Saturday, May 20, 2023

हम्पी

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स्मार्ट कार से दक्षिण भारत की ओर

भारत के दक्षिण प्रदेशों का रहन-सहन, खान-पान, पहनावा, भाषा एवं विभिन्न विषयों पर दर्शन भी उत्तर भारत भिन्न हैं, इस विभिन्नता के बाद भी उत्तर-दक्षिण दोनो जुड़े हुए हैं, इन्हें हमारी संस्कृति जोड़ती है। अगर हम उत्तर की निगाह से देखें तो अत्यधिक भिन्नता पाएगें। उत्तर भारतीयों के लिए दक्षिण में भाषाई समस्या बड़ा रोड़ा बनती है। पूर्व में भी दक्षिण भारत की यात्राएं कर चुका हूँ। परन्तु यात्राएं रेल एवं वायू मार्ग से होने के कारण के क्षेत्र को समीप से देखने एवं समझने में कठिनाई होती रही। जब तक धरातल (सड़क मार्ग) पर न उतरा जाए तब तक किसी भी संस्कृति को समझना बहुत ही कठिन है। इसे समझने के लिए यायावर जैसे दृष्टि एवं संकल्प की आवश्यकता होती है। 
नेपाल की सीमा पर स्मार्ट कार
यायावरी के लिए समय भरपूर चाहिए, जिससे निकट से किसी भी चीज की परख की जा सके। वर्तमान की भागम-भाग भरी जिन्दगी में सभी घरेलू जिम्मेदारियों की कथरी उतार कर कुछ समय यायावरी के लिए चुराना बहुत ही दुष्कर है। खासकर एक गृहस्थी व्यक्ति के लिए। जिसके आगे नाथ, न पीछे पगहा हो, वह कुछ भी कर सकता है। यायावर मन कभी चैन नहीं लेने देता। हमेशा कदम चलने को तैयार रहते हैं, थोड़ी बहुत तकलीफ़ झेलकर भी यायावरी करने को तत्पर रहते हैं, बस जरा सी हवा चली और ये व्याकुल हो जाते हैं कि अब चलना चाहिए। बहुत दिन हो गए एक स्थान पर ही ठहरे हुए। अवसर मिलते ही मन यायावरी साधने निकल पड़ता है।
नेपाल की सीमा
अब की यायावरी में पुन: साथी बने बी एस पाबला जी। पिछली नेपाल यात्रा हमने कार से संग-संग ही की थी और यह यात्रा काफ़ी सफ़ल और सकुशल रही। पाबला जी के पास मारुति ईको कार है, जिसे उन्होंने विभिन्न गजट लगाकर "स्मार्ट कार" बना रखा है। इसकी खासियत यह है कि एक बार स्टेयरिंग पर बैठने के बाद किसी से रास्ता पूछने की आवश्यकता नहीं पड़ती। रास्ता बताने वाली बाई (जीपीएस) को निर्धारित स्थान बताने पर वह स्वयं ही रास्ता बताते हुए मंजिल तक पहुंचा देती है। चौक चाराहों, मोड़ों की जानकारी 100 मीटर पहले से ही मिलने के कारण गति बनी रहती है और चालक पूर्व से ही कार्यवाही के लिए सावधान हो जाता है। 
बी एस पाबला जी स्मार्ट कार के साथ
दूसरी खासियत यह है कि इसमें 4 कैमरे लगे हैं, जो बाहर के रास्ते और भीतर के लोगों की बातचीत एवं गतिविधियों की फ़िल्म भी बनाता है। जिससे सड़क की समस्त घटनाएं रिकार्ड होती जाती हैं और यात्रा करने वालों का आत्मविश्वास बना रहता है। अगर कोई चूक भी हो जाए तो वह भी रिकार्ड हो जाती है। जिससे उसे रिप्ले करके देखा जा सकता है। तीसरी खासियत है कि पाबला जी वाहन के सुचालक है। जिसके कारण मुझे कार चलाने का मौका ही नहीं मिल पाता और लम्बी से लम्बी यात्रा सकुशल सम्पन्न हो जाती है। चौथी खासियत है कि हमारी आपस में पटरी बैठ जाती है। खान-पान और भाषा के साथ समझदारी आड़े नहीं आती। दोनों एक सी भाषा बोलते हैं और समझते हैं साथ ही खान-पान भी एक सा ही है। जिसके कारण कभी असहजता महसूस नहीं होती।
स्मार्ट कार के स्मार्ट कैमरे
मैने देखा है कि कई महीने पहले से यात्रा बनाने पर मेरी यात्रा योजना हमेशा फ़ेल हो जाती है। समय समीप आने पर कोई न कोई अड़ंगा आ जाता है और जब भी तत्काल यात्रा बनाई गई, वह सफ़लता से सम्पन्न हो जाती है। फ़ेसबुक पाबला जी ने कार से बैंगलोर यात्रा की मंशा जताई थी, पर वे असमंजस में थे। मैने देखा और कहा चलो। बस इतने में ही बात बन गई, उनका फ़ोन आने पर मैने कहा कि जरा "मालकिन" से स्वीकृति ले लेता हूँ। उनसे भी स्वीकृति लेने में पाँच मिनट ही लगे और अगले दिन यात्रा की तैयारी के लिए था। मैने अपनी तैयारियाँ कर ली, कम से कम सामान और सुविधा की सारी वस्तुएं जुटा ली गई। पाबला जी ने भी गाड़ी की सर्विंसिंग करवा कर टायर इत्यादि बदलवा लिए। अब गाड़ी जाने के लिए टनाटन होकर तैयार थी। 
हम और हमार मालकिन
इस बार की यात्रा में हमारे दर्शनीय स्थल क्या होगें, इसके लिए हमने पूर्व से कोई तय नहीं किया था। रास्ते में जो दिख जाए, उसे देख लेगें। यही योजना बनी थी। हमें अभनपुर से नागपुर, हैदराबाद होते हुए बंगलोर तक जाना था। वहां दो तीन दिन रुक कर वापस लौटना था। इस बीच रास्ते में पुरातात्विक महत्व के स्मारकों की जानकारी लेकर भी उन्हें देखना था। दक्षिण भारत के समुद्री किनारों की यात्रा तो हो गई थी, परन्तु यह बीच वाला भाग हमेशा छूट जाता था। इस यात्रा में वह भी पूर्ण होने वाला था। सड़क यात्रा का रोमांच भी अलग ही होता है, हर पर जान हथेली पे लेकर चलने वाला काम है। कई तरह की शंका कुशंकाएं मन में आती है, यात्रा के रोमांच से मन दृढ़ हो जाता है, कि बस अब चलना चाहिए। 

वो सत्रह घंटे : दक्षिण यात्रा-2

आरम्भ से पढ़ें 
त श्री अकाल का संदेश सुबह 4 बजे मेरे चलभाष पर आ गया। मतलब पाबला जी भिलाई से अभनपुर की ओर प्रस्थान कर चुके थे। भिलाई से अभनपुर 60 किमी की दूरी पर है। मैने भी उनके पहुंचते तक तैयारी कर ली। मालकिन ने भी रास्ते के लिए खाना बना दिया। सुबह सवा पाँच बजे हमने अभनपुर से बंगलोर के लिए माता जी का आशीर्वाद लेकर यात्रा का श्री गणेश कर दिया। अभी अंधेरा ही था, रायपुर और भिलाई के बीच उजाला होने लगा, दिन निकलने वाला था। भिलाई से निकलते हुए पाबला जी मन एक बार फ़िर घर की तरफ़ जाने का हुआ, फ़िर उन्होने इरादा बदल कर गाड़ी हाईवे पर डाल दी। ठीक दो घंटे के बाद हमने सुबह सवा सात बजे राजनांदगाँव के बाद तुमड़ी बोड़ के गुरुनानक ढाबे में चाय पी। तुमड़ी बोड़ से डोंगरगढ़ के लिए रास्ता जाता है। 
सफ़र का प्रारंभ अभनपुर
मुकेश के पुराने गानों एवं जीपीएस वाली बाई के निर्देशों के तहत सपाटे से गाड़ी आगे बढ़ती गई। रायपुर नागपुर हाईवे फ़ोर लाईन होने के बाद से मैने कार द्वारा इस सड़क पर सफ़र नहीं किया था, तो अंदाजा था कि 12 से एक बजे के बीच नागपुर पहुंच जाएगें। पर हाईवे पर सपाटे के साथ गाड़ी एक सौ बीस की स्पीड से चल रही थी रास्ता जल्दी तय हो रहा था। हम सवा आठ बजे महाराष्ट्र की सीमा में प्रवेश कर गए। हमें नागपुर से संध्या जी के यहाँ का बना खाना लेना था। इसलिए उन्हें समय 12 से एक बजे के बीच का बताया गया था। हमारी गाड़ी लगभग साढ़े नौ बजे भंडारा के पास पहुंच चुकी थी। इससे लगा कि साढे दस बजे तक किसी भी हालत में नागपुर पहुंच जाएगें। 
तुमड़ी बोड़ ढाबा छत्तीसगढ़
हमने वहीं नाश्ता करने का निर्णय लिया। होटल वाले से दही होने की जानकारी ली, मिलने पर मटर के पराठे निकाल कर वहीं पर बैठ कर खाए। इस प्रक्रिया में आधा घंटा लग गया। इसके बाद नागपुर बायपास से हम शहर के बाहर ही बाहर निकल लिए। यह बायपास बुटीबोरी वाले रोड़ में जामठा के पास मिल जाता है। यहीं पर हमें खाना मिल गया। यहां से हम बारह बजे आगे बढे। हिंगणघाट होते हुए हमें आज रात हैदराबाद पहुंचना था। एक बजे के बाद भूख लगने लगी। हम भोजन करने के लिए हाईवे के किनारे नीम, बरगद, पीपल, महुआ आदि किसी छायादार वृक्ष की तलाश करने लगे। परन्तु एक घंटे तक तलाश करने पर भी हमें कहीं पर मनवांछित वृक्ष नहीं मिला। हर तरफ़ कीकर की ही झाड़ियाँ नजर आ रही थी। जिसके नीचे बैठने की सोच कर बचपन में लगाई डॉक्टर की सारी सुईयाँ याद कर तशरीफ़ सिहर जाती है।
सपाटे की सड़क
आखिर दो बजे एक ढाबे के पास नीम का एक वृक्ष दिखाई दिया, जिसके नीचे छाया में एक गाड़ी वाला सोया हुआ था। हमें यही स्थान उपयुक्त लगा भोजन के लिए। गाड़ी वृक्ष के नीचे लगा कर, छाया में चादर बिछाकर हमने आराम से भोजन किया। जब मनचाहा हो जाए तो उससे अच्छी तृप्ति और कोई नहीं हो सकती। भोजन के बाद हमने तीन बजे फ़िर सफ़र शुरु किया। यहाँ से हैदराबाद लगभग 400 किमी था। बीच में लगभग 50 किमी की सड़क का निर्माण अधूरा होने के कारण गति धीमी हो गई। इसके बाद आगे चलकर पांडुरकवड़ा होते हुए आदिलाबाद के बायपास से गुजरे। देखा जाए तो विदर्भ के इस इलाके में वर्षा आधारित फ़सल ही हो सकती है। सिंचाई के कोई साधन दिखाई नहीं दे रहे थे और न ही हरियाली। चारों तरफ़ झाड़ झंखाड़ एवं सूखा दिखाई दे रहा था।
दोपहर का भोजन कुड़ूए नीम की छांव में
हम एशियन हाईवे 43 पर चल रहे थे। एशियन हाईवे बनने के बाद यह पता चलना कठिन हो गया है कि हम किस गाँव से गुजर रहे हैं। क्योंकि इसकी गति इतनी अधिक है कि गांवों की तरफ़ ध्यान ही नहीं जाता। कामारेड्डी पहुंचने पर दिन ढल गया। चौड़ी सड़क गाड़ी सपाटे से चलती है और एक टोल से दूसरे टोल के बीच का सफ़र तेजी से कट जाता है। 45 रुपए के टोल से शुरु हुई यात्रा 103 रुपए तक पहुंच गई। ये टोल रोड़ भी नोट को कागज बनाने की मशीन हो गए हैं, आप उन्हें नोट दो और ये आपको उसके बदले में एक छोटी सी पर्ची थमा देते हैं। हमने टोल रोड़ की सारी पर्चियाँ जमा करना शुरु कर दिया था। टोल देते ही पर्ची गाड़ी के टूल बाक्स में पहुंच जाती थी। यह पर्चियों का गुल्लक बन गया था।
अब जबेलियाँ दिखने लगी।
पाबला जी ने हैदराबाद बंगलोर रोड़ पर शहर से बाहर होटल बुक करवा रखा था। आज हमने लगभग 872 किमी और 17 घंटे लगातार कार ड्राईव की। हम रात को 10 बजे होटल में पहुंच गए।  होटल पहुंच कर खाना खाया। इस यात्रा के दौरान सभी होटलों में नेपाली या असमी स्टाफ़ ही दिखाई दिया। नेपाल में भूकंप से हुए नुकसान के बाद बड़ी संख्या में नेपाली बाहर काम करने निकल गए। भाषा की समस्या होने के बाद भी ये नौकरी कर कुछ धन अर्जित करने के लिए जद्दो जहद कर रहे हैं। रात को सुबह जल्दी बंगलोर निकलने के लिए प्लान बनने लगा। पर गोलकुंडा का किला देखने का मुड बन गया तो तय किया गया कि किला नौ बजे खुलता है इसलिए होटल से आठ बजे चला जाए और रास्ते में ही नाश्ता किया जाए। किला देखकर बंगलोर के लिए प्रस्थान किया जाए।

प्राचीन विरासत गोलकुंडा का किला : दक्षिण यात्रा-3

सुबह हमने होटल छोड़ दिया और रात्रि कालीन सभा में गोलकुंडा भ्रमण के प्रस्ताव के अनुमोदन के पश्चात हमें गोलकुंडा किले के दर्शनार्थ जाना था। सुबह के साढे सात बज रहे थे। हैदराबाद में ट्रैफ़िक सुबह ही शुरु हो जाता है। हमारे होटल से गोलकुंडा तक हमें लगभग 20 किमी शहर के भीतर होकर पहुंचना था। रास्ते में एक स्थान पर नाश्ते का जुगाड़ दिख गया। एक व्यक्ति मोपेड पर बर्तन रखकर इडली उत्तपम बेच रहा था। बस इसी से लेकर हमने नाश्ता किया। गर्मागर्म इडली और उत्तपम खा कर लगा कि दिन बन गया। अब आगे का सफ़र आराम से हो सकता है। कुछ देर के सफ़र के बाद हम पुरानी बसाहट से होते हुए गोलकुंडा के किले के मुहाने तक पहुंच गए।
स्ट्रीट फ़ूड का आनंद, सुबह का नाशता
किले में सुबह की चहल-पहल प्रारंभ हो चुकी थी। टिकिट खिड़की भी खुल चुकी थी। किले के पास ही पार्किंग में गाड़ी खड़ी कर हमने टिकिट खिड़की से 10-10 रुपए की टिकेटें खरीदी। टिकिट घर के सामने उद्यान बना हुआ है, कारपेट घास की तराई करते हुए लोग मिले। मैने सोचा कि गाईड ले लिया जाए। एक से चर्चा करने पर उसने 600 रुपए पारिश्रमिक बताया और उससे एक पैसा कम करने को तैयार नहीं था। इसके बदले मैने वहीं बिक रही गोलकुंडा दर्शन का हिन्दी ट्रैक्ट 20 रुपए में खरीद लिया। यह भी गाईड का ही काम करेगा। शुद्ध 580 रुपए की बचत हो गई। बाकी तो देखने दिखाने के लिए अपनी आँखे ही काफ़ी हैं। 30 वर्षों की घुमक्कड़ी के अनुभव से इतना तो समझ आ जाता है कि कहाँ क्या होगा?
गोलकुंडा का प्रवेश द्वार
गोलकुंडा का जिक्र हो तो सबसे पहले कोहिनूर हीरा ही याद आता है, जो आज ब्रिटेन की महारानी के ताज में जड़ा हुआ है और जिस पर भारत के अलावा पाकिस्तान भी अपना दावा ठोक रहा है। इस विश्वविख्यात हीरे का वास्तविक घर गोलकुंडा है, यह हीरा गोलकुंडा की खदान से ही निकला था। इसका प्राचीन नाम सामंती मणि था, जिसे भगवान सूर्य ने अपने पुत्र कर्ण को उपहार स्वरूप दिया था। गोलकुंडा में एक गरीब मजदूर को यह हीरा खुदाई के समय मिला था। मीरजुमला ने बतौर नजराना इसे शाहजहाँ को पेश किया।  जिन्होंने इसे तख्त–ए–ताउस में जड़वा दिया। इसके बाद यह हीरा महाराजा रणजीत सिंह से होते हुए ब्रिटेन के ताज तक पहुंच गया।
बाला हिसार द्वार की ओर जाता मार्ग
किले के मुहाने पर कड़प्पा पत्थर की स्लेट पर गोलकुंडा का नक्शा बना हुआ है, जिसे एकबारगी देख कर किले राह रस्ते समझ आ जाते हैं। टिकिट घर से मुख्य द्वार बाला हिसार दिखाई नहीं देता। उसके सामने दीवार एक पर्दा बनी हुई है। दांई तरफ़ एक पांच फ़ुट की गली से किले के मुख्यद्वार तक पहुंचा जाता है, इस द्वार को बाला हिसार द्वार कहा जाता है। पाषाण की चौखट पर लकड़ी के किवाड़ चढे हुए हैं। सिरदल पर दोनो ओर सिंह एवं मध्य में पद्मांकन है। द्वार की बनावट देख कर ही लगता है कि यह किसी हिन्दू राजा द्वारा बनाया गया है। सिरदल के उपर दोनो ओर सुंदर मयूराकृतियाँ बनी हुई हैं तथा द्वार बंद होने पर सुरक्षा की दृष्टि से झांकने के लिए एक झरोखा भी बना हुआ है। द्वार को मजबूती प्रदान करने के लिए उस पर लोहे का पतरा मढा होने के साथ हाथियों की टक्कर से बचाने के लिए मोटे कीले भी लगे हुए हैं।

