट ऊँची और करीब 15 फीट चौड़ी हैं. किले की बाहरी दीवारों के साथ साथ 30 फीट चौड़ी झील भी हुआ करती थी जो अब नहीं नज़र आती. किले में समय समय पर आने वाले राजाओं द्वारा कुछ ना कुछ बनता रहा. ये राजा राव हैं:
करन सिंह का राज 1631 - 1639 तक रहा और उन्होंने करन महल बनवाया.
अनूप सिंह का राज 1669 - 1698 तक रहा और उन्होंने ज़नानखाना और दीवाने आम 'अनूप महल' बनवाया.
गज सिंह ने 1746 - 1787 तक राज किया और चन्द्र महल बनवाया.
सूरत सिंह ने 1787 - 1828 ने कांच और पेंटिंग के काम करवाए.
डूंगर सिंह ने 1872 - 1887 के दौरान राज किया और बादल महल बनवाया.
गंगा सिंह ने 1887 - 1943 तक राज किया और गंगा निवास महल बनवाया.

राव गंगा सिंह ब्रिटिश राज में नाईट कमांडर रहे और जिस हॉल में अपने राजकाल की स्वर्ण जयंती मनाई उसमें अब संग्रहालय है. उन्होंने एक लालगढ़ महल भी बनवाया जिसमें वे 1902 में शिफ्ट हो गए. उनके पुत्र सदूल सिंह के समय बीकानेर राज का 1949 में भारत में विलय हो गया.

किला और अंदर के महल बहुत सुंदर है और संग्रहालय पुराने हथियार, पालकियों और शाही कपड़ों से भरा हुआ है. आप चाहें तो घंटों बिता सकते हैं. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो :

1. किले के अन्दर का एक बड़ा आँगन. सफ़ेद और लाल पत्थर का सुंदर संगम 


2. मीनार 

3.  ठंडक रखने के लिए पानी का तालाब 

4.  किले की बाहरी दिवार 

5. किले का एक प्रवेश द्वार 

6. सुरक्षा के लिए तीन दरवाज़े 

7. महल की ओर जाने के लिए पतली गली 

8. सुंदर टाईलों का फर्श, मेहराब, झरोखे और खिड़कियाँ 

9. इस आँगन में रंग कुछ अलग हैं, खम्बे और झरोखे भी अलग तरह के हैं  

10. बाहर के बाग़ बगीचे 

11. ठंडी हवा का आनंद भी और बाहर एक नज़र भी 

12. बेहतरीन कारीगरी 

13. सबसे बड़ा हाल जो काफी बाद में बना 

14. पर्यटक 

 जूनागढ़, बीकानेर - 2 / 2

थार रेगिस्तान में बसा बीकानेर शहर जयपुर से 330 किमी और दिल्ली से 435 किमी दूर है. शहर की समुद्र तल से उंचाई लगभग 242 मीटर है. शहर में एयर पोर्ट भी हैऔर रेल भी और कई राजमार्ग भी यहाँ मिलते हैं इसलिए यात्रा करने में कठिनाई नहीं है. शहर में हर बजट के होटल उपलब्ध हैं. बीकानेर जिले की सीमा पंजाब, हरयाणा के अलावा पाकिस्तान से भी मिली हुई है.

रेगिस्तान में बसा होने के कारण वार्षिक सामान्य तापमान में काफी फर्क रहता है. गर्मी में पारा 50 तक और सर्दी में 4 डिग्री तक नीचे आ सकता है. बारिश कम होती है इसलिए खेती भी कम है. पर फिर भी इतने बड़े किले, महल और विलासिता थी. इस बारे में काफी पूछताछ की तो पता लगा की थार रेगिस्तान का ये शहर 'सिल्क रूट' पर था. ऊँटों के कारवाँ मध्य एशिया और खाड़ी के देशों से व्यापार करने आते और यहाँ टैक्स देते थे. व्यापार में सिल्क, सोने चाँदी के जेवर और अफीम भी शामिल थी. अफीम अब भी सरकारी दुकानों में यहाँ मिलती है. ऐसा सुना कि पार्टी शार्टी में थोड़ी बहुत आजकल भी चलती है. अफीम के बारे में राजस्थानी कहावत है,

ले रत्ती तो देस मत्ती,
ले मासो तो टाळे पासो,
ले तोलो तो घर घर डोलो!

याने रत्ती भर लोगे तो दिमाग ठीक रहेगा, मासे जितनी लोगे तो बदन दर्द ठीक हो जाएगा और अगर तोले जितनी किसी ने ली तो गलियों में भटकता फिरेगा!

बीकानेर शहर की स्थापना राठोड़ वंशी राजा राव बीका ने 1488 में की थी. उस से पहले यह इलाका जांगलदेश या जांगलू कहलाता था और आबादी नाम मात्र की थी. धीरे धीरे राव बिका ने आसपास का इलाका जीत कर बीकानेर राज की स्थापना की. शहर का स्थापना दिवस अक्षय तृतीय के दिन मनाया जाता है. बीकानेर राज के छठे राजा राव राय सिंह( 1571 - 1611) के समय बीकानेर का नाम ज्यादा प्रसिद्द हुआ. राव राय सिंह अकबर और जहाँगीर के दरबार में ऊँचे ओहदे पर रहे और उन्हें बहुत सी जागीरें इनाम में मिली. इन जागीरों की आमदनी से जूनागढ़ किले का निर्माण 17 फरवरी 1589 के दिन शुरू कराया गया जो 17 जनवरी 1594 को समाप्त हुआ.

किला 5.28 हेक्टेयर में फैला हुआ है और किसी पहाड़ी पर ना होकर जमीन पर ही है. ज्यादातर लाल बालू पत्थर और संगमरमर का बना हुआ है. किले की दीवारों की लम्बाई लगभग 1078 गज है. दीवारें 40 फीट ऊँची और करीब 15 फीट चौड़ी हैं. किले की बाहरी दीवारों के साथ साथ 30 फीट चौड़ी झील भी हुआ करती थी जो अब नहीं नज़र आती. किले में समय समय पर आने वाले राजाओं द्वारा कुछ ना कुछ बनता रहा. ये राजा हैं:
करन सिंह का राज 1631 - 1639 तक रहा और उन्होंने करन महल बनवाया.
अनूप सिंह का राज 1669 - 1698 तक रहा और उन्होंने ज़नानखाना और दीवाने आम 'अनूप महल' बनवाया.
गज सिंह ने 1746 - 1787 तक राज किया और चन्द्र महल बनवाया.
सूरत सिंह ने 1787 - 1828 ने कांच और पेंटिंग के काम करवाए.
डूंगर सिंह ने 1872 - 1887 के दौरान राज किया और बादल महल बनवाया.
गंगा सिंह ने 1887 - 1943 तक राज किया और गंगा निवास महल बनवाया.

