17. संत पीपाजी का निर्माणाधीन मंदिर
लाल बाग़ और राजवाड़ा, इंदौर
नैनागिरी जैन मंदिर
खजुराहो की कामुक मूर्तियाँ - 1
मध्य प्रदेश का छोटा सा शहर खजुराहो अपने मंदिरों के कारण विश्व प्रसिद्द है. ये सभी मंदिर विश्व धरोहर - World Heritage Site में
आते हैं. भोपाल से खजुराहो की दूरी 380 किमी है और झांसी से 175 किमी.
खजुराहो हवाई जहाज, रेल या सड़क से पहुंचा जा सकता है. हर तरह के होटल और
अन्य सुविधाएं उपलब्ध हैं.
खजुराहो
की स्थापना करने वाले चन्देल राजा चंद्र्वर्मन थे जिन्होंने इसे अपने
राज्य की राजधानी बनाया था. चन्देल राजवंश ने लगभग नौवीं शताब्दी से लगभग
तेरहवीं शताब्दी तक बुंदेलखंड के कुछ हिस्सों और उसके आस पास राज किया था. खजुराहो
के ज्यादातर मंदिर सन 850 से सन 1150 के बीच चंदेल राजाओं द्वारा बनवाए गए
थे. बीस वर्ग किमी में फैले क्षेत्र में पच्चासी मंदिरों का निर्माण हुआ
था. इन
पच्चासी मंदिरों में से अब पच्चीस मंदिर ही शेष हैं जो छै वर्ग किमी में
फैले हुए हैं. तेरहवीं सदी में यहाँ दिल्ली के सुल्तानों के हमले हुए और वो
इस इलाके पर काबिज हो गए. मंदिरों को नुक्सान पहुंचा और मंदिरों की देखभाल
और उनका महत्व घट गया. ज्यादातर मंदिर झाड़ झंखाड़ और जंगल में खो गए. 1830
में ब्रिटिश सर्वेयर टी एस बर्ट ने मंदिरों की पुनः खोज की.इस खोज के कुछ
बरस बाद एलेग्जेंडर कन्निन्घम ने मंदिरों की विस्तृत जानकारी दी और 1852
में मैसी ने मंदिरों के पहले रेखा चित्र बनाए.
मंदिरों
में भारी, मज़बूत और बढ़िया किस्म का बलुआ पत्थर और ग्रेनाइट का प्रयोग किया
गया है. पत्थर जोड़ने के लिए कोई सीमेंट नहीं इस्तेमाल किया गया है बल्कि
इन पत्थरों में खांचे बना कर एक दूसरे में फंसा दिया गया है जो कमाल की
कारीगरी है. सभी मंदिर ऊँचे और लम्बे-चौड़े चबूतरों पर बनाए गए हैं. ये
मंदिर और मूर्तियाँ वास्तु और मूर्तिकला के बेमिसाल नमूने हैं.
मंदिरों
की बाहरी दीवारों पर लगभग आठ नौं फुट की ऊँचाई पर दो या तीन कतारों में
सैकड़ों सुंदर मूर्तियां बनी हुई है. इनमें विष्णु और उनके अवतार, शिव,
पार्वती, गणेश के अलावा यक्ष, यक्षिणी, देवियाँ, सैनिक, जानवर, पेड़, पौधे,
और राजा रानियाँ हैं और जीवन के हर पहलु के विभिन्न दृश्य हैं.
सभी
मंदिरों को मिला कर देखा जाए तो महिलाओं की मूर्तियों की बहुतायात लगती
है. लगभग 8-10% कामुक या मिथुन मूर्तियाँ हैं जो विश्व प्रसिद्द हैं और जो
खजुराहो की पहचान बन गई हैं. सभी मूर्तियों में चाहे महिला हो या पुरुष,
हृष्ट पुष्ट और भरपूर शरीर के बनाए गए हैं. स्त्रियों के वक्ष स्थल,
नितम्ब, बाहें, टांगें, और चेहरे सही अनुपात में और सुंदर तरीके से दर्शाए
गए हैं. बालों के जूड़े और स्टाइल, शरीर के विभिन्न भागों में पहने हुए जेवर
बारीकी से बनाए गए हैं. पुरुषों ने भी बहुत से जेवर पहन रखे हैं, या कई
तरह की दाढ़ियाँ रखी हैं. सभी के चेहरों पर अलग अलग परन्तु यथा-योग्य भाव
हैं. ज्यादातर पुरुषों का हल्का सा बढ़ा हुआ पेट भी बनाया गया है याने ये
लोग खाते पीते घर के हैं!
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
 |
| प्रणय मुद्रा
में युगल शालीनता और धैर्य के साथ. अंगों का पारस्परिक अनुपात, हाथों,
बाहों और टांगों की स्थिति बेहतरीन ढंग से बनाई गई है |
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| कामुक युगल. हाथों पैरों की स्थिति और चेहरे पर भाव में सुंदर बारीकी है |
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| सिर पर मुकुट
के कारण राजा रानी लग रहे हैं. चेहरों पर सौम्य भाव है. शारीरिक मुद्रा
दोनों का अन्तरंग होना सुन्दरता से दिखाया गया है |
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| कामुक युगल की सुंदर भाव भंगिमाएं |
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| छोटे छोटे आलों
में बनी कामुक युगल मूर्तियाँ शायद आम लोगों की हैं. ये ज्यादा सुघड़ और
उतनी सुंदर नहीं हैं जितनी की राजा रानियों की |
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| प्यार में पुरुष की दाढ़ी सहलाती महिला ! दोनों के चेहरे के भाव आकर्षक हैं |
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| चुम्बन लेते मिथुन युगल की सुंदर मुद्रा |
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| डांस में मस्त युगल. पत्थर की युगल मूर्ती में पैरों, टांगों और हाथों का गजब का प्रदर्शन |
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| पत्थर के बने
चुम्बन लेते कामुक युगल की शानदार प्रतिमा. पत्थर में होते हुए भी दोनों की
शारीरिक भाषा में एक प्रवाह और आकर्षण है |
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| ऊँचे और विशाल जैन मंदिर की बाहरी दीवार में छोटी छोटी मूर्तिकारी की तीन पंक्तियाँ |
खजुराहो की कामुक मूर्तियाँ - 2
खजुराहो की कामुक मूर्तियाँ - 1 से आगे दूसरा और अंतिम भाग :-
खजुराहो के हिन्दू और जैन मंदिरों में कामुक या मिथुन मूर्तियों को देख कर
कोई शर्माता है, कोई झिझकता है, कोई खिलखिलाता है और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो
देखना ही नहीं चाहते! जो भी हो सभी इन मूर्तियों को देखकर इन के बारे में
सोचने पर मजबूर हो जाते हैं. और बातों के अलावा एक सवाल तो मन में आ ही
जाता है कि मंदिर में ऐसी कामुक या मिथुन या erotica मूर्तियाँ क्यूँ बनाई
गईं? अगर आप मैथुनरत युगल देखें तो उनके चेहरे शांत, आनंदित और सरल दिखते
हैं उनमें उद्विग्नता या आक्रामक हवस नहीं दिखती. मंदिर की दीवारों पर
कामुक मूर्तियाँ क्यूँ बनाई गईं, इस प्रश्न के उत्तर में कई कयास लगाए जाते
हैं जैसे कि:
* मानव जीवन के क्रिया कलाप को चार मुख्य भागों में बांटा जा सकता है -
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष. दूसरे शब्दों में पैदा होने के बाद संसार को
देखना समझना, उसके बाद अपने और अपनों के जीवन यापन के लिए 'अर्थ' के जुगाड़
में लग जाना, उसके बाद अपना जीवन साथी ढूँढना और फिर परलोक प्रस्थान कर
जाना. इन चारों अवस्थाओं के विभिन्न आयामों को मूर्तियों में देखा जा सकता
है. खजुराहो के मंदिरों में हजारों मूर्तियों हैं जिनमें से कामुक
मूर्तियाँ थोड़ी सी 8-10% ही हैं. ये मूर्तियाँ मंदिर की बाहरी दीवारों पर
ही हैं. इसका मतलब शायद ये रहा हो कि मंदिर में प्रवेश से पहले आपने सब कुछ
भोग लिया है और अब मोक्ष दरकार है. मंदिरों की बनावट भी एक गुफा की तरह ही
है - प्रवेश द्वार छोटा सा और गुफा में आगे बढ़ें तो गर्भ गृह उंचा और बड़ा
है जहाँ संसार को बनाने या मिटाने वाले शिव या विष्णु विराजमान है. याने
जीवन का अंतिम पड़ाव.
* मंदिरों का निर्माण सन 850-1150 के बीच हुआ और मान्यता है कि उस समय
मध्य भारत में तांत्रिक विद्या का प्रचलन था. यहाँ का सबसे पहले बना मंदिर
चौंसठ योगिनी मंदिर भी उसी विद्या का उदहारण है जो शिव और शक्ति या फिर
पुरुष और प्रकृति को समर्पित है. इस विद्या में तन और मन का बैलेंस करना और
सम्भोग से मोक्ष की और जाने की बात की गई है. सम्भोग या मिथुन भी जीवन के
अन्य कार्यकलापों की तरह एक स्वाभाविक और आवश्यक क्रिया है जो जीवन का एक
अंग है. यहाँ यही बात बिंदास मूर्तियों में ढाली गई है.
* कुछ लोगों का कहना है कि ये कामुक मूर्तियाँ काम कला के ज्ञान sex
education देने के लिए बनाईं गईं थीं और इसीलिए मंदिर की बाहरी दीवारों पर
हैं अंदर नहीं. लोग कामुक मूर्तियाँ देखें, समझें और काम भावना त्याग दें!
इस पर गाइड का कहना था कि लम्बे समय तक कोई भी मैथुन मूर्ति देखी ही नहीं
जा सकती क्यूंकि उकताहट हो जाती है और स्वत: नज़र हट जाती है.
* एक मत ये भी है कि बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के बाद ( ईसा पूर्व 400
से लेकर लगभग ईसा पश्चात 500 तक ), पूजा पाठ और मंदिरों की महत्ता घट गई
थी. बौद्ध स्तूपों या धार्मिक स्थलों में भगवानों की मूर्तियाँ नहीं होती
थी. इसके अलावा बुद्ध की मूर्ति का आदर सम्मान तो किया जाता है पर पूजा
अर्चना या आरती नहीं होती है. जनता को फिर से मंदिरों और भगवान् की ओर
आकर्षित करने के लिए यहाँ कामुक मूर्तियाँ बनाई गईं.
* एक और दृष्टिकोण है कि मंदिरों की दीवारों पर भगवान, यक्ष, गांधार की
मूर्तियों के अलावा काल्पनिक जानवर भी बनाए गए हैं मसलन व्याल, वृक व्याल
और गज व्याल. इन सभी में कई जानवरों के अच्छे गुणों के मिश्रण हैं और ये
शुभ हैं. प्रवेश करने वाले इन सभी का दर्शन करें और अपनी दुनियावी इच्छाओं
को बाहर रख कर मंदिर में प्रवेश करें.
* कवि चंदबरदाई के अनुसार चंदेल राजपूत वंश की शुरुआत एक कन्या हेमवती जो
चांदनी में नहा रही थी, और चंद्रमा के मिलन से हुई थी. सभी चंदेल राजा कला
प्रेमी हुए और उन्होंने सुंदर महल और मंदिर बनवाए और अनोखी मूर्तियों से
सजावट की. यह मूर्ति कला चौंसठ योगिनी के सिंपल से मंदिर से शुरू होकर डेढ़
सौ वर्षों बाद लक्ष्मण मंदिर और कंदारिया मंदिर में निखर कर शिखर पर पहुँच
गई.
मंदिरों में इन कामुक मूर्तियों के होने का जो भी कारण रहा हो पूरे विश्व
में इनका कोई मुकाबला नहीं है. इनकी बनावट, हाथ पैरों की पोज़ीशन, चेहरे के
हाव भाव, सजावटी जेवर, हेयर स्टाइल इत्यादि कमाल की सजीवता लिए हुए हैं.
हलके ठन्डे मौसम और हरियाली में ये मंदिर और लैंडस्केप बहुत ही सुंदर लगते
हैं. मंदिर में प्रवेश के लिए और गाइड के लिए खासे पैसे लगते हैं. अच्छा
कैमरा, पानी की बोतल और टोपी साथ रखिये और अनोखी विश्व धरोहर का आनंद
लीजिये.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
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| मंदिर की बाहरी दीवार पर बेमिसाल नक्काशी. इसमें से तीन मिथुन फोटो अलग अलग नीचे दी गईं हैं |
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| कामुक युगल - 1 |
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| कामुक युगल - 2 |
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| कामुक युगल - 3 |
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| छोटे छोटे आलों में बनी मिथुन मूर्तियाँ |
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| कहा जाता है कि
घर से लम्बे समय तक दूर रहने वाले कुछ सिपाही इस तरह की हरकत कर देते थे
जो अवैध मानी जाती थी. पिछले दो सिपाही उसे पकड़ने जा रहे हैं |
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| एक स्त्री और
जानवर का मैथुन. इस स्त्री को भी पकड़ कर महिला पुलिस राजा के दरबार में पेश
कर रही है. वही स्त्री हाथ जोड़ कर और सिर झुका कर राजा से माफी मांग रही
है |
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| दो बड़े पत्थरों के बीच बने आले में मिथुन मूर्तियाँ |
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| ऊपर वाले क्रम में और मूर्तियाँ |
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| ऊपर वाले क्रम में कुछ और मूर्तियाँ |
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| खजुराहो के सुंदर मंदिर |
खजुराहो के कुछ मंदिरों पर फोटो ब्लॉग इन निम्नलिखित नामों पर क्लिक कर के देखे जा सकते हैं:
1. चौंसठ योगिनी मंदिर
2. दुल्हादेव मंदिर
3. वाराह मंदिर
4. चतुर्भुजा मंदिर
5. जावरी मंदिर
6. वामन मंदिर
जावरी मंदिर खजुराहो
मध्य
प्रदेश का छोटा सा शहर खजुराहो अपने मंदिरों के कारण विश्व प्रसिद्द है.
ये सभी मंदिर विश्व धरोहर - World Heritage Site में आते हैं. भोपाल से
खजुराहो की दूरी 380 किमी है और झाँसी से 175 किमी है. खजुराहो छतरपुर जिले
का हिस्सा है. खजुराहो में एक एयरपोर्ट भी है. इसके अलावा रेल और सड़क से
भी पहुंचा जा सकता है. हर तरह के होटल और अन्य सभी सुविधाएं यहाँ उपलब्ध
हैं.
खजुराहो
की स्थापना करने वाले चन्देल राजा चंद्र्वर्मन थे जिन्होंने इसे अपने
राज्य की राजधानी बनाया था. चन्देल राजवंश ने लगभग नौवीं शताब्दी से लेकर
लगभग तेरहवीं शताब्दी तक बुंदेलखंड के कुछ हिस्सों और उसके आस पास राज किया
था. इस दौरान पहले राजधानी खजुराहो में बनी और फिर महोबा में बना दी गई
थी.
खजुराहो
के ज्यादातर मंदिर सन 850 से सन 1150 के बीच चंदेल राजाओं द्वारा बनवाए गए
थे. बीस वर्ग किमी में फैले क्षेत्र में पच्चासी मंदिरों का निर्माण हुआ
था जिनमें से पहला मंदिर चौंसठ योगिनी मंदिर माना
जाता है जो 850 - 860 में बना और आखिरी मंदिर - दुल्हादेव मंदिर लगभग 1110
- 1125 में बनवाया गया माना जाता है. इन पच्चासी मंदिरों में से अब पच्चीस
मंदिर ही शेष हैं जो छे वर्ग किमी में फैले हुए हैं.
खजुराहो
के मंदिरों में से एक मंदिर है जावरी मंदिर ( कहीं कहीं जवारी मंदिर भी
कहा गया है ) जो की भगवान विष्णु को समर्पित है. परन्तु गर्भगृह में विष्णु
की मूर्ति खंडित है और उसके चारों हाथ और मस्तक टूटे हुए हैं. मंदिर एक
ऊँचे, 39 फुट लम्बे और 21 फुट चौड़े चबूतरे पर भारी और मजबूत पत्थरों से बना
है. शिखर की बनावट बहुत सुंदर है. खजुराहो
के अन्य मंदिरों की तरह जावरी मंदिर की बाहरी दीवारों पर मिथुन मूर्तियाँ
हैं पर कम हैं. मंदिर बनाने का समय सन 950 से 975 माना जाता है.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो :
 |
| मंदिर की बाहरी दीवार पर बनी सुंदर मूर्तियाँ. चेहरे पर सजीव भाव |
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| कामुक युगल |
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| नंदी मनुष्य के रूप में. बाँई ओर कामुक युगल |
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| बाहरी दीवार पर बने छोटे से शिवालय में शिव पार्वती |
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| बाहरी दीवार की बहुत सी मूर्तियाँ क्षतिग्रस्त हैं |
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| 'मकर' तोरण इस मंदिर की विशेषता है. इसमें तीन उलटे कमल थे जो टूट चुके हैं |
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| भारी भरकम पत्थरों पर टिका मंदिर |
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| भारी पत्थरों पर बारीक काम |
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| सुंदर सुघड़ शिखर |
वामन मंदिर खजुराहो
Orchcha Fort Complex - 1/2
Orchcha
is a small historical town in Tikamgarh district of Madhya Pradesh and
was capital of Bundela kings. From Jhansi it is 15 km, from Khajuraho
175 km & from Gwalior 124 km. First Bundela
King Rudra Pratap Singh who ruled from 1501 to 1531, made Orchcha his
capital & got the fort construction started. There were several
additions & modifications subsequently by later kings Bharati
Chandra, Madhukar Shah and Veer Singh Dev.
2.
About the origin of Suryavanshi Rajput Bundelas a poet named Lal Kavi
has in 1700, given a mythical & poetical account. His poems
inter-alia state that Bundelas are descendents from gods ( with gaps of
several generations between some of them ) as under:
Vishnu
> Brahma > Vihagaraja > Kiratdeva > Virbhadra > Jagdas
> Arjunpal > Sohanpal > Rudra Pratap Singh.
3.