बाला हिसार द्वार, हिन्दू शैली पर इस्लामिक शैली का निर्माण
द्वार से भीतर प्रवेश करते ही उजड़ा हुआ नगर दिखाई देने लगता है। चारों तरफ़ ईमारतें ही ईमारते दिखाई देती हैं। गोलकुंडा का किला 400 फ़ुट ऊंची (कणाश्म-कड़प्पा) ग्रेनाईट की पहाड़ी पर बना हुआ है। इसके तीन परकोटे हैं और यह 7 मील में फ़ैला हुआ है, इसके चारों तरफ़ 87 बुर्ज बने हुए हैं। बुर्ज युद्ध के समय तोप रखकर चलाने के काम आते थे। साथ ही वाच टावर भी बने हुए हैं। वैसे भी किले पहाड़ी के शीर्ष में बनाए जाते थे, इसके कारण दूर तक दिखाई देता है। यह भग्न नगर हैदराबाद शहर से पाँच मील की दूरी पर है। इस किले की सुरक्षा के लिये उसके चारो तरफ पांच मील पत्थर की चारदिवारी है। चारदीवारी के बाहर खाई है, इसमें 9 दरवाजे, 43 खिड़कियां तथा 58 भूमिगत रास्ते हैं।
किले के शीर्ष से विहंगम दृश्य
बाला हिसार किले का मुख्याकर्षण यहाँ की दूरसंचार व्यवस्था है। वास्तुकार ने इसे विशेषता से निर्मित किया है और ध्वनि विज्ञान का विशेष ध्यान रखा है। द्वार के समीप षटकोणिय आकृति की परिधि में ही करतल ध्वनि करने पर उसकी आवाज किले के शीर्ष तक पहुंचती है। इस स्थान पर गाईड पर्यटकों को ताली बजवा कर इसका चमत्कार दिखाते हैं। यह व्यवस्था किले की सुरक्षा को ध्यान में रख कर की गई है। ध्वनि की विविधता के आधार पर उपर रहने वालों को पता चल जाता था कि द्वार पर मित्र है, शत्रु है या फ़िर फ़रियादी है । यह ध्वनि मुखबीरों के भी काम आती थी, थोड़ी सी भी आवाज तरंगों में बदल कर दूर तक सुनाई देती थी। वर्तमान जिसे ईको सिस्टम कहा जाता है।
तोप एवं दूर संचार का केन्द्र
मैं और पाबला जी किले में बने हुए पथ पर आगे बढ़े जा रहे थे। सुबह का सूर्य यौवन की प्राप्ति की ओर बढ रहा था और धूप चमकने लगी थी। कुछ विदेशी यात्री भी किले को परख रहे थे, जिनमें दो युवतियाँ बिंदास अपने कैमरे लेकर बिना किसी गाईड के ही घूम रही थी। मुख्य द्वार पर आगे बढ़ने पर तारामती महल दिखाई देता है। समय की मार के बावजूद भी यह बचा हुआ है खंडहर होने से। किंवदंती है कि तारामती, जो क़ुतुबशाही सुल्तानों की प्रेयसी तथा प्रसिद्ध नर्तकी थी, क़िले तथा छतरी के बीच बंधी हुई एक रस्सी पर चाँदनी में नृत्य करती थी। सड़क के दूसरी ओर प्रेमावती की छतरी है। यह भी क़ुतुबशाही नरेशों की प्रेमपात्री थी।

रानी तारामती का महल
इस स्थान से सीढियों द्वारा उपर जाने पर एक द्वार और बना हुआ है, इसके बाद मैदान है, जहाँ से पहाड़ी के शीर्ष तक जाने के लिए दांए-बांए दो रास्ते हैं। पाबला जी नीचे ही रह गए और मैं बारहदरी तक उपर चढ गया। धूप बहुत तेज थी और अब उपर चढने में स्वास्थ्यगत समस्याएं सामने आती हैं। भले ही 30-30 पैड़ी चढ़ा, पर उपर पहुंच गया। गला सूखने लगा था। एक घूंट जल कि चाहिए थी। बारहदरी के समीप ही एक कैंटीन है, जहाँ से पानी लेकर पीया और फ़िर बारहदरी का निरीक्षण किया। यह ऊंचे अधिष्ठान पर निर्मित है।
प्रतिक्षारत पाबला जी
यहाँ पहुंचने के लिए दोनो तरफ़ पैड़ियाँ बनी हुई हैं। यहां से उपर आने पर एक बड़ा हॉल है, जिसके दोनो तरफ़ कमरे बने हुए हैं, यहाँ से दो जीने और बने हैं उपर जाने के लिए। यह जीने दो पार्ट में हैं। इसके बगल से एक जीना सीधे ही उपर दरबार तक पहुंचाता है। इस किले का शीर्ष यही दरबार है। नीचे के मंडप को दीवाने आम कहा  जाता है, जहाँ दरबारी बैठकर राजकाज में सम्मिलित होते थे और उपरी मंडप दीवाने खास है, जहाँ बैठ कर सुल्तान खास मंत्रणा करते थे और विशिष्ट जनों से मिलते थे। नीचे बाला हिसार द्वार से की गई हल्की सी आवाज की गूंज यहाँ तक सुनाई देती है। यही वास्तु का चमत्कार है।

बारहदरी का दीवान-ए-आम
बारहदरी भवन का नक्शा इस तरह बनाया गया है ताकि यह पहाड़ी के शिखर का विस्तार लगे। शिखर पर होने की वजह से यह दूर से ही नज़र आता है और भव्य दिखता है। दो तल की इस ईमारत में एक खुली छत है, जिसमें एक दर्शक दीर्घा है। जहाँ महत्वपूर्ण अवसरों पर शामियाने लगाये जाते थे। बारहदरी भवन के रास्ते में एक गहरा कुआँ है जो वर्तमान में सूखा है, किंतु उस समय सेना को पानी की आपूर्ति इसी कुएँ से की जाती थी। थोड़ी ही दूरी पर जीर्ण–शीर्ण अवस्था में एक भवन है, जिसके कोने में एक गोलाकार सुरंगनुमा रास्ता है। इसकी गहराई लगभग आठ किलोमीटर है। कुतुबशाही शासक आपातकाल में इसका उपयोग करते थे।
दीवान-ए-आम की छत पर मुख्य दरबार दीवान-ए-खास
किले के निर्माण के समय सबसे महत्वपूर्ण जलापूर्ति के साधन होते हैं। इतिहास गवाह है कि कई बार किलों की जलापूर्ति एवं रसद रोक कर भी राज्यों को हस्तगत किया गया है। किले के दक्षिण में मूसी नदी प्रवाहित होती है और इसी से किले में जलापूर्ति की व्यवस्था की गई थी।  यहाँ मोरियों के रुप में जलापूर्ति के चिन्ह दिखाई देने लगते हैं, इस ईमारत में एक फ़व्वारा भी बना हुआ है। किले में सुनियोजित ढंग से जलापूर्ति की व्यवस्था की गई है। प्रत्येक तलों में जलसंचय की व्यवस्था थी। जो टेरीकोटा पाइपों द्वारा विभिन्न तलों के महलों, बगीचों और झरनों में पहुँचाई जाती थी। पाइपों के भग्नावशेष अब भी दीवारों पर देखे जा सकते हैं।

रानी तारामती का कुतुबशाही प्रेम: दक्षिण यात्रा-4

बारहदरी से थोड़ी दूर पर देवी का प्राचीन मंदिर है, इसके द्वार पर महाकाली मंदिर लिखा हुआ है। इसका नाम मदन्ना मंदिर है। अब्दुलहसन तानाशाह के एक मंत्री के नाम पर इसका नामकरण किया गया है। यहां महाकाली ग्रेनाईट की बड़ी चट्टानों के बीच विराजित हैं, जिन्हें अब पत्थरों की दीवार से घेर कर मंडप बनाकर उसमें लोहे का द्वार लगा दिया गया है। इस प्राचीन दुर्ग को वारंगल के हिन्दू राजाओं ने बनवाया था, देवगिरी के यादव तथा वारंगल के काकातीय नरेशों के अधिकार में रहा था। इन राज्यवंशों के शासन के चिन्ह तथा कई खंडित अभिलेख दुर्ग की दीवारों तथा द्वारों पर अंकित मिलते हैं। अवश्य ही देवी का यह मंदिर हिन्दू राजाओं ने स्थापित किया होगा। जिसे कालांतर में मुस्लिम शासकों ने किसी अज्ञात भयवश नहीं ढहाया होगा।
किले के शीर्ष पर मस्जिद के पीछे स्थित मद्नन्ना का महाकाली मंदिर 
आगे चलकर जब हम मस्जिद के पीछे से नीचे उतरते हैं तो यहाँ रामदास का कोठा है। इसे अम्बर खाना कहा जाता है। इसका निर्माण 1642 में अब्दुल्ला कुतुबशाह ने करवाया था। नजदीक ही किले की अंदरूनी दीवार है जो पूर्णतः अजेय है। इस दीवार का निर्माण बेहद बुद्धिमत्ता से पत्थरों से किया गया है एवं पत्थरों की दरारों को गच्चों से भरा गया है। यह एक मजबूत आयताकार भवन है, इसके अंदर जाने का एक कृत्रिम द्वार है। वास्तव में इसका निर्माण भंडारगृह के लिए किया गया था किंतु अबुल हसन कुतुबशाह (1672–1687) के दौरान इसे कारागार में बदल दिया गया। भद्राचल रामदास शाही खजाने के खजांची थे। कहा जाता है कि जब शाही खजाने के दुरूपयोग का आरोप लगा था तब उन्हें इसी कैदखने में बंद किया गया था। किलवट यानी शाही निजी कक्ष। यह छोटा किंतु किले के वास्तुशिल्प का सबसे खूबसूरत हिस्सा है।
महाकाली मंदिर के समक्ष मस्जिद
इतिहास की ओर चलते हैं तो ज्ञात होता है कि किले के साथ कई ऐतिहासिक कथाएं जुड़ी हैं। राजा प्रताप रूद्रदेव काकतीय राजवंश के राजा थे। उनके राज्यकाल के समय, सन् 1143 ई. में  एक गड़ेरिए ने इस पहाड़ी पर किला बनाने सुझाव दिया। उसके सुझाव पर, यह किला पहाड़ी पर बनाया गया।  गोल्ला का अर्थ गड़रिया और  पहाडी को कोण्डा कहते है। इसीलिये इसका नाम 'गोल्लकोण्डा' रखा गया। सन् 1663 में इसी वंश के राजा कृष्णदेवराय ने एक संधि के अनुसार 'गोलकोण्डा' किले को बहमनी वंश के राजा मोहम्मद शाह को दे दिया। बहमनी राजाओं की राजधानी गुलबर्गा तथा बीदर में थी। राज्य में, उनकी पकड़ भी अच्छी न थी।
अंबरखाना
उनके पांच सुबेदार बहमनी राज्य की अस्थिरता के कारण मौके का लाभ उठा कर स्वतंत्र हो गये। इसके एक सूबेदार कुली कुतुबशाह नें 1518 में गोलकोण्डा में मे अपनी सल्तनत कुतुबशाही  स्थापित की। 1518 से 1617 तक कुतुबशाही वंश के सात राजाओं ने गोलकोण्डा पर राज किया। पहले तीन राजाओं ने गोलकोंडा किला का पुन: निर्माण राजमहल और  पक्की इमारतें बनावायी। 1587 में चौथे राजा मोहम्मद कुली कुतुबशाह ने अपनी प्रिय पत्नी भागमती के नाम से भाग्यनगर नामक शहर बसाया। इसे अब हैदाराबाद कहा जाता है। 1687 तक हैदराबाद इन राजाओं की राजधानी थी। 1656 में औरंगजेब ने गोलकोण्डा और हैदराबाद पर हमला किया। सुलतान अब्दुल्ला शाह की हार हुई सुलतान अब्दुल्ला की ओर से गुजारिश करने पर दोनों में संधि हुई। जिसकी एक शर्त पूरी करने के लिए सुल्तान की बेटी की शादी औरंगजेब के बेटे मोहम्मद सुल्तान से की गयी।
किले का वाईड एंगल व्यू
कुतुबशाही का अब्दुल हसन तानाशाह 1687 में सातवां राजा था। उस समय औरंगजेब ने दूसरी बार गोलकोण्डा पर हमला किया। आठ महिनों तक औरंगजेब गोलकोंडा जीतने में सफलता नहीं मिली। लेकिन कुतुबशाही सेना का नायक अब्दुल्ला खान पन्नी बागी हो गया। उसने रात के समय किले का दरवाजा खोल दिया। अब्दुल हसन तानाशाह बंदी बनाया गया। चौदह साल बाद जेल में उसका देहांत हुआ। इस प्रकार कुतुबशाही का अंत हुआ और गोलकोण्डा पर मुगलों का शासन आरंभ हुआ। कुतुबशाही समाप्त होने के उपरांत मुगल साम्राज्य की ओर से कई सूबेदार हैदराबाद में रखे गये। लेकिन 1737 ईस्वी में मोहम्मद शाह के समय मुगलों की राजनीतिक स्थिति कमजोर हो गई। इसका फायदा उठाते हुए  निज़ाम-उल-मुल्क आसिफ जाह-1 स्वतंत्र बन गया और स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया। इस वंश के सात राजाओं में, आखरी राजा ने नवाब मीस उस्मान अली खान ने 1947 तक हैदराबाद पर राज्य किया।
किले का दीवान-ए-आम और उसकी ओर जाती पैड़ियाँ
समय-समय शासकों ने इसमें अपनी सुविधानुसार निर्माण किया, तब कहीं जाकर आज यह किला विशाल स्वरुप लिए खड़ा है।यहाँ के महलों तथा मस्जिदों के खंडहर अपने प्राचीन गौरव गरिमा की कहानी सुनाते हैं। दुर्ग से लगभग आधा मील उत्तर कुतबशाही राजाओं के ग्रेनाइट पत्थर के मकबरे हैं जो टूटी फूटी अवस्था में अब भी विद्यमान हैं। फतेह मैदान से पोटला बुर्ज जाने के रास्ते में एक कटोरा घर है। चूने और पत्थरों से निर्मित यह घर अब खाली पड़ा है। किंतु कुतुबशाही के स्वर्णिम काल में यह इत्र से भरा रहता था जो अंतःपुर की महिलाओं के लिए होता था। असलाहखाना यानी शस्त्रागार, एक आडम्बरहीन, किंतु किले की एक प्रभावशाली इमारत है। यह तीन तलों में बना है। तारामती मस्जिद कुतुबशाही शासनकाल के वास्तुशिल्प का बेहतरीन नमूना है। यह हिंदू और मुगल शैली का मिला–जुला नमूना है। इसके अतिरिक्त दो मीटर चौड़ाई का एक स्थान है, जहाँ बारह छोटे–छोटे मेहराब बने हैं।
रानी तारामती महल एवं मस्जिद
गोलकुंडा किला के अवशेषों में कुतुबशाही साम्राज्य के कई शासकों के शासनकाल के दौरान बने विभिन्न महल तत्कालीन वास्तुकला के सबसे खूबसूरत नमूनों में से हैं। इनमें से कुछ महल पाँच से छह तलों तक के हैं। इनमें जनाना कोठरी, आमोद–प्रमोद के बगीचे, झरने आदि प्रमुख हैं। ऐसे सभी निर्माणों में चमकीले संगमरमर पत्थरों की कारीगरी, फूलों और पत्तियों की नक्काशी और चमकीले बेसाल्ट पत्थरों के परत का इस्तेमाल किया गया है। यह सारी कारीगरियाँ कुतुबशाही शैली की विशेषता हैं। अनेक खूबसूरत धार्मिक इमारतें भी कुतुबशाही शासनकाल में बनी थीं, जो वास्तुशिल्प के दिलचस्प पहलुओं को अंकित करती हैं। इनमें बहमनी बुर्ज के निकट बनी एक विशाल मसजिद है। इसमें एक खुला प्रांगण और एक प्रार्थना–कक्ष हैं।

किले में जाने के लिए बनाई गई पैड़ियों के निर्माण में मेहराब का प्रयोग
इसका क्षेत्रफल उत्तर से पश्चिम की ओर 42 मीटर एवं पूर्व से पश्चिम की तरफ 45 मीटर है। आंगन के बीचों बीच तीन कब्रे हैं। कब्रों के गुंबज पर उकेरी गयी इबारतों के अनुसार यह इब्राहिम कुतुबशाह के मंत्री मुस्तफाखान के बेटों की है। आयताकार प्रार्थना कक्ष में एक मेहराबनुमा छत है। खूबसूरती से तराशे गये इस मुहराबनुमा छत में पवित्र कुरान की आयतें बेमिसाल सुलेख में खुदी हुई हैं। प्रार्थना–कक्ष की दीवारें गचकारी कला को दर्शाती हैं। इस प्रार्थना कक्ष के उत्तरी और दक्षिणी दीवारों 7X4 मीटर के दो छोटे–छोटे कक्ष भी हैं। यह सीधे आँगन में खुलती है। सीढ़ियाँ दोनों कमरों से मसजिद के छत तक जाती है। इसके दक्षिणी दीवार के बीचोंबीच एक अंदर जाने का रास्ता है जिसमें एक दीवार पर एक पर्शियन शिलालेख है।
पर्सियन शिलालेख :)
किले का भ्रमण कर मैं नीचे उतर रहा था और आँखे पाबला जी को ढूंढ रही थी। मैं उन्हें द्वार के समीप छोड़ कर गया था पर वे दिखाई नहीं दे रहे थे। कुछ जोड़े एकांत सेवन करते हुए दिखाई दे रहे थे। इस तरह के प्राचीन स्मारक नवयुगलों के प्रेमालाप के आदर्श स्थान बन गए हैं। भारत में किसी भी प्राचीन स्मारक में चले जाईए, ये दिखाई देते हैं क्योंकि दस रुपए की टिकिट में इससे सुरक्षित स्थान कहीं दूसरी जगह नहीं मिल सकता। तभी पाबला जी नीचे जाते हुए दिखाई दिए। यहाँ एक सैलानियों की टोली गाईड के साथ जमी हुई थी। नीचे पहुंचने पर गला सूखकर चिपका जा रहा था। सबसे पहले एक छोटी कोल्ड्रिंक से प्यास बुझाई।
कुतुबशाही शव स्नानागार
बालाहिसार द्वार के समीप ही एक छोटी तोप रखी है। इन छोटी छोटी तोपों ने अपने कार्यकाल में युद्ध में बहुत कहर ढ़ाया है। कई युद्धों में इनका इस्तेमाल हुआ है। आज समय निकल जाने पर इनकी उपयोगिता खत्म हो गई और कभी लोग इन्हें माथे पर धरते थे, आज ये उपक्षित पड़ी हुई हैं। मुख्यद्वार के थोड़ी ही दूरी पर एक ईमारत है, जिसे शवस्नान गृह बताया गया है। कुएं के आकार के इस खंड का निर्माण पारसी या तुर्की शैली में किया गया है। इसका उपयोग शाही परिवार के शवों को नहलाने के लिए किया जाता था। शवों के नहलाने के लिए इस स्थान पर चबूतरा भी बना हुआ है, जिस पर रखकर शवों को सुपुर्देखाक से पहले स्नान कराया जाता था।
संग्रह में रखा हुआ बड़ा ताला
लौटते समय द्वार के बांई ओर लकड़ी की कांच लगी पेटियों में किले से प्राप्त वस्तुएं रखी हुई हैं, जिसमें चीनी के बर्तनों के साथ,  सील, मुहरें, कुछ सिक्के, कुछ कागज की कतरनों के साथ एक बड़ा ताला भी रखा हुआ है, जिसकी लम्बाई डेढ फ़ुट होगी। इस्का इस्तेमाल किसी बड़ दरवाजे पर किया जाता होगा। यहाँ ताले का कुंड़े वाला भाग ही रखा है। हम द्वार से बाहर निकल आए और गोलकुंडा के किले का भ्रमण एक छोटी सी अवधि में सम्पन्न हुआ क्योंकि हमारे पास अधिक समय नहीं था वरना इसे देखने में ही तीन दिन लग सकते हैं। यहाँ से हमने जीपीएस वाली बाई को इलेक्ट्रानिक सिटी बंगलोर का पता दिया और हमारी स्मार्ट कार अगले पड़ाव की ओर चल पड़ी।

