Tuesday, July 30, 2024

मध्य प्रदेश का

 https://jogharshwardhan.blogspot.com/2019/07/jain-temples-khajuraho.html

 Maheshwar : The Land of Maharani Ahilyabai

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          Date of Journey : 07 Dec.2019 
          
महेश्वर : मध्य प्रदेश

उज्जैन पहुँचते -पहुँचते तीन बज गए थे दोपहर के और मेरे जो मित्र लोग थे हमारे GDS ग्रुप के , वो मंदिर में दर्शन की लाइन में लगे थे। संपर्क मुश्किल हो रहा था क्यूंकि फ़ोन सभी के बाहर ही रखवा लिए जाते हैं। GDS -जानते तो होंगे आप ? घुमक्कड़ी दिल से , हमारा एक फेसबुक ग्रुप है जिसके 50 हजार से ज्यादा सदस्य हैं। और बात चली है तो ये भी बताता जाऊं कि GDS परिवार का ये वार्षिक मिलन समारोह था जिसमें हम सभी मित्रों को भारत के कोने -कोने से महेश्वर पहुंचना था। सही पहचाना आपने - पवित्र नर्मदा के किनारे बसा महारानी अहिल्याबाई का शहर महेश्वर जिसके नाम में ही पवित्र होने का संकेत मिलता है !! GDS परिवार का ये मिलन , चौथा मिलन था। जबकि इससे पहले , ओरछा में 2016 में पहला समारोह हुआ , 2017 में रांसी (उत्तराखंड ) में दूसरा और 2018 में जैसलमेर में तीसरा मिलन हो चूका था। ये चौथा मिलन समारोह था 2019 का ! आप कल्पना करिये - आप ऐसे लोगों से मिलते हैं जो भारत के अलग -अलग दिशाओं , अलग -अलग प्रांतों और शहरों से आते हैं और एक परिवार के नाम से , एक छत के नीचे ऐसे मिलते हैं जैसे पिछले जन्म के कोई सगे सम्बन्धी रहे हों। अद्भुत ग्रुप है GDS और मैं इस ग्रुप के साथ जुड़कर स्वयं को सम्मानित और गौरवान्वित महसूस करता हूँ। 

 आज का दिन अच्छा था। उज्जैन के महाकाल मंदिर में दर्शन के लिए हमेशा लम्बी लाइन लगती है लेकिन मैं मुश्किल से 20 मिनट में दर्शन करके बाहर आ चुका था। जय महाकाल !! 

आज 7 दिसंबर 2019 है !! मैंने थोड़ा आगे जाकर उज्जैन के बाहर अपनी टीम की बस को आखिर पकड़ ही लिया और पकड़ा भी कहाँ ? खाना खाते हुए एक होटल पर। खैर अब इंदौर के लिए प्रस्थान कर चुके थे और बस सरसराती हुई इंदौर की तरफ उडी जा रही थी जहाँ ग्रुप के ही दो तीन परिवार इंतज़ार में थे। डॉ सुमित शर्मा और GDS के संस्थापक माननीय भालसे परिवार ने जो स्वागत किया उसने हम सभी को अभिभूत कर दिया।  

रात के एक बजे के आसपास महेश्वर की सीमा में प्रवेश कर गए थे। सभी लगभग निद्रा वाली अवस्था में थे और अपने गंतव्य तक पहुँचते पहुँचते रजाई उठाकर लंबलेट हो चुके थे। मैं अपने लिए रजाई और गद्दा ढूंढ ही रहा था कि मुंबई से पधारे विनोद गुप्ता जी , मेरी आँखों के सामने से रजाई गद्दे को उठा ले गए। उनकी भी मजबूरी थी। पत्नी और दो बच्चे थे उनके साथ और अगर पत्नी की सेवा न करते इस वक्त तो भारी पड़ सकता था। मैंने भी आखिर कहीं से अपना इंतेज़ाम कर ही लिया। ठण्ड वाली रात थी , सिकुड़ना नहीं था। 

अगली सुबह एक नई जगह की खुशबू से सराबोर थी। ऐसे जल्दी नहीं जाग पाता हूँ लेकिन उस दिन पता नहीं क्यों और कैसे आँखें जल्दी खुल गईं ! बाहर निकल के देखा कि कहीं चाय -वाय का इंतेज़ाम है क्या ? लेकिन सब सिकुड़े हुए से गहरी नींद में थे -चाय की तो क्या बात करें ! ये आदत मेरी वाइफ की बिगाड़ी हुई है , मेरी कोई गलती नहीं ! वो खुद जल्दी जग जाती है और चाय बना लेती है फिर मुझे जगाती है , यहाँ भी उसी आदत के कारण चाय की प्यास लगी थी लेकिन यहाँ कौन इतना जल्दी चाय पिलाता मुझे ? यहाँ कौन है तेरा....... मुसाफिर 


कोई न कोई तो इस दुनियां में है जो आपका भी ध्यान रखेगा। निकल चले नर्मदा घाट की ओर। दुकानें सजी हैं मंदिर के सामने ही। ज्यादातर प्रसाद की हैं लेकिन चाय ? मिल गई मिल गई ! अहा ....ऐसे लगा जैसे प्राणों को यमराज से फिर मांग लाया होऊं ....कुछ देर के लिए ! 

बहुत ही छोटा कप मिला चाय का .....  दो घूँट मारे और चाय खत्म , फिर एक और ली .. फिर एक और ली ! तीन कप चाय पीने के बाद कुछ लगा पेट को और बोला -हाँ ! मालिक , अब ज़रा कुछ संतुष्टि मिली !! मेरा पेट भी मेरे साथ ही रहता है ज्यादातर.. . यात्रा में भी ... भावनाओं में भी। ये मेरी बात मान लेता है और मैं इसकी .. लेकिन आजकल ये अपने साइज से कुछ बड़ा हो गया है ज्यादा खा खा के।



सुबह -सुबह का अदभुत नजारा देख रही थीं मेरी आँखें और स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हुए आपस मैं बातें कर रही थीं दोनों जुड़वाँ बहनें और मैं .......चुपके से कनखियों से उनका वार्तालाप सुने जा रहा था।  भारत के सबसे पवित्र नदियों में से एक नर्मदा का किनारा हो , कल कल करती जलधारा हो , हाथ में चाय का कप हो और सामने दूर .....क्षितिज में प्रकृति अपने अनन्य रूप में आभा बिखेरने को उतावली हुई जा रही हो तो ऐसे में कौन ना बैरागी हो जाएगा ? कैमरे का शटर खोल के जीवन के इन क्षणों को कैद कर लेना भी तो जरुरी है जिससे जब मैं बुजुर्ग हो जाऊँगा तब कम से कम इन्हें देखकर अपने अकेलेपन का साथी तो बना सकूंगा अपनी इन यादों को !! .....बाकी बातें कल करेंगे 











धन्यवाद् !!

 Jain Temple in Deogarh (Lalitpur) : देवगढ़ का जैन मंदिर 

 दशावतार मंदिर में ज्यादा देर नहीं लगी। ऑटो वाला बाहर ही इंतज़ार कर रहा था मेरा।  बाहर आया , पानी की बोतल भरी और फिर से बैठ गया ऑटो में , चलो भाई ! जैन मंदिर चलते हैं।  दशावतार मंदिर से 1 -1.5 किलोमीटर और आगे होगा जैन मंदिर।  दोनों तरफ जबरदस्त हरियाली , घना जंगल और दूर से सुनाई पड़ती बेतवा नदी की आवाज। बहुत ही शांत और रमणीय स्थल। रहने -खाने की कोई सुविधा नहीं है।  यहाँ तक कि चाय पीने तक के लिए कोई दुकान वगैरह नहीं है।  एकदम गाँव है और अगर आप इस विचार को लेकर जा रहे हैं कि वहां कुछ ऐसा मिलेगा भी तो ऐसा मत सोचिये।  प्रकृति के अद्भुत रूप और मंदिर के सिवाय कुछ नहीं हैं वहां , हाँ ! पानी मिल जायेगा !  


मैं अंदर गया तो तीन -चार लड़के इधर -उधर टहलते हुए दिखे।  मैं समझ गया कि कर्मचारी ही होंगे , नहीं तो कोई इतना दूर क्यों आएगा ? हाँ , मेरे जैसा पागल होगा तो वो कहीं भी चला जाएगा !! मंदिर बहुत प्राचीन लगा देखने से और उतना ही स्वच्छ भी।  खूब फोटो खींचे , वीडियो बनाया और अब चल भैया वापस जाखलौन ! जाखलौन से ललितपुर !!ये जो जैन मंदिर हैं वो 8वीं या 9वीं शताब्दी के हैं। यह मंदिर किले के अन्दर और बाहर स्थित हैं। यह भव्य मंदिर खुदाई के दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है और प्राचीन भारत के स्मारकों की श्रेष्ठता को दर्शाता है। मंदिर के दीवार पर सुन्दर भित्तिशिल्प बने हैं जो जैन कला और संस्कृति को दर्शाता है। यह मंदिर लाल बलुआ पत्थर से बने हैं। संग्राहालय के सर्वेक्षण से पता चला है है कि 31 जैन मंदिर का अर्थ निकाला गया है। यह सारे मंदिर इस जगह पर बने हिन्दू मंदिरों के बाद बने हैं। उस समय के अनुसार जब यह बने थे इनको दो समय काल में बांटा गया है: शुरूआती मध्यकालीन काल और मध्यकालीन काल। 


ललितपुर लौटकर उसी होटल में खाना खाया लेकिन  इस बार जबरदस्ती पैसे दिए उन्हें।  5 दिसंबर थी 2019 की।  खाना खाके मैं सामने ही दिख रहे ललितपुर रेलवे स्टेशन के प्रतीक्षालय में पहुँच गया।  मेरी ट्रेन का निर्धारित समय साढ़े आठ बजे का था , हालाँकि वो आई 12 बजे के बाद ।  लेकिन इस दरम्यान मेरी हालत खराब रही और क्या क्या झेलना पड़ा वो बताता हूँ।  5 दिसंबर था और हल्की हल्की ठंड थी।  स्वेटर डाल के बैग को कंधे के नीचे लगाया और आराम करने लगा। ....... थका हुआ शरीर था , कब आँख लग गई ! पता ही नहीं चला ! पता तब चला जब छह सात पोलिसकर्मी मुझे जगा रहे थे :) मेरा बैग चेक हुआ , एक -एक सामान चेक हुआ।  पूरी पूछताछ हुई।  जाते -जाते हड़का के गए।  छह बजे होंगे उस वक्त।  बैग लटकाया और बाहर निकल आया।  चाय पी और आमलेट खाने लगा।  पुलिस का दस्ता चला आ रहा था रोड पर ! आमलेट वाले ने डर के अपना ठेला पीछे की तरफ सरका लिया।  मैंने ऐवें ही पूछ लिया -तू क्यों डर गया ? अरे कल 6 दिसंबर है उस चक्कर में ज्यादा ही पुलिस की चहलपहल है।  मेरा माथा ठनका !! अरे हाँ !! कल विजय दिवस है और कुछ के लिए काला दिवस।  अब असली बात समझ आई लेकिन तब तक सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला दे चुका था लेकिन कुछ लोगों की चुल्लु हमेशा हिलोरें मारती रहती है।  अभी खतरा टला नहीं , उधर का तो टल गया मेरा नहीं टला ! मैं फिर से उसी प्रतीक्षालय में , उसी सीट पर आकर बैठ गया।  आधा घंटा बैठा होऊंगा और फिर बैग छोड़ के इधर -उधर घूमने लगा।  इस इधर -उधर में खाली पड़े प्लेटफार्म पर जाकर आती जाती ट्रेनों को देखता रहा , बच्चे की तरह।  और उधर -मेरा बैग फिर से चेक हो रहा था किसी मेटल डिटेक्टर से।  बैग में पावर बैंक , कैमरा , छोटा चाक़ू , चैन जाने क्या क्या था और मेटल डिटेक्टर कांय -कांय किये जा रहा था।  जोर -जोर की आवाज आ रही थी -किसका बैग है ये ? बताओ किसका बैग है ये ? और हम मजे से प्लेटफार्म पर ट्रेन गिन रहे थे।  आवाज सुनकर प्रतीक्षालय की तरफ लौटा तो देखा -मेरा ही बैग है !! और इस बार पुलिस के साथ -साथ ब्लैक यूनिफार्म वाले चार कमांडो भी हैं।  और तो और वो पोलिस अफसर भी साथ हैं जो कुछ घंटे पहले ही मुझे हड़का के गए थे।  अब लग गई लंका !! 

भयंकर डांट पड़ी !! गनीमत रही कि सुताई नहीं हुई।  कैमरा चेक किया , फोटो चेक किये ! फ़ोन चेक किया , कांटेक्ट चेक किये और Recent Calls चेक किये।  आधार कार्ड चेक हुआ , whats app की चैट चेक हुई।  मुझे लगा -आज गया मैं अंदर ! Recent calls में Home मिला। किसका नंबर है ये -मेरी वाइफ का है !! OK !! कॉल करो और फ़ोन को स्पीकर पर लगाओ !! बात हुई , वो संतुष्ट हुए और एक बढ़िया सी डोज़ देके चले गए।  

झांसी -इटारसी पैसेंजर ट्रेन 12 बजे के बाद ही आई।  करीब पांच घंटे लेट और मैं चल दिया विदिशा लेकिन नींद का कच्चा आदमी , विदिशा की टिकट लेकर भोपाल पहुँच गया बिना टिकट ही।  बाकी बातें अगले ब्लॉग में ..... 

 









































यहाँ नहीं जा पाया मैं
यहाँ नहीं जा पाया मैं 




भगवान महावीर सेंचुरी है ये दोनों तरफ 

                                           लौट के बुद्धू घर को .......न न ललितपुर स्टेशन आये :) 

 Dashavatara Temple, Deogarh (Lalitpur)-UP

दशावतार मंदिर , देवगढ़ (ललितपुर ) 
यात्रा दिनांक : 05 दिसंबर 2019



सुबह का समय था और घड़ी की सुइयां धीरे धीरे 10 बजने की तरफ बढ़ रही थीं जब ललितपुर जैसे छोटे से रेलवे स्टेशन से बाहर निकल रहा था। बड़े बड़े विक्रम टेम्पो तितर -बितर होकर आड़े -तिरछे जहाँ -तहाँ खड़े हुए थे। और तो और जो बाहर आने -जाने का रास्ता था उसके सामने भी टैंपो खड़े थे। मैं तो जैसे -तैसे निकल गया लेकिन महिलाओं को , विशेषकर मोटी सी महिलाओं को बहुत परेशान होते हुए देख रहा था। न पुलिस और न ट्रैफिक का कोई नियम -कानून ! भूख लगने लगी थी तो रेलवे स्टेशन से बाहर निकलकर दोनों तरफ कई होटल बने हुए दिख गए और हम एक में जा बैठे। बैग भारी था। आखिर आठ दिन के लिए कपड़े थे और ठण्ड के मौसम की वजह से कुछ गर्म कपड़े भी ....तो बैग फुल हो गया था और भारी भी। इसे और आगे "ढोना " नहीं चाहता था। नाश्ता करने के बाद उसी होटल वाले से पूछा -भैया बैग यहाँ छोड़ दें क्या ? भैया से पूछ लेना ! भैया ? जी। .. होटल मालिक ! आने वाले होंगे ! जब तक भइया आएं -तुम एक कप चाय और दो कचौड़ी और खिला दो ! उसके साथ सब्जी और दही ने स्वाद को और बढ़ा दिया !


भैया आये तो उनसे भी यही सवाल -बैग यहाँ छोड़ के जा सकता हूँ ? मुझे देवगढ़ जाना है ! आप कहाँ से आये हैं ? जी -गाजियाबाद से !

आप सुबह आये होते तो छह बजे यहाँ से एक बस जाती है , उससे चले जाते। आप जैन हैं ? नहीं , मैं जैन नहीं हूँ ! गाजियाबाद में कहाँ से है ? जी ---शास्त्री नगर से ! कौन से ब्लॉक से ? H ब्लॉक से !! H ब्लॉक से ... आप फलां जैन को जानते हैं ? हाँ जी जानता हूँ !! उनकी स्पोर्ट्स के सामान की दुकान है ! फिर और बातें हुईं। .. बैग वहीँ रखा ! नाश्ते के कितने पैसे हुए ? कुछ नहीं !! आपको पैसे नहीं देने हैं और हाँ , जब लौट के आएंगे देवगढ़ से तो आपको खाना भी यहीं खाना है !!  इस रिश्ते को क्या नाम दूँ ?

ललितपुर से देवगढ़ करीब 30 किलोमीटर तो होगा ही और ऑटो वाले का 500 रुपया माँगना गलत भी नहीं था लेकिन 500 रुपया मेरे लिए ठीक नहीं था। इतना महंगा ट्रिप नहीं बनाता मैं अपना। करीब आधा घंटे बाद यानी साढ़े ग्यारह के आसपास बस आई जो केवल जाखलौन तक जायेगी। कुछ तो आगे बढ़ेंगे ही। जाखलौन से बस 10 किलोमीटर के आसपास ही रह जायेगा देवगढ़। वैसे एक और बात है -अगर थोड़ा होमवर्क करता पहले तो जिस ट्रेन से ललितपुर आया था उसका एक हिस्सा टीकमगढ़ जाता है और दूसरा होस्सा बीना की तरफ जाता है। बीना वाले ही रूट पर ललितपुर से अगला स्टेशन जाखलौन ही है लेकिन ये सुविधा आपको तभी मिलेगी जब आप मेरी तरह पैसेंजर ट्रेन से यात्रा कर रहे होंगे अन्यथा तो आपको ललितपुर ही उतरना पड़ेगा। और हाँ , ललितपुर स्टेशन भी बहुत बड़ा स्टेशन नहीं है और न बहुत ज्यादा ट्रेन यहाँ रूकती हैं।


जाखलौन पहुँच चुका हूँ। नमक लगा खीरा अच्छा लगता है , दो खीरे खाने में बुराई नहीं है और इतनी देर में एक ऑटो भी तय कर लिया 200 रूपये में। हालाँकि मैं चाहता था कोई बाइक वाला मिल जाए जो मुझे देवगढ़ के दर्शन करा लाये। होई है वही .........जो राम रची राखा !! 


गजमोक्ष का दर्शन

 दशावतार मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित मंदिर है जिसे 6th Century में बनाया गया था। ऐसे कहा जाता है कि इसे गुप्तकाल में बनाया गया था। बेतवा नदी की रमणीक घाटी में स्थित ये मंदिर आज के मंदिरों जैसा भव्य भले न हो लेकिन बहुत ही प्राचीन जरूर है। इतने पुराने मंदिरों में से बचे कुछ गिने -चुने मंदिरों में से एक दशावतार मंदिर की एक विशेषता इसका इतना प्राचीन होना भी है। मंदिर हालाँकि विष्णु जी को समर्पित है किन्तु आप यहाँ शिव , पार्वती , कार्तिकेय के साथ -साथ इसके मुख्य प्रवेश द्वार पर गंगा -यमुना की मूर्तियां भी देख सकते हैं। अच्छी बात ये है कि अब इस मंदिर को ASI ने अपने संरक्षण में ले रखा है जिससे कुछ और सुधार होने की गुंजाइश तो बढ़ती ही है। दशावतार का शाब्दिक अर्थ है -विष्णु जी के दस अवतार जो यहाँ परिलक्षित किये गए थे लेकिन इनमें से कुछ अवतार की मूर्तियां अब "मिसिंग " हैं।


दशावतार मन्दिर का शिखर अधिक ऊँचा नहीं है, वरन् इसमें क्रमिक घुमाव बनाए गए हैं। इस समय शिखर के निचले भाग की गोलाई ही शेष है, किन्तु इससे पूर्ण शिखर का आभास मिल जाता है। शिखर के आधार के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ की सपाट छत थी, जिसके किनारे पर बड़ी व छोटी चैत्य खिड़कियाँ थीं, जैसा कि महाबलीपुरम के रथों के किनारों पर हैं।



मुख्य मंदिर एक बड़े प्लेटफार्म पर बना है और आधार प्लेटफार्म आयताकार दीखता है। मंदिर लगभग इसके मध्य में स्थित है और मंदिर की तीन दीवारें एक से एक बेहतरीन , दुर्लभ विष्णु अवतार की मूर्तियां से और अन्य मूर्तियां से भी शोभायमान कर दी गयी हैं। मुख्य द्वार के दोनों तरफ गंगा -यमुना सहित अन्य देवी देवताओं की मूर्तियां सजाई हुई हैं। आप जब इसे देखेंगे तो स्वतः ही कहेंगे -वाओ ! क्या खूबसूरत मूर्तिकला है ! अद्भुत !!

विष्णुजी , शेषनाग की छाया में विश्राम लेते हुए






ये​ मुख्य प्रवेशद्वार है













आज इतना ही। अब आगे चलेंगे एक और खूबसूरत जगह देखने यहीं देवगढ़ में ही .....

इस जगह का एक वीडियो भी बनाया था। आप चाहें तो देख सकते हैं: https://www.youtube.com/watch?v=mIXLGVyI7Ng

 Datia Mahal : Datia (M.P)

दतिया महल : दतिया
Date of Journey : 04 Dec.2019 


दतिया ! मध्य प्रदेश का एक छोटा सा शहर जो माँ पीताम्बरा पीठ के होने से ज्यादा पहचाना जाता है। पीताम्बरा पीठ के दर्शन के लिए उस वक्त ज्यादा भीड़भाड़ नहीं थी। वैसे भी दोपहर में स्थानीय लोग मंदिर के दर्शन को नहीं जाते , या तो सुबह या शाम को आरती के समय उनका ज्यादा आना जाना रहता है। लेकिन मेरे लिए यही वक्त उचित था।


मंदिर से निकला तो दतिया महल की तरफ मुंह करके खड़ा हो गया। मैं आज शाम तक दतिया से करीब 20 KM दूर सोनागिरि भी जाना चाहता था इसलिए थोड़ी देर ये सोचता रहा कि पहले कहाँ जाऊं ? दतिया महल या सोनागिरि !! खड़े -खड़े क्या सोचना , चलो कचौड़ी खाते हुए सोचते हैं !! और जब तक दो कचौड़ी with रायता खत्म होतीं तब तक मन तय कर चुका था कि पहले दतिया महल चलेंगे। 

ज्यादा दूर नहीं है मंदिर से लेकिन रास्ता घूम घाम के था इसलिए पैदल का मोह छोड़ दिया और ऑटो पकड़ के महल के बिलकुल सामने पहुँच गए। पहली नजर में ही समझ में आ गया कि इस महल को इसके ही हाल पर छोड़ दिया गया है। अंदर एक कर्मचारी टिकट फाड़ रहा है और टिकट काउंटर के नाम पर बस एक कुर्सी मेज पड़े हैं। 25 रूपये का टिकट है लेकिन टिकट काउंटर की हालत उन काउंटर से भी बुरी है जहां 10 -10 रूपये का टिकट मिलता है। महल के सामने सूअर अपना गंगा स्नान करने में व्यस्त हैं। अगर आप दतिया में हैं और आपके पास दो तीन घंटे का समय है , अगर आप net Savvy नहीं हैं और आपको ये नहीं मालुम कि दतिया में मंदिर के अलावा कुछ और भी है ! तो सच मानिये आपको पता लगेगा भी नहीं और आप वापस घर पहुँच के अचंभित हो जाएंगे जब आपको कहीं से ये जानकारी मिलेगी कि दतिया में मंदिर के अलावा भी बहुत कुछ है !! एक बोर्ड तक नहीं है पूरे शहर में !! जी हाँ भाईसाब !! संभव है मुझे न दिखा हो बोर्ड लेकिन मैंने इस बारे में ऑटो वाले से पूछा भी था , उसने मना किया । मतलब आपके शहर में इतना कुछ है लेकिन आप उसका प्रचार ही नहीं कर रहे ?

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओं और ईद की मुबारकवाद के फ़र्ज़ी साइन बोर्ड से शहर भर को गंदा किये रहते हो लेकिन दतिया महल का एक बोर्ड , बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन पर नहीं लगाओगे ? अरे इतिहास ने इतना कुछ आपको दिया है तो उसे संवारिये , सजाइये , लोगों को दिखाइए ! आपके ही भाई -बंधुओं को रोज़गार मिलेगा।चाय -पकोड़ी ज्यादा बिकेगी , चना -मुरमुरा बिकेगा। होटल में लोग रुकेंगे लेकिन नहीं ! करेंगे नहीं कुछ बस बकेंगे !!

दतिया महल को बीर सिंह महल भी कहते हैं और इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका सात मंजिल का होना है। बीच में एक सेंट्रल बिल्डिंग है जिसके चारों दिशाओं में तीलियों की तरह बहुत ही शानदार खम्भे बनाये गए हैं। सात मंजिलों की वजह से इसे सतखण्डा महल भी बोलते हैं बहुत लोग। ऐसे बताते हैं कि बुन्देलखण्ड के राजा महाराजा बीर सिंह देव जी ने पूरे देश में ऐसे 52 Monuments बनवाये जिसमें से सबसे बड़ा यही है। इसे बनाने में कारीगरों को नौ साल का समय लगा था। नौ साल लगा मतलब फिर भी जल्दी ही बना दिया !! 1614 ईस्वी में बना ये महल सात मंजिल का है और विस्मय की बात ये कि इसे बनाने में केवल ईंट , सीमेंट या बालू का ही उपयोग किया गया है , लोहे या लकड़ी का कोई उपयोग नहीं है।

मजे की बात ये है कि इतने बड़े महल में कभी कोई राजा या रानी नहीं रही। इस महल को बनाने का एकमात्र उद्देश्य जहांगीर के दतिया आने का एक निशान बनाने का , एक यादगार बनाने का था। राजा बीर सिंह देव भी कभी इस महल में नहीं रहे और ऐसे प्रमाण भी नहीं मिलते कि वो यहां एक दो दिन के लिए भी आये हों। खैर बड़े लोग छोटे छोटे शहरों में ऐसे ही महल बनाकर भूल जाया करते हैं। मैंने गिने नहीं लेकिन वहां उपस्थित लोग इस महल में 440 कमरे बताते हैं। वो खैर अलग बात है लेकिन जैसे जैसे आप ऊपरी मंजिलों पर पहुँचते हैं इसकी सुंदरता और भी अच्छी लगने लगती है। आखिर के कुछ खंड यानी मंजिलें बंद हैं लेकिन जितना खुला है अच्छा लगता है। हाँ जाते हुए पहले तल पर जो करिडोर हैं , उनमें बदबू सी आती रहती है लेकिन जब आप अंदर मुख्य महल के प्रांगण में पहुँचते हैं तो इसके चमकीले खम्भे देखकर मन प्रसन्न हो जाता है !! मौका मिले तो जाइएगा जरूर !! 












मुझे सबसे सुन्दर ये खम्भे लगे जो इसी तरह चारों दिशाओं में बनाये गए हैं 


इस महल का वीडियो भी बनाया था जिसका लिंक यहाँ दे रहा हूँ !! अच्छा लगे तो बताइयेगा जरूर !!https://www.youtube.com/watch?v=bxmgnMxDaJM&t=107s

 In the feet of Maa Pitambhara : Datia

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पीताम्बरा पीठ : दतिया 

04-Dec-2019 


कल का दिन लगभग सुबह 9 बजे से रात 12 बजे तक व्यस्त रहा था। आखिरी जगह सूर्य मंदिर के दर्शन करने के बाद मैं और जैन साब , मित्रवर विकास के साथ उनके कार्यस्थल पर पहुँच गए थे वहां से फिर उनके छोटे भाई शोभित के फ्लैट पर पहुंचे और खाना खा के निवृत होने में 12 बज चुके थे। हाँ इस दरम्यान नवोदित फिल्म कलाकार "कार्तिक आर्यन" का घर जरूर दिखाया शोभित ने लेकिन फिल्मों और फ़िल्मी कलाकारों से कोई लगाव नहीं है तो उसकी कोई बात नहीं।


सुबह जागते -जागते देर हो गयी जिसका परिणाम ये हुआ कि आगरा -झाँसी पैसेंजर ट्रेन निकल चुकी थी। धत तेरे की !! ​अब ग्वालियर -दतिया खण्ड पर पैसेंजर से यात्रा करने का मौका फिर से निकल गया। सोना अच्छी आदात है लेकिन बेफिक्र सोना ... रात में 12 के बाद आदमी सोयेगा तो जल्दी कैसे जगेगा ? ग्वालियर स्टेशन पहुँचते पहुँचते 10 बज गए। हालाँकि शाम को एक और पैसेंजर ट्रेन है जो आगरा से झाँसी जाती है लेकिन उससे मेरा पूरा दिन खराब हो जाता इसलिए जो भी ट्रेन मिलेगी , दतिया निकल लेंगे। ग्वालियर -बरौनी एक्सप्रेस मिल गयी जो 12 बजे निकल के करीब डेढ़ बजे के आसपास दतिया पहुँच गयी थी। रास्ते में डबरा -सोनागिरि जैसे जाने -पहचाने स्टेशन आते गए निकलते गए। कभी बहुत क्रेज रहता था इन स्टेशनों का , जब हॉस्टल में था झाँसी . मेरी दाढ़ी काली से सफ़ेद होने लगी लेकिन इन स्टेशनों का कुछ नहीं बदला। सब कुछ ज्यों का त्यों !! छोटे छोटे समोसे और वही पाउडर वाली चाय। कुछ चीजें कभी नहीं बदलती और न भी बदलें तो भी क्या बुराई है ? पहिचान बन चुकी होती हैं !!
यहाँ से यात्रा शुरू हुई है आज की ! 

ग्वालियर -मुरैना -दतिया भले ही चम्बल का क्षेत्र हो , कभी खतरनाक माना जाता रहा हो लेकिन ट्रेन से जाते हुए इसकी खूबसूरती को लगातार निहारते रहने का मन करता है। आप इसे मेरा सौभाग्य कह सकते हैं कि मुझे इस जगह को बेहतरीन रूप में पहले भी देखने और घूमने का मौका मिलता रहा है। सजीव ग्रीन और खूबसूरत मैदानों -खेतों को देखकर आप एकबारगी भी नहीं कह सकते कि ये जगह कभी दुर्दांत डकैतों का क्षेत्र रही है !
ये छोटी लाइन वाली गाडी है जो ग्वालियर से श्योपुर तक जाती है।  जल्दी ही इसमें बैठने और यात्रा करने का मन है ......

लेकिन बदला है दतिया में ! बहुत कुछ बदला है। दतिया स्टेशन से सीधे पीताम्बरा पीठ पहुंचा तो वहां का नजारा इन 20 सालों में बहुत बदल चुका है। पहले हम झाँसी से आते थे दतिया और खूब खुले दर्शन करके लौट जाते थे अपने हॉस्टल लेकिन अब ! फ़ोन -कैमरा बाहर रखिये ! जूते बाहर रखिये ! पर्ची कटाइये फ़ोन -कैमरा रखने की। जांच कराइये गेट पर। फोटो लेने की तो गुंजाईश ही नहीं रही। खैर ! मैं मानता हूँ ये सब मंदिर की सुरक्षा और पवित्रता को बनाये रखने के लिए जरुरी भी है। लेकिन ... मैं चाहता था कि सोनागिरि भी घूम आया जाये वक्त मिल तो किन्तु बैग मंदिर के बाहर के स्टोर में केवल पांच बजे तक रखने की हिदायत दे दी भाईसाब ने ! अब ? किसी दुकान पर रख दिया जाए ? इतना बड़ा और भारी बैग लेकर परेशान होने से बेहतर है कहीं रख दिया जाए ! याद आया -राजीव कनकने जी के बारे में ! उन्हें फ़ोन करता हूँ शायद कोई बात बन जाए ! राजीव जी से पहले कभी बात नहीं हुई थी लेकिन उनका नंबर मेरे पास था। दतिया बहुत बड़ा शहर नहीं है इसलिए राजीव जी को मेरे पास तक पहुँचने में 10 मिनट से ज्यादा का समय नहीं लगा था। मेरी समस्या का समाधान हो गया था। धन्यवाद राजीव कनकने जी !! रात 9 बजे तक बैग सुरक्षित रखवा दिया राजीव जी तो हम निकल चले माँ पीताम्बरा के दर्शन के लिए और राजीव जी वापस चले गए तहसील , जहाँ उन्हें आज कोई रजिस्ट्री करानी थी। 



हरा भरा चम्बल आकर्षित करता है 


यहाँ मंदिर से दर्शन करके कुछ खाया पिया और फिर सोचा कि कहाँ जाया जाए ? दतिया महल या पहले सोनागिरि ? खुद ही खुद से सवाल किया और खुद ही खुद को जवाब दिया - पहले दतिया पैलेस चलते हैं। ये खुद से खुद वाला कांसेप्ट नया नहीं है , 1955 में ऐसे ही एक बार नेहरू जी ने खुद से पूछा था : 

नेहरू जी नेहरू से - भारत रत्न लोगे आप ? 
नेहरू , नेहरू जी से : क्या करना लेके ?
नेहरू जी नेहरू से - ले लो ! 
नेहरू नेहरू जी से - दे दो ! अगर ऐसा है तो ! 

