Tuesday, January 21, 2025

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भारत की सबसे प्राचीन गणेश प्रतिमा

Team LHI

‘गणपत्ति बप्पा मोरया!’, एक ऐसा जयकारा जो एक आवाज़ के साथ शुरू होता है और हज़ारों आवाज़ों की गूँज के साथ बंद होता है। हिन्दू धर्म के सबसे लोकप्रिय देवताओं में से एक हैं गणेश, एक छोटी सी टपरी खोलने से लेकर बड़ी से बड़ी कम्पनी तक बिना गणपति मूर्ति की स्थापना के सब आरम्भ अधूरे है। यानी गणेश का आशीर्वाद हर छोटे-से-छोटे काम के पहले लिया जाता हैं | उनकी विभिन्न प्रकार की प्रतिमाएं लोगो के घरों, गाड़ियों और दफ्तरों में पायी जाती हैं | जिसकी जैसी श्रद्धा उसकी वैसी प्रतिमा, कोई छोटी मिट्टी में अपने भगवान को पूजता है तो कोई हीरे जवाहरात की मूर्त में गणपति की आराधना करता है | पर क्या आप जानते हैं कि भारत की सबसे प्राचीन गणेश प्रतिमा कहाँ पायी जाती है?

इसका जवाब आपको मिलेगा, मध्य प्रदेश के विदिशा जिले मे स्थित, उदयगिरि पहाड़ी की एक गुफ़ा मे |

उदयगिरि की गुफ़ा सं. 6 मे मौजूद, पांचवी सदी की गुप्त साम्राज्य कालीन गणेश शिल्प, भारत की सबसे प्राचीन गणेश प्रतिमा मानी जाती है | उदयगिरि में कुल २० गुफाएँ हैं जिनमे से कुछ गुफ़ाओं का निर्माण गुप्त साम्राज्य के सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय के शासन काल मे हुआ | इतिहासकार मानते है की, गणेश की प्रतिमा पूजन का आरम्भ गुप्त राजवंश (450-500 सी.ई.) के काल में हुआ | इस काल से पहले गणेश की प्रतिमा का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता।

उदयगिरि पहाड़ी

बेसनगर या प्राचीन विदिशा (भूतपूर्व ग्वालियर सियासत) के निकट उदयगिरि विदिशा नगरी ही का उपनगर था। एक अन्य गुफ़ा में गुप्त संवत् 425-426 ई. में उत्कीर्ण कुमार गुप्त प्रथम के शासन काल का एक अभिलेख है। इसमें शंकर नामक किसी व्यक्ति द्वारा गुफ़ा के प्रवेश-द्वार पर जैन तीर्थ कर पार्श्वनाथ की मूर्ति के प्रतिष्ठापित किए जाने का उल्लेख है। गुफ़ा छः से प्राप्त लेख से ज्ञात होता है कि उस क्षेत्र पर सनकानियों का अधिकार था। उदयगिरि के द्वितीय गुफ़ा लेख में चन्द्रगुप्त के सचिव पाटलिपुत्र निवासी वीरसेन उर्फ शाव द्वारा शिव मन्दिर के रूप में गुफ़ा निर्माण कराने का उल्लेख है। वह वहाँ चन्द्रगुप्त के साथ किसी अभियान में आया था।

समय के अनुसार उदयगिरि से सात घंटे की दूरी पर स्तिथ, सतना जिले के भूमरा गाँव मे एक और पांचवी सदी की गुप्त कालीन गणेश प्रतिमा पाई गयी है | भूमरा का शिव मंदिर, भारत के सबसे प्राचीन मंदिरो मे माना जाता है | इस मन्दिर का अब केवल गर्भगृह विद्यमान है | यहाँ पर एक गणेश प्रतिमा है, जो उदयगिरि की प्रतिमा से समकालीन मानी गयी है |

अगर आप कभी उदयगिरि या भूमरा जाए तो इन ऐतिहासिक गणेश शिल्पो को देखना ना भूले!