मुकेश के गानों के साथ तैरती सड़क : दक्षिण यात्रा -5

गोलकुंडा दर्शन करते हुए ग्यारह बज चुके थे, शहर से बाहर आते  हुए साढे ग्यारह बज गए। अब हमारी स्मार्ट कार बंगलोर के लिए हाईवे पर दौड़ रही थी। हमारी मंजिल यहाँ से 587 किमी थी और जीपीएस वाली बाई बता रही थी कि जिस गति से हम चल रहे हैं, लगातार उसी गति से चलते रहे तो  साढे आठ घंटे चलेगें तो मंजिल तक पहुंच जाएगें। हैदराबाद से बंगलोर तक टोल रोड़ है, इसलिए इस मार्ग पर गाड़ियां भी तेज गति से चलती हैं। तेज गति से चलने पर लोकल बाईक वाले सवार बाधा बनते हैं। डिवाईडर के ऊपर से कब कौन कूदकर आपकी गाड़ी के सामने आ जाए इसका पता नहीं चलता। मुझे सारे रास्ते भर इसी का भय लगा रहा। जब भी कोई रोड़ कट दिखाई देता मैं पहले से ही पाबला जी को गति धीमी करने के लिए आगाह करता। रोड़कट पार होने पर फ़िर ये वही गति पकड़ लेते, मेरा सारा सफ़र गति नियंत्रण में ही निकल गया।
चौराहों पर स्थापित होने के लिए तैयार पुतले
हमारा देश पुतलों का देश है, पुतले ही शासन करते हैं, पुतले ही प्रतिष्ठा दिलाते हैं, पुतले ही दंगा कराते हैं, अगर कहा जाए तो सारी व्यवस्था पुतलों के अधीन हो गई है। हर गली चौराहे पर कोई न कोई पुतले खड़े दिखाई दे जाते हैं। रास्ते में चलते हुए एक स्थान पर बहुत सारे कांक्रीट के पुतले खड़े हुए दिखाई दिए। इतने सारे पुतले मैने एक साथ कभी नहीं देखे थे, जिज्ञासावश गाड़ी रोकी गई, फ़ोटो लेने की इच्छा भी पूरी करनी थी। इन पुतलों में बाबा साहेब के पुतले अधिक थे। पुतले भी आठ फ़ुट से दस फ़ुट ऊंचाई तक के थे। मैने पुतले बनाने वाले से चर्चा की। उसने बताया की बाबा साहेब के पुतलों की सबसे अधिक बिक्री होती है, उसके बाद नम्बर आता है, महात्मा फ़ूले का। इंदिरागांधी, नेहरु, गांधी जी, राजीव गांधी एवं अन्य नेताओं के भी पुतले बना कर रखने पड़ते हैं, अगर मांग आ जाए तो तुरंत सप्लाई की जा सके। एक पुतले की कीमत पचास हजार से एक लाख तक बताई। 

हाईवे
हम फ़ोटो लेने में मगन थे और हाईवे पुलिस आकर पाबला जी को तीन बार टोक चुकी थी, हाईवे पर गाड़ी नहीं खड़ी की जा सकती है। गाड़ी खड़ी करके आराम करने के लिए भी निर्धारित स्थान हैं, जहाँ आप घंटो गाड़ी खड़ी कर आराम कर सकते हैं। गाड़ी के हार्न की आवाज सुनकर दो चार फ़ोटो और लेकर मैं गाड़ी में पहुंच गया। गाड़ी चलने पर पाबला जी ने सारा किस्सा बताया। अब एक घंटा दबा के गाड़ी चलाई जाए तो सौ किमी का सफ़र तय हो जाएगा। चलते वक्त मेरी निंगाहें सड़क पर चौकस रहती थी, अब एक सौ बीस-तीस की गति में तो चौकस रहना ही पड़ता है। तब भी कहीं न कहीं स्पीड ब्रेकर पर चूक हो ही जाती और गाड़ी उछल जाती। खैर जैसे भी चल रहे थे, मतलब चल रहे थे। इस दौरान वार्तालाप भी कम ही होता था। मुकेश के गानों के सहारे दोनों की मौज हो रही थी।
होटल का नाम नहीं पता, खुद ही पढ़ लो
थोड़ी देर बाद भूख लगने लगी और हम कोई अच्छा ढाबा या होटल देखने लगे भोजन के लिए। कई स्थान तो ऐसे मिलते थे जहाँ कतार से ढाबे और होटल दिखाई देते थे, कभी सैकड़ों किमी चलने पर एक दो ढाबे दिखते थे। आज आंध्रा का परम्परागत भोजन करने का मन था। एक होटल में तेलगु में लिखा हुआ दिखा और साईन बोर्ड पर थाली की फ़ोटो छपी थी। समझ आ गया कि यहाँ खाना मिल जाएगा। गाड़ी रोकने पर होटल वाले ने बताया कि खाना मिल जाएगा। खाने में चपाती, चावल, दाल, रसम, सांभर, दही, चटनी, भाजी, पापड़ और अचार भी था। उसने खाली थाली लाकर रख दी और अलग से बर्तन में चावल के साथ सारी दाल सब्जी भी। जितनी आवश्यकता है उतना लो। मांगने का कोई झमेला नहीं, अपना हाथ जगन्नाथ। खाना स्वादिष्ट था, मजा आ गया। उदर के साथ आत्मा भी तृप्त हो गई।
स्पेटपनी पर शैव तिलक
भोजन करके हम अपने अगले पड़ाव की ओर चल पड़े। आज शिवरात्रि का दिन था, मंदिरों में उत्सव चल रहे थे। पूजा के साथ भंडारे का आयोजन भी हो रहा था। दक्षिण भारत में शैव सम्प्रदाय के मानने वाले अधिक है, एक समय था कि दक्षिण एवं उत्तर भारत शैव एवं वैष्णव सम्प्रदाय के बीच बंटा हुआ था तथा अत्यधिक झगड़े में इनमें ही आपस में होते थे। सदैव एक दूसरे को नीचा दिखाने को तत्पर रहते थे। आद्य शंकराचार्य के हस्तक्षेप से समय में बदलाव आया, वैष्णव दक्षिण पहुंचे और शैव उत्तर की ओर, दोनो पूजित होने लगे। सम्प्रादायिक भेद भाव इस कदर खत्म हुआ कि "हरिहर" की संघाट प्रतिमाएं बनने लगी। तिरुपति बाला जी और पद्मनाभ स्वामी मंदिर वैष्णव सम्प्रदाय के हैं तो उत्तर भारत में कई ज्योतिर्लिंग हैं। यह साम्प्रदायिक समरसता अभी तक कायम है। 
पथकर नाका
हिन्दू धर्म के विभिन्न सम्प्रदायों की पहचान तिलक छापे एवं वेषभूषा से होती है। शैव आड़े तिलक लगाते हैं तो वैष्णव खड़े। कोई गोल तिलक लगाता है तो कोई सारा माथा ही रंग लेता है। कोई चंदन का तिलक लगाता है तो कोई रोली, हल्दी का। सभी अपनी पहचान आज भी कायम रखे हुए हैं। शायद यह जीवन की पहली शिवरात्रि होगी जब मैं कहीं यात्रा पर रहा हूँ। बाकी तो अन्य त्यौहारों पर यात्रा पर जाना होता रहा है, सिर्फ़ रक्षा बंधन, दीवाली और होली, ये तीन त्यौहार हमेशा घर पर ही मनते हैं। मुकेश के गानों के साथ सफ़र सपाटे से कटते जा रहा था। अनंतपुर के आगे चलने पर रास्ते में बहुत सारे पवन पंखे लगे दिखाई दिए, पहाड़ियों पर लगाकर इनसे बिजली उत्पन्न की जाती है तथा एक ग्रिड से जोड़कर इसका वितरण किया जाता है। यह पवन उर्जा का सदूपयोग दिखाई देता है।
उर्जा उत्पादन का साधन पवन पंखे
जिस हाईवे पर हम चल रहे थे, उसे बनाने के लिए काफ़ी श्रम लगा होगा। हाईवे बनाने के लिए पहाड़ों को भी काटना पड़ा तो कहीं सड़क को पचास फ़ुट ऊपर तक उठाना भी पड़ा, इस तरह यह हाईवे बनकर तैयार हुआ। हर 50-60 किमी में एक टोल नाका आ ही जाता था। जिस पर सड़क बनाने वाली कम्पनियाँ खर्च की गई राशि वसूल कर रही थी। चलते चलते वह समय आ ही गया जब बंगलोर की हद में हम पहुंच गए। रात हो गई थी और अब थकान इतनी बढ गई थी कि लग रहा था, कब होटल में पहुंचे और बिस्तर के हवाले हो जाएं। बंगलोर पचास किमी पहले से शुरु हो जाता है। रात को गति वैसे भी कम हो जाती है। 
रात का ट्रैफ़िक बंगलोर
भारी ट्रैफ़िक के बीच हम इलेक्ट्रानिक सिटी की तरफ़ जा रहे थे, रास्ते में एक फ़्लाई ओव्हर ऐसा आया कि गाड़ी चल रही थी और वह खत्म होने का नाम ही नही ले रहा था। लग रहा था कि यह हमें सीधे आकाश की ओर लेकर जा रहा है। जब फ़्लाई ओव्हर खत्म हुआ तब सांस में सांस आई। पता चला कि यह नौ किमी लम्बा है। एक गोल चक्कर के बाद जीपीएस वाली बाई ने दिखाया कि हम मंजिल के करीब पहुंच गए हैं, दो तीन मोड़ों से गुजरने बाद बोली " आपकी मंजिल आ गई है"। रात साढे नौ बज रहे थे। हम अपनी मंजिल पर पहुंच गए थे। होटल चेक इन किया और रुम में पहुंचते ही पड़ गए बिस्तरों पर, अगली सुबह के इंतजार में।

ब्लॉगर भोज सह ब्लॉगर मिलन: दक्षिण यात्रा - 6

बैंगलोर में हिन्दी ब्लॉगर बिरादरी भी रहती है, यह तो हम वर्षों से जानते थे और यहाँ पहुंचने के पूर्व भी ब्लॉगर मिलन का कार्यक्रम बन गया था। सोचा यह था कि एक दिन सभी किसी नियत स्थान पर एकत्रित हो जाएं तो सभी से मिलन हो सकता है। परन्तु हमारे प्रवास के दिनों में रविवार सम्मिलित नहीं था। रविवार तक तो हमें घर पहुंचना था। मंगलवार का रात्रि भोजन का निमंत्रण भाई आशीष श्रीवास्तव द्वारा मिला। हम रात्रि साढे आठ बजे के आस पास उनके घर पर पहुंच गए। घर पर उनके अलावा उनकी माता जी, श्रीमती जी एवं पुत्री गार्गी, कुल मिलाकर चार की नफ़री है।
पाबला जी, ललित जी, पीडी जी, आशीष जी एवं गार्गी जी :)
घर पहुंचने पर चाय पानी के संवाद चर्चा प्रारंभ हुई, ब्लॉग एगीगेटर नारद से लेकर चिट्ठा जगत, ब्लॉग वाणी इत्यादि की चर्चा के साथ हमारी वाणी एवं ब्लॉग सेती एग्रीगेटर का भी जिक्र हुआ। परन्तु ब्लॉगिंग का जो आनंद 2011 तक था वह इन एगीगेटरों के माध्यम से लौट कर नहीं आया। चिट्ठा जगत में उस समय 30 हजार ब्लॉग दर्ज थे। ब्लॉग वाणी सफ़ल एग्रीगेटर था, जल्दी खुल जाता था और फ़ीड भी एक बटन दबाने पर दिखाई देने लगती थी। मेरे डेस्कटॉप पर हमेशा खुला रहता था। जब भी समय मिला सरसरी तौर पर एक निगाह डाल लेता था। पर अब उस जैसा मजा नहीं, मैने कई वर्षों से किसी एग्रीगेटर की ओर झांक कर देखा ही नहीं।
आशीष श्रीवास्तव जी का छत्तीसगढ़ से नाता है, साथ पड़ोस के गोंदिया शहर के निकट के गाँव के निवासी भी हैं। वर्डप्रेस पर इनका ब्लॉग विज्ञान विश्व काफ़ी प्रसिद्ध है, इसके साथ ब्लॉग स्पॉट पर भी इनके कई ब्लॉग हैं। हमारे से सीनियर ब्लॉगर हैं, प्रारंभिक दिनों में इन्होनें हिन्दी ब्लॉगिंग को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चर्चा के बीच ये बार-बार किसी को फ़ोन लगा रहे थे। थोड़ी देर बाद द्वार उन्मुक्त हुआ और ब्लॉगर प्रशांत प्रियदर्शी सपत्नी प्रकट हुए। यह मेरे लिए बोनस जैसा था, उम्मीद से दुगना। प्राचीन ब्लॉगर प्रशांत प्रियदर्शी को निक नेम "पीडी" के नाम से जानते हैं। पीडी जी का ब्लॉग "मेरी छोटी सी दुनिया" है, इस पर दो बज्जिया बैराग बढिया पोस्ट चेपे हैं।
बातचीत करते खाना भी लग गया, खूब बातें हुई। नए पुराने ब्लॉगरों के जिक्र के साथ। जब ब्लॉगर साथ बैठेगें तो चर्चा होगी ही न। पाबला जी गार्गी की फ़ोटो लेते रहे। गार्गी ने लिखाई कर सारे घर की दीवारें रंग डाली हैं, मेरा बेटा उदय भी यही करता था, पर उसकी इन हरकतों में उसकी मां सतत निगाह रखती थी। थोड़े दिनों में उसकी यह आदत छूट गई। बच्चों के लिए दीवाल एक श्याम पट का काम करती है। जो चाहे मांड लो, जैसे चाहे पेंसिल घुमा लो। हमारे समय में तो चाक पेंसिल मिलती थी, जिसका लिखा कपड़े की एक रगड़ से साफ़ हो जाता था। आज की पेसिंलों का लिखा मिटाने के लिए फ़िर से दीवालें पोतनी पड़ती है।
भोजन के वक्त वजन कम करने की बात छिड़ गई। पाबला जी का वजन काफ़ी कम हो गया है और आशीष श्रीवास्तव जी ने भी अपना वजन भोजन पर नियंत्रण करके कम कर लिया। 2005 के आस पास हमारा भी वजन 103 किलो था, पर शक्कर अधिक होने के कारण धीरे धीरे कम होते होते 75 किली रह गया। वो तो भला हो डॉक्टर सत्यजीत साहू का जिन्होने इस पर ध्यान दिया, वरना हम तो घिसते घिसते आज 25 किलो के रह जाते। सारे कपड़े ढीले हो गए, नए कपड़े लेने पड़े। जब वजन बढने लगा तो फ़िर नए कपड़े आए। आज वजन ठीक है, 90-95 के बीच कांटा झूलते रहता है। वैसे भी एक उम्र में आकर डाईट पर नियंत्रण करना आवश्यक है। खासकर कुर्सी पर बैठकर काम करने वालों के लिए।
राष्ट्रपति पुरस्कृत ज्योतिषी संगीता पुरी जी से कभी मजाक कह दिया करता हूँ कि ग्रहों के संकट निवारण के लिए "ब्लॉगर भोज" के लिए अपने क्लाईंटों को कहा करें, जिससे उनके संकट का निवारण शीघ्रता से हो जाएगा और समस्याओं का समाधान भी। यथा 5-11-21-51 ब्लॉगर श्रद्धानुसार जिमाने में कोई हर्ज नहीं है। वर्तमान में ब्लॉगर ही संकट मोचन बनकर सामने आए हैं। विभिन्न विषयों पर लिखे जा रहे ब्लॉगों के कारण ही गुगल पर जानकारियाँ उपलब्ध हो पाई हैं और इसमें ब्लॉगरों के योगदान को किसी काल में भी नकारा नहीं जा सकता। नेट पर हिन्दी ब्लॉगरों की ही देन है।
ब्लॉगरों की बैठकी तो ऐसी होती है, जैसे बहुत दिनों के बाद कोई घर छुट्टी आता है और सारी रात परिजनों से बातचीत में कट जाती है, सुबह पौ फ़टते पता चलता है कि बातचीत में ही रात गुजर गई। यहाँ भी रात बढने लगी तो चर्चाओं पर विराम देकर हमने आशीष जी से विदा ली। उत्तम ब्लॉगर भोजन से हृदय आनंदित हो गया था और अब एक लम्बी नींद की आवश्यकता महसूस हो रही थी। सभी नीचे छोड़ने आए और हम अपने ठिकाने होटल लौट आए। इस तरह एक छोटी सी ब्लॉगर बैठकी हो गई। आशीष जी का घर हमारे होटल से नजदीक ही था। जल्दी ही जीपीएस वाली बाई ने हमें होटल तक पहुंचा दिया और कहा " आपकी मंजिल आ गई है।

बैंगलोर के मड फ़ोर्ट के निर्माण की कहानी -7

यात्रा की थकान काफ़ी हो गई थी, एक दिन आराम करने के बाद अगले दिन बैंगलोर भ्रमण का कार्यक्रम बनाया गया। बैंगलोर  काफ़ी बड़ा है और भीड़ भरी सड़कों पर ही सारा समय निकल जाता है। पर्यटन करने के लिए वैसे बैंगलोर  में बहुत कुछ है, परन्तु पर्यटन अपनी रुचि के हिसाब से होता है। प्राचीन स्मारकों को देखने की रुचि होने के कारण हमने सर्च किया तो बंगलोर में तीन स्थान दिखाई दिए, पहला बैंगलोर  फ़ोर्ट, दूसरा बैंगलोर पैलेस, तीसरा टीपू सुल्तान का समर पैलेस, इसके बाद श्री रंगपट्टनम में टीपू सुल्तान का जन्म स्थल। इसके बाद गुगल मैसूर की जानकारियां देने लगता है।

हमने बैंगलोर शहर के अन्य स्मारक देखना ही तय किया। सुबह साढे नौ बजे नाश्ता करके हम बैंगलोर  दर्शन के लिए चल पड़े। एक डेढ घंटे चक्कर काटते हुए बैंगलोर फ़ोर्ट तक पहुंचे, उसके बगल में विक्टोरिया अस्पताल भी है। परन्तु वहाँ पार्किंग का स्थान नहीं होने के कारण आगे बढ़ गए। एक गोल चक्कर लगाने के बाद भी कोई पार्किंग का स्थान दिखाई नहीं दिया। लगातार चलते हुए अब माथा भी खराब होने लगा था। भीड़ एवं ट्रैफ़िक इतना अधिक रहता है कि मत पूछो। इससे एक सबक मिला कि अपनी गाड़ी के बजाए अगर कैब कर लेते तो सभी स्थान आराम से देखे भी जा सकते हैं और कोई समस्या भी नहीं रहती।
मड़ फ़ोर्ट बैंगलोर का मुख्य द्वार
किले के नाम पर वर्तमान में सिर्फ़ एक द्वार ही दिखाई देता है, जिसे दिल्ली गेट कहते हैं, जिन्होने राजस्थान एवं स्थानों के बड़े दुर्ग देखे हैं, उन्हें इस दुर्ग के नाम पर सिर्फ़ निराशा ही हाथ लगेगी। क्योंकि यह दुर्ग नष्ट हो चुका है और इसकी 95 प्रतिशत जमीन पर कब्जा होकर अन्य इमारते खड़ी हो गई हैं। वास्तव में यह मृदा भित्ति दुर्ग था, जिसे मड फ़ोर्ट कहते हैं। मड फ़ोर्ट बनाने के लिए उपयुक्त स्थान का चयन कर उसके चारों तरफ़ सुरक्षा गोलाकर खाईयाँ खोद दी जाती हैं। इसके निर्माण पत्थरों का प्रयोग नहीं होता। यह तात्कालिक तौर पर सुरक्षा उपलब्ध करता थै। छत्तीसगढ़ में इस तरह के दुर्गों की संख्या 48 तक पहुंच गई है।