Jagdas was son of Virbhadra from a junior queen and was denied share in
Kashi kingdom by sons from chief queen. He came to the shrine of
Vindhyavasini and sat down in Tapasya. After a long while nothing
happened & out of desperation he decided to sacrifice his head to
Vindhyavasini. As soon as a drop of his blood fell on ground
Vindhyavasini appeared and said that his son shall be born from this
drop - 'बूँद of his blood to become future ruler. Future rulers were
thus called Bundelas - बुन्देला. Bundelas worship Vindhyavasini as their
family deity or Kuldevi.
4.
Bundelas ruled the area named Bundelkhand with Orchcha as capital for
over 250 years. Some of the famous Bundela kings are Rudra Pratap Singh,
Bharati Chandra, Madhukar Shah who ruled during 1594-1591 & built
Raja Mahal and Chatrasal. King Veer Singh Dev who ruled during 1605-1627
built Jahangir Mahal. Within Bundelkhand area there were several
smaller states such as Orchcha, Datia, Panna, Ajaigarh, Bijawar,
Charkhari. They fought with Mughals & at times there were fights
within these smaller states which were taken advantage of by Mughals.
5.
Forts, palaces, memorials & temples in & around Orchcha have
beautiful and distinct style. River Betwa passing through the rocks adds
to the beauty of the place. Boating & rafting can be enjoyed in
Betwa. Noons are hot here with bare rocks getting roasted in the sun,
take care. With a little better tourist infra and maintanance of
monuments tourism can improve. All the monuments are within walking
distance otherewise conveyance is also easily available. Some snaps:
 |
| 1. Raja Mahal |
 |
| 2. Pillars and arches |
 |
| 3. Arches & balcony of Raja Mahal |
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| 4. Plumbline perfect. From top of dome to the corner of the platform a straight line can be drawn |
 |
| 5. Cool pool in courtyard to beat the heat |
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| 6. Observation post |
 |
| 7. Top floor of Jahangir Mahal |
 |
| 8. Beautiful arches |
 |
| 9. High ceilings on pillars kept the place cool & also let the air & light in |
 |
| 10. Painted walls & ceilings with women horse riders. No purdah system here for the ladies |
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| 11. Jungle, war & shikar scenes. Polo style games are also seen |
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| 12. Bedroom of the Raja has this latticed window through which he could see the Ram Raja Temple as he got up in the morning |
 |
| 13. This is
what Raja saw from his window. High rise building is Chaturbhuj Temple
built for installing statue of Lord Ram to be brought from Ayodhya.
However it remains empty. The queen who brought the statue from Ayodhya
inadvertantly placed the statue in a kitchen. It could not be lifted
from there and white building became Ram Raja Temple. Lord Rama is
reverred here as a Raja |
 |
| 14. A small balcony used by Raja to address Darbar. Over this balcony are small 108 elephants |
 |
| 15. Mahal as seen from outside the enclosure wall |
 |
| 16. Sheesh Mahal which now is a hotel / restaurant |
 |
17. Jahangir
Mahal constructed in 17th century in honour of Mughal Emperor Jahangir
by king Vir Singh Deo. Jahangir stayed here for a night
Orchcha Fort - 2 / 2
Orchcha
is a small historical town in Tikamgarh district of Madhya Pradesh and
was capital of Bundela kings. From Jhansi it is 15 km, from Khajuraho
175 km & from Gwalior 124 km. First Bundela
King Rudra Pratap Singh who ruled from 1501 to 1531, made Orchcha his
capital & got the fort construction started. There were several
additions & modifications subsequently by later kings Bharati
Chandra, Madhukar Shah and Veer Singh Dev.
You can click & see Orchcha Fort - 1 / 2.
2.
About the origin of Suryavanshi Rajput Bundelas a poet named Lal Kavi
has in 1700, given a mythical & poetical account. His poems
inter-alia state that Bundelas are descendents from gods ( with gaps of
several generations between some of them ) as under:
Vishnu
> Brahma > Vihagaraja > Kiratdeva > Virbhadra > Jagdas
> Arjunpal > Sohanpal > Rudra Pratap Singh.
3.
Jagdas was son of Virbhadra from a junior queen and was denied share in
Kashi kingdom by sons from chief queen. He came to the shrine of
Vindhyavasini and sat down in Tapasya. After a long while nothing
happened & out of desperation he decided to sacrifice his head to
Vindhyavasini. As soon as a drop of his blood fell on ground
Vindhyavasini appeared and said that his son shall be born from this
drop - 'बूँद of his blood to become future ruler. Future rulers were
thus called Bundelas - बुन्देला. Bundelas worship Vindhyavasini as their
family deity or Kuldevi.
4.
Bundelas ruled the area named Bundelkhand with Orchcha as capital for
over 250 years. Some of the famous Bundela kings are Rudra Pratap Singh,
Bharati Chandra, Madhukar Shah who ruled during 1594-1591 & built
Raja Mahal and Chatrasal. King Veer Singh Dev who ruled during 1605-1627
built Jahangir Mahal. Within Bundelkhand area there were several
smaller states such as Orchcha, Datia, Panna, Ajaigarh, Bijawar,
Charkhari. They fought with Mughals & at times there were fights
within these smaller states which were taken advantage of by Mughals.
5.
Forts, palaces, memorials & temples in & around Orchcha have
beautiful and distinct style. River Betwa passing through the rocks adds
to the beauty of the place. Boating & rafting can be enjoyed in
Betwa. Noons are hot here with bare rocks getting roasted in the sun,
take care. With a little better tourist infra and maintanance of
monuments tourism can improve. All the monuments are within walking
distance otherewise conveyance is also easily available. Some snaps:
 |
| 1. Orchcha Fort Complex & river Betwa |
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| 2.Entry bridge to Sheesh Mahal, Jahangir Mahal , Raja Mahal |
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| 3. You may come across many sadhus looking for alms |
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| 4. Security measures |
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| 5. Welcome in |
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| 6. Beautiful carvings on pillars, ceiling & walls |
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| The place has a small museum also. Stone sculpture in museum - Ram, Janaki and Lakshman |
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| Eleventh century sand stone sculpture in museum - Sheshashai Vishnu |
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| Latticed windows served as air inlets & to keep eye on visitors |
 |
| Well constructed balconies & parapets |
 |
| View from the first floor balcony |
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Rai Praveen
Palace. Constructed in 1618 by King Indrajit Singh in honour of a
courtesan Rai Praveen who was a beautiful singer. Her fame reached
Emperor Akbar who summoned her in 1602. It was clear that she won't ever
come back. Rai Praveen wriggled out of the situation and came back by
telling Akbar "विनति राय प्रवीण की, सुनिए शाह सुजान, जूठी पातर भकत हैं बारी, बायस, स्वान ". that is a 'used one' is not meant for an Emporer
| |
तानसेन
सूरज कुण्ड ग्वालियर
ग्वालियर
का किला शहर से सौ मीटर ऊँची पहाड़ी पर है जिस का नाम गोपाचल पहाड़ी है.
गेरुए लाल रंग के बलुए पत्थरों से बना किला तीन वर्ग किमी में फैला हुआ है.
दीवारों की लम्बाई दो मील है. किले की अंदरूनी चौड़ाई दो सौ मीटर से लेकर
एक हज़ार मीटर तक है. किले के अंदर मंदिर, महल, पानी के तालाब, जेल और एक
म्यूजियम भी है.
ये
किला कब बनाया गया और किसने बनवाया इसकी पक्की जानकारी नहीं है. माना जाता
है की छठी शताब्दी में यहाँ मूल रूप से किला बना था. किले से सम्बन्धित
नवीं और दसवीं शताब्दी के सम्बन्धित अवशेष भी मिले हैं जिससे लगता है की
किला तब भी मौजूद था.
किले
के बारे में एक किस्सा मशहूर है कि राजा सूरज सेन इस पहाड़ी पर पीने के लिए
पानी ढूँढ रहे थे. उन्हें एक संत ग्वालिपा ( कहीं कहीं ऋषि गलवा भी लिखा
हुआ है ), नज़र आये जो उन्हें सूरज कुंड तक ले गए. राजा ने पानी पिया तो
उनकी प्यास तो बुझी ही साथ में उनके शरीर का कोढ़ भी दूर हो गया. राजा ने
यहाँ किला बनवाया और उसका नाम ग्वालियर किला रख दिया. कुण्ड का नाम
कालान्तर में सूरज कुण्ड हो गया. सुबह और शाम यहाँ का दृश्य ज्यादा सुंदर
लगता है. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
 |
| सूरज कुण्ड. फिलहाल कमल के पत्तों से ढका दिखाई दे रहा है. मौसम में सुंदर कमल खिलते हैं |
 |
| कुण्ड के पास छोटा सा मंदिर |
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| सूरज कुण्ड के किनारे समाधि |
सूरज कुण्ड के पास ही तेली का मंदिर और गुरुद्वारा श्री दाता बंदी छोड़
भी हैं वो भी देख सकते हैं. ये सभी किले के अंदर ही हैं और सुबह से शाम तक
खुले रहते हैं. प्रवेश के लिए अलग से टिकट नहीं है. किले के लिए प्रवेश का
टिकट इन सभी स्थानों पर लागू है.
Udaygiri Caves MP
Udaigiri
Caves are situated in Vidisha district of Madhy Pradesh. Udaygiri is 11
km from Sanchi & 60 km from Bhopal. The area is served by Betwa
& Bes rivers. During and after monsoon Udaigiri gets lush green
cover & is pleasant to look at. Land is fertile & friendly to
inhabitants. This might have led to Vidisha becoming a ancient centre of
trade, cultural & religious activities. There were Buddhist Viharas
in nearby Sanchi. King Bindusara had deputed his son Ashoka as a
governer of Vidisha who later became Ashoka the Great. In fact Ashoka
wed Vidisha Devi here who was a daughter of wealthy merchant of Vidisha.
2.
A couple of km from Udaigiri is a stone pillar made by Greek ambassador
Heliodorus deputed by King Antialcidas of Texla in about second century
BC. Heliodorus is said to have started following Vaishanvism & made
a Vishnu Temple as well which has however disappeared. The Pillar still
stands & is locally known as Kham Baba.
As
per a few inscriptions, the caves relate to Chadragupta II period that
is 4th and 5th centuries. Further, caves were in religious use till 10th
century. After advent of 11th century invaders the caves seem to have
lost importance & merged in to the nearby jungle.
3.
In 1870 Alexander Cunningham reported about ten caves to Archeological
Survey of India. He mentioned these to be related to second century BC
to fifth century AD which aroused the interest of
historians.Subsequently ten more caves were discovered.
4.
Udaigiri is a hill which rises 350 feet above ground and is approx 2.5
km long. There are 20 caves here of which two are dedicated to Jainism
& the rest have Shiva, Shakti & Vishnu statues or engravings.
These are not natural caves but carved ones with depth ranging from
three to seven feet. The statues are mostly worn out or defaced or
broken. Besides aggressors & vagaries of nature some blame is also
shared by quality of stone here. The sand stone here is said to have
less resistance to the elements.
5.
Noons here are hot and there is no retaurant around, take care. We
reached here in afternoon & no guide was available. Caves have no
electric illumination so visiting early recommended. About 200 meters
from ticket window there is a small museum which provides complete info
about the individual caves which are numbered 1 to 20. It may be
mentioned that caves with similar name 'Udaygiri Caves' are located in Rajgir, Bihar and near Bhuvneshwar, Odisha also.
Some photos:
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| 1. Lord
Ganesha. This magnificent carving is said to be one of the earliest
Ganesha reliefs. There is a long groove over the niche which suggests
that it might have had stone slab shades |
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| 2. Ground level cave with pillars. Some sort of mandap might have been there on these pillars. |
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| 3. Entry and decorative carvings |
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| 4. Solar dial |
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| 5. Said to be a Jain Cave shuttered now |
 |
| 6. Shell script - शंख लिपि. |
 |
| 7. There are lots of these Shell scipts here. This script is yet to be deciphered |
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| 8. This place has largest depository of shell script |
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| 9. Vishnu / Narsimha |
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| 10. Narsimha and Dwarpals |
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| 11. Durga - Mahishasurmardini |
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| 12. Ganesha & Dwarpal? |
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| 13. Vishnu |
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| 14. Kartikeya |
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| 15. Climb up is facilitated with steps & railings |
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| 16. Ticket window and a view of hill |
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| 17. Stepping down the hill with Tawa Cave on the left |
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| 18. This Pillar is supposed to be a part of a temple built in Chandrgupta II times which is no more visible now |
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| 19. Beautiful
& perhaps the best macho presentation of Varaha as saviour of earth.
The earth or Bhudevi was dragged into Rasatal or the cosmic ocean by
demon Hiranyakshya. Vishnu appeared as Varaha or the wild boar in third
avtar to rescue the Bhudevi. Shown here with muscular body, broad
shouldered with powerful posture with his left foot firmly planted on
Sheshnaga. |
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| 20. Varuna the Lord of Oceans with a Kalasha in his hands |
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| 21. Yaksha in
the heavens overhead. Ganga on Makara & Yamuna on Kachchapa
descending from the heavens & going towards Varuna |
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| 22. Rescued Bhudevi, Brahma over the head and Shiva on Nandi |
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| 23. Varaha wears a Kanthmala with lotus over the head |
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| 24. Varahi on the left holding a lotus which is over the head of Varaha |
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| 25. Sheshanaga
with thirteen hoods seeking forgiveness. Thick & large garland
Vaijayanatimala worn by Varaha as a mark of victory |
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| 26. King Chandragupta II or someone else? Opinions are divided |
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| 27. Devtas, saints, Yakshas, Ganas, kings paying respecs |
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| 28. Lush green
Vidisha. On the left of this pavement about a km ahead is a village and
you can guess the economic status of residents. On the right of this
way is the hill Udaygiri. | From Gwalior Fort Museum
Gwalior and nearby area used to be called Gird - गिर्द or Gopa गोपा area
in earlier times. This area included Gwalior, Bhind, Morena, Shivpuri
and Sheopur. Gopachal in fact is the name of a hill upon which Gwalior
Fort has been constructed. The Gird area touched Malwa, Bundelkhand,
Braj and Hadoti. All these ancient names are slowly fading out as their
defined boundaries are no more there.
The area was ruled by Bhaghels, Gurjars, Pratiharas, Kachchvahas,
Mughals, Marathas and the British. The area had its share of battles
& wars, forts, palaces & temples. Lot of monuments have survived
the elements & aggressors. The area however remains backwards,
lacks infra & the people are poor. Tourist inflow is less despite
rich & varied archeological findings.
Gwalior Fort has two museums displaying archeological artifacts, larger
being Gujari Mahal and smaller one in Fort area near Karan Mahal. Some
photos from museum in Fort:
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| 1. This
beautiful sculpture is of 9th century from Khairat district Bhind. Near
the feet of Shiva & Parvati are seated Ganesha, Bhringi, Nandi &
a lion. Graceful with remarkable carvings of jewellary |
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| 2. Beautiful dancing Ganesha. 9th century sculpture from Terahi district Shivpuri |
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| 3.
Saptmatrika. Tenth century panel from Survaya district Shivpuri. From L
to R - Chaturbhuji Brahmani, Maheshwari, Kaumari, Vaishnvi, Varahi,
Indrani and Chamunda |
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| 4. Arishtnemi 21st Jain Tirthankar. 8th century carving found in Amroli district Gwalior |
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| 5. A shikhara |
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| 6. Erotica panel of tenth century from Padawali district Morena. A bit crude compared to that seen in Khajuraho |
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| 7. Kartikeya.
First century BC sculpture from Mitawali district Morena. Son of Shiva
& Parvati considerd as commander of army of devtas. In left hand he
holds a weapon & in right a cock |
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| 8. Four armed Durga. Eleventh century find from Sihonia district Morena. Relates to Kachchapghata times |
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| 9. Balram.
Elder brother of Lord Krishna. Considered as one of the ten avtars of
Lord Vishnu. First century AD from Mitawali district Morena |
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| 10. Mother & child. Beautiful statue of eleventh century Kachchapghata period from Sihonia district Morena |
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| 11. Ek Mukhi Linga |
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Gujari Mahal as seen from Gwalior Fort
उदयगिरी गुफाएं मध्य प्रदेश
उदयगिरी की गुफाएं भोपाल से 60 किमी और साँची से 11 किमी की दूरी पर हैं.
पास ही बेतवा नदी और एक छोटी सहायक नदी बेस भी है. उदयगिरी पहाड़ी लगभग 350
फुट ऊँची है और करीबन ढाई किमी लम्बी है. इसी पहाड़ी में अलग अलग स्थानों
में छोटी बड़ी गुफाएं अलग अलग समय में बनाई गई है. कुल बीस गुफाओं में से दो
में जैन सम्बन्धी मूर्तियाँ हैं और बाकी में शिव, शक्ति और विष्णु
सम्बन्धी मूर्तियाँ या चट्टानों पर उकेरी आकृतियाँ हैं. गुफाओं के अंदर की
मूर्तियाँ क्षत विक्षत हैं और कुछ गुफाओं में अब नहीं हैं. उदयगिरी नाम की
गुफाएं राजगीर, बिहार और भुवनेश्वर, ओडिशा के निकट भी हैं.
ये गुफाएं 7 - 8 फुट से ज्यादा गहरी नहीं हैं पर चौड़ाई और उंचाई में बड़ी
हैं. चूँकि लाइट की व्यवस्था नहीं है इसलिए सुबह नों से शाम चार तक ही खुली
रहती हैं. प्रवेश और गाइड के लिए अलग अलग टिकट हैं. पहाड़ी से तीन सौ मीटर
दूर एक म्यूजियम है जहां अगर पहले चले जाएं तो गुफाओं की और आस पास के
दूसरे दर्शनीय स्थानों के बारे में अच्छी जानकारी मिल सकती है. पास ही
ग्रीक राजदूत हेलियोडोरस का खम्बा
भी है. आने जाने और यहाँ रहने के लिए सभी तरह की सुविधाएं उपलब्ध हैं. हरा
भरा क्षेत्र है. पर दोपहर को चट्टानें गर्म हो जाती हैं. आस पास अच्छे
ढाबे या रेस्तरां नहीं हैं. अपना इंतज़ाम करके चलना ठीक रहेगा.