 और फिर नेहरू जी के बहुत दबाव डालने पर नेहरू जी ने , नेहरू जी की ख़ुशी के लिए नेहरू जी की बात मान ली और नेहरू जी को नेहरू जी ने भारत रत्न प्रदान करने की सिफारिश नेहरू जी से कर दी। महान राजनीतिक लोगों का देश रहा है भारत !! 

पीताम्बरा मंदिर का प्रवेश द्वार 

ये क्या है ? मुझे नहीं मालूम कोई बताइयेगा 

ये दतिया है ....
ये दतिया पैलेस है।  चलेंगे यहाँ भी ......


मिलते हैं जल्दी ही फिर जय हिन्द ! जय हिन्द की सेना

 सूर्य मंदिर : ग्वालियर 

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Sun Temple : Gwalior 

Date of Journey : 03 Dec.2019 

सूर्य एक ऐसे देवता रहे हैं जिनकी पूजा सिर्फ हिन्दू धर्म तक सीमित नहीं रही है। ग्रीक सभ्यता से लेकर मिश्र तक सूर्य उपासना के अवशेष देखने को मिलते हैं। भारत में भारतीय संस्कृति के महाकाव्य महाभारत में भी सूर्य देव को उचित और प्रतिष्ठित रूप से परिभाषित किया गया है। सूर्यपुत्र कर्ण की कहानी हम और आप सब जानते हैं लेकिन इसके साथ एक और बात भी है कि सूर्य , कुंती को वरदान देने के लिए जिस जगह कुंतलपुर , अपने रथ से उतरे थे वो जगह भी ग्वालियर से ज्यादा दूर नहीं हैं। 


ग्वालियर घूमने के बाद अगर मैं परिभाषित करूँ तो कहूंगा कि ये एकमात्र ऐसा शहर है जो ऐतिहासिक रूप से भी उतना ही समृद्ध है जितना धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से है। ऐसा बहुत कम जगहों के साथ ही होता है इसलिए ग्वालियर एक परफेक्ट पैकेज है घुमक्कड़ी पसंद व्यक्ति के लिए। ग्वालियर के सूर्य मंदिर के अलावा और भी बहुत खूबसूरत सूर्य मंदिर हैं सम्पूर्ण भारत में। तो एक लिस्ट उन मंदिरों की और फिर आगे बढ़ेंगे : 

1. कोणार्क सूर्य मंदिर , ओडिशा। वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल है और भारत के स्वयं के सात आश्चर्यों में गिना जाता है। 
2 . मोढेरा सूर्य मंदिर , मेहसाणा , गुजरात 
3 . सूर्य मंदिर , गया , बिहार 
4 . सूर्य पहाड़ मंदिर , ग्वालपाड़ा , असाम
5 . सूर्यनार मंदिर , कुम्भकोणम , तमिलनाडु 
6 . सूर्यनारायण मंदिर , अरसवल्ली , श्रीकाकुलम , आंध्रप्रदेश 
7 . सूर्य मंदिर , उनाव , म. प्र . 
8 . मार्तण्ड सूर्य मंदिर , अनंतनाग , कश्मीर 
9 . सूर्य मंदिर , रांची , झारखण्ड 
10 . सूर्य मंदिर , कटारमल (अल्मोड़ा ) , उत्तराखण्ड 
11 . सूर्य नारायण मंदिर , दोमलूर , बंगलोर 
12 . सूर्य मंदिर , ग्वालियर , मध्य प्रदेश। 


और भी होंगे लेकिन मैं नहीं जानता। आपको पता हो तो बताइयेगा , मैं एडिट कर दूंगा । कहते हैं भारत में कुल 21 सूर्य मंदिर हैं। सूर्य मंदिर की एक विशेषता है कि इनमें सूर्य के सात अश्व वाला रथ जरूर दिखाया जाता है जिसमें कुल 24 पहिये लगे होते हैं , 12 -12 दोनों तरफ। हर पहिये में 16 तीलियाँ (Spokes ) बनाई जाती हैं जिनमें आठ कुछ मोटी और आठ पतली बनाई जाती हैं। अब इतना कुछ है तो निश्चित रूप से किसी न किसी खगोलीय रूपरेखा से जुड़ा होगा ही क्यूंकि सूर्य खगोलीय गणनाओं के सबसे बड़े माध्यम माने जाते रहे हैं।




रथ में जूते सात अश्व (घोड़े ) , सप्ताह के सात दिनों को रेखांकित करते हैं तो 24 पहिये , वर्ष भर के पखवाड़ों को रेखांकित करते हैं। एक पखवाड़ा 15 दिन और कुछ घण्टों का माना जाता है। आप कैलकुलेट करके देखिये , पूरा 365 दिन का हिसाब -किताब मिल जाएगा। कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि 24 पहिये , 24 घंटों को परिभाषित करते हैं लेकिन घण्टा वाला Concept भारत के पुराने समय में कहीं नहीं मिलता है इसलिए कहना मुश्किल है कि ये पहिये घण्टों को रेखांकित करते हैं। अब आते हैं इन तीलियों पर जो संख्या में कुल 16 हैं और एक निर्धारित दूरी पर बनाई गयी हैं यानी Equi distance पर स्थापित की गयी हैं। दो तीलियों के बीच की दूरी 1.5 घंटे को परिभाषित करती है। अर्थात एक पूरा व्हील पूरे दिन को व्यक्त करता है 16 x 1.5 = 24 . कैलकुलेशन तो एकदम सटीक बैठती है बाकी आप स्वतंत्र हैं कुछ भी सोचने के लिए।



बहुत देर हो चुकी थी सूर्य मंदिर पहुँचते पहुँचते और अँधेरा आसमान से जमीन पर उतरने की कोशिश कर रहा था। ज्यादा समय नहीं था जीभर देखने के लिए और बंद करने का समय भी हो चला था इस मंदिर को। समय ने इजाजत नहीं दी कि और देखा जाए ! 

मंदिर खुलने का निर्धारित समय कुछ इस तरह है : 

सुबह : 6: 00 बजे से 12: 00 बजे तक 
शाम : 1: 00 बजे से 6: 00 बजे तक 


मंदिर की दीवारों को बहुत ही खूबसूरत बनाया गया है। विभिन्न देवी -देवताओं की मूर्तियों के अलावा भगवान विष्णु के दस अवतारों को भी दिखाया गया है। प्रसिद्ध उद्योगपति जी. डी बिरला जी द्वारा बनवाया गया ये सूर्य मंदिर विवस्वान मंदिर भी कहलाता है जो सूर्य का ही एक और नाम है। 



शाम ने अपना आँचल फैला दिया है और रात को आवाज दे दी है। मेरा समय है ग्वालियर की जगहों को नमस्कार कहने का। सामने मित्र विकास नारायण श्रीवास्तव अपने छोटे भाई के साथ गाडी में मेरा और जैन साब का इंतज़ार कर रहे हैं। हम दोनों बाहर आते हैं मंदिर प्रांगण से और विकास जी के साथ उनके निवास की तरफ प्रस्थान कर जाते हैं और प्रस्थान कर जाता है आज का सूर्य भी। प्रस्थान करेंगे तभी अगली सुबह होगी और मैं प्रस्थान करूँगा तभी अगली जगह पहुँच पाऊंगा। तो मिलते हैं इसी यात्रा के अगले पड़ाव पर। तब तक जय राम जी की। 



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तेली मंदिर से निकलने के बाद अगला पड़ाव तानसेन का मकबरा था और वहीँ मुहम्मद गॉस का भी मकबरा है।  ज्यादा कुछ नहीं है इसके बारे में लिखने को।  बस फोटो देखिये और आनंद लीजिये ! 

Md. Gaus Maqbara 
Md. Gaus Maqbara 
तानसेन उर्फ़ रामतनु पाण्डेय का मक़बरा 


मुहम्मद गॉस का मकबरा 
गॉस के मकबरे की जालियां बहुत खूबसूरत लगीं 




 अपना ध्यान रखिये , कोरोना से डरना नहीं उसे हराना है !!

 Teli Mandir : Gwalior

Date of Journey : 03 Dec.2019

तेली का मंदिरग्वालियर
जो चीज जितनी अच्छी होती है उतनी ही मुश्किल भी। आप इसे उल्टा भी कह सकते हैं -जो जितनी मुश्किल होती है उसको पाने का जज़्बा भी उतना ही आनंद देता है।  सात -आठ साल पहले की बात है -हमारे कॉलेज के डायरेक्टर साब थे एक , डॉ जी एस यादवा ! आईआईटी से आये थे , बहुत ही ज्यादा कड़क .  एक फॅमिली गेट टुगेदर था कॉलेज के एम्प्लॉय का उसी में कुछ कहते हुए उन्होंने एक बात कही थी - सामान्य काम जरूर करते रहिये लेकिन वो काम जरूर करिये जिसे कोई नहीं करता या जो आपको बहुत कठिन लगता है।  दूसरी वाली बात पकड़ ली -जो काम कठिन लगे , उसे एक बार करने की कोशिश कर लेनी चाहिए।  कर ली -उर्दू सीखी ! टेढ़े -मेढ़े अक्षरों को जोड़ना सीखा।  जापानी सीखी - शब्दों को पिक्चर में व्यक्त करना सीखा ! ट्रैकिंग की और अभी भी जारी है। ... हाँ ! ऐसा कुछ नहीं किया जिसे कोई और न कर पाए ! 


एक ही दिन था ग्वालियर के लिए और वो भी करीब 10 बजे से शुरू हुआ था इसलिए दिन के घण्टे ही ज्यादा सही है लिखना।  केवल सुबह दस बजे से शाम के अँधेरे तक का समय था जिसमें अब तक गूजरी महल , ग्वालियर फोर्ट , चतुर्भुज मंदिर , सास-बहु मंदिर और जैन मूर्तियों के अद्भुत दर्शन कर चुका था।  Productivity अच्छी थी लेकिन अभी शाम की लालिमा आसमान से झाँकने लगे उससे पहले मैं जितना ज्यादा संभव हो पाए , उतना ग्वालियर देख लेना चाहता था।  चलते हैं ग्वालियर के एक और खूबसूरत नगीने की ओर : तेली मंदिर 

तेली का मंदिर ​भी ​ग्वालियर किले​ के परिसर ​में ​ही ​स्थित है।  यह एक बड़ी संरचना है जिसकी ऊंचाई करीब 100 फुट है।  इसकी छत की वास्तुकला द्राविड़ीयन शैली की है जबकि नक्काशियां और मूर्तियाँ उत्तर भारतीय शैली की बताते हैं। इसकी वास्तुशैली हिंदू और बौद्ध वास्तुकला का सम्मिश्रण है। यह ग्वालियर के किले के परिसर का सबसे पुराना स्मारक है जिसका निर्माण 11 वीं या 8 वीं शताब्दी में हुआ था। ​किसने बनवाया ? पक्का कह पाना मुश्किल है !

 यह मन्दिर भगवान विष्णुशिव और मातृका को समर्पित है। इसका निर्माण काल विभिन्न विद्वानों द्वारा 8वीं शताब्दी से लेकर 9वीं शताब्दी के आरम्भिक काल के बीच में माना जाता है। मंदिर के अंदर देवियों, सांपों, प्रेमी युगलों और गरुड़ की मूर्तियां हैं जिनकी वास्तुकला और शैली आपको मंत्र मुग्ध कर देगी। इस मंदिर की एक और ख़ास बात है कहा जाता है कि गुलामी के समय इस मंदिर का इस्तेमाल अंग्रेज अफसर कॉफ़ी शॉप और सोडा फैक्ट्री के रूप में करते थे। 



'तेली मंदिर' के नाम के पीछे कई कहानियां भी प्रचलित हैं। एक कहानी के अनुसार इसका निर्माण तेलंगाना की राजकुमारी ने करवाया था इसलिए इसका नाम तेली मंदिर पड़ गया। एक अन्य कहानी के अनुसार मंदिर का निर्माण तेल या व्यापार करने वाले लोगों ने मिलकर करवाया था इसलिए मंदिर का नाम तेली मंदिर पड़ गया।



 प्रवेश द्वार के एक तरफ कछुए पर यमुना व दूसरी तरफ मकर पर विराजमान गंगा की मानवाकृतियां हैं । आर्य द्रविड़ शैली युक्त इस मंदिर का वास्तुशिल्प अद्वितीय है । मंदिर के शिखर के दोनों ओर चैत्य गवाक्ष बने हैं तथा मंदिर के अग्रभाग में ऊपर की ओर मध्य में गरूढ़ नाग की पूंछ पकड़े अंकित है ।


उत्तर भारतीय अलंकरण से युक्त इस मंदिर का स्थापत्य दक्षिण द्रविड़ शैली का है । वर्तमान में इस मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है पर दरअसल यह एक विष्णु मंदिर था । कुछ इतिहासकार इसे शैव मंदिर मानते हैं । सन 1231 में यवन आक्रमणकारी इल्तुमिश द्वारा मंदिर के अधिकांश हिस्से को ध्वस्त कर दिया गया था । तब 1881–1883 ई. के बीच अंग्रेज हुकमरानों ने मंदिर के पुरातात्विक महत्व को समझते हुये मेजर कीथ के निर्देशन में किले पर स्थित अन्य मंदिरों, मान महल(मंदिर) के साथ-साथ तेली का मंदिर का भी ​पुनर्द्धार  करवाया था । मेजर कीथ ने इधर-उधर पड़े भग्नावशेषों को संजोकर तेली मंदिर के समक्ष विशाल आकर्षक द्वार भी बनवा दिया ।




ग्वालियर यात्रा जारी रहेगी : 

 Jain Statues in Gwalior

Jain Statues in Gwalior 

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Date of Journey : 03 Dec.2019 



मैंने ग्वालियर में पूरा एक दिन गुजारा और फोर्ट के अलावा और भी बहुत कुछ देखा। लेकिन जो सबसे बेहतरीन जगह लगी , उसका कहीं भी दिमाग में कोई खाका तैयार नहीं था। बस नाम सुना था उस जगह का और सच मानिये वहां जाने का कोई विचार नहीं था। वो तो मैं और जैन साब मस्ती में घूमते चले जा रहे थे तो एक जगह चाय पीते हुए जैन साब बोले -योगी जी ! चलिए आपको बहुत बेहतरीन जगह दिखाता हूँ जो वैसे तो जैन मुनियों की प्रतिमाओं के लिए जानी जाती है लेकिन आप देखेंगे तो आपको भी पसंद आएगी। चाय बड़े छोटे कप में मिली थी , दोबारा फिर से पिएंगे एक -एक कप और ! फिर चलेंगे आगे


चाय का दूसरा कप भी सुपुड -सुपुड होते हुए अपने अंतिम समय में जा पहुंचा था और उधर रितेश जी से भी बात हो चुकी थी। जैन साब और मैं , सासबहू मंदिर देखने के बाद उनकी बताई हुई जगह जाने वाले थे। सासबहू मंदिर की बातें आप पहले पढ़ चुके हैं तो अब चलते हैं जैन मुनियों की शानदार , आदमकद और अदभुत कला का साहकार कही जाने वाली पवित्र भूमि -गोपांचल पर्वत। गोपांचल पर्वत ही वो पहाड़ी है जिस पर ग्वालियर का फोर्ट बना हुआ है। मैं कहूंगा कि अगर जैन साब मुझे ये जगह न दिखाते तो मैं बहुत कुछ ऐसा देखने से वंचित हो रहता जिसे जरूर -जरूर देखा जाना चाहिए। हालाँकि मैं शाम होने की वजह से पूरा अंचल नहीं देख पाया लेकिन इस जगह ने मुझे फिर से एक बार और ग्वालियर जाने की वजह दे दी। जब भी जाऊँगा सबसे पहले यहीं जाऊंगा। 

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अब से पहले मैंने केवल हिमाचल प्रदेश के मसरूर में रॉक कट टेम्पल देखा है लेकिन उसमें और यहाँ में बहुत अंतर है। वहां एक बड़ा सा मंदिर है लेकिन यहां 1500 से ज्यादा मूर्तियां एक ही साथ हैं। हालाँकि दोनों की सुंदरता देखते ही बनती है और मूर्तियां बनाने वालों के कौशल और उनकी योग्यता को नमन करने का मन करता है। मेरा देश ऐसे ही महान नहीं बना , इसको महान बनाने में सिर्फ कुछ गिने चुने नाम नहीं बल्कि हर उस प्राणी का योगदान है जिसने इस धरती को अपना माना। 

गोपाचल पर्बत की इन जैन मुनियों की प्रतिमाओं को पहाड़ियों को काट -काटकर बनाया गया है। ग्वालियर किले की प्राचीरों और चहारदीवारों में बनी ये प्रतिमाएं अलग-अलग कालखंड में बनी हैं। अगर पूरा समय समायोजित किया जाए तो 7वीं शताब्दी से लेकर 15वीं शताब्दी के बीच इन प्रतिमाओं को उकेरा गया और अलग -अलग जगह से मंगवाकर यहाँ स्थापित किया गया। इन प्रतिमाओं में जैन तीर्थंकरों को बैठने की स्थिति यानी पद्मासन के साथ -साथ खड़े होने की स्थिति (कायोत्सर्ग ) में दिखाया गया है। यहाँ एक ही स्थान पर जितनी मूर्तियां हैं उतनी शायद और कहीं नहीं हैं। 1500 मूर्तियां कम नहीं होतीं ! और यही एक कारण भी रहा जिसकी वजह से मुझे यहाँ दोबारा जाने की इच्छा है क्यूंकि मैं सभी मूर्तियों को एक -एक करके जीभर देखना चाहता हूँ , महसूस करना चाहता हूँ , फोटो लेना चाहता हूँ और वीडियो भी बनाना चाहता हूँ।



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इन 1500 मूर्तियों को इनके क्लस्टर के हिसाब से पांच प्रखंडों में विभाजित किया जा सकता है। अगर आप 1901 के ग्वालियर का मैप देखेंगे तो आपको ऐसा लगेगा जैसे पूरा फोर्ट चारों तरफ से इन प्रतिमाओं से सुसज्जित किया गया हो ! 

एक पत्थर की बावड़ी ग्रुप : दक्षिण -पूर्व के इस क्लस्टर को शुरुआत में -एक पत्थर की बावड़ी ग्रुप कहा जाता था जिसे आजकल "गोपाचल अतिशय क्षेत्र " कहा जाता है। इस क्लस्टर में लगभग 500 मीटर की रेंज में एक ही लाइन में 26 caves हैं जिनमें से 13 में 1468 से 1473 ईस्वी अंकित है। ये जगह दीनदयाल सिटी मॉल की तरफ से एकदम नजदीक पड़ती है।

त्रिशलागिरि : फोर्ट के दक्षिण -पश्चिम भाग में स्थित त्रिशलागिरि , उरवाई गेट के अंदर की ओर हैं। ग्वालियर तो वैसे भी जैन मतावलम्बियों का प्रमुख केंद्र माना जाता है जहां गुप्तकालीन जैन धर्म से सम्बंधित विवरण मिलते रहे हैं। 

उरवाई ग्रुप : ज्यादातर लोग इसी रास्ते से फोर्ट देखने जाते हैं जहां से रोड बनी हुई है और लोग सीधे अपने व्हीकल्स से फोर्ट देखने जाते हैं। इसके दोनों तरफ जैन मुनियों की प्रतिमाएं बनी हुई हैं। हम भी इन्हें ही देख पाए और इन्हीं प्रतिमाओं के चित्र ले पाए और एक छोटा सा वीडियो भी बनाया था। मैंने तो नहीं देखा लेकिन लोग ऐसा कहते हैं कि इन प्रतिमाओं को 1440 -1453 ईस्वी के बीच में बनाया गया है।

नामिनाथ गिरी ग्रुप : ग्वालियर फोर्ट के उत्तर-पश्चिम हिस्से में स्थित ये ग्रुप भगवान नामिनाथ जी को समर्पित है। मैं यहाँ तक नहीं पहुंचा हूँ अभी तक लेकिन कहते हैं कि यहाँ पहुँच पाना थोड़ा कठिन था इसीलिए बाबर की बुरी नज़रों से ये जगह बची रह गयी और यहां की मूर्तियां अपने मूलरूप में स्थित हैं जबकि अन्य जगहों पर स्थित मूर्तियों को खण्डित किया गया था।

नैमगिरी : किले के उत्तर-पूर्व में अवस्थित मूर्तियों के ग्रुप को नैमगिरी कहा जाता है जिसे ये नाम तीर्थंकर नेमीनाथ जी के नाम से मिला है।


गोपाचल पर्वत के साथ-साथ सिद्धांचल पर्वत में भी जैन मूर्तियां मिलती हैं। दोनों में से गोपाचल पर्वत की मूर्तियां ज्यादा पुरानी कही जाती हैं। दोनों ही जगह की बहुत सी मूर्तियों को बाबर ने 1527 में खण्डित करा दिया था। बाद में फिर इन मूर्तियों को संशोधित और बेहतर किया गया। 

इन मूर्तियों में श्री आदिनाथ जी की एक मूर्ति तो करीब 57 फुट ऊँची है जिसे मैं भी देख पाया। इनमे से ज्यादातर मूर्तियों का निर्माण तोमर वंश के राजा डूंगर सिंह और कीर्ति सिंह (1341-1479) के काल में हुआ था। यहां पर एक भगवान पार्श्वनाथ की पद्मासन मुद्रा में बहुत ही सुंदर और चमत्कारी मूर्ति है।


तोमर शासकों के पास ग्वालियर फोर्ट 1517 तक रहा और उसके बाद बाबर के कब्जे में चला गया। बाबर ने भी 1527 ईस्वी में वही किया जो लगभग सभी मुस्लिम शासकों ने किया था । उसने सैकड़ों मूर्तियों को तहस नहस कर डाला। उरवाई गेट और एक पत्थर की बावड़ी लगभग खत्म कर दिए। हालाँकि कुछ मूर्तियां बाबर से बची रह गयीं क्यूंकि उसके सैनिक उन तक पहुँच नहीं पाए। 



खैर ! एक बेहतरीन खजाना मिल गया मुझे और जैसा मैंने कहा कि मुझे एक और बहाना मिल गया है फिर से ग्वालियर की सैर करने का ! इस बार इस जगह को पूरा समय दूंगा और एक -एक मूर्ति की फोटो आप तक पहुंचा पाया तो मुझे प्रसन्नता होगी। चलिए जल्दी ही मिलेंगे तेली मंदिर में। .. तब तक आप सभी को हाथ जोड़कर राम राम !! 

















आप चाहें तो इन जैन प्रतिमाओं का एक बहुत छोटा सा वीडियो भी देख सकते हैं : https://www.youtube.com/watch?v=476JiSAGLV8

 Sas-Bahu Mandir : Gwalior

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Date of Journey : 03 Dec.2019 


ग्वालियर को जी भर के देखने के लिए एक दिन पर्याप्त नहीं है लेकिन हाँ , कुछ जगहों पर विशेष फोकस और कम महत्व वाली जगहों पर पाला -छूने की ट्रिक अपनाने से संभवतः आप ग्वालियर के सभी स्थानों को घूम सकते हैं। मेरी ग्वालियर घूमने की भूख शांत नहीं हुई है , हाँ ! कुछ संतुष्टि जरूर मिली है। अभी मैं सिर्फ जैन मुनियों की मूर्तियों को फिर से , मन भर के देखने के लिए जाना चाहता हूँ। फिर से जाना चाहता हूँ श्योपुर वाली ट्रेन से यात्रा करने के लिए फिर से एक दिन जाना चाहता हूँ। फिर से जाना चाहता हूँ कचौड़ी और पोहा खाने के लिए। इसके अलावा ऐसा कुछ नहीं रहा जो मैं देखना चाहता था लेकिन देख नहीं पाया ! बहुत ही व्यस्त और बहुत ही मस्त दिन रहा 03 दिसंबर 2019 मेरे लिए। पहले शरद जैन जी , फिर विकास नारायण श्रीवास्तव और शाम होते -होते रितेश गुप्ता जी से मुलाकात ने इस दिन को विशिष्ट और यादगार बना दिया था।



बंदी छोड़ गुरूद्वारे से निकलकर एक-एक कप चाय के लिए मैं और शरद जी एक टपरी पर थे जब रितेश जी का पता चला कि वो भी फोर्ट काम्प्लेक्स में ही मौजूद हैं। हालाँकि इतना मालुम था कि वो आगरा से ग्वालियर आये हुए हैं किसी शादी समारोह में। इतने बड़े ब्लॉगर से मुलाक़ात का लालच कैसे छोड़ पाते हम ? आखिर उन्हें सासबहू मंदिर के प्रांगण में पकड़ ही लिया उनकी धर्मपत्नी जी के साथ। सास-बहु मंदिर का ग्वालियर ही क्या भारत में ही कहीं होना गले से नीचे नहीं उतरता ! जिस देश में सास ने बहु को दहेज़ के लिए जिन्दा जलाया हो ! कभी बेटी का दर्जा न दिया हो ! उस देश में सास -बहु का मंदिर होना , उनके प्रेम को तो नहीं व्यक्त कर सकता ? हाँ अब व्यवस्थाएं , मान्यताएं। सोच और मानसिकताएं बदली हैं लेकिन ये मंदिर आज के नहीं हैं। ये 11 वीं शताब्दी के हैं। 

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सास-बहु , सहस्त्रबाहु मंदिर या हरिसदनम मंदिर एक ही मंदिर के नाम हैं। नहीं -नहीं एक नहीं ये दो मंदिर हैं जो राजा महिपाल ने 11 वीं शताब्दी में बनवाये हैं। हाँ ये कहानी सच लगती है कि इनमें से एक मंदिर राजा की महारानी ने बनवाया जो विष्णु भक्त थीं और इस मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित की। इस मंदिर को सहस्त्रबाहु (Thousand Arms ) मंदिर कहा गया। ये मंदिर दूसरे वाले मंदिर से कुछ बड़ा भी है। आखिर सास ने बनवाया था तो बड़ा होना भीचहिये था क्यूंकि सास , हमेशा ही बहु से कद और पद में बड़ी होती है। दूसरा मंदिर कुछ छोटा है जिसे महाराजा महिपाल की पुत्रवधु ने बनवाया जो शिवभक्त कही जाती थीं। हालाँकि मंदिर देखने पर लगता है कि मंदिर की दीवारें विष्णु , शिव , ब्रह्मा , सरस्वती और अन्य देवी -देवताओं की सुन्दर प्रतिमाओं से सुसज्जित हैं । मंदिर की दीवारों पर वैष्णव , शैव और शक्ति से सम्बंधित विभिन्न प्रतिमाओं और उनसे सम्बंधित परम्पराओं को बहुत ही सुन्दर रूप में उकेरा गया है। इन मंदिरों में भगवान विष्णु को पदमनाभन के रूप में विराजमान किया गया है जो इस क्षेत्र के जैन और हिन्दू मंदिरों की विशेषता कही जाती है। भगवान श्री कृष्ण से सम्बंधित विभिन्न लीलाओं को भी दीवारों पर बने चित्रों-प्रतिमाओं के माध्यम से व्यक्त किया गया है। 

ग्वालियर फोर्ट के अंदर जाते समय आपको एक टिकट लेना पड़ता है। सास-बहू मंदिर के लिए अलग से टिकट नहीं लगता बल्कि उसका टिकट भी इस फोर्ट वाले टिकट में ही शामिल रहता है। बड़े मंदिर में (जिसे सास मंदिर भी कहते हैं ) जब आप अंदर पहुँचते हैं तो इस को कई बार विध्वंस किये जाने के लक्षण आपको साफतौर पर दिखाई देते हैं। दुःख होता है और गुस्सा भी आता है। बाहर से जरूर मंदिर को पुराना रूप देने की बेहतर कोशिश हुई है लेकिन अंदर उनके आतंक और उनकी बेशर्मी के सबूत आसानी से देखने को मिलेंगे। 

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अगर आप कभी ग्वालियर जाते हैं और अगर आपके पास समय की परेशानी नहीं है तो सास-बहु मंदिर देखने के लिए शाम यानी अँधेरा होने से पहले का समय चुनिए। उस वक्त आपको ये मंदिर और भी खूबसूरत लगेंगे।

तो अभी जैन मूर्तियां देखने चलेंगे और फिर उसके बाद तेली मंदिर जाएंगे। बने रहिये साथ-साथ.......


सासबहू मंदिर का बड़ा मंदिर , जिसे सास मंदिर भी कहा जाता है 
प्रवेश द्वार की सुंदरता देखिये 




11 वीं शताब्दी में इतना महीन और महान काम.... गज़ब है 


सासबहू मंदिर का छोटा मंदिर जिसे बहु मंदिर कह सकते हैं 





फिर मिलेंगे जल्दी ही ........

 Gurudwara Bandi Chhod : Gwalior

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Date of Journey : 03 Dec.2019 


पिछली पोस्ट का आखिरी फोटो देखेंगे तो उसके सामने एक खाली जगह और उसके आगे एक प्लेटफार्म जैसा दिखेगा। दोबारा लगाऊंगा उस पिक्चर को। ये जो खाली जगह और प्लेटफार्म है ये Light & Sound Show के लिए है। यहां हिंदी और अंग्रेजी में लाइट एंड साउंड शो होता है रात को 7: 30 बजे से जिसमें महानायक अमिताभ बच्चन की आवाज श्रोताओं को मुग्ध कर देती है। निश्चित बात है कि उसका टिकट लगता है। 


थोड़ा आगे बढ़ते हैं तो कई सारे खम्भे दीखते हैं। चौरासी खम्भे बताते हैं लेकिन इतिहास अनुसार 80 खम्भे हैं जिसका जिक्र गुरु हरगोबिंद सिंह जी की कहानी में भी मिलता है -अस्सी खम्भे के रूप में। इन खम्भों को पता नहीं क्यों बनाया गया ? लेकिन इनका पैटर्न बहुत शानदार है। इनके आखिर में एक बावली है जिसे किले के लिए बनवाया गया था जिससे पानी की सप्लाई लगातार मिलती रहे फोर्ट को ! लेकिन जहांगीर ने इसका दूसरा ही फायदा उठाया। कहते हैं उसने गुरु हरगोबिंद जी और अनेक राजाओ को यहां बंदी बनाकर रखा था। गुरु हरगोबिंद सिंह जी , जो छठवें गुरु हैं , उन्हें सन 1606 में गुरु की गद्दी पर बिठाया गया था और तब उनकी उम्र क्या थी ? जानते हैं ! मात्र 11 वर्ष ! और 14 वर्ष की उम्र में जहांगीर ने उनकी ताकत , उनकी हिम्मत से डरकर उन्हें ग्वालियर में बंदी बना लिया।

उनको छोड़ने के साल पर इतिहासकारों में मतभेद हैं लेकिन इतना जरूर है कि उन्हें जिस जगह छोड़ा गया उसे बंदी छोड़ गुरुद्वारा कहा गया और उनके साथ कई और राजाओं को भी मुक्त किया गया। गुरु हरगोबिंद सिंह जी ने अकेले रिहा होने से मना कर दिया था और शर्त लगाईं थी कि उनके साथ बंदी रहे राजाओं को साथ छोड़ा जाएगा तभी वो भी मुक्त होंगे। असली लीडर ये होता है ! राजाओं की संख्या 52 बताते हैं जानने वाले।

मजेदार किस्सा है। गुरु हरगोबिंद सिंह जी को मुक्त करने के लिए जहांगीर ने अपने मंत्री वज़ीर खान को तीन बार उनके पास भेजा लेकिन गुरु जी अकेले वहां से नहीं जाना चाहते थे। आखिर चौथी मुलाक़ात में ये तय हुआ कि जो राजा , गुरु जी के वस्त्र को पकड़कर बाहर आएंगे वो मुक्त होंगे। जहांगीर असल में राजपूत राजाओं को किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहता था लेकिन उस वक्त की परिस्थितियां कुछ इस तरह की बन गईं कि उसे ये शर्त लगानी पड़ी। सभी राजा , जो गुरु हरगोबिंद सिंह जी के साथ बंदी बने हुए थे , वो सब गुरु हरगोबिंद जी के चौंगे (गाउन ) का एक हिस्सा पकड़कर जेल से बाहर निकल आये और मुक्त हुए। 

हर वर्ष दीपावली के साथ ही बंदीछोड़ दिवस भी मनाया जाता है। सिख सम्प्रदाय में इस दिवस की बहुत मान्यता है क्यूंकि ये माना जाता है कि इसी दिन गुरु हरगोबिंद सिंह जी जेल से बाहर आये थे। गर्व है भारत को ऐसे आध्यात्मिक और समाज के नगीने पर !! मिलेंगे जल्दी ही......