इस किले का निर्माण 1537 में बैंगलोर शहर बसाने वाले केम्पे गौड़ा ने किया था। यह विजयनगर राज्य का जमीदार एवं बैंगलोर शहर का संस्थापक था। उसके बाद 1761 में हैदर अली ने इसमें निर्माण कार्य किया और इसे पत्थरों से निर्मित कर सुरक्षित किया। अंग्रेजों की सेना ने 21 मार्च 1791 को लार्ड कार्नवालिस के नेतृत्व में मैसूर के तीसरे युद्ध के दौरान इस किले की घेराबंदी कर अपने कब्जे में ले लिया। किसी जमाने में यह किला टीपू सुल्तान की नाक कहा जाता था आज इसका थोड़े से अवशेष और दिल्ली दरवाजा ही बाकी है। यहां पर अंगेजों ने अपनी विजय का जिक्र एक संगमरमर की पट्टिका में किया है।
मड फ़ोर्ट का प्लान
किले के लिए स्थान चयन एवं निर्माण के लिए कई किवंदन्तियाँ हैं। केम्पे गौड़ा एक बार शिकार के लिए जंगल में गया, शिकार करते हुए वह पश्चिम दिशा की ओर शिव समुद्र (हेसाराघट्टा) गाँव तक चला गया। यहां के शांत वातावरण को देख कर उसने इस स्थान को राजधानी बनाने के लिए उपयुत्क समझा। उसने यहां पर छावनी, जलाशय, मंदिर एवं व्यवसायियों के लिए बाजार की कल्पना की और इस स्थान पर राजधानी बनाने के निर्णय को स्थाई कर दिया। इस स्थान का एक केन्द्र बना कर उसने चारों दिशाओं में सजाए हुए सफ़ेद बैलों से जुताई कर राजधानी बनाने का कार्य प्रारंभ कर दिया।

इसके बाद मिट्टी के किले के लिए खाईयों का निर्माण किया गया और इसके नौ द्वार बनए गए। कहते हैं दक्षिण द्वार का जब निर्माण हो रहा था तब किसी विघ्न होने के कारण कार्य जल्दी सम्पन्न नहीं हो रहा था। किसी ने कहा कि यह मानव बलि मांगता है। अब बलि कौन दे और किसकी दे। तब केम्पे गौड़ा की भाभी लक्ष्म्मा ने रात्रि के समय तलवार से अपनी गर्दन काट कर बलि चढा दी। इसके बाद किले का निर्माण बिना किसी दुर्घटना से शीघ्रता से पूर्ण कर लिया गया। इसके बाद कोरमंगला में लक्ष्म्मा के नाम के एक मंदिर का निर्माण किया गया। अब इस मृदा भित्ति दुर्ग को बैंगलोर फ़ोर्ट कहा जाता है।
बैंगलोर फ़ोर्ट का गणेश मंदिर
इस किले में गणेश जी का एक मंदिर है। इसके साथ बैंगलोर का इतिहास जुड़ा हुआ है, परन्तु हमने अपने इतिहास को संजो कर रखना नहीं सीखा। यह किला अतिक्रमण की चपेट में आकर अपना वास्तविक स्वरुप खो चुका है। यह वही स्थान है जहां बीजापुर के सेनापति रुस्तमें जमां की तीस हजार फ़ौज को केम्पे गौड़ा की फ़ौज ने धूल चटाई थी। इतिहास की बातें तो इतिहास में दर्ज हो चुकी हैं और धूल का किला धूल धुसरित हो गया। यहाँ से हम बैंगलोर पैलेस के लिए चल पड़े। जीपीएस वाली बाई को उसका पता बताया गया और हम आगे बढ गए। 

अंग्रेजों से खरीदा वाडियार राजा ने बैंगलोर पैलेस - दक्षिण यात्रा - 8

बैगलोर फ़ोर्ट से चलकर दो चार चक्कर काटने के बाद हम बैगलोर पैलेस पहुंच गए। पहले तो किसी स्कूल का सूचना फ़लक दिखने पर संशय हुआ कि गलत स्थान पर आ गए, परन्तु द्वारपाल द्वारा बताया गया कि हम सही स्थान पर हैं और यही प्रवेश द्वार है। बैंगलोर पैलेस का कैम्पस बहुत बड़ा है, भीतर प्रवेश करने पर दूर से ही ट्यूडर शैली की मीनारों वाली इमारत दिखाई देने लगी। पैलेस नामधारी इस सुंदर इमारत को देखकर लगा कि किसी ब्रिटिश इमारत को देख रहे हैं। शाय्द भारत में यह इकलौती इमारत है जो गोथिक शैली में निर्मित हुई है। पेड़ की छाया ढूंढकर कार खड़ी की। धूप बहुत अधिक हो गई थी और बैंगलोर की सड़कों पर चक्कर काटते  हुए दिमाग भी खराब हो चुका था। दूर से देख कर ही लग रहा था कि यह स्थान किसी की निजी संपत्ति है।
ट्यूडलर गोथिक शैली का बैंगलोर पैलेस
पैलेस के मुख्यद्वार के बांई तरफ़ रिशेप्शन बना हुआ है, यहाँ पैलेस भ्रमण करने वालों के लिए टिकट बेची जाती है। प्रति भारतीय शायद 285 रुपए लिए जाते हैं (इसके विषय में पाबला जी के ब्लॉग से पता चलेगा, क्योंकि टिकट के पैसे उन्होंने ही दिए थे।) कैमरे का चार्ज छ: सौ रुपए से अधिक है, तथा मोबाईल से भी फ़ोटो लेने पर लगभग 300 रुपए देने होते हैं। यहाँ आडियो डिवाईस दिया जाता है, जो कई देशी विदेशी भाषाओं में है। हमने हिन्दी वाला लिया, हेड फ़ोन लगाकर सुनते हुए सारा महल घूम जा सकता है। स्वागत कक्ष से लगा हुआ राजा का दरबार है। यहाँ आठ दस सीसी कैमरे लगे हुए हैं। वैसे भी सारे महल में कैमरों का जाल बिछा हुआ है। 
महल का सुसज्जित भीतरी भाग
हमने पहले कक्ष से भ्रमण प्रारंभ किया, यहां वाड़ियार राजाओं की तश्वीरे लगी हैं और  तत्कालीन अखबारों एवं लंदन की पत्रिकाओं में प्रकाशित समाचारों एवं आलेखों की प्रतियाँ फ़्रेम करके लगाई हुई हैं। यह राजा का आगंतुक कक्ष था। यहां हमने भी बैठकर कुछ चित्र खिंचवाए। इस दूमंजिले पैलेस में कई कक्ष हैं और यह आयताकार बना हुआ है। कक्षों में से कई बंद हैं। सारे स्थानों पर वाडियार राजाओं के वैभव एवं उनके शिकार के कारनामों को प्रदर्शित किया गया है। एक स्थान पर शेर एवं हाथी के पैर के बने स्टूल रखे हुए हैं। 
हाथी के पैरों के स्टूल
मुझे एक चीज पसंद आई, यहां के राजाओं को हार्स पोलो खेलने का शौक था। तो उनकी ऊंचाई के हिसाब से ड्रेस बनाई जाती थी और उनका वजन भी तोला जाता था। वजन तोलने के विशेष तौर पर एक कुर्सी बनाई गई है, जिस पर बैठने के बाद हार्स राईडर का वजन किया जाता था। शायद वजन का कोई संबंध हार्स पोलो खेल से हो, यह मुझे पता नहीं। पर वजन तोलने के लिए लकड़ी की बनाई हुई मशीन लाजवाब है। इसके साथ ही इससे बगल में खड़े होने पर ऊंचाई भी नापी जाती थी।
हार्स पोलो के जॉकी इसी मशीन पर अपना वजन तोलते थे।
बैंगलोर पैलेस वाड़ियार राजाओं ने सेंट्रल हाई स्कूल के तत्कालीन प्राचार्य रेव जे गैरेट से खरीदा था। इसका निर्माण 1862 में प्रारन्भ हुआ। इस बीच 1873 में मैसूर के युवा राजकुमार चामराजा वाडियार ने इसे जॉन रॉबर्ट्स और लाजर से चालिस हाजर की रकम देकर खरीद लिया और अपनी इच्छा अनुसार इसका नवीनीकरण करवाया। यह महल पैतालिस हजार वर्ग फ़ुट में निर्मित है तथा इसका प्रांगण 454 एकड़ का है। इसकी ट्यूडर शैली में कलात्मकता को बरकरार रखा गया। इसकी अंदरुनी साज सज्जा में काष्ठ में फ़ूल पत्तियों की नक्काशी की गई है तथा फ़र्नीचर विक्टोरियन शैली में ही बनाया गया है। महल की सम्पत्ति को लेकर कई वर्षों तक उत्तराधिकारियों में कानूनी विवाद चलता रहा।
एक झलक बैंगलोर पैलेस के साथ
नीचे तल में एक फ़व्वारा लगा हुआ है, इसे फ़्लोरोसेंट नीचे सिरेमिक टाईल्स से सजाया गया है तथा खुले आंगन में ग्रेनाईट की बेंच बनाई हुई हैं, इन पर बैठकर फ़व्वारे का आनंद लिया जाता था। ऊपर की मंजिल में राजा का दरबार हाल बना हुआ है। यहां बैठकर वे अपनी विधानसभा को संबोधित करते थे एवं पदाधिकारियों से चर्चा करते थे। पैडियों के साथ चित्र लगाए हुए हैं तथा इसे गोथिक शैली से सजाया गया है। यहाँ सोने की फ़्रेम का एक आदमकद आईना भी लगा हुआ है। इस तरह पैलेस का एक चक्कर लगाकर हम एक घंटे में बाहर आ गए। महल के आस पास के विशाल मैदान का अब व्यवसायिक उपयोग किया जा रहा है। शादि विवाह एवं अन्य कार्यक्रमों के लिए इसे किराए में दिया जाता है।
विजय माल्या के यु बी मॉल के फ़ुड कोर्ड में कर्जा वसूलते हुए दो हाकड़
 यहां से निकलने पर धूप प्रचंड हो चुकी थी और हमें भूख भी लग रही थी। हमने दक्षिण भारतीय खाने के रुप में दही चावल खाया। इसके बाद विजय माल्या से पैसा वसूलने उसके यु बी माल की ओर चल दिए। यु बी मॉल में शायद दफ़्तर अधिक हैं और यहां कि दुकानों काफ़ी मंहगा सामान है। विशेषकर लोग यहां के फ़ुड कोर्ट में व्यंजनों का आनंद लेने आते हैं। हमने भी एक विदेशी नाम वाला शरबत पिया। उसके बाद अपने होटल आ गए। कल हमें हम्पी की यात्रा करनी थी।

ब्लॉगर मिलन के बाद हम्पी की ओर - दक्षिण यात्रा 9

गले दिन 10 मार्च 2016 को सुबह हमने कर्नाटक के नगर हम्पी जाने का फ़ैसला किया। विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हम्पी जाने का कई वर्षों से मन था। आज की रात ब्लॉगर साथी विवेक रस्तोगी जी के यहाँ भोजन का निमंत्रण था। हमारे होटल से यह दूरी लगभग 20 किमी तो होगी ही, आना-जाना 40 किमी और उसी रास्ते से हम्पी जाना था। तब विवेक रस्तोगी जी से उनके यहां ही रात रुकने की अनुमति ली गई, जिससे चालिस किमी का फ़ेरा और समय दोनों की बचत होगी। रात हम उनके यहां पहुंच गए। उन्होने अपने घर का जीपीएस दे दिया। कार सीधी जाकर दरवाजे पर ही रुकी।
तीन ब्लॉगर - बी एल पाबला, विवेक रस्तोगी, ललित शर्मा
घर पहुंचने पर विवेक भाई प्रतीक्षा करते मिले, जाते ही पहले स्वादिष्ट भोजन किया और उसके बाद फ़ुरसत में ब्लॉगिंग की दुनिया के भूले बिसरे गीत गाए गए। चर्चा करते हुए काफ़ी रात हो गई, हमें तो सुबह जल्दी हम्पी के लिए निकलना था। इसलिए सो गए। सुबह जल्दी उठकर स्नानाबाद से लौटकर विवेक भाई से विदा ली और गाड़ी गेयर में डाल दी। इनका घर सुरक्षित कालोनी में है। हमारी गाड़ी अब हम्पी के रास्ते पर दौड़ रही थी। हमें लगभग साढे तीन सौ किमी का सफ़र तय करके हम्पी पहुंचना था। 
हाईवे पर ब्लॉगर
सुबह जल्दी प्रारंभ किया गया सफ़र हमेशा सुखदाई होता है, सफ़र जल्दी तय होता और शहरी इलाके में ट्रैफ़िक कम रहता है। वरना बड़े शहर से बाहर निकलते हुए ही एक घंटा से अधिक समय खराब हो जाता है। हमारी गाड़ी हाईवे पर सपाटे से चल रही थी। साढे तीन सौ किमी का सफ़र तय करने में कम से कम छ: घटे तो लगने ही थे। साढे सात बजे के लगभग नाश्ते की आवश्यकता महसूस होने लगी।
खाने का नाश माने नाश्ता
हमने नेलमंगला स्थान पर इडली बनते देखकर गाड़ी रोकी। यहाँ एक मशीन से बड़ी इडली बन रही थी। हमने इडली खाई, परन्तु यहां की चटनी सांभर में वो मजा नहीं आया, जो हैदराबाद में मिला था। नाश्ते के बाद आगे का सफ़र तय करने के लिए चल दिए।
पवन पंखे का ब्लेड
चित्रदुर्ग से हमने हाईवे छोड़ दिया स्टेट हाईवे पर आ गए। अब हमारी गाड़ी की रफ़्तार कम हो गई। रास्ते पर एक स्थान पर छोटी डूंगरी पर इकलौता वृक्ष दिखाई दिया। ऐसा ही हमें हैदराबाद से बैंगलोर आते समय दिखा था। गाड़ी रोक कर इसकी फ़ोटो ली। इधर हवा से बिजली बनाई जाती है, इसके पंखे जगह जगह पर लगे हुए हैं। गाड़ियों में भी इनकी पंखुड़ियां ट्रांसपोर्ट होती दिखाई दे रही थी। एक पंखुड़ी ही एक गाड़ी में ट्रांसपोर्ट हो रही थी। इससे पंखुड़ी के साईज का पता चल रहा था। बड़ी कम्पनियां यहां पवन उर्जा के टावर लगाकर मोटा पैसा बना रही हैं। राजस्थान के जैसलमेर क्षेत्र में ऐसा ही दिखाई देता है।
विजयनगर साम्राज्य हम्पी का हौसपेट द्वार
हम डेढ बजे हौसपेट से प्राचीन विजयनगर साम्राज्य के द्वार पर पहुंच चुके थे। द्वार देखकर ही मन खिल गया। इसके दांए तरफ़ प्रस्तर के नागदेवता विराजमान हैं और बांए तरफ़ कूप आराम वाटिका है। हमने गाड़ी रोकर इनकी फ़ोटो ली, क्योंकि हमारा वापसी का मार्ग तय नहीं था। हो सके कि वापसी में इधर आना ही न हो, इसलिए कल पर छोड़ने के बजाय आज ही चित्र ले लो। 
की होल कूप ( कूप आराम वाटिका)
यहां से हम्पी का मुख्य गांव कमलापुर पांच किमी की दूरी पर होगा। यहां भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का मिनी सर्किल है। उसके अधीन ही हम्पी में संरक्षण एवं उत्खनन का कार्य होता है। यहां डिप्टी एस ए के पद पर एन सी प्रकाश पदासीन है। उनसे फ़ोन पर बात हुई, कमलापुर के अम्बेडकर स्क्वेयर आने कहा।
कमलापुर चौक हम्पी
अम्बेडकर स्क्वेयर के एक रास्ता बेल्लारी तरफ़ चला जाता है। इसी चौक पर सर्वे का दफ़्तर है। हम यहां दो बजे पहुंचे तो डिप्टी एस ए भोजनावकाश पर थे। उनके लौटने तक हम भी भोजन करने के लिए चौक पर आ गए। चौक पर ही साउथ इंडियन खाने का एक अच्छा शाकाहारी होटल है। यहीं हमने भोजन किया, खाना भी एक नम्बर और उम्दा था और खर्च भी कम। एक सौ बीस रुपए हम दोनो का पेटभर भोजन हो गया। जिसमें सांभर, चटनी, दो सब्जी और रोटी थी। भोजन करके लौटने पर डिप्टी एस ए महोदय भोजनावकाश से लौट आए थे। परिचय होने पर उन्होंने अपना एक आदमी हमें गाईड के रुप में हम्पी भ्रमण के लिए दिया।