कपिलेश्वर मंदिर में भगवान गणेश की अद्भुत प्रतिमाएं, नागवंशी राजाओं के समय की शिल्प कला का बेजोड़ नमूना - Kapileshwar Mandir of Lord Ganesh

ETV Bharat

कपिलेश्वर मंदिर (ETV Bharat)

बालोद : जिले का कपिलेश्वर मंदिर समूह कपिलेश्वर मंदिर समूह एक ऐतिहासिक और पुरातात्विक धरोहर है. इस मंदिर समूह का इतिहास ग्यारहवीं सदी से लेकर तेरहवीं सदी से जुड़ा है. बालोद के कपिलेश्वर मंदिर समूह को नागवंशी गोंड़ राजाओं के काल में निर्मित कराया गया था. कपिलेश्वर मंदिर सात अलग अलग मंदिरों का समूह है, जिनमें मुख्य मंदिर भगवान गणेश को समर्पित है.

कपिलेश्वर मंदिर का महत्व : कपिलेश्वर मंदिर समूह नागवंशी गोंड़ राजाओं के कला, प्रेम और धार्मिक आस्था का प्रतीक हैं. कपिलेश्वर मंदिर के परिसर में भगवान गणेश की एक विशाल और प्राचीन प्रतिमा स्थित है. इस गणेश प्रतिमा की ऊंचाई 6 फीट है. यह प्रतिमा न केवल अपनी विशालता से, बल्कि अपने अद्वितीय शिल्पकला से भी लोगों को प्रभावित करती है. मंदिर के मुख्य शिवलिंग के दाएं और बाएं ओर भी गणेश जी की प्रतिमाएं स्थापित हैं. इतना ही नहीं कपिलेश्वर मंदिर समूह में मुख्य पट पर सभी जगह भगवान गणेश की प्रतिमा बनी हुई है.

भगवान गणेश की 4 प्राचीन प्रतिमाएं : कपिलेश्वर धाम में भगवान गणेश की 4 प्राचीन प्रतिमाएं हैं, जिनसे लोगों की गहरी आस्था जुड़ी है. पुरातत्व विभाग के केयरटेकर विकास साहू ने बताया, "इस मंदिर में भगवान गणेश की एक प्रतिमा गर्भगृह में है और तीन प्रतिमाएं बाहर हैं. इसके साथ ही दो ऐसी गणेश प्रतिमाएं हैं, जो शिव मंदिर के द्वार की दोनों ओर बराबर प्रहरी के रूप में स्थापित हैं. अंदर भगवान शिव का मंदिर है."

"भगवान श्री गणेश को प्रथम पूज्य माना गया है. भगवान गणेश को भगवान शिव का प्रहरी भी बताया गया है. भगवान गणेश की विशालता और महानता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह मंदिर भगवान शिव का है और इसमें हर जगह भगवान गणेश को स्थान दिया गया है." - विकास साहू, केयरटेकर, पुरातत्व विभाग

बालोद में सबसे ज्यादा प्राचीन गणेश प्रतिमा : पुरातत्व विभाग के विकास साहू बताते हैं, "कपिलेश्वर मंदिर समूह में जिस तरह भगवान गणेश की प्राचीन प्रतिमाएं हैं, उसे देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि सबसे पहले मंदिर जाने के पूर्व पथ पर स्थापित भगवान गणेश की पूजा होती है. जिसके बाद भक्तों को अंदर जाकर पूजा करनी होती है."

"11वीं सदी में जब गोंड राजाओं का शासन था, तब उनके द्वारा इन मंदिरों की स्थापना की गई. उस समय भगवान गणेश का महत्व सबसे अधिक था. इसलिए बालोद जिले में सबसे ज्यादा भगवान गणेश की प्राचीन मूर्तियां पाई जाती हैं." - विकास साहू, केयरटेकर, पुरातत्व विभाग

गणेशोत्सत्व के दौरान होती है विशेष पूजा : गणेशोत्सव के दौरान यहां पर विशेष पूजा अर्चना होती है. लोग दूर दूर से यहां आते हैं. सभी धार्मिक त्योहारों में यहां भक्तों की भीड़ देखने को मिलती है. यह कपिलेश्वर मंदिर पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है. इसलिए यहां इन मूर्तियों की विशेष देखभाल की जाती है.




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गणेश चतुर्थी पर विशेष:देश का अनूठा शिल्प मंदिर मंदाकिनी: नारी गणेश की 2 मूर्तियां, महामारी से बचाव के लिए व...