इतिहास के नज़र से उदयगिरी और आसपास का इलाका समृद्ध है. गुफाओं पर कुछ
अभिलेख संस्कृत और नागरी लिपि में मिले हैं जिनसे गुफाओं का सम्बन्ध
चन्द्रगुप्त द्वितीय याने सन 380 से सन 414 से जुड़ता है. पांचवीं सदी से
लेकर बारहवीं सदी के छोटे छोटे लेख भी है जिससे लगता है है कि यहाँ हिन्दू
और जैन तीर्थ यात्रियों का आना होता था. तेरहवीं सदी के आक्रमणों के बाद ये
जगह वीरान हो गई और जंगल में खो गई.
1870 में एलेग्जेंडर कन्निन्घम ने पुरातत्व विभाग ASI को अपनी रिपोर्ट में
विस्तार से दस गुफाओं के बारे में बताया और इनका समय दूसरी शताब्दी ईसा
पूर्व से लेकर ईसा के बाद पांचवीं शताब्दी तक बताया जिसकी वजह से लोगों का
ध्यान इस ओर गया. बाद की खोजबीन में और गुफाएं मिलीं और गुफाओं पर एक से
बीस तक नम्बर लगा दिए गए. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
 |
| 1. चट्टानों पर उकेरी वैष्णवी मूर्तियाँ |
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| 2. भगवान्
विष्णु का वाराह अवतार. उदयगिरी की बीस गुफाओं में से सबसे महत्वपूर्ण और
सबसे सुंदर चित्रण. यह गुफा बीस फुट चौड़ी, बारह फुट आठ इंच ऊँची और तीन फुट
चार इंच गहरी है. |
 |
| 3. बाएँ पृथ्वी या भूदेवी जिसे वाराह ने दांतों के सहारे उठा रखा है. दाएं हैं आदित्या, अग्नि, रुद्रा, गणदेवता और ऋषि मुनि |
 |
| 4. गुप्त वंश के राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय परन्तु इस पर इतिहासकारों में मतभेद है |
 |
| 5. नागदेव |
 |
| 6. बाएँ नीचे लक्ष्मी हाथ में कमल की डोर लिए हुए. कमल सबसे ऊपर है |
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| 7. भूदेवी के हाथ के ऊपर ब्रह्मा विराजमान हैं और और पास में है नंदी बैल जिस पर शिव सवार हैं |
 |
| 8. सबसे ऊपर यक्ष और आसमान से गंगा और यमुना उतरती हुई. गंगा अपने वाहन मकर पर और यमुना अपने वाहन कच्छप पर सागर की ओर जाती हुई |
 |
| 9. सागर देवता वरुण जिनके हाथ में कलश है |
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| 10. वाराह पर एक लम्बी वैजयन्ती माला है जो लम्बे युद्ध में विजय दर्शाती है |
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| 11. शेषशायी विष्णु |
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| 12. ग्राउंड फ्लोर की गुफा |
 |
| 13. गणेश |
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| 14. दुर्गा शक्ति - महिषासुरमर्दिनी |
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| 15. शंख लिपि जिसे अभी पूरी तरह से पढ़ा जाना बाकी है. यहाँ इस तरह के लेख की कई चट्टानें हैं |
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| 16. ये स्तम्भ शायद गुप्त काल के मंदिर का हिस्सा है. मंदिर तो अब नहीं है |
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| 17. सूर्य घड़ी |
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| 18. तवा गुफा का एक हिस्सा |
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| 19. उदयगिरी पहाड़ी के ऊपर जाने का रास्ता बना दिया गया है |
 |
20. वापिस उतरने का रास्ता
वाराह मंदिर खजुराहो
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में खजुराहो छोटा सा पर प्रसिद्ध शहर है जहां
सन 850 से लेकर लगभग सन 1150 तक चंदेल वंश का राज रहा है. इस दौरान चंदेल
राजाओं ने 85 सुंदर मंदिरों का निर्माण करवाया जिनमें 25 अभी भी बचे हुए
हैं. ये सभी मंदिर 1988 में विश्व धरोहर याने World Heritage Site में
शामिल किये गए थे.
खजुराहो के मंदिरों में एक मन्दिर वाराह का भी है जो की विष्णु का तीसरा
अवतार है. माना जाता है कि यह मन्दिर चंदेल राजाओं द्वारा सन 900 से 925 के
बीच बनवाया गया था. यह छोटा सा मंदिर एक ऊँचे चबूतरे पर बना हुआ है.
चबूतरे के ऊपर चौदह खम्बे हैं जिनके ऊपर पिरामिडनुमा मंडप है. पूरा मंदिर
बलुए पत्थर का बना हुआ है. वाराह की मूर्ति की लम्बाई 2.6 मीटर है और ऊँचाई
1.7 मीटर है. इस विशालकाय वाराह के शरीर पर कमाल की छोटी छोटी और सुंदर
मूर्तियाँ उकेरी गई हैं. गिनती में तो ये कई सौ होंगी.
पुरानी कथा के अनुसार एक दानव हिरण्याक्ष ने ब्रह्माण्ड में बहुत उत्पात
मचा रखा था. सभी देवी, देवता और दानव उससे त्रस्त थे. एक दिन उसने पृथ्वी
को हर लिया और रसातल में जलमग्न कर दिया. भगवान् विष्णु एक वाराह या जंगली
शूकर के रूप में आये और दोनों के बीच घमासान युद्ध हुआ जो एक हजार वर्षों
तक चला. अंत में विष्णु ने हिरण्याक्ष का वध कर दिया और अपने दांतों पर
पृथ्वी को उठा कर वापिस सही स्थान पर रख दिया. वाराह को केवल शूकर या एक
मानव जिसका सिर शूकर का है दोनों तरह से दिखाया जाता है. इस मंदिर में
जंगली शूकर का ही रूप दिखाया गया है. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
 |
| 1. सबसे आगे वीणा वादिनी सरस्वती |
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| 2. पैरों में अजगर |
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| 3. देवी देवता |
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| 4. देवी देवता |
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| 5. कमाल की कारीगरी |
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| 6. मंडप की छत पर कमल |
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7. स्कन्द पुराण में दिया गया वाराह मन्त्र - ऊँ नम: श्री वाराहाय धरण्युद्धारणाय स्वाहा:
दूल्हादेव मंदिर खजुराहो
मध्य प्रदेश का छोटा सा शहर खजुराहो अपने मंदिरों के कारण विश्व प्रसिद्द है. ये सभी मंदिर विश्व धरोहर - World Heritage Site में
आते हैं. भोपाल से खजुराहो की दूरी 380 किमी है और यह छतरपुर जिले का
हिस्सा है. खजुराहो की स्थापना करने वाले चन्देल राजा चंद्र्वर्मन थे
जिन्होंने इसे अपने राज्य की राजधानी बनाया था. चन्देल राजवंश ने लगभग
नौवीं शताब्दी से लेकर तेरहवीं शताब्दी तक बुंदेलखंड के कुछ हिस्सों और
उसके आस पास राज किया था. इस दौरान पहले राजधानी खजुराहो में बनी और फिर
महोबा में बना दी गई थी.
खजुराहो
के ज्यादातर मंदिर सन 850 से सन 1150 के बीच चंदेल राजाओं द्वारा बनवाए गए
थे. बीस वर्ग किमी में फैले क्षेत्र में पच्चासी मंदिरों का निर्माण हुआ
था जिनमें से केवल पच्चीस मन्दिर ही बचे हैं. इनमें से पहला मंदिर चौंसठ योगिनी मंदिर माना
जाता है जो 850 - 860 में बना और आखिरी मंदिर - दुलादेव मंदिर लगभग 1110 -
1125 में चंदेल राजा मदन वर्मन द्वारा बनवाया गया माना जाता है. दुलादेव
मन्दिर को दुल्हादेव मंदिर या फिर कुंवरनाथ मठ भी कहा जाता है. मंदिर पांच
फुट ऊँचे, 69 फुट लम्बे और 40 फुट चौड़े चबूतरे पर स्थापित है और भगवान शिव
को समर्पित है. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
 |
| 1. दुलादेव मंदिर का प्रवेश मंडप. चंदेल वंश के राजा मदनवर्मन की दें है ये शिव मंदिर |
 |
| 2. दुलादेव
मंदिर. मंदिर का काफी हिस्सा ढह गया है और पत्थर के बड़े बड़े ब्लाक एक दूसरे
पर फंस कर टिके हुए हैं. मंदिर का मुख पूर्व की ओर है. निर्माण का समय सन
1000 से 1150 तक के मध्य माना जाता है |
 |
| 3. पिछली ओर का
भाग कुछ बचा हुआ है. नीचे के पांच शिखरों में से बांये हाथ वाला सीधे सपाट
पत्थरों से पूरा किया गया है. पांच छोटे शिखरों पर तीन और उन के उपर तीन
और उनके ऊपर एक शिखर खूबसूरत तरीके से बनाया गया है |
 |
| 4. मंदिर के
गर्भ गृह में मूर्ति ना होकर शिवलिंग है. इसे भी खंडित मूल शिवलिंग की जगह
लगाया गया है. इसकी खासियत है के इस पर 999 छोटे छोटे शिवलिंग उकेरे गए
हैं. अर्थात एक परिक्रमा 1000 परिक्रमाओं के बराबर हो जाती है |
 |
| 5. खजुराहो के
दूसरे मंदिरों की तरह दुलादेव मंदिर की बाहरी दीवार पर तीन श्रंखलाओं में
मूर्तियाँ गढ़ी गई है. सबसे ऊपर उड़ते हुए मस्त युगल हैं. अप्सराएं हैं जो दो
या तीन के ग्रुप में स्वछन्द उड़ रही हैं. दूसरी लाइन में नंदी, शिव और
पार्वती हैं और तीसरी में कई राजा रानियाँ और शिव-पार्वती हैं. बीच बीच में
कामुक मूर्तियाँ भी हैं |
 |
| 6. बाहरी दीवार में शिव |
 |
| 7. पूरा मंदिर
एक सप्तरथ की तरह बना है और ऊँचे चबूतरे पर स्थित है जिस पर परिक्रमा की जा
सकती है. इस दीवार की मूर्तियाँ क्षतिग्रस्त हैं |
 |
| 8. मिथुन |
 |
| 9. सभी मूर्तियों में सुंदर और बारीक भाव भंगिमा और तरह तरह के जेवर हैं. इस तरह के आभूषण खजुराहो के मंदिरों की खासियत है |
 |
| 10. बीच में कामुक जोड़े |
 |
| 11. हर मूर्ति कुछ कहती है |
 |
12. भारी भरकम
पत्थर जरूर हैं पर उतनी ही महीन कारीगारी भी है. चाहे फूल पत्ते हों, जानवर
हों, पुरुष हों या महिलाएं बहुत सुंदर, बारीक और शानदार काम किया गया है.
पत्थरों के कोने, घुमाव, एक दूसरे में फासला बहुत ही नपा तुला और सटीक है.
ये सब कुछ एक हजार साल पहले बिना मशीन के! जितनी तारीफ़ की जाए उतनी ही कम
है
चतुर्भुजा मंदिर, खजुराहो
मध्य प्रदेश का छोटा सा शहर खजुराहो अपने मंदिरों के कारण विश्व प्रसिद्द
है. भोपाल से इसकी दूरी 380 किमी है और यह छतरपुर जिले का हिस्सा है.
खजुराहो के संस्थापक चन्देल राजा चंद्र्वर्मन थे जिन्होंने इसे अपने राज्य
की राजधानी बनाया था. चन्देल राजवंश ने लगभग नौवीं शताब्दी से लेकर तेरहवीं
शताब्दी तक बुंदेलखंड के कुछ हिस्सों और उसके आस पास राज किया. इस दौरान
पहले राजधानी खजुराहो में बनी और फिर महोबा में बना दी गई थी.
खजुराहो के ज्यादातर मंदिर सन 850 से सन 1150 के बीच चंदेल राजाओं द्वारा
बनवाए गए थे. बीस वर्ग किमी में फैले क्षेत्र में पच्चासी मंदिरों का
निर्माण हुआ था जिनमें से केवल पच्चीस मन्दिर ही बचे हैं. इनमें से पहला
मंदिर चौंसठ योगिनी मंदिर माना जाता है जो 850 - 860 में बना और आखिरी मंदिर - दुलादेव मंदिर लगभग 1110 - 1125 में बना माना जाता है.
चतुर्भुजा मंदिर खजुराहो के दक्षिण में तीन किमी दूर गाँव जटकारा में है
जिसके कारण इस मंदिर को जटकारी मंदिर भी कहा जाता है. इस मंदिर का निर्माण
का श्रेय चंदेल राजा लक्षवर्मन को दिया जाता है. इन्टरनेट में कहीं कहीं
मंदिर बनवाने वाले राजा का नाम यशोवर्मन भी लिखा हुआ है परन्तु यशोवर्मन का
राज 925 से 950 तक रहा था. इस अंतर को इतिहासकार ही बता सकते हैं.
चतुर्भुजा मंदिर खजुराहो का अकेला ऐसा मंदिर है जिसमें मिथुन या कामुक
मूर्तियों का अभाव है. दूसरे मंदिरों की तरह इस मंदिर की बाहरी दीवारों पर
भी मूर्तियों की तीन श्रंखलाएं हैं जिसमें अप्सराएं, विद्याधर और भगवान् की
मूर्तियाँ हैं. ये मूर्तियाँ भी उतनी ही खूबसूरत हैं जैसे की खजुराहो के
अन्य मंदिरों में हैं. पर एक्सपर्ट्स का कहना है कि इन मूर्तियों में भाव
भंगिमा कम हैं. इस मंदिर में गर्भगृह से पहले का मंडप या अर्ध मंडप और
मुख्य मूर्ति की परिक्रमा नहीं बनी हुई है. चतुर्भुजा मूर्ति का रुख भी
दक्षिण की ओर है. बाहरी दीवार पर कई मूर्तियाँ अधूरी भी रह गई हैं. सन 1125
के आसपास का ये समय चंदेल वंश के सूर्यास्त का दौर था.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
 |
| 1. ऊँचे चबूतरे पर बना चतुर्भुजा मंदिर |
 |
| 2. प्रवेश द्वार. आम तौर पर मंदिर पूर्वमुखी होते हैं पर इस मंदिर का प्रवेश दक्षिण की ओर है |
 |
| 3. नौ फुट ऊँची
चतुर्भुजा विष्णु की मूर्ति. वहां के पुजारी के अनुसार ये त्रिदेव मूर्ति
है और इसमें शिव, विष्णु और कृष्ण तीनों का समावेश है. मुकुट से ऊपर शिव की
जटाएं हैं, चार भुजाएं विष्णु की हैं और दो टांगों पर खड़े होने का विशेष
अंदाज़ बंसी बजाते कृष्ण का है |
 |
| 4. मूर्ति का ऊपरी भाग. मुकुट के ऊपर जटाएं भी हैं |
 |
| 5. मंदिर की बाहरी दीवार पर मूर्तियों की तीन श्रृंखलाएं |
 |
| 6. इस मंदिर
में खजुराहो के अन्य मंदिरों की तरह मिथुन या कामुक मूर्तियाँ नहीं हैं. पर
पुरुष हो या महिला साज सज्जा, स्टाइल और जेवरों में कोई कमी नहीं है |
 |
| 7. कुछ टूटे हुए हिस्से सादे सपाट पत्थर लगाकर दुरुस्त कर दिए गए हैं |
 |
8.अर्धनारीश्वर
साँची के स्तूप -1/2
गौतम बुद्ध का परिनिर्वाण अस्सी वर्ष की आयु में ईसा पूर्व सन 483 में हुआ
था. गौतम बुद्द के अंतिम संस्कार के बाद उनके अवशेषों को आठ भागों में बाँट
कर आठ स्तूपों में राजगृह, वैशाली, कपिलवस्तु, अल्लाकप्पा, पावानगर,
कुशीनगर, रामग्राम और वेथापिडा में दबा दिया गया. दो अन्य स्तूपों में
कलशों में भस्म दबा दी गई.
समय गुज़रा और मौर्य शासन की बागडोर सम्राट अशोक के हाथ आ गई. सम्राट अशोक
ने ईसा पूर्व सन 273 से ईसा पूर्व सन 232 तक राज किया. अशोक ने इस दौरान
कलिंगा राज्य पर बड़ी जीत हासिल की, पर युद्ध के भयानक विनाश से दुखी होकर
गौतम बुद्ध के बताए मध्य मार्ग की शरण ली. बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए
चौरासी हज़ार स्तूप, स्तम्भ, विहार और शिलालेख बनवाए. बौद्ध संघों में सुधार
करवाया और गौतम बुद्ध के अवशेषों को पुनर्स्थापित करवाया. रामग्राम के
स्तूप को छोड़ बाकी स्थानों से बुद्ध के अवशेषों को नए शहरों और सुदूर
स्थानों में बनाए गए नए स्तूपों में स्थापित करवाया.
अशोक के सम्राट बनने से पहले उनके पिता महाराजा बिन्दुसार ने अशोक को
विदिशा का गवर्नर नियुक्त किया था. विदिशा उस समय का एक समृद्ध व्यापारिक
केंद्र था. यहाँ के एक व्यापारी की बेटी विदिशा देवी से सम्राट अशोक की
शादी भी हुई थी. दूसरी बात यह की विदिशा के पास साँची में बौद्ध संघ भी थे.
इसलिए सम्राट अशोक ने साँची में मुख्य स्तूप बनवाकर गौतम बुद्ध के कुछ
अवशेषों को यहाँ स्थापित करवाया.
मुख्य स्तूप जिसे स्तूप नम्बर 1 भी कहते हैं सम्राट अशोक द्वारा ईसा पूर्व
तीसरी शताब्दी में बनाया गया था. गौतम बुद्ध के अवशेष इंटों से बने गोलाकार
छोटे स्तूप में रखे गए थे. ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में इसका पत्थर लगा कर
विस्तार किया गया और ऊपर चपटा कर के छतरी रखी गई. स्तूप की उंचाई 54 फुट
है और व्यास 120 फुट. सातवाहन वंश के समय तोरण और परिक्रमा जोड़ी गईं. लगभग
बारहवीं शताब्दी तक यहाँ के स्तूपों में कुछ न कुछ विस्तार होता रहा और
मंदिर भी बने. इसके बाद संभवत: यह जगह उपेक्षित रही, मूर्तियों को नुक्सान
हुआ और ये जगह जंगल में खो गई.