हम्पी का भव्य विरुपाक्ष मंदिर एवं उसका स्थापत्य - दक्षिण यात्रा 10

म्पी के लैंडमार्क के रुप में यहां के विट्ठल मंदिर का पाषाण गरुड़रथ दिखाया जाता है। यह गरुड़रथ हम्पी की पहचान बन गया है। हम्पी पहुंचने से पहले मैने इस प्राचीन नगर के विस्तार के विषय में सोचा ही नहीं था। मेरी सोच से भी बढ़कर मैने इसे पाया। सबसे पहले हम विरुपाक्ष मंदिर गए। यह मंदिर सतत पूजित है, यहां अभी भी उत्सव एवं पूजा होती है। नगर विन्यास की दृष्टि से देखा जाए तो इसे वर्तमान आधुनिक शहरों की तरह ही बसाया गया है। विजयनगर साम्राज्य की यह राजधानी अपने समय में बहुत ही सुंदर रही होगी। खंडहर बताते हैं इस नगर का रुतबा क्या रहा होगा। यह राजधानी तुंगभद्रा नदी को मध्य में लेकर कई गाँव को मिलाकर बसी हुई है। 
विरुपाक्ष मंदिर का गोपुरम
हेमकुट पर्वत से घिरे पन्द्रहवीं सदी में निर्मित विरुपाक्ष मंदिर के मार्ग के दोनो तरफ़ प्राचीन बाजार के अवशेष दिखाई देते हैं प्रस्तर निर्मित स्तंभों पर छतें अभी तक मौजूद हैं। मार्ग के दोनो ओर दो तल्ला दुकानों की कतारें सुव्यवस्थित हैं। गंगाधर ने बताया कि इन दुकानों पर अतिक्रमण करके लोग निवास कर रहे थे, उन्हें पुरातत्व विभाग ने स्थानीय प्रशासन के सहयोग से हटाया। अन्यथा यह पुरातात्विक धरोहर भी खतरे में थी। ऐसा ही बाजार की बसाहट सिरपुर में देखने मिलती है। यहीं विरुपाक्ष मंदिर का विशाल गोपुरम दिखाई देता है। यह गोपुरम सात तल का है। पहला तल प्रस्तर निर्मित है, इसके बाद सभी तल ईंटों से बनाए गए हैं, जिन पर चूने से लिपाई की गई है। यहां के सभी मंदिर इसी तरह निर्मित हैं। उनकी छत तक प्रस्तर निर्मित है, उसके बाद के निर्माण ईंटों के हैं।
व्यवस्थित प्राचीन बाजार स्थल
गोपुरम से प्रवेश करने पर विशाल प्रांगण है, इसके बांई तरफ़ मंदिर का हाथी बंधा हुआ है, इसके पीछे पाकशाला है। मंदिर के हाथी के साथ उसके दो महावत भी सोए हुए हैं। उन्होने लेटे हुए आवाज दी और हाथी ने हमारे सिर पर सूंड़ रख कर आशीष दिया। मंदिर में प्रसाद बनाने के लिए जल की व्यवस्था नालियों द्वारा की की गई है। यहां तुंगभद्रा नदी का स्वच्छ जल पाकशाला से होकर प्रवाहित होता है। चावल पसाने के लिए बड़े बड़े प्रस्तर के कुंड हैं और दाल पीसने के बड़े सिल लोढे भी यहां रखे हुए हैं। हांलाकि इनका प्रयोग अब नहीं किया जाता। परन्तु उत्सव के अवसर पर इस पाकशाला में हजारों श्रद्धालुओं का भोजन तैयार होता था।
मंदिर के गज द्वारा ब्लॉगर को आशीष
मंदिर के प्रांगण में दो स्तंभ दिखाई देते हैं, एक स्तंभ लकड़ी का बना हुआ है, दूसरा प्रस्तर निर्मित है। प्रस्तर निर्मित स्तंभ पर राजकीय चिन्ह है तथा लकड़ी का स्तंभ ध्वजा आदि के काम लिया जाता रहा होगा। मंदिर परिसर के सभी स्तंभ प्रतिमाओं एवं लता वल्लरियों से अलंकृत हैं। मंदिर के द्वार पर एक स्तंभ में नंदी अंकित है तथा उसके शीर्ष पर दोनो तरफ़ चाँद एवं सूर्य हैं तथा नीचे के भाग में स्थानीय लिपि में लेख अंकित है। अब यहां की लिपि न जानने के कारण अभिलेख से वंचित रह गए और सर्वे के दफ़्तर में भी जानकारी लेना भूल गए। 
विरुपाक्ष मंदिर का प्रांगण
विरुपाक्ष मंदिर के गर्भगृह के समक्ष विशाल प्रस्तर निर्मित मंडप है, इस मंडप के वितान पर पद्माकंन के साथ रंगों से चित्रकारी की गई है। गर्भगृह में स्वर्णरजत अलंकृति भगवान विरुपाक्ष विराजमान हैं। यहां के पुजारी ने गर्भगृह में ले जाकर मुझसे पूजा करवाई। विरुपाक्ष भगवान के दर्शन करवाए। विरुपाक्ष शिव का ही एक नाम है। विरुपाक्ष का अर्थ सुंदर नेत्रों वाला और भयंकर नेत्रों वाला भी हो सकता है। विरुपाक्ष भगवान के रुप के विषय में आगे चर्चा करेगें। 
भगवान विरुपाक्ष स्वामी हम्पी
गर्भगृह के दांई तरफ़ कक्ष में गोपुरम की विलोम छवि दिखाई देती है। इस कक्ष की भित्ति पर एक छिद्र से प्रकाश आता है और वही प्रकाश भित्ति पर विलोम छवि का निर्माण करता है। ठीक आधुनिक पिन होल कैमरे की छवि जैसे। पन्द्रहवीं सदी के वास्तुकारों को इस तकनीकि का ज्ञान था, यह बड़ी बात है। जबकि कैमरे का अविष्कार को उन्नीसवीं सदी में हुआ था। उसके बाद ही आगे चलकर कैमरा की तकनीक परिष्कृत होती गई और पिन होल कैमरे का जन्म हुआ। लगभग 300 फ़ुट से अधिक दूरी की छवि को एक छिद्र से भित्ति पर दिखाना उस सदी का बहुत बड़ा चमत्कार एवं क्रांतिकारी अविष्कार ही कहा जाएगा और यह तकनीक वर्तमान में भी अपना कार्य कर रही है।
पिन होल से गोपुरम का दृश्य
इस मंदिर के गोपुड़ा का निर्माण राजा कृष्णदेव राय ने करवाया था। दांई तरफ़ स्थिति गोपुरम से बाहर निकलने पर एक काफ़ी बड़ी पुष्करी है। इस पुष्करी का निर्माण पत्थरों से किया गया है। जिसमें चारों तरफ़ पैड़ियां बनी हुई है। धार्मिक कर्मकांड यहां पर सम्पन्न करवाए जाते हैं तथा गोपुरम की छवि पुष्करी के जल में दिखाई देती है। गोपुरम की भित्ति में मंदिर की तरफ़ राजा कृष्णदेव राय की खड़गधारी करबद्ध स्थानक मुद्रा में छवि अंकित की गई और इसके साथ उनका नाम भी खुदा हुआ है। इस तरह किसी राजा की छवि मुझे पहली बार किसी म।द्निर में दिखाई दी जिसके साथ उसका नाम भी अंकित हो। मंदिर निर्माण करवाने वाले राजा की पत्नी सहित छवि तो अनेक स्थानो पर मिलती है।
पुष्करणी एवं गोपुरम
विरुपाक्ष मंदिर तो यह अपनी तरह अनोखा मंदिर है। पन्द्रहवी शताब्दी में निर्मित इस मंदिर की पुर्व दिशा में विशाल नंदी विराजमान है, दक्षिण दिशा में में गणेश जी विशाल प्रतिमा है। इसके साथ  ही द्वार पर तीन मुखी नंदी भी स्थापित है। तीन मुखी नंदी मैने पहली बार देखा। यहां विष्णु के नृसिंह अवतार की विशाल प्रतिमा है। विरुपाक्ष मंदिर तल से शिखर तक पचास मीटर ऊंचा है। इस प्रांगण में विरुपाक्ष मंदिर से भी प्राचीन कई छोटे छोटे मंदिर है। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर में राजा कृष्णदेव राय ने अपने अभिशेक के समय गोपुड़ा का निर्माण करवाया था। इस मंदिर को पंपापति नाम से भी जाना जाता है। अर्थात इस नगर का प्राचीन नाम पंपा था एवं इसके मालिक पंपापति अर्थात विरुपाक्ष भगवान हैं।
विरुपाक्ष मंदिर का मंडप एवं गर्भगृह 
प्रत्येक प्रसिद्ध स्थान के कुछ न कुछ किंवदन्तियां भी जुड़ी रहती हैं। इसके साथ किंवदंती है कि भगवान विष्णु ने इस जगह को अपने रहने के लिए कुछ अधिक ही बड़ा समझा और अपने घर वापस लौट गए। विरुपाक्ष मन्दिर में भूमिगत शिव मन्दिर भी है। मन्दिर का बड़ा हिस्सा पानी के अन्दर समाहित है, इसलिए वहाँ कोई नहीं जा सकता। बाहर के हिस्से के मुक़ाबले मन्दिर के इस हिस्से का तापमान बहुत कम रहता है। हालांकि हम्पी एक प्राचीन शहर है और इसका जिक्र रामायण में भी किया गया है और इतिहासकारों के अनुसार इसे किष्किन्धा के नाम से बुलाया जाता था, वास्तव में 13वीं से 16वीं सदी तक यह शहर विजयनगर राजाओं की राजधानी के रुप में समृद्ध हुआ।
राजा कृष्णदेव राय की प्रतिमा
विरूपाक्ष नाम भी वेद प्रसिद्ध है। महानारायाण उपनिषद् विरूपाक्ष को बार–बार प्रणाम करती है– विरूपाक्षं विश्वरूपाय वै नमो नम:। विषमणि विविधशक्तीफीन्यक्षीणि विलक्षणानि वाक्षाणि। हर! हेमकूटशैले लिंगे व्यक्तोSस्यतो विरूपाक्ष:।। अर्थात् हे हर! आपके लोचंन विषम है, आप विविध शक्तियों वाले हैं, आपकी इन्द्रियाँ विलक्षण है और आप हेमकूट पर्वत पर विरूपाक्ष लिंग रूप से स्थापित हैं अतएव आप विरूपाक्ष कहे जाते हैं। वस्तुत: हमारी इन्द्रियाँ विषय को देखती हैं और शिव की इन्द्रियाँ चेतन को देखकर मानो विषय को नंगा कर देती हैं इसलिए उन्हें विरूपाक्ष कहा जाता है। …… विरुपाक्ष मंदिर दर्शन कर हम विट्ठल मंदिर की ओर चल दिए।

स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना विट्ठल मंदिर हम्पी : दक्षिण यात्रा 11

विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हम्पी को मंदिरों का नगर कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। क्योंकि यहां शैव, वैष्णव, शाक्त सभी पंथो का प्रतिनिधित्व करते हुए मंदिरों का निर्माण भव्यता के साथ हुआ है। विरुपाक्ष स्वामी मंदिर शिव को, विट्ठल मंदिर विष्णु को एवं माता मंदिर देवी को समर्पित है। इसके साथ ही जैन मंदिर एवं मठ भी है। इससे स्पष्ट होता है कि विजय नगर साम्राज्य में सभी पंथो का समान आदर था। अगर हम्पी नगर का भ्रमण करना है तो कम से कम पर्यटक के पास 3 दिन का समय होना चाहिए तथा वाहन भी। क्योंकि सभी मंदिर एवं स्मारक दो-चार किमी की दूरी पर है। यहाँ किराये पर सायकिल मिलती है, जिससे भ्रमण किया जा सकता है।
तलारी गट्टा द्वार
विरुपाक्ष मंदिर के दर्शनों के पश्चात हम विट्ठल मंदिर पहुंचे यह मंदिर से पूर्व दिशा की ओर लगभग 5 किमी की दूरी पर है। विट्ठल मंदिर के लिए तलारीगट्टा द्वार से होकर जाना पड़ता है। तलारी गट्टा का अर्थात चुंगी द्वार। इस द्वार से प्रवेश करने वाले व्यापारी से यहां चुंगीकर वसूल किया जाता था। 
बैटरी चलित वाहन को चलाती लड़की
यह मंदिर तुंगभद्रा नदी के दक्षिणी किनारे पर है। यहां पहुंचने पर मंदिर एक किमी पहले वाहन पार्किंग में खड़े करवा लिए जाते हैं, इसके बाद यहां से बैटरी चलित वाहन से मंदिर तक ले जाया जाता है। इन वाहनों को यहां के गांव की लड़कियाँ चलाती हैं। मुझे कर्नाटक सरकार का यह कार्य पसंद आया। अधिक लड़कियां विद्यार्थी हैं, जो पार्ट टाईम में वाहन चलाकर कुछ खर्च जुटा लेती हैं।
विट्ठल मंदिर का दृश्य
कड़प्पा पत्थरों का शहर होने के कारण यहाँ के सभी भवन पत्थरों से ही निर्मित है। मंदिरों के प्रथम तल कड़प्पा पत्थरों से बने हुए हैं और ऊपर के तल में ईंटों का प्रयोग हुआ है। कड़प्पा पत्थर अधिक सख्त होता है, इसलिए इस पर नक्काशी का काम सावधानी एवं कठिन परिश्रम भी मांगता है। विट्ठल मंदिर के गोपुरम का शीर्ष भाग भग्न हो चुका है। इसकी निर्माण शैली में इस्लामिक प्रभाव नहीं है, यह विशुद्ध हिन्दू शैली में निर्मित है। इसके मुख्यद्वार पर शिलापट का उपयोग हुआ है। द्वार पदतल शिला पर दंडवत होकर प्रणाम करते हुए मनुष्यों का अंकन दिखाई देता है। स्थापत्य की दृष्टि से यह मंदिर मूल दक्षिण भारतीय द्रविड़ मंदिरों की स्थापत्य शैली का प्रतिनिधित्व करता है।
हम्पी का लैंडमार्क गरुड़ रथ
इस मंदिर का निर्माण सोलहवीं सदी में राजा कृष्णदेव राय द्वारा किया गया बताया जाता है। मुख्य द्वार से प्रवेश करने पर हम्पी के लैंडमार्क गरुड़ रथ का पार्श्व भाग दिखाई देता है। यह मंदिर के विशाल प्रांगण के मध्य में रखा हुआ है। इसे इस तरह स्थापित किया गया है कि मंदिर के गर्भगृह भगवान विट्ठल को गरुड़ रथ में विराजित होकर देखता रहे। मंदिर के गर्भगृह से गरुड़ रथ का द्वार दिखाई देता है। गरुड़ रथ का निर्मान एकाश्म चट्ठान से करने की बजाए, पत्थर से किया गया है। जिस तरह लकड़ी से रथ के सभी अंगों को बनाकर जोड़ा जाता है, इसी तरह गरुड़ रख में पत्थर से बनाकर रथ के सभी अंगों को जोड़ा गया। जिसे पत्थर के बने दो हाथी खींच रहे हैं। पहले इसे घोड़े खींचा करते। घोड़े को किसी ने भग्न कर दिया तो उसी पत्थरों को शिल्पकार ने हाथी की आकृति में बदल दिया। इसके प्रमाण स्वरुप रथ में जुते घोड़े की टांगे दिखाई देती हैं।
महामंडप - इसके ही स्तंभों से मधुर ध्वनि निकलती है।
मंदिर में महामंडप, रंग मंडप एवं अन्य कई मंडप हैं, महामंडप की छत भग्न हो चुकी है। इस महामंडप में जड़ित 56 स्तंभ हैं, जिन्हें थपथपाने मधुर संगीत सुनाई देता है। प्रत्येक स्तंभ से अलग तरह का स्वर निकलता है। सुरक्षा की दृष्टि से स्तंभो के थपथपाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। महामंडप के पश्चात गर्भगृह है, जो प्रतिमा विहीन है। मंदिर के गर्भगृह द्वार पर नदी देवियों के स्थान द्वारपाल बनाए गए हैं। द्वार शिलापट पर गजाभिषिक्त लक्ष्मी अंकित हैं। अधिष्ठान रिक्त है, यहां अवश्य ही विष्णु विग्रह रहा होगा। विट्ठल देव मंदिर हम्पी का सर्वाधिक अलंकृत मंदिर है। इसकी खूबसूरती देखते ही बनती है। सिंह व्याल, गज व्यालादि का अंकन प्रस्तर भित्तियों पर दिखाई देता है।
रंग मंडप का भीतरी भाग
गर्भगृह की भित्तियों पर रामायण की कथा का चित्रण किया गया है। जिसमें राजा दशरथ द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ। अशोक वाटिका में हनुमान द्वारा सीता को राम मुद्रिका देना, वानर सेना का सीता जी खोज करने का अंकन प्रमुख है। इसके साथ ही लक्ष्मी नारायण इत्यादि को प्रदर्शित किया गया है। बाहरी भित्ति पर पद्मासन लगाए हुए ध्यानरत साधु का अंकन किया गया है। यह आद्य शंकराचार्य हो सकते हैं। इसके साथ ही रामायण के अन्य प्रसंगों का चित्रण भी महत्वपूर्ण है। इस मंदिर को देखने के लिए भरपूर समय चाहिए। पर हमारे पास समय की कमी थी, सांझ ढल रही थी, इसलिए हम जल्दी से जल्दी और अधिक से अधिक अपने कैमरे में कैद कर लेना चाहते थे। फ़िर भी बहुत कुछ छूट गया। 
अशोक वाटिका में सीता जी
इससे तो सभी विज्ञ है कि प्राचीन काल में भारत में तकनीकि विज्ञान अपने चरमोत्कर्ष पर था। जहाँ पुष्पक विमान से लेकर अन्य आश्चर्यचकित करने वाली तकनीकि सामने आई। विट्ठल मंदिर की बाहरी भित्ति में उत्कीर्ण एक प्रतिमा में दो चक्के का स्कूटर दिखाया गया है। जिसमें हैंडिल भी है और इक स्त्री इसे फ़र्राटे से संचालित करते हुए दिखाई दे रही है। उसने एक हाथ में स्कूटर का हैंडिल पकड़ा हुआ है और दूसरे हाथ में खड्ग दिखाई दे रही है। अवश्य ही यह युद्ध का चित्रण किया गया है, स्कूटर सवार वेगवती स्त्री हाथ में खडग लेकर जैसे अरिसेना को ललकार कर आगे बढ़ती हुई दिखाई दे रही है। इस तरह दो चक्कों के इलेक्ट्रानिक स्कूटर आज दिखाई देते हैं। वैसे भी स्कूटर का अविष्कार उन्नीसवीं सदी की औद्यौगिक क्रांति की देन है। परन्तु विट्ठल मंदिर का यह स्कूटर सोलहवीं शताब्दी में ही तैयार हो गया और संचालन नारी के द्वारा हो रहा है, इससे यह भी जाहिर होता है कि समाज में नारियों की स्थिति शीर्ष पर रही होगी। 
स्वचालित स्कूटर सवार स्त्री
विट्ठल मंदिर की भव्यता ऐसी है कि दर्शक ठगा सा खड़ा रह जाएगा। प्रस्तर स्थापत्य का अद्भुत कार्य यहाँ देखने को मिलता है। मंदिर की सुरक्षा परिखा काफ़ी मजबूत बनाई गई है। इसके साथ ही यहां फ़ूल बाजार भी है।  इस स्थान पर मंदिर में अर्पण करने एवं अन्य कार्यों के फ़ूलों का विक्रय होता था। इसके साथ ही अन्य सामान भी मिलता होगा। प्रस्तर स्तंभों से निर्मित बाजार की दुकानें अपने वैभव का गुणगान स्वत ही करती हैं। दुकानों के मध्य प्रतिमा विहीन एक मंदिर भी है। इस मंदिर किस देवता का विग्रह स्थापित था और किसे समर्पित था, इसकी जानकारी मुझे प्राप्त नहीं हो सकी। मंदिर का दर्शन करके हम सन सेट पाईंट की लौट गए।
राम मंदिर हम्पी का गोपुरम
सन सेट पाईंट एक पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ से अस्ताचल को जाते हुए सूर्य का दृश्य सुंदर दिखाई देता है। यहां बड़े परकोटे घिरा हुआ राम मंदिर भी है। यह अयोध्या की हनुमानगढ़ी से संचालित होता है। इस मंदिर का गोपुरम छोटा है तथा द्वार शीर्ष पर गजलक्ष्मी का अंकन है। भीतर प्रवेश करने पर चतुष्टिका में लगे हुए शिलालेख दिखाई देते हैं तथा एकाश्म प्रस्तर का एक स्तंभ भी गड़ा हुआ है। शायद इस पर गरुड़ विराजमान रहे होगें। परन्तु अभी उपर का हिस्सा रिक्त है। मंदिर का गर्भगृह एकाश्म चट्टान को खोद कर गुहानुमा बनाया गया है। तथा उसी चट्टान को निर्माण में सम्मिलित करते हुए महामंडप का निर्माण किया गया है। हम जब पहुंचे तो यहाँ रामचरित मानस का अखंड पाठ जारी था।
सुर्यास्त स्थल पर हनुमान जी
मंदिर के पीछे पहाड़ी से सूर्यास्त देखा जाता है। जब हम पहुंचे तो सुर्य अस्ताचल को जा चुके थे, थोड़ी सी लालिमा दिखाई दे रही थी। इस स्थान पर बहुत से पर्यटकों के पहले से ही डेरा जमा रखा रखा था। यहां एक चट्टान पर कई शिवलिंग बने हुए हैं। जिस पर लोग पुष्प चढा रहे। पर्यटक सूर्यास्त की फ़ोटो खींचने में व्यस्त थे। एक व्यक्ति गदाधारी हनुमान जी का रुप धरकर उनसे कुछ दक्षिणा मिलने की उम्मीद लगाए, पूंछ हिलाते खड़ा था। यहां की फ़ोटो लेते हुए अंधेरा होने लगा था। इसके बाद हम कमलापुर लौट आए। आर्कियोलॉजी के गेस्ट हाऊस में रुम खाली न होने पर हमने एक होटल में रुम लिया और पुन: अम्बेडकर सर्किल के होटल में भोजन कर विश्राम गति को पहुंच गए।