दैनिक भास्कर

गणेशी या नारी गणेश का नाम थोड़ा अटपटा लग सकता है, लेकिन भीलवाड़ा जिले के बिजौलियां में स्थित प्राचीन मंदाकिनी शिल्प मंदिर में नारी गणेश की दो अद्भुत मूर्तियां हैं। इस अनूठे मंदिर में गणेश चतुर्थी और अन्य विशेष अवसरों पर विनायकी मूर्तियों की पूजा की ज

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नारी गणेश की मूर्तियों का अंकन 10वीं और 12वीं शताब्दी में हुआ माना जाता है। जबकि देशभर में कुछ ही मंदिरों में नारी गणेश की मूर्तियां हैं, बिजौलियां का मंदाकिनी मंदिर अपनी दो मूर्तियों के साथ एकमात्र है।

मंदाकिनी मंदिर के बाहरी स्तंभ पर नारी गणेश की एक छोटी प्रतिमा है, जबकि मंदिर के दक्षिण भाग के कोष्ठकों में नारी गणेश की ललितासन प्रतिमा उत्कीर्ण की गई है। इस चतुर्भुज प्रतिमा में शिल्पियों ने नारी गणेश को फरसा, गदा, मोदक और सुंड के साथ मोदक थाल पर अंकित किया है। इसे तांत्रिक प्रभाव के रूप में भी माना जाता है, और उन्नत वक्ष व अलंकरण नारी देह का परिचायक हैं। मंदाकिनी मंदिर पुरातत्व विभाग के अधीन है और इन विनायकी प्रतिमाओं के बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी थी। करीब 15 साल पहले कस्बे वासियों को इन अनूठी मूर्तियों का पता चला और तब से पर्व, त्योहार, बुधवार और गणेश चतुर्थी पर श्रद्धालु इनकी पूजा-अर्चना करते हैं।

कौन है वैनायिकी नारी गणेश के कई नाम हैं, जैसे गणेशी, नारी गणेश, गजानना, हस्तिनी, वैनायिकी, विघ्नेश्वरी, गणेश्वरी, गणपति सदा, अयंगिनी, महोदरा, गजवस्त्रा, लंबोदरा, और महाकाया। ओडिशा के चौंसठ योगिनी मंदिरों और जबलपुर के भैरा घाट मंदिर में नारी गणेश की एक-एक मूर्ति है। राजस्थान के हर्ष देव मंदिर में भी नारी गणेश की मूर्ति स्थित है। बिजौलियां के मंदाकिनी मंदिर में नारी गणेश की दो अद्भुत मूर्तियां हैं।

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इतिहासकार डॉ. श्री कृष्ण जुगनू ने बताया कि विनायिकी की पूजा के पीछे छः प्रकार की मान्यताएं रही हैं- महामारी, टिड्डियों, राजभय, चूहों, आदि। बेगूं, बिजौलिया सहित कई गांवों में आज भी किसान गणेशजी को बीज चढ़ाकर ही बुवाई करते हैं। यह मान्यता 12वीं सदी के आसपास की मानी जाती है, क्योंकि गणेशी की मूर्तियां इसी समय की हैं। यदि चूहे बीज खा जाते हैं तो स्त्री को बीज बचाने वाली और उर्वराशक्ति संपन्न माना जाता है। यही विश्वास इस देवी के प्रति श्रद्धा का कारण बना है।

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1 हजार साल पुरानी हैं मूर्तियां

राष्ट्रपति से सम्मानित उदयपुर के प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू के अनुसार, 10वीं और 12वीं शताब्दी के दौरान मेनाल एक महत्वपूर्ण मूर्ति धाम के रूप में प्रतिष्ठित था। इसी अवधि में बिजौलियां के मंदाकिनी मंदिर में नारी गणेश की मूर्तियां तराशी गईं। मेवाड़ में नारी गणेश की पूजा दैवीय शक्ति के रूप में की जाती रही है। विनायिकी को चौंसठ योगिनियों में शामिल किया गया है। मधुरा, आंध्रप्रदेश, लोहारी-बांदा, ग्वालियर, हिंगलाज गढ़ (मध्यप्रदेश), और राजस्थान के हर्ष देव तीर्थ जैसे स्थानों पर चौथी से लेकर सातवीं शताब्दी तक की विनायिकी की प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं।