सन 1818 में ब्रिटिश जनरल टेलर ने पहली बार इन स्तूपों का वर्णन किया पर तब
भी पुनर्स्थापना का काम नहीं हुआ. 1912 से 1919 तक इस जगह को पुरात्तव
विभाग - ASI ने सर जॉन हुबर्ट मार्शल के नेतृत्व में फिर से विकसित करने का
प्रयास किया. 1989 में इसे विश्व धरोहर या World Heritage Site का दर्जा मिला. अब यहाँ एक म्यूजियम भी है और इस स्थान का रख रखाव सुंदर है.
भोपाल से साँची 46 किमी दूर है और विदिशा से 10 किमी. आने जाने के लिए बसें
और टैक्सी उपलब्ध हैं. साँची और विदिशा में हर तरह के होटल उपलब्ध हैं.
साँची का यह विश्व धरोहर सुबह से शाम तक खुला है और गाइड मिल जाते हैं.
पार्किंग की जगह है और एक छोटा सा रेस्तरां भी है. ढाई हजार साल पहले के
जीवन की झलक जरूर देख कर आएं. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
 |
| 1. मुख्य स्तूप के चार दिशाओं में सुंदर नक्काशीदार चार तोरण या गेट हैं जो कि साँची स्मारकों की पहचान बन चुके हैं |
 |
| 2. गौतम बुद्ध
के अवशेषों का प्रमुख स्तूप. पाली में स्तूप को थुपा, संस्कृत में स्तूप,
चीनी में शेलिता, जापानी में शरितो, कोरियाई में सोडोल्फा और मंगोलिन भाषा
में सुवर्गा कहते हैं. सबसे ऊपर क्षत्रप या छतरी है. छत के बाएँ हिस्से में
किया हुआ दो हज़ार साल से ज्यादा पुराना पलस्तर अभी भी कायम है |
 |
| 3. तोरण चौकोर
खम्बों पर टिके हुए हैं और पत्थरों को एक दुसरे में फंसा दिया गया है.
खम्बों पर चारों तरफ सुंदर नक्काशी हैं जिनमें उस समय की घटनाएं, जातक
कथाएँ, पशु, पक्षी, पेड़ पौधे वगैरा उकेरे गए हैं. इनमें हाथियों पर सवार
महावत महिलाएं भी हैं |
 |
| 4. खम्बे पर
उकेरा गया लुम्बिनी का एक दृश्य. कुछ लोग काम पर जा रहे हैं और कुछ
खिड़कियों और झरोखों में बातचीत कर रहे हैं. ऊपर बाएँ कोने में एक गर्भवती
महिला लेटी हुई है. वह रानी महामाया है और प्रजा बच्चे के जन्म की सूचना
आने की इंतज़ार में हैं. |
 |
| 5. ऊपर वाले
चित्र नम्बर 4 का एडिट किया हुआ भाग. राजमहल में गर्भवती रानी महामाया सपने
में ऐरावत हाथी देख रही हैं. सिद्धार्थ के जन्म लेने का समय आ गया है |
 |
| 6. गौतम बुद्ध
के प्रवचन सुनने के लिए साधक बैठे हैं. बीच में वट वृक्ष है और खाली स्थान
बुद्ध का आसन है. पूरे परिसर में मूर्तियों की नक्काशी बहुत है पर बुद्ध का
केवल आसन ही बनाया गया कोई मूर्ति नहीं बनाई गई है. और जैसा कि हर क्लास
या गोष्ठी में होता है निचली लाइन में तीन साधक बैक-बेन्चर्स की तरह बतिया
भी रहे हैं |
 |
| 7. महल से राजा
की सवारी निकल रही है. माना जाता है की ये दृश्य राजा बिम्बिसार का है जो
राजगृह से गिद्धकूट पर्वत की ओर जा रहा था जहां गौतम बुद्ध विराजमान थे |
 |
| 8. कुछ विदेशी शायद ग्रीक संगीतकार हैं यहाँ. इनका पहनावा, जूते, चेहरे, सिर के कपड़े, ढोल और वाद्ययंत्र बिलकुल अलग हैं |
 |
| 9. गाँव का एक
सुंदर दृश्य. ऊपर बाएँ कोने में पति पत्नी बतिया रहे हैं. पास में एक महिला
कूट रही है, दूसरी कुछ पीस रही है और तीसरी सूप से छटाई कर रही है. दाईं
ओर दो महिलाएं बालकनी में बैठी बतिया रही हैं. एक खाली आसन गौतम बुद्ध का
है जिसके पीछे दो पुरुष हाथ जोड़े खड़े हैं. नीचे दाहिनी ओर एक महिला पौधों
में मटके से पानी डाल रही है |
 |
| 10. फूल, पत्ते और लताओं का सुंदर चित्रण |
 |
| 11. खम्बे पर नक्काशी. गौतम बुद्ध के चरण, उनमें चक्र और सुंदर फूल मालाएं |
 |
| 12. अभिलेख |
 |
| 13. छोटे साधकों के स्तूप |
 |
| 14. शेर का एक सिर है पर शरीर दोनों तरफ हैं |
 |
| 15. कुछ अन्य अरहंतों के स्तूप |
 |
17. यहाँ एक
बौद्ध विहार या मोनेस्ट्री थी. आप देख सकते हैं की ये जगह सुंदर और शांत है
और पहाड़ियां बहुत ऊँची नहीं हैं. पास में ही नदी भी है और जमीन उपजाऊ है.
साधकों के लिए बहुत अच्छी जगह रही होगी
चौंसठ योगिनी मंदिर, खजुराहो
योग पुरुष करे तो योगी और महिला करे तो योगिनी! पर ये चौंसठ योगिनी का क्या
अर्थ है ये नहीं समझ आया. ऐसी मान्यता है की ये चौंसठ योगिनियाँ पार्वती
की सखियाँ थी और शिव भक्त थीं. इनके मन्दिर भी अलग तरह के हैं जिनके बारे
में पूरी पूरी ऐतिहासिक जानकारी अभी तक नहीं मिली है.
बताया जाता है की चौंसठ योगिनियों का सम्बन्ध तंत्र विद्या से है. चौंसठ
में से आठ मुख्य योगिनियाँ हैं : 1. सुर-सुंदरी 2. मनोहरा 3. कनकवती 4.
कामेश्वरी 5. रति-सुंदरी 6. पद्मिनी 7. नतिनी और 8. मधुमती. वैसे सभी 64
योगिनियों के नाम और गुण अलग अलग हैं, उनके 64 अलग अलग मन्त्र हैं और 64
अलग अलग ही भजन भी हैं. आप गूगल करें तो इस विषय पर बहुत कुछ मिलेगा.
भारत में पिछले लगभग दो सौ सालों से इन मंदिरों का नाम आगे आया है. चौंसठ योगिनी मंदिर कई स्थानों पर मिले हैं जैसे कि मितावली जिला मोरेना,
हीरापुर ओडिशा, रानीपुर ओडिशा, खजुराहो और भेड़ाघाट जबलपुर. खजुराहो के
चौंसठ योगिनी मन्दिर को छोड़ कर बाकी सभी मंदिर गोलाकार हैं. बड़े गोले में
चौसठ छोटे छोटे मंदिर या कोष्ठ - cell हैं और उनके दरवाज़े बीच में खुलते
हैं. गोले के बीच में छोटा मंदिर है जिसमें या तो शिव की मूर्ति है या फिर
शिवलिंग स्थापित है. गोलाकार मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व में है जैसा की
आम मंदिरों में होता है. केवल खजुराहो का मंदिर आयताकार है और खजुराहो के
सबसे पुराने मंदिरों में से एक है.
खजुराहो का चौंसठ योगिनी मंदिर शिव सागर के पास है. यह एक 5.4 मीटर ऊँची
जगती या प्लेटफार्म पर बना हुआ है. 31.4 मीटर गुणा 18.3 मीटर के आयत में
फैला हुआ है. बाहरी दीवार में 65 कोष्ठ बने हुए थे जिनमें से अब 35 ही बचे
हैं. ये कोष्ठ केवल एक मीटर ऊँचे और एक ही मीटर गहरे हैं. इनमें से एक
कोष्ठ बड़ा और उंचा है जो सम्भवत: दुर्गा मंदिर रहा होगा. पूरे मंदिर में
बड़े बड़े चौरस और आयताकार अनघड़ या रफ़ पत्थरों को इस्तेमाल किया गया है.
खजुराहो के पश्चिमी मंदिरों से यहाँ पैदल भी जा सकते हैं. कोई टिकट नहीं है
और कोई गाइड भी नहीं मिला हमें. कोई सज्जन वहां पूजा करवा रहे थे उन्होंने
ही जानकारी दी. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
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| 1. छोटे छोटे 65 कोष्ठ या चैम्बर थे जिनमें से 35 बचे हैं |
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| 2. इन छोटे कोष्ठों में फिलहाल कुछ भी नहीं है |
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| 3. पीछे खजुराहो के पश्चिमी मंदिर नज़र आ रहे हैं |
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| 4. एक उंचा मंदिर जो शायद दुर्गा मंदिर रहा होगा . इसी में पूजा हो रही थी |
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| 5. बाहरी दीवार |
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| 6. प्रवेश के लिए सीढियां |
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7. मंदिर के सामने मैदान में भी कुछ है. संरक्षण की सख्त जरूरत है
ग्वालियर का किला
ग्वालियर का किला ग्वालियर शहर के पास एक ऊँची पथरीली पहाड़ी पर है. पहाड़ी
आसपास के मैदान से सौ मीटर ऊँची है और इसका नाम गोपाचल पहाड़ी है. गेरुए लाल
रंग के बलुए पत्थरों से बना किला तीन वर्ग किमी में फैला हुआ है. दीवारों
की लम्बाई दो मील है. किले की अंदरूनी चौड़ाई दो सौ मीटर से लेकर एक हज़ार
मीटर तक है. किले के अंदर मंदिर, महल, पानी के तालाब, जेल और अब म्यूजियम
भी है.
ये किला कब बनाया गया और किसने बनवाया इसकी पक्की जानकारी नहीं है. माना
जाता है की छठी शताब्दी में यहाँ मूल रूप से किला बना था. किले से
सम्बन्धित नवीं और दसवीं शताब्दी के सम्बन्धित अवशेष भी मिले हैं जिससे
लगता है की किला तब भी मौजूद था.
किले के बारे में एक किस्सा मशहूर है कि राजा सूरज सेन इस पहाड़ी पर पीने के
लिए पानी ढूँढ रहे थे. उन्हें एक संत ग्वालिपा ( कहीं कहीं ऋषि गलवा भी
लिखा हुआ है ), नज़र आये जो उन्हें सूरज कुंड तक ले गए. राजा ने पानी पिया
तो उनकी प्यास तो बुझी ही साथ में उनके शरीर का कोढ़ भी दूर हो गया. राजा ने
यहाँ किला बनवाया और उसका नाम ग्वालियर किला रख दिया.
भारत में बने दूसरे किलों की तरह यह किला भी कई शासकों के आधीन रहा. कई राजाओं ने हमले किये और कई राजाओं ने इसे बनाया संवारा.
दसवीं शताब्दी में यहाँ कच्छपघात राजा राज कर रहे थे.
1022 में महमूद ग़ज़नी ने किले पर चार दिन का कब्ज़ा जमाए रखा और 35 हाथियों के बदले किला खाली किया.
1196 में कुतुबद्दीन ऐबक ने किला कब्जा लिया.
1232 में किला इल्तुतमिश के हाथ में चला गया.
1398 में यहाँ तोमर वंश ने अधिकार जमा लिया. तोमर वंश में राजा मान सिंह
तोमर का नाम बहुत प्रसिद्द है. मान सिंह ने यहाँ किले में मान मंदिर महल और
अपनी गूजर रानी मृगनयनी के लिए गुजरी महल बनवाया.
1516 में इब्राहिम लोदी के हमले में राजा मान सिंह हार गए और मारे गए.
1526 में बाबर ने किला हथिया लिया.
1542 में शेर शाह सूरी ने किला जीत लिया. सूरी सल्तनत के जनरल हेमू या हेमचन्द्र ने यहाँ किलेदारी की.
1558 में अकबर ने किला जीत लिया.
1707 में औरंगजेब के मरने के बाद ग्वालियर किले पर गोहद राणा छतर सिंह ने
कब्जा कर लिया. टैक्स वसूली के झगड़े में मराठा सेनापति ने छतर सिंह पर हमला
बोल कर किला वापिस ले लिया.
1780 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने किला जीत लिया पर गोहद के राणा को वापिस कर दिया.
1784 में शिन्दे ने फिर से राणा छतर सिंह से किला जीत लिया.
1808 से 1844 के बीच किले पर कभी अंग्रेजों का और कभी मराठों का अधिकार
रहा. 1844 में किला अंग्रेजों ने अपने संरक्षण में शिंदे ( या सिंदिया )
परिवार को दे दिया.
1857 में जब स्वाधीनता संघर्ष का बिगुल बजा तो किले के फौजियों ने
अंग्रेजों के खिलाफ 'बगावत' कर दी. पर जयाजी शिंदे अंग्रेजों के खिलाफ नहीं
गए.
1858 में फिर से किले पर अंग्रेजों ने अधिकार जमा लिया.
1886 तक अंग्रेजों की हालत उत्तर भारत में काफी मजबूत हो गई थी और उन्हें
अब किले की जरूरत नहीं रही थी. किला एक बार फिर से सिंदिया परिवार को दे
दिया गया. सिंदिया परिवार ने किले में काफी काम कराए और 1947 तक किला
उन्हीं के पास रहा.
ग्वालियर का सालाना तापमान 5 डिग्री से लेकर 46 डिग्री तक हो सकता है.
अक्टूबर से मार्च तक का समय किला देखने के लिए आरामदेह है. यहाँ दोपहर की
धूप तीखी है और पथरीली सतह के कारण गर्मी तेज़ हो जाती है. किले में पैदल
जाने के लिए ग्वालियर गेट है. गाड़ी ले जानी हो तो उरवाई गेट से ले जा सकते
हैं. पर गेट से पहले सड़क बहुत संकरी है और चढ़ाई अचानक आ जाती है इसलिए गाड़ी
सावधानी से चलानी होगी.
पार्किंग और किले के अंदर जाने का टिकट है जो सभी स्मारकों में मान्य है.
अंदर छोटा सा रेस्टोरेंट भी है. किले के अलावा आप उसी टिकट में सहस्त्रबाहू मंदिर, तेली का मंदिर और गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़ भी देख सकते हैं.
अपनी रूचि के मुताबिक किले में चार पांच घंटे भी लगा सकते हैं या फिर दो
तीन दिन भी. ग्वालियर शहर में रोड, रेल या हवाई जहाज से आसानी से पहुंचा जा
सकता है. सभी तरह के होटल और सुविधाएं उपलब्ध हैं.
प्रस्तुत हैं किले की कुछ फोटो:
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| 1. ग्वालियर का किला. किले के बाएँ बुर्ज का ऊपर वाला हिस्सा तोप के गोलों से नष्ट हो गया था |
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| 2. किले का मुख्य प्रवेश द्वार |
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| 3. किले की वास्तु हिन्दू शैली में है. नीली टाइलें विदेशी बताई जाती है. इनका रंग अब फीका पड़ रहा है |
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| 4. किले के क्षतिग्रस्त भाग को सीधे सपाट लाल पत्थरों से ढक दिया गया है |
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| 5. अंदर महल में सुंदर झरोखे और नक्काशी |
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| 6. लाल बलुए पत्थर पर शानदार कारीगरी |
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| 7. तहखाना यहाँ रानियों के रहने का इंतजाम था. हवा के लिए रोशनदान और नहाने के लिए पानी का बड़ा हौज़ था जो अब कवर कर दिया गया है |
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| 8. रनिवास के झरोखे, नक्काशीदार खम्बे |
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| 9. छत पर की गई शानदार नक्काशी |
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| 10. फर्श के कुछ पत्थरों में फूल पत्ते भी हमेशा के लिए स्थापित हैं |
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| 11. सुंदर कारीगरी |
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| 12. राजा रानी का बेडरूम और आगे का दालान |
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| 13. बेडरूम.
बेडरूम के तीन ओर परिक्रमा बनी हुई है. इस परिक्रमा में अगर सीधे खड़े होकर
चलेंगे तो कुछ नहीं दिखेगा. अलार्म बजाने के लिए दासियां पैर में घुंघरू
बाँध कर इस परिक्रमा से निकलती थी. |
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| 14. गाइड आपकी भी इस तरह की फोटो खींच देगा |
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| 15. तहखाने का एक और कमरा |
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| 16. जहाँगीर महल का वरांडा |
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| 17. किले से नज़र आता शहर |
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| 18. गोपाचल पहाड़ी पर बना किला. इस किले की दीवारें पहाड़ी के सिरे पर बनाई गई हैं. इसलिए एकसार ना होकर आड़ी तिरछी हैं |
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| 19. किले का दूसरा छोर और शहर. किले की दीवार की लम्बाई लगभग दो मील है |
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| 20. किले से नीचे जाने का रास्ता |
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| 21. ब्रिटिश तोप |
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| 22. जौहर
कुण्ड. इस कुण्ड में लकडियाँ डाल कर आग जला दी जाती और बहुत सी रानियाँ और
विवाहित औरतें यहाँ कूद पड़ती थी. कुण्ड में से बाहर निकलने का कोई रास्ता
नहीं है |
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| 23. करण महल |
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| 24. किले का
जेल. अकबर और औरंगजेब ने यहाँ अपने विरोधियों को बंदी बना कर रखा था.