राव गंगा सिंह ब्रिटिश राज में नाईट कमांडर रहे और जिस हॉल में अपने राजकाल की स्वर्ण जयंती मनाई उसमें अब संग्रहालय है. उन्होंने एक लालगढ़ महल भी बनवाया जिसमें वे 1902 में शिफ्ट हो गए. उनके पुत्र सदूल सिंह के समय बीकानेर राज का 1949 में भारत में विलय हो गया.

किला और अंदर के महल बहुत सुंदर है और संग्रहालय पुराने हथियार, पालकियों और शाही कपड़ों से भरा हुआ है. आप चाहें तो घंटों बिता सकते हैं. कुछ चित्र पहले भाग में प्रकाशित किये गए थे उन्हें इस लिंक पर देखा जा सकता है:

http://jogharshwardhan.blogspot.com/2017/08/1-2.html

प्रस्तुत हैं कुछ और फोटो :

लाल पत्थर के सुंदर खम्बे और मेहराबें 

राव बीकाजी की पेंटिंग 

किले के अंदर महल 

पत्थरों का शानदार उपयोग 

तोप और तोरण 

मैं तुलसी तेरे आँगन की 
थार रेगिस्तान में बीकानेर 

जालियों का सुंदर काम 

कमाल का वास्तु शिल्प




बूंदी का किला

बूंदी राज्य की स्थापना 1342 में हाड़ा राजपूत राव देवा सिंह हाड़ा ने की थी. इससे पहले यहाँ की बागडोर सरदार बूंदा मीणा के हाथ में थी और इस क्षेत्र को 'बूंदा का नाल' कहा जाता था. कहा जाता है कि बूंदा मीणा के पौत्र जैत मीणा से छल पूर्वक राज ले लिया गया था. इसके बाद बूंदी और आसपास का इलाका हाड़ौती कहलाने लगा. 1544 के बाद बूंदी राज्य मेवाड़ के आधीन, 1569 में मुग़लों के आधीन और 1818 में ब्रिटिश के आधीन हो गया. 1947 में बूंदी का भारत में विलय हो गया. किला 1342 में बनना शुरू हुआ था और धीरे धीरे बढ़ता गया. बनावट केवल राजस्थानी शैली में है. अंदर सुन्दर महल, मंदिर हैं. पानी की शानदार व्यवस्था है. किले में पत्थर काट कर बनाई हुई झील भी है. कुछ फोटो प्रस्तुत हैं.

1. हाथी पोल याने हाथी दरवाज़ा, राजा सा हाथी पर बैठे बैठे अंदर या बाहर आ जा सकते थे 


2. किला काफी बड़ा है और सबसे ऊँची बुर्ज पर पहुंचना भी एक एडवेंचर है 

3. हिण्डोला ! झूला डालने के लिए बने खम्बे 

4. राजा सा का सिंहासन 

5. दरबार हॉल 

6. दरबार हॉल 

7. महिला दीर्घा। यहाँ से दरबार हाल देखा जा सकता था 

8. ऊपरी मंज़िल 

9. महिला निवास का एक दृश्य 

10. बादल महल 

11. बदल महल के सुन्दर खम्बे 

12. छोटा सा पूल. महल में गर्म और ठन्डे पानी की व्यवस्था थी 

13. फूल महल 

14. शाही शौचालय 


15. ना घर तेरा ना घर मेरा चिड़िया रैन बसेरा

16. पहरेदार की बुर्जी 

17. अस्तबल 

18. चित्रशाला की ओर ऊपर  जाता रास्ता 

19. किले के प्रवेश से पहले गणेश मंदिर 

20. किले की एक छत से नज़र आता बूंदी शहर 

21. हाथी पोल के अंदर 

22. राजा सा अपने सिंहासन पर बैठे बैठे हाथी पोल से आने जाने वालों को देख सकते थे 

 बूंदी राजस्थान

टोंक से बूंदी का रास्ता लगभग 120  किमी है जो शायद दो घंटे में पूरा हुआ. सड़कें अच्छी हैं राजस्थान में. पर हाँ टोल की चपत भी अच्छी खासी है जो आपकी जेब खाली करती रहती है. बूंदी पहुँचने से पहले ही किला दिखाई पड़ने लगा. पर मेन रोड छोड़ कर अंदर पुराने बूंदी शहर में सड़कें तंग हैं. गली गलियारों में दोनों ओर घर दुकानें हैं. इसलिए गाड़ी मेन रोड पर ही छोड़ के पैदल अंदर पहुंचे। दो तीन गेस्ट हाउस देखे और फिर एक हवेली में बने गेस्ट हाउस में डेरा डाल दिया.

हवेली में गेस्ट हाउस बना तो देते हैं पर गेस्ट का ध्यान काम रखते हैं. मसलन कहीं पर आपको एक दिन में एक लिटर पानी की बोतल फ्री मिलेगी, कहीं पर आधे लिटर की. राजस्थान की गर्मी में अब आप पानी की बोतलें खरीदते रहिये! कोई गेस्ट हाउस वाला ब्रेकफास्ट फ्री देगा और कोई टरका देगा। कोई चाय की केतली, चाय पत्ती और चीनी कमरे में सजा कर रख देगा बनाओ और पियो। कोई मंगाने पर देगा। कपल के लिए कोई बाथरूम में एक ही तौलिया टांग देगा ! दूसरा माँगना पड़ेगा। मांगने के लिए फ़ोन करेंगें तो इण्टरकॉम बंद मिलेगा। खैर, घुमक्कड़ी में छुटर पुटर बातें चलती रहती हैं. इस मामले में सबसे बढ़िया ताज होटल हैं हर चीज़ टिप टॉप और रेडी मिलेगी( वो भी बढ़िया तभी तक है जब आपके मोटे से बिल का भुगतान कोई और कर रहा हो 😜 )!

बूंदी जून 1242 में राव देवा सिंह ने बसाया था. पहले यहाँ ज्यादातर मीणा, गुर्जर,अहीर और आदिवासी रहा करते थे. राव देवा सिंह हाड़ा राजपूत थे इस कारण ये इलाका हाड़ोती क्षेत्र कहलाने लगा जिसमें कोटा, सवाई और आसपास का एरिया भी शामिल था. यहाँ के राजाओं में से राव उम्मेद सिंह ( 1749 से 1773 तक राज किया ) बहुत वीर, कला प्रेमी और जनप्रिय राजा थे. जीवन के अंतिम दिनों में राज-पाट बेटे को सौंप कर वो साधु बन गए थे. 

यहाँ की राजस्थानी हिंदी के साथ साथ हड़ौती और मेवाड़ी भी बोली जाती हैं. गेस्ट हाउस के मालिक से बातचीत में कई हाड़ा कहावतें सुनने को मिलीं पर अब एक कहावत ही याद रह गई है - आटे में लूण समावे, लूण में आटो नहीं ! मतलब आप समझ ही गए होंगे कि आटे में नमक खप जाता है पर नमक में आटा नहीं। यहाँ दिन का मौसम गर्म है पर शाम सुहानी है. घूमने के लिए सुन्दर सुन्दर स्पॉट हैं जिनकी चर्चा आगे करेंगे। मानसून और उसके तुरंत बाद बहुत हरा भरा हो जाता है इसलिए सितम्बर से मार्च तक का मौसम घूमने के लिहाज से ठीक है. 