हम्पी का शाही स्नानघर, पुष्करणी एवं महानवमी उत्सव : दक्षिण यात्रा 12

आज हमें हम्पी नगर का बहुतेरा भाग देखना था। पाबला जी ने निर्णय ले लिया था कि 10 बजे तक हम्पी छोड़ देगें। हमने तैयार होकर उड़ूपी रेस्तरां में इडली का नाश्ता किया, तब तक हमारा गाईड गंगाधर भी आ गया था। सबसे पहले हम शाही स्नानघर पहुंचे। रानियों के स्नान के लिए विशेष कुंड का निर्माण किया गया था जिसमें बाहर की दीवारों में ढके हुए झरोखे हैं जिनसे हवा का आवागमन हो सके।  चौरस रानी कुंड की लम्बाई चौड़ाई 30 मीटर है, जिसमें 15 मीटर लम्बाई चौड़ाई एवं डेढ मीटर गहराई है। इसमें चारों तरफ़ झरोखे बने हुए हैं, जहां बालकनियाँ भी बनी हुआ हैं और सुंदर अलंकरण किया गया है। 
शाही स्नान घर हम्पी
इसके चारों तरफ़ बरामदा है जिसकी छत मेहराबों पर टिकी हैं। इस इमारत पर मुस्लिम स्थापत्य का पूर्ण प्रभाव दिखाई देता है। इसकी छतों सुंदर आकृति का वितानालंकरण दिखाई देता है। कुंड से जल निकासी एवं जल भराव की व्यवस्था प्रणालिकाओं द्वारा की गई है, जिससे सदैव निर्मल जल प्राप्त हो सके। गर्मी के दिनों में यह स्थान बहुत सुकून देता होगा। आज सिर्फ़ अहसास ही किया जा सकता है। जब जलती बलती ग्रीष्म ॠतु में यहाँ जल किलोल किया जाता होगा तो यह स्थान किसी स्वर्ग से कम नहीं लगता होगा। 
शाही स्नान घर का भीतरी दृश्य
शाही स्नान घर से कुछ दूरी पर सैनिकों की बैरकें हुआ करती थी। यहां सैनिकों के लिए किसी स्थाई संरचना का निर्माण नहीं दिखाई देता। परन्तु उनके भोजन करने के लिए जल की व्यवस्था दिखाई देती है। यहाँ तुंगभद्रा का जल प्रणालिकाओं के माध्यम से पहुंचाया जाता है, जिससे सैनिक जल द्वारा अपना नित्य कार्य स्नान भोजन इत्यादि कर सकें। स्थान का निरीक्षण करने पर प्रतीत होता है कि सैनिकों के रहने के लिए तंम्बु आदि की अस्थाई व्यवस्था की जाती रही होगी। वर्तमान में भी सैनिकों के अस्थाई निवास के लिए तम्बुओं की व्यवस्था ही होती है।
महानवमी उत्सव मंच हम्पी
यहां से हम शाही आवास परिसर की ओर चल दिए। विदित हो कि विजयनगर साम्राज्य (हम्पी) के तुलुवा वंश के राजा कृष्ण देव राय वैष्णवधर्मी थे। परन्तु उन्होनें सभी पंथो एवं धर्मों का आदर किया। उनके कार्यकाल में बने हुए भवनों के वास्तुशिल्प में यह स्पष्ट परिलक्षित होता है। हिन्दू शैली के साथ मुगल शैली का समावेश निर्माण में हुआ है। उनमें उत्सव धर्मिता की भी कमी नहीं थी। महानवमी (रामनवमी) पर भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया जाता था जिसमें राज्य भर की प्रजा उपस्थित होकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ उत्सव का आनंद लेती थी। उनके कार्यकाल में राज्य में विदेशियों का आगमन भी होता था। वे व्यापार करने, घोड़े बेचने एवं अपने कला कौशल प्रदर्शित करने के लिए आते थे।

नृत्य उत्सव का प्रदर्शन
उत्सव के आयोजन के लिए राज परिसर में भव्य मंच का निर्माण किया गया था। जिसे महानवमी दिबा कहा जाता है। यह वर्गाकार मंच 22 फ़ुट ऊंचा एवं 80 फ़ुट लम्बा एवं चौड़ा वर्गाकार है। इसे राजा कृष्ण देव राय ने उड़ीसा के गजपति शासकों की विजय पर स्मृति के रुप में बनवाया था। इस पर चढने के लिए सामने से पैड़ियाँ बनी हुई हैं और पार्श्व में दस फ़ुट ऊंचा द्वार बना हुआ है, जिससे भीतर से इस पर पहुंचा जा सकता है। हो सकता है इसका प्रयोग राजा के आगमन एवं कलाकारों के मंच पर पहुंचने के लिए किया जाता होगा। जब अचानक कलाकर मंच पर पहुंचता होगा तो दर्शक विस्मय से देखते होते होंगे।

चतुरंगिणी सेना का प्रदर्शन
इस मंच के निर्माण में कला कौशल का भरपूर प्रयोग किया गया है, यह भी वहां उपलब्ध कड़प्पा प्रस्तर से ही बनाया गया है। ऊंचे अधिष्ठान के ऊपर गजथर का निर्माण किया गया है। इसके बाद अन्य पशुओं एवं उनके कारनामों को दिखाया गया है। छोटे गवाक्षों के साथ नृत्यरत सुंदरियों को दिखाया गया है। युद्धरत सैनिकों एवं हाथियों के करतबों को मंच की भित्तियों में स्थान दिया गया है। इनके राज्य में विदेशी राजदूत भी आते थे, उनका भी चित्रण किया गया है।  हिन्दुओं के त्यौहारों का शिल्पांकन किया गया है। विशेषकर होली पर ढफ़ बजाते हुए एवं नृत्य करते  हुए दिखाया गया। 
जल प्रबंधन के लिए प्रस्तर प्रणालिकाएँ
इस मंच का उपयोग कौतुक प्रदर्शन से लेकर, गायन, वादन, नृत्य एवं अन्य प्रतियोगिताओं के संचालन के लिए होता था। मंच के समक्ष बैठ कर देखने के लिए काफ़ी बड़ा मैदान है तथा इसके सामने पुष्करी का निर्माण भी किया गया है। जिससे आने वाले दर्शकों को पेयजल उपलब्ध हो सके। मंच की बांई तरफ़ की दीवार पर चतुरंगणी सेना को दिखाया गया है, जिसमें हाथी, घोड़े ऊंट एवं पैदल सेना का चित्रण किया गया है। इससे जाहिर होता है कि राजा के पास सुदृढ सेना थी, जिसके बल पर उसने पूरे दक्षिण भारत को फ़तह कर लिया और विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की। उत्सव के लिए इतना बड़ा मंच मुझे अन्य किसी स्थान पर देखने नहीं मिला। महानवमी का त्यौहार अवश्य ही राजकीय त्यौहार के रुप में मनाया जाता रहा होगा।
शाही आवास क्षेत्र स्थित पुष्करणी
महानवमी दिबा के समक्ष पुष्करणी एवं कुंआ बना हुआ है। तुंगभद्रा नदी का जल नहरों एवं प्रस्तर प्रणालिकाओं के माध्यम से योजनाबद्ध रुप से सारे नगर में पहुंचाया जाता था। पुष्करणी में जल निकासी एवं भराव की व्यवस्था दिखाई देती है। इसका निर्माण काले पत्थर से किया गया है। जिसमें समकोण बनी हुई पैड़ियां पुष्करणी की सुंदरता में चार चाँद लगाती दिखाई देती हैं। इसके आगे ही चौरीसी स्तंभों की इमारत है। जिसके स्तंभों के चिन्ह मात्र दिखाई देते हैं बाकी पुरा परिसर काल के गाल में समा गया है। समय की मार से सब ढह गया। जो कुछ बचा है, उसे आज पर्यटक देखने आते हैं।

विजयनगर साम्राज्य का समृद्ध इतिहास : दक्षिण यात्रा 13

लते-चलते एक नजर विजयनगर साम्राज्य के इतिहास पर भी डालते हैं। वर्तमान के खंडहरों में जो विजयनगर राज्य का वैभव दिखाई देता है, उसे बनाने में कई पीढिया बीत गई। तब कहीं जाकर आज भव्य भवन, सुव्यवस्थित बाजार, नगर सुरक्षा, जल प्रबंधन, नगर प्रबंधन, सैनिक छावनी, शस्त्रागार, अन्नागार, वास्तु शिल्प एवं प्रतिमा शिल्प दिखाई दे रहा है। अगर उस काल में किसी भी राजा ने देखा होगा तो इसी तरह की राजधानी बनाने की कल्पना की होगी और यहाँ के एश्वर्य से अचम्भित अवश्य हुआ होगा। विजयनगर साम्राज्य (1336-1646) मध्यकालीन दक्षिण भारत का एक साम्राज्य था। इसके राजाओं ने 310 वर्ष राज किया। 
विरुपाक्ष मंदिर के पुजारी एवं कथा का सुत्रधार ब्लॉगर
विजयनगर राज्य का वास्तविक नाम कर्णाटक साम्राज्य था। इसकी स्थापना हरिहर प्रथम और बुक्का राय प्रथम नामक दो भाइयों ने की थी। दोनो भाई युद्ध प्रेमी एवं कुशल रणनीतिकार थे पुर्तगाली इसे बिसनागा राज्य के नाम से जानते थे।इस राज्य की 1567 में भारी पराजय हुई और राजधानी विजयनगर को जला दिया गया। उसके पश्चात क्षीण रूप में यह और 80 वर्ष चला। राजधानी विजयनगर के अवशेष आधुनिक कर्नाटक राज्य में हम्पी शहर के निकट पाये गये हैं और यह एक विश्व विरासत स्थल है। पुरातात्त्विक खोज से इस साम्राज्य की शक्ति तथा धन-सम्पदा एवं वैभव का पता चलता है।
विजयनगर साम्राज्य की भव्यता की दास्तान कहते खंडहर
विजयनगर राज्य में चार विभिन्न वंशों ने शासन किया। प्रत्येक वंश में प्रतापी एवं शक्तिशाली नरेशों की कमी न थी। युद्धप्रिय होने के अतिरिक्त, सभी हिंदू संस्कृति के रक्षक थे। स्वयं कवि तथा विद्वानों के आश्रयदाता थे। हरिहर तथा बुक्क संगम नामक व्यक्ति के पुत्र थे अतएव उन्होंने संगम सम्राट् के नाम से शासन किया। विजयनगर राज्य के संस्थापक हरिहर प्रथम ने थोड़े समय के पश्चात् अपने वरिष्ठ तथा योग्य बंधु को राज्य का उत्तराधिकारी घोषित किया। संगम वंश के तीसरे प्रतापी नरेश हरिहर द्वितीय ने विजयनगर राज्य को दक्षिण का एक विस्तृत, शक्तिशाली तथा सुदृढ़ साम्राज्य बना दिया।
शाही आवास क्षेत्र विजयनगर साम्राज्य ह्म्पी
हरिहर द्वितीय के समय में सायण तथा माधव ने वेद तथा धर्मशास्त्र पर निबंधरचना की। उनके वंशजों में द्वितीय देवराय का नाम उल्लेखनीय है जिसने अपने राज्याभिषेक के पश्चात् संगम राज्य को उन्नति का चरम सीमा पर पहुँचा दिया। मुसलमानी रियासतों से युद्ध करते हुए, देबराय प्रजापालन में संलग्न रहा। राज्य की सुरक्षा के निमित्त तुर्की घुड़सवार नियुक्त कर सेना की वृद्धि की। उसके समय में अनेक नवीन मंदिर तथा भवन बने। दूसरा राजवंश सालुव नाम से प्रसिद्ध था। इस वंश के संस्थापक सालुब नरसिंह ने 1487 से 1490 ई. तक शासन किया। उसने शक्ति क्षीण हो जाने पर अपने मंत्री नरस नायक को विजयनगर का संरक्षक बनाया।
स्तंभ एवं भग्नावशेष विजाय्नगर साम्राज्य हम्पी
यही नरस नायक, तुलुव वंश का प्रथम शासक माना गया है। उसने 1490 से 1509 ई. तक शासन किया और दक्षिण में कावेरी के सुदूर भाग पर भी विजयदुंदुभी बजाई। तुलुब वंशज कृष्णदेव राय का नाम गर्व से लिया जाता है। उसने 1509 से 1539 ई. तक शासन किया। वह महान प्रतापी, शक्तिशाली, शांतिस्थापक, सर्वप्रिय, सहिष्णु और व्यवहारकुशल शासक था। उसने नायक लोगों को दबाया, उड़ीसा पर आक्रमण किया और दक्षिण के भूभाग पर अपना अधिकार स्थापित किया। सोलहवीं सदी में यूरोप से पुर्तगाली भी पश्चिमी किनारे पर आकर डेरा डाल चुके थे। उन्होंने कृष्णदेव राय से व्यापारिक संधि की जिससे विजयनगर राज्य की श्रीवृद्धि हुई।
विहंगम दृश्य विजयनगर साम्राज्य ह्म्पी
तुलुव वंश का अंतिम राजा सदाशिव परंपरा को कायम न रख सका। सिंहासन पर रहते हुए भी उसका सारा कार्य रामराय द्वारा संपादित होता था। सदाशिव के बाद रामराय ही विजयनगर राज्य का स्वामी हुआ और इसे चौथे वंश अरवीदु का प्रथम सम्राट् मानते हैं। रामराय का जीवन कठिनाइयों से भरा पड़ा था। शताब्दियों से दक्षिण भारत के हिंदू नरेश इस्लाम का विरोध करते रहे, अतएव बहमनी सुल्तानों से शत्रुता बढ़ती ही गई। मुसलमानी सेना के पास अच्छी तोपें तथा हथियार थे, इसलिए विजयनगर राज्य के सैनिक इस्लामी बढ़ाव के सामने झुक गए। विजयनगर शासकों द्वारा नियुक्त मुसलमान सेनापतियों ने राजा को घेरवा दिया अतएव सन् 1565 ई. में तलिकोट के युद्ध में रामराय मारा गया। मुसलमानी सेना ने विजयनगर को नष्ट कर दिया जिससे दक्षिण भारत में भारतीय संस्कृति की क्षति हो गई। 
विरुपाक्ष मंदिर के समक्ष स्थापित भव्य नंदी
अरवीदु के निर्बल शासकों में भी वेकंटपतिदेव का नाम विशेषतया उल्लेखनीय है। उसने नायकों को दबाने का प्रयास किया था। बहमनी तथा मुगल सम्राट् में पारस्परिक युद्ध होने के कारण वह मुसलमानी आक्रमण से मुक्त हो गया था। इसके शासनकाल की मुख्य घटनाओं में पुर्तगालियों से हुई व्यापारिक संधि थी। शासक की सहिष्णुता के कारण विदेशियों का स्वागत किया गया और ईसाई पादरी कुछ सीमा तक धर्म का प्रचार भी करने लगे। वेंकट के उत्तराधिकारी निर्बल थे। शासक के रूप में वे विफल रहे और नायकों का प्रभुत्व बढ़ जाने से विजयनगर राज्य का अस्तित्व मिट गया।
सुरक्षा चौकी विजयनगर साम्राज्य हम्पी
विजयनगर के शासक गण राज्य के सात अंगों में कोष को ही प्रधान समझते थे। उन्होंने भूमि की पैमाइश कराई और बंजर तथा सिंचाइवाली भूमि पर पृथक्-पृथक् कर बैठाए। चुंगी, राजकीय भेंट, आर्थिक दंड तथा आयात पर निर्धारित कर उनके अन्य आय के साधन थे। विजयनगर एक युद्ध राज्य था अतएव आय का दो भाग सेना में व्यय किया जाता, तीसरा अंश संचित कोष के रूप में सुरक्षित रहता और चौथा भाग दान एवं महल संबंधी कार्यों में व्यय किया जाता था। इन शासको में कृष्णदेव राय का नाम अग्रणी रुप से लिया जाता है और कहा जाए तो उनका शासन विजयनगर साम्राज्य का स्वर्ण काल था।

विजयनगर साम्राज्य की गुप्तचर एवं दंड व्यवस्था : दक्षिण यात्रा 13

विजय नगर साम्राज्य के राजा कृष्णदेव राय ने अपने जीवन काल में 14 युद्ध किए और उनमें विजय पाई। दक्षिण में उनका एक क्षत्र साम्राज्य स्थापित हो गया। यह समय हम्पी के लिए स्वर्णकाल माना जा सकता है। इस दौरान राज्य में निर्माण भी प्रचूर मात्रा में हुए। किसी भी साम्राज्य की सुरक्षा के लिए उसकी गुप्तचर प्रणाली सुदृढ होनी चाहिए। गुप्तचर ही राजा के आँख-कान होते हैं, उनके माध्यम से ही राज्य का हाल चाल एवं षड़यंत्रों की सूचना राजा तक पहुंचती है। इन सूचनाओं का परीक्षण कर राजा शत्रुओं एवं षड़यंत्रकारियों से सचेत हो सकता है। वैसे भी इतिहास से ज्ञात होता है कि युद्ध विजयों में गुप्तचरों का विशेष योगदान रहा है।
राजा कृष्ण देव राय
गुप्त शब्द के साथ रोमांच जुड़ा हुआ है। हम्पी में भी कई गुप्त स्थान हैं, जहाँ राजा अपने गुप्तचरों एवं राज्य के विशेष अधिकारियों से गुप्त मंत्रणा करता था। शाही आवास क्षेत्र के मध्यम में एक भूमिगत गुप्त मंत्रणा कक्ष भी बना हुआ है। जिसकी छत वर्तमान में ढह गई है। इस कक्ष का निर्माण काले ग्रेनाईट से किया गया है। लगभग 15X15 लम्बाई चौड़ाई के इस कक्ष के चारों तरफ़ गलियारा है, तथा गलियारे में मशाल लगाने स्थान बने हुए हैं। वर्तमान में उन्मुक्त द्वार कभी गुप्त रहा होगा। कक्ष की छत धरती के समतल है जो वर्तमान में ढह गई है। राजा यहाँ सामरिक महत्व की चर्चा करने सेनापति और महामंत्री के साथ गुप्तचरों से भी भेंट करते रहे होंगे। कभी किसी विशेष कैदी को भी इस स्थान पर रखा जाता होगा।
गुप्त मंत्रणा कक्ष 
बाबू देवकी नंदन खत्री के उपन्यास चंद्रकांता संतति में गुप्तचरों (एयारों) एवं गुप्त कक्षों के माध्यम राज काज का खाका खींचा गया है। बताया क्या है कि गुप्तचर एक राज्य के लिए कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। भूमिगत रास्ते, गुप्त मंत्रणा कक्ष, तहखाने, गुप्त यातना गृह एवं कारावास इत्यादि राज्य की व्यवस्था के आवश्यक अंग थे। प्रत्येक किले या दूर्ग के निर्माण के समय सुरक्षा की दृष्टि से कई भूमिगत गुप्त रास्तों का निर्माण किया जाता था। जो वर्तमान में भी हमें किलों में दिखाई देते हैं। इसके साथ खजाने को भी गुप्त रखने की व्यवस्था की जाती थी। जिसकी जिम्मेदारी किसी एक विश्वसनीय के पर होती थी तथा बीजक के माध्यम से खजाने का मार्ग दर्शाया जाता था।
गुप्त मंत्रणा कक्ष का द्वार
हम देखते हैं कि किलों एवं दुर्गों में स्थित कूपों में कई कक्ष एवं द्वार दिखाई देते हैं। कई तलों में इन कूपों का निर्माण किया जाता था तथा उन तक पहुंचने के लिए पैड़ियों का निर्माण किया जाता था। यह कूप भी एक तरह से गुप्त मंत्रणा के कार्य में लिए जाते थे। जब राज्य काज संबंधी कोई आवश्यक चर्चा करनी होती थी तब इन कूपों का उपयोग किया जाता था। इसलिए कूप खनन के दौरान भी उसमें गुप्त कक्ष बनाए जाते थे। चर्चा के दौरान आवाज गुंजित न हो इसलिए दीवारों को मोटा बनाया जाता था। कई स्थानों पर दीवारें कई हाथ मोटी दिखाई देती हैं। चुनारगढ़ के किले के कुंए में भी इस तरह के गुप्त द्वार दिखाई देते हैं। इस तरह राज्य की सूरक्षा के लिए गुप्त कक्ष एवं तहखानों का निर्माण होते थे। 
विजयनगर राज्य का राजकीय आवास क्षेत्र
राज्य को चलाने के लिए दंड विधान की आवश्यकता भी होती है। कभी मानव सभ्यता का एक काल ऐसा भी जब न राजा था, न राज्य था, न दंड था, न दंड था, न दंडी था और सभी लोग मानव धर्म के अनुसार एक दूसरे का सम्मान करते हुए रक्षा करते थे। (न राज्यं न च राजासीत न दण्डो न च दाण्डिकः। स्वयमेव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम ॥)  दंड की उत्पत्ति राज्यसंस्था की उत्पत्ति के साथ हुई। महाभारत के शांतिपर्व: (56.13-33) में यह कहा गया है कि मानव जाति की प्रारंभिक स्थिति अत्यंत पवित्र स्वभाव, दोषरहित कर्म, सत्वप्रकृति और ऋतु की थी। तब दंड की आवश्यकता ही नहीं थी।
हाथी द्वारा मृत्यु दंड
किंतु कालांतर में तामस्गुणों का प्राबल्य बढ़ने लगा, मनुष्य समाज अपनी आदिम सत्व प्रकृति से च्युत हो गया और मत्स्य न्याय छा गया। बलवान् कमजोरों को खाने लगे। ऐसी स्थिति में राज्य और राजा की उत्पत्ति हुई और सबको सही रास्तों पर रखने के लिये दंड का विधान हुआ। दंड राज्य शक्ति का प्रतीक हुआ जो सारी प्रजाओं का शासक, रक्षक तथा सभी के सोते हुए जागनेवाला था। अत: दंड को ही धर्म स्वीकार किया गया। राज्य धर्मानुसार दंड की व्यवस्था सभी पर समान रुप से लागु थी, इतिहास गवाह है कि राजाओं ने भी दंड को स्वीकार कर राज्य धर्म की रक्षा की। दंड का प्रयोग करनेवाला राजा भी यदि धर्म का उल्लंघन करे तो दंड का भागी होता था। धर्म अर्थात् विधि से परे कोई न था धर्म राजाओं का भी राजा था। राज्य का प्रधान राजा अथवा अन्य कोई शक्ति, यथा गणतंत्र का मुखिया न्यायिकय संगठन का प्रधान अवश्य था, किंतु विधि का प्रधान वह कभी नहीं हो सका और विधि के उल्लंघन करने पर दंड उस पर भी सवार हो जाता था। 
दंड के लिए हाथी को उकसाते हुए
दंड चार तरह के माने गए, 1- प्रतीकारात्मक - समाज की अत्यंत प्रारंभिक अवस्था प्रतीकारात्मक दंड की थी, जिसमें आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत (फोड़ देने और उखाड़ देने) का सिद्धांत चलता था। वैदिक साहित्य की "जीवगृभ" जैसी संज्ञाएँ इस बात की द्योतक हें कि भारतीय इतिहास के अत्यंत प्रारंभिक काल का न्याय कठोर और प्रतीकारात्मक ही था। इस सिद्धान्त की मान्यता है कि एक अपराधी को कठोर दण्ड देने से दूसरे लोग अपराध करने से डरते हैं।