ग्वालियर के जानकार लोग समझाएं ये क्या है ? 
अस्सी खम्भे का प्रवेश द्वार .......आकर्षित करता है 



ये अस्सी खम्भे के पीछे का हिस्सा है जहां सिक्योरिटी वाले ने जाने को रोक दिया 
अस्सी खम्भे ......गिने तो नहीं मैंने 
अस्सी खम्भे ........आपने गिने हैं कभी ?



ये है वो बावली जिससे फोर्ट को पानी की सप्लाई होती थी।  बहुत बड़ी है फोटो पूरा नहीं आ सका 
यही है क्या वो ग्वालपा ऋषि का सरोवर ? जिनके नाम पर इस शहर कानाम ग्वालियर पड़ा 



क्या खूबसूरत रास्ता है बंदीछोड़ गुरुद्वारा जाने का 




 बंदीछोड़ गुरुद्वारा 

 Gwalior Fort : Gwalior

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Date of Journey : 03 Dec.2019 

आसान नहीं होता किसी चीज को इतने दिनों तक संभालना और न केवल उसे संभाले रखना बल्कि उसी रूप में सजाये रखना  इसका सबसे सुन्दर और सजीव उदाहरण देखना हो तो एक बार ग्वालियर जाइये और वहां का फोर्ट देखिये। एक छोटी सी ऊंचाई की पहाड़ी पर बनाया गया ये फोर्ट यूँ तो बताया जाता है की इसे 10वीं शताब्दी में बनाया गया लेकिन कुछ ऐतिहासिक प्रमाण कहते हैं की ये यहां 6 वीं शताब्दी से मौजूद है। किले को मुख्य रूप से दो महल मिलाकर बनाकर फोर्ट बनाया गया जिसमें गूजरी महल और मान मंदिर बहुत सुन्दर बनाये गए थे । गूजरी महल को तो अब म्यूजियम में बदल दिया गया है लेकिन मान मंदिर बहुत ही शान से आज भी खड़ा है।

इसके इतिहास के साथ एक बड़ी अजीब सी बात जुडी हुई है। ग्वालियर के पहले राजा सूरज सेन एक बार लकवाग्रस्त हो गए तो उनका इलाज करने एक ग्वालपा नाम के संत आये जिन्होंने वहीँ स्थित एक सरोवर के जल से उन्हें ठीक कर दिया ...ये सरोवर अब भी है यहां फोर्ट काम्प्लेक्स में लेकिन इसके साथ ही संत ग्वालपा ने राजा सूरज सेन को अपने नाम के साथ पाल जोड़ने का आदेश दिया और ये भी ताकीद कर दिया की जब तक उनके वंशजों के साथ पाल लगा रहेगा तब तक फोर्ट उनके लिए भाग्यशाली भी होगा और उनके कब्जे में रहेगा । लेकिन ये सब 83 राजाओं तक तो सही चलता रहा मगर 84 वें राजा तेज करन ने अपने नाम के साथ 'पाल " नहीं लगाया और इसका नुकसान ये हुआ कि उन्हें अपना किला गंवाना पड़ा। शायद उन्हें लगा होगा कि कुछ अलग हट के किया जाए इसलिए नाम के साथ पाल नहीं जोड़ा होगा। 


ग्वालियर मध्य भारत का मुख्य राजवंश रहा था इसलिए ऐसा संभव ही नहीं था कि औरत खोर और दौलत खोर अफगान  की बुरी निगाहें इस जगह पर न पड़तीं। कच्छप , हुण और चन्देलों से होते हुए ये किला आखिर गज़नी के कब्जे में आया जिसे उसने 35 लाख लेकर चार दिन बाद मुक्त कर दिया। ये किला जितना बेहतरीन है उतना ही बड़ा भी है। काम्प्लेक्स इतना बड़ा है की आपको पूरा दिन लग सकता है अगर आप इसे पूरी तरह देखना चाहते हैं तो। बाकी अगर पाला छूकर भागना है और गिनती बढ़ानी है तो आप जितना चाहें उतना घूमें। 1398 ईस्वी में आखिरकार ये फोर्ट तोमर राजाओं के कण्ट्रोल में आ गया और इस वंश के सबसे विख्यात राजा -राजा मान सिंह हुए। उन्होंने किले के अंदर बहुत सारे मोनुमेंट्स बनवाये जिन्हें आज देश -दुनियां से देखने हजारों -लाखों आते हैं। लेकिन 1505 ईसवी में दिल्ली की सल्तनत के सिकंदर लोधी ने इसे कब्जाने की कोशिश की , हालांकि वो सफल नहीं हुआ मगर 1516 ईस्वी में सिकंदर लोधी के शहज़ादे इब्राहिम लोधी ने फिर से इस पर आक्रमण कर दिया और इस बार वो इस किले पर कब्जा करने में सफल हो गया। मान सिंह तोमर की मृत्यु के परिणाम स्वरुप ये फोर्ट इब्राहिम लोधी के कब्जे में आ गया। जल्दी ही मुग़ल शासक बाबर ने इस पर कब्जा कर लिया और फिर उससे शेर शाह सूरी ने इसे 1542 में बाबर से छीन लिया। हेमू , दिल्ली का शासक शायद इतिहास का वो चरित्र रहा जिसे जितनी प्रशंसा मिलनी चाहिए थी , जिस प्रशंसा का वो अधिकारी था , उतनी प्रशंसा उसे नहीं मिली ? मिलती भी कैसे ? जब भारत का इतिहास लिखने वाले दिल और दिमाग से वामपंथी रहे हों ! हेमू ने भी इस फोर्ट को अपने कब्जे में रखा और इसका उपयोग अपनी सेना को रखना के लिए किया जिसे Garrison कहा जाता है अंग्रेजी में। कुछ दिन बाद ये फोर्ट अकबर के कब्जे में भी रहा। जहां उसने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों को कैदी बनाकर रखा। 


जब अकबर ने इस किले पर कब्जा कर लिया तो उसका शासन लम्बा चला और आखिरकार जहांगीर भी इसके कब्जेदारों में शामिल रहा। जहांगीर ने गुरु अर्जुन देव जी को मृत्युदंड दिया था जिसके बाद गुरु हरगोविंद जी को सिर्फ 11 वर्ष की उम्र में ही गुरु का दर्ज़ा दिया गया। गुरु हरगोविंद जी के अंदर जहांगीर से बदला लेने की भावना आग उगल रही थी मगर वो अभी बहुत छोटे थे उम्र से। जहांगीर इतना कमजोर निकला कि उसने 1609 ईस्वी में मात्र 14 साल के गुरु हरगोविंद जी को डर के मारे यहीं ग्वालियर के किले में बंदी बना दिया। और बहाना क्या बनाया गया ? बहाना ये कि गुरु अर्जुन देव और सिखों पर जो जज़िया लगाया गया था वो नहीं चुकाया गया था। बस इसी बात के लिए जहांगीर ने उन्हें बंदी बना लिया। जहांगीर शासक था या लुटेरा था ? किडनैपर था ? जहांगीर , शासक ! हाहाहा ---- जिस शासक की 14 साल के सिख युवक से फट रही हो और जिसने डर के मारे उसे जेल में डाल दिया वो शासक भी इतिहास में महान बन गया। हद्द है चाटुकारिता और इतिहासकारों कके ज्ञान की ! आखिरकार गुरु हरगोविंद को मुक्त किया गया और जिस जगह उन्हें छोड़ा गया उस जगह एक सुन्दर गुरुद्वारा बना है आज जिसे -बंदी छोड़ गुरुद्वारा कहा जाता है। जिस दिन गुरु हरगोविंद जी को छोड़ा गया था उस दिन को बंदी छोड़ दिवस के रूप में मनाया जाता है। और डिटेल में बात करेंगे इस बारे में जब बंदी छोड़ गुरूद्वारे चलेंगे। 


किला बाहर से देखने पर बहुत ही खूबसूरत दिखता है। इसकी दीवारों रंग अभी तक चमक बिखेर रहे हैं और क्या बेहतरीन कलर किये गए हैं ! अद्भुत ! अप्रतिम। बाहर से देखने पर ही इसकी विशालता और सुंदरता नजर आने लगती है लेकिन जब आप मान मंदिर में जाते हैं अंदर तो सीधे Courtyard में पहुँचते हैं। कोर्टयार्ड बहुत बड़ा तो नहीं कहूंगा लेकिन सुन्दर बहुत है। सुन्दर भी और सुसज्जित भी। टिकट लगता है 40-50 रूपये का। पक्का याद नहीं आ रहा अब। Courtyard से नीचे जाने के लिए छोटी -छोटी सीढ़ियां बनी हुई हैं। कोई कहता है ये तीन मंजिल का था किला कोई कहता है कि सात मंजिल का था। खैर गौर करने वाली बात ये है की बीच में कुछ जाल जैसा लगाया गया है और ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी गहरे कुँए को ढका गया हो ! जी , बिलकुल ! इतिहास कहता है कि औरंगज़ेब ने इसी किले में अपने भाई मुराद और अपने दो भतीजों को फांसी के तख्ते पर झुलाया था। अंदाज़ा लगाना मुहकिल नहीं है कि ये वही जगह है जो बहुत गहरी है। हालाँकि नीचे अँधेरा बहुत रहता है जिससे फोटो लेना तो मुश्किल सा होता है लेकिन समझने के लिए ज्यादा कठिन नहीं है। जहांगीर का भी एक महल भी मान मंदिर से थोड़ा सा हटके बनाया गया है। लेकिन आज भी मान मंदिर यानि ग्वालियर फोर्ट जितना सुन्दर दिखता है , जहांगीर महल खँडहर सा लगता है उसके मुकाबले। तो अब आसपास के नज़ारे देख लेते हैं और फिर मिलते हैं जल्दी ही। .. असल में ग्वालियर इतना विस्तृत और ऐतिहासिक रूप से इतना समृद्ध है कि एक दिन भी कम पड़ जाए लेकिन लिखने की भी एक सीमा है इसलिए अब और नहीं......

फोर्ट की बाहरी दीवारें 
 
 



Courtyard 


ग्वालियर का विहंगम द्रश्य 

Courtyard भी बेहद कलरफुल है  


ये शायद करण महल है 



 

ये गूजरी महल है जो अब म्यूजियम बन चुका है।  ऊपर से गूजरी महल का एक दृश्य 




अच्छा ......हो गया ! अब आगे चलते हैं ...


फिर मिलेंगे जल्दी ही :

 Chaturbhuj Mandir : Gwalior

चतुर्भुज मंदिर : ग्वालियर

Date of Journey : 03 Dec.2019 

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जैन साब की गज्जक ने उदर को आनंद प्रदान कर दिया और अब ग्वालियर फोर्ट देखने को हल्के-हल्के कदमों से बढ़ चले। गूजरी महल से थोड़ी ऊंचाई पर है ग्वालियर फोर्ट इसलिए मुझे जैन साब की तेज तेज धड़कनें सुनाई पड़ रही थीं। मैंने उन्हें बिना बताये अपनी चाल धीमी कर दी। आज मेरे गाइड , मेरे मित्र ग्वालियर के कण कण से वाकिफ श्री शरद कुमार जैन जी रहेंगे। धन्यवाद जैन साब , साथ रहने और ग्वालियर से परिचित कराने के लिए !

अभी धीरे -धीरे ग्वालियर फोर्ट काम्प्लेक्स में ही मौजूद चतुर्भुज मंदिर की तरफ पहुँच रहे हैं। गूजरी महल से चतुर्भुज मंदिर के लिए ठीक सी चढ़ाई चढ़नी पड़ रही है करीब 20 -25 मीटर की ऊंचाई तो होगी ही और शायद इसीलिए ज्यादातर लोग इस रास्ते से नहीं आते। पानी की बोतल भी खत्म होने को है। चतुर्भुज मंदिर बहुत छोटा सा मंदिर है , अगर ये यहां नहीं होता और एक महत्वपूर्ण तथ्य इसके साथ न जुड़ा होता तो ये एक गुमनाम मंदिर में सुमार किया जाता। वो महत्वपूर्ण तथ्य क्या है ? पढ़ेंगे इस बारे में !

ग्वालियर किले की मजबूत , सुदृढ़ , रंगीन और खूबसूरत दीवारों से नजर हटके अगर कहीं रूकती है तो वो है चतुर्भुज मंदिर जिसे कभी चट्टान काटकर बनाया गया था लेकिन मंदिर की खासियत इसकी बनावट या खूबसूरती नहीं बल्कि इसके अंदर की दीवारें हैं जो एक ऐसा "तथ्य" समाहित किये हुए हैं जिस पर भारत गर्व का अनुभव करता है। सभी को पता है कि स्वामी विवेकानंद जी ने शिकागो के धर्म सम्मलेन में सन 1893 में जीरो को आधार बनाकर एक ओजस्वी , ऐतिहासिक और लंबा भाषण दिया था जिसे आज भी बहुत याद किया जाता है। बहुत सम्मान की द्रष्टि से भी देखा जाता है। ये जीरो ही है जिसने चतुर्भुज मंदिर को इतना विशिष्ट बना दिया और विश्व के लिए धरोहर के रूप में एक स्थान पा लिया। कार्बन डेटिंग विधि के माध्यम से ये पक्का हुआ है कि चतुर्भुज मंदिर की अंदर की दीवारों पर बना जीरो , विश्वभर में सबसे प्राचीन जीरो है। इसके अलावा वियतनाम और पाकिस्तान के पेशावर में भी इस तरह की आकृतियां पाई गयी हैं जिन पर जीरो की आकृति बनी हुई है।

एकबार मुंबई से "आयरन लेडी " के नाम से विख्यात अल्पा दगली जी का फ़ोन आया था। उन्हें कुछ जानना था जीरो के ही विषय में क्यूंकि उनका बेटा रक्षित दगली इस फील्ड में कुछ काम कर रहा था। रक्षित से अभी तक मिला नहीं हूँ मैं लेकिन 13 -14 साल के बच्चे के कारनामे सुनकर -पढ़कर इतना भरोसा होने लगा है कि एक शानदार स्कॉलर भारत का भविष्य तैयार कर रहा है। तो जी अल्पा दगली को तो पता नहीं मैं क्या बता पाया लेकिन मैंने बहुत कुछ पढ़ लिया इस चक्कर में। और ये भी एक कारण रहा ग्वालियर के चतुर्भुज मंदिर तक की राह तक पहुँचने का। धन्यवाद अल्पा !!

अब फिर से वहीँ चलते हैं यानि चतुर्भुज मंदिर और जीरो पर ही बात कर लेते हैं। हम जब वहां पहुंचे तो मंदिर के छोटे से दरवाज़े का ताला लगा हुआ था और ताला खोलेगा कौन ? कोई होगा तो खोलेगा ! कोई था ही नहीं इसलिए बाहर से जो दिखा , जितना दिखा वो देख लिया ! और दिखा क्या -बस कुछ मूर्तियां ! लेकिन हम कुछ और भी देखना चाहते थे। हम इस मंदिर की अंदर की दीवारें देखना चाहते थे जिनमें जीरो की आकृति अंकित है। नहीं देख पाए !! इसलिए किसी और जगह से फोटो लेनी पड़ेगी !!

सवाल उठा सकते हैं आप कि यहां जीरो क्यों लिखा गया ? क्या उद्देश्य रहा होगा ! कुछ अभिलेख ऐसा कहते हैं कि यहां 187 हस्त गुणा 270 हस्त का एक बाग़ बनाया गया था (एक हस्त मतलब 1.5 फ़ीट ) ! इस गार्डन से प्रतिदिन 50 फूलों के हार इस मंदिर में उपयोग किये जाते थे। इन दोनों 270 और 50 संख्याओं में आखिरी digit जीरो आता है। लोगों का मानना है की जीरो की उपयोगिता इस मंदिर में उल्लिखित इस स्टेटमेंट से पहले से थी। संभव है ! किन्तु लिखित रूप में सबसे पुराना अभिलेख यही है इसलिए माना जाता है कि यही सबसे पुराना जीरो सिद्धांत का epigraphical evidence है।

भारत में ही जीरो की उत्पत्ति का एक बड़ा कारण ये भी माना जा सकता है कि यहां जीरो अर्थात शून्य की परिकल्पना हिन्दू धर्म से पूर्ण रूप से संबंधित रही है। शून्य में देखना ! शुन्य में समाना ! शून्य हो जाना जैसे मुहावरे कहीं न कहीं इस परिकल्पना को सत्य सिद्ध करते हैं कि भारत की "निर्वाण (Nothingness ) " की प्रक्रिया जीरो के प्रयोग पहले भारत में ही शुरू हुए होंगे। भारतीय संत और ज्ञानी , एक निश्चित आयु के बाद निर्वाण ले लिया करते थे अर्थात अपने आपको शून्य मान लिया करते थे। भौतिक रूप से अनुपस्थित !!

मंदिर और उसके आसपास के खूब सारे फोटो लेकर अब ग्वालियर के फोर्ट की तरफ निकल रहे हैं। ग्वालियर फोर्ट जिसे मान मंदिर भी कहते है , बेहद खूबसूरत जगह दिखाई दे रही है। बाकी तो अंदर जाकर ही पता चलेगा ........


हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में Sign Board लगे हैं जीरो के

ग्वालियर ऐसा दीखता है चतुर्भुज मंदिर से




चतुर्भुज मंदिर : छोटा सा ही है
इसमें जीरो (0) ढूंढिए : pc : gwaliorzoo2-kRID--621x414@LiveMint
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ग्वालियर के शानदार फोर्ट की पहली झलक


 Gujari Mahal : Gwalior

गूजरी महल : ग्वालियर
Date of Journey : 03 Dec.2019 

मौसम भी दिलखुश हो , Leave Account में छह CL बची हों और जेब थोड़ा सा भारी हो😋  तो किसी भी यात्रा पर निकलने में बुराई नहीं है। ऐसे में बस आपको घरवाली को समझाना होता है और अगर सही तरह से समझाया जाए तो समझ भी जाती हैं। ये यात्रा कुछ अलग थी। अलग दूसरे अर्थों में - जहाँ तक संभव होगा पैसेंजर ट्रेन से यात्रा करूँगा , ऐसी जगहें देखूंगा जो बहुत ज्यादा प्रसिद्ध नहीं हैं लेकिन खूबसूरत हैं , भारत की महान संस्कृति और विरासत को परिलक्षित करती हैं। ऐसी जगहें जो भले पर्यटन मानचित्र पर न हों लेकिन इतिहास के पन्नों में दर्ज़ हैं। 


दो दिसंबर की रात ठण्ड से कपकंपा रही थी मुझे लेकिन ये वो रात थी जिसने मुझे फिर से कई सालों बाद भारत का सही चित्र दोबारा दिखाया था। दिल्ली के हज़रत निजामुद्दीन स्टेशन से दक्षिण एक्सप्रेस पकड़कर मैं करीब ढाई -तीन बजे आगरा कैंट स्टेशन पहुँच गया था। आज की पैसेंजर यात्रा आगरा से ही शुरू करनी थी क्यूंकि दिल्ली से आगरा तक की पैसेंजर ट्रेन की यात्रा पिछले वर्ष कर चुका हूँ और अब आगे बढ़ने की तैयारी थी। आज की मंजिल ग्वालियर पहुँचने तक थी जिसके लिए आगरा -झांसी पैसेंजर ट्रेन का इंतज़ार करना था। अभी करीब तीन घंटे इंतज़ार करना था क्योंकि झांसी पैसेंजर ट्रेन का समय सुबह 6 बजे का है आगरा से खुलने का। कॉफ़ी ने थोड़ा गर्मी का एहसास कराया तो स्टेशन से बाहर निकल आया। स्टेशन के आसपास माहौल हमेशा ही जाग्रत (Live ) रहता है , चाहे रात के दस बजे हों या सुबह के दो बजे हों। हर जगह पैक , हर बेंच फुल। टिकट विण्डो के आसपास का पूरा स्पेस फुल था। सब सोये थे -कुछ अपनी ट्रेन के इंतज़ार में , कुछ का यही ठिकाना होता है रात का। पता नहीं ये तस्वीर कब बदलेगी ? बदलेगी भी या नहीं !! 

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समय के साथ ट्रेन भी सरकती रही और धौलपुर , मुरैना होते हुए नौ बजते बजते मैं ग्वालियर के अपने पहले गंतव्य की धरती पर उतर चुका था। पिछले कुछ वर्षों में रेलवे में बहुत कुछ बदला है और इसी का एक हिस्सा है स्टेशन के बाहर "Deluxe Toilets" का होना। एकदम साफ़ -सुथरे और कई सुविधाओं से आपके जीवन और आपकी पॉकेट को आराम देते हैं ये टॉयलेट्स। नहाना है , फ्रेश होना है ? बैग रखना है ? सबकुछ इनके यहाँ मौजूद है - बस थोड़ा ज्यादा खर्च करना पड़ेगा आपको। कितना ज्यादा ? कुछ साल पहले आप बदबूदार टॉयलेट्स का उपयोग करने के लिए आप पांच रुपया खर्च करते थे लेकिन अब एकदम साफ़ सुथरे टॉयलेट्स को उपयोग करने के लिए 10 रुपया खर्च करते हैं ! क्या बुरा है जी ? तो जी हम भी नहाधोकर , बाबूजी बन गए और कैमरा और पावर बैंक लेकर ग्वालियर घूमने निकल चले। सुना है ग्वालियर की कचौड़ी बहुत स्वादिष्ट होती हैं ! तो कचौड़ी with चाय उदरस्थ कर ली जाए फिर अपने मित्र ग्वालियर निवासी विकास नारायण श्रीवास्तव और शरद कुमार जैन जी को सूचित किया जाएगा। आप भी कभी जब ग्वालियर जाने का मन बनाएं तो वहां कचौड़ी और पोहे का स्वाद लेना मत भूलना हालाँकि मुझे अब भी लगता है कि मेरे होम टाउन अलीगढ जैसी कचौड़ी शायद ही कहीं मिलती हो ! जबरदस्त होती है अलीगढ की कचौड़ी और पोहा ! जो पोहा मेरी बड़ी बहन के हाथ का या इंदौर में !! 


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 पैदल -पैदल रानी लक्ष्मी बाई की समाधि की तरफ बढ़ चला। यहां बैठना ग्वालियर के स्थानीय लोगों का प्रिय टाइम पास फार्मूला है और लव बर्ड्स के लिए एकांत मिलने का उचित और मुफ्त ठिकाना। यहीं पास में ही गोपाचल पर्वत का बोर्ड लगा है लेकिन अंदर एक बगीचा सा ही दिखा। चौकीदार ने बताया कि आगे जाकर बगीचा है और एक जैन मंदिर है। असली गोपाचल पर्वत ग्वालियर किले के पास है। इस किले को मान मंदिर भी कहते हैं। चलेंगे वहां भी !! लो जी घूमते - घामते फूल मैदान पहुँच गए। फूल मैदान का नाम बहुत सुना करता था क्योंकि ग्वालियर की ज्यादातर रैलियां पहले इसी मैदान में हुआ करती थीं। फूल मैदान में फूल के नाम पर बस कुछ गेंदा , कुछ गुलाब के ही फूल दिखे। इतनी फूल तो हमारे आसपास के पार्कों में दिख जाते हैं , शायद इससे भी ज्यादा !! यहां से गूजरी महल के लिए ऑटो पकड़ते हैं और चलते हैं। 



Rani Lakshmi Bai Samadhi

Narrow Gauge track . Yes ! Narrow Gauge track still exist in Gwalior

गूजरी महल , राजा मान सिंह ने 15 वीं शताब्दी में अपनी प्रिय पत्नी मृगनयनी के लिए बनवाया था जो आज एक म्यूजियम के रूप में ज्यादा प्रचलित है। शायद 25 रूपये का टिकट लगा था यहां अंदर जाने के लिए। अंदर गया तो वहां फोटो लेने लगा। फोटो लेते हुए देखकर पहले एक महिला कर्मचारी आई और फिर एक पुरुष कर्मचारी - टिकट है आपके पास ? हाँ -है न ! ये देखो !! अरे ये नहीं कैमरे का टिकट ? कैमरे का अलग से टिकट थोड़े ही लगता है यहाँ ? नहीं ! लगता है !! आप बिना टिकट के फोटो नहीं ले सकते !! मैं भड़क गया !! ऐसा है भाई ये लो अपना टिकट और मुझे मेरे पैसे वापस करो ! मुझे नहीं देखना यहां कुछ भी ! इतने में तीन चार पुलिस वाले भी पहुँच गए ! मामला रफा -दफा हुआ और खूब सारे फोटो खींचे बिना कोई अलग से टिकट लिए हुए। आप भी कैमरे का टिकट मत लेना क्योंकि कैमरे का अलग से कोई टिकट नहीं है ! ये लोग शायद अपना जुगाड़ बनाते हैं ऐसे डर दिखा के ! 25 या 30 रूपये का टिकट है और उसी में सब शामिल है !! आज बस इतना ही......




















This is our art work on the tiles !! So why appraise only the art work of Tajmahal ?







शरद कुमार जैन जी भी पहुँच गए थे जब तक गूजरी महल देखा।  सर आपकी गज़क बहुत स्वादिष्ट थी !! धन्यवाद आपका 








 गागरों का किला

झालावाड़ में झालरा पाटन के मंदिरों के अलावा एक और सुन्दर टूरिस्ट स्पॉट है गागरों का किला। झालावाड़ से ज्यादा दूर नहीं लगभग पंद्रह किमी है. आप अपनी गाड़ी या ऑटो से भी जा सकते हैं. गाड़ी पार्किंग के लिए किले के अंदर जगह है. किला बारहवीं शताब्दी में डोड राजा बिजल देव सिंह ने शुरू करवाया था हालांकि यह जगह सातवीं सदी से ही इस्तेमाल की जा रही थी. किले के निर्माण की कोई पक्की तारीख नहीं मालूम है. यह किला आहु और कालीसिंध नदियों के संगम पर स्थित है. दोनों नदियां तीन ओर से एक ऊँची पहाड़ी को घेर लेती हैं जिस पर ये किला बना हुआ है. किले के प्रवेश द्वार के पास एक झील बना दी गई थी जिसके कारण यह किला चारों तरफ से पानी से घिर गया अर्थात 'जल दुर्ग' बन गया है. इस झील या खाई को गिद्ध खाई कहते हैं. 

डोड ( परमार ) राजा द्वारा बनाए जाने के कारण इसे डोड गढ़ भी कहते हैं. इस जल दुर्ग की एक और खासियत है की किले की नींव नहीं है बल्कि पहाड़ी की चट्टानों के ऊपर ही भारी पत्थरों को रख कर दीवारों का निर्माण कर दिया गया है. किले के दो दरवाज़े हैं एक नदी की तरफ और एक पहाड़ी रास्ते की तरफ. तीन परकोटे हैं और अंदर महल. मंदिर, दीवाने ए आम और ख़ास हैं. प्रवेश द्वार की तरफ सूफी संत मिट्ठे शाह की दरगाह भी है. पास में ही संत पीपाजी का आश्रम भी है.  

किले पर डोडिया राजपूत,  खींची राजपूतों ने राज किया उसके बाद खिलजी, राणा कुंभा, अकबर और महारावल भीम सिंह ने राज किया। किले ने 14 लड़ाइयां और दो बार जौहर देखे। 

जून 2013 में राजस्थान के 6 किलों को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर घोषित किया गया था जिनमें गागरों का किला भी शामिल है. अन्य पांच किले हैं - आमेर का किला, चित्तोड़ गढ़, जैसलमेर का किला, कुम्भल गढ़ और रणथम्बोर का किला। प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

1. किले का एक परकोटा। यहाँ से सुन्दर दृश्य देखे जा सकते हैं 

2. महल का एक भाग 

3. मानसून के कारण आस पास अच्छी हरियाली हो जाती है 

4. किले का प्रवेश द्वार गणेश पोल. गेट के ऊपर नक्कार खाना है जहाँ नगाड़े बजाए जाते थे. 

5. सैनिक निवास 

6. परकोटा और दूर के पहाड़। ये विंध्याचल रेंज की मुकुन्दरा पहाड़ियां हैं 

7. किले का इस भाग और दूर की पहाड़ियों के बीच कालीसिंध नदी बहती है 

8. महल के झरोखे से एक नज़ारा 

9. यहाँ कभी जौहर हुआ था 

10. राम बुर्ज और सैलानी 

  
11. बड़ा महल 


12. अँधेरी बावड़ी 

13. बड़े महल का दालान 

14. बड़े महल का एक हिस्सा 

15. प्रवेश द्वार के पास बना किले का नक्शा 

16. खींची राजपूत राजा पीपाजी संत बन गए थे. आस पास के क्षेत्र में इनकी बड़ी मान्यता है

17. संत पीपाजी का निर्माणाधीन मंदिर 

लाल बाग़ और राजवाड़ा, इंदौर

मध्य प्रदेश का इंदौर शहर होल्कर वंश का बसाया हुआ है. इंदौर शहर के दो प्रमुख आकर्षण हैं  नेहरू केंद्र लाल बाग़ और राजवाड़ा. दोनों ही शहर के बीच में हैं और आस पास भीड़ वाले बाज़ार हैं. इंदौर मध्य प्रदेश राज्य का सबसे ज्यादा और घनी आबादी वाला शहर है पर फिर भी राज्य का और देश का सबसे साफ़ शहर है. शहर में नगर निगम की जीप घूमती नज़र आती है और कोई कूड़ा फेंकता नज़र आ जाए तो तुरंत लाउड स्पीकर पर चेतावनी हो जाती है. जीप में बैठे अधिकारी की सीटी भी बजनी शुरू हो जाती है. पर ट्रैफिक का हाल वही है जो देश के दूसरे शहरों में है. सफाई में तो नागरिक सहयोग यहाँ है पर ट्राफिक में नहीं है. 