जहाँगीर ने सिखों के छठे गुरु हरगोबिंद सिंह जी महाराज को इस जेल में बंद
कर रखा था |
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| 25. सहस्त्रबाहू मंदिर की एक झलक |
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| 26. म्यूजियम का प्रवेश. किले और ग्वालियर के आसपास के इलाकों में पाई गई मूर्तियाँ और अन्य अवशेष यहाँ रखे हुए हैं |
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| 27. किले में
एक छोटा सा नौवीं सदी का चतुर्भुज मंदिर है जहाँ एक अभिलेख में ज़ीरो या
शून्य का 'इस्तेमाल' किया गया है जैसे की पचास - '50' मालाएं. पहले ये ज़ीरो
का प्राचीनतम लेख माना जाता था. परन्तु कुछ समय पहले बख़शाली, पेशावर में
सन 224 - 383 की पेड़ की छाल पर लिखी पाण्डुलिपि मिली है जिसमें शून्य का
प्रयोग मिला है |
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28. उरवाई गेट से किले की ओर जाती सड़क और ऊपर नज़र आता किला
दतिया महल
दतिया शहर ग्वालियर से 75 किमी दूर है और बुन्देलखण्ड क्षेत्र का एक
ऐतिहासिक नगर है. इस इलाके में बुंदेला राजपूत राजाओं का राज रहा है तभी ये
क्षेत्र बुंदेलखंड कहलाता है. इन बुंदेला शासकों में से राजा बीर सिंह देव
का नाम बहुत मशहूर है. राजा बीर सिंह देव ने दतिया और आसपास बावन बड़ी
इमारतें बनवाई जिनमें दतिया महल भी शामिल है.
दतिया महल को बीर सिंह महल या जहांगीर महल भी कहा जाता है. राजा बीर सिंह
देव और शहज़ादा सलीम में अच्छी दोस्ती थी पर सलीम के पिता बादशाह अकबर अपने
बेटे सलीम से खफ़ा थे. अकबर ने अपने विश्वस्त अबुल फज़ल को अचानक दक्षिण की
मुहीम से तुरंत वापिस आने का सन्देश भेजा. शहजादा सलीम को अबुल फज़ल का आना
नागवार गुज़रा. शहजादे ने राजा बीर सिंह देव को अपने साथ मिला लिया. अबुल
फज़ल 1602 में जब वापिस आ रहा था तो रास्ते में राजा बीर सिंह देव से हमला
करवा कर मरवा दिया. बदले में शहजादे सलीम से राजा बीर सिंह देव की दोस्ती
और पक्की हो गयी. सलीम बाद में जहाँगीर के नाम से गद्दी पर बैठा. राजा बीर
सिंह देव ने जहांगीर के सम्मान में सात मंजिला जहांगीर महल या दतिया महल
1614 - 1622 में बनवाया हालांकि जहांगीर कभी इस महल में नहीं आया और ना
राजा बीर सिंह देव का परिवार इसमें कभी रहा.
यह विशाकाय महल अस्सी मीटर चौड़ा और अस्सी मीटर लम्बा है. चट्टानी पहाड़ी पर
बने महल की पांच मंजिलें ऊपर हैं और दो मंजिलें नीचे तहखाने में हैं. महल
के बीच का बुर्ज पैंतीस मीटर ऊँचा है. महल बनाने में लकड़ी या लोहे का
इस्तेमाल नहीं किया गया है. महल की बनावट में इस्लामी और बुन्देली वास्तु
का मेलजोल है.
ग्वालियर से झाँसी जाते हुए राष्ट्रिय राजमार्ग 44 पर दूर पहाड़ी पर ये महल
नज़र आ रहा था. ये कौन सा महल या किला है ऐसी जानकारी हमें नहीं थी. पर फिर
भी हमने गाड़ी उस तरफ मोड़ ली कि चलो इस इमारत को भी देखते चलते हैं. इस
शानदार महल को गन्दी सी बस्ती ने घेर रखा है. खुली नालियां, तंग गलियाँ
जिनमें सूअर, कुत्ते, बकरियां और गाय घूम रहे थे. छोटे छोटे मकान थे जो कुल
मिलकर गैर कानूनी अतिक्रमण ही लग रहा था. ऐसा लगा कि लोग इस महल को देखने
नहीं आते? या कोई और रास्ता रहा होगा जिसका हमें पता नहीं लगा. खैर गाड़ी
दूर खड़ी कर के पैदल गेट तक पहुँच गए. कोई टिकट नहीं और कोई गाइड नहीं था.
कुछ लोग महल की ड्योढ़ी में पत्ते खेल रहे थे. उनमें से एक महल दिखाने के
लिए तैयार हो गया. दो मंजिलों तक चमगादड़ों और कबूतरों ने कब्ज़ा किया हुआ है
और अगर आप इन दो मंजिलों की बदबू और अँधेरा बर्दाश्त कर लें तो ऊपर की तीन
मंजिलों में हवा और रौशनी है और बाहर का नज़ारा भी अच्छा है.
शानदार महल को बनाने में नौ साल का समय और तब का पैंतीस लाख रूपये लगा और
हम हैं की इतनी कीमती धरोहर को संभाल भी नहीं पा रहे! ऐतिहासिक खज़ाना है इस
बुंदेलखंड क्षेत्र में पर रख रखाव बस राम भरोसे है. मध्य प्रदेश में जिन
स्थानों की विश्व धरोहर होने की घोषणा हो गई है जैसे खजुराहो या भीमबेटका
वहां तो व्यवस्था ठीक है और दूसरे स्मारकों और किलों महलों की हालात खराब
ही लगी. इसके विपरीत कर्णाटक, महांराष्ट्र, तमिलनाडु और केरल में स्मारकों
की व्यवस्था बेहतर लगी.
बहरहाल प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
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| 1. सात मंजिला महल. सात मंजिलों के कारण इसे सतखंडा महल भी कहते हैं |
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| 2. महल की दूसरी मंजिल से नज़र आता शहर और झील |
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| 3. मेहराब |
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| 4. दूसरी मंज़िल की सीढ़ी |
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| 5. पुरानी जेल |
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| 6. महल और महल जाने का रास्ता |
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| 7. महल की एक साइड |
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8.महल की चारदीवारी और बाद में बना मंदिर
बीजामंडल, विदिशा
विदिशा भारत के प्राचीनतम शहरों में से एक है. मध्य प्रदेश में स्थित
विदिशा की भोपाल से दूरी 56 किमी है और ग्वालियर से 370 किमी है. विदिशा
बेतवा नदी के पूर्व में है और साँची से नौ किमी की दूरी पर है.
विदिशा ईसा पूर्व छठी और पांचवीं शताब्दी में एक महत्वपूर्ण व्यापारिक
केंद्र था. पाली ग्रंथों में भी विदिशा का जिक्र आया है. अशोक के सम्राट
बनने से पहले उनके पिता राजा बिन्दुसार ने अशोक को विदिशा का गवर्नर बनाया
था. सम्राट अशोक की पत्नी विदिशा देवी यहीं विदिशा की रहने वाली थी. इसके
अलावा विदिशा में ग्रीक राजदूत हेलिओडोरस
- Heliodorus द्वारा ईसा पूर्व 113 में बनवाया गया एक खम्बा मौजूद है जो
की विष्णु मंदिर का हिस्सा था. मंदिर तो अब नहीं है पर उसके कुछ प्रमाणिक
अवशेष मिले हैं.
जैसा की भारत में अन्य जगहों पर हुआ है यहाँ भी प्राचीन काल से राजनैतिक
उथल पुथल चलती रही है. यहाँ मौर्य, नाग, शुंग, गुप्त, सतवाहन, परमार, मुग़ल,
मराठा, सिंदिया और ब्रिटिश राज रहा है. धार्मिक नज़र से देखें तो यहाँ के
इलाके में बौद्ध, जैन और हिन्दू मूर्तियाँ, मंदिर और गुफाएं हैं. इतिहास का
धनी क्षेत्र है और विस्तार से खोज बीन की अपेक्षा रखता है.
विदिशा में एक मंदिर का निर्माण पहले पहल आठवीं शताब्दी में हुआ बताया जाता
है जिसे अब बीजामंडल के नाम से जाना जाता है. सन 1094 - 1133 के दौरान
मंदिर का पुनर्निर्माण राजा नरवर्मन द्वारा कराया गया था. 1233-34 में
गुलाम वंशी सुलतान इल्तुतमिश ने हमला किया और लूटपाट की. 1250 में मंदिर का
पुनर्निर्माण हुआ परन्तु 1293 में अलाउद्दीन खिलजी के मंत्री मालिक काफूर
ने लूट खसोट की. 1532 में बहादुर शाह ( गुजरात सल्तनत ) और 1682 में
औरंगजेब के हमलों में मंदिर को काफी नुकसान पहुंचा. मंदिर का नाम आलमगीर
मस्जिद हो गया. मंदिर के पत्थरों से मीनारें बनी. 1760 में पेशवा ने मस्जिद
हटा दी. बाद में फिर बन गई. 1971-74 की खुदाई के दौरान यहाँ
महिषासुरमर्दिनी और गणेश की मूर्तियाँ मिलीं. 1991 में तेज़ और भारी वर्षा
के कारण मस्जिद का काफी भाग गिर गया और एक बार फिर खुदाई में मूर्तियाँ
निकलीं.
मंदिर के चबूतरे में लगे भारी भरकम पत्थरों से लगता है कि मंदिर विशालकाय
रहा होगा. एक स्तम्भ पर खुदे अभिलेख के अनुसार यह मंदिर चर्चिका देवी का
था. इस देवी का दूसरा नाम शायद विजया या बिजया देवी था जिससे इस मंदिर का
नाम बिजया मंदिर कहा गया. कालान्तर में यह बीजामंडल कहलाने लगा.
कुल मिलाकर मंदिर के नाम, निर्माण के समय और निर्माण कराने वालों के बारे
में कयास ज्यादा हैं और ये कितने सही हैं पता नहीं. पुराने समय में लिखित
रिकॉर्ड तो रखा नहीं जाता था. मंदिर में संस्कृत में खुदे कुछ अभिलेख मिले
हैं जिनमें तारीख नहीं है. बहरहाल साँची जाएं तो बीजा मंडल जरूर देख कर
आएं.
इस विषय पर और अधिक जानकारी के लिए आप B. L. Nagarch का खोजी लेख Bijamandal or Vijiyamandira, Vidisha: A Study पढ़ सकते हैं या फिर इन्टरनेट में खोज कर सकते हैं.
कुछ फोटो प्रस्तुत हैं:
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| 1. बीजामंडल मंदिर और मीनार |
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| 2. खुदाई में प्राप्त कुछ मूर्तियाँ |
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| 3. एक नक्काशीदार स्तम्भ |
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| 4. बगीचे में रखे कुछ अवशेष |
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| 5. देवियों का सुंदर पैनल |
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| 6. मंदिर का ऊँचा और बड़ा प्रवेश द्वार |
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| 7. कुछ और अवशेष |
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| 8. बाद में बनी मेहराब |
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| 9. छत पर भी बहुत सा सामान ताले में बंद पड़ा है |
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| 10. बगीचा |
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| 11. भारी भरकम और ऊँचा प्लेटफार्म. देख कर लगता है की मंदिर विशाल रहा होगा |
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| 12. मंदिर के आसपास घनी बस्ती है. अगर कार से जाएं तो पार्किंग मिलना मुश्किल है |
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| 13. खम्बे और पैनल |
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14. बहुत सी मूर्तियाँ 2002 से शेड में बंद हैं पता नहीं कब खुलेंगीं
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15. मंदिर का बायाँ भाग
गुजरी महल ग्वालियर
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| गुजरी महल, ग्वालियर |
आप महल देखने जाएं या किला, किस्से कहानियां जरूर सुनने को मिलेंगे. राजा
लोगों के पास दौलत थी, ताकत थी और रानियों के पास समय था. ऐसे में प्यार
मोहब्बत के किस्से, छोटी बड़ी घटनाएं और वारदातें होती ही रहती थीं. पिछले
दिनों ग्वालियर का किला देखने गए तो वहां से नीचे देखने पर बड़ी सी इमारत
नज़र आई. गाइड ने बताया कि वो बिल्डिंग गुजरी महल है. गाइड से पूछा की किले
से बाहर महल क्यूँ बनाया गया था? जवाब में गुजरी महल का किस्सा उसने कुछ इस
तरह सुनाया:
पंद्रहवीं सदी के आसपास ग्वालियर पर तोमर वंश का राज था. तोमर या तंवर लोग
अपने को चंद्रवंशी राजपूत मानते हैं. 1486 में ग्वालियर की राज गद्दी पर
मान सिंह तोमर विराजमान हुए. मान सिंह प्रतापी राजा थे. युद्ध कला में
निपुण, संगीत और वास्तु में दिलचस्पी लेने वाले थे. एक दिन राजा मान सिंह
अपनी टोली के साथ शिकार खेलने निकले. किले से 16 किमी दूर राई नदी के पास
वाले जंगल में हर तरह का शिकार मिलता था. उसी ओर कूच कर दिया.
नदी से कुछ पहले दो गुस्सैल बैल सींग से सींग लड़ाते नज़र आए. दोनों में से
कोई पीछे हटने को तैयार नहीं था और बार बार एक दूसरे पर हमला कर रहे थे.
दोनों बैलों ने राजा साब का रास्ता जाम कर दिया था. राजा और उनके कारिंदे
वहीँ रुक कर तमाशा देखने लगे और रास्ता साफ़ होने का इंतज़ार करने लगे. तभी
एक लड़की वहां आई. उसने दोनों बैलों को छुड़ा दिया. राजा उस लड़की की बहादुरी
से बहुत खुश हुए. उसका रूपरंग देखकर राजा के मन में विचार आ गया कि ऐसी
सुंदर और बहादुर लड़की को अपनी पटरानी बनाएंगे. संतान भी बहादुर होगी.
पूछने पर लड़की ने अपना नाम निन्नी उर्फ़ मृगनयनी बताया. सैनिक निन्नी को
लेकर उसके गाँव पहुँच गए जो गूजरों का गाँव था. निन्नी के माता पिता को
सारी बात बताई और दरबार में हाजिर होने को कहा. लड़की भी निडर थी और उसने
संदेसा भिजवा दिया कि शादी तब करुँगी जब मेरी तीन शर्तें मानी जाएंगीं :
पहली शर्त ये कि मैं राई नदी का पानी पीकर बड़ी हुई हूँ इसलिए मुझे ता-उम्र
राई का पानी पीने को मिलना चाहिए. दूसरी ये कि मैं पर्दों या बंद कमरों में
नहीं रहूंगी खुली जगह में रहूंगी उसका इंतज़ाम किया जाना चाहिए और तीसरी
शर्त ये कि जब भी राजा किले से बाहर जाएंगे तो मैं उनके साथ जाउंगी चाहे वो
शिकार पर जा रहे हों या युद्ध करने.
राजा के फैसले से रनिवास में भी खलबली मच गई. गूजर लड़की से कैसी शादी? पर
राजा मान सिंह तोमर भी अपनी बात पर डटे रहे और शादी हो ही गई. पानी के लिए
नहरिया बनी और गुजरिया के लिए गुजरी महल.
इस प्रेम कथा पर वृन्दावन लाल वर्मा ने 'मृगनयनी' नाम से एक नावेल भी लिखा
है जिसमें ग्वालियर का इतिहास भी विस्तार से लिखा गया है. वैसे 1922 में
अंग्रेजों ने गुजरी महल को म्यूजियम बना दिया था. ग्वालियर और आसपास के
इलाकों में पाई गई हजारों ऐतिहासिक वस्तुओं का संग्रह है यहाँ. म्यूजियम
सुबह ग्यारह बजे से पांच बजे तक खुला है और प्रवेश के लिए टिकट है.
 |
ग्वालियर के किले का एक दृश्य
सहस्त्रबाहू मंदिर ग्वालियर
सहस्त्रबाहू मंदिर ग्वालियर किले के परिसर में पूर्वी ओर है. इस मंदिर का
दूसरा नाम सास बहू मंदिर भी है जो सहस्त्रबाहू का एक बिगड़ा हुआ रूप ही है.
एक ही शैली के दो मंदिर पास पास हैं, एक बड़ा जिसे सास का और एक छोटा जिसे
बहू का बताया जाता है.
इन्टरनेट पर इस मंदिर का इतिहास देखते समय पुरातत्व विभाग ASI की रिपोर्ट्स
में से A Cunningham की रिपोर्ट भी पढ़ी. इस की कुछ रोचक लाइनें इस प्रकार
हैं:
" .... On the east side of wall of antarala, the ante-chamber,
there is an incomplete inscription dated in S. 1160, or A.D.1103, only
ten years later than the opening of the temple. In the same place there
are two other dated records of S. 1522 and S. 1540, or A.D. 1465 and
A.D. 1483, which show that the temple was again used by Hindus during
the sway of Tomara Rajas in fifteenth century. Early in the following
century the fortress was again captured by Musalmans, and as it was
afterwards used as State prison, and jealously guarded, I presume that
the Hindus were once more excluded. In 1844, I resided in the fort, I
found the sanctum desecreted and the floor of the ante-chamber dug out
to a depth of 15 feet in search of treasure. This hole I filled up, and I
afterwards propped up all cracked beams, repaired the broken plinth,
and added a flight of of steps to the entrance, so that the temple is
now accessible and secure, and likely to last for several centuries.
..."
यहाँ S का मतलब सम्वत है जो अंग्रेजी सन से 57 साल आगे चलता है.
मन्दिर किले के अंदर है और प्रवेश के लिए कोई अलग से टिकट नहीं है. दोपहर की तीख़ी धूप से बचें. सुबह से शाम तक खुला है.
कुछ फोटो:
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| 1. सहस्त्रबाहु मन्दिर |
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| 2. सहस्त्रबाहु का छोटा मन्दिर |
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| 3. छोटा और बड़ा मन्दिर पास पास ही हैं |
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| 4. नक्काशी किया हुआ स्तम्भ |
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| 5. चबूतरे से लेकर छत तक सुंदर नक्काशी |
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| 6. मन्दिर का एक सज्जित कोना |
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| 7. मन्दिर के चारों ओर बनी परिक्रमा |
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| 8. दीप स्तम्भ |
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| 9. चार भारी भरकम स्तम्भों पर टिकी छत |
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| 10. कुछ तोड़ा गया और कुछ समय ने जीर्ण किया |
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| 11. सुंदर और सुगढ़ मूर्तियां |
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| 12. गिरने से बचाने के लिए लगाई गई त्रिकोणीय रोक |
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| 13. छत पर की गई खूबसूरत नक्काशी |
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| 14. छत का एक और दृश्य |
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| 15. महिषासुर मर्दिनी |
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| 16. सहस्त्रबाहू मंदिर से नज़र आता ग्वालियर शहर |
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| 17. पत्थर पर लिखा गलत नाम - सास बहू मन्दिर |
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18. "This
temple was cleaned and stripped of chuna with which the Mahomedans had
defaced it for centuries by Major J.B. Keith, November A.D. 1881 under
the directions of Captain H. Cole R.E. Curator of Ancient Monuments in
India"
सूर्य मंदिर, ग्वालियर
ग्वालियर के मोरार कैंट में एक सुंदर सूर्य मंदिर है जिसे विवस्वान मंदिर
भी कहा जाता है. मंदिर के चारों ओर सुंदर पेड़ पौधों से सजा काफी बड़ा बाग़ है
जिससे मंदिर की सुन्दरता और भी बढ़ जाती है. मंदिर निर्माण से पहले यह
तपोवन गार्डन कहलाता था फिर सूर्या गार्डन और अब सूर्य मंदिर कहलाता है.