फिलहाल शहर की कुछ फोटो प्रस्तुत हैं. 

1. बूंदी की शान और प्रमुख आकर्षण - तारा गढ़, या बूंदी का किला, 1345 में बना ये क़िला राजस्थान के किलों में से सबसे सुंदर लगता है.  

2. बूंदी छोटा सा शहर है पर पतली संकरी गलियों के बीच में सुंदर मंदिर, हवेलियाँ और बावड़ी हैं
 

3. हवेली के झरोखे से दिखता जैत सागर. सामने पहाड़ी पर जाती दीवार काफ़ी चौड़ी है जिस पर घुड़सवारी करते हुए राजा, रानी या सैनिक किले से पहाड़ी बुर्ज तक जा सकते थे. सड़क बनाने के लिए दीवार का एक बड़ा भाग तोड़ दिया गया है 

4. बूंदी की एक गली 


5. हवेली की सुंदर ड्योढ़ी, ऐसी हवेलियां अब गेस्ट हाउस और होटल बन गई हैं 


6. एक और गली और मेहराब जो कभी बॉउंड्री वाल का हिस्सा रही होगी


7. राव राजा उम्मेद सिंह का प्रिय ईरानी ( या शायद अरबी ) घोड़ा हुंजा. ये घोड़ा  कई लड़ाइयों में काम आया. घोड़े के मरने के बाद सफ़ेद संगमरमर का घोड़ा शहर के बुलबुल चबूतरे पर लगाया गया था जो हमले में टूट फूट गया. बाद में इसे छतों पर लगाया गया. मान्यता थी कि घोड़े में दैविक शक्ति थी जो घायल सैनिकों को ठीक कर देती थी. 


8. एक गली में यह सुंदर मंदिर भी है. नागरी शैली में बना हुआ है और खजुराहो के मंदिरों से मिलता जुलता है पर इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिल पाई.


9. राजस्थान में बहुत से लोग घोटा लगाते हैं. आप घोटा किसमें पसंद करेंगे - छाछ में या दही में या फिर दूध में ?😄


10. जैत सागर के बीच में बारादरी। सागर किनारे बैठ कर चाय, कॉफी या बियर का आनंद लिया जा सकता है !


11. गेस्ट हाउस और होटलों में घर दुकान की सजावट पुरातन समान के साथ देखने को मिलती है.


12. ये था राजा का प्रिय हाथी जिसका नाम रखा गया था शिव प्रसाद. बूंदी में हुंजा घोड़े और शिव प्रसाद हाथी की कई मूर्तियाँ नज़र आती हैं 

13. छोटे से मंदिर के ऊपर हुंजा 


14. बूंदी के बाद अपनी कार कोटा में पहुँची. यहां रुके नहीं इसलिए चलते चलते जो भी फोटो खींची वही पेश हैं  


15. कोटा एक उद्योग नगरी है. और कोटा शहर बहुत से कोचिंग सेंटर होने की वजह से भी मशहूर है. बहरहाल शहर खुला खुला है, अच्छी सड़कें और बाजार हैं. इसे और खूबसूरत बनाया जा रहा है.  

16. स्वामी विवेकानंद की मूर्ति 

17. एक और गेट बनाने की तैयारी 

अरबी फ़ारसी इंस्टिट्यूट, टोंक, राजस्थान

सुनहरी कोठी देखने के बाद हम अरबी फ़ारसी इंस्टिट्यूट पहुँचे. टोंक की कुछ और जानकारी हासिल हुई वो भी बताते चलें.

राजस्थान का टोंक शहर मीठे ख़रबूज़ों और लखनऊ जैसी मीठी बोली के लिए भी जाना जाता है. ये बनास नदी के किनारे बसा हुआ है. सन् 1817 से टोंक नवाबी रियासत की राजधानी थी. यहाँ 1961 में राजस्थान ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट की शाखा खोली गई थी. 

आजकल इसका नाम मौलाना अबुल कालाम आज़ाद अरेबिक पर्शियन रिसर्च इंस्टीट्यूट है. यहाँ एक म्यूजियम भी है जिसमें 3064 पांडुलिपियाँ संभाल कर रखी गई हैं. 133 नायाब किताबें भी है जो पुरानी नवाबी रियासत के पुस्तकालय से ली गई हैं. दुनिया की सबसे बड़ी क़ुरान शरीफ़ भी म्यूजियम में रखी हुई है. महाभारत और वाल्मीकि रामायण के फ़ारसी अनुवाद भी हैं. यहाँ से किताबें और शोध जर्नल भी प्रकाशित होते रहते हैं. 

और अधिक जानकारी के लिए maapritonk.nic.in विज़िट कर सकते हैं. म्यूजियम की कुछ फ़ोटो प्रस्तुत हैं. 

मौलाना अबुल कालाम आज़ाद अरेबिक पर्शियन रिसर्च इंस्टीट्यूट

दुनिया की सबसे बड़ी क़ुरान शरीफ़ 

हरिशंकर बलौठिया का सुलेख 

महाभारत का फ़ारसी अनुवाद 

वाल्मीकि रामायण ( बाल खण्ड ) का फ़ारसी में अनुवाद 


सबसे बड़ी क़ुरान तैयार करने पर दिया गया प्रशस्ति पत्र 


यह संस्था ‘अरबी फ़ारसी इंस्टिट्यूट’ के नाम से ज़्यादा प्रचलित है 

सबसे बड़ी क़ुरान के अलावा पुराने सिक्के, कपड़े और दूसरी नायब वस्तुएँ भी म्यूजियम में हैं 

नवाबी घोड़े की जीन 

बोतल के अंदर नन्हीं सी खटिया 


शोध संस्थान की बिल्डिंग का शिलान्यास 1985 में हुआ था 
 

 नगीना बाजार और रतन सिंह पैलेस : चित्तौड़गढ़

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मुख्य सड़क पर कुम्भा पैलेस से रतन सिंह पैलेस की तरफ चलते हुए दोनों तरफ आपको पुराने जमाने की छोटी छोटी  दुकानों के खण्डहर दिखाई देंगे जो नगीना बाजार और मोती बाजार के खँडहर हैं। ये बाजार और दुकानें कभी बहुत ही भव्य रही होंगी और महल में रहने वाले ग्राहकों की भीड़ यहां जमा होती रही होगी लेकिन आज ये खँडहर हैं।  वक्त सदैव एक सा नहीं रहता।

रतन सिंह पैलेस : चित्तौड़गढ़ किले के उत्तर में स्थित एक शानदार महल रहा होगा।  इस महल को विशेष रूप से सर्दियों के लिए राजाओं के निवास स्थान के रूप में बनाया गया था ! इसके पास ही रत्नेश्वर नाम की झील भी है जो इसकी खूबसूरती में चार चाँद लगा देती है।  