डॉ. जुगनू बताते हैं कि इस देवी को देवताओं की सहयोगी माना गया है। नारी गणेश को फसलों को चूहों, टिड्डियों और कीटों से बचाने और मानव जाति को महामारियों से सुरक्षित रखने के लिए पूजा जाता है। देवी सहस्त्रनाम में गणेशवी, विनायकी, लंबोदरी, और गणेश्वरी जैसे नामों से संबोधित किया गया है। मत्स्य पुराण और स्कंद पुराण में भी विनायकी का उल्लेख किया गया है और गजानना, वैनायिकी जैसे नाम आए हैं। बौद्ध ग्रंथों में गणपति हृदय का उल्लेख है, और जैन ग्रंथों में विनायकी को 36वें क्रम में शामिल किया गया है। मत्स्य पुराण के तीसरे सदी के 179वें अध्याय में वर्णित है कि अंधकासुर वध के बाद भगवान शिव ने रक्त को पीने के लिए लगभग 200 माताओं को उत्पन्न किया, जिनमें एक मातृका विनायिकी बताई गई है।


गणेश मंदिर, शिव मंदिर, चित्रकूट, मध्यप्रदेश
छिपा हुआ खजाना
मराठों ने हमारे देश में कई महल, किले, मंदिर और बाड़वड़ियाँ बनवायीं। चित्रकूट में भी एक खजुराहों जैसा मंदिर है जिसे मराठों ने बनवाया था। जिसका नाम है गणेश मंदिर। मराठों ने इसे खजुराहों मंदिर की शैली में बनाने का सफल प्रयत्न किया है। जिसके कारण इसे ‘मिनी खजुराहो’ भी कहा जाता है। इसमें खजुराहों शैली पर आधारित काम और कला का सुंदर रूप से चित्रण किया गया है। पेशवा ने गणेश बाग के साथ पुरानी कोतवाली किला, गोल तालाब और नारायण बाग भी बनवाया था। गणेश बाग की दीवारों को काट-काट कर, उन पर देवी-देवताओं की मूर्तियों को गढ़ा गया है। यहां पर काम, योग और भक्ति का एक अद्भुत और खूबसूरत मेल देखने को मिलेगा। मंदिर की बाहरी दीवारों पर सात अश्वों के रथ पर सवार सूर्यदेव, कहीं विष्णु और अन्य देवी-देवताओं के चित्र बनाये गए हैं। शीर्ष पर नारियल के साथ एक संपूर्ण कलश को त्रुटिहीन समरूपता के साथ पत्थर में गढ़ा गया है। मंदिर के निर्माण में नागर शैली का प्रयोग किया गया है। जिसकी वजह से गणेश बाग को मिनी खजुराहो कहा जाता है। नागर शैली की विशेषता है कि ऊँची जगह बनाकर ही मूर्ति बनाई जाती है। यहां के मंदिर में बनी मूर्तियां खजुराहों के मंदिर में बनी मूर्तियों की तरह ही है। साथ ही बाग में एक बावली भी है, जिसमें सात खंड है। सात में से छह खंड पाने में डूबे रहते हैं और एक खंड खुला रहता है। यह बावली गर्मियों के समय ठंडक पहुँचाने का काम करती है।
चित्रकूट से 3 किलोमीटर दूर कर्वी के देवांगना रोड पर स्थित गणेश मंदिर यहां के सर्वाधिक आकर्षक मनभावन स्थलों में से एक है। इस मंदिर का निर्माण 1800 ईसवीं से पहले पेशवा राजा, विनायक राव द्वारा हुआ था। इसका विशाल सरोवर और लम्बी, गहरी बावड़ी विशेष रूप से गर्मियों में प्रयोग की जाती होगी, ऐसा प्रतीत होता है। यहां का खुबसूरत और विशेष प्रकार की स्थापत्य कला से बना, एक जीर्ण-शीर्ण किंतु समृद्ध रूप से अलंकृत शिव मंदिर इस स्थल का मुख्य आकर्षण है। जिसे स्थानीय लोग ‘गणेश मंदिर’ के रूप में उल्लिखित करते हैं। इसकी वास्तुकला स्पष्ट रूप से मंदिर के चंदेल मूल को दर्शाती है। इस मंदिर में कामुक मूर्ति कला देखने को मिल सकती है। खास कर इस मंदिर के गुंबदों पर खजुराहो मंदिर की तरह मूर्ति कला उकेरी गई है। मंदिर के बरामदे में चारों ओर से सीढि़यों से घिरा एक तालाब है जो मंदिर के सौन्दर्य को बढ़ाता है। मंदिर के अतिरिक्त यहां सात मंजिला बनी बावड़ी भी दर्शनीय है। यह पानी एकत्र करने का उत्कृष्ट प्रयोग और कला का एक विशिष्ट उदाहरण है। यही नहीं, इसी के आस-पास पेशवाओं के आवास भी बने हैं जो लगभग खंडहर हो चुकें हैं किंतु उनकी बनावट आज भी आकर्षित करती है। बुंदेलखंड में अन्य चंदेला मंदिरों को देखने के बाद, सदैव की भाँति यह माना सकता था कि वे देवी-देवताओं की पत्थर की मूर्तियों को, जीवन जैसी तरलता प्रदान करने में सक्षम हैं।
पेशवा के काल में स्थापत्य कला अपनी चरम सीमा तक पहुँच चुकी थी। इसमें खजुराहो शैली पर आधरित काम कला का विस्तृत चित्राकंन है। यह तत्कालीन पेशवा नरेशों की मानसिकता की देन है, संभवतः पेशवा नरेशों ने अपने आमोद-प्रमोद के लिए निर्माण कराया हो। पंच मंजिलें के समूह को पंचायतन कहते है। इस पंच मंजिले मन्दिर के शिखर पर काम कला के बहुत से भितिं चित्र खोदे गये है। कुछ स्वतन्त्र मैथुन मुद्रा में हैं, तथा कुछ पुराणों एवं रामायण पर आधारित हैं। यहाँ काम, योग तथा भक्ति का अद्भुत सामन्नजस्य देखने को मिलता है। मंदिर परिसर में अत्यधिक बहुमूल्य मूर्तियां जिस खराब स्थिति में बिखरी पड़ी हैं, वह भी बहुत खराब लगता है। आज भी जो कुछ भी बचा है, वह साधुओं और स्थानीय ग्रामीणों की ही देन है।
मन्दिर के ठीक सामने एक सरोवर है, जिसके ऊपर मन्दिर की ओर स्नान के लिए एक हौज है, जिसमें दो छिद्रों से पानी आता है, मन्दिर में फानूस में लगे हुए लोहे के हुक आज भी कला-कृति एवं साज-सजावट की दस्तान बताते हैं। जिसके चार खण्ड भूमि-गत हैं। ग्रीष्म ऋतु में जलस्तर कम होने पर तीन खंडों के लिए रास्ता जाता है। इसका निर्माण उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में श्रीमन्त विनायकराव पेशवा ने कराया था। यहाँ की इमारतों का निर्माण भारतीय स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। ऊपरी भाग में भित्ति-प्रस्तरों की बारीक कटाई करके कर्वी पेशवाकालीन राजमहल से गणेश बाग तक गुप्त रास्ता है, जो पेशवाओं के पारिवारिक सदस्यों के आने-जाने के लिए प्रयुक्त किया जाता था। यदि इसे छोटा खजुराहो कहा जाय तो अतियोक्ति न होगी। गणेश बाग घूमते हुए, इसके पास के रामघाट और जानकी कुंड भी देखे जा सकते हैं। इस क्षेत्र के अधिकांशतः मंदिर भगवान शिव को समर्पित हैं, यहाँ आने वाले पर्यटकों एवं अधिकारी भी इन छिपे हुए रत्नों पर ध्यान दें, तो ये अमूल्य निधि और अधिक प्रकाश में आये।




