मंदिर का निर्माण बिड़ला घराने ने 19 जनवरी 1984 में शुरू कराया था और प्राण
प्रतिष्ठा 23 जनवरी 1988 को की गई. 20500 वर्ग फीट में फैले मंदिर की
उंचाई 76 फीट एक इंच है. मंदिर का निर्माण लाल बलुए पत्थर से किया गया है
और वास्तु या डिज़ाइन ओडिशा के कोणार्क सूर्य मंदिर पर आधारित है. रथ-नुमा
मंदिर को सात घोड़े ( सप्ताह के सात दिन के प्रतीक ) खींच रहे हैं. मंदिर के
दोनों तरफ की दीवारों पर 12-12 पहिये ( 12 घंटे का दिन और 12 घंटे की रात
या दूसरे शब्दों में वर्ष के 24 पखवाड़े ) बने हैं. हर पहिये में आठ मोटी और
आठ पतली ( 8+8 कुल 16 पहर या यम ) तीलियाँ बनी हुई हैं. कुल मिला कर मंदिर
में 373 मूर्तियाँ हैं जिसमें से 365 मूर्तियाँ साल के दिनों को दर्शाती
हैं. चबूतरे पर बने छोटे तीन मंदिरों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की
मूर्तियाँ हैं. दो बड़े आलों में बिड़ला परिवार जनों की आदम कद मूर्तियाँ भी
हैं.
ग्वालियर से मंदिर आने जाने के लिए ऑटो वगैरह मिल जाते हैं. प्रवेश के लिए
टिकट है. परन्तु मंदिर के आस पास कोई रेस्तरां नहीं है इसलिए खाने पीने का
इन्तेजाम करके चलना ठीक रहेगा. छुट्टी वाले दिन भीड़ रहती है.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
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| सूर्य मन्दिर का प्रवेश |
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| सूर्य रथ |
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| दीवारों पर सुंदर पहिये |
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| चबूतरे पर छोटे मंदिरों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश विराजमान हैं |
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| बाग़ बगीचे से नज़र आता मंदिर का पिछला भाग |
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| प्रवेश द्वार |
सूर्य मंदिर पर वीडियो देखें इस लिंक पर
https://youtu.be/CUCnv6909P4
गढ़ी पढ़ावली
गढ़ी पढ़ावली जिला मोरेना, मध्य प्रदेश में एक छोटी सी गढ़ी या छोटा किला या
fortress है. ये गढ़ी ग्वालियर से 35 किमी दूर है. यहाँ पहुँचने के लिए
ग्वालियर से आना जाना आसान है. आप गढ़ी के अलावा यहाँ से कुछ दूर पर बटेसर मंदिर समूह और चौंसठ योगिनी मंदिर, मितावली भी देखने जा सकते हैं. आस पास होटल, रेस्तरां या ढाबे की सुविधा नहीं है इसलिए अपना इंतज़ाम करके चलना ही ठीक रहेगा.
2. ऐसा माना जाता है की ये गढ़ी वास्तव में एक बड़ा मंदिर था. परन्तु अब
मंदिर का अगला भाग ही शेष बचा है. इस भाग में प्रवेश द्वार और मुखमण्डप हैं
जिनमें बहुत सुंदर नक्काशी है. यहाँ ब्रह्मा, विष्णु, महेश, शिव, पार्वती,
गणेश की मूर्तियों को बेहतरीन तरीके से उकेरा गया है. इसके अलावा मण्डप के
खम्बों और छत पर कई पैनल हैं जिनमें महाभारत और रामायण की कथाएँ मूर्तियों
में देखी जा सकती हैं. इनमें सेना, संगीतकार, हाथी, घोड़े वगैरह शामिल हैं
जो बहुत ही सुंदर हैं. मंदिर की खुदाई में रंग मंडप और गर्भ गृह की नीवें
भी मिली हैं. मंदिर की कलाकारी, वास्तु और खुदाई में मिली चीज़ों के आधार पर
पुरातत्त्व विभाग ASI द्वारा अंदाजा लगाया गया कि यह मंदिर दसवीं शताब्दी
में बनाया गया होगा.
3. तो मंदिर से गढ़ी कैसे बनी? दसवीं शताब्दी से लेकर सत्रहवीं शताब्दी के
बीच के इतिहास का रहस्य अब तक खुला नहीं है. सत्रहवीं और उन्नीसवीं
शताब्दियों के दौरान यहाँ जाट राणाओं का राज रहा है. ये गोहद के राणा
कहलाते थे और आस पास के इलाकों में जाट राणाओं की बहुत सी गढ़ी थीं - भिलसा,
बडेरा, बिलहाटी, बहादुरपुर, गोहद और पड़ावाली. पास ही ग्वालियर है जहां
मराठों का राज रहा करता था. मराठा और राणा के टैक्स को लेकर कई बार युद्ध
हुए. इस बारे में पुख्ता जानकारी नहीं है की मंदिर युद्ध के कारण या फिर
किन्हीं प्राकृतिक कारणों से ढह गया. बहरहाल सत्रहवीं शताब्दी में राणा के
सैनिकों द्वारा इसे 'पड़ाव' की तरह इस्तेमाल किया गया. सैनिक पड़ाव के लिए
मंदिर के गिरे हुए पत्थरों को इस्तेमाल करते हुए गढ़ी का निर्माण हुआ जो अब
गढ़ी पढ़ावाली के नाम से जानी जाती है.
4. गढ़ी में गाइड की सुविधा नहीं है. वहीँ एक 'ठेकेदार' ने ज्यादातर जानकारी
दी जिसे कहीं से सत्यापित भी नहीं किया जा सका. उसने बताया की यहाँ से
निकली कुछ मूर्तियाँ ग्वालियर किले के म्यूजियम और कुछ भोपाल के म्यूजियम
में रखी हुई हैं. जो शेर या 'व्याल' नीचे फोटो में हैं उनके मूल भी
म्यूजियम में हैं. गढ़ी के बाहर लॉन में बहुत से मूर्तियाँ और पैनल रखे हुए
हैं जिनके बारे में जानकारी नहीं मिली.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
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| 1. प्रवेश मंडप या मुख मंडप. ऊपर के शिखर टूट चुके हैं |
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| 2. गढ़ी की रक्षा करते 'व्याल' |
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| 3. नंदी और ग्वाला. गढ़ी के बाहर लॉन में रखी मूर्ति. ऐसी ही खंडित मूर्तियाँ पास के बटेश्वर मंदिर में भी हैं |
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| 4. गढ़ी के लॉन में रखा एक सुंदर पैनल |
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| 5. गढ़ी का बायाँ भाग |
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| 6. गढ़ी का प्रवेश. शिव मंदिर बहुत ऊँचे चबूतरे पर बनाया गया था |
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| 7. कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा - मंदिर के गिरे हुए पत्थरों से दोबारा बनाई गई गढ़ी की दीवारें |
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| 8. मंडप के नक्काशीदार खम्बे |
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| 9. बीच में है चामुंडा देवी |
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| 10. महाभारत और रामायण पर आधारित कहानी सुनाती हुई मुर्तियां |
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| 11. दशावतार |
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| 12. ब्रह्मा, विष्णु और महेश |
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| 13. सूर्य |
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| 14. शिव पार्वती |
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| 15. एक पैनल पर खजुराहो स्टाइल में काम कला के दृश्य भी हैं हालांकि ये मंदिर खजुराहो के मंदिरों से पहले बना माना जाता है |
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| 16. मंडप में 2+16 स्तम्भ हैं |
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| 17. ये हिस्सा बाद में बनाया गया लगता है |
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| 18. शिवलिंग तहखाने में यूँ ही पड़ा हुआ है |
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| 19. ASI का नोटिस बोर्ड |
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20. गाँव पढ़ावली
भीमबेटका
भीमबेटका की गुफाएं भोपाल के दक्षिण में लगभग 45 किमी दूर हैं. इसे
भीमबैठका भी कहते हैं. वैसे ये स्थान जिला रायसेन, मध्य प्रदेश में है और
रातापानी वन्यप्राणी अभ्यारण्य - Ratapani Wildlife Sanctuary से घिरा हुआ
है. यहाँ विन्ध्याचल पर्वत माला लगभग ख़तम सी हो जाती है.
* भीमबेटका की जैसी यहाँ आस पास छे और पहाड़ियां हैं - विनायक, भोरांवली,
लाखा जुआर पूर्वी, लाखा जुआर पश्चिमी, झोंडरा और मुनि बाबा की पहाड़ी. ये
इलाका बीस किमी के दायरे में फैला हुआ है और यहाँ लगभग सात सौ से ज्यादा
चट्टानी आश्रय - rock shelters हैं. हरे भरे जंगल में बड़ी बड़ी और आड़ी तिरछी
गुलाबी quartz की चट्टाने भी कम मज़ेदार नहीं हैं अजूबा ही लगती हैं. ये
छोटी बड़ी और आड़ी टेढ़ी कुदरती गुफाएं आदि मानव को सिर छुपाने के काम आती
थीं. ASI याने पुरातत्व विभाग ने इस इलाके में 1892 हेक्टेयर जमीन सुरक्षित
घोषित कर दी है. अभी भी यहाँ कई गाँव हैं जिनमें गोंड और किरकु आदिवासी
रहते हैं.
* भीमबेटका में लगभग 250 शेल्टर्स हैं जिनमें अधिकाँश में आदि मानव ने अलग
अलग समय पर चित्रकारी की हुई है. गुफाओं में बने कुछ चित्र 30,000 साल पहले
के माने जाते हैं. इन शेल्टेर्स में से 15 गुफाएं जिनमें चित्रकारी है,
जनता के देखने के लिए अलग कर दी गई हैं. चूँकि जंगल और पथरीला इलाका है
इसलिये करीबन 1.5 किमी लंबा एक घुमावदार रास्ता बना दिया गया है ताकि इन 15
गुफाओं में चलते चलते चित्रकारी देखने में सुविधा हो. चित्र तो ऐसे हैं
जैसे बच्चे दीवारों पर खुरच के बना देते हैं इसलिये थोड़ा ध्यान से देखना
होगा. बादल छाए हों तो चित्रकारी देखना मुश्किल होगा. फोटो में शायद उतना
साफ़ ना नज़र आए. इनमें से कुछ में हरा या लाल रंग भी भरा गया है जो अब तक
थोड़ा बहुत बचा हुआ है.
* भीमबेटका की ये चित्रकारी काकाड़ू नेशनल पार्क, ऑस्ट्रेलिया, लास्कौ केव
पेंटिंग्स, फ्रांस और कालाहारी रेगिस्तान के बुशमैन की चित्रकारी से काफी
कुछ मिलती जुलती हैं.
* 1957 में भीमबेटका की इन गुफाओं की खोज archeologist श्री विष्णु श्रीधर
वाकणकर ने की. काफी समय बाद 1970 तक बड़े पैमाने पर खोजबीन हुई और आस पास की
पहाड़ियों में 700 से ज्यादा गुफाएं रिपोर्ट की गईं. 1990 में ASI ने ये
स्थान सम्भालना शुरू किया और 2003 में यूनेस्को द्वारा भीमबेटका को World
Heritage Site घोषित किया गया.
* अगर आप जाना चाहें तो भोपाल से सुबह भीमबेटका पहुँच सकते हैं और देखने का
बाद वापिस भी जा सकते हैं. सुबह सात से शाम पांच बजे खुलता है.गाइड मिल
जाता है. लगभग एक से चार घंटे देखने में लग सकते हैं. वैसे ये विषय आपको
कितना रोचक लगता है उस पर भी निर्भर करता है. प्रवेश का टिकट है और गाड़ी का
टिकट महंगा है. उमस भरी दोपहर से बचें. आसपास कोई होटल, रेस्तरां या ढाबा
नहीं है इसलिए खाने पीने का इंतज़ाम करके चलना ठीक रहेगा.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
 |
| 1. चट्टानों का रंगमंच |
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| 2. इस चट्टान का नाम रखा गया है boar rock |
 |
| 3. हरियाली और रास्ता |
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| 4. आदि मानव का गाँव |
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| 5. तरह तरह की गुफाएं |
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| 6. जानवरों के चित्रों की वजह से इस चट्टान का नाम Zoo Rock रख दिया गया है |
 |
| 7. घोडा और हाथी. यह चित्रण प्रागैतिहासिक ना होकर ऐतिहासीक काल का है. |
 |
| 8. एक मानव ढोलक जैसा कुछ बजा रहा है और नाच हो रहा है |
 |
| 9. ये चित्रण बेहतर लग रहा है |
 |
| 10. पौधे का चित्र |
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| 11. Boar या
वराह या जंगली सूअर आक्रामक हो गया है और कोई मानव भागने की कोशिश कर रहा
है. गोल सींग और छोटे कान भी हैं. कुछ लोग नीचे खड़े हैं. इस चित्र में रंग
भी भरा गया है |
 |
| 12. पक्षी शायद मोर बनाने का प्रयास |
 |
| 13. आस पास के
जंगल में कई तरह के पेड़ पौधे हैं. उस वक़्त आदिवासियों को यहाँ फल, कन्द-मूल
और शिकार आसानी से मिल जाते होंगे. यहाँ देखिये 'कारी' के पेड़ के तने पर
'पापड़ा' का पेड़ उगा हुआ है |
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| 14. ASI का नोटिस बोर्ड |
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| 15. गेट खुलने का इंतज़ार. यहाँ से लगभग तीन किमी अंदर हैं भीमबेटका की चट्टानों पर पेंटिंग |
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| 16. यहाँ कुछ 'आधुनिक' चित्रण है. छोटे हाथी पर एक सवार भी है और उसके हाथ में भाला भी है |
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| 17. सीधी सीधी लाइनों वाले चित्र |
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| 18. चट्टानों और गुफाओं में आदिवासी जीवन की झलक |
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19. डायनोसोर जैसी चट्टानें
ग्रीक राजदूत का खम्बा
ग्रीक राजदूत का खम्बा दरअसल एक पत्थर का खम्बा है जो लगभग 2100 साल पुराना
है. ये खम्बा बेसनगर जिला विदिशा, मध्य प्रदेश में है. ये स्थान भोपाल से
साठ किमी, साँची के बौद्ध स्तूपों से ग्यारह किमी दूर और उदयगिरी की गुफाओं
से तीन किमी दूर है. स्थानीय लोग इसे 'खाम बाबा' या 'खम्बा बाबा' भी कहते
हैं. ये स्तम्भ 6.5 मीटर ऊँचा है और ये 113 ईसा पूर्व में ग्रीक राजदूत
हेलिओडोरस ने बनवाया था.
2. इस ऐतिहासिक खम्बे का बड़ा रोचक किस्सा है. तक्षशिला, ( पाली भाषा में
तक्खिला, अंग्रेजी में Taxila जो अब पंजाब, पाकिस्तान में है ) में 200 साल
ईसा पूर्व ग्रीक राजा अन्तियलसिदास ( Antialcidas ) का राज था. तक्षशिला
एक व्यापारिक केंद्र भी था और भारतीय उप महाद्वीप के कई शहरों से इसके
व्यापारिक और सांस्कृतिक सम्बन्ध थे. यूनानी राजा ने हेलिओडोरस को राजदूत
बना कर विदिशा भेजा था. उस समय विदिशा समेत उत्तर भारत में शुंग वंश के
पांचवें राजा भागभद्र का राज था. हेलिओडोरस यात्रा के दौरान या फिर विदिशा
में रहते हुए विष्णु भक्त हो गया और उसने 113 ईसा पूर्व में इस स्तम्भ और
साथ में एक मंदिर का निर्माण करवाया. मंदिर अब नहीं है. खम्बा गोल ना होकर
कोणीय है. इस स्तम्भ का निचला हिस्सा 8 कोणीय है, बीच में 16 कोणीय और ऊपर
32 कोणीय है. मतलब की बड़े कौशल और मेहनत से ये स्तम्भ बनाया गया था.
3. विदिशा के आस पास पहाड़ियां, घने जंगल और बेस नदी भी है. कालान्तर में
हेलिओडोरस का खम्बा और मंदिर झाड़ झंखाड़ और जंगल में खो गए. 1887 में
एलेग्जेंडर कन्निन्घम ने बेस नगर और आस पास की खोज में इस पत्थर के खम्बे
के बारे में लिखा था. पर खम्बा सिंदूर, तेल और धूल की मोटी परत से से ढका
हुआ था इसलिए कन्निन्घम ने उस पर लिखे अभिलेख को शायद नहीं देखा और ना ही
अभिलेख के बारे में जिकर किया. उसके विचार में यह खम्बा गुप्त कालीन याने
ईसा के बाद सन 300 से 350 के दरम्यान का रहा होगा.
4. 1901 में जॉन मार्शल और लेक ने आगे खोज की. इस बीच खम्बे के आस पास देसी
बाबाओं का डेरा लग चुका था और पत्थर का खम्बा भी अब 'बाबा' बन चुका था. आस
पास के गाँव के लोगों द्वारा 'खम्बा बाबा' को सिंदूर लगा कर पूजा जा रहा
था. जब खम्बे पर से सिंदूर की जमी परतें हटवाई गई तो मालूम हुआ कि खम्बे
पर तो कुछ खुदाई कर के लिखा भी गया है. तब मार्शल ने कहा कि यह खम्बा गुप्त
कालीन नहीं बल्कि कई सदी पुराना होना चाहिए. जब अभिलेख पढ़ा गया तो सभी
आश्चर्यचकित रह गए कि एक ग्रीक राजदूत हेलिओडोरस विष्णु का भक्त हो गया था
और उस भक्त ने यह खम्बा और मंदिर बनवा दिया था.