1. लाल बाग़ 

शहर के बीच बने और 72 एकड़ के विशाल परिसर में फैले हुए लाल बाग़ नेहरू केंद्र में एक महल और बड़े उद्यान हैं. ये लाल बाग़ होल्कर वंश द्वारा बनाया गया था. बनवाने वाले होल्कर नरेश थे:  तुकोजी राव द्वितीय ( 1844  - 1886 ), शिवाजी राव ( 1886 - 1903 ) और तुकोजी राव तृतीय ( 1903 - 1926  ). तुकोजी राव तृतीय 1976 तक यहीं रहे. 1980 के दशक में महल की हालत खराब हो गई. 1988 में प्रदेश सरकार ने लाल बाग़ का अधिग्रहण कर लिया और इसे सांस्कृतिक केंद्र बना दिया. 

परिसर के बहत्तर में से चार एकड़ में 45 कमरों का महल बना हुआ है. लाल बाग़ का गेट लंदन के बकिंघम पैलेस की तर्ज पर बनवाया गया और उस पर होल्कर राज का चिन्ह भी लगाया गया है. गेट पर अष्ट धातु के दो शेर भी बैठाए गए हैं. महल में रोमन, फ्रेंच और बारोक शैली में निर्माण है. इटली की मूर्तियां, बेल्जियम से मंगवाया गया कांच का सामान और कई यूरोपियन देशों से मंगाई गई पेंटिंग्स लगाईं हुई हैं. कमरों की छतों पर सुन्दर चित्रांकन है और फर्श पर सुन्दर कालीन बिछे हुए हैं. कई छोटे बड़े मीटिंग रूम, डाइनिंग हाल इत्यादि हैं. 

कुछ फोटो प्रस्तुत हैं:

2. लाल बाग़ का गेट 

3. गेट से अंदर महल की ओर जाती सड़क 

4. लाल बाग़ महल 

5. सूबेदार मल्हार राव होल्कर की प्रतिमा ( 1693- 1766 ) 

6. दरबार हाल के दरवाज़े पर देवी अहिल्या बाई होल्कर की फोटो 

7. महल का एक गलियारा 

8. शाही शौक की निशानी 

9. मीटिंग हॉल 

10. मीटिंग हॉल 

11. मीटिंग हॉल 

12. रानी विक्टोरिया की मूर्ति 

13. डांस हॉल 

2. राजवाड़ा 

राजवाड़ा या होल्कर महल इंदौर शहर के घनी आबादी के बीच में बना हुआ है. इसे इस तरह भी कह सकते हैं की इंदौर शहर इसी भवन के आस पास बनता चला गया. शुरुआत 1747 में सूबेदार मल्हार राव होल्कर ने अपने परिवार के निवास बनाने के लिए की और बाद में महल बनाया गया और समय समय पर महल में फेर बदल होते रहे. लकड़ी का काफी काम हुआ था जिसके कारण कई बार आग भी लग चुकी है. पेशवा बाजी राव ने मल्हार राव को ये जागीर दी थी जिसमें मालवा, खानदेश और इंदौर के आस पास के बहुत से गांव शामिल थे. महल सात मंज़िल का है और इसकी बनावट में मुग़ल, मराठा और यूरोपियन शैली शामिल हैं. कुछ फोटो प्रस्तुत हैं:

 
14. महल के अंदर मंदिर 

15. महल में अलग अलग शैली के भवन 

16. सुन्दर खम्बों से सज्जित गलियारा 

17. महल के पहले माले का एक भाग 

18. एक और अलग तरह का गलियारा 

19. आँगन 

20. राजस्थानी शैली के छज्जे 

21. मुख्य दरवाज़ा 

22. बाहर सड़क से एक दृश्य 

23. अंदर आँगन से एक फोटो 


24. लकड़ी के सुन्दर नक्काशीदार खम्बे 
 
25. राजवाड़े का इतिहास  


  



 नैनागिरी जैन मंदिर

नैनागिरी में जैन मंदिरों का एक बड़ा समूह है. यह जगह दलपतपुर जिला छतरपुर मध्यप्रदेश में है और सागर जिले से लगभग 55 किमी दूर है. नैनागिरी को रेशंदिगिरी या दिगम्बर जैन सिद्ध क्षेत्र भी कहते हैं. यहाँ 38 मंदिर पहाड़ी पर हैं, 13 मंदिर नीचे हैं और दो झील में हैं. इस स्थान के सम्बन्ध में कहा गया है कि:

पासस्स समवसरणे सहिया वरदत्त मुणिवरा पंच |
रिस्सिन्देगिरि सिहरे णिव्वाण गया णमो तेसिं ||

अर्थात इस स्थान रेशंदिगिरी पर पांच मुनियों - श्री वर दत्त, श्री मुनीन्द्र दत्त, श्री इन्द्र दत्त, श्री गुण दत्त और श्री सागर दत्त ने त्याग और कठिन तप के बाद निर्वाण प्राप्त किया.

एक अभिलेख के अनुसार यहाँ का सबसे पुराना मंदिर सन 1042 - 1109 के दौरान बना था. ये सभी मंदिर सैकड़ों बरसों तक जंगल में गुम रहे. कुछ साधकों ने 1900 के आस पास पहाड़ी में खुदाई करके इन मन्दिरों को खोजा था. पास की नदी की धारा के बीच में एक बड़ी शिला है जिसे सिद्ध शिला कहा जाता है जिस पर बैठ कर मुनियों ने तप किया था. साल में दो बार - श्री पार्श्वनाथ और श्री महावीर निर्वाण दिवस पर यहाँ मेले लगते हैं. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

1. श्री पार्श्व नाथ जिन्नालय 

2. झील में दो मंदिर 

3. वंदना यहाँ से प्रारम्भ होती है 

4. मुनियों की चर्चा 

5. भगवन बाहुबली मंदिर 

6. जिन्नालय 

7. श्री आदि नाथ 

8. श्री शांति नाथ और श्री कुन्थु नाथ जिन्नालय 

9. श्री चन्द्र प्रभु जिन्नालय  
10. श्री पार्श्व नाथ जिन्नालय 

11. श्री पार्श्व नाथ 

12. जैन मुनि 

13. पांच मुनि 

14. संक्षिप्त इतिहास 

15. श्री 1008 दिगम्बर जैन सिद्ध क्षेत्र रेशंदिगिरी 

17. जैन मंदिर 
18. आसपास का इलाका हरा भरा और बहुत सुंदर है 

 खजुराहो की कामुक मूर्तियाँ - 1

मध्य प्रदेश का छोटा सा शहर खजुराहो अपने मंदिरों के कारण विश्व प्रसिद्द है. ये सभी मंदिर विश्व धरोहर - World Heritage Site में आते हैं. भोपाल से खजुराहो की दूरी 380 किमी है और झांसी से 175 किमी. खजुराहो हवाई जहाज, रेल या सड़क से पहुंचा जा सकता है. हर तरह के होटल और अन्य सुविधाएं उपलब्ध हैं. 

खजुराहो की स्थापना करने वाले चन्देल राजा चंद्र्वर्मन थे जिन्होंने इसे अपने राज्य की राजधानी बनाया था. चन्देल राजवंश ने लगभग नौवीं शताब्दी से लगभग तेरहवीं शताब्दी तक बुंदेलखंड के कुछ हिस्सों और उसके आस पास राज किया था. खजुराहो के ज्यादातर मंदिर सन 850 से सन 1150 के बीच चंदेल राजाओं द्वारा बनवाए गए थे. बीस वर्ग किमी में फैले क्षेत्र में पच्चासी मंदिरों का निर्माण हुआ था. इन पच्चासी मंदिरों में से अब पच्चीस मंदिर ही शेष हैं जो छै वर्ग किमी में फैले हुए हैं. तेरहवीं सदी में यहाँ दिल्ली के सुल्तानों के हमले हुए और वो इस इलाके पर काबिज हो गए. मंदिरों को नुक्सान पहुंचा और मंदिरों की देखभाल और उनका महत्व घट गया. ज्यादातर मंदिर झाड़ झंखाड़ और जंगल में खो गए. 1830 में ब्रिटिश सर्वेयर टी एस बर्ट ने मंदिरों की पुनः खोज की.इस खोज के कुछ बरस बाद एलेग्जेंडर कन्निन्घम ने मंदिरों की विस्तृत जानकारी दी और 1852 में मैसी ने मंदिरों के पहले रेखा चित्र बनाए. 

मंदिरों में भारी, मज़बूत और बढ़िया किस्म का बलुआ पत्थर और ग्रेनाइट का प्रयोग किया गया है. पत्थर जोड़ने के लिए कोई सीमेंट नहीं इस्तेमाल किया गया है बल्कि इन पत्थरों में खांचे बना कर एक दूसरे में फंसा दिया गया है जो कमाल की कारीगरी है. सभी मंदिर ऊँचे और लम्बे-चौड़े चबूतरों पर बनाए गए हैं. ये मंदिर और मूर्तियाँ वास्तु और मूर्तिकला के बेमिसाल नमूने हैं. 

मंदिरों की बाहरी दीवारों पर लगभग आठ नौं फुट की ऊँचाई पर दो या तीन कतारों में सैकड़ों सुंदर मूर्तियां बनी हुई है. इनमें विष्णु और उनके अवतार, शिव, पार्वती, गणेश के अलावा यक्ष, यक्षिणी, देवियाँ, सैनिक, जानवर, पेड़, पौधे, और राजा रानियाँ हैं और जीवन के हर पहलु के विभिन्न दृश्य हैं. 

सभी मंदिरों को मिला कर देखा जाए तो महिलाओं की मूर्तियों की बहुतायात लगती है. लगभग 8-10% कामुक या मिथुन मूर्तियाँ हैं जो विश्व प्रसिद्द हैं और जो खजुराहो की पहचान बन गई हैं. सभी मूर्तियों में चाहे महिला हो या पुरुष, हृष्ट पुष्ट और भरपूर शरीर के बनाए गए हैं. स्त्रियों के वक्ष स्थल, नितम्ब, बाहें, टांगें, और चेहरे सही अनुपात में और सुंदर तरीके से दर्शाए गए हैं. बालों के जूड़े और स्टाइल, शरीर के विभिन्न भागों में पहने हुए जेवर बारीकी से बनाए गए हैं. पुरुषों ने भी बहुत से जेवर पहन रखे हैं, या कई तरह की दाढ़ियाँ रखी हैं. सभी के चेहरों पर अलग अलग परन्तु यथा-योग्य भाव हैं. ज्यादातर पुरुषों का हल्का सा बढ़ा हुआ पेट भी बनाया गया है याने ये लोग खाते पीते घर के हैं!
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

 प्रणय मुद्रा में युगल शालीनता और धैर्य के साथ. अंगों का पारस्परिक अनुपात, हाथों, बाहों और टांगों की स्थिति बेहतरीन ढंग से बनाई गई है  

कामुक युगल. हाथों पैरों की स्थिति और चेहरे पर भाव में सुंदर बारीकी है 

सिर पर मुकुट के कारण राजा रानी लग रहे हैं. चेहरों पर सौम्य भाव है. शारीरिक मुद्रा दोनों का अन्तरंग होना सुन्दरता से दिखाया गया है 
कामुक युगल की सुंदर भाव भंगिमाएं 

छोटे छोटे आलों में बनी कामुक युगल मूर्तियाँ शायद आम लोगों की हैं. ये ज्यादा सुघड़ और उतनी सुंदर नहीं हैं जितनी की राजा रानियों की 

प्यार में पुरुष की दाढ़ी सहलाती महिला ! दोनों के चेहरे के भाव आकर्षक हैं 

चुम्बन लेते मिथुन युगल की सुंदर मुद्रा 
डांस में मस्त युगल. पत्थर की युगल मूर्ती में पैरों, टांगों और हाथों का गजब का प्रदर्शन 
पत्थर के बने चुम्बन लेते कामुक युगल की शानदार प्रतिमा. पत्थर में होते हुए भी दोनों की शारीरिक भाषा में एक प्रवाह और आकर्षण है    

ऊँचे और विशाल जैन मंदिर की बाहरी दीवार में छोटी छोटी मूर्तिकारी की तीन पंक्तियाँ 

 खजुराहो की कामुक मूर्तियाँ - 2

खजुराहो की कामुक मूर्तियाँ - 1 से आगे दूसरा और अंतिम भाग :-

खजुराहो के हिन्दू और जैन मंदिरों में कामुक या मिथुन मूर्तियों को देख कर कोई शर्माता है, कोई झिझकता है, कोई खिलखिलाता है और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो देखना ही नहीं चाहते! जो भी हो सभी इन मूर्तियों को देखकर इन के बारे में सोचने पर मजबूर हो जाते हैं. और बातों के अलावा एक सवाल तो मन में आ ही जाता है कि मंदिर में ऐसी कामुक या मिथुन या erotica मूर्तियाँ क्यूँ बनाई गईं? अगर आप मैथुनरत युगल देखें तो उनके चेहरे शांत, आनंदित और सरल दिखते हैं उनमें उद्विग्नता या आक्रामक हवस नहीं दिखती. मंदिर की दीवारों पर कामुक मूर्तियाँ क्यूँ बनाई गईं, इस प्रश्न के उत्तर में कई कयास लगाए जाते हैं जैसे कि:

* मानव जीवन के क्रिया कलाप को चार मुख्य भागों में बांटा जा सकता है - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष. दूसरे शब्दों में पैदा होने के बाद संसार को देखना समझना, उसके बाद अपने और अपनों के जीवन यापन के लिए 'अर्थ' के जुगाड़ में लग जाना, उसके बाद अपना जीवन साथी ढूँढना और फिर परलोक प्रस्थान कर जाना. इन चारों अवस्थाओं के विभिन्न आयामों को मूर्तियों में देखा जा सकता है. खजुराहो के मंदिरों में हजारों मूर्तियों हैं जिनमें से कामुक मूर्तियाँ थोड़ी सी 8-10% ही हैं. ये मूर्तियाँ मंदिर की बाहरी दीवारों पर ही हैं. इसका मतलब शायद ये रहा हो कि मंदिर में प्रवेश से पहले आपने सब कुछ भोग लिया है और अब मोक्ष दरकार है. मंदिरों की बनावट भी एक गुफा की तरह ही है - प्रवेश द्वार छोटा सा और गुफा में आगे बढ़ें तो गर्भ गृह उंचा और बड़ा है जहाँ संसार को बनाने या मिटाने वाले शिव या विष्णु विराजमान है. याने जीवन का अंतिम पड़ाव.

*  मंदिरों का निर्माण सन 850-1150 के बीच हुआ और मान्यता है कि उस समय मध्य भारत में तांत्रिक विद्या का प्रचलन था. यहाँ का सबसे पहले बना मंदिर चौंसठ योगिनी मंदिर भी उसी विद्या का उदहारण है जो शिव और शक्ति या फिर पुरुष और प्रकृति को समर्पित है. इस विद्या में तन और मन का बैलेंस करना और सम्भोग से मोक्ष की और जाने की बात की गई है. सम्भोग या मिथुन भी जीवन के अन्य कार्यकलापों की तरह एक स्वाभाविक और आवश्यक क्रिया है जो जीवन का एक अंग है. यहाँ यही बात बिंदास मूर्तियों में ढाली गई है.

*  कुछ लोगों का कहना है कि ये कामुक मूर्तियाँ काम कला के ज्ञान sex education देने के लिए बनाईं गईं थीं और इसीलिए मंदिर की बाहरी दीवारों पर हैं अंदर नहीं. लोग कामुक मूर्तियाँ देखें, समझें और काम भावना त्याग दें! इस पर गाइड का कहना था कि लम्बे समय तक कोई भी मैथुन मूर्ति देखी ही नहीं जा सकती क्यूंकि उकताहट हो जाती है और स्वत: नज़र हट जाती है.

* एक मत ये भी है कि बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के बाद ( ईसा पूर्व 400 से लेकर लगभग ईसा पश्चात 500 तक ),  पूजा पाठ और मंदिरों की महत्ता घट गई थी. बौद्ध स्तूपों या धार्मिक स्थलों में भगवानों की मूर्तियाँ नहीं होती थी. इसके अलावा बुद्ध की मूर्ति का आदर सम्मान तो किया जाता है पर पूजा अर्चना या आरती नहीं होती है. जनता को फिर से मंदिरों और भगवान् की ओर आकर्षित करने के लिए यहाँ कामुक मूर्तियाँ बनाई गईं.

* एक और दृष्टिकोण है कि मंदिरों की दीवारों पर भगवान, यक्ष, गांधार की मूर्तियों के अलावा काल्पनिक जानवर भी बनाए गए हैं मसलन व्याल, वृक व्याल और गज व्याल. इन सभी में कई जानवरों के अच्छे गुणों के मिश्रण हैं और ये शुभ हैं. प्रवेश करने वाले इन सभी का दर्शन करें और अपनी दुनियावी इच्छाओं को बाहर रख कर मंदिर में प्रवेश करें.

* कवि चंदबरदाई के अनुसार चंदेल राजपूत वंश की शुरुआत एक कन्या हेमवती जो चांदनी में नहा रही थी, और चंद्रमा के मिलन से हुई थी. सभी चंदेल राजा कला प्रेमी हुए और उन्होंने सुंदर महल और मंदिर बनवाए और अनोखी मूर्तियों से सजावट की. यह मूर्ति कला चौंसठ योगिनी के सिंपल से मंदिर से शुरू होकर डेढ़ सौ वर्षों बाद लक्ष्मण मंदिर और कंदारिया मंदिर में निखर कर शिखर पर पहुँच गई.

मंदिरों में इन कामुक मूर्तियों के होने का जो भी कारण रहा हो पूरे विश्व में इनका कोई मुकाबला नहीं है. इनकी बनावट, हाथ पैरों की पोज़ीशन, चेहरे के हाव भाव, सजावटी जेवर, हेयर स्टाइल इत्यादि कमाल की सजीवता लिए हुए हैं. हलके ठन्डे मौसम और हरियाली में ये मंदिर और लैंडस्केप बहुत ही सुंदर लगते हैं. मंदिर में प्रवेश के लिए और गाइड के लिए खासे पैसे लगते हैं. अच्छा कैमरा, पानी की बोतल और टोपी साथ रखिये और अनोखी विश्व धरोहर का आनंद लीजिये.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

मंदिर की बाहरी दीवार पर बेमिसाल नक्काशी. इसमें से तीन मिथुन फोटो अलग अलग नीचे दी गईं हैं  

कामुक युगल - 1 

कामुक युगल - 2

कामुक युगल - 3

छोटे छोटे आलों में बनी मिथुन मूर्तियाँ 

कहा जाता है कि घर से लम्बे समय तक दूर रहने वाले कुछ सिपाही इस तरह की हरकत कर देते थे जो अवैध मानी जाती थी. पिछले दो सिपाही उसे पकड़ने जा रहे हैं 
एक स्त्री और जानवर का मैथुन. इस स्त्री को भी पकड़ कर महिला पुलिस राजा के दरबार में पेश कर रही है. वही स्त्री हाथ जोड़ कर और सिर झुका कर राजा से माफी मांग रही है 

दो बड़े पत्थरों के बीच बने आले में मिथुन मूर्तियाँ 

ऊपर वाले क्रम में और मूर्तियाँ 

ऊपर वाले क्रम में कुछ और मूर्तियाँ 

खजुराहो के सुंदर मंदिर 


खजुराहो के कुछ मंदिरों पर फोटो ब्लॉग इन निम्नलिखित नामों पर क्लिक कर के देखे जा सकते हैं:

1. चौंसठ योगिनी मंदिर

2. दुल्हादेव मंदिर

3. वाराह मंदिर

4. चतुर्भुजा मंदिर

5. जावरी मंदिर

6. वामन मंदिर

 जावरी मंदिर खजुराहो

मध्य प्रदेश का छोटा सा शहर खजुराहो अपने मंदिरों के कारण विश्व प्रसिद्द है. ये सभी मंदिर विश्व धरोहर - World Heritage Site में आते हैं. भोपाल से खजुराहो की दूरी 380 किमी है और झाँसी से 175 किमी है. खजुराहो छतरपुर जिले का हिस्सा है. खजुराहो में एक एयरपोर्ट भी है. इसके अलावा रेल और सड़क से भी पहुंचा जा सकता है. हर तरह के होटल और अन्य सभी सुविधाएं यहाँ उपलब्ध हैं. 

खजुराहो की स्थापना करने वाले चन्देल राजा चंद्र्वर्मन थे जिन्होंने इसे अपने राज्य की राजधानी बनाया था. चन्देल राजवंश ने लगभग नौवीं शताब्दी से लेकर लगभग तेरहवीं शताब्दी तक बुंदेलखंड के कुछ हिस्सों और उसके आस पास राज किया था. इस दौरान पहले राजधानी खजुराहो में बनी और फिर महोबा में बना दी गई थी.

खजुराहो के ज्यादातर मंदिर सन 850 से सन 1150 के बीच चंदेल राजाओं द्वारा बनवाए गए थे. बीस वर्ग किमी में फैले क्षेत्र में पच्चासी मंदिरों का निर्माण हुआ था जिनमें से पहला मंदिर चौंसठ योगिनी मंदिर माना जाता है जो 850 - 860 में बना और आखिरी मंदिर - दुल्हादेव मंदिर लगभग 1110 - 1125 में बनवाया गया माना जाता है. इन पच्चासी मंदिरों में से अब पच्चीस मंदिर ही शेष हैं जो छे वर्ग किमी में फैले हुए हैं.

खजुराहो के मंदिरों में से एक मंदिर है जावरी मंदिर ( कहीं कहीं जवारी मंदिर भी कहा गया है ) जो की भगवान विष्णु को समर्पित है. परन्तु गर्भगृह में विष्णु की मूर्ति खंडित है और उसके चारों हाथ और मस्तक टूटे हुए हैं. मंदिर एक ऊँचे, 39 फुट लम्बे और 21 फुट चौड़े चबूतरे पर भारी और मजबूत पत्थरों से बना है. शिखर की बनावट बहुत सुंदर है. खजुराहो के अन्य मंदिरों की तरह जावरी मंदिर की बाहरी दीवारों पर मिथुन मूर्तियाँ हैं पर कम हैं. मंदिर बनाने का समय सन 950 से 975 माना जाता है.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो :


मंदिर की बाहरी दीवार पर बनी सुंदर मूर्तियाँ. चेहरे पर सजीव भाव  

कामुक युगल 

नंदी मनुष्य के रूप में. बाँई ओर कामुक युगल 

बाहरी दीवार पर बने छोटे से शिवालय में शिव पार्वती 

बाहरी दीवार की बहुत सी मूर्तियाँ क्षतिग्रस्त हैं 
'मकर' तोरण इस मंदिर की विशेषता है. इसमें तीन उलटे कमल थे जो टूट चुके हैं 

भारी भरकम पत्थरों पर टिका मंदिर 

भारी पत्थरों पर बारीक काम 

सुंदर  सुघड़ शिखर 

 वामन मंदिर खजुराहो

मध्य प्रदेश का छोटा सा शहर खजुराहो अपने मंदिरों के कारण विश्व प्रसिद्द है. ये सभी मंदिर विश्व धरोहर - World Heritage Site में आते हैं. भोपाल से खजुराहो की दूरी 380 किमी है और यह छतरपुर जिले का हिस्सा है. खजुराहो में एक एयरपोर्ट भी है. इसके अलावा रेल और सड़क से भी पहुंचा जा सकता है. हर तरह के होटल और अन्य सुविधाएं यहाँ उपलब्ध हैं. छोटा सा शहर होने के कारण सभी मंदिरों को पैदल या साइकिल सवारी कर के देखा जा सकता है वर्ना इ रिक्शा तो हैं ही. 

खजुराहो की स्थापना करने वाले चन्देल राजा चंद्र्वर्मन थे जिन्होंने इसे अपने राज्य की राजधानी बनाया था. चन्देल राजवंश ने लगभग नौवीं शताब्दी से लेकर तेरहवीं शताब्दी तक बुंदेलखंड के कुछ हिस्सों और उसके आस पास राज किया था. इस दौरान पहले राजधानी खजुराहो में बनी और फिर महोबा में बना दी गई थी.

खजुराहो के ज्यादातर मंदिर सन 850 से सन 1150 के बीच चंदेल राजाओं द्वारा बनवाए गए थे. बीस वर्ग किमी में फैले क्षेत्र में पच्चासी मंदिरों का निर्माण हुआ था जिनमें से पहला मंदिर चौंसठ योगिनी मंदिर माना जाता है जो 850 - 860 में बना और आखिरी मंदिर - दुल्हादेव मंदिर लगभग 1110 - 1125 में चंदेल राजा मदन वर्मन द्वारा बनवाया गया माना जाता है. इन पच्चासी मंदिरों में से अब पच्चीस मंदिर ही शेष हैं जो छे वर्ग किमी में फैले हुए हैं.

खजुराहो के मंदिरों में से एक मंदिर है वामन मंदिर. यह मंदिर वामन जो की विष्णु के पांचवें अवतार माने जाते हैं, को समर्पित है. मंदिर एक ऊँचे, 62 फुट लम्बे और 45 फुट चौड़े चबूतरे पर बना है. इसमें अर्धमंडप, महामंडप, अंतराल और गर्भगृह हैं. गर्भगृह में वामन की मूर्ति है. मंदिर की बाहरी दीवार पर दो कतारों में मूर्तियाँ हैं. मंदिर भारी और मजबूत पत्थरों से बना लगता है. खजुराहो के अन्य मंदिरों के मुकाबले वामन मंदिर की बाहरी दीवारों पर मिथुन मूर्तियाँ कम हैं. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो :


1. बाहरी दीवार पर उकेरी कुछ सजीव मूर्तियाँ 

2. सुडौल शरीर और चेहरे पर सुंदर भाव भंगिमा

3. व्याल और महिलाओं की मूर्तियाँ. हर चेहरा बड़ी मेहनत से उकेरा गया है और हरेक का भाव भी अलग अलग है. बालों का स्टाइल और जेवर बहुत सजीव बनाए गए हैं   

4. कामुक मुद्रा में यक्षिणी 

5. मंदिर के दाहिनी ओर का एक दृश्य 

6. दो कतारों में की गयी बिमिसाल नक्काशी 

7. बहुत सी बाहरी मूर्तियाँ खंडित हो चुकी हैं 

8. सुंदर बनावट और आभूषणों से सज्जित 

9. मंदिर की बाँई दीवार 

10. वामन मंदिर 

11. वामन मंदिर 

12. गर्भगृह 

13. वामन 

खजुराहो के चार अन्य मंदिरों पर सचित्र ब्लॉग इन नामों पर क्लिक कर के देखे जा सकते हैं :

 Orchcha Fort Complex - 1/2

Orchcha is a small historical town in Tikamgarh district of Madhya Pradesh and was capital of Bundela kings. From Jhansi it is 15 km, from Khajuraho 175 km & from Gwalior 124 km. First Bundela King Rudra Pratap Singh who ruled from 1501 to 1531, made Orchcha his capital & got the fort construction started. There were several additions & modifications subsequently by later kings Bharati Chandra, Madhukar Shah and Veer Singh Dev.  

2. About the origin of Suryavanshi Rajput Bundelas a poet named Lal Kavi has in 1700, given a mythical & poetical account. His poems inter-alia state that Bundelas are descendents from gods ( with gaps of several generations between some of them ) as under: 
Vishnu > Brahma > Vihagaraja > Kiratdeva > Virbhadra > Jagdas > Arjunpal > Sohanpal > Rudra Pratap Singh. 

3. Jagdas was son of Virbhadra from a junior queen and was denied share in Kashi kingdom by sons from chief queen. He came to the shrine of Vindhyavasini and sat down in Tapasya. After a long while nothing happened & out of desperation he decided to sacrifice his head to Vindhyavasini. As soon as a drop of his blood fell on ground Vindhyavasini appeared and said that his son shall be born from this drop - 'बूँद of his blood to become future ruler. Future rulers were thus called Bundelas - बुन्देला. Bundelas worship Vindhyavasini as their family deity or Kuldevi. 

 4. Bundelas ruled the area named Bundelkhand with Orchcha as capital for over 250 years. Some of the famous Bundela kings are Rudra Pratap Singh, Bharati Chandra, Madhukar Shah who ruled during 1594-1591 & built Raja Mahal and Chatrasal. King Veer Singh Dev who ruled during 1605-1627 built Jahangir Mahal. Within Bundelkhand area there were several smaller states such as Orchcha, Datia, Panna, Ajaigarh, Bijawar, Charkhari. They fought with Mughals & at times there were fights within these smaller states which were taken advantage of by Mughals.   

5. Forts, palaces, memorials & temples in & around Orchcha have beautiful and distinct style. River Betwa passing through the rocks adds to the beauty of the place. Boating & rafting can be enjoyed in Betwa. Noons are hot here with bare rocks getting roasted in the sun, take care. With a little better tourist infra and maintanance of monuments tourism can improve. All the monuments are within walking distance otherewise conveyance is also easily available. Some snaps:

1. Raja Mahal 

2. Pillars and arches 

3. Arches & balcony of Raja Mahal

4. Plumbline perfect. From top of dome to the corner of the platform a straight line can be drawn

5. Cool pool in courtyard to beat the heat

6. Observation post

7. Top floor of Jahangir Mahal

8. Beautiful arches

9. High ceilings on pillars kept the place cool & also let the air & light in 

10. Painted walls & ceilings with women horse riders. No purdah system here for the ladies 

11. Jungle, war & shikar scenes. Polo style games are also seen 

12. Bedroom of the Raja has this latticed window through which he could see the Ram Raja Temple as he got up in the morning

13. This is what Raja saw from his window. High rise building is Chaturbhuj Temple built for installing statue of Lord Ram to be brought from Ayodhya. However it remains empty. The queen who brought the statue from Ayodhya inadvertantly placed the statue in a kitchen. It could not be lifted from there and white building became Ram Raja Temple. Lord Rama is reverred here as a Raja

14. A small balcony used by Raja to address Darbar. Over this balcony are small 108 elephants

15. Mahal as seen from outside the enclosure wall

16. Sheesh Mahal which now is a hotel / restaurant 

17. Jahangir Mahal constructed in 17th century in honour of Mughal Emperor Jahangir by king Vir Singh Deo. Jahangir stayed here for a night 

 Orchcha Fort - 2 / 2

Orchcha is a small historical town in Tikamgarh district of Madhya Pradesh and was capital of Bundela kings. From Jhansi it is 15 km, from Khajuraho 175 km & from Gwalior 124 km. First Bundela King Rudra Pratap Singh who ruled from 1501 to 1531, made Orchcha his capital & got the fort construction started. There were several additions & modifications subsequently by later kings Bharati Chandra, Madhukar Shah and Veer Singh Dev.  
You can click & see Orchcha Fort - 1 / 2. 

2. About the origin of Suryavanshi Rajput Bundelas a poet named Lal Kavi has in 1700, given a mythical & poetical account. His poems inter-alia state that Bundelas are descendents from gods ( with gaps of several generations between some of them ) as under: 
Vishnu > Brahma > Vihagaraja > Kiratdeva > Virbhadra > Jagdas > Arjunpal > Sohanpal > Rudra Pratap Singh. 

3. Jagdas was son of Virbhadra from a junior queen and was denied share in Kashi kingdom by sons from chief queen. He came to the shrine of Vindhyavasini and sat down in Tapasya. After a long while nothing happened & out of desperation he decided to sacrifice his head to Vindhyavasini. As soon as a drop of his blood fell on ground Vindhyavasini appeared and said that his son shall be born from this drop - 'बूँद of his blood to become future ruler. Future rulers were thus called Bundelas - बुन्देला. Bundelas worship Vindhyavasini as their family deity or Kuldevi. 

 4. Bundelas ruled the area named Bundelkhand with Orchcha as capital for over 250 years. Some of the famous Bundela kings are Rudra Pratap Singh, Bharati Chandra, Madhukar Shah who ruled during 1594-1591 & built Raja Mahal and Chatrasal. King Veer Singh Dev who ruled during 1605-1627 built Jahangir Mahal. Within Bundelkhand area there were several smaller states such as Orchcha, Datia, Panna, Ajaigarh, Bijawar, Charkhari. They fought with Mughals & at times there were fights within these smaller states which were taken advantage of by Mughals.   