इससे थोड़ा सा आगे चलते हैं तो एक तोपखाना दिखाई देता है जिसमें पुराने जमाने की छोटी छोटी सी तोप रखी हुई हैं।  एक बड़ी सी  रखी हुई है।  इस बिल्डिंग में अब भारतीय सर्वेक्षण वालों का दफ्तर खुल गया है लेकिन फिर भी आने जाने पर मनाही नही है।  हालाँकि मैं अकेला ही घूम रहा था और कोई उधर दिखाई नही दिया।  आपको चित्तौड़गढ़ में सबसे ज्यादा भीड़ विजय स्तम्भ पर ही मिलती है अन्य जगहों पर बहुत कम लोग ही जाते हैं शायद।  

श्रृंगार चौरी : तोपखाना बिल्डिंग और बनवीर की दीवार के बीच में एक शानदार मंदिर बना है जिसमें दो तरफ से प्रवेश द्वार बना है।  पहले तो मालुम नही था कि ये क्या है लेकिन वहां पूछा तो पता चला कि ये एक मंदिर है जो जैन धर्म के 10 वे तीर्थंकर शांति नाथ को समर्पित है।  15 वीं सदी में बने इस मंदिर को श्रृंगार चौरी कहा जाता है।  इसका उत्तरी दरवाज़ा भामाशाह की हवेली की तरफ है और दक्षिण प्रवेश द्वार बनबीर की दीवार की तरफ है।  मंदिर के अंदर एक मंच (स्टेज ) जैसा बना है जिसके चारों किनारे पर सात मीटर लम्बे खम्भे लगे हैं। इस मंदिर को सन 1448 ईस्वी में महाराणा कुम्भा के खचांची कोला के पुत्र बेल्का (भंडारी बेला ) ने बनवाया था।  

बनबीर की दीवार : पूरा इतिहास नही लिखा जा सकता इसलिए संक्षिप्त रूप में लिख रहा हूँ। उदय सिंह के दूर के रिश्तेदार बनबीर से बहुत छोटे और अभी तक बच्चे उदय सिंह को जब राणा घोषित कर दिया गया तो वो बौखला गया और उस वक्त बंदी रहे विक्रमादित्य पर हमला कर दिया और वो सीधा महाराणा उदय सिंह को मारने के लिए निकल पड़ा। उस वक्त पन्ना धाय उदय सिंह को दूध पिलाकर सुला रही थी तभी एक नौकर भागता हुआ आया और बनबीर के बारे में बताया।  पन्ना धाय ने उदय सिंह के स्थान पर अपने पुत्र चन्दन की बलि दे दी और उदय सिंह को सुरक्षित बचा लिया।  लेकिन पन्ना धाय को किसी ने भी शरण नही और वो बच्चे उदय सिंह को लेकर महीनो तक इधर उधर फिरती रही।  आखिर में कुम्भलगढ़ में वहां के रियासतदार और जैन व्यापारी आशा देपुरा शाह ने उन्हें शरण दी।  जब महाराणा उदय सिंह बड़े हुए तो उन्हें मेवाड़ का महाराणा घोषित कर दिया गया जिससे चिढ़कर बनबीर ने उदय सिंह के खिलाफ लड़ाई का बिगुल बजा दिया जिसमें बनबीर हार गया। वो हार कर मार दिया गया या भाग गया , उसके विषय में कुछ पता नही चलता लेकिन उसकी याद में एक दीवार जरूर बनी हुई है जो उसी ने बनवाई थी ! 

इसी के साथ चित्तौड़गढ़ की अपनी यात्रा का समापन करता हूँ ! जल्दी ही मिलेंगे एक और नयी जगह का यात्रा वृतांत लेकर !!

 आइये फोटो देखते हैं :





नगीना बाजार के खँडहर
मोती बाजार के खँडहर

तोप खाने में बंद पड़ी तोपें






रतन सिंह पैलेस
रतन सिंह पैलेस











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उस दिन दिल्ली लौटते समय बारिश हो रही थी लेकिन ये फिर भी हमारे लिए दूध लेकर आते हैं ! एक धन्यवाद तो करिये ! ये फरीदाबाद की फोटो है 

  कीर्ति स्तम्भ : चित्तौड़गढ़

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मीरा मंदिर , कुम्भ श्याम मंदिर के दर्शन करने के बाद उस प्रांगण से बाहर निकल कर आया तो सामने ही जैन मंदिर भी था । उसके भी बाहर से ही फोटो ले लिए। असल में मैं बहुत ज्यादा धार्मिक नहीं हूँ , बस भगवान के सामने हाथ जोड़कर निकल लेता हूँ। जैन मंदिर के बराबर से ही एक रास्ता कीर्ति स्तम्भ की तरफ चला जाता है। लेकिन इस रास्ते पर आपको बहुत कम लोग जाते हुए दिखाई देते हैं। या तो उन्हें पता नही है कि अभी एक और स्तम्भ है या फिर वो इतने थक और पक चुके होते हैं कि अब आगे जाने का मन नही होता। रास्ते के दोनों तरफ सीताफल के पेड़ लगे हुए हैं जिन पर उस वक्त छोटे छोटे सीताफल दिखाई भी दे रहे थे। पैदल पैदल चलता गया।


विजय स्तम्भ और कीर्ति स्तम्भ नाम से एक दुसरे के पूरक लग सकते हैं लेकिन दोनों अलग अलग समय और अलग ऊंचाई के बने हुए हैं ! कीर्ति स्तम्भ , विजय स्तम्भ से पहले का बना हुआ है। कीर्ति स्तम्भ 12 वीं सदी का बना हुआ है जबकि  विजय स्तम्भ 15 वीं सदी का है। कीर्ति स्तम्भ मात्र 22 मीटर ऊँचा है जिसे जैन व्यापारी साह जीजा भगेरवाला ने रावल कुमार सिंह के शासनकाल में 12 वीं शताब्दी में जैन धर्म की शान में बनवाया था। अगर इतिहास उठाकर देखें तो पता चलता है कि चित्तोड़ किसी जमाने में जैन धर्म  का बहुत प्रसिद्द केंद्र हुआ करता था।


कीर्ति स्तम्भ का आधार 30 मीटर चौड़ा है और ऊपर जाते जाते इसकी चौड़ाई 15 मीटर रह जाती है। कीर्ति स्तम्भ , प्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित है। इसमें अंदर जाने का मौका तो नही मिला क्योंकि इसमें जो एक दरवाजा दिखाई दे रहा था वो बंद था और उसके पास में एक चौकीदार भी बिठा रखा था। मालुम नही बंद दरवाजे पर चौकीदार क्या कर रहा था लेकिन थोड़ी देर बाद वहां से कहीं निकल गया। सोलंकी शैली में बने इस स्तम्भ की कुल सात मंजिलें हैं। और इसमें जो दीवारें बनी हुई हैं उन पर जैन तीर्थंकरों के चित्र लगे हुए हैं , ऐसा कहा जाता है ! मैंने अपनी आँखों से नही देखा। इसकी दूसरी मंजिल पर भगवान आदिनाथ की शानदार प्रतिमा भी लगी हुई है।