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Syunrakot : Himvan : Kumaon Art, Craft and Culture

कौशल किशोर सक्सेना

शोभित सक्सेना

अल्मोड़ा जनपद के महत्वपूर्ण नौलों में से स्यूनराकोट का नौला शिल्प की दृष्टि से सिरमौर है। अल्मोडा से कौसानी जाने वाले मार्ग पर कोसी से आगे चल कर पक्की सड़क मुमुछीना गांव तक जाती है जहां से मात्र आधा किमी की दूरी पर पन्थ्यूड़ा ग्राम है। इसी गांव में यह नौला स्थित है।

उत्तराभिमुख यह नौला 16वीं शती में निर्मित प्रतीत होता है। नौले की तलछंद योजना में गर्भगृह और अर्धमंडप है। अर्धमंडप का आकार तीन गढ़नो से सज्जित किया गया है। मध्यवर्ती गढ़न को पुप्पाकृतियों से सजाया गया है। स्तम्भों का निचला भाग भी वर्गरूपेण है जो अर्धपद्म से सज्जित किया गया है। मध्यवर्ती स्तम्भ में बारह लम्बवत परंतु सादी पट्टियां हैं। उपर की ओर तोड़ेनुमा आकृतियों के नीचे पद्म, फुल्ल पद्म सजाये गये हैं। तोड़े भी पद्म आकृतियों से सज्जित हैं। इनमें उपर की ओर गरू़ड सदृश आकृतियां बनायी गयी होंगी जो अब स्पष्ट नहीं है।