5. Forts, palaces, memorials & temples in & around Orchcha have beautiful and distinct style. River Betwa passing through the rocks adds to the beauty of the place. Boating & rafting can be enjoyed in Betwa. Noons are hot here with bare rocks getting roasted in the sun, take care. With a little better tourist infra and maintanance of monuments tourism can improve. All the monuments are within walking distance otherewise conveyance is also easily available. Some snaps:

1. Orchcha Fort Complex & river Betwa

2.Entry bridge to Sheesh Mahal, Jahangir Mahal , Raja Mahal

3. You may come across many sadhus looking for alms

4. Security measures

5. Welcome in

6. Beautiful carvings on pillars, ceiling & walls

The place has a small museum also. Stone sculpture in museum - Ram, Janaki  and Lakshman 

Eleventh century sand stone sculpture in museum - Sheshashai Vishnu

Latticed windows served as air inlets & to keep eye on visitors

Well constructed balconies & parapets 
View from the first floor balcony 

Rai Praveen Palace. Constructed in 1618 by King Indrajit Singh in honour of a courtesan Rai Praveen who was a beautiful singer. Her fame reached Emperor Akbar who summoned her in 1602. It was clear that she won't ever come back. Rai Praveen wriggled out of the situation and came back by telling Akbar "विनति राय प्रवीण की, सुनिए शाह सुजान, जूठी पातर भकत हैं बारी, बायस, स्वान ".  that is a 'used one' is not meant for an Emporer

 तानसेन

संगीत सम्राट तानसेन का जन्म ग्वालियर से 45 किमी दूर एक गाँव बेहट में 1506 में हुआ था. तानसेन के पिता का नाम मकरंद पाल था जिन्होने अपने बेटे का नाम रामतन्नु पाल रखा. इन्टरनेट पर देखें तो पिता का नाम मकरंद पांडे या मुकुंद पांडे या मुकुंद मिश्रा भी लिखा मिलता है. और तानसेन का नाम तन्नु पाण्डे या तन्नु मिश्र या तनसुख या त्रिलोचन भी दिया हुआ है. कुछ लोगों का कहना है की 'तानसेन' एक नाम नहीं था बल्कि एक उपाधि थी. इसी तरह से तानसेन के जन्म / मृत्यु वर्ष में भी अंतर है. 

तानसेन ने संगीत की शिक्षा वृन्दावन के स्वामी हरिदास से और ग्वालियर के सूफी संत मोहम्मद गौस से ली. पहले तो तानसेन ग्वालियर के संगीत प्रेमी राजा मन सिंह तोमर के दरबार में रहे. राजा मान सिंह तोमर की मृत्यु के बाद संगीत मण्डली बिखर गई और तानसेन वृन्दावन चले गए. उसके बाद तानसेन कुछ समय दौलत खां पुत्र शेरशाह सूरी के दरबार में रहे. वहां से वे बांधव गढ़, रीवा के राजा रामचंद्र के दरबार में पहुँच गए जहां उनका बहुत सम्मान हुआ. इस दरबार से तानसेन की शानदार गायकी की खबर मुग़ल सम्राट अकबर के दरबार में पहुंची. अकबर ने तानसेन को अपने दरबार में बुला लिया और मियां और नवरत्न की पदवी दी.

तानसेन की शादी ग्वालियर की रानी मृगनयनी की दासी हुसैनी से हुई थी. तानसेन के चार पुत्र हुए - सुरतसेन, शरतसेन, तरंगसेन और विलास खान. एक पुत्री थी जिसका नाम सरस्वती था. तानसेन कवि भी थे और उन्होंने  तीन ग्रन्थ भी लिखे - संगीतसार, रागमाला और श्रीगणेश स्तोत्र.  तानसेन ने कई राग रागिनियों की रचना भी की - मियां का मल्हार, दरबारी कान्हड़ा और गुजरी तोड़ी / मियाँ की तोड़ी. तानसेन की मृत्यु अस्सी साल की आयु में हुई. उनकी इच्छा के अनुसार उन्हें उनके गुरु मोहम्मद गौस की समाधि के पास दफनाया गया जहां अब हर साल दिसम्बर में संगीत महोत्सव मनाया जाता है.

तानसेन की जीवनी में गायकी की एक घटना बताना जरूरी है. अकबर के जिद करने पर तानसेन ने राग दीपक छेड़ दिया. राग ज्यूँ ज्यूँ राग ऊँचे स्वर में उठता गया, तानसेन का शरीर तपने लगा. आसपास बैठे दरबारी घबरा कर उठ गए. ऐसा लगा कि तानसेन इस तपिश में नहीं बचेंगे तो उनकी पुत्री सरस्वती ने राग मल्हार शुरू किया और तानसेन शांत हुए. बाद में अकबर ने अपनी जिद पर अफ़सोस जाहिर किया.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

1. तानसेन का मक़बरा

2. मियां तानसेन का अंतिम पड़ाव 

3. नारायण गाइड तानसेन के बारे में बताते हुए. पीछे है तानसेन के गुरु सूफी संत मोहम्मद गौस की दरगाह 

4. सूफी संत मोहम्मद गौस की दरगाह  

5. दरगाह का पिछला हिस्सा 

6. दरगाह में समाधियाँ 

7. ऊँचे खम्बों वाली छतें और सुंदर जाली का काम 

8. छत पर बने फूल पत्ते 

9. ऊँचे खम्बों पर नक्काशी 

10. दरगाह का एक और दृश्य 
11. सोलहवीं सदी में बनी दरगाह 
12. तानसेन के मकबरे के पास इमली का बूटा जिसके बारे में मशहूर है कि इसके पत्ते चूसने से गला सुरीला हो जाता है 


13. अकबर के दरबार के नवरत्न की यादगार  

 सूरज कुण्ड ग्वालियर

ग्वालियर का किला शहर से सौ मीटर ऊँची पहाड़ी पर है जिस का नाम गोपाचल पहाड़ी है. गेरुए लाल रंग के बलुए पत्थरों से बना किला तीन वर्ग किमी में फैला हुआ है. दीवारों की लम्बाई दो मील है. किले की अंदरूनी चौड़ाई दो सौ मीटर से लेकर एक हज़ार मीटर तक है. किले के अंदर मंदिर, महल, पानी के तालाब, जेल और एक म्यूजियम भी है.

ये किला कब बनाया गया और किसने बनवाया इसकी पक्की जानकारी नहीं है. माना जाता है की छठी शताब्दी में यहाँ मूल रूप से किला बना था. किले से सम्बन्धित नवीं और दसवीं शताब्दी के सम्बन्धित अवशेष भी मिले हैं जिससे लगता है की किला तब भी मौजूद था.

किले के बारे में एक किस्सा मशहूर है कि राजा सूरज सेन इस पहाड़ी पर पीने के लिए पानी ढूँढ रहे थे. उन्हें एक संत ग्वालिपा ( कहीं कहीं ऋषि गलवा भी लिखा हुआ है ), नज़र आये जो उन्हें सूरज कुंड तक ले गए. राजा ने पानी पिया तो उनकी प्यास तो बुझी ही साथ में उनके शरीर का कोढ़ भी दूर हो गया. राजा ने यहाँ किला बनवाया और उसका नाम ग्वालियर किला रख दिया. कुण्ड का नाम कालान्तर में सूरज कुण्ड हो गया. सुबह और शाम यहाँ का दृश्य ज्यादा सुंदर लगता है.  प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

सूरज कुण्ड. फिलहाल कमल के पत्तों से ढका दिखाई दे रहा है. मौसम में सुंदर कमल खिलते हैं

कुण्ड के पास छोटा सा मंदिर 

सूरज कुण्ड के किनारे समाधि 

सूरज कुण्ड के पास ही तेली का मंदिर और गुरुद्वारा श्री दाता बंदी छोड़ भी हैं वो भी देख सकते हैं. ये सभी किले के अंदर ही हैं और सुबह से शाम तक खुले रहते हैं. प्रवेश के लिए अलग से टिकट नहीं है. किले के लिए प्रवेश का टिकट इन सभी स्थानों पर लागू है.


 Udaygiri Caves MP

Udaigiri Caves are situated in Vidisha district of Madhy Pradesh. Udaygiri is 11 km from Sanchi & 60 km from Bhopal. The area is served by Betwa & Bes rivers. During and after monsoon Udaigiri gets lush green cover & is pleasant to look at. Land is fertile & friendly to inhabitants. This might have led to Vidisha becoming a ancient centre of trade, cultural & religious activities. There were Buddhist Viharas in nearby Sanchi. King Bindusara had deputed his son Ashoka as a governer of Vidisha who later became Ashoka the Great. In fact Ashoka wed Vidisha Devi here who was a daughter of wealthy merchant of Vidisha.

2. A couple of km from Udaigiri is a stone pillar made by Greek ambassador Heliodorus deputed by King Antialcidas of Texla in about second century BC. Heliodorus is said to have started following Vaishanvism & made a Vishnu Temple as well which has however disappeared. The Pillar still stands & is locally known as Kham Baba. 
As per a few inscriptions, the caves relate to Chadragupta II period that is 4th and 5th centuries. Further, caves were in religious use till 10th century. After advent of 11th century invaders the caves seem to have lost importance & merged in to the nearby jungle.

3. In 1870 Alexander Cunningham reported about ten caves to Archeological Survey of India. He mentioned these to be related to second century BC to fifth century AD which aroused the interest of historians.Subsequently ten more caves were discovered. 

4. Udaigiri is a hill which rises 350 feet above ground and is approx 2.5 km long. There are 20 caves here of which two are dedicated to Jainism & the rest have Shiva, Shakti & Vishnu statues or engravings. These are not natural caves but carved ones with depth ranging from three to seven feet. The statues are mostly worn out or defaced or broken. Besides aggressors & vagaries of nature some blame is also shared by quality of stone here. The sand stone here is said to have less resistance to the elements.  

5. Noons here are hot and there is no retaurant around, take care. We reached here in afternoon & no guide was available. Caves have no electric illumination so visiting early recommended. About 200 meters from ticket window there is a small museum which provides complete info about the individual caves which are numbered 1 to 20. It may be mentioned that caves with similar name 'Udaygiri Caves' are located in Rajgir, Bihar and near Bhuvneshwar, Odisha also. 
Some photos:

1. Lord Ganesha. This magnificent carving is said to be one of the earliest Ganesha reliefs. There is a long groove over the niche which suggests that it might have had stone slab shades 

2. Ground level cave with pillars. Some sort of mandap might have been there on these pillars. 

3. Entry and decorative carvings

4. Solar dial 

5. Said to be a Jain Cave shuttered now 

6. Shell script - शंख लिपि.  

7. There are lots of these Shell scipts here. This script is yet to be deciphered

8. This place has largest depository of shell script 

9. Vishnu / Narsimha

10. Narsimha and Dwarpals

11. Durga - Mahishasurmardini

12. Ganesha & Dwarpal?


13. Vishnu

14. Kartikeya 

15. Climb up is facilitated with steps & railings

16. Ticket window and a view of hill 

17. Stepping down the hill with Tawa Cave on the left
18. This Pillar is supposed to be a part of a temple built in Chandrgupta II times which is no more visible now

19. Beautiful & perhaps the best macho presentation of Varaha as saviour of earth. The earth or Bhudevi was dragged into Rasatal or the cosmic ocean by demon Hiranyakshya. Vishnu appeared as Varaha or the wild boar in third avtar to rescue the Bhudevi. Shown here with muscular body, broad shouldered with powerful posture with his left foot firmly planted on Sheshnaga. 

20. Varuna the Lord of Oceans with a Kalasha in his hands 

21. Yaksha in the heavens overhead. Ganga on Makara & Yamuna on Kachchapa descending from the heavens & going towards Varuna 

22. Rescued Bhudevi, Brahma over the head and Shiva on Nandi 

23. Varaha wears a Kanthmala with lotus over the head

24. Varahi on the left holding a lotus which is over the head of Varaha 

25. Sheshanaga with thirteen hoods seeking forgiveness. Thick & large garland Vaijayanatimala worn by Varaha as a mark of victory 

26. King Chandragupta II or someone else? Opinions are divided

27. Devtas, saints, Yakshas, Ganas, kings paying respecs

28. Lush green Vidisha. On the left of this pavement about a km ahead is a village and you can guess the economic status of residents. On the right of this way is the hill Udaygiri.  

 From Gwalior Fort Museum

Gwalior and nearby area used to be called Gird - गिर्द or Gopa गोपा area in earlier times. This area included Gwalior, Bhind, Morena, Shivpuri and Sheopur. Gopachal in fact is the name of a hill upon which Gwalior Fort has been constructed. The Gird area touched Malwa, Bundelkhand, Braj and Hadoti. All these ancient names are slowly fading out as their defined boundaries are no more there.

The area was ruled by Bhaghels, Gurjars, Pratiharas, Kachchvahas, Mughals, Marathas and  the British. The area had its share of battles & wars, forts, palaces & temples. Lot of monuments have survived the elements & aggressors. The area however remains backwards, lacks infra & the people are poor. Tourist inflow is less despite rich & varied archeological findings.

Gwalior Fort has two museums displaying archeological artifacts, larger being Gujari Mahal and smaller one in Fort area near Karan Mahal. Some photos from museum in Fort:

1. This beautiful sculpture is of 9th century from Khairat district Bhind. Near the feet of Shiva & Parvati are seated Ganesha, Bhringi, Nandi & a lion.  Graceful with remarkable carvings of jewellary 

2. Beautiful dancing Ganesha. 9th century sculpture from Terahi district Shivpuri

3. Saptmatrika. Tenth century panel from Survaya district Shivpuri. From L to R - Chaturbhuji Brahmani, Maheshwari, Kaumari, Vaishnvi, Varahi, Indrani and Chamunda 

4. Arishtnemi 21st Jain Tirthankar. 8th century carving found in Amroli district Gwalior

5. A shikhara 

6. Erotica panel of tenth century from Padawali district Morena. A bit crude compared to that seen in Khajuraho 

7. Kartikeya. First century BC sculpture from Mitawali district Morena. Son of Shiva & Parvati considerd as commander of army of devtas. In left hand he holds a weapon & in right a cock    

8. Four armed Durga. Eleventh century find from Sihonia district Morena. Relates to Kachchapghata times 

9. Balram. Elder brother of Lord Krishna. Considered as one of the ten avtars of Lord Vishnu.  First century AD from Mitawali district Morena  

10. Mother & child. Beautiful statue of eleventh century Kachchapghata period from Sihonia district Morena  

11. Ek Mukhi Linga  

Gujari Mahal as seen from Gwalior Fort

 उदयगिरी गुफाएं मध्य प्रदेश

उदयगिरी की गुफाएं भोपाल से 60 किमी और साँची से 11 किमी की दूरी पर हैं. पास ही बेतवा नदी और एक छोटी सहायक नदी बेस भी है. उदयगिरी पहाड़ी लगभग 350 फुट ऊँची है और करीबन ढाई किमी लम्बी है. इसी पहाड़ी में अलग अलग स्थानों में छोटी बड़ी गुफाएं अलग अलग समय में बनाई गई है. कुल बीस गुफाओं में से दो में जैन सम्बन्धी मूर्तियाँ हैं और बाकी में शिव, शक्ति और विष्णु सम्बन्धी मूर्तियाँ या चट्टानों पर उकेरी आकृतियाँ हैं. गुफाओं के अंदर की मूर्तियाँ क्षत विक्षत हैं और कुछ गुफाओं में अब नहीं हैं. उदयगिरी नाम की गुफाएं राजगीर, बिहार और भुवनेश्वर, ओडिशा के निकट भी हैं.

ये गुफाएं 7 - 8 फुट से ज्यादा गहरी नहीं हैं पर चौड़ाई और उंचाई में बड़ी हैं. चूँकि लाइट की व्यवस्था नहीं है इसलिए सुबह नों से शाम चार तक ही खुली रहती हैं. प्रवेश और गाइड के लिए अलग अलग टिकट हैं. पहाड़ी से तीन सौ मीटर दूर एक म्यूजियम है जहां अगर पहले चले जाएं तो गुफाओं की और आस पास के दूसरे दर्शनीय स्थानों के बारे में अच्छी जानकारी मिल सकती है. पास ही ग्रीक राजदूत हेलियोडोरस का खम्बा भी है. आने जाने और यहाँ रहने के लिए सभी तरह की सुविधाएं उपलब्ध हैं. हरा भरा क्षेत्र है. पर दोपहर को चट्टानें गर्म हो जाती हैं. आस पास अच्छे ढाबे या रेस्तरां नहीं हैं. अपना इंतज़ाम करके चलना ठीक रहेगा.

इतिहास के नज़र से उदयगिरी और आसपास का इलाका समृद्ध है. गुफाओं पर कुछ अभिलेख संस्कृत और नागरी लिपि में मिले हैं जिनसे गुफाओं का सम्बन्ध चन्द्रगुप्त द्वितीय याने सन 380 से सन 414 से जुड़ता है. पांचवीं सदी से लेकर बारहवीं सदी के छोटे छोटे लेख भी है जिससे लगता है है कि यहाँ हिन्दू और जैन तीर्थ यात्रियों का आना होता था. तेरहवीं सदी के आक्रमणों के बाद ये जगह वीरान हो गई और जंगल में खो गई.

1870 में एलेग्जेंडर कन्निन्घम ने पुरातत्व विभाग ASI को अपनी रिपोर्ट में विस्तार से दस गुफाओं के बारे में बताया और इनका समय दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर ईसा के बाद पांचवीं शताब्दी तक बताया जिसकी वजह से लोगों का ध्यान इस ओर गया. बाद की खोजबीन में और गुफाएं मिलीं और गुफाओं पर एक से बीस तक नम्बर लगा दिए गए. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

1. चट्टानों पर उकेरी वैष्णवी मूर्तियाँ 

2. भगवान् विष्णु का वाराह अवतार. उदयगिरी की बीस गुफाओं में से सबसे महत्वपूर्ण और सबसे सुंदर चित्रण. यह गुफा बीस फुट चौड़ी, बारह फुट आठ इंच ऊँची और तीन फुट चार इंच गहरी है.   

3. बाएँ पृथ्वी या भूदेवी जिसे वाराह ने दांतों के सहारे उठा रखा है. दाएं हैं आदित्या, अग्नि, रुद्रा, गणदेवता और ऋषि मुनि 

4. गुप्त वंश के राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय परन्तु इस पर इतिहासकारों में मतभेद है  

5. नागदेव 

6. बाएँ नीचे लक्ष्मी हाथ में कमल की डोर लिए हुए. कमल सबसे ऊपर है 

7. भूदेवी के हाथ के ऊपर ब्रह्मा विराजमान हैं और और पास में है नंदी बैल जिस पर शिव सवार हैं 

8. सबसे ऊपर यक्ष और आसमान से गंगा और यमुना उतरती हुई. गंगा अपने वाहन मकर पर और यमुना अपने वाहन कच्छप पर सागर की ओर जाती हुई  

9. सागर देवता वरुण जिनके हाथ में कलश है 

10. वाराह पर एक लम्बी वैजयन्ती माला है जो लम्बे युद्ध में विजय दर्शाती है 
11. शेषशायी विष्णु 

12. ग्राउंड फ्लोर की गुफा 

13. गणेश 

14. दुर्गा शक्ति - महिषासुरमर्दिनी

15. शंख लिपि जिसे अभी पूरी तरह से पढ़ा जाना बाकी है. यहाँ इस तरह के लेख की कई चट्टानें हैं  

16. ये स्तम्भ शायद गुप्त काल के मंदिर का हिस्सा है. मंदिर तो अब नहीं है 
17. सूर्य घड़ी

18. तवा गुफा का एक हिस्सा 
19. उदयगिरी पहाड़ी के ऊपर जाने का रास्ता बना दिया गया है 

20. वापिस उतरने का रास्ता 

 वाराह मंदिर खजुराहो

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में खजुराहो छोटा सा पर प्रसिद्ध शहर है जहां सन 850 से लेकर लगभग सन 1150 तक चंदेल वंश का राज रहा है. इस दौरान चंदेल राजाओं ने 85 सुंदर मंदिरों का निर्माण करवाया जिनमें 25 अभी भी बचे हुए हैं. ये सभी मंदिर 1988 में विश्व धरोहर याने World Heritage Site में शामिल किये गए थे.

खजुराहो के मंदिरों में एक मन्दिर वाराह का भी है जो की विष्णु का तीसरा अवतार है. माना जाता है कि यह मन्दिर चंदेल राजाओं द्वारा सन 900 से 925 के बीच बनवाया गया था. यह छोटा सा मंदिर एक ऊँचे चबूतरे पर बना हुआ है. चबूतरे के ऊपर चौदह खम्बे हैं जिनके ऊपर पिरामिडनुमा मंडप है. पूरा मंदिर बलुए पत्थर का बना हुआ है. वाराह की मूर्ति की लम्बाई 2.6 मीटर है और ऊँचाई 1.7 मीटर है. इस विशालकाय वाराह के शरीर पर कमाल की छोटी छोटी और सुंदर मूर्तियाँ उकेरी गई हैं. गिनती में तो ये कई सौ होंगी.

पुरानी कथा के अनुसार एक दानव हिरण्याक्ष ने ब्रह्माण्ड में बहुत उत्पात मचा रखा था. सभी देवी, देवता और दानव उससे त्रस्त थे. एक दिन उसने पृथ्वी को हर लिया और रसातल में जलमग्न कर दिया. भगवान् विष्णु एक वाराह या जंगली शूकर के रूप में आये और दोनों के बीच घमासान युद्ध हुआ जो एक हजार वर्षों तक चला. अंत में विष्णु ने हिरण्याक्ष का वध कर दिया और अपने दांतों पर पृथ्वी को उठा कर वापिस सही स्थान पर रख दिया. वाराह को केवल शूकर या एक मानव जिसका सिर शूकर का है दोनों तरह से दिखाया जाता है. इस मंदिर में जंगली शूकर का ही रूप दिखाया गया है. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

1. सबसे आगे वीणा वादिनी सरस्वती 

2. पैरों में अजगर

3. देवी देवता 

4. देवी देवता 

5. कमाल की कारीगरी 

6. मंडप की छत पर कमल 

7. स्कन्द पुराण में दिया गया वाराह मन्त्र - ऊँ नम: श्री वाराहाय धरण्युद्धारणाय स्वाहा:

 दूल्हादेव मंदिर खजुराहो

मध्य प्रदेश का छोटा सा शहर खजुराहो अपने मंदिरों के कारण विश्व प्रसिद्द है. ये सभी मंदिर विश्व धरोहर - World Heritage Site में आते हैं. भोपाल से खजुराहो की दूरी 380 किमी है और यह छतरपुर जिले का हिस्सा है. खजुराहो की स्थापना करने वाले चन्देल राजा चंद्र्वर्मन थे जिन्होंने इसे अपने राज्य की राजधानी बनाया था. चन्देल राजवंश ने लगभग नौवीं शताब्दी से लेकर तेरहवीं शताब्दी तक बुंदेलखंड के कुछ हिस्सों और उसके आस पास राज किया था. इस दौरान पहले राजधानी खजुराहो में बनी और फिर महोबा में बना दी गई थी.

खजुराहो के ज्यादातर मंदिर सन 850 से सन 1150 के बीच चंदेल राजाओं द्वारा बनवाए गए थे. बीस वर्ग किमी में फैले क्षेत्र में पच्चासी मंदिरों का निर्माण हुआ था जिनमें से केवल पच्चीस मन्दिर ही बचे हैं. इनमें से पहला मंदिर चौंसठ योगिनी मंदिर माना जाता है जो 850 - 860 में बना और आखिरी मंदिर - दुलादेव मंदिर लगभग 1110 - 1125 में चंदेल राजा मदन वर्मन द्वारा बनवाया गया माना जाता है. दुलादेव मन्दिर को दुल्हादेव मंदिर या फिर कुंवरनाथ मठ भी कहा जाता है. मंदिर पांच फुट ऊँचे, 69 फुट लम्बे और 40 फुट चौड़े चबूतरे पर स्थापित है और भगवान शिव को समर्पित है. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

1. दुलादेव मंदिर का प्रवेश मंडप. चंदेल वंश के राजा मदनवर्मन की दें है ये शिव मंदिर 

 2. दुलादेव मंदिर. मंदिर का काफी हिस्सा ढह गया है और पत्थर के बड़े बड़े ब्लाक एक दूसरे पर फंस कर टिके हुए हैं. मंदिर का मुख पूर्व की ओर है. निर्माण का समय सन 1000 से 1150 तक के मध्य माना जाता है 

3. पिछली ओर का भाग कुछ बचा हुआ है. नीचे के पांच शिखरों में से बांये हाथ वाला सीधे सपाट पत्थरों से पूरा किया गया है. पांच छोटे शिखरों पर तीन और उन के उपर तीन और उनके ऊपर एक शिखर खूबसूरत तरीके से बनाया गया है   

4. मंदिर के गर्भ गृह में मूर्ति ना होकर शिवलिंग है. इसे भी खंडित मूल शिवलिंग की जगह लगाया गया है. इसकी खासियत है के इस पर 999 छोटे छोटे शिवलिंग उकेरे गए हैं. अर्थात एक परिक्रमा 1000 परिक्रमाओं के बराबर हो जाती है 

5. खजुराहो के दूसरे मंदिरों की तरह दुलादेव मंदिर की बाहरी दीवार पर तीन श्रंखलाओं में मूर्तियाँ गढ़ी गई है. सबसे ऊपर उड़ते हुए मस्त युगल हैं. अप्सराएं हैं जो दो या तीन के ग्रुप में स्वछन्द उड़ रही हैं. दूसरी लाइन में नंदी, शिव और पार्वती हैं और तीसरी में कई राजा रानियाँ और शिव-पार्वती हैं. बीच बीच में कामुक मूर्तियाँ भी हैं 

6. बाहरी दीवार में शिव 

7. पूरा मंदिर एक सप्तरथ की तरह बना है और ऊँचे चबूतरे पर स्थित है जिस पर परिक्रमा की जा सकती है. इस दीवार की मूर्तियाँ क्षतिग्रस्त हैं   

8. मिथुन 

9. सभी मूर्तियों में सुंदर और बारीक भाव भंगिमा और तरह तरह के जेवर हैं. इस तरह के आभूषण खजुराहो के मंदिरों की खासियत है

10. बीच में कामुक जोड़े 

11. हर मूर्ति कुछ कहती है 


12. भारी भरकम पत्थर जरूर हैं पर उतनी ही महीन कारीगारी भी है. चाहे फूल पत्ते हों, जानवर हों, पुरुष हों या महिलाएं बहुत सुंदर, बारीक और शानदार काम किया गया है. पत्थरों के कोने, घुमाव, एक दूसरे में फासला बहुत ही नपा तुला और सटीक है. ये सब कुछ एक हजार साल पहले बिना मशीन के! जितनी तारीफ़ की जाए उतनी ही कम है 

 चतुर्भुजा मंदिर, खजुराहो

मध्य प्रदेश का छोटा सा शहर खजुराहो अपने मंदिरों के कारण विश्व प्रसिद्द है. भोपाल से इसकी दूरी 380 किमी है और यह छतरपुर जिले का हिस्सा है. खजुराहो के संस्थापक चन्देल राजा चंद्र्वर्मन थे जिन्होंने इसे अपने राज्य की राजधानी बनाया था. चन्देल राजवंश ने लगभग नौवीं शताब्दी से लेकर तेरहवीं शताब्दी तक बुंदेलखंड के कुछ हिस्सों और उसके आस पास राज किया. इस दौरान पहले राजधानी खजुराहो में बनी और फिर महोबा में बना दी गई थी.

खजुराहो के ज्यादातर मंदिर सन 850 से सन 1150 के बीच चंदेल राजाओं द्वारा बनवाए गए थे. बीस वर्ग किमी में फैले क्षेत्र में पच्चासी मंदिरों का निर्माण हुआ था जिनमें से केवल पच्चीस मन्दिर ही बचे हैं. इनमें से पहला मंदिर चौंसठ योगिनी मंदिर माना जाता है जो 850 - 860 में बना और आखिरी मंदिर - दुलादेव मंदिर लगभग 1110 - 1125 में बना माना जाता है.

चतुर्भुजा मंदिर खजुराहो के दक्षिण में तीन किमी दूर गाँव जटकारा में है जिसके कारण इस मंदिर को जटकारी मंदिर भी कहा जाता है. इस मंदिर का निर्माण का श्रेय चंदेल राजा लक्षवर्मन को दिया जाता है. इन्टरनेट में कहीं कहीं मंदिर बनवाने वाले राजा का नाम यशोवर्मन भी लिखा हुआ है परन्तु यशोवर्मन का राज 925 से 950 तक रहा था. इस अंतर को इतिहासकार ही बता सकते हैं.

चतुर्भुजा मंदिर खजुराहो का अकेला ऐसा मंदिर है जिसमें मिथुन या कामुक मूर्तियों का अभाव है. दूसरे मंदिरों की तरह इस मंदिर की बाहरी दीवारों पर भी मूर्तियों की तीन श्रंखलाएं हैं जिसमें अप्सराएं, विद्याधर और भगवान् की मूर्तियाँ हैं. ये मूर्तियाँ भी उतनी ही खूबसूरत हैं जैसे की खजुराहो के अन्य मंदिरों में हैं. पर एक्सपर्ट्स का कहना है कि इन मूर्तियों में भाव भंगिमा कम हैं. इस मंदिर में गर्भगृह से पहले का मंडप या अर्ध मंडप और मुख्य मूर्ति की परिक्रमा नहीं बनी हुई है. चतुर्भुजा मूर्ति का रुख भी दक्षिण की ओर है. बाहरी दीवार पर कई मूर्तियाँ अधूरी भी रह गई हैं. सन 1125 के आसपास का ये समय चंदेल वंश के सूर्यास्त का दौर था.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

1. ऊँचे चबूतरे पर बना चतुर्भुजा मंदिर 


2. प्रवेश द्वार. आम तौर पर मंदिर पूर्वमुखी होते हैं पर इस मंदिर का प्रवेश दक्षिण की ओर है


3. नौ फुट ऊँची चतुर्भुजा विष्णु की मूर्ति. वहां के पुजारी के अनुसार ये त्रिदेव मूर्ति है और इसमें शिव, विष्णु और कृष्ण तीनों का समावेश है. मुकुट से ऊपर शिव की जटाएं हैं, चार भुजाएं विष्णु की हैं और दो टांगों पर खड़े होने का विशेष अंदाज़ बंसी बजाते कृष्ण का है   
4. मूर्ति का ऊपरी भाग. मुकुट के ऊपर जटाएं भी हैं  

5. मंदिर की बाहरी दीवार पर मूर्तियों की तीन श्रृंखलाएं 

6. इस मंदिर में खजुराहो के अन्य मंदिरों की तरह मिथुन या कामुक मूर्तियाँ नहीं हैं. पर पुरुष हो या महिला साज सज्जा, स्टाइल और जेवरों में कोई कमी नहीं है 

7. कुछ टूटे हुए हिस्से सादे सपाट पत्थर लगाकर दुरुस्त कर दिए गए हैं   

8.अर्धनारीश्वर 

 साँची के स्तूप -1/2

गौतम बुद्ध का परिनिर्वाण अस्सी वर्ष की आयु में ईसा पूर्व सन 483 में हुआ था. गौतम बुद्द के अंतिम संस्कार के बाद उनके अवशेषों को आठ भागों में बाँट कर आठ स्तूपों में राजगृह, वैशाली, कपिलवस्तु, अल्लाकप्पा, पावानगर, कुशीनगर, रामग्राम और वेथापिडा में दबा दिया गया. दो अन्य स्तूपों में कलशों में भस्म दबा दी गई.