कीर्ति स्तम्भ के ही बिल्कुल पास में एक और जैन मंदिर है। उसके विषय में ज्यादा जानकारी मुझे तो नही मालुम। न वहां ऐसा कुछ लिखा है जिससे जानकारी जुटाई जा सके और न ही इंटरनेट पर इस मंदिर के विषय में कुछ लिखा गया है ! हाँ , बस उसका नाम मालुम है ! इस मंदिर का नाम है सात बीस देवरिया दात और ये जैन धर्मवलम्बियों के लिए एक प्रसिद्द स्थान माना जाता है।


आइये फोटो देखते चलते हैं :



इसे सीताफल ही कहते हैं न ?
इसे सीताफल ही कहते हैं न ?



ये वो जैन मंदिर ! कीर्ति स्तम्भ के पास ही है



ये वो जैन मंदिर ! कीर्ति स्तम्भ के पास ही है
थोड़ी दूर से तस्वीर ली थी ! अच्छी लग रही है ?

थोड़ी दूर से तस्वीर ली थी ! अच्छी लग रही है ?


ये फ़तेह प्रकाश पैलेस दिखाई दे रहा है
​
कीर्ति स्तम्भ से ऐसा दीखता है विजय स्तम्भ
​इस दरवाजे में नीचे भी जा सकते हैं ! दोनों तरफ किले की बहुत  मोटी  और गहरी दीवार बनी हैं
ये हैं वो दीवार

ये रास्ते में बना हुआ है ! कलाकृति देखिये !!
ये रास्ते में बना हुआ है ! कलाकृति देखिये !!

 मीरा मंदिर : चित्तौड़गढ़


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विजय स्तम्भ और गोमुख मंदिर के बाद अब अगला पड़ाव बिल्कुल पास में ही स्थित मीरा मंदिर था। मीरा यानि मीराबाई , भगवान श्री कृष्णा की अनन्य भक्त थीं। मंदिर तक जाने से पहले आइये थोड़ा सा मीरा बाई का इतिहास पढ़ते जाते हैं जिससे उन्हें और उनके भक्त रूप को समझने में आसानी रहे और समझ में भी आ सके।


मीराबाई एक राजपूत राजकुमारी थीं जिनका जन्म राजस्थान के मेड़ता में 1498 ईसवी में जोधपुर के संस्थापक राव जोधा के यहाँ हुआ था। बचपन से ही मीरा बाई भगवान की भक्ति में रमने लग गयी थीं और उनकी आवाज भी बहुत सुरीली थी। जब भी वो भगवन के भजन गाती तो राजा का दरबार भी उन्हें सुनने लग जाता था। एक दिन उनके घर के सामने से एक बारात निकल रही थी , दूल्हे को देखकर मीरा ने माँ से पूछा , माँ मेरा दूल्हा कौन होगा , माँ ने ऐसे ही कह दिया , ये बंशी वाला तेरा दूल्हा होगा ! और तब से भगवान को अपना सब कुछ मान बैठी। समय आने पर उनका विवाह चित्तोड़ के राजा भोज राज से कर दिया गया लेकिन वो भगवान को ही अपना पति मान चुकी थीं इसलिए इस विवाह में उनकी कोई रूचि नही रही फलस्वरूप उन्हें कोई संतान भी नही हुई। 1521 में राजा भोज राज की मृत्यु हो गयी तो उसके बाद उनके ससुर राणा सांगा ने उनकी हिफाज़त की। कालांतर में मीरा बाई की भक्ति और भी बढ़ती गयी और वो घर से बाहर निकलकर सत्संग में जाने लगीं। ये देखकर उनके देवर विक्रमादित्य और ननद उदा बाई को नागवार गुजरने लगा और उन्होंने मीरा बाई को कई बार मारने की कोशिश करी। उदा बाई ने मीरा को कई दिन तक भूखे प्यासे एक कमरे में बंद रखा जिससे वो स्वतः ही दम तोड़ दे लेकिन कहते हैं भगवान रोज़ उनके लिए खाना लाते और उसके बाद मीरा भगवान के भजन गाया करती। विक्रमादित्य ने मीरा को मारने के जितने भी प्रयास किये भगवान श्री कृष्णा ने वो सब असफल कर दिए ! राजस्थानी भाषा में ये लोक गीत देखिये :

                शूल सेज राणा नै भेजी, दीज्यो मीरां सुलाय/सांझ भई मिरां सोवन लागी, मानों फूल बिछाय'


मीरा बाई वृन्दावन होते हुए अपने आखिरी दिनों में द्वारका चली गयी। 1546 ईस्वी में जब राणा उदय सिंह चित्तोड़ के राजा बने तो उन्होंने मीरा बाई को वापस बुलाने के लिए ब्राह्मणों को द्वारका भेजा लेकिन मीरा बाई ने आने से मना कर दिया और एक रात मंदिर में गुजारने देने की अनुमति मांगी। कहते हैं उस रात के बाद मीरा बाई अंतर्ध्यान हो गयीं और ऐसा कहा जाता है कि वो भगवान श्री कृष्णा की मूर्ति में ही समा गयी।


ये जो वर्तमान मीरा मंदिर है चित्तौड़गढ़ का , इसे मीरा बाई के ससुर राणा सांगा ने उनके लिए ही बनवाया था ताकि वो भगवान की भक्ति कर सकें। इस मंदिर के पास में ही विष्णु मंदिर है जिसे राणा कुम्भा ने बनवाया था और इसे कुम्भा मंदिर कहते हैं। इसके पास में ही मीरा मंदिर है और एक मंदिर है जिसे कुम्भा श्याम मंदिर कहते हैं। राजपुताना स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना इन मंदिरों में देखने को मिलता है। मीरा मंदिर में चार मंडप हैं जो मंदिर को घेरे हुए हैं। अंदर आपको भगवान श्री कृष्णा और मीरा बाई की सुन्दर तस्वीरें देखने को मिलती हैं !

तो आइये इंतज़ार किस बात का , दर्शन करते जाइए ! कुछ फोटो इंटरनेट से भी लिए गए हैं !
 
 






ये मैकेनिकली बजता है आरती के समय ! सच में काम करता या नहीं मालुम नही
जय श्री कृष्णा
महिला पुजारी ! किताबें भी बेच लेती हैं मंदिर में










मीरा मंदिर के सामने ही है जैन श्वेताम्बर मंदिर ! बाहर से ही फोटो खींच लिए , अंदर नही गया था !
मीरा मंदिर के सामने ही है जैन श्वेताम्बर मंदिर ! बाहर से ही फोटो खींच लिए , अंदर नही गया था !   