2- निषेघात्मक - निषेधात्मक सिद्धान्त की मान्यता है कि अपराधी को दण्ड देने से जिसके प्रति अपराध हुआ है उसे उसका 'बदला' मिल जाता है। यह सभी सिद्धान्तों में सबसे बुरा सिद्धान्त है क्योंकि इसमें समाज का कल्याण या समाज की सुरक्षा की भावना नहीं है। 

3-अवरोधक -तीसरी अवस्था में दंड का स्वरूप प्रतीकारात्मक के बदले अवरोधक हो गया। इसका कारण था दोषी मनुष्य के प्रति दोष किए गए हुए मनुष्य का निपट लेने के बजाय दंड धारण करनेवाले राज्य का बीच में आ जाना। व्यक्तिगत बदले की भावना को समाप्त कर राजकीय दंड की महिमा को स्थापित करना राज्य का उद्देश्य और उसकी बढ़ती हुई शक्ति का द्योतक हो गया। दीवानी के मामलों में अर्थदंड आदि द्वारा दोष किए गए हुए व्यक्ति को कुछ बदला दिलाना यद्यपि वैध माना गया, फौजदारी के मामलों में बदला लेना अब असंभव था। किंतु कठोर - कभी कभी तो अत्यंत क्रूर और असभ्य दंडों का दिया जाना प्राय: नियम सा था। 
विजयनगर राज्य का सार्वजनिक दंड स्थल 
4- सुधारात्मक - चौथा और सर्वोत्तम दंड का प्रकार है सुधारात्मक। सभ्यता के विकास के क्रम में भी यद्यपि सभी देशों में संभावित दोषियों के प्रति दोषों के गंभीर परिणाम और दंडयातनाओं का भय उपस्थित करने के लिय कठोर अवरोधक दंड दिए जाते रहे हैं, पर कभी-कभी सुधारात्मक प्रवृत्तियाँ भी उठती रही हैं। प्राचीन रोम में दोषी की स्वतंत्रता का हरण (जेल में डाल देना) मात्र ही सबसे बड़ा दंड माना गया और उसके बाद कोई यातना आवश्यक नहीं समझी गई । भारतवर्ष में कौटिल्य ने काराग्रस्तों को प्रायश्चित्त कराने और अपने पापों का बोध कराने की व्यवस्था के द्वारा उन्हें विशुद्ध कराने का उल्लेख  किया है।
विजयनगर राज्य के सार्वजनिक दंड स्थल पर ब्लॉगर
आज दंड विधान की चर्चा करने का उद्देश्य था कि हम्पी यात्रा के दौरान प्राचीन विजयनगर राज्य में भी दंड की व्यवस्था के प्रमाण दिखाई देते हैं, जहाँ कारागार में निरुद्ध करने एवं सार्वजनिक रुप से दंड देने की प्रथा दिखाई देती है। राजमहल के लगे हुए दशहरा उत्सव स्थल के समीप सार्वजनिक रुप से दंड देने के लिए मुख्य मार्ग पर दो स्तंभ गड़े दिखाई देते हैं। इन स्तंभों के छिद्रों में लकड़ी डालकर अपराधी को हाथों से उसमें बांध दिया जाता था। यहाँ उसे प्रजा की उपस्थिति में सार्वजनिक रुप से दंड दिया जाता था। यह दंड सार्वजनिक रुप से कोड़े मारने से लेकर शीश विच्छेद तक का हो सकता था। किसी भी राज्य के संचालन के लिए साम, दाम, दंड एवं भेद की प्राचीन पद्धति लागु होती है। क्रूरतम अपराधी एवं राजद्रोही को कठोर दंड का विधान था।




पत्थर के दरवाजे एवं खराद का प्राचीन कार्य : दक्षिण यात्रा 14

म्पी यात्रा कई मायनों में सार्थक रही, कुछ ऐसी चीजें देखने मिली जो अन्य स्थानों पर दिखाई नहीं देती। विजयनगर साम्राज्य का वैभव एवं उसके भवनों की भव्यता आज भी दिखाई देती है और पर्यटक को विस्मित कर देती है। यहां के निर्माणों को देखकर उसे सोचना पड़ता है कि इसका निर्माण मनुष्यों द्वारा ही किया गया है या किसी अन्य ग्रह के प्राणियों द्वारा। वैसे भी वर्तमान में डिस्कवरी चैनल पर तो इस तरह के निर्माणों को सीधे-सीधे ही परग्रहियों द्वारा निर्मित करार दे दिया जाता है और मनुष्य के कार्यों पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया जाता है।
हम्पी स्थित प्रस्तर द्वार
हम्पी का राजनिवास 59000 मीटर के क्षेत्र में फ़ैला हुआ है, यह विजयनगर का पुरातन हिस्सा है, जिसमें हरिहर बुक्का से लेकर राजा कृष्ण देव राय द्वारा निर्मित भवनों का जखीरा है। यह एक आहते से घिरा हुआ जिसमें तैतालिस भवन हैं। यह क्षेत्र ऊंची दोहरी दीवारों से घिरा हुआ है। आहते में तीन प्रवेश द्वार हैं, दो द्वार उत्तर एवं एक द्वार पश्चिम में। यहीं से आहते में प्रवेश के लिए मुख्यद्वार है तथा इसके समीप ही नवरात्रि एवं दशहरा उत्सव मनाने के लिए विशाल मंच बनाया गया है जिसे "महानवमी डिब्बा" कहते हैं। इस मंच पर ही उत्सव के कार्यक्रम होते थे। 
हम्पी स्थित प्रस्तर द्वार
इसके समीप ही कड़प्पा पत्थर से निर्मित दो किवाड़ रखे हुए हैं। इनकी ऊंचाई लगभग 13 फ़ुट एवं चौड़ाई साढे तीन फ़ुट (बंद होने पर लगभग सात फ़ुट) होगी। ये दरवाजे बेड़ीदार बने हुए हैं। आज भी छत्तीसगढ़ अंचल में बबूल की लकड़ी के इस तरह के किवाड़ों (नौबेड़िया) का ग्रामीण अंचल में बहुतायत से उपयोग होता है। इस पत्थर के किवाड़ों का निर्माण शिल्पकार ने बड़ी कुशलता से किया है। दूर से देखने से प्रतीत नहीं होता कि ये किवाड़ पत्थर के होगें। लकड़ी द्वारा निर्मित किवाड़ो की सभी बारीकियों को कील समेत कुशलता से उकेरा गया है। चौखट में स्थापित करने के लिए इनमें नीचे तरफ़ मोटी कील बनाई गई हैं तथा पीछे की तरफ़ बंद करने के लिए अर्गल लगाने के छेद भी बनाए गए हैं।
हम्पी स्थित प्रस्तर द्वार
कहते हैं कि इस किवाड़ों का उपयोग आहते में प्रवेश करने वाले मुख्यद्वार में किया गया था। इसको खोलने एवं बंद करने के लिए हाथियों का उपयोग किया जाता था। इसे खोलना एवं बंद करना आदमी के बस की बात नहीं थी। परन्तु इन किवाड़ों के अवलोकन के पश्चात मुझे नहीं लगा कि कभी इनका उपयोग किया गया होगा। क्योंकि किवाड़ों में बनी धूरी (कील) में चिकनाई नहीं थी। वह वैसी ही खुरदरी हैं जैसी निर्माण के समय होगी। अगर इन किवाड़ों का उपयोग किया गया होता तो इनकी धूरी खोलने एवं बंद करने के घर्षण के कारण चिकनी होती। जब यह जानने के लिए मैंने धूरी का स्पर्श किया तो बस मुझे यही बात खटक गई थी। हो सकता है इन किवाड़ों का उपयोग छद्म द्वार के रुप में या दिखावटी द्वार के रुप में किया गया हो।
लेथ (खराद) मशीन में निर्मित होता स्तंभ
राजाओं नें हम्पी में जो निर्माण कार्य किए उसको देखकर देशी-विदेशी चकित रह जाते हैं। विशालकाय एकाश्म शिलाओं की प्रतिमाओं के साथ भव्य मंदिरों एवं भवनों का भी निर्माण हुआ। मंदिरों के निर्माण में विशेषता दिखाई देती है। कई मंदिरों के स्तंभ गोलाकार एवं खरादे हुए हैं। इन स्तभों का निर्माण काले कणाश्म (कड़प्पा) पाषाणों से हुआ है। इन स्तंभों को देख कर मैं सोच रहा था कि इनका निर्माण कैसे किया गया होगा?
लेथ (खराद) मशीन एवं उसपे निर्माण कार्य
हम्पी भ्रमण के दौरान मुझे इसके प्रमाण अनायास ही मिल गए, ढूंढने के लिए अधिक श्रम नहीं करना पड़ा। दशहरा उत्सव स्थल के समीप मुख्य मार्ग पर अपराधियों को सजा देने के लिए लगाए गए स्तंभों के मध्यम में दो पत्थर रखे हुए हैं, जिन पर खराद (लेथ) करने के चिन्ह दिखाई दे रहे थे। इन्हें देखने के पता चलता है कि लगभग 15 फ़ुट लम्बाई एवं 3X3 फ़ुट के प्रस्तरों का वजन सहने लायक वह कौन सी खराद मशीन होगी, जिस पर इन स्तंभों को तराशा गया होगा और उसके संचालन के लिए कौन सी उर्जा का उपयोग किया गया होगा?
हम्पी के राजमार्ग पर स्तम्भ अवसेष
भारत में लोहे की खोज बहुत पहले हो गई थी। लोहे से इस्पात भी बनाया जाने लगा था। दक्षिण की दमिश्त तलवारें विश्व प्रसिद्ध थी, उनकी धार एवं मजबूती का लोहा दुनिया मानती थी और यहाँ से उनका निर्यात भी बड़ी मात्रा में होता था। खराद मशीन के निर्माण के लिए इसी लोहे का प्रयोग किया गया होगा तथा चक्र की योजना से खराद बना कर इन स्तभों को कुशल कारीगरों द्वारा तराशा गया होगा। वर्तमान में कणाश्म (ग्रेनाईट) पाषाण को काटने के लिए डायमंड कटर का उपयोग किया जाता है, तब कहीं जाकर यह कठोर पाषाण कटता है। 
लेथ से खरादे गए स्तंभ हम्पी
पन्द्रहवीं शताब्दी में कारीगरों ने ग्रेनाईट काटने के लिए मजबूत लोहे के औजार बनाए और उनसे इन पत्थरों को तराशा। यह उस काल की आश्चर्यचकित करने वाली उत्तम तकनीक थी। विशाल चट्टानों को मशीन पर रज्जु चक्र यंत्र (चैन कुप्पी) की मदद से स्थापित किया जाता होगा और उसका सेंटर लेकर मशीन में बांधा जाता होगा। पन्द्रहवीं सदी में विद्युत का अविष्कार नहीं हुआ था इसलिए मशीन को चलाने के लिए पशुबल का उपयोग किया जाता था। जिस तरह तेल निकालने की मशीन या रहट चलाने के लिए चक्रों का प्रयोग किया जाता था उसी प्रकार इस मशीन को चलाने के लिए चक्रों का प्रयोग किया गया होगा एवं पशुओं के बल से मशीन संचालित होती होगी।
वृषभ शक्ति से चलित जयगढ़ राजस्थान की प्राचीन लेथ (खराद)
इस मशीन का जीवंत उदाहरण हमें राजस्थान के जयपुर के जयगढ़ दुर्ग 1726 ईं में दिखाई देता है। यहाँ विश्व की सबसे बड़ी तोप "जय बाण" का निर्माण हुआ था। दुर्ग के भीतर तोप बनाने का कारखाना है, जिसमें तोप की ढलाई के बाद उसे वास्तविक रुप देने एवं उसमें छेद करने के लिए पशु संचालित खराद मशीन का उपयोग किया गया था। यह मशीन बैलों से चलती थी। इसे आज भी सुरक्षित रखा गया है। मशीन संचालन की प्रणाली जानने के लिए यह एक अच्छा उदाहरण है। कई वर्षों पहले मैने इस मशीन को देखा था और इसकी संचालन की प्रणाली को समझा था। लकड़ी, लोहे तथा पत्थर को तराशने के लिए खराद मशीन का अविष्कार निर्माण कार्य में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया होगा।

रामायणकालीन किष्किन्धा (हम्पी) एवं उसकी जलप्रबंधन प्रणाली : दक्षिण यात्रा 15

आरम्भ से पढ़ें
हम्पी के विषय में मान्यता है कि यह रामायण काल का वानर राज्य किष्किन्धा है। शायद इसकी वजह यहाँ के वानर रहे होगें। हम जानते हैं कि हम्पी मंदिरों का शहर है, पम्पा का अपभ्रंश हम्पी नाम है। पम्पा तुंगभद्रा नदी का पुराना नाम है। हम्पी इसी नदी के किनारे बसा हुआ है। हम्पी से पहले एनेगुंदी विजयनगर की राजधानी हुआ करती थी। हम्पी को राजधानी बनाने के पीछे मूल कारण यहाँ की भौगौलिक संरचना है। चारों तरफ़ पहाड़ी से घिरे होने के कारण सुरक्षा की दृष्टि से इसे बसाया गया तथा राजधानी के लिए जल उपलब्ध कराने के लिए तुंगभद्रा नदी भी थी। मनुष्य को जीवन रक्षा के लिए जल की आवश्यकता होती है, जहाँ प्रचूर मात्रा में जल उपलब्ध हो और सामरिक दृष्टि से सुरक्षित हो ऐसे स्थान पर ही राजधानी बनाई जाती थी।
हम्पी नगर का माडल जिसके माध्यम से जलापुर्ति प्रबंध को बताया गया है।
हम्पी बहुत बड़ा नगर है, कल्पना से भी बड़ा। इसकी तुलना रोम से की जा सकती है। भवनों एवं मंदिरों का नगर है यह। विशाल क्षेत्र में जल पहुंचाने के लिए जल प्रबंधन प्रणाली का विकास बहुत ही नायाब तरीके से किया गया है। यहाँ का जल प्रबंधन तत्कालीन अभियांत्रिकी बड़ी मिशाल है। कर्नाटक की सबसे बड़ी नदी तुंगभद्रा इसी भूभाग से बहती है और इस भूभाग की संरचना ऐसी है कि बहती हुई नदी अचानक अपनी ऊंचाई खोकर नीचे की ओर आती है, परिणामतः यह अत्यधिक गति पकड़ लेती है और प्रचंड वेग से बहती है। बस इसी वेग का सदूपयोग यहाँ की जटिल जल प्रणाली को संचालित करने के लिए किया गय।
प्रणालिकाओं के माध्यम से तुंगभद्रा नदी जल वितरण प्रबंध

पत्थर की नालियाँ बनाकर शाही इलाके में जल लाया गया। नदी के वेग का उपयोग कर मुख्य प्रणालिका द्वारा जल शहर में आता था तथा उसके पश्चात अन्य लघु प्रणालिकाओं द्वारा इसे विभाजित कर अन्य स्थानों पर भेजा जाता था। विरुपाक्ष मंदिर में विशाल पाकशाला है। एक समय में यहाँ हजारों लोगों के लिए भोजन प्रसाद की व्यवस्था होती थी, तुंगभद्रा नदी का शीतल जल प्रणालिकाओं के माध्यम में पाकशाला में निरंतर वर्तमान में भी प्रवाहित हो रहा है। पाकशाला में जल की व्यवस्था करने के लिए किसी कुंए या बावड़ी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
विरुपाक्ष मंदिर के भोजनालय में प्रणालिका के माध्यम से तुंगभद्रा से सतत जलापूर्ति
प्रणालिकाओं से नदी का जल शहर में लाकर उसे लघु प्रणालिकाओं द्वारा विभाजित कर पुष्करी को भी भरा जाता था। शाही आवास क्षेत्र में काले कड़प्पा पत्थर से निर्मित एक सुंदर पुष्करी है, जिसे नदी के जल से भरने की व्यवस्था की गई है। इसके बाद आवास क्षेत्र के मध्य में एक कुंआ है जिसे नदी के जल से भर दिया जाता था। उसके पश्चात कुंए के जल का उपयोग किया जाता था। कुंए से जल निकाल कर प्रणालिकाओं के माध्यम से आगे बढा दिया जाता था। इससे राज निवास, सैनिक छावनी, महानवमी दिब्बा, अंत:पुर एवं अन्य आवासों तक समुचित व्यवस्था की जाती थी। 
की होल कूप हम्पी
शाही आवास के मध्य में मुख्य मार्ग के समीप घुड़साल है, जहाँ आगंतुक अपने अश्वों को बांध कर विश्राम देते थे। यहाँ पर लगभग 40 फ़ुट लम्बे एकाश्म पत्थर की नांद (खेळ) रखी हुई है, जिसका उपयोग पशुओं की प्यास बुझाने के लिए किया जाता था। हम्पी नगर में एक शानदार तकनीक का उपयोग कर जल प्रबंधन किया गया है। यहाँ राजधानी का निर्माण करना तुलुवा वंश के शासकों के लिए दूर दृष्टि का परिचायक था। विजय नगर साम्राज्य सारे दक्षिण में छा गया और एक सुदृढ़ राज्य बना, भले की कालखंड पृथक हो परन्तु मगध से कम करके नहीं आँका जा सकता