समय गुज़रा और मौर्य शासन की बागडोर सम्राट अशोक के हाथ आ गई. सम्राट अशोक ने ईसा पूर्व सन 273 से ईसा पूर्व सन 232 तक राज किया. अशोक ने इस दौरान कलिंगा राज्य पर बड़ी जीत हासिल की, पर युद्ध के भयानक विनाश से दुखी होकर गौतम बुद्ध के बताए मध्य मार्ग की शरण ली.  बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए चौरासी हज़ार स्तूप, स्तम्भ, विहार और शिलालेख बनवाए. बौद्ध संघों में सुधार करवाया और गौतम बुद्ध के अवशेषों को पुनर्स्थापित करवाया. रामग्राम के स्तूप को छोड़ बाकी स्थानों से बुद्ध के अवशेषों को नए शहरों और सुदूर स्थानों में बनाए गए नए स्तूपों में स्थापित करवाया.

अशोक के सम्राट बनने से पहले उनके पिता महाराजा बिन्दुसार ने अशोक को विदिशा का गवर्नर नियुक्त किया था. विदिशा उस समय का एक समृद्ध व्यापारिक केंद्र था. यहाँ के एक व्यापारी की बेटी विदिशा देवी से सम्राट अशोक की शादी भी हुई थी. दूसरी बात यह की विदिशा के पास साँची में बौद्ध संघ भी थे. इसलिए सम्राट अशोक ने साँची में मुख्य स्तूप बनवाकर गौतम बुद्ध के कुछ अवशेषों को यहाँ स्थापित करवाया.

मुख्य स्तूप जिसे स्तूप नम्बर 1 भी कहते हैं सम्राट अशोक द्वारा ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में बनाया गया था. गौतम बुद्ध के अवशेष इंटों से बने गोलाकार छोटे स्तूप में रखे गए थे. ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में इसका पत्थर लगा कर विस्तार किया गया और ऊपर चपटा कर के छतरी रखी गई. स्तूप की उंचाई 54 फुट है और व्यास 120 फुट. सातवाहन वंश के समय तोरण और परिक्रमा जोड़ी गईं. लगभग बारहवीं शताब्दी तक यहाँ के स्तूपों में कुछ न कुछ विस्तार होता रहा और मंदिर भी बने. इसके बाद संभवत: यह जगह उपेक्षित रही, मूर्तियों को नुक्सान हुआ और ये जगह जंगल में खो गई.

सन 1818 में ब्रिटिश जनरल टेलर ने पहली बार इन स्तूपों का वर्णन किया पर तब भी पुनर्स्थापना का काम नहीं हुआ. 1912 से 1919 तक इस जगह को पुरात्तव विभाग - ASI ने सर जॉन हुबर्ट मार्शल के नेतृत्व में फिर से विकसित करने का प्रयास किया. 1989 में इसे विश्व धरोहर या World Heritage Site का दर्जा मिला. अब यहाँ एक म्यूजियम भी है और इस स्थान का रख रखाव सुंदर है.

भोपाल से साँची 46 किमी दूर है और विदिशा से 10 किमी. आने जाने के लिए बसें और टैक्सी उपलब्ध हैं. साँची और विदिशा में हर तरह के होटल उपलब्ध हैं. साँची का यह विश्व धरोहर सुबह से शाम तक खुला है और गाइड मिल जाते हैं. पार्किंग की जगह है और एक छोटा सा रेस्तरां भी है. ढाई हजार साल पहले के जीवन की झलक जरूर देख कर आएं. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

1. मुख्य स्तूप के चार दिशाओं में सुंदर नक्काशीदार चार तोरण या गेट हैं जो कि साँची स्मारकों की पहचान बन चुके हैं  

2. गौतम बुद्ध के अवशेषों का प्रमुख स्तूप. पाली में स्तूप को थुपा, संस्कृत में स्तूप, चीनी में शेलिता, जापानी में शरितो, कोरियाई में सोडोल्फा और मंगोलिन भाषा में सुवर्गा कहते हैं. सबसे ऊपर क्षत्रप या छतरी है. छत के बाएँ हिस्से में किया हुआ दो हज़ार साल से ज्यादा पुराना पलस्तर अभी भी कायम है   

3. तोरण चौकोर खम्बों पर टिके हुए हैं और पत्थरों को एक दुसरे में फंसा दिया गया है. खम्बों पर चारों  तरफ सुंदर नक्काशी हैं जिनमें उस समय की घटनाएं, जातक कथाएँ, पशु, पक्षी, पेड़ पौधे वगैरा उकेरे गए हैं. इनमें हाथियों पर सवार महावत महिलाएं भी हैं  

4. खम्बे पर उकेरा गया लुम्बिनी का एक दृश्य. कुछ लोग काम पर जा रहे हैं और कुछ खिड़कियों और झरोखों में बातचीत कर रहे हैं.  ऊपर बाएँ कोने में एक गर्भवती महिला लेटी हुई है. वह रानी महामाया है और प्रजा बच्चे के जन्म की सूचना आने की इंतज़ार में हैं.

5. ऊपर वाले चित्र नम्बर 4 का एडिट किया हुआ भाग. राजमहल में गर्भवती रानी महामाया सपने में ऐरावत हाथी देख रही हैं. सिद्धार्थ के जन्म लेने का समय आ गया है 

6. गौतम बुद्ध के प्रवचन सुनने के लिए साधक बैठे हैं. बीच में वट वृक्ष है और खाली स्थान बुद्ध का आसन है. पूरे परिसर में मूर्तियों की नक्काशी बहुत है पर बुद्ध का केवल आसन ही बनाया गया कोई मूर्ति नहीं बनाई गई है. और जैसा कि हर क्लास या गोष्ठी में होता है निचली लाइन में तीन साधक बैक-बेन्चर्स की तरह बतिया भी रहे हैं

7. महल से राजा की सवारी निकल रही है. माना जाता है की ये दृश्य राजा बिम्बिसार का है जो राजगृह से गिद्धकूट पर्वत की ओर जा रहा था जहां गौतम बुद्ध विराजमान थे   

8. कुछ विदेशी शायद ग्रीक संगीतकार हैं यहाँ. इनका पहनावा, जूते, चेहरे, सिर के कपड़े, ढोल और वाद्ययंत्र बिलकुल अलग हैं  

9. गाँव का एक सुंदर दृश्य. ऊपर बाएँ कोने में पति पत्नी बतिया रहे हैं. पास में एक महिला कूट रही है, दूसरी कुछ पीस रही है और तीसरी सूप से छटाई कर रही है. दाईं ओर दो महिलाएं बालकनी में बैठी बतिया रही हैं. एक खाली आसन गौतम बुद्ध का है जिसके पीछे दो पुरुष हाथ जोड़े खड़े हैं. नीचे दाहिनी ओर एक महिला पौधों में मटके से पानी डाल रही है  

10. फूल, पत्ते और लताओं का सुंदर चित्रण 

11. खम्बे पर नक्काशी. गौतम बुद्ध के चरण, उनमें चक्र और सुंदर फूल मालाएं 

12. अभिलेख 

13. छोटे साधकों के स्तूप 

14. शेर का एक सिर है पर शरीर दोनों तरफ हैं 

15. कुछ अन्य अरहंतों के स्तूप 

17. यहाँ एक बौद्ध विहार या मोनेस्ट्री थी. आप देख सकते हैं की ये जगह सुंदर और शांत है और पहाड़ियां बहुत ऊँची नहीं हैं. पास में ही नदी भी है और जमीन उपजाऊ है. साधकों के लिए बहुत अच्छी जगह रही होगी  

 चौंसठ योगिनी मंदिर, खजुराहो

योग पुरुष करे तो योगी और महिला करे तो योगिनी! पर ये चौंसठ योगिनी का क्या अर्थ है ये नहीं समझ आया. ऐसी मान्यता है की ये चौंसठ योगिनियाँ पार्वती की सखियाँ थी और शिव भक्त थीं. इनके मन्दिर भी अलग तरह के हैं जिनके बारे में पूरी पूरी ऐतिहासिक जानकारी अभी तक नहीं मिली है.

बताया जाता है की चौंसठ योगिनियों का सम्बन्ध तंत्र विद्या से है. चौंसठ में से आठ मुख्य योगिनियाँ हैं : 1. सुर-सुंदरी 2. मनोहरा 3. कनकवती 4. कामेश्वरी 5. रति-सुंदरी 6. पद्मिनी 7. नतिनी और 8. मधुमती. वैसे सभी 64 योगिनियों के नाम और गुण अलग अलग हैं, उनके 64 अलग अलग मन्त्र हैं और 64 अलग अलग ही भजन भी हैं. आप गूगल करें तो इस विषय पर बहुत कुछ मिलेगा.

भारत में पिछले लगभग दो सौ सालों से इन मंदिरों का नाम आगे आया है. चौंसठ योगिनी मंदिर कई स्थानों पर मिले हैं जैसे कि मितावली जिला मोरेना, हीरापुर ओडिशा, रानीपुर ओडिशा, खजुराहो और भेड़ाघाट जबलपुर. खजुराहो के चौंसठ योगिनी मन्दिर को छोड़ कर बाकी सभी मंदिर गोलाकार हैं. बड़े गोले में चौसठ छोटे छोटे मंदिर या कोष्ठ - cell हैं और उनके दरवाज़े बीच में खुलते हैं. गोले के बीच में छोटा मंदिर है जिसमें या तो शिव की मूर्ति है या फिर शिवलिंग स्थापित है. गोलाकार मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व में है जैसा की आम मंदिरों में होता है. केवल खजुराहो का मंदिर आयताकार है और खजुराहो के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है.

खजुराहो का चौंसठ योगिनी मंदिर शिव सागर के पास है. यह एक 5.4 मीटर ऊँची जगती या प्लेटफार्म पर बना हुआ है. 31.4 मीटर गुणा 18.3 मीटर के आयत में फैला हुआ है. बाहरी दीवार में 65 कोष्ठ बने हुए थे जिनमें से अब 35 ही बचे हैं. ये कोष्ठ केवल एक मीटर ऊँचे और एक ही मीटर गहरे हैं. इनमें से एक कोष्ठ बड़ा और उंचा है जो सम्भवत: दुर्गा मंदिर रहा होगा. पूरे मंदिर में बड़े बड़े चौरस और आयताकार अनघड़ या रफ़ पत्थरों को इस्तेमाल किया गया है.

खजुराहो के पश्चिमी मंदिरों से यहाँ पैदल भी जा सकते हैं. कोई टिकट नहीं है और कोई गाइड भी नहीं मिला हमें. कोई सज्जन वहां पूजा करवा रहे थे उन्होंने ही जानकारी दी. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

1. छोटे छोटे 65 कोष्ठ या चैम्बर थे जिनमें से 35 बचे हैं 

2. इन छोटे कोष्ठों में फिलहाल कुछ भी नहीं है 

3. पीछे खजुराहो के पश्चिमी मंदिर नज़र आ रहे हैं 

4. एक उंचा मंदिर जो शायद दुर्गा मंदिर रहा होगा . इसी में पूजा हो रही थी 

5. बाहरी दीवार 

6. प्रवेश के लिए सीढियां 

7. मंदिर के सामने मैदान में भी कुछ है. संरक्षण की सख्त जरूरत है  

 ग्वालियर का किला

ग्वालियर का किला ग्वालियर शहर के पास एक ऊँची पथरीली पहाड़ी पर है. पहाड़ी आसपास के मैदान से सौ मीटर ऊँची है और इसका नाम गोपाचल पहाड़ी है. गेरुए लाल रंग के बलुए पत्थरों से बना किला तीन वर्ग किमी में फैला हुआ है. दीवारों की लम्बाई दो मील है. किले की अंदरूनी चौड़ाई दो सौ मीटर से लेकर एक हज़ार मीटर तक है. किले के अंदर मंदिर, महल, पानी के तालाब, जेल और अब म्यूजियम भी है.

ये किला कब बनाया गया और किसने बनवाया इसकी पक्की जानकारी नहीं है. माना जाता है की छठी शताब्दी में यहाँ मूल रूप से किला बना था. किले से सम्बन्धित नवीं और दसवीं शताब्दी के सम्बन्धित अवशेष भी मिले हैं जिससे लगता है की किला तब भी मौजूद था.

किले के बारे में एक किस्सा मशहूर है कि राजा सूरज सेन इस पहाड़ी पर पीने के लिए पानी ढूँढ रहे थे. उन्हें एक संत ग्वालिपा ( कहीं कहीं ऋषि गलवा भी लिखा हुआ है ), नज़र आये जो उन्हें सूरज कुंड तक ले गए. राजा ने पानी पिया तो उनकी प्यास तो बुझी ही साथ में उनके शरीर का कोढ़ भी दूर हो गया. राजा ने यहाँ किला बनवाया और उसका नाम ग्वालियर किला रख दिया.

भारत में बने दूसरे किलों की तरह यह किला भी कई शासकों के आधीन रहा. कई राजाओं ने हमले किये और कई राजाओं ने इसे बनाया संवारा.
दसवीं शताब्दी में यहाँ कच्छपघात राजा राज कर रहे थे.
1022 में महमूद ग़ज़नी ने किले पर चार दिन का कब्ज़ा जमाए रखा और 35 हाथियों के बदले किला खाली किया.
1196 में कुतुबद्दीन ऐबक ने किला कब्जा लिया.
1232 में किला इल्तुतमिश के हाथ में चला गया.
1398 में यहाँ तोमर वंश ने अधिकार जमा लिया. तोमर वंश में राजा मान सिंह तोमर का नाम बहुत प्रसिद्द है. मान सिंह ने यहाँ किले में मान मंदिर महल और अपनी गूजर रानी मृगनयनी के लिए गुजरी महल बनवाया.
1516 में इब्राहिम लोदी के हमले में राजा मान सिंह हार गए और मारे गए.
1526 में बाबर ने किला हथिया लिया.
1542 में शेर शाह सूरी ने किला जीत लिया. सूरी सल्तनत के जनरल हेमू या हेमचन्द्र ने यहाँ किलेदारी की.
1558 में अकबर ने किला जीत लिया.
1707 में औरंगजेब के मरने के बाद ग्वालियर किले पर गोहद राणा छतर सिंह ने कब्जा कर लिया. टैक्स वसूली के झगड़े में मराठा सेनापति ने छतर सिंह पर हमला बोल कर किला वापिस ले लिया.
1780 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने किला जीत लिया पर गोहद के राणा को वापिस कर दिया.
1784 में शिन्दे ने फिर से राणा छतर सिंह से किला जीत लिया.
1808 से 1844 के बीच किले पर कभी अंग्रेजों का और कभी मराठों का अधिकार रहा. 1844 में किला अंग्रेजों ने अपने संरक्षण में शिंदे ( या सिंदिया ) परिवार को दे दिया.
1857 में जब स्वाधीनता संघर्ष का बिगुल बजा तो किले के फौजियों ने अंग्रेजों के खिलाफ 'बगावत' कर दी. पर जयाजी शिंदे अंग्रेजों के खिलाफ नहीं गए.
1858 में फिर से किले पर अंग्रेजों ने अधिकार जमा लिया.
1886 तक अंग्रेजों की हालत उत्तर भारत में काफी मजबूत हो गई थी और उन्हें अब किले की जरूरत नहीं रही थी. किला एक बार फिर से सिंदिया परिवार को दे दिया गया. सिंदिया परिवार ने किले में काफी काम कराए और 1947 तक किला उन्हीं के पास रहा.

ग्वालियर का सालाना तापमान 5 डिग्री से लेकर 46 डिग्री तक हो सकता है. अक्टूबर से मार्च तक का समय किला देखने के लिए आरामदेह है. यहाँ दोपहर की धूप तीखी है और पथरीली सतह के कारण गर्मी तेज़ हो जाती है. किले में पैदल जाने के लिए ग्वालियर गेट है. गाड़ी ले जानी हो तो उरवाई गेट से ले जा सकते हैं. पर गेट से पहले सड़क बहुत संकरी है और चढ़ाई अचानक आ जाती है इसलिए गाड़ी सावधानी से चलानी होगी.

पार्किंग और किले के अंदर जाने का टिकट है जो सभी स्मारकों में मान्य है. अंदर छोटा सा रेस्टोरेंट भी है. किले के अलावा आप उसी टिकट में सहस्त्रबाहू मंदिर, तेली का मंदिर और गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़ भी देख सकते हैं.

अपनी रूचि के मुताबिक किले में चार पांच घंटे भी लगा सकते हैं या फिर दो तीन दिन भी. ग्वालियर शहर में रोड, रेल या हवाई जहाज से आसानी से पहुंचा जा सकता है. सभी तरह के होटल और सुविधाएं उपलब्ध हैं.
प्रस्तुत हैं किले की कुछ फोटो:

1. ग्वालियर का किला. किले के बाएँ बुर्ज का ऊपर वाला हिस्सा तोप के गोलों से नष्ट हो गया था 

2. किले का मुख्य प्रवेश द्वार 

3. किले की वास्तु हिन्दू शैली में है. नीली टाइलें विदेशी बताई जाती है. इनका रंग अब फीका पड़ रहा है 


4. किले के क्षतिग्रस्त भाग को सीधे सपाट लाल पत्थरों से ढक दिया गया है  

5. अंदर महल में सुंदर झरोखे और नक्काशी 

6. लाल बलुए पत्थर पर शानदार कारीगरी 

7. तहखाना यहाँ रानियों के रहने का इंतजाम था. हवा के लिए रोशनदान और नहाने के लिए पानी का बड़ा हौज़ था जो अब कवर कर दिया गया है  

8. रनिवास के झरोखे, नक्काशीदार खम्बे  

9. छत पर की गई शानदार नक्काशी  

10. फर्श के कुछ पत्थरों में फूल पत्ते भी हमेशा के लिए स्थापित हैं 

11. सुंदर कारीगरी 

12. राजा रानी का बेडरूम और आगे का दालान 

13. बेडरूम. बेडरूम के तीन ओर परिक्रमा बनी हुई है. इस परिक्रमा में अगर सीधे खड़े होकर चलेंगे तो कुछ नहीं दिखेगा. अलार्म बजाने के लिए दासियां पैर में घुंघरू बाँध कर इस परिक्रमा से निकलती थी. 

14. गाइड आपकी भी इस तरह की फोटो खींच देगा 

15. तहखाने का एक और कमरा 

16. जहाँगीर महल का वरांडा 

17. किले से नज़र आता शहर 

18. गोपाचल पहाड़ी पर बना किला. इस किले की दीवारें पहाड़ी के सिरे पर बनाई गई हैं. इसलिए एकसार ना होकर आड़ी तिरछी हैं 

19. किले का दूसरा छोर और शहर. किले की दीवार की लम्बाई लगभग दो मील है  

20. किले से नीचे जाने का रास्ता  

21. ब्रिटिश तोप

22. जौहर कुण्ड. इस कुण्ड में लकडियाँ डाल कर आग जला दी जाती और बहुत सी रानियाँ और विवाहित औरतें यहाँ कूद पड़ती थी. कुण्ड में से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है  

23. करण महल 

24. किले का जेल. अकबर और औरंगजेब ने यहाँ अपने विरोधियों को बंदी बना कर रखा था. जहाँगीर ने सिखों के छठे गुरु हरगोबिंद सिंह जी महाराज को इस जेल में बंद कर रखा था  

25. सहस्त्रबाहू मंदिर की एक झलक 

26. म्यूजियम का प्रवेश. किले और ग्वालियर के आसपास के इलाकों में पाई गई मूर्तियाँ और अन्य अवशेष यहाँ रखे हुए हैं  

27. किले में एक छोटा सा नौवीं सदी का चतुर्भुज मंदिर है जहाँ एक अभिलेख में ज़ीरो या शून्य का 'इस्तेमाल' किया गया है जैसे की पचास - '50' मालाएं. पहले ये ज़ीरो का प्राचीनतम लेख माना जाता था. परन्तु कुछ समय पहले बख़शाली, पेशावर में सन 224 - 383 की पेड़ की छाल पर लिखी पाण्डुलिपि मिली है जिसमें शून्य का प्रयोग मिला है   

28. उरवाई गेट से किले की ओर जाती सड़क और ऊपर नज़र आता किला 

 दतिया महल

दतिया शहर ग्वालियर से 75 किमी दूर है और बुन्देलखण्ड क्षेत्र का एक ऐतिहासिक नगर है. इस इलाके में बुंदेला राजपूत राजाओं का राज रहा है तभी ये क्षेत्र बुंदेलखंड कहलाता है. इन बुंदेला शासकों में से राजा बीर सिंह देव का नाम बहुत मशहूर है. राजा बीर सिंह देव ने दतिया और आसपास बावन बड़ी इमारतें बनवाई जिनमें दतिया महल भी शामिल है.

दतिया महल को बीर सिंह महल या जहांगीर महल भी कहा जाता है. राजा बीर सिंह देव और शहज़ादा सलीम में अच्छी दोस्ती थी पर सलीम के पिता बादशाह अकबर अपने बेटे सलीम से खफ़ा थे. अकबर ने अपने विश्वस्त अबुल फज़ल को अचानक दक्षिण की मुहीम से तुरंत वापिस आने का सन्देश भेजा. शहजादा सलीम को अबुल फज़ल का आना नागवार गुज़रा. शहजादे ने राजा बीर सिंह देव को अपने साथ मिला लिया. अबुल फज़ल 1602 में जब वापिस आ रहा था तो रास्ते में राजा बीर सिंह देव से हमला करवा कर मरवा दिया. बदले में शहजादे सलीम से राजा बीर सिंह देव की दोस्ती और पक्की हो गयी. सलीम बाद में जहाँगीर के नाम से गद्दी पर बैठा. राजा बीर सिंह देव ने जहांगीर के सम्मान में सात मंजिला जहांगीर महल या दतिया महल 1614 - 1622 में बनवाया हालांकि जहांगीर कभी इस महल में नहीं आया और ना राजा बीर सिंह देव का परिवार इसमें कभी रहा.

यह विशाकाय महल अस्सी मीटर चौड़ा और अस्सी मीटर लम्बा है. चट्टानी पहाड़ी पर बने महल की पांच मंजिलें ऊपर हैं और दो मंजिलें नीचे तहखाने में हैं. महल के बीच का बुर्ज पैंतीस मीटर ऊँचा है. महल बनाने में लकड़ी या लोहे का इस्तेमाल नहीं किया गया है. महल की बनावट में इस्लामी और बुन्देली वास्तु का मेलजोल है.

ग्वालियर से झाँसी जाते हुए राष्ट्रिय राजमार्ग 44 पर दूर पहाड़ी पर ये महल नज़र आ रहा था. ये कौन सा महल या किला है ऐसी जानकारी हमें नहीं थी. पर फिर भी हमने गाड़ी उस तरफ मोड़ ली कि चलो इस इमारत को भी देखते चलते हैं. इस शानदार महल को गन्दी सी बस्ती ने घेर रखा है. खुली नालियां, तंग गलियाँ जिनमें सूअर, कुत्ते, बकरियां और गाय घूम रहे थे. छोटे छोटे मकान थे जो कुल मिलकर गैर कानूनी अतिक्रमण ही लग रहा था. ऐसा लगा कि लोग इस महल को देखने नहीं आते? या कोई और रास्ता रहा होगा जिसका हमें पता नहीं लगा. खैर गाड़ी दूर खड़ी कर के पैदल गेट तक पहुँच गए. कोई टिकट नहीं और कोई गाइड नहीं था. कुछ लोग महल की ड्योढ़ी में पत्ते खेल रहे थे. उनमें से एक महल दिखाने के लिए तैयार हो गया. दो मंजिलों तक चमगादड़ों और कबूतरों ने कब्ज़ा किया हुआ है और अगर आप इन दो मंजिलों की बदबू और अँधेरा बर्दाश्त कर लें तो ऊपर की तीन मंजिलों में हवा और रौशनी है और बाहर का नज़ारा भी अच्छा है.

शानदार महल को बनाने में नौ साल का समय और तब का पैंतीस लाख रूपये लगा और हम हैं की इतनी कीमती धरोहर को संभाल भी नहीं पा रहे! ऐतिहासिक खज़ाना है इस बुंदेलखंड क्षेत्र में पर रख रखाव बस राम भरोसे है. मध्य प्रदेश में जिन स्थानों की विश्व धरोहर होने की घोषणा हो गई है जैसे खजुराहो या भीमबेटका वहां तो व्यवस्था ठीक है और दूसरे स्मारकों और किलों महलों की हालात खराब ही लगी. इसके विपरीत कर्णाटक, महांराष्ट्र, तमिलनाडु और केरल में स्मारकों की व्यवस्था बेहतर लगी.
बहरहाल प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

1. सात मंजिला महल. सात मंजिलों के कारण इसे सतखंडा महल भी कहते हैं  

2. महल की दूसरी मंजिल से नज़र आता शहर और झील 

3. मेहराब 

4. दूसरी मंज़िल की सीढ़ी 

5. पुरानी जेल 

6. महल और महल जाने का रास्ता 

7. महल की एक साइड 

8.महल की चारदीवारी और बाद में बना मंदिर 

 बीजामंडल, विदिशा

विदिशा भारत के प्राचीनतम शहरों में से एक है. मध्य प्रदेश में स्थित विदिशा की भोपाल से दूरी 56 किमी है और ग्वालियर से 370 किमी है. विदिशा बेतवा नदी के पूर्व में है और साँची से नौ किमी की दूरी पर है.

विदिशा ईसा पूर्व छठी और पांचवीं शताब्दी में एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था. पाली ग्रंथों में भी विदिशा का जिक्र आया है. अशोक के सम्राट बनने से पहले उनके पिता राजा बिन्दुसार ने अशोक को विदिशा का गवर्नर बनाया था. सम्राट अशोक की पत्नी विदिशा देवी यहीं विदिशा की रहने वाली थी. इसके अलावा विदिशा में ग्रीक राजदूत हेलिओडोरस - Heliodorus द्वारा ईसा पूर्व 113 में बनवाया गया एक खम्बा मौजूद है जो की विष्णु मंदिर का हिस्सा था. मंदिर तो अब नहीं है पर उसके कुछ प्रमाणिक अवशेष मिले हैं.

जैसा की भारत में अन्य जगहों पर हुआ है यहाँ भी प्राचीन काल से राजनैतिक उथल पुथल चलती रही है. यहाँ मौर्य, नाग, शुंग, गुप्त, सतवाहन, परमार, मुग़ल, मराठा,  सिंदिया और ब्रिटिश राज रहा है. धार्मिक नज़र से देखें तो यहाँ के इलाके में बौद्ध, जैन और हिन्दू मूर्तियाँ, मंदिर और गुफाएं हैं. इतिहास का धनी क्षेत्र है और विस्तार से खोज बीन की अपेक्षा रखता है.

विदिशा में एक मंदिर का निर्माण पहले पहल आठवीं शताब्दी में हुआ बताया जाता है जिसे अब बीजामंडल के नाम से जाना जाता है. सन 1094 - 1133 के दौरान मंदिर का पुनर्निर्माण राजा नरवर्मन द्वारा कराया गया था. 1233-34 में गुलाम वंशी सुलतान इल्तुतमिश ने हमला किया और लूटपाट की. 1250 में मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ परन्तु 1293 में अलाउद्दीन खिलजी के मंत्री मालिक काफूर ने लूट खसोट की. 1532 में बहादुर शाह ( गुजरात सल्तनत ) और 1682 में औरंगजेब के हमलों में मंदिर को काफी नुकसान पहुंचा. मंदिर का नाम आलमगीर मस्जिद हो गया. मंदिर के पत्थरों से मीनारें बनी. 1760 में पेशवा ने मस्जिद हटा दी. बाद में फिर बन गई. 1971-74 की खुदाई के दौरान यहाँ महिषासुरमर्दिनी और गणेश की मूर्तियाँ मिलीं. 1991 में तेज़ और भारी वर्षा के कारण मस्जिद का काफी भाग गिर गया और एक बार फिर खुदाई में मूर्तियाँ निकलीं.

मंदिर के चबूतरे में लगे भारी भरकम पत्थरों से लगता है कि मंदिर विशालकाय रहा होगा. एक स्तम्भ पर खुदे अभिलेख के अनुसार यह मंदिर चर्चिका देवी का था. इस देवी का दूसरा नाम शायद विजया या बिजया देवी था जिससे इस मंदिर का नाम बिजया मंदिर कहा गया. कालान्तर में यह बीजामंडल कहलाने लगा.

कुल मिलाकर मंदिर के नाम, निर्माण के समय और निर्माण कराने वालों के बारे में कयास ज्यादा हैं और ये कितने सही हैं पता नहीं. पुराने समय में लिखित रिकॉर्ड तो रखा नहीं जाता था. मंदिर में संस्कृत में खुदे कुछ अभिलेख मिले हैं जिनमें तारीख नहीं है. बहरहाल साँची जाएं तो बीजा मंडल जरूर देख कर आएं.
इस विषय पर और अधिक जानकारी के लिए आप B. L. Nagarch का खोजी लेख Bijamandal or Vijiyamandira, Vidisha: A Study पढ़ सकते हैं या फिर इन्टरनेट में खोज कर सकते हैं.
कुछ फोटो प्रस्तुत हैं:


1. बीजामंडल मंदिर और मीनार 

2. खुदाई में प्राप्त कुछ मूर्तियाँ 

3. एक नक्काशीदार स्तम्भ 

4. बगीचे में रखे कुछ अवशेष 

5. देवियों का सुंदर पैनल 

6. मंदिर का ऊँचा और बड़ा प्रवेश द्वार 

7. कुछ और अवशेष 

8. बाद में बनी मेहराब 


9. छत पर भी बहुत सा सामान ताले में बंद पड़ा है  

10. बगीचा 

11. भारी भरकम और ऊँचा प्लेटफार्म. देख कर लगता है की मंदिर विशाल रहा होगा 

12. मंदिर के आसपास घनी बस्ती है. अगर कार से जाएं तो पार्किंग मिलना मुश्किल है   

13. खम्बे और पैनल 
14. बहुत सी मूर्तियाँ 2002 से शेड में बंद हैं पता नहीं कब खुलेंगीं 


     15. मंदिर का बायाँ भाग  

 गुजरी महल ग्वालियर


गुजरी महल, ग्वालियर  

आप महल देखने जाएं या किला, किस्से कहानियां जरूर सुनने को मिलेंगे. राजा लोगों के पास दौलत थी, ताकत थी और रानियों के पास समय था. ऐसे में प्यार मोहब्बत के किस्से, छोटी बड़ी घटनाएं और वारदातें होती ही रहती थीं. पिछले दिनों ग्वालियर का किला देखने गए तो वहां से नीचे देखने पर बड़ी सी इमारत नज़र आई. गाइड ने बताया कि वो बिल्डिंग गुजरी महल है. गाइड से पूछा की किले से बाहर महल क्यूँ बनाया गया था? जवाब में गुजरी महल का किस्सा उसने कुछ इस तरह सुनाया:

पंद्रहवीं सदी के आसपास ग्वालियर पर तोमर वंश का राज था. तोमर या तंवर लोग अपने को चंद्रवंशी राजपूत मानते हैं. 1486 में ग्वालियर की राज गद्दी पर मान सिंह तोमर विराजमान हुए. मान सिंह प्रतापी राजा थे. युद्ध कला में निपुण, संगीत और वास्तु में दिलचस्पी लेने वाले थे. एक दिन राजा मान सिंह अपनी टोली के साथ शिकार खेलने निकले. किले से 16 किमी दूर राई नदी के पास वाले जंगल में हर तरह का शिकार मिलता था. उसी ओर कूच कर दिया.

नदी से कुछ पहले दो गुस्सैल बैल सींग से सींग लड़ाते नज़र आए. दोनों में से कोई पीछे हटने को तैयार नहीं था और बार बार एक दूसरे पर हमला कर रहे थे. दोनों बैलों ने राजा साब का रास्ता जाम कर दिया था. राजा और उनके कारिंदे वहीँ रुक कर तमाशा देखने लगे और रास्ता साफ़ होने का इंतज़ार करने लगे. तभी एक लड़की वहां आई. उसने दोनों बैलों को छुड़ा दिया. राजा उस लड़की की बहादुरी से बहुत खुश हुए. उसका रूपरंग देखकर राजा के मन में विचार आ गया कि ऐसी सुंदर और बहादुर लड़की को अपनी पटरानी बनाएंगे. संतान भी बहादुर होगी.