  गौमुख मंदिर : चित्तौड़गढ़

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व्हाट्स एप्प पर एक मैसेज देखा था ! मैसेज क्या ये एक जोक है - तुम भगवान को रोज़ रोज़ याद करते हो अगर भगवान ने भी तुम्हें एक दिन याद कर लिया तो ? सच में , हम ऐसा सोचते भी नहीं कि भगवान के यहां से कभी कॉल आ गयी तो सब कुछ यहीं धरा रह जाएगा , इसलिए जिंदगी को जितना बेहतर जी सकते हो जीने की कोशिश करिये। खुशियाँ चुनिए , खुशियाँ बाँटिये !


चित्तौड़गढ़ के विश्व प्रसिद्द विजय स्तम्भ को देखने और उसमें घुसने पर दो बार सर फुटवाने के बाद थोड़ी सी देर आराम की जरुरत महसूस होने लगी थी। मैं वहीँ एक जगह पत्थर पर बैठ गया। तभी एक चार पांच विदेशियों का ग्रुप भी वहीँ आकर खड़ा हो गया। थोड़ी देर में उनका गाइड भी आ गया। गाइड भी वहां ऐसे ऐसे हैं कि बस पूछिए मत। ज्यादातर गाइड को देखकर ऐसा लगेगा जैसे ये अभी टेम्पो चलाकर आया हो , लेकिन ये शायद उनका पहनावा है। या पार्ट टाइम काम ? जैसा विजय स्तम्भ का चौकीदार बता रहा था कि यहां रहने वाले लोगों को बहुत मुआवजा मिला है और कोई भी करोड़पति से कम नही है। इसलिए यहीं रहकर गाइड का काम करते हैं और अंग्रेजी बहुत बढ़िया बोलते हैं। अगर आप परिचित नही हैं तो पहिचान नही पाएंगे कि ये आदमी अंग्रेजी भी बोल सकता है और गाइड भी हो सकता है। वो वहीँ से खड़े होकर उन विदेशियों को कुछ बताने लगा , समझाने लगा। जब तक वो वहां रहे मैं भी बैठा ही रहा , मुझे बिना पैसे खर्च किये गाइड का ज्ञान मिल रहा था।


एक जगह का जिक्र करना चाहूंगा। वहां फोर्ट काम्प्लेक्स में बहुत से पत्थर पड़े हैं जिन्हें संभालकर रखा गया है। ये उन मंदिरों के पत्थर हैं जिन्हें मुग़ल शासकों ने तोड़ दिया था। उनके अवशेषों को यहां एकत्रित किया गया है। मुग़ल शासक सबसे पहले हिन्दू मंदिरों का शीर्ष तोड़ते थे और फिर उसमें से चोरी कर ले जाते थे। हमने भी कैसा कैसा समय देखा है ?


इसी काम्प्लेक्स में आपको कुम्भ श्याम मंदिर देखने को मिलेगा और गज लक्ष्मी मंदिर भी। ये बहुत प्रसिद्द मंदिर तो नही हैं लेकिन जब आदमी वहां तक गया है तो सोचता है एक बार अंदर जाकर तो देख ही लूँ। पीछे की तरफ चलते जाइए तो आपको गौमुख मंदिर और सरोवर मिलेगा जिसमें से पानी लगातार बहता रहता है। एक छोटा सा कमरा है , कमरा कहना गलत होगा , जीने का साइज ही होगा , उसमें पानी आता रहता है। बहुत गन्दगी और फिसलन है उधर। दो तीन महिलाएं दान प्राप्त करने के लिए बैठी होती हैं और कुछ ज्यादा आकर्षित करने वाली चीज उधर नही है। सरोवर का पानी भी बहुत गंदा है। कहते हैं पहले यहीं से महलों के लिए पानी की सप्लाई होती थी , लेकिन तब शायद इतना गंदा नहीं रहता होगा।


आइये फोटो देखते हैं :


आज पहली बार फोटो पर अपना नाम लिखना सीखा है , गलतियां हुई हैं ! लेकिन अभ्यास करते करते सब सीख जाऊँगा !










ये हैं वो पत्थर जिन्हें मुग़ल शासकों द्वारा तोड़े गए मंदिरों के अवषेशों के रूप में रखा गया है


गौमुख मंदिर 
गौमुख मंदिर
ये गौमुख जलाशय

इस जगह में लगातार पानी चलता रहता है , लेकिन बहुत फिसलन है
महासती ! यहां राजपरिवार के मृतकों का अंतिम संस्कार होता था



  जयमल फत्ता महल और विजय स्तम्भ : चित्तौड़गढ़

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पद्मिनी महल के बिल्कुल सामने ही राजस्थान पुलिस का अपने रडार ट्रेनिंग सेंटर है और उसी दिशा में कुछ खण्डहर भी हैं जो कभी महल रहे होंगे। इस किले में 65 ऐतिहासिक इमारती हुआ करती थीं जिनमें 4 महल , 19 मुख्य मंदिर , 4 मेमोरियल और 20 तालाब हुआ करते थे लेकिन सब समय के साथ मिट्टी में मिल गया। जैसे इंसान मिट्टी में मिल जाता है। थोड़ा सा आगे बढ़ने पर नौगज़ा पीर आता है , मैं नही गया क्योंकि मुझे पार आदि में कोई मजा नही आता। आगे चलने पर एक जगह बोर्ड लगा है जिस पर लिखा है जयमल फत्ता हवेली उद्यान। अंदर पहुँच गया। उद्यान तो किसी मतलब का नही है बल्कि उद्यान के नाम के अलावा वहां कुछ है भी नही जिसे उद्यान कहा जा सके। लेकिन जयमल -फत्ता के विषय में जानना बहुत ही रोचक और रोमांचित करने वाला प्रसंग है।

जयमल -फत्ता एक नहीं दो लोग हैं। एक हैं बदनोर के जयमल राठौर जो मीराबाई के चचेरे भाई थे। और एक फ़तेह सिंह सिसोदिया उर्फ़ फत्ता। इनकी वीरता की कहानियाँ आपको चित्तौड़गढ़ की मिटटी में रची बसी मिलती हैं। जब महाराणा उदय सिंह ने चित्तौड़गढ़ को छोड़कर उदयपुर को अपनी राजधानी बनाया तो जयमल को चित्तोड़ का किलेदार बना दिया और पूरा किला और उसकी सुरक्षा का जिम्मा उनके हवाले करके उदय सिंह उदयपुर चले गए। सन 1568 ईस्वी में जब अकबर ने दुर्ग पर हमला कर दिया तो उसकी सेना किले की मजबूत दीवार को पार नही कर पा रही थी और इसी चक्कर में चार महीने बीत गए। आखिर अकबर ने विस्फोट करके एक दीवार तुड़वा दी जिससे उसकी सेनाएं अंदर घुस सकें। जयमल ने जब टूटी हुई दीवार देखि तो उन्होंने उसको तुरंत ठीक करवाने के लिए वहां मिस्त्री लगा दिये। जब अकबर ने शाही कपडे पहने एक शख्स को देखा तो उसे लगा ये जरूर कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति होगा और उसने अपनी बन्दूक "संग्राम " से उस व्यक्ति को घायल कर दिया। ये व्यक्ति जयमल था।