5. बाद में खम्बे के आस पास खुदाई होने पर प्रमाण मिले की पहले यहाँ मंदिर भी रहा होगा जो शायद बाढ़ में बह गया. अगर
आप साँची या उदयगिरी गुफाएं देखने जाएं तो खाम बाबा को आसानी से देख सकते
हैं. चूँकि स्तम्भ के अलावा यहाँ कुछ भी नहीं है और वहां गाइड भी उपलब्ध
नहीं है इसलिए देखने में ज्यादा समय नहीं लगेगा. पर रोमांच जरूर होगा कि
कहाँ विदिशा और कहाँ ग्रीस ! गूगल
में देखें तो विदिशा से तक्षशिला की दूरी 1234 किमी है और तक्षशिला से
ग्रीस की दूरी 5791 किमी है. हेलिओडोरस को महीनों लग गए होंगे यहाँ पहुँचने
में. और फिर उसका विष्णु भक्त बन जाना भी एक चमत्कार सा ही है.
6. पत्थर के स्तम्भ में खुदा हुआ अभिलेख का रूपांतरण इस प्रकार है जो की विकिपीडिया से लिया है:
देव देवस वासुदेवस गरुड़ध्वजे अयं
कारिते इष्य हेलियो दरेण भाग
वर्तन दियस पुत्रेण नखसिला केन
योन दूतेन आगतेन महाराज स
अंतलिकितस उपता सकारु रजो
कासी पु (त्र)(भा) ग (भ) द्रस त्रातारस
वसेन (चतु) दसेन राजेन वधमान
अर्थात
देवाधिदेव वासुदेव का यह गरुड़ध्वज (स्तंभ) तक्षशिला निवासी दिय के पुत्र भागवत हेलिओवर ने बनवाया, जो महाराज
अंतिलिकित के यवन राजदूत होकर विदिशा में काशी (माता) पुत्र (प्रजा) पालक भागभद्र के समीप उनके राज्यकाल के चौदहवें वर्ष में आए
त्रिनि अमृतपदानि अनुत्थानी
नयमती स्वग दमो छगो अप्रमादो
अर्थात
तीन अमृत पद के अनुष्ठान से स्वर्ग मिलता है - संयम, दान, निष्ठा.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो -
 |
| 1. हेलिओडोरस का खम्बा |
 |
| 2. खम्बे का ऊपरी भाग |
 |
| 3. प्राकृत भाषा और ब्रह्म लिपि में अभिलेख |
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| 4. चबूतरे में लगा पत्थर. स्तम्भ का जीर्णोद्धार 1921 में ग्वालियर के महाराजा माधवराव सिंधिया, आलीजाह बहादुर के शासन काल में हुआ |
 |
| 5. पास ही चबूतरे पर रखे कुछ आइटम. इसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली |
 |
6. चलो चलें खाम बाबा को देखने
ओरछा
झांसी से 17 किमी दूर है ओरछा और ओरछा से लगभग 200 किमी दूर है खजुराहो. आम
तौर पर टूरिस्ट सीधे खजुराहो ही निकल जाते हैं. पर टूरिस्ट के लिए ओरछा भी
कम नहीं है. मंदिर, छतरियां और महल तो हैं ही साथ ही नदी, पहाड़ियाँ और
जंगल भी पास में हैं. बेतवा नदी में राफ्टिंग की जा सकती है और जंगल में
ट्रैकिंग. ओरछा के राम राजा सरकार मन्दिर में सालाना सात लाख लोग आते हैं
और यहाँ 25-30 हजार परदेसी टूरिस्ट भी आते हैं. ओरछा में देखने के लिए
राजा महल, जहाँगीर महल, राय प्रवीण महल, हमाम खाना और ऊंट खाना है जिनकी
वास्तु कला अलग है. नदी किनारे पंद्रह बुंदेला राजाओं की सुंदर छतरियां (
स्मारक ) भी हैं.
कहा जाता है कि बुंदेला राजपूत राजा रूद्र प्रताप सिंह ने 1531 में ओरछा
शहर और राज की स्थापना की थी. इन्टरनेट में देखा तो लिखा है की राजा मिहिर
भोज ने आठवीं शताब्दी में ओरछा बसाया था. बहरहाल ओरछा का किला रूद्र प्रताप
सिंह का बनवाया हुआ है. ओरछा जिला निवाड़ी का एक भाग है ( कहीं कहीं जिला
टीकमगढ़ भी लिखा हुआ था ). ओरछा पुराने समय से ही ज्यादातर गुमनाम सा ही रहा
है और अब तक भी सैलानियों के नक़्शे में कम ही आता है. इलाका पिछड़ा सा जरूर
है पर यहाँ हर तरह के होटल और सुविधाएं उपलब्ध हैं.
यहाँ की बोली थोड़ी सी अलग है और इसे बुन्देली कहते हैं. स्थानीय लोगों से
बातचीत की तो पता लगा की बोलने का अंदाज़ अलग है, शब्दों का भण्डार बड़ा है
और कहावतों और लोकोक्तियों की कमी नहीं है. मसलन
"गधन के मौर बाँध दई" याने गधे के सर पर ताज रख दिया.
"घोड़न को चारो गधन को नईं डारो जात" घोड़े का चारा गधों को नहीं दिया जाता.
एक और रोचक कहावत गाइड ने बताई:
इक हते राम इक हते रावन्ना,
जे हते ठाकुर वे हते बामन्ना,
उन्ने उनकी नार हरी,
उन्ने उनकी नास करी,
बात बात को बातन्ना,
तुलसी बाबा को पोथन्ना!
प्रस्तुत हैं ओरछा की कुछ फोटो:
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| बेतवा नदी और नदी किनारे बुंदेला राजाओं की छतरियां |
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| बेतवा नदी. ये
नदी अभी तक तो काफी साफ़ है. मानसून में पानी तीन चार फुट ऊपर आ जाता है और
पत्थर दिखाई नहीं पड़ते. बाईं ओर किले की दीवार है |
 |
| नदी के दूसरी ओर रिज़र्व जंगल है. इस जंगल में कुछ गाँव भी हैं . यहाँ ट्रैकिंग की जा सकती है |
 |
| बाढ़ में पुल को काफी नुक्सान हुआ. अब दूसरी ओर जाना मुश्किल हो गया है |
 |
| प्रविश नगर कीजे सब काजा, ह्रदय राखि कौशलपुर राजा. राम राजा नगरी ओरछा का द्वार |
 |
| शहर की सीमा. कभी यहाँ सैनिक रहते होंगे |
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| राजा महल |
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| ओरछा वासी |
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| नगर पंचायत द्वारा बनाया गया प्रतीक्षालय |
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| ओरछा वासी के साथ |
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| ओरछा वासी |
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| ओरछा वासी |
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| बेतवा नदी और तीन देवियाँ |
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| बहुत कठिन है डगर जीवन की |
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| बेतवा नदी में एक शिवलिंग |
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| पुराने महल में नए ज़माने के हाथी घोड़े |
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चतुर्भुजा मंदिर
बटेसर मंदिर, मोरेना
 |
| बटेसर के मंदिर, मोरेना |
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कई मन्दिरों के सामने नंदी की खंडित मूर्तियाँ हैं. इनके सिर और कूबड़ टूटे हुए हैं. इन सभी पर एक ग्वाला या रखवाला भी बना हुआ है
|
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बटेसर या बटेश्वर मंदिरों का एक बड़ा ग्रुप जिला मोरेना, मध्य प्रदेश
में हैं. इनमें से एक बड़े मंदिर को भूतेश्वर मंदिर भी कहा जाता है. ये
मंदिर मोरेना शहर से लगभग 30 किमी और ग्वालियर से लगभग 40 किमी दूर हैं. इस
ग्रुप या समूह में 200 से ज्यादा मंदिर थे जो 25 एकड़ के इलाके में फैले
हुए हैं. आसपास घना जंगल और पहाड़ियां हैं. ये स्थान चम्बल घाटी के पुराने
किले के अंदर है. किला तो लगभग गायब ही हो चुका है.
आना जाना ग्वालियर से आसान है पर बसों की कमी है और सर्विस भरोसेमंद भी
नहीं हैं. अपनी गाड़ी या टैक्सी बेहतर रहेगी. आस पास कोई रेस्तरां या ढाबा
भी नहीं है इसलिए खाने पीने का अपना इंतज़ाम करके चलना ठीक रहेगा. दोपहर की
धूप यहाँ तीखी है और अगर उमस भरा मौसम हो तो परशानी हो सकती है. आप चाहें
तो एक दिन में बटेसर मंदिरों के अलावा गढ़ी पड़ावाली, चौंसठ योगिनी मंदिर, मोरेना
और शनिचरा भी देख सकते हैं. अफ़सोस है की इन सुंदर धरोहरों पर गाइड नहीं
मिलते माली या गार्ड जो बता दें वही सुन कर संतोष करना पड़ता है!
सभी मंदिर हल्के लाल बलुआ पत्थर याने sand stone के बने हुए हैं. मंदिर
छोटे छोटे हैं और शिव, शक्ति और विष्णु को समर्पित हैं. कई मंदिरों में
शिवलिंग है और मंदिर के सामने नंदी बैठा हुआ है परन्तु ज्यादातर क्षत
विक्षत हैं. इन मंदिरों में से जो ठीक ठाक नज़र आ रहे हैं वो पुरातत्व विभाग
याने ASI द्वारा पुनर्स्थापित किये गए हैं.
इतिहासकारों के अनुसार ये मंदिर सन 750 से लेकर सन 1100 तक के दरम्यान बने
होने की सम्भावना है. लेकिन कैसे ये मंदिर गिरे या टूटे या तोड़े गए इस के
बारे में पुख्ता जानकारी नहीं है. करीबन तेरहवीं शताब्दी के बाद से ये
मंदिर झाड़ झंखाड़ और जंगलों से ढके रहे. 1882 में अलेक्ज़ंडर कन्निन्घम ने
पड़ावली की पहाड़ियों में 100 से ज्यादा सुंदर मंदिरों के बारे में बताया था.
1920 में पुरातत्व विभाग अर्थात ASI ने इसे संरक्षित जगह घोषित किया. 1968
में एक फ़्रांसिसी इतिहासकार ने मंदिरों पर विस्तृत पेपर प्रकशित किया.
2005 में पुरातत्व विभाग के भोपाल क्षेत्र के अधिकारी श्री के के मोहम्मद
की पचास आदमियों की टीम ने लगभग साठ मंदिरों को फिर से स्थापित करना शुरू
किया.
वहां के एक कर्मचारी ने एक किस्सा बताया जो की स्थानीय अखबारों में भी छपा
था, की जब काम शुरू हुआ तो एक आदमी वहां बीड़ी के सुट्टे मारता हुआ कारवाई
देखने लगा. मोहम्मद साब ने उसे डांट दिया कि मंदिर में बीड़ी ना पिए. इस पर
उनकी टीम के सदस्य ने बताया की इस आदमी से ना उलझें ये चम्बल का नामी डाकू
है! पर जब डाकू को पूरी बात पता लगी तो उसने और उसकी 'टीम' ने भी मंदिर के
काम में सहयोग दिया.
ये मंदिर गुर्जर-प्रतिहार शैली के हैं. नक्काशी का काम खजुराहो के मंदिरों
जैसा सुघड़ नहीं हैं. शायद ये गुर्जर-प्रतिहार कला का शुरुआती दौर रहा होगा.
श्री के के मोहम्मद के अनुसार इन मंदिरों की वास्तु संस्कृत में लिखे दो
पुराने ग्रंथों के अनुसार है - मानसारा वास्तु शास्त्र और मायामत वास्तु
शास्त्र जो की चौथी और सातवीं शताब्दी के हैं. उनकी टीम ने खंडहरों के
टूटे, बिखरे पत्थर तरतीब से एक पहेली याने jig saw puzzle की तरह जोड़ना
शुरू किया पर बहुत सा काम अभी बाकी है.
फिलहाल इन मंदिरों में कोई पूजा पाठ नहीं होता है. बीच में एक बड़े पत्थर पर
बनी हनुमान की गेरुए रंग से रंगी मूर्ति जरूर है जो बिलकुल अलग ही नज़र आती
है. शायद बाद में रखी गई होगी. और हाँ गूगल में ढूंढेंगे तो एक और बटेसर
या बटेश्वर मंदिर मिलेगा जो की उत्तर प्रदेश में है.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो और वीडियो. वीडियो ब्लॉग में पोस्ट नहीं हो पाए.
इनको अपनी यूट्यूब चैनल में पोस्ट किया है और लिंक अंत में दिए हैं:
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| रख रखाव की तरफ और ध्यान की जरूरत है |
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| मन्दिरों के लिए पानी का इन्तेजाम भी है |
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| बहुत कुछ करना बाकी है |
यूट्यूब के वीडियो लिंक:
राम राजा मंदिर, ओरछा
झाँसी से करीब 18 किमी दूर झाँसी-खजुराहो मार्ग पर है ओरछा. और यहाँ पर है
ओरछा मंदिर या राम राजा मंदिर. यहाँ भगवान राम की पूजा राजा के रूप में की
जाती है. बल्कि ओरछा को आम तौर पर राम राजा नगरी भी कहा जाता है. पुलिस की
एक टुकड़ी सुबह और शाम की आरती के बाद राजा राम को सलामी भी देती है. इस
मंदिर से जुड़ी एक कहानी भी है जो संक्षेप में इस प्रकार है:
ओरछा के राजा मधुकर शाह जू देव (1554-1592 ) बांके बिहारी के उपासक थे और
रानी गणेश कुँवरि भगवान् राम की भक्ति में मगन रहती थी. जब राजा वृन्दावन
जाते और तो रानी अयोध्या चली जाया करतीं. एक दिन राजा ने रानी को कृष्ण
उपासना करने के लिए वृन्दावन साथ चलने को कहा. दोनों जब वहां पहुंचे तो
मंदिर बंद हो चुके थे परन्तु कुछ भक्त मंदिर के बाहर ही भजन कीर्तन कर रहे
थे. दोनों उन्हीं में शामिल हो गए और संगीत के साथ नाचते रहे. राजा को लगा
की स्वयं बांके बिहारी उनमें समा गए हैं. अगले बरस राजा फिर से वृन्दावन की
ओर चले तो रानी ने साथ ना जाकर अयोध्या जाना चाहा. क्रोध में राजा ने कहा
की अगर अयोध्या जा रही हो तो अपने राम को ओरछा में लेकर आना खाली हाथ नहीं
आना.
रानी ने भी निश्चय कर लिया और अयोध्या पहुँच कर सरयू किनारे डेरा डाल दिया.
कई महीनों तक राम राजा के दर्शन नहीं हुए. खाना पीना त्याग दिया. अंत में
रानी सरयू में कूद पड़ीं. जल में राम के दर्शन हुए और रानी ने पूरी बात
बताई. राम राजा ने ओरछा जाना स्वीकार कर लिया पर शर्तें लगा दीं कि:
- पूरी यात्रा पैदल होगी और यात्रा केवल पुष्प नक्षत्र में होगी,
- ओरछा पहुँचने पर ओरछा में मेरा राज होगा और
- मूर्ति एक स्थान पर रखने के बाद हिलेगी नहीं.
राजा को संदेशा भेज दिया गया कि रानी राम राजा के साथ आ रही हैं. ओरछा में
राम मंदिर बनाने की तैयारी शुरू हो गयी. रानी बालक राम की मूर्ति गोद में
लेकर पैदल चलती रहीं और आठ महीने सत्ताईस दिन बाद अपने महल में पहुँचीं.
स्वागत के दौरान राजा ने अचानक रानी से पानी माँग लिया तो रानी ने मूर्ती
रख दी और राजा को पानी दिया. पर फिर मूर्ति तो वहां से हिलाई नहीं जा सकी
और महल को ही मंदिर बनाना पड़ा. जो भव्य और विशाल चतुर्भुजा मंदिर तैयार
किया गया था वह आज भी मूर्ति के बगैर ही है.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:
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| ऊँची जगती ( प्लेटफार्म ) पर बना चतुर्भुजा मंदिर जिसमें कोई मूर्ति नहीं है. दाएँ सफ़ेद रंग में राम राजा मंदिर है |
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| राजा महल में राजा का शयन कक्ष. इस कक्ष में ये जाली बनवाई गई थी जहां से राजा सुबह मंदिर का दर्शन करते थे |
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| चांदनी रात में चतुर्भुजा मंदिर |
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| राम राजा मंदिर का प्रवेश |
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| राम राजा मंदिर |
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| पुलिस की टुकड़ी यहाँ सलामी देने के लिए तैनात रहती है |
गुरुद्वारा श्री दाता बंदी छोड़ साहिब, ग्वालियर
ग्वालियर के किले में एक गुरुद्वारा है जिसकी एक रोचक और ऐतिहासिक कहानी
है. इस गुरूद्वारे का नाम है - गुरुद्वारा श्री दाता बंदी छोड़ साहिब और इसी
नाम से जुड़ी कहानी भी है. ये कहानी एक उदाहरण भी है की सिखों के छठे गुरु
हर गोबिंद जी कितने विशाल और उदार ह्रदय के थे.
गुरु हर गोबिंद जी ने गद्दी ( छेवीं पातशाही ) सँभालने के बाद अमृतसर में
अकाल तख़्त की स्थापना की. साथ ही उन्होंने लोहागढ़ किले अमृतसर में संत
सिपाहियों की फ़ौज तैयार करनी शुरू कर दी. धीरे धीरे खबर में बादशाह जहाँगीर
के दरबार में भी पहुच गई जिसके कारण जहांगीर को चिंता हो गई. गुरु साहिब
को दरबार में बुलाया गया जहां गुरु साहिब की जहाँगीर से मुलाकातें हुईं.
जहाँगीर की तबियत खराब हुई तो कुछ दरबारियों और हाकिम ने सलाह दी कि अगर
ग्वालियर किले में कोई साधू संत प्रार्थना करे तो जहाँगीर की सेहत बेहतर हो
सकती है. गुरु साहिब का नाम सुझाया गया और उन्हें ग्वालियर के किले में
भेज दिया गया. किले में पहुँचने पर उन्हें बंदी बना दिया गया.