पूछने पर लड़की ने अपना नाम निन्नी उर्फ़ मृगनयनी बताया. सैनिक निन्नी को लेकर उसके गाँव पहुँच गए जो गूजरों का गाँव था. निन्नी के माता पिता को सारी बात बताई और दरबार में हाजिर होने को कहा. लड़की भी निडर थी और उसने संदेसा भिजवा दिया कि शादी तब करुँगी जब मेरी तीन शर्तें मानी जाएंगीं :

पहली शर्त ये कि मैं राई नदी का पानी पीकर बड़ी हुई हूँ इसलिए मुझे ता-उम्र राई का पानी पीने को मिलना चाहिए. दूसरी ये कि मैं पर्दों या बंद कमरों में नहीं रहूंगी खुली जगह में रहूंगी उसका इंतज़ाम किया जाना चाहिए और तीसरी शर्त ये कि जब भी राजा किले से बाहर जाएंगे तो मैं उनके साथ जाउंगी चाहे वो शिकार पर जा रहे हों या युद्ध करने.

राजा के फैसले से रनिवास में भी खलबली मच गई. गूजर लड़की से कैसी शादी? पर राजा मान सिंह तोमर भी अपनी बात पर डटे रहे और शादी हो ही गई. पानी के लिए नहरिया बनी और गुजरिया के लिए गुजरी महल.

इस प्रेम कथा पर वृन्दावन लाल वर्मा ने 'मृगनयनी' नाम से एक नावेल भी लिखा है जिसमें ग्वालियर का इतिहास भी विस्तार से लिखा गया है. वैसे 1922 में अंग्रेजों ने गुजरी महल को म्यूजियम बना दिया था. ग्वालियर और आसपास के इलाकों में पाई गई हजारों ऐतिहासिक वस्तुओं का संग्रह है यहाँ. म्यूजियम सुबह ग्यारह बजे से पांच बजे तक खुला है और प्रवेश के लिए टिकट है.

ग्वालियर के किले का एक दृश्य 

 सहस्त्रबाहू मंदिर ग्वालियर

सहस्त्रबाहू मंदिर ग्वालियर किले के परिसर में पूर्वी ओर है. इस मंदिर का दूसरा नाम सास बहू मंदिर भी है जो सहस्त्रबाहू का एक बिगड़ा हुआ रूप ही है. एक ही शैली के दो मंदिर पास पास हैं, एक बड़ा जिसे सास का और एक छोटा जिसे बहू का बताया जाता है.

इन्टरनेट पर इस मंदिर का इतिहास देखते समय पुरातत्व विभाग ASI की रिपोर्ट्स में से A Cunningham की रिपोर्ट भी पढ़ी. इस की कुछ रोचक लाइनें इस प्रकार हैं:

" .... On the east side of wall of antarala, the ante-chamber, there is an incomplete inscription dated in S. 1160, or A.D.1103, only ten years later than the opening of the temple. In the same place there are two other dated records of S. 1522 and S. 1540, or A.D. 1465 and A.D. 1483, which show that the temple was again used by Hindus during the sway of Tomara Rajas in fifteenth century. Early in the following century the fortress was again captured by Musalmans, and as it was afterwards used as State prison, and jealously guarded, I presume that the Hindus were once more excluded. In 1844, I resided in the fort, I found the sanctum desecreted and the floor of the ante-chamber dug out to a depth of 15 feet in search of treasure. This hole I filled up, and I afterwards propped up all cracked beams, repaired the broken plinth, and added a flight of of steps to the entrance, so that the temple is now accessible and secure, and likely to last for several centuries. ..."
यहाँ S का मतलब सम्वत है जो अंग्रेजी सन से 57 साल आगे चलता है.

मन्दिर किले के अंदर है और प्रवेश के लिए कोई अलग से टिकट नहीं है. दोपहर की तीख़ी धूप से बचें. सुबह से शाम तक खुला है.
कुछ फोटो:

1. सहस्त्रबाहु मन्दिर 
2. सहस्त्रबाहु का छोटा मन्दिर

3. छोटा और बड़ा मन्दिर पास पास ही हैं 

4. नक्काशी किया हुआ स्तम्भ

5. चबूतरे से लेकर छत तक सुंदर नक्काशी 

6. मन्दिर का एक सज्जित कोना

7. मन्दिर के चारों ओर बनी परिक्रमा
8. दीप स्तम्भ

9. चार भारी भरकम स्तम्भों पर टिकी छत

10. कुछ तोड़ा गया और कुछ समय ने जीर्ण किया

11. सुंदर और सुगढ़ मूर्तियां

12. गिरने से बचाने के लिए लगाई गई त्रिकोणीय रोक

13. छत पर की गई खूबसूरत नक्काशी

14. छत का एक और दृश्य

15. महिषासुर मर्दिनी

16. सहस्त्रबाहू मंदिर से नज़र आता ग्वालियर शहर  
17. पत्थर पर लिखा गलत नाम - सास बहू मन्दिर

18. "This temple was cleaned and stripped of chuna with which the Mahomedans had defaced it for centuries by Major J.B. Keith, November A.D. 1881 under the directions of Captain H. Cole R.E. Curator of Ancient Monuments in India"

 सूर्य मंदिर, ग्वालियर

ग्वालियर के मोरार कैंट में एक सुंदर सूर्य मंदिर है जिसे विवस्वान मंदिर भी कहा जाता है. मंदिर के चारों ओर सुंदर पेड़ पौधों से सजा काफी बड़ा बाग़ है जिससे मंदिर की सुन्दरता और भी बढ़ जाती है. मंदिर निर्माण से पहले यह तपोवन गार्डन कहलाता था फिर सूर्या गार्डन और अब सूर्य मंदिर कहलाता है.

मंदिर का निर्माण बिड़ला घराने ने 19 जनवरी 1984 में शुरू कराया था और प्राण प्रतिष्ठा 23 जनवरी 1988 को की गई. 20500 वर्ग फीट में फैले मंदिर की उंचाई 76 फीट एक इंच है. मंदिर का निर्माण लाल बलुए पत्थर से किया गया है और वास्तु या डिज़ाइन ओडिशा के कोणार्क सूर्य मंदिर पर आधारित है. रथ-नुमा मंदिर को सात घोड़े ( सप्ताह के सात दिन के प्रतीक ) खींच रहे हैं. मंदिर के दोनों तरफ की दीवारों पर 12-12 पहिये ( 12 घंटे का दिन और 12 घंटे की रात या दूसरे शब्दों में वर्ष के 24 पखवाड़े ) बने हैं. हर पहिये में आठ मोटी और आठ पतली ( 8+8 कुल 16 पहर या यम ) तीलियाँ बनी हुई हैं. कुल मिला कर मंदिर में 373 मूर्तियाँ हैं जिसमें से 365 मूर्तियाँ साल के दिनों को दर्शाती हैं. चबूतरे पर बने छोटे तीन मंदिरों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की मूर्तियाँ हैं. दो बड़े आलों में बिड़ला परिवार जनों की आदम कद मूर्तियाँ भी हैं.

ग्वालियर से मंदिर आने जाने के लिए ऑटो वगैरह मिल जाते हैं. प्रवेश के लिए टिकट है. परन्तु मंदिर के आस पास कोई रेस्तरां नहीं है इसलिए खाने पीने का इन्तेजाम करके चलना ठीक रहेगा. छुट्टी वाले दिन भीड़ रहती है.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

सूर्य मन्दिर का प्रवेश 

सूर्य रथ 

दीवारों पर सुंदर पहिये 

चबूतरे पर छोटे मंदिरों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश विराजमान हैं 

बाग़ बगीचे से नज़र आता मंदिर का पिछला भाग 

प्रवेश द्वार 

सूर्य मंदिर पर वीडियो देखें इस लिंक पर
https://youtu.be/CUCnv6909P4

 ओरछा की छतरियां

ओरछा नगर बुंदेला राजपूत राजा रूद्र प्रताप सिंह ने बेतवा नदी के किनारे 1531 में बसाया था. ओरछा झाँसी से 17 किमी और ग्वालियर से लगभग 200 किमी दूर है. ओरछा में प्रवेश करते ही एक तरफ बेतवा नदी और दूसरी तरफ ऊँचे बड़े महल, मंदिर और छतरियां दिखाई पड़ने लगती हैं. छतरी का अर्थ है स्मारक. राजाओं या शाही परिवार जनों की मृत्यु के बाद उनके पुत्रों या पौत्रों द्वारा ये स्मारक बनाए गए थे. बेतवा नदी के किनारे कंचना घाट के आस पास 15 बुन्देली राजपूत राजाओं की छतरियां हैं जिनमें राजा मधुकर शाह, वीर सिंह देव, जसवंत सिंह, उदित सिंह, पहाड़ सिंह भी शामिल हैं.

कला और वास्तु की दृष्टि से ये छतरियां बहुत आकर्षक हैं. अनूठी रचना और वास्तु देखने को मिलेगी. सूर्योदय और सूर्यास्त के समय ख़ास तौर से ये विशाल छतरियां अनोखी और सुंदर लगती हैं. छतरियां बड़े चौकोर चबूतरों पर दो या तीन मंजिली ऊँची बनी हुई हैं. ज्यादातर पंचायतन हैं याने चारों कोनों पर छोटे शिखर हैं और बीच में एक बड़ा नागर शैली का मन्दिरनुमा शिखर है. छतरी के अंदर चबूतरे पर चौकोर हाल है पर मूर्तियाँ नहीं हैं. दरवाजों और झरोखों में खुले और बड़े बड़े मेहराब हैं. सोलहवीं और अठारहवीं शताब्दी के बीच ये छतरियां बनाई गई थी.

ओरछा का मतलब है छुपा हुआ. शायद इसीलिए इतिहास और अब के टूरिस्ट नक्शों में ओरछा खूबसूरत होते हुए भी छुपा सा ही है.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

बुंदेला राजाओं की छतरियां 

इस छतरी की वास्तु शैली कुछ अलग है. शिखर गुम्बदनुमा है 

कुछ छतरियों के शिखर मंदिर जैसे हैं 

इस्लामिक स्टाइल की छतरी ? 

बेतवा नदी किनारे  

छतरी के साथ छोटा ढांचा 

सबसे बड़ी और सबसे अलग छतरी बुंदेला राजा वीर सिंह देव की है 

छोटी छतरी पर गुम्बद . रख रखाव की सख्त जरूरत है 

बीच में इस्लामिक बनावट 

छतरी के सामने शिवलिंग

छतरियों के अंदर कुछ है नहीं 

ना घर तेरा ना घर मेरा चिड़िया रेन बसेरा. छतरियों पर गिद्ध रात गुजारते हैं. नदी और जंगल पास होने के कारण इन्हें शिकार मिल ही जाता है. लाल निशान देखें गिद्ध बैठे हुए हैं 

ओरछा की छतरियां, बेतवा नदी और ढलती शाम 


 गढ़ी पढ़ावली

गढ़ी पढ़ावली जिला मोरेना, मध्य प्रदेश में एक छोटी सी गढ़ी या छोटा किला या fortress है. ये गढ़ी ग्वालियर से 35 किमी दूर है. यहाँ पहुँचने के लिए ग्वालियर से आना जाना आसान है. आप गढ़ी के अलावा यहाँ से कुछ दूर पर बटेसर मंदिर समूह और चौंसठ योगिनी मंदिर, मितावली भी देखने जा सकते हैं. आस पास होटल, रेस्तरां या ढाबे की सुविधा नहीं है इसलिए अपना इंतज़ाम करके चलना ही ठीक रहेगा.

2. ऐसा माना जाता है की ये गढ़ी वास्तव में एक बड़ा मंदिर था. परन्तु अब मंदिर का अगला भाग ही शेष बचा है. इस भाग में प्रवेश द्वार और मुखमण्डप हैं जिनमें बहुत सुंदर नक्काशी है. यहाँ ब्रह्मा, विष्णु, महेश, शिव, पार्वती, गणेश की मूर्तियों को बेहतरीन तरीके से उकेरा गया है. इसके अलावा मण्डप के खम्बों और छत पर कई पैनल हैं जिनमें महाभारत और रामायण की कथाएँ मूर्तियों में देखी जा सकती हैं. इनमें सेना, संगीतकार, हाथी, घोड़े वगैरह शामिल हैं जो बहुत ही सुंदर हैं. मंदिर की खुदाई में रंग मंडप और गर्भ गृह की नीवें भी मिली हैं. मंदिर की कलाकारी, वास्तु और खुदाई में मिली चीज़ों के आधार पर पुरातत्त्व विभाग ASI द्वारा अंदाजा लगाया गया कि यह मंदिर दसवीं शताब्दी में बनाया गया होगा.

3. तो मंदिर से गढ़ी कैसे बनी? दसवीं शताब्दी से लेकर सत्रहवीं शताब्दी के बीच के इतिहास का रहस्य अब तक खुला नहीं है. सत्रहवीं और उन्नीसवीं शताब्दियों के दौरान यहाँ जाट राणाओं का राज रहा है. ये गोहद के राणा कहलाते थे और आस पास के इलाकों में जाट राणाओं की बहुत सी गढ़ी थीं - भिलसा, बडेरा, बिलहाटी, बहादुरपुर, गोहद और पड़ावाली. पास ही ग्वालियर है जहां मराठों का राज रहा करता था. मराठा और राणा के टैक्स को लेकर कई बार युद्ध हुए. इस बारे में पुख्ता जानकारी नहीं है की मंदिर युद्ध के कारण या फिर किन्हीं प्राकृतिक कारणों से ढह गया. बहरहाल सत्रहवीं शताब्दी में राणा के सैनिकों द्वारा इसे 'पड़ाव' की तरह इस्तेमाल किया गया. सैनिक पड़ाव के लिए मंदिर के गिरे हुए पत्थरों को इस्तेमाल करते हुए गढ़ी का निर्माण हुआ जो अब गढ़ी पढ़ावाली के नाम से जानी जाती है.

4. गढ़ी में गाइड की सुविधा नहीं है. वहीँ एक 'ठेकेदार' ने ज्यादातर जानकारी दी जिसे कहीं से सत्यापित भी नहीं किया जा सका. उसने बताया की यहाँ से निकली कुछ मूर्तियाँ ग्वालियर किले के म्यूजियम और कुछ भोपाल के म्यूजियम में रखी हुई हैं. जो शेर या 'व्याल' नीचे फोटो में हैं उनके मूल भी म्यूजियम में हैं. गढ़ी के बाहर लॉन में बहुत से मूर्तियाँ और पैनल रखे हुए हैं जिनके बारे में जानकारी नहीं मिली.

प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

1. प्रवेश मंडप या मुख मंडप. ऊपर के शिखर टूट चुके हैं  
2. गढ़ी की रक्षा करते 'व्याल'

3. नंदी और ग्वाला. गढ़ी के बाहर लॉन में रखी मूर्ति. ऐसी ही खंडित मूर्तियाँ पास के बटेश्वर मंदिर में भी हैं   

4. गढ़ी के लॉन में रखा एक सुंदर पैनल 

5. गढ़ी का बायाँ भाग 

6. गढ़ी का प्रवेश. शिव मंदिर बहुत ऊँचे चबूतरे पर बनाया गया था 

7. कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा - मंदिर के गिरे हुए पत्थरों से दोबारा बनाई गई गढ़ी की दीवारें

8. मंडप के नक्काशीदार खम्बे 

9. बीच में है चामुंडा देवी 

10. महाभारत और रामायण पर आधारित कहानी सुनाती हुई मुर्तियां

11. दशावतार 

12. ब्रह्मा, विष्णु और महेश  

13. सूर्य 

14. शिव पार्वती

15. एक पैनल पर खजुराहो स्टाइल में काम कला के दृश्य भी हैं हालांकि ये मंदिर खजुराहो के मंदिरों से पहले बना माना जाता है   

16. मंडप में 2+16 स्तम्भ हैं  
17. ये हिस्सा बाद में बनाया गया लगता है 

18. शिवलिंग तहखाने में यूँ ही पड़ा हुआ है 

19. ASI का नोटिस बोर्ड 

20. गाँव पढ़ावली

 भीमबेटका

भीमबेटका की गुफाएं भोपाल के दक्षिण में लगभग 45 किमी दूर हैं. इसे भीमबैठका भी कहते हैं. वैसे ये स्थान जिला रायसेन, मध्य प्रदेश में है और रातापानी वन्यप्राणी अभ्यारण्य - Ratapani Wildlife Sanctuary से घिरा हुआ है. यहाँ विन्ध्याचल पर्वत माला लगभग ख़तम सी हो जाती है.

* भीमबेटका की जैसी यहाँ आस पास छे और पहाड़ियां हैं - विनायक, भोरांवली, लाखा जुआर पूर्वी, लाखा जुआर पश्चिमी, झोंडरा और मुनि बाबा की पहाड़ी. ये इलाका बीस किमी के दायरे में फैला हुआ है और यहाँ लगभग सात सौ से ज्यादा चट्टानी आश्रय - rock shelters हैं. हरे भरे जंगल में बड़ी बड़ी और आड़ी तिरछी गुलाबी quartz की चट्टाने भी कम मज़ेदार नहीं हैं अजूबा ही लगती हैं. ये छोटी बड़ी और आड़ी टेढ़ी कुदरती गुफाएं आदि मानव को सिर छुपाने के काम आती थीं. ASI याने पुरातत्व विभाग ने इस इलाके में 1892 हेक्टेयर जमीन सुरक्षित घोषित कर दी है. अभी भी यहाँ कई गाँव हैं जिनमें गोंड और किरकु आदिवासी रहते हैं.

* भीमबेटका में लगभग 250 शेल्टर्स हैं जिनमें अधिकाँश में आदि मानव ने अलग अलग समय पर चित्रकारी की हुई है. गुफाओं में बने कुछ चित्र 30,000 साल पहले के माने जाते हैं. इन शेल्टेर्स में से 15 गुफाएं जिनमें चित्रकारी है, जनता के देखने के लिए अलग कर दी गई हैं. चूँकि जंगल और पथरीला इलाका है इसलिये करीबन 1.5 किमी लंबा एक घुमावदार रास्ता बना दिया गया है ताकि इन 15 गुफाओं में चलते चलते चित्रकारी देखने में सुविधा हो. चित्र तो ऐसे हैं जैसे बच्चे दीवारों पर खुरच के बना देते हैं इसलिये थोड़ा ध्यान से देखना होगा. बादल छाए हों तो चित्रकारी देखना मुश्किल होगा. फोटो में शायद उतना साफ़ ना नज़र आए. इनमें से कुछ में हरा या लाल रंग भी भरा गया है जो अब तक थोड़ा बहुत बचा हुआ है.

* भीमबेटका की ये चित्रकारी काकाड़ू नेशनल पार्क, ऑस्ट्रेलिया, लास्कौ केव पेंटिंग्स, फ्रांस और कालाहारी रेगिस्तान के बुशमैन की चित्रकारी से काफी कुछ मिलती जुलती हैं.

* 1957 में भीमबेटका की इन गुफाओं की खोज archeologist श्री विष्णु श्रीधर वाकणकर ने की. काफी समय बाद 1970 तक बड़े पैमाने पर खोजबीन हुई और आस पास की पहाड़ियों में 700 से ज्यादा गुफाएं रिपोर्ट की गईं. 1990 में ASI ने ये स्थान सम्भालना शुरू किया और 2003 में यूनेस्को द्वारा भीमबेटका को World Heritage Site घोषित किया गया.

* अगर आप जाना चाहें तो भोपाल से सुबह भीमबेटका पहुँच सकते हैं और देखने का बाद वापिस भी जा सकते हैं. सुबह सात से शाम पांच बजे खुलता है.गाइड मिल जाता है. लगभग एक से चार घंटे देखने में लग सकते हैं. वैसे ये विषय आपको कितना रोचक लगता है उस पर भी निर्भर करता है. प्रवेश का टिकट है और गाड़ी का टिकट महंगा है. उमस भरी दोपहर से बचें. आसपास कोई होटल, रेस्तरां या ढाबा नहीं है इसलिए खाने पीने का इंतज़ाम करके चलना ठीक रहेगा.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

1. चट्टानों का रंगमंच 
2. इस चट्टान का नाम रखा गया है boar rock   

3. हरियाली और रास्ता 

4. आदि मानव का गाँव     
5. तरह तरह की गुफाएं  

6. जानवरों के चित्रों की वजह से इस चट्टान का नाम Zoo Rock रख दिया गया है 

7. घोडा और हाथी. यह चित्रण प्रागैतिहासिक ना होकर ऐतिहासीक काल का है.  

8. एक मानव ढोलक जैसा कुछ बजा रहा है और नाच हो रहा है 

9. ये चित्रण बेहतर लग रहा है 

10. पौधे का चित्र 

11. Boar या वराह या जंगली सूअर आक्रामक हो गया है और कोई मानव भागने की कोशिश कर रहा है. गोल सींग और छोटे कान भी हैं. कुछ लोग नीचे खड़े हैं. इस चित्र में रंग भी भरा गया है    

12. पक्षी शायद मोर बनाने का प्रयास 
13. आस पास के जंगल में कई तरह के पेड़ पौधे हैं. उस वक़्त आदिवासियों को यहाँ फल, कन्द-मूल और शिकार आसानी से मिल जाते होंगे. यहाँ देखिये 'कारी' के पेड़ के तने पर 'पापड़ा' का पेड़ उगा हुआ है 

14. ASI का नोटिस बोर्ड 

15. गेट खुलने का इंतज़ार. यहाँ से लगभग तीन किमी अंदर हैं भीमबेटका की चट्टानों पर पेंटिंग   

16. यहाँ कुछ 'आधुनिक' चित्रण है. छोटे हाथी पर एक सवार भी है और उसके हाथ में भाला भी है 
17. सीधी सीधी लाइनों वाले चित्र 

18. चट्टानों और गुफाओं में आदिवासी जीवन की झलक 

19. डायनोसोर जैसी चट्टानें 

 ग्रीक राजदूत का खम्बा

ग्रीक राजदूत का खम्बा दरअसल एक पत्थर का खम्बा है जो लगभग 2100 साल पुराना है. ये खम्बा बेसनगर जिला विदिशा, मध्य प्रदेश में है. ये स्थान भोपाल से साठ किमी, साँची के बौद्ध स्तूपों से ग्यारह किमी दूर और उदयगिरी की गुफाओं से तीन किमी दूर है. स्थानीय लोग इसे 'खाम बाबा' या 'खम्बा बाबा' भी कहते हैं. ये स्तम्भ 6.5 मीटर ऊँचा है और ये 113 ईसा पूर्व में ग्रीक राजदूत हेलिओडोरस ने बनवाया था.

2. इस ऐतिहासिक खम्बे का बड़ा रोचक किस्सा है. तक्षशिला, ( पाली भाषा में तक्खिला, अंग्रेजी में Taxila जो अब पंजाब, पाकिस्तान में है ) में 200 साल ईसा पूर्व ग्रीक राजा अन्तियलसिदास ( Antialcidas ) का राज था. तक्षशिला एक व्यापारिक केंद्र भी था और भारतीय उप महाद्वीप के कई शहरों से इसके व्यापारिक और सांस्कृतिक सम्बन्ध थे. यूनानी राजा ने हेलिओडोरस को राजदूत बना कर विदिशा भेजा था. उस समय विदिशा समेत उत्तर भारत में शुंग वंश के पांचवें राजा भागभद्र का राज था. हेलिओडोरस यात्रा के दौरान या फिर विदिशा में रहते हुए विष्णु भक्त हो गया और उसने 113 ईसा पूर्व में इस स्तम्भ और साथ में एक मंदिर का निर्माण करवाया. मंदिर अब नहीं है. खम्बा गोल ना होकर कोणीय है. इस स्तम्भ का निचला हिस्सा 8 कोणीय है, बीच में 16 कोणीय और ऊपर 32 कोणीय है. मतलब की बड़े कौशल और मेहनत से ये स्तम्भ बनाया गया था.

3. विदिशा के आस पास पहाड़ियां, घने जंगल और बेस नदी भी है. कालान्तर में हेलिओडोरस का खम्बा और मंदिर झाड़ झंखाड़ और जंगल में खो गए. 1887 में एलेग्जेंडर कन्निन्घम ने बेस नगर और आस पास की खोज में इस पत्थर के खम्बे के बारे में लिखा था. पर खम्बा सिंदूर, तेल और धूल की मोटी परत से से ढका हुआ था इसलिए कन्निन्घम ने उस पर लिखे अभिलेख को शायद नहीं देखा और ना ही अभिलेख के बारे में जिकर किया. उसके विचार में यह खम्बा गुप्त कालीन याने ईसा के बाद सन 300 से 350 के दरम्यान का रहा होगा.

4. 1901 में जॉन मार्शल और लेक ने आगे खोज की. इस बीच खम्बे के आस पास देसी बाबाओं का डेरा लग चुका था और पत्थर का खम्बा भी अब 'बाबा' बन चुका था. आस पास के गाँव के लोगों द्वारा 'खम्बा बाबा' को सिंदूर लगा कर पूजा जा रहा था. जब खम्बे पर से सिंदूर की  जमी परतें हटवाई गई तो मालूम हुआ कि खम्बे पर तो कुछ खुदाई कर के लिखा भी गया है. तब मार्शल ने कहा कि यह खम्बा गुप्त कालीन नहीं बल्कि कई सदी पुराना होना चाहिए. जब अभिलेख पढ़ा गया तो सभी आश्चर्यचकित रह गए कि एक ग्रीक राजदूत हेलिओडोरस विष्णु का भक्त हो गया था और उस भक्त ने यह खम्बा और मंदिर बनवा दिया था.

5. बाद में खम्बे के आस पास खुदाई होने पर प्रमाण मिले की पहले यहाँ मंदिर भी रहा होगा जो शायद बाढ़ में बह गया. अगर आप साँची या उदयगिरी गुफाएं देखने जाएं तो खाम बाबा को आसानी से देख सकते हैं. चूँकि स्तम्भ के अलावा यहाँ कुछ भी नहीं है और वहां गाइड भी उपलब्ध नहीं है इसलिए देखने में ज्यादा समय नहीं लगेगा. पर रोमांच जरूर होगा कि कहाँ विदिशा और कहाँ ग्रीस ! गूगल में देखें तो विदिशा से तक्षशिला की दूरी 1234 किमी है और तक्षशिला से ग्रीस की दूरी 5791 किमी है. हेलिओडोरस को महीनों लग गए होंगे यहाँ पहुँचने में. और फिर उसका विष्णु भक्त बन जाना भी एक चमत्कार सा ही है. 

6. पत्थर के स्तम्भ में खुदा हुआ अभिलेख का  रूपांतरण इस प्रकार है जो की विकिपीडिया से लिया है:
देव देवस वासुदेवस गरुड़ध्वजे अयं
कारिते इष्य हेलियो दरेण भाग
वर्तन दियस पुत्रेण नखसिला केन
योन दूतेन आगतेन महाराज स
अंतलिकितस उपता सकारु रजो
कासी पु (त्र)(भा) ग (भ) द्रस त्रातारस
वसेन (चतु) दसेन राजेन वधमान
अर्थात
देवाधिदेव वासुदेव का यह गरुड़ध्वज (स्तंभ) तक्षशिला निवासी दिय के पुत्र भागवत हेलिओवर ने बनवाया, जो महाराज
अंतिलिकित के यवन राजदूत होकर विदिशा में काशी (माता) पुत्र (प्रजा) पालक भागभद्र के समीप उनके राज्यकाल के चौदहवें वर्ष में आए
त्रिनि अमृतपदानि अनुत्थानी
नयमती स्वग दमो छगो अप्रमादो
अर्थात
तीन अमृत पद के अनुष्ठान से स्वर्ग मिलता है - संयम, दान, निष्ठा. 
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो -

1. हेलिओडोरस का खम्बा 

2. खम्बे का ऊपरी भाग 

3. प्राकृत भाषा और ब्रह्म लिपि में अभिलेख 

4. चबूतरे में लगा पत्थर. स्तम्भ का जीर्णोद्धार 1921 में ग्वालियर के महाराजा माधवराव सिंधिया, आलीजाह बहादुर के शासन काल में हुआ 

5. पास ही चबूतरे पर रखे कुछ आइटम. इसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली 

6. चलो चलें खाम बाबा को देखने 

 ओरछा

झांसी से 17 किमी दूर है ओरछा और ओरछा से लगभग 200 किमी दूर है खजुराहो. आम तौर पर टूरिस्ट सीधे खजुराहो ही निकल जाते हैं. पर टूरिस्ट के लिए ओरछा भी कम नहीं है. मंदिर, छतरियां और महल तो हैं ही साथ ही नदी, पहाड़ियाँ और जंगल भी पास में हैं. बेतवा नदी में राफ्टिंग की जा सकती है और जंगल में ट्रैकिंग. ओरछा के राम राजा सरकार मन्दिर में सालाना सात लाख लोग आते हैं और यहाँ 25-30 हजार परदेसी टूरिस्ट भी आते हैं. ओरछा में  देखने के लिए राजा महल, जहाँगीर महल, राय प्रवीण महल, हमाम खाना और ऊंट खाना है जिनकी वास्तु कला अलग है. नदी किनारे पंद्रह बुंदेला राजाओं की सुंदर छतरियां ( स्मारक ) भी हैं.

कहा जाता है कि बुंदेला राजपूत राजा रूद्र प्रताप सिंह ने 1531 में ओरछा शहर और राज की स्थापना की थी. इन्टरनेट में देखा तो लिखा है की राजा मिहिर भोज ने आठवीं शताब्दी में ओरछा बसाया था. बहरहाल ओरछा का किला रूद्र प्रताप सिंह का बनवाया हुआ है. ओरछा जिला निवाड़ी का एक भाग है ( कहीं कहीं जिला टीकमगढ़ भी लिखा हुआ था ). ओरछा पुराने समय से ही ज्यादातर गुमनाम सा ही रहा है और अब तक भी सैलानियों के नक़्शे में कम ही आता है. इलाका पिछड़ा सा जरूर है पर यहाँ हर तरह के होटल और सुविधाएं उपलब्ध हैं.

यहाँ की बोली थोड़ी सी अलग है और इसे बुन्देली कहते हैं. स्थानीय लोगों से बातचीत की तो पता लगा की बोलने का अंदाज़ अलग है, शब्दों का भण्डार बड़ा है और कहावतों और लोकोक्तियों की कमी नहीं है. मसलन
"गधन के मौर बाँध दई" याने गधे के सर पर ताज रख दिया.
"घोड़न को चारो गधन को नईं डारो जात" घोड़े का चारा गधों को नहीं दिया जाता.
एक और रोचक कहावत गाइड ने बताई:
इक हते राम इक हते रावन्ना,
जे हते ठाकुर वे हते बामन्ना,
उन्ने उनकी नार हरी,
उन्ने उनकी नास करी,
बात बात को बातन्ना,
तुलसी बाबा को पोथन्ना!