जब दुर्ग के अंदर राजपूतों को ये आभास हो गया कि वो अब ये युद्ध नहीं जीत सकते तो दुर्ग के अंदर "जौहर " की अग्नि प्रज्वलित होने लगी। इस अग्नि को देखकर आमेर के राजा भगवानदास को एहसास हो गया कि अब राजपूत राजा अपनी आखिरी लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हो रहे हैं और उसने मुग़ल सेना को इस बारे में सतर्क कर दिया। भयंकर युद्ध हुआ जिसमें जयमल मारे गए और उनके मरने के बाद फत्ता ने युद्ध की कमान संभाली। लेकिन वो भी युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। इस युद्ध में एक अनुमान के अनुसार 3 ०,००० योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए थे। अकबर ने इन दोनों नवयुवक वीरों की वीरता का सम्मान करते हुए अपने आगरा के महल के बाहर दोनों की हाथी पर सवार मूर्ति लगवाई लेकिन उसे औरंगजेब ने तोड़ डाला।


विजय स्तम्भ

विजय स्तम्भ अब हेरिटेज साइट में शामिल है। विजय स्तम्भ या जय स्तम्भ को राणा कुम्भा ने 1458 से 1468 के बीच , मालवा के सुल्तान महमूद शाह के विरुद्ध 1440 ईस्वी में मिली जीत की निशानी के तौर पर बनवाया था। आठ मंजिल के बाद इसमें नौंवीं मंजिल पर एक तरह की छतरी ( डोम ) है जिसे बाद में बनवाया गया था। ये एक बार बिजली गिरने से कुछ टूट भी गया था जिसे पुनः मरम्मत करके वर्तमान रूप में लाया गया। इसमें कुल 157 सीढ़ियां हैं जो आपको ऊपर तक ले जाते हुए आपकी हालत खराब करने के लिए काफी हैं। हजारों लोग इन पर रोज़ चढ़ते उतरते हैं जिससे ये बहुत चिकनी हो गयी हैं। साइज में भी बहुत छोटी हैं और इनके ऊपर खड़े होने की भी ज्यादा जगह नहीं है इसलिए नए आदमी का एक दो बार तो कम से कम सिर फुट ही जाता है। एक और भी बात ध्यान देने की है , जैसा मैंने बताया की जगह बहुत कम है तो एक बार में इन सीढ़ियों से एक ही आदमी आ या जा सकता है अगर कैसे भी दोनों तरफ से लोग मिल गए तो एक को रुकना पड़ेगा जैसे तंग गली में एक गाडी को रोककर दूसरी निकालनी पड़ती है ऐसे ही एक को रोक कर दुसरे को निकाला जाता है , पहले आप ! हाँ , गोल गोल चक्कर से में जरूर जगह है जहां से आप पूरा चित्तोड़ देख सकते हैं और ठंडी ठंडी हवा का आनंद ले सकते हैं। सबसे ऊपर जाकर डोम के नीचे बहुत ही ठंडी हवा लगती है और एक मस्त और रोमांचित करने वाला नजारा दिखाई देता है !


आज बस इतना ही , बहुत हो गया ! आइये फोटो देखते चलें :



ये बाहर से जयमल फत्ता की हवेली

हनुमान जी के सेना के कमांडो

जयमल -फत्ता महल ! कभी महल रहा होगा अब खण्डहर है

जयमल -फत्ता महल ! कभी महल रहा होगा अब खण्डहर है



जयमल -फत्ता महल ! कभी महल रहा होगा अब खण्डहर है

जयमल -फत्ता महल ! कभी महल रहा होगा अब खण्डहर है


जयमल -फत्ता महल ! कभी महल रहा होगा अब खण्डहर है



विश्व हेरिटेज में शामिल विजय स्तम्भ
विश्व हेरिटेज में शामिल विजय स्तम्भ
विश्व हेरिटेज में शामिल विजय स्तम्भ


विजय स्तम्भ की सीढ़ियां बहुत रपटीली सी हैं
विजय स्तम्भ में अंदर की कलाकृतियां

ये विजय स्तम्भ की छत है

विजय स्तम्भ में अंदर की कलाकृतियां

विजय स्तम्भ में अंदर की कलाकृतियां

विजय स्तम्भ में अंदर की कलाकृतियां

बड़ी ठंडी हवा आती है इन झरोखों से







विजय स्तम्भ के सामने ही है ये ! क्या है नहीं मालूम


और ये इसी की दूसरी साइड ! कितना अंतर है न ?



अलग अलग कोण से विजय स्तम्भ

अलग अलग कोण से विजय स्तम्भ

अलग अलग कोण से विजय स्तम्भ

विजय स्तम्भ क्षेत्र में ही है ये सब


अलग अलग कोण से विजय स्तम्भ

अलग अलग कोण से विजय स्तम्भ 


                                                                                              


































जयवाण

जयवाण नाम है एक भीमकाय ऐतिहासिक तोप का जो आजकल जयपुर के किले जयगढ़ में खड़ी है.

इस तोप की ढलाई 1720 में राजा जय सिंह द्वितीय ने कराई थी. मजेदार बात ये है की इसे केवल एक ही बार ही चलाया गया. उस वक़्त राजा जय सिंह द्वितीय और दिल्ली के मुग़ल सुलतान मुहम्मद शाह भी वहां मौजूद थे.

भारी होने के कारण इस तोप को घुमाना मुश्किल था. इस काम के लिए चार हाथियों का इस्तेमाल होता था. तोप की बैरल की लम्बाई 6.15 मीटर है और तोप का वजन 50 टन है. इस में इस्तेमाल किये जाने वाला गोला 50 किलो का था और उसे फेंकने के लिए लगभग सौ किलो बारूद की जरूरत पड़ती थी. कहते हैं की पहियों पर चलने वाली ये तोप विश्व की सबसे बड़ी तोप है पर इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई.

इसका गोला जब पहली और अंतिम बार जब फेंका गया तो लगभग 35-40 किमी दूर गिरा था. हालांकि कुछ लोगों का कहना 11 किमी और कुछ का कहना 22 किमी दूर गिरा था. गोला चाकसू नामक गाँव में गिरा जो 35 किमी दूर था और वहां बड़ा गड्ढा बन गया. बाद में बारिश के पानी से तालाब बन गया 'गोला ताल'. बहरहाल गोला दागने वाला तोपची, आठ अन्य सिपाही और एक हाथी धमक या शॉकवेव से ही मर गए. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

भारी भरकम तोप जयवाण. कई जगह इसका नाम 'जय बाण' या 'जय बान' भी लिखा गया है.   