किले के जेल में बावन और लोग भी बंदी थे. ये आसपास की छोटी रियासतों और
छोटे मोटे राज्यों के राजपूत राजा थे जिन्होनें जहांगीर के शाही खज़ाने में
लगान और टैक्स नहीं जमा किये थे. गुरु साहिब जेल में नियमित पाठ करते और
जरूरत होती तो साथी कैदियों की सेवा भी करते. खबर नूरजहाँ तक पहुंची की कोई
संत महात्मा ग्वालियर किले में कैद हैं जो नियम से पाठ करते हैं और बीमार
कैदियों की मदद भी करते हैं. इधर जहांगीर की तबियत खराब होती जा रही थी.
फैसला हुआ की जेल में जो संत बंदी हैं उन्हें छोड़ दिया जाए. जवाब में गुरु
साहिब ने सन्देश भेजा कि मैं अकेला बाहर नहीं जाऊँगा बल्कि मेरे साथ सभी
बावन कैदी छोड़े जाएं.
ये शर्त टेढ़ी थी कि सबको छोड़ दिया जाए. काफी दिन बाद जवाब में अनोखा आदेश
आया की जो भी गुरु साहिब का पल्ला पकड़ कर बाहर आएगा उसे छोड़ दिया जाएगा. अब
ये शाही शर्त ये सोच कर लगाई गई की राजपूत राजाओं को पल्ला पकड़ कर चलना
बेज्ज़ती का कारण होगा और वो ऐसा नहीं करेंगे. परन्तु गुरु साहिब ने अपने
अंगरखे में बावन रिब्बन बाँध लिए और बावन के बावन कैदी एक एक रिब्बन पकड़ कर
गुरु साहिब के साथ बाहर आ गए. ये अक्टूबर 1619 की बात है. तब से गुरु
साहिब को दाता बंदी छोड़ साहिब कहा जाने लगा. किले में एक छोटा सा संगमरमर
का चबूतरा स्मारक के रूप में बना दिया गया जिसकी देख रेख मुस्लिम करते थे.
1947 के बाद से यहाँ छोटा गुरुद्वारा शुरू हुआ, 1970 - 80 के दौरान छे एकड़
में गुरुद्वारा विकसित हुआ. अब यहाँ दो सरोवर, लंगर हॉल और एक छोटा
म्यूजियम भी है. अक्टूबर में दाता बंदी छोड़ दिवस भी मनाया जाता है.
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| गुरुद्वारा श्री दाता बंदी छोड़ का गेट .यहाँ एक म्यूजियम भी है |
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| किले के अंदर जेल जहाँ कैदी बंद थे |
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| जेल के तहखाने का रास्ता |
यह कहानी तीन या चार तरह से कही गई है. और अधिक जानकारी के लिए गूगल में खोज करें या देखें :
sikhiwiki.org
historicalgurudwaras.com
चौंसठ योगिनी मंदिर, मोरेना
चौंसठ योगिनी मंदिर का नाम जैसा अनोखा है वैसा ही मंदिर भी अनोखा पर बहुत
सुंदर है. इस गोलाकार मंदिर में 64 cell या प्रकोष्ठ हैं जिनके द्वार गर्भ
गृह की ओर खुले हुए हैं. इनमें से ज्यादातर में शिवलिंग है पर और कोई
मूर्ति नहीं है. बीच के बहुत बड़े गोलाकार आँगन में एक गोलाकार चबूतरे पर
मंडप में गर्भ गृह है जिसमें शिव लिंग स्थापित है. इस सुंदर गोलाकार चौंसठ
योगिनी मंदिर का दूसरा नाम इकोत्तरसो या इकंतेश्वर महादेव मंदिर भी बताया
जाता है. इकोत्तरसो / इकंतेश्वर जैसे शब्द क्यूँ इस्तेमाल में आए इसके बारे
में पता नहीं लगा.
ये मंदिर मध्य प्रदेश के मोरेना जिले के मितावली ( अंग्रेज़ी में Mitawali /
Mitaoli / Mitavali ) गाँव में है. वैसे मितावली गाँव ग्वालियर से 40 किमी
दूर है और ग्वालियर से मंदिर तक आना जाना ज्यादा आसान है. मितावली गाँव के
खेतों के बीच में सौ फुट ऊँची एक पहाड़ी है जिस पर ये मंदिर बना हुआ है.
ऊपर चढ़ने के लिए आड़े टेढ़े पत्थरों को सौ पायदान वाली सीढ़ी है. पहाड़ी के ऊपर
बड़ी और चौड़ी चट्टानें हैं जिस पर ये गोलाकार मंदिर बनाया गया है. गोले का
व्यास 340 फुट है. मुख्य मंदिर के ऊपर या 64 प्रकोष्ठों के ऊपर सपाट छत है
और कोई शिखर नहीं है. ASI का कहना है की शिखर थे पर अगर कभी रहे हों तो अब
नहीं है. मंदिर का उद्धार धीरे धीरे पिछले सौ वर्षों में ही हुआ है. मंदिर
में 1323 के लिखे हुए एक अभिलेख - inscription के अनुसार ये मंदिर राजा
देवपाल ( राज काज 1055- 1075 ) ने बनवाया था. ASI ने राजा देवपाल का नाम तो
लिखा है पर 1055-1075 का जिक्र नहीं किया है. इसी तरह के गोलाकार चौंसठ
योगिनी मंदिर हीरापुर ओडिशा, रानीपुर ओडिशा और जबलपुर में भी हैं. एक चौंसठ
योगिनी मंदिर खजुराहो में भी है परन्तु वह गोलाकार ना होकर आयताकार है.
योगी / योगिन / योगिनी या जोगी जोगिन शब्द तो परिचित शब्द हैं. इन शब्दों
का इस्तेमाल हिन्दू, जैन और तांत्रिक बौद्ध साहित्य में हुआ है. पर यहाँ
पूरा का पूरा मंदिर ही जोगिनों को समर्पित है. इसका क्या उद्देश्य या कैसा
उपयोग रहा होगा यह तो इतिहास में दबा ही रह गया. इतना ज़रूर है कि इन चौंसठ
योगिनियों के नाम और चौंसठ ही मन्त्र इन्टरनेट में मिल जाएंगे जिनका
सम्बन्ध तांत्रिक विद्या से बताया जाता है. वहां मौजूद पंडित जी भी ज्यादा
बता नहीं पाए. उनके अनुसार पार्वती अपनी 64 योगिनियों के साथ भगवान् शिव को
रिझाने के लिए या फिर उनकी आराधना करने के लिए यहाँ आती थी.
कुछ लोगों का ये भी कहना है की नई दिल्ली के संसद भवन का डिजाईन भी यहीं से लिया गया है. इस बात की पुख्ता जानकारी नहीं मिली.
अगर आप जाना चाहें तो मोरेना से या ग्वालियर से जा सकते हैं. बसों के बजाए
अपनी गाड़ी या पूरे दिन की टैक्सी बेहतर रहेगी. इस मंदिर के अलावा आप बटेसर
मंदिर, गढ़ी पड़ावली और शनिचरा भी देख सकेंगे. ध्यान रहे कि दोपहर की धूप
यहाँ तीखी है और पत्थर / चट्टानें गर्म हो जाती हैं. आसपास कोई रेस्टोरेंट
नहीं है. GPS भी बीच बीच में गायब हो जाता है. टिकट नहीं है और गाइड भी
नहीं मिलते. आधी अधूरी भावनात्मक जानकारी स्थानीय लोगों से मिलती है. इन
स्मारकों के आस पास साफ़ सफाई की कमी है और ये सभी सुंदर और कीमती धरोहर
उपेक्षा की शिकार लगती है.
शुभकामनाओं के साथ कुछ फोटो प्रस्तुत हैं:
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| चौंसठ योगिनी मंदिर का आँगन |
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| प्रवेश द्वार |
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| प्रवेश के दाहिनी ओर पूजा |
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| परिक्रमा |
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| इस प्रकार के 34 खम्बे हैं |
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| गर्भ गृह में स्थापित शिवलिंग |
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| मंदिर में अभी भी पूजा पाठ होती है |
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| गर्भ गृह के पहले वृत्त में 17 खम्बे हैं , बीच के वृत्त में 34 और तीसरे बड़े वृत्त में 68 खम्बे हैं |
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| ऐसे दो शिवलिंग गर्भ गृह के बाहर हैं |
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| कुछ पल आराम
के! यहाँ तक आना मुश्किल जरूर था पर इस पुरातन मंदिर की बनावट, पत्थर का
काम और सुन्दरता देख कर बहुत ख़ुशी हुई और थकावट दूर हो गई |
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| पहाड़ी के ऊपर |
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| ASI का नोटिस
बोर्ड. ये भी लिखा है कि पहाड़ी की तलहटी में भारी भरकम आभूषणों युक्त आदमकद
कुषाण कालीन पाषाण प्रतिमाएं प्राप्त हुई है जो ग्वालियर किले के म्यूजियम
में रखी गई हैं |
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| इस छोटे से केबिन में कोई मूर्ती नहीं है |
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| पहाड़ी पर बना मंदिर दूर से संसद भवन जैसा लगता है. यह अधूरी मूर्ती शायद नंदी की लगती है. ये कब लगाईं गई इसका पता नहीं लगा |
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| आड़ी तिरछी पत्थर की सीढ़ी पर सौ फुट ऊँची चढ़ाई |
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| पहाड़ी की तलहटी में शायद गार्ड रूम बना होगा. अब गाँव के लोगों के लिए आरामगाह है |
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| बाहर का दृश्य |
मंदिर के अंदर का 29 सेकंड का वीडियो >
ज़ीरो माइल स्टोन
दिल्ली के राजघाट और मुम्बई के होर्निमैन सर्किल में क्या सम्बन्ध है? इस
प्रश्न का उत्तर ये है कि दोनों जगहों पर ज़ीरो माइल स्टोन हैं याने जहां से
दूरियां नापी जाती हैं. इसी तरह हैदराबाद में आल इंडिया रेडियो के पास,
नागपुर में रिज़र्व बैंक चौराहे के पास और मेरठ में बेगम पुल के पास ज़ीरो
मील पत्थर लगे हुए हैं. आपके शहर में भी एक ज़ीरो का मील पत्थर होगा जो
दूरियां नापने का मानक या standard benchmark माना जाता है.
तो फिर देश का ज़ीरो माइल स्टोन कहाँ है? ज्यादातर देशों में ज़ीरो उन देशों
की राजधानी में है. परन्तु भारत में 1907 में नागपुर को ब्रिटिश राज का
केंद्र बिंदु मान कर ज़ीरो माइल स्टोन का पत्थर लगाया गया. इस पत्थर से
राजघाट दिल्ली के ज़ीरो मील पत्थर की दूरी 1078 किमी है. इसी पत्थर से
समुद्री सतह - mean sea level की ऊँचाई भी नापी गई.
नीचे दी हुई पहली फोटो ज़ीरो माइल स्टोन नागपुर की है जिसमे बलुए पत्थर का
खम्बा 6.5 मी ऊँचा है. खम्बे का गोलाकार आधार 7.90 मी व्यास का है. इसके
उपर का चबूतरा षटकोणीय है जिस पर आठ शहरों के नाम और उनकी दूरीयां दर्ज हैं
जैसे कि हैदराबाद 318 मील.
तीसरी फोटो में एक पत्थर है जिस पर G.T.S लिखा हुआ है याने Great
Trigonometrical Survey. पहला सर्वे 1802 में ईस्ट इंडिया कंपनी के फौजी
ऑफिसर विलियम लैम्पटन ने शुरू कराया जो रुक रुक कर चलता रहा और 1871 में
सम्पूर्ण अविभाजित भारत का पहला नक्शा तैयार हुआ. नपाई की एक खासियत थी की
इसकी शुरुआत एक त्रिभुज से की गई और उसमें आगे त्रिभुज जोड़ते चले गए. पहला
त्रिभुज मद्रास / चिन्नई, में बनाया गया. इस त्रिभुज का आधार 7.5 मील लम्बी
समतल लाइन थी, एक भुजा माउंट डेल्ले की पहाड़ी तक थी और दूसरी तड़ीयाडमोल
पहाड़ी तक. यहाँ से फिर भारतीय उपमहाद्वीप के पूर्वी समुद्र तट याने चेन्नई
तट से पश्चिमी तट तक के सर्वे में पांच साल लगे थे.
ज़ीरो मील पत्थर का स्मारक राष्ट्रीय राजमार्ग 7 पर है. स्मारक देखने का कोई
टिकट नहीं है क्यूंकि ये सड़क के किनारे ही है और 24 घंटे खुला है कभी भी
देखा जा सकता है. पार्किंग की जगह नहीं है. चार घोड़े और खम्बा किसने लगाया
इसका रिकॉर्ड नहीं है.
बहरहाल आपके शहर का ज़ीरो मील पत्थर याने खूँटी कहाँ है?
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| 1. ज़ीरो माइल स्टोन नागपुर |
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| 2. ज़ीरो मील पत्थर - भारत का केंद्र |
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| 3. ये वो पत्थर है जिसे शून्य बिंदु मान कर शहरों की दूरियां नापी गईं Standard Bench Mark |
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| भारत के नक़्शे में ज़ीरो मील पत्थर |
 |
विकिपीडिया से साभार - ये नक्शा जो Great Trigonometrical Survey में इस्तेमाल किया गया. त्रिभुजों की सहायता से नपाई की गई
तेली का मंदिर, ग्वालियर
ग्वालियर के किले में स्थित तेली का मंदिर अनूठा मंदिर है. यह मंदिर लगभग
तीस मीटर ऊँचा है और इस विशालकाय मंदिर की बनावट में नागर और द्रविड़
शैलियों का मिश्रण है. मंदिर के अगले भाग की बनावट शिखर ^ जैसी है
परन्तु उस के ऊपर T की तरह, द्रविड़ शैली का गोपुरम भी है. मंदिर विष्णु,
शिव और शक्ति को समर्पित है पर फिलहाल अंदर कोई मूर्ति नहीं है शिवलिंग
है. दीवारों पर तरह तरह की नक्काशी है जिनमें गरुड़ प्रमुख है. चार दिशाओं
में दरवाज़े हैं परन्तु पूर्वी प्रवेश ही खुला है. बाकी तीन दिशाओं के
दरवाज़ों पर एहतियातन पत्थर लगा दिए गए हैं. हज़ार बारह सौ साल पुराने मंदिर
में जगह जगह दरारें पड़ी हुई हैं.
तेली का मंदिर कब बना इस के बारे में इतिहासकार सहमत नहीं हैं और सन 700 से
लेकर सन 900 तक के अलग अलग समय बताते हैं. शायद इसीलिए बनाने वाले के बारे
में भी पुख्ता जानकारी नहीं है. बनावट, डिजाईन और शैली के अनुसार
गुर्जर-प्रतिहार काल में बना माना जाता है. कुछ का कहना है की
गुर्जर-प्रतिहार राजा मिहिर भोज ( जिन्होंने सन 836 से 885 तक राज किया )
के राज काल में बनाया गया होगा. बहरहाल पहले कुतुबुद्दीन ऐबक और फिर
इल्तुतमश के हमले में 1231 में मंदिर को काफी नुकसान पहुंचा. इसके बाद
मंदिर का खंडहर झाड़ झंखाड़ से ढक गया. कुछ समय बाद जब किले पर मराठा शासन
हुआ तो उस दौरान मंदिर में सुधार किया गया.
फिर किले पर अंग्रेजों ने हमला बोला और अधिकार जमा लिया. फिर मन्दिर छुप
गया. किले में ब्रिटिश फ़ौज एक टुकड़ी तैनात कर दी गई. 1881- 82 में मेजर कीथ
ने किले के अंदर की तीन इमारतों - मान मंदिर महल, तेली का मंदिर और
सहस्त्र बाहू मंदिर का जीर्णोद्धार किया. इस काम पर 7625 रूपए शाही ब्रिटिश
खजाने से खर्च हुए और 4000 रुपए महाराजा सिंदिया की और से खर्चे गए.
मंदिर के नामकरण के बारे में भी अलग अलग विचार हैं. मंदिर किसी तेली ने
बनाया या फिर तेल के व्यापारियों ने मिलकर बनाया इस सवाल का कोई स्पष्ट
उत्तर नहीं है. विकिपीडिया में इसे तेलकी मंदिर भी कहा गया है. हम
हिन्दुस्तानी कहाँ अपनी धरोहर पर ध्यान देते हैं जो नाम पर ध्यान दें या
खोज कर के सही बात का पता लगाएं. सब चलता है! तेली के मंदिर के पास ही
सहस्त्रबाहू मंदिर भी है जिसे आम भाषा में सास बहु मंदिर नाम दे दिया गया
है! इत्तेफाक से सहस्त्रबाहु मंदिर असल में दो मंदिर हैं एक बड़ा और दूसरा
छोटा. बड़े को सास मंदिर और छोटे को बहू मंदिर पुकारा जाता है.
मंदिर सुबह से शाम तक खुला है. किले के टिकट पर ये मंदिर भी देखा जा सकता
है. मंदिर में कोई गाइड हमें मिला नहीं. अगर आपने जाना हो तो दोपहर की धूप
से बचें और पानी का इंतज़ाम रखें. अपनी गाड़ी से अगर किले में जा रहे हों तो
उरवाई गेट की तरफ से जाएं. सड़क के कुछ हिस्से में खड़ी चढ़ाई है और सड़क संकरी
इसलिए सावधानी रखनी होगी. इस मंदिर की ऊँचाई को देखते हुए और ऊँचाई पर की
गई नकाशी की फोटो के लिए बेहतर कैमरे की जरूरत है.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो जो मोबाइल और आईपैड से ली गई हैं:
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| मंदिर का प्रवेश द्वार जो कभी बाद में बना |
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| मंदिर बहुत ऊँचे चबूतरे पर बनाया गया है |
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| बचाव के लिए पत्थर के खम्बे और स्लैब लगाए हुए हैं |
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| मंदिर के बाएँ भाग का दृश्य |
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| मेजर कीथ का लगाया पत्थर |
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| अंदर की ओर से नज़र आता तोरण |
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| हरियाली में छुपा मंदिर | | | |
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