प्रस्तुत हैं ओरछा की कुछ फोटो: 

बेतवा नदी और नदी किनारे बुंदेला राजाओं की छतरियां  

बेतवा नदी. ये नदी अभी तक तो काफी साफ़ है. मानसून में पानी तीन चार फुट ऊपर आ जाता है और पत्थर दिखाई नहीं पड़ते. बाईं ओर किले की दीवार है  

नदी के दूसरी ओर रिज़र्व जंगल है. इस जंगल में कुछ गाँव भी हैं . यहाँ ट्रैकिंग की जा सकती है 

बाढ़ में पुल को काफी नुक्सान हुआ. अब दूसरी ओर जाना मुश्किल हो गया है 

प्रविश नगर कीजे सब काजा, ह्रदय राखि कौशलपुर राजा.  राम राजा नगरी ओरछा का द्वार 
शहर की सीमा. कभी यहाँ सैनिक रहते होंगे  

राजा महल 

ओरछा वासी 

नगर पंचायत द्वारा बनाया गया प्रतीक्षालय 
ओरछा वासी के साथ 

ओरछा वासी 

ओरछा वासी 

बेतवा नदी और तीन देवियाँ 

बहुत कठिन है डगर जीवन की 
बेतवा नदी में एक शिवलिंग 


पुराने महल में नए ज़माने के हाथी घोड़े 
चतुर्भुजा मंदिर 

 बटेसर मंदिर, मोरेना


बटेसर के मंदिर, मोरेना 

कई मन्दिरों के सामने नंदी की खंडित मूर्तियाँ हैं. इनके सिर और कूबड़ टूटे हुए हैं. इन सभी पर एक ग्वाला या रखवाला भी बना हुआ है 


बटेसर या बटेश्वर मंदिरों का एक बड़ा ग्रुप जिला मोरेना, मध्य प्रदेश में हैं. इनमें से एक बड़े मंदिर को भूतेश्वर मंदिर भी कहा जाता है. ये मंदिर मोरेना शहर से लगभग 30 किमी और ग्वालियर से लगभग 40 किमी दूर हैं. इस ग्रुप या समूह में 200 से ज्यादा मंदिर थे जो 25 एकड़ के इलाके में फैले हुए हैं. आसपास घना जंगल और पहाड़ियां हैं. ये स्थान चम्बल घाटी के पुराने किले के अंदर है. किला तो लगभग गायब ही हो चुका है.

आना जाना ग्वालियर से आसान है पर बसों की कमी है और सर्विस भरोसेमंद भी नहीं हैं. अपनी गाड़ी या टैक्सी बेहतर रहेगी. आस पास कोई रेस्तरां या ढाबा भी नहीं है इसलिए खाने पीने का अपना इंतज़ाम करके चलना ठीक रहेगा. दोपहर की धूप यहाँ तीखी है और अगर उमस भरा मौसम हो तो परशानी हो सकती है. आप चाहें तो एक दिन में बटेसर मंदिरों के अलावा गढ़ी पड़ावाली, चौंसठ योगिनी मंदिर, मोरेना और शनिचरा भी देख सकते हैं. अफ़सोस है की इन सुंदर धरोहरों पर गाइड नहीं मिलते माली या गार्ड जो बता दें वही सुन कर संतोष करना पड़ता है!

सभी मंदिर हल्के लाल बलुआ पत्थर याने sand stone के बने हुए हैं. मंदिर छोटे छोटे हैं और शिव, शक्ति और विष्णु को समर्पित हैं. कई मंदिरों में शिवलिंग है और मंदिर के सामने नंदी बैठा हुआ है परन्तु ज्यादातर क्षत विक्षत हैं. इन मंदिरों में से जो ठीक ठाक नज़र आ रहे हैं वो पुरातत्व विभाग याने ASI द्वारा पुनर्स्थापित किये गए हैं.

इतिहासकारों के अनुसार ये मंदिर सन 750 से लेकर सन 1100 तक के दरम्यान बने होने की सम्भावना है. लेकिन कैसे ये मंदिर गिरे या टूटे या तोड़े गए इस के बारे में पुख्ता जानकारी नहीं है. करीबन तेरहवीं शताब्दी के बाद से ये मंदिर झाड़ झंखाड़ और जंगलों से ढके रहे. 1882 में अलेक्ज़ंडर कन्निन्घम ने पड़ावली की पहाड़ियों में 100 से ज्यादा सुंदर मंदिरों के बारे में बताया था. 1920 में पुरातत्व विभाग अर्थात ASI ने इसे संरक्षित जगह घोषित किया. 1968 में एक फ़्रांसिसी इतिहासकार ने मंदिरों पर विस्तृत पेपर प्रकशित किया. 2005 में पुरातत्व विभाग के भोपाल क्षेत्र के अधिकारी श्री के के मोहम्मद की पचास आदमियों की टीम ने लगभग साठ मंदिरों को फिर से स्थापित करना शुरू किया.

वहां के एक कर्मचारी ने एक किस्सा बताया जो की स्थानीय अखबारों में भी छपा था, की जब काम शुरू हुआ तो एक आदमी वहां बीड़ी के सुट्टे मारता हुआ कारवाई देखने लगा. मोहम्मद साब ने उसे डांट दिया कि मंदिर में बीड़ी ना पिए. इस पर उनकी टीम के सदस्य ने बताया की इस आदमी से ना उलझें ये चम्बल का नामी डाकू है! पर जब डाकू को पूरी बात पता लगी तो उसने और उसकी 'टीम' ने भी मंदिर के काम में सहयोग दिया.

ये मंदिर गुर्जर-प्रतिहार शैली के हैं. नक्काशी का काम खजुराहो के मंदिरों जैसा सुघड़ नहीं हैं. शायद ये गुर्जर-प्रतिहार कला का शुरुआती दौर रहा होगा. श्री के के मोहम्मद के अनुसार इन मंदिरों की वास्तु संस्कृत में लिखे दो पुराने ग्रंथों के अनुसार है - मानसारा वास्तु शास्त्र और मायामत वास्तु शास्त्र जो की चौथी और सातवीं शताब्दी के हैं. उनकी टीम ने खंडहरों के टूटे, बिखरे पत्थर तरतीब से एक पहेली याने jig saw puzzle की तरह जोड़ना शुरू किया पर बहुत सा काम अभी बाकी है.

फिलहाल इन मंदिरों में कोई पूजा पाठ नहीं होता है. बीच में एक बड़े पत्थर पर बनी हनुमान की गेरुए रंग से रंगी मूर्ति जरूर है जो बिलकुल अलग ही नज़र आती है. शायद बाद में रखी गई होगी. और हाँ गूगल में ढूंढेंगे तो एक और बटेसर या बटेश्वर मंदिर मिलेगा जो की उत्तर प्रदेश में है.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो और वीडियो. वीडियो ब्लॉग में पोस्ट नहीं हो पाए. इनको अपनी यूट्यूब चैनल में पोस्ट किया है और लिंक अंत में दिए हैं:


घने जंगल और पहाड़ियों के बीच मंदिरों के खंडहर 

ये सुंदर मंदिर दूसरे मन्दिरों से थोड़ा दूर है और बड़ा है. चार हिरन सड़क पार कर रहे थे पर जब तक मोबाइल से फोटो क्लिक की तब तक तीन तेज़ी से दूसरी तरफ निकल गए. यहाँ मोर भी बहुत हैं   
इन खम्बों पर शायद कभी बड़े मंदिर की छत रही हो 

बनावट छोटे किले या गढ़ी जैसी है. रहने का स्थान रहा होगा  

सभी मन्दिर ऊँचे चबूतरों पर बने हैं और इनमें दरवाज़े नहीं हैं 

फिर से जोड़ कर बनाया गया मंदिर 

छोटे से मंदिर में शिवलिंग 

मूर्तियाँ जाने क्या कहती हैं 

रख रखाव की तरफ और ध्यान की जरूरत है 

मन्दिरों के लिए पानी का इन्तेजाम भी है 

बहुत कुछ करना बाकी है 

यूट्यूब के वीडियो लिंक:

 राम राजा मंदिर, ओरछा

झाँसी से करीब 18 किमी दूर झाँसी-खजुराहो मार्ग पर है ओरछा. और यहाँ पर है ओरछा मंदिर या राम राजा मंदिर. यहाँ भगवान राम की पूजा राजा के रूप में की जाती है. बल्कि ओरछा को आम तौर पर राम राजा नगरी भी कहा जाता है. पुलिस की एक टुकड़ी सुबह और शाम की आरती के बाद राजा राम को सलामी भी देती है. इस मंदिर से जुड़ी एक कहानी भी है जो संक्षेप में इस प्रकार है:

ओरछा के राजा मधुकर शाह जू देव (1554-1592 ) बांके बिहारी के उपासक थे और रानी गणेश कुँवरि भगवान् राम की भक्ति में मगन रहती थी. जब राजा वृन्दावन जाते और तो रानी अयोध्या चली जाया करतीं. एक दिन राजा ने रानी को कृष्ण उपासना करने के लिए वृन्दावन साथ चलने को कहा. दोनों जब वहां पहुंचे तो मंदिर बंद हो चुके थे परन्तु कुछ भक्त मंदिर के बाहर ही भजन कीर्तन कर रहे थे. दोनों उन्हीं में शामिल हो गए और संगीत के साथ नाचते रहे. राजा को लगा की स्वयं बांके बिहारी उनमें समा गए हैं. अगले बरस राजा फिर से वृन्दावन की ओर चले तो रानी ने साथ ना जाकर अयोध्या जाना चाहा. क्रोध में राजा ने कहा की अगर अयोध्या जा रही हो तो अपने राम को ओरछा में लेकर आना खाली हाथ नहीं आना.

रानी ने भी निश्चय कर लिया और अयोध्या पहुँच कर सरयू किनारे डेरा डाल दिया. कई महीनों तक राम राजा के दर्शन नहीं हुए. खाना पीना त्याग दिया. अंत में रानी सरयू में कूद पड़ीं. जल में राम के दर्शन हुए और रानी ने पूरी बात बताई. राम राजा ने ओरछा जाना स्वीकार कर लिया पर शर्तें लगा दीं कि:
- पूरी यात्रा पैदल होगी और यात्रा केवल पुष्प नक्षत्र में होगी,
- ओरछा पहुँचने पर ओरछा में मेरा राज होगा और
- मूर्ति एक स्थान पर रखने के बाद हिलेगी नहीं.
राजा को संदेशा भेज दिया गया कि रानी राम राजा के साथ आ रही हैं. ओरछा में राम मंदिर बनाने की तैयारी शुरू हो गयी. रानी बालक राम की मूर्ति गोद में लेकर पैदल चलती रहीं और आठ महीने सत्ताईस दिन बाद अपने महल में पहुँचीं. स्वागत के दौरान राजा ने अचानक रानी से पानी माँग लिया तो रानी ने मूर्ती रख दी और राजा को पानी दिया. पर फिर मूर्ति तो वहां से हिलाई नहीं जा सकी और महल को ही मंदिर बनाना पड़ा. जो भव्य और विशाल चतुर्भुजा मंदिर तैयार किया गया था वह आज भी मूर्ति के बगैर ही है.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो:

ऊँची जगती ( प्लेटफार्म ) पर बना चतुर्भुजा मंदिर जिसमें कोई मूर्ति नहीं है. दाएँ सफ़ेद रंग में राम राजा मंदिर है 

राजा महल में राजा का शयन कक्ष. इस कक्ष में ये जाली बनवाई गई थी जहां से राजा सुबह मंदिर का दर्शन करते थे 

चांदनी रात में चतुर्भुजा मंदिर 

राम राजा मंदिर का प्रवेश 

राम राजा मंदिर 

पुलिस की टुकड़ी यहाँ सलामी देने के लिए तैनात रहती है 

राम, जानकी और लक्ष्मण की एक पत्थर की मूर्ति जो राजा महल के म्यूजियम में रखी हुई है. कपड़े और मुकुट कुछ अलग से हैं  

 Raneh Falls

Raneh Falls is an awesome sight formed by Ken River flowing through & falling on granite rocks. Ken ( ancient name Karnavati ) falls in multiple places in to thirty meter deep & five km long canyon. This canyon is made up of crystalline granite rocks of different hues - pink, reddish, greenish & greyish. The rocks are said to be formed of volcanic activity long long ago - guide said five lac years back!

We had driven our car from Delhi & were in Khajuraho. The hotel staff recommended a visit to Raneh as driving was not a problem to us. Had never heard of River Ken or Raneh but decided to give it a try. The 22 km drive to Raneh was bumpy on a narrow rural road. Nevertheless the sight of water falls was worth it. Due to coloured rocks flanking the river in deep gorge this place is unique in India. Charming place for nature lovers.

Raneh is in Chhatarpur district of Madhya Pradesh 22 km from Khajuraho & 44 km from Panna. Public transport is available but erratic so have your own vehicle or hire one. Close to Raneh Falls is Ken Ghariyal Sanctuary where you can watch Ghariyals - smaller fish-eating crocodiles with long snouts native to India. This Ghariyal Santuary opens from Oct to Apr / May. There is a small photo museum about local birds & rocks here. A restaurant is also there. Boating is available. If time permits you can visit Panna National Park as well which is a tiger reserve. It is 20 km from Raneh but then jungle safari requires time min half a day. Besides per person entry charges of Rs. 20, there is guide fee & hefty vehicle fee as well.
Here are some photos & two videos:

This 30 meter deep canyon is unique in India 

Pink, grey granite rocks & the river Ken

Jungle, rocks & river. During monsoon amount & flow of water is much more

Enjoying the nature

Black & red

One of the many Falls of Ken River

Spectacular landscape

Smaller fall which comes into action in monsoon 

This rocky area is surrounded by dense jungle including Panna National Park 

Entry point of Raneh Falls. Road to this place from Khajuraho is very narrow & ride is bumpy 









 गुरुद्वारा श्री दाता बंदी छोड़ साहिब, ग्वालियर

ग्वालियर के किले में एक गुरुद्वारा है जिसकी एक रोचक और ऐतिहासिक कहानी है. इस गुरूद्वारे का नाम है - गुरुद्वारा श्री दाता बंदी छोड़ साहिब और इसी नाम से जुड़ी कहानी भी है. ये कहानी एक उदाहरण भी है की सिखों के छठे गुरु हर गोबिंद जी कितने विशाल और उदार ह्रदय के थे.

गुरु हर गोबिंद जी ने गद्दी ( छेवीं पातशाही ) सँभालने के बाद अमृतसर में अकाल तख़्त की स्थापना की. साथ ही उन्होंने लोहागढ़ किले अमृतसर में संत सिपाहियों की फ़ौज तैयार करनी शुरू कर दी. धीरे धीरे खबर में बादशाह जहाँगीर के दरबार में भी पहुच गई जिसके कारण जहांगीर को चिंता हो गई. गुरु साहिब को दरबार में बुलाया गया जहां गुरु साहिब की जहाँगीर से मुलाकातें हुईं. जहाँगीर की तबियत खराब हुई तो कुछ दरबारियों और हाकिम ने सलाह दी कि अगर ग्वालियर किले में कोई साधू संत प्रार्थना करे तो जहाँगीर की सेहत बेहतर हो सकती है. गुरु साहिब का नाम सुझाया गया और उन्हें ग्वालियर के किले में भेज दिया गया. किले में पहुँचने पर उन्हें बंदी बना दिया गया.

किले के जेल में बावन और लोग भी बंदी थे. ये आसपास की छोटी रियासतों और छोटे मोटे राज्यों के राजपूत राजा थे जिन्होनें जहांगीर के शाही खज़ाने में लगान और टैक्स नहीं जमा किये थे. गुरु साहिब जेल में नियमित पाठ करते और जरूरत होती तो साथी कैदियों की सेवा भी करते. खबर नूरजहाँ तक पहुंची की कोई संत महात्मा ग्वालियर किले में कैद हैं जो नियम से पाठ करते हैं और बीमार कैदियों की मदद भी करते हैं. इधर जहांगीर की तबियत खराब होती जा रही थी. फैसला हुआ की जेल में जो संत बंदी हैं उन्हें छोड़ दिया जाए. जवाब में गुरु साहिब ने सन्देश भेजा कि मैं अकेला बाहर नहीं जाऊँगा बल्कि मेरे साथ सभी बावन कैदी छोड़े जाएं.

ये शर्त टेढ़ी थी कि सबको छोड़ दिया जाए. काफी दिन बाद जवाब में अनोखा आदेश आया की जो भी गुरु साहिब का पल्ला पकड़ कर बाहर आएगा उसे छोड़ दिया जाएगा. अब ये शाही शर्त ये सोच कर लगाई गई की राजपूत राजाओं को पल्ला पकड़ कर चलना बेज्ज़ती का कारण होगा और वो ऐसा नहीं करेंगे. परन्तु गुरु साहिब ने अपने अंगरखे में बावन रिब्बन बाँध लिए और बावन के बावन कैदी एक एक रिब्बन पकड़ कर गुरु साहिब के साथ बाहर आ गए. ये अक्टूबर 1619 की बात है. तब से गुरु साहिब को दाता बंदी छोड़ साहिब कहा जाने लगा. किले में एक छोटा सा संगमरमर का चबूतरा स्मारक के रूप में बना दिया गया जिसकी देख रेख मुस्लिम करते थे.

1947 के बाद से यहाँ छोटा गुरुद्वारा शुरू हुआ, 1970 - 80 के दौरान छे एकड़ में गुरुद्वारा विकसित हुआ. अब यहाँ दो सरोवर, लंगर हॉल और एक छोटा म्यूजियम भी है. अक्टूबर में दाता बंदी छोड़ दिवस भी मनाया जाता है.

गुरुद्वारा श्री दाता बंदी छोड़ का गेट .यहाँ एक म्यूजियम भी है  

किले के अंदर जेल जहाँ कैदी बंद थे 

जेल के तहखाने का रास्ता 

यह कहानी तीन या चार तरह से कही गई है. और अधिक जानकारी के लिए गूगल में खोज करें या देखें :
 sikhiwiki.org
 historicalgurudwaras.com

 चौंसठ योगिनी मंदिर, मोरेना

चौंसठ योगिनी मंदिर का नाम जैसा अनोखा है वैसा ही मंदिर भी अनोखा पर बहुत सुंदर है. इस गोलाकार मंदिर में 64 cell या प्रकोष्ठ हैं जिनके द्वार गर्भ गृह की ओर खुले हुए हैं. इनमें से ज्यादातर में शिवलिंग है पर और कोई मूर्ति नहीं है. बीच के बहुत बड़े गोलाकार आँगन में एक गोलाकार चबूतरे पर मंडप में गर्भ गृह है जिसमें शिव लिंग स्थापित है. इस सुंदर गोलाकार चौंसठ योगिनी मंदिर का दूसरा नाम इकोत्तरसो या इकंतेश्वर महादेव मंदिर भी बताया जाता है. इकोत्तरसो / इकंतेश्वर जैसे शब्द क्यूँ इस्तेमाल में आए इसके बारे में पता नहीं लगा.

ये मंदिर मध्य प्रदेश के मोरेना जिले के मितावली ( अंग्रेज़ी में Mitawali / Mitaoli / Mitavali ) गाँव में है. वैसे मितावली गाँव ग्वालियर से 40 किमी दूर है और ग्वालियर से मंदिर तक आना जाना ज्यादा आसान है. मितावली गाँव के खेतों के बीच में सौ फुट ऊँची एक पहाड़ी है जिस पर ये मंदिर बना हुआ है. ऊपर चढ़ने के लिए आड़े टेढ़े पत्थरों को सौ पायदान वाली सीढ़ी है. पहाड़ी के ऊपर बड़ी और चौड़ी चट्टानें हैं जिस पर ये गोलाकार मंदिर बनाया गया है. गोले का व्यास 340 फुट है. मुख्य मंदिर के ऊपर या 64 प्रकोष्ठों के ऊपर सपाट छत है और कोई शिखर नहीं है. ASI का कहना है की शिखर थे पर अगर कभी रहे हों तो अब नहीं है. मंदिर का उद्धार धीरे धीरे पिछले सौ वर्षों में ही हुआ है. मंदिर में 1323 के लिखे हुए एक अभिलेख - inscription के अनुसार ये मंदिर राजा देवपाल ( राज काज 1055- 1075 ) ने बनवाया था. ASI ने राजा देवपाल का नाम तो लिखा है पर 1055-1075 का जिक्र नहीं किया है. इसी तरह के गोलाकार चौंसठ योगिनी मंदिर हीरापुर ओडिशा, रानीपुर ओडिशा और जबलपुर में भी हैं. एक चौंसठ योगिनी मंदिर खजुराहो में भी है परन्तु वह गोलाकार ना होकर आयताकार है.

योगी / योगिन / योगिनी या जोगी जोगिन शब्द तो परिचित शब्द हैं. इन शब्दों का इस्तेमाल हिन्दू, जैन और तांत्रिक बौद्ध साहित्य में हुआ है. पर यहाँ पूरा का पूरा मंदिर ही जोगिनों को समर्पित है. इसका क्या उद्देश्य या कैसा उपयोग रहा होगा यह तो इतिहास में दबा ही रह गया. इतना ज़रूर है कि इन चौंसठ योगिनियों के नाम और चौंसठ ही मन्त्र इन्टरनेट में मिल जाएंगे जिनका सम्बन्ध तांत्रिक विद्या से बताया जाता है. वहां मौजूद पंडित जी भी ज्यादा बता नहीं पाए. उनके अनुसार पार्वती अपनी 64 योगिनियों के साथ भगवान् शिव को रिझाने के लिए या फिर उनकी आराधना करने के लिए यहाँ आती थी.

कुछ लोगों का ये भी कहना है की नई दिल्ली के संसद भवन का डिजाईन भी यहीं से लिया गया है. इस बात की पुख्ता जानकारी नहीं मिली.

अगर आप जाना चाहें तो मोरेना से या ग्वालियर से जा सकते हैं. बसों के बजाए अपनी गाड़ी या पूरे दिन की टैक्सी बेहतर रहेगी. इस मंदिर के अलावा आप बटेसर मंदिर, गढ़ी पड़ावली और शनिचरा भी देख सकेंगे. ध्यान रहे कि दोपहर की धूप यहाँ तीखी है और पत्थर / चट्टानें गर्म हो जाती हैं. आसपास कोई रेस्टोरेंट नहीं है. GPS भी बीच बीच में गायब हो जाता है. टिकट नहीं है और गाइड भी नहीं मिलते. आधी अधूरी भावनात्मक जानकारी स्थानीय लोगों से मिलती है. इन स्मारकों के आस पास साफ़ सफाई की कमी है और ये सभी सुंदर और कीमती धरोहर उपेक्षा की शिकार लगती है.
शुभकामनाओं के साथ कुछ फोटो प्रस्तुत हैं:

चौंसठ योगिनी मंदिर का आँगन 
प्रवेश द्वार 

प्रवेश के दाहिनी ओर पूजा 

परिक्रमा 

इस प्रकार के 34 खम्बे हैं 

गर्भ गृह में स्थापित शिवलिंग 

मंदिर में अभी भी पूजा पाठ होती है 

गर्भ गृह के पहले वृत्त में 17 खम्बे हैं , बीच के वृत्त में 34 और तीसरे बड़े वृत्त में 68 खम्बे हैं 

ऐसे दो शिवलिंग गर्भ गृह के बाहर हैं 

कुछ पल आराम के! यहाँ तक आना मुश्किल जरूर था पर इस पुरातन मंदिर की बनावट, पत्थर का काम और सुन्दरता देख कर बहुत ख़ुशी हुई और थकावट दूर हो गई 
पहाड़ी के ऊपर  

ASI का नोटिस बोर्ड. ये भी लिखा है कि पहाड़ी की तलहटी में भारी भरकम आभूषणों युक्त आदमकद कुषाण कालीन पाषाण प्रतिमाएं प्राप्त हुई है जो ग्वालियर किले के म्यूजियम में रखी गई हैं  

इस छोटे से केबिन में कोई मूर्ती नहीं है 

पहाड़ी पर बना मंदिर दूर से संसद भवन जैसा लगता है. यह अधूरी मूर्ती शायद नंदी की लगती है. ये कब लगाईं गई इसका पता नहीं लगा  

आड़ी तिरछी पत्थर की सीढ़ी पर सौ फुट ऊँची चढ़ाई 

पहाड़ी की तलहटी में शायद गार्ड रूम बना होगा. अब गाँव के लोगों के लिए आरामगाह है 


बाहर का दृश्य 
मंदिर के अंदर का 29 सेकंड का वीडियो >



 ज़ीरो माइल स्टोन

दिल्ली के राजघाट और मुम्बई के होर्निमैन सर्किल में क्या सम्बन्ध है? इस प्रश्न का उत्तर ये है कि दोनों जगहों पर ज़ीरो माइल स्टोन हैं याने जहां से दूरियां नापी जाती हैं. इसी तरह हैदराबाद में आल इंडिया रेडियो के पास, नागपुर में रिज़र्व बैंक चौराहे के पास और मेरठ में बेगम पुल के पास ज़ीरो मील पत्थर लगे हुए हैं. आपके शहर में भी एक ज़ीरो का मील पत्थर होगा जो दूरियां नापने का मानक या standard benchmark माना जाता है.

तो फिर देश का ज़ीरो माइल स्टोन कहाँ है? ज्यादातर देशों में ज़ीरो उन देशों की राजधानी में है. परन्तु भारत में 1907 में नागपुर को ब्रिटिश राज का केंद्र बिंदु मान कर ज़ीरो माइल स्टोन का पत्थर लगाया गया. इस पत्थर से राजघाट दिल्ली के ज़ीरो मील पत्थर की दूरी 1078 किमी है. इसी पत्थर से समुद्री सतह - mean sea level की  ऊँचाई भी नापी गई.

नीचे दी हुई पहली फोटो ज़ीरो माइल स्टोन नागपुर की है जिसमे बलुए पत्थर का खम्बा 6.5 मी ऊँचा है. खम्बे का गोलाकार आधार 7.90 मी व्यास का है. इसके उपर का चबूतरा षटकोणीय है जिस पर आठ शहरों के नाम और उनकी दूरीयां दर्ज हैं जैसे कि हैदराबाद 318 मील.

तीसरी फोटो में एक पत्थर है जिस पर G.T.S लिखा हुआ है याने Great Trigonometrical Survey. पहला सर्वे 1802 में ईस्ट इंडिया कंपनी के फौजी ऑफिसर विलियम लैम्पटन ने शुरू कराया जो रुक रुक कर चलता रहा और 1871 में सम्पूर्ण अविभाजित भारत का पहला नक्शा तैयार हुआ. नपाई की एक खासियत थी की इसकी शुरुआत एक त्रिभुज से की गई और उसमें आगे त्रिभुज जोड़ते चले गए. पहला त्रिभुज मद्रास / चिन्नई, में बनाया गया. इस त्रिभुज का आधार 7.5 मील लम्बी समतल लाइन थी, एक भुजा माउंट डेल्ले की पहाड़ी तक थी और दूसरी तड़ीयाडमोल पहाड़ी तक. यहाँ से फिर भारतीय उपमहाद्वीप के पूर्वी समुद्र तट याने चेन्नई तट से पश्चिमी तट तक के सर्वे में पांच साल लगे थे.

ज़ीरो मील पत्थर का स्मारक राष्ट्रीय राजमार्ग 7 पर है. स्मारक देखने का कोई टिकट नहीं है क्यूंकि ये सड़क के किनारे ही है और 24 घंटे खुला है कभी भी देखा जा सकता है. पार्किंग की जगह नहीं है. चार घोड़े और खम्बा किसने लगाया इसका रिकॉर्ड नहीं है.

बहरहाल आपके शहर का ज़ीरो मील पत्थर याने खूँटी कहाँ है?

1. ज़ीरो माइल स्टोन नागपुर 

2. ज़ीरो मील पत्थर - भारत का केंद्र 

3. ये वो पत्थर है जिसे शून्य बिंदु मान कर शहरों की दूरियां नापी गईं Standard Bench Mark

भारत के नक़्शे में ज़ीरो मील पत्थर 

विकिपीडिया से साभार - ये नक्शा जो Great Trigonometrical Survey में इस्तेमाल किया गया. त्रिभुजों की सहायता से नपाई की गई   

 तेली का मंदिर, ग्वालियर

ग्वालियर के किले में स्थित तेली का मंदिर अनूठा मंदिर है. यह मंदिर लगभग तीस मीटर ऊँचा है और इस विशालकाय मंदिर की बनावट में नागर और द्रविड़ शैलियों का मिश्रण है. मंदिर के अगले भाग की बनावट शिखर  ^  जैसी है परन्तु उस के ऊपर  T  की तरह, द्रविड़ शैली का गोपुरम भी है. मंदिर विष्णु, शिव और शक्ति को समर्पित है पर फिलहाल अंदर कोई मूर्ति नहीं है शिवलिंग है. दीवारों पर तरह तरह की नक्काशी है जिनमें गरुड़ प्रमुख है. चार दिशाओं में दरवाज़े हैं परन्तु पूर्वी प्रवेश ही खुला है. बाकी तीन दिशाओं के दरवाज़ों पर एहतियातन पत्थर लगा दिए गए हैं. हज़ार बारह सौ साल पुराने मंदिर में जगह जगह दरारें पड़ी हुई हैं.

तेली का मंदिर कब बना इस के बारे में इतिहासकार सहमत नहीं हैं और सन 700 से लेकर सन 900 तक के अलग अलग समय बताते हैं. शायद इसीलिए बनाने वाले के बारे में भी पुख्ता जानकारी नहीं है. बनावट, डिजाईन और शैली के अनुसार गुर्जर-प्रतिहार काल में बना माना जाता है. कुछ का कहना है की गुर्जर-प्रतिहार राजा मिहिर भोज ( जिन्होंने सन 836 से 885 तक राज किया ) के राज काल में बनाया गया होगा. बहरहाल पहले कुतुबुद्दीन ऐबक और फिर इल्तुतमश के हमले में 1231 में मंदिर को काफी नुकसान पहुंचा. इसके बाद मंदिर का खंडहर झाड़ झंखाड़ से ढक गया. कुछ समय बाद जब किले पर मराठा शासन हुआ तो उस दौरान मंदिर में सुधार किया गया.

फिर किले पर अंग्रेजों ने हमला बोला और अधिकार जमा लिया. फिर मन्दिर छुप गया. किले में ब्रिटिश फ़ौज एक टुकड़ी तैनात कर दी गई. 1881- 82 में मेजर कीथ ने किले के अंदर की तीन इमारतों - मान मंदिर महल, तेली का मंदिर और सहस्त्र बाहू मंदिर का जीर्णोद्धार किया. इस काम पर 7625 रूपए शाही ब्रिटिश खजाने से खर्च हुए और 4000 रुपए महाराजा सिंदिया की और से खर्चे गए.

मंदिर के नामकरण के बारे में भी अलग अलग विचार हैं. मंदिर किसी तेली ने बनाया या फिर तेल के व्यापारियों ने मिलकर बनाया इस सवाल का कोई स्पष्ट उत्तर नहीं है. विकिपीडिया में इसे तेलकी मंदिर भी कहा गया है. हम हिन्दुस्तानी कहाँ अपनी धरोहर पर ध्यान देते हैं जो नाम पर ध्यान दें या खोज कर के सही बात का पता लगाएं. सब चलता है! तेली के मंदिर के पास ही सहस्त्रबाहू मंदिर भी है जिसे आम भाषा में सास बहु मंदिर नाम दे दिया गया है! इत्तेफाक से सहस्त्रबाहु मंदिर असल में दो मंदिर हैं एक बड़ा और दूसरा छोटा. बड़े को सास मंदिर और छोटे को बहू मंदिर पुकारा जाता है.

मंदिर सुबह से शाम तक खुला है. किले के टिकट पर ये मंदिर भी देखा जा सकता है. मंदिर में कोई गाइड हमें मिला नहीं. अगर आपने जाना हो तो दोपहर की धूप से बचें और पानी का इंतज़ाम रखें. अपनी गाड़ी से अगर किले में जा रहे हों तो उरवाई गेट की तरफ से जाएं. सड़क के कुछ हिस्से में खड़ी चढ़ाई है और सड़क संकरी इसलिए सावधानी रखनी होगी. इस मंदिर की ऊँचाई को देखते हुए और ऊँचाई पर की गई नकाशी की फोटो के लिए बेहतर कैमरे की जरूरत है.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो जो मोबाइल और आईपैड से ली गई हैं:


तेली का मंदिर 

मंदिर का प्रवेश द्वार जो कभी बाद में बना 

मंदिर बहुत ऊँचे चबूतरे पर बनाया गया है 

बचाव के लिए पत्थर के खम्बे और स्लैब लगाए हुए हैं 


मंदिर के बाएँ भाग का दृश्य 

मेजर कीथ का लगाया पत्थर 

अंदर की ओर से नज़र आता तोरण 

हरियाली में छुपा मंदिर 
















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