इन बड़े पहियों का व्यास 9 फुट है 

पहियों के आकार का अंदाजा इस फोटो से भी लग सकता है. अगले दो पहिये काफी ऊँचे हैं और पिछले नीचे. तोप की पूरी लम्बाई 31 फीट और 3 इंच है   

जयवाण तोप का मुहाना 11 इंच का है और मोटाई 8.5 इंच है 

 Hawa Mahal, Jaipur

Pink City was established by Maharaja Jai Singh II. The construction started on 18 November 1727 & was completed in four years. Most of the construction of walls, ramparts, shops & other buildings is in pink or reddish sand stone & hence the name Pink City. Another anecdote about the colour of city is that in 1878 Prince of Wales visited Jaipur when the city was painted pink all over.

The Pink City has an fortified enclosure having seven huge strong gates. It is spread over large nine rectangular blocks two of which were retained for palace, gardens & administrative buildings and rest seven blocks were allocated to the general public.

In 1799 five story high Hawa Mahal was added to the Palace complex during the reign of Maharaja Sawai Pratap Singh. It was designed by Lal Chand to facilitate royal family members to watch processions & street scenes without being seen as they had to maintain purdah. Some photos:

Hawa Mahal 

Rear view from first floor

View of Pink City from a Jharokha. 

View of the street below

View from the top

Back side of Hawa Mahal

 In Pink City, Jaipur

Pink City Jaipur was established by Maharaja Jai Singh II in 1727. Most of the construction of walled city is in pink or reddish sand stone & hence the name. Another anecdote about the city is that the city was painted pink all over during visit of Prince of Wales in 1878.

The city was designed by Vidyadhar Bhattacharya based on ancient Vastu Shastra. It has an fortified enclosure having seven large strong gates. It is spread over huge nine rectangular blocks two of which were retained for palace, gardens & administrative buildings and rest seven blocks were allocated to the general public.

In 1799 five story high Hawa Mahal was added to the Palace complex to enable royal ladies to watch processions & street scenes without being seen as they had to maintain purdah. The Palace & Hawa Mahal were meant for royals & the elite. All commoners now & no royals. Some photos of commoners in walled city:

View of Pink City from Hawa Mahal. In the year 1900 population was 1.6 lacs & now it is 66 lacs 
Royal couple in Royal City

Flower sellers of Pink city in the morning 

Open air saloon near Hawa Mahal- Rs. 20 for hair cut & Rs. 10 for shave 

Near Jantar Mantar the Observatory. In the end it is the birds who occupy palaces 

Near Hawa Mahal 

Waiting for the customers 

A group of foreign tourists enjoying rickshaw ride near City Palace


सुनहरी कोठी, टोंक, राजस्थान

मेरठ-बैंगलोर-मेरठ कार यात्रा का पहला पड़ाव था जयपुर. एम आई रोड के नज़दीक राजस्थान पर्यटन होटल में डेरा डाल दिया. चार पाँच साल पहले भी इस होटल में ठहरे थे तब बेहतर था. बहरहाल होटल ने सीनियर सिटिज़न का और ऑफ सीजन का डिस्काउंट दे दिया. आप तो जानते ही हैं की सीनियर लोगों के चाँदी जैसे बाल आसानी से थोड़े ही आते हैं!

सुबह नाश्ता कर के कोटा की और कूच कर दिया. रास्ते में टोंक का नाम बार बार आ रहा था. लगभग सौ किमी पर टोंक की तरफ़ गाड़ी मोड़ ली. गूगल ने और फिर पान वाले ने भी बताया कि शहर में सुनहरी कोठी और अरब-फ़ारसी इंस्टिट्यूट देख सकते हैं. कोठी ढूँढने में समय लगा. गूगल आंटी बोली इधर से जाओ, दुकानदार बोले उधर से जाओ और स्कूली बच्चे बोले कोठी तो पीछे रह गई! गाड़ी वहीं छोड़ हम पैदल हो लिये. गली  के अंदर मुश्किल से सौ मीटर गए होंगे की कोठी नज़र आ गई. कोठी की फ़ोटो दिखाने से पहले आपको टोंक का संक्षिप्त इतिहास भी बताते चलें.

टोंक जिला राजस्थान में है और जयपुर से लगभग सौ किमी दूर है. टोंक भी किसी समय नवाबी रियासत की राजधानी थी. मोहम्मद आमिर ख़ान ( 1769-1834 ) यशवन्त राव होलकर की मराठा सेना में शामिल हो गया और जल्दी ही ऊँचे ओहदे पर पहुँच गया. मराठा सेना ने 1806 में जयपुर राज्य पर हमला कर दिया और काफ़ी बड़ा इलाक़ा जीत लिया. मराठा सरदार होलकर ने खुश हो कर आमिर ख़ान को टोंक इनाम में दे दिया. तीसरे एंग्लो- मराठा युद्ध - 1817 के बाद पेशावर-भोंसले-होलकर मराठा संघ की हार हो गई ( सिंधिया तटस्थ रहे और युद्ध में शामिल नहीं हुए ). आमिर ख़ान ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ हो गया और टोंक रियासत का नवाब बना दिया गया. 

उस वक़्त टोंक रियासत में निम्बाहेड़ा, छाबड़ा, पिरावा, सिरोंज और रामपुरा क़स्बे भी शामिल थे. आमिर ख़ान के बाद टोंक रियासत में छे और नवाब हुए और अप्रैल 1948 में ये रियासत भारत में मिल गई. अब टोंक शहर की मशहूर सुनहरी कोठी से आपका परिचय कराते हैं:

टोंक में कई पुरानी हवेलियां हैं उन में से ये सुनहरी कोठी सबसे सुंदर और मशहूर है. बड़ी नफ़ीस कारीगरी देखने को मिलती है. फ़ोटो में नज़र आता ये दरवाज़ा असल में दीवार पर की गई पेंटिंग है!

ये सुनहरी कोठी आमिर ख़ान ने बनवाई थी 

इस कोठी को बने दो सौ साल से ज्यादा हो चुके हैं परंतु अभी भी कलाकारी ताज़ा तरीन लगती है 

काफ़ी बारीक काम है पर आकर्षक है और पुराना महसूस नहीं होता. चमक दमक वैसी ही है 

छत पर की गई चित्रकारी खूबसूरत है. यह कोठी रंगारंग कार्यक्रमों के आयोजन के लिए बनाई गई थी 

ये कोठी ज्यादा बड़ी नहीं है पर चित्रकारी के कारण अनोखी है 

ये कोठी टोंक शहर के बीचो बीच में है. आसपास घनी आबादी है 

सुनहरी कोठी 

कोठी के गेट पर कोई बोर्ड नहीं था और ना ही कोई गाइड मिला 



























































































राजस्थान डायरीज २

  बैराट, राजस्थान बैराट या  विराट नगर  एक प्राचीन शहर है जो अब राजस्थान के कोटपूतली-बहरोड़ जिले में है. जयपुर से विराट नगर लगभग 60 किमी की दू...