स्तम्भों के मध्य में एक विशाल पत्थर लगाकर एक सादा उत्तरंग बनाया गया है। बाहर की ओर स्नान के लिए मंच बनाये गये हैं।

गर्भगृह के प्रवेशद्वारों के स्तम्भों को पंच पत्रावलियों से सजाया गया है। इनमें पत्र शाखाओं और मणिबन्ध शाखाओं की बनावट दृष्टव्य है। ललाटबिम्ब में गणेश का अंकन किया गया है। सबसे उपर पुरूष आकृतियां अंकित हैं। प्रवेशद्वार के बायीं ओर त्रिरथ देवकुलिकायें बनायी गयी हैं। जिनके जंघा भाग सम्भवतः देवी देवताओं के पैनल से सजाये गये है। परन्तु वर्तमान में केवल हंस पर आरूढ़ वीणावादिनी सरस्वती तथा एक पुरूष आकृति ही दृष्टव्य है। नीचे की ओर भी कुछ आकृतियां बनायी गयी होंगी जिनमें एक पुरूष तथा एक स़्त्री आकृति स्पष्ट प्रतीत होती है। प्रवेशद्वार के एकदम बगल में बायीं ओर उपासिकाओं से पूजित गजलक्ष्मी का अंकन है। इसके बगल में व्याल आकृति तथा दायीं ओर भी देवकुलिकायें बनायी गयी हैें। इसी ओर नीचे कूर्मावतार तथा सूर्य का अंकन है।

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परम्परिक गढ़नों से सज्जित कुंड के उपर गर्भगृह में भी देवकुलिकायें निर्मित की गयी है। जिनमें ढोलक बजाते पुरूष आखेट के लिए जाते धनुर्धारी आखेटक एवं गणेश आदि के अतिरिक्त गरूड़ का भी अंकन है। जंघा भाग को पैनल लगाकर विष्णु के दशावतारों से सज्जित किया गया है। जिनमें बायें से दायें मत्स्य के उपर आरूढ़ चारों वेद, नीचे की ओर जलचर, तलवारधारी अश्वारूढ कल्कि अपने सेवकों सहित विराजमान हैं। रामलक्ष्मण, वाराह अवतार, शंख, चक्र गदाधारी विष्णु , मुरली वादक कृष्ण तथा शेष पैनल अस्पष्ट हैं। वितान विभिन्न सोपानयुक्त आकृतियों से उपर उठाया गया है।

Himvan

नौले में बाहर की ओर जंघा भाग पर भी पैनल लगे है। इनमें सम्भतः मातृकायें रहीं होंगी। टूटे पैनलों में लिंग पूजन, विष्णु, अश्वारूढ़ योद्धा, गायक-वादक, मंदिरों की आकृतियां, अत्यधिक लम्बा खडग लिये पुरूषाकृति तथा महिषमर्दिनी का अंकन है।

नौला तराशे गये प्रसाधित पत्थरों से बना है। छत पटालों से आच्छादित की गयी है।

लेकिन कुछ समय पूर्व तक सम्पूर्ण नौले की जर्जर हालत के कारण इसे तुरन्त बचाने की आवश्यकता थी। नौले में जगह जगह दरारें पड़ गयी थीं। छत गिरने के कगार पर आ गयी थी। पत्थर चटकने लगे थे। लोगों ने चूना पोत कर नौले को बदरंग कर दिया । चारों तरह पानी का रिसाव होंने के कारण कीचड़ हो गयी जिसके कारण भी क्षरण की प्रक्रिया तेज हो गयी थी। कई अलंकृत पैनल लोग उठाकर ले गये । लेकिन नौला नष्ट होने की स्थिति मे आने से पहले ही संस्कृति प्रेमियों के अथक प्रयासों से राज्य पुरातत्व संगठन ने इसे अपने संरक्षण में ले लिया जिससे एक अमूल्य धरोहर सदा के लिए नष्ट होने से बच गई।














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