हम्पी के रनिवास का कमल महल एवं सुरक्षा प्रबंध : दक्षिण यात्र 16

किसी भी राज्य का सबसे सुरक्षित एवं संरक्षित स्थल रनिवास या जनानखाना हुआ करता था। ऐसा ही विजयनगर साम्राज्य में भी था। लगभग पचीस फ़ुट ऊंची पत्थर की दीवारों से घिरा हुआ जनानखाना यहां भी है। इसे किसी गढ़ के सदृश सुरक्षित बनाया गया है। 
जनानखाना हम्पी का प्रवेश द्वार
जनानखाना की सुरक्षा एवं आठों पहर निगरानी की के लिए वाच टावर बनाया हुआ है। जिस पर चढ कर दूर तक देखा जा सकता है। जनानखाना परिसर काफ़ी बड़ा है, इसमें रानी महल एवं कमल महल प्रसिद्ध है। इसके के समीप ही कोषागार स्थित है तथा कमल महल के पीछे हाथी खाना भी है। जहाँ राजकीय हाथी रखे जाते थे।

जनानखाना हम्पी में कमल महल का द्वितलीय भवन
जनानखाना में प्रवेश के लिए छोटा सा द्वार है। यहां प्रवेश शुल्क लिया जाता है। रानी महल का सिर्फ़ अधिष्ठान ही दिखाई देता है। बाकी भवन तो नष्ट हो चुका है। जनानखाना में महिलाओं के उत्सव मनाए जाते थे तथा यह राजपरिवार की महिलाओं के ग्रीष्मकालीन निवास के रुप में भी प्रयुक्त होता था।
कमल महल एवं सुरक्षा स्तंभ
यहां आमोद प्रमोद के साधन भी उपलब्ध कराए जाते थे। जिससे जनानखाना की महिलाओं का मनोरंजन होता रहे। जनानखाने में दर्शनीय सिर्फ़ कमल महल ही है। यही भवन बचा हुआ है, वरना सभी नष्ट हो गए। भारतीय एवं इस्लामिक शैली के मिश्रण निर्मित किया गया है।
प्रस्तर परकोटे से घिरा हुआ कमल महल
कमल महल को वास्तुकार ने ग्रीष्मकालीन भवन के रुप में निर्मित किया है। इसकी भित्तियों में सिरेमिक की नालियां बनाकर स्थापित की गई हैं, जिसमें सायफ़न पद्धति से जल प्रवाह बनता था और भवन ग्रीष्मकाल में शीतल रहता था। यह दुमंजिला भवन है। इसकी छत का निर्माण मेहराबों पर हुआ है। 
रानी महल के अवशेष एवं वाच टावर
भवन के निर्माण में ईंटों एवं चूने सुर्खी का प्रयोग किया गया है। द्वारों पर पुष्प वल्लरियों का सुंदर अलंकरण किया गया है। इन द्वारों के इस हिसाब से बनाया गया कि निरंतर वायु का प्रवाह बना रहे। जिससे भवन गर्म न हो। इस भवन की छत कमल की पंखुड़ियों जैसे निर्मित की गई हैं, इसलिए इसे कमल महल कहा जाता है।
कमल महल का वातानुकूलन प्रबंध
इस भवन में एक विशिष्टता मुझे यह दिखाई दी कि इन्डो इस्लामिक शैली में निर्मित होने के बाद भी इसके द्वार शीर्ष पर कीर्तिमुख का अंकन किया गया है। कीर्तिमुख के निर्माण का विधान सिर्फ़ शिवालयों में ही दिखाई देता था। कीर्तिमुख शिवगण है तथा शिव से वरदान प्राप्त  होने के पश्चात ही इसे मंदिरों की भित्ति में स्थान मिला। हो सकता है कि इस भवन का उपयोग रनिवास में धार्मिक कर्मकाण्डों एवं उत्सवों के लिए किया जाता रहा होगा, क्योंकि निवास भवनों में कीर्तिमुख अलंकरण का विधान नहीं है। जहाँ देव स्थापित हो वहीं कीर्तिमुख रहते हैं।
कमल महल के द्वार शीर्ष पर कीर्तिमुख अलंकरण
हम्पी सम्पन्न राज्य था, यहां की सड़कों पर बेशकीमती पत्थरों की दुकाने लगा करती थी। देश विदेश से व्यापारी अपनी श्रेष्ठतम वस्तुएं यहां विक्रय के लिए प्रदर्शित करते थे। जिस तरह मुगलों के समय में रनिवास में मीना बाजार लगाया जाता था उसी तरह यहां के रनिवास में मीना बाजार लगाया जाता रहा होगा। जिससे जनानखाने के लिए स्त्रियां अपनी पसंद का सामान खरीद सकें।

कमल महल का वातानुकूलन प्रबंध
हम्पी में धन और वैभव की कोई कमी नहीं थी। विट्ठल मंदिर एवं महानवमी दिब्बा की भित्तियों पर विदेशी व्यापारियों को प्रदर्शित किया है। इससे तय है कि यहां विदेशी व्यापारियों की पहुच हम्पी तक थी। बेशकीमती सामान एवं राज परिसर की स्त्रियों की सुरक्षा के लिए जनानखाने को सुरक्षित निर्मित किया गया है। 

द्रविड़ शिल्पकला उत्कृष्ट हजार राम मंदिर : दक्षिण यात्रा 17

आरम्भ से पढ़ें
निवास से हम हम्पी के शाही आवासीय परिसर के प्रवेश द्वार पर स्थित हजार राम मंदिर पहुंच गए। पन्द्रहवीं सदी में कड़प्पा प्रस्तर से निर्मित यह राजा का निज मंदिर है, इस मंदिर में राजपरिवार द्वारा पूजा की जाती थी। यह जनाना आवास के समीप ही है।  कहा जाता है कि इसका निर्माण राजा कृष्णदेव राय ने अपने कार्यकाल में करवाया था।
हजार राम मंदिर का मुख्य मंडप
इसके सामने सुपारी बाजार है और मंदिर के गर्भगृह से समक्ष स्थापित गरुड़ स्तंभ दिखाई देता है। शाही आवासीय परिसर में स्थित इस मंदिर की शिल्पकला देखने लायक है। रामायण के कथानकों को भित्तियों में स्थान दिया गया है, रामकथा के हजार प्रसंगों का शिल्पाकंन करने के कारण इसे हजारराम मंदिर नाम दिया गया।
हजार राम मंदिर का महामंडप  एवं गर्भ गृह

मंदिर के गर्भगृह में वर्तमान में कोई प्रतिमा स्थापित नहीं है। मुख्य मंडप में काले ग्रेनाईट के चार अलंकृत स्तंभों का प्रयोग किया गया है। इन्हे पॉलिश करके चिकना किया गया है। इन स्तभों पर राम सीता, विष्णु, उमा महेश्वर, मुरलीधर एवं अन्य देवी देवताओं को स्थान दिया गया है। 
महामंडप के अलंकृत स्तंभ एवं गर्भगृह
मुख्य मंडप का वितान चतुष्कोणीय जिसमें सुंदर पद्मांकन किया गया है। मंदिर के मुख्यद्वार के शिलापट पर गजाभिषिक्त लक्ष्मी का अंकन है। मंदिर की बाहरी एवं भीतरी भित्तियों पर प्रचूर मात्रा में रामायण के कथानकों के साथ अन्य देवी देवताओं को भी स्थान दिया गया है। मुख्यद्वार पर एक तरफ़ महिषसुर मर्दनी एवं दूसरी तरफ़ भैरव की प्रतिमा बनाई गई है।
हजाराराम मन्दिर के द्वार पर भैरव अंकन
भगवान विष्णु को समर्पित यह भव्य मंदिर है,  इसका निर्माण राजपरिवार के धार्मिक अनुष्ठानों के लिए किया गया था। विशेष पर्वों पर आमजनता को भी इस मंदिर में दर्शन की अनुमति दी जाती रही होगी। यह मंदिर द्रविड़ शिल्पकला का अनुपम उदाहरण है। 
हजाराराम मन्दिर के द्वार पर महिषासुर मर्दनी अंकन
इसकी योजना में एक गर्भगृह, एक अंतराल, एक मुख मंडप तथा उत्तर-दक्षिण में अर्ध मंडप निर्मित हैं। पुर्व दिशा में विस्तारित सुंदर महा मंडप है। मंदिर की उत्तर दिशा में देवी का अलंकृत मंदिर भी है। हजारराम मंदिर अपने पॉलिश किए गए स्तंभों के कारण अलग पहचाना जाता है।
हजाराराम मंदिर की भित्ति पर रामायण के प्रसंगो का प्रदर्शन
भित्तियों पर अंकित प्रतिमाओं के मैने कुछ चित्र लिए, समय इतना नहीं था कि पूरी रामायण को अपने कैमरे में कैद कर सकूं। कुछ शिल्पांकन रामायण से हट कर भी दिखाई देता है, एक स्थान पर मुझे विष कन्याओं का शिल्पांकन भी दिखाई दिया। जो हाथ में फ़णीधर नाग लेकर उससे खेलती हुई दिखाई दे रही हैं। 
हजाराराम मन्दिर की भित्ति पर विष कन्या का अंकन
इसके साथ  ही सैनिक दल, आखेट, नृत्यांगनाओं एवं अन्य राजकीय गतिविधियों को भी दर्शाया गया है। हम्पी के सन्य मंदिरों की तरह इस मंदिर की छत से उपर का निर्माण ईंटों से किया गया है तथा सूर्खी एवं चूने की सहायता से प्रतिमाओं का निर्माण भी किया गया है, जो अभी क्षरित हो रही हैं। 
रामायण के प्रसंग में राजा दशरथ तीनो रानियों को यज्ञ शेष खीर का वितरण करते हुए
जिस तरह उत्तर भारत के मंदिरों में प्रत्येक मंदिर में मिथुन शिल्प को भी स्थान दिया गया है, वहीं हम्पी के मंदिरों में मिथुन प्रतिमाओं का लगभग अभाव ही है, अन्य किसी मंदिर में मुझे मिथुन प्रतिमाएं दिखाई नहीं दी। सिर्फ़ हजार राम मंदिर में अपवाद स्वरुप एक मिथुन भित्ति प्रतिमा दिखाई देती है। 
हजारराम मंदिर का इकलौता मिथुनांकन
शायद इस काल में मंदिरों में मिथुन प्रतिमाओं का अंकन कम हो गया होगा या मिथुन प्रतिमाओं के सार्वजनिक प्रदर्शन से बचा जाता होगा। कुछ भी हो सकता है, परन्तु एक मिथुन प्रतिमा का मिलना अपवाद ही माना जा सकता है। कुल मिलाकर हजार राम मंदिर द्वविड़ शिल्पकला का उत्कृष्ट प्रदर्शन करता है।

हम्पी की यादें लिए तेनाली राम के साथ लेपाक्षी ओर: दक्षिण यात्रा 18

प्राचीन हम्पी नगर पचीस किमी के दायरे में फ़ैला हुआ है, इसके सभी स्मारक देखने के लिए कई दिनों का समय चाहिए। हमारे पास गाड़ी थी, ठहरने खाने की व्यवस्था थी, पर समय नहीं था। इसलिए इस यात्रा को अधूरी छोड़कर ही जाना था। यहां कृष्ण मंदिर, अच्यूतानारायण मंदिर, माता मंदिर, जैन मंदिर, यल्लमा मंदिर आदि कई स्मारक हैं, जिन्हें हम नहीं देख सके। चलते चलते हमने यहाँ का पुरातत्विक संग्रहालय अवश्य देखा। यहां हम्पी से प्राप्त प्रतिमाएं रखी हुई हैं। गंगाधर को नगर के चौराहे पर छोड़ते हुए हम 11 मार्च को सुबह साढे दस बजे बेल्लारी की ओर चल दिए। फ़िर इतनी कम अवधि में हमने गुनने लायक तो हम्पी देख लिया था। 
राज कृष्ण देव राय अपनी दोनो पत्नियों चिन्ना देवी एवं तिरुमल देवी संग
विजयनगर साम्राज्य की बात हो और तेनाली राम का जिक्र न आए तो यह बहुत ना इंसाफ़ी होगी। तेनाली राम के किस्से बचपन  में पढकर बड़े हुए। वह एक चतुर व्यक्ति था, जो समस्याओं का समाधान चुटकियों में निकाल लेता था। जिस तरह अकबर ने अपने दरबार में नव रत्न नियुक्त किए थे, उसी तरफ़ राजा कृष्णदेव राय ने अपने अपने दरबार में अष्टदिग्गज नियुक्त कर रखे थे। इन्ही में से एक दिग्गज तेनाली राम था। तेनाली राम का कार्यकाल 1509 से 1529 ईस्वीं तक बताया जाता है। वह अपने बीस वर्ष के कार्यकाल में  ही इतना प्रसिद्ध हो गया कि उसे पाँच सौ वर्षों के बाद आज भी याद किया जा रहा है। 

तेनाली राम जन्म से शैव था, लेकिन बाद में उसने वैष्णव धर्म अपना लिया और अपना नाम  रामकृष्ण कर दिया।  शैव और वैष्णव उस समय में हिन्दू धर्म के दो विपरीत विपरीत संप्रदाय थे। इसका जन्म 16 वी सदी के आरम्भ में तेलगु ब्राह्मण परिवार में हुआ था।  ऐसा माना जाता है कि उनका जन्म आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के एक तेनाली नामक एक नगर में हुआ था।  तेनाली के पिताजी गरलाप्रति रमय्या तेनाली नगर के रामालिंगेश्वर स्वामी मन्दिर में पुजारी थे।  उसके पिता की मौत के बाद तेनाली राम को उसके चाचा ने पाला था | उसके जाति के धार्मिक रीती रिवाजो के कारण उन्हें शिक्षा नही दी गई।

तेनाली राम “भगवत मेला” नाम के एक प्रसिद्ध मंडली के साथ विजयनगर पहुचे।  उसके प्रदर्शन से प्रसन्न होकर कृष्णदेवराय ने उसे अपने दरबार में हास्य कवि के रूप में रख लिया और बाद में वो अष्टदिग्गज में शामिल हो गये। ऐसा माना जाता है कि तेनाली राम ने अपनी बुद्धि और रणनीति से समय समय पर विजयनगर साम्राज्य को दिल्ली सल्तनत से बचाया था। बुद्धिमता के मामले में तेनाली राम की बीरबल से तुलना कर सकते है परन्तु बीरबल की तरह तेनाली राम धनवान नही था। 

तेनालीराम के चरित्र की यह खासियत थी कि वो कभी भी बड़े से बड़े शत्रु के आगे हारा या झुका नही। हमेशा उसके पास एक ऐसा छिपा हुआ दांव रहता था, जिससे विरोधियो के छक्के छुट जाते थे। इसके अलावा तेनालीराम के पास जनता के विश्वास का सबसे बड़ा बल था। वो हर बार राजा कृष्णदेव राय को हवाई बातो से बचाकर अपनी जमीन और जनता के दुःख दर्द से जुड़े रहने को प्रेरित करता था।  इसके लिए वो हास्य का भरपूर इस्तेमाल करता था। 

तेनालीरामा अपने समय का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति था, जिसका हमेशा अपने समय , समाज और प्रजा के हालात की नब्ज पर हाथ रहता था। तेनाली राम के काव्य पांडूरंगा महात्यम को तेलुगु साहित्य के पांच महान काव्यो में एक गिना जाता है। तेनाली राम के जीवन पर तेलगु और तमिल भाषा में नाटक भी रचे गये। तेनाली राम के किस्से भारत के सभी भाषा भाषियों की जुबान पर है। उसके किस्सों का भारत की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ और बच्चों को उसके चतुराई भरे किस्से बड़े रोचक लगते हैं। 
बेल्लारी जिले का ग्रामीण इलाका
तेनाली राम की याद चल रही थी, हमको आज किसी भी हालत में लेपाक्षी मंदिर देखते हुए रात तक बैंगलोर पहुंचना था। गाड़ी सपाटे से चल रही थी। हमारे राड़ार पर लेपाक्षी मंदिर पहले थे उसके बाद बैंगलोर। हम्पी से बेल्लारी लगभग 60 किमी, बेल्लारी से लेपाक्षी 220 किमी तथा लेपाक्षी से बैंगलोर 125 किमी था। इस तरह हमें कुल चार सौ किमी से अधिक चलना था। बेल्लारी पहुंचने से पहले जी पी एस ने शहर से बाईपास कर दिया। हम सिंगल रोड़ पर आ गए। ग्रामीण इलाका था। सड़क किनारे गाँव और खेत। ग्रामीण इलाके में यही दिखाई देता है। इस सड़क पर हमारे साथ ऐसी दुर्घटना घट गई कि जो जिन्दगी भर के लिए सबक दे गई और कभी भूली नहीं जाएगी।

राह में ऐसा भी होता है : दक्षिण यात्रा 19

होता है, होता है, ऐसा भी होता है। जब हम यात्रा पर निकलते हैं तो कई तरह की चुनौतियों का सामना भी करना पड़ता है। कुछ चुनौतियाँ प्रकृतिजन्य होती हैं, कुछ परिस्थितिजन्य तो कुछ स्वजन्य।। हम्पी से हम बेल्लारी होते हुए अनंतपुर की ओर लौट रहे थे। बेल्लारी शहर में प्रवेश करने पूर्व जीपीएस ने एक शार्टकट रास्ता दिखाया और हम उस पर ही चल पड़े। यह रास्ता ग्रामीण इलाके बीच से होकर चल रहा था। सिंगल रोड़ था, दोनो ओर खेत और हम कर्नाटक एवं आन्ध्र के सीमावर्ती क्षेत्र के ग्रामीण अंचल से भी परिचित हो रहे थे।
ग्रामीण अंचल की सड़क एवं स्कूल से लौटते बच्चे
एक गाँव में मिर्चों के खेत दिखाई दिए, पाबला जी ने मिर्चों की फ़ोटो लेने के लिए गाड़ी रोकी। मेरा फ़ोटो लेने का मुड नहीं था, इसलिए गाड़ी में ही बैठा रहा। गाड़ी स्टार्ट थी क्योंकि एसी चल रहा था। पाबला जी फ़ोटो ले रहे थे, तभी मुझे विपरीत दिशा में कपास के खेत दिखाई दिए। मैने सोचा कि लगे हाथ कपास के खेतों की फ़ोटो ले ली जाए। कभी काम आ सकती है। मैं भी गाड़ी से बाहर आ गया और फ़ोटो लेने लगा। पाबला जी ने कैमरे से फ़ोटो लेकर उसे अपनी सीट पर रखा और दरवाजा बंद कर मोबाईल से भी फ़ोटो लेने लगे। जब मैं फ़ोटो लेकर लौटा और दरवाजा खोलने लगा तो खुला ही नहीं। मैं पाबला जी को आवाज दी, दरवाजा लॉक हो गया है। 

मिर्च के खेत
उन्होंने आकर देखा तो सारे दरवाजे लॉक हो गए हैं। गाड़ी के साथ एसी भी चालु था। अब माथे पर पसीने के साथ चिंता की लकीरें भी उभर आए। क्या किया जाए? मैने तो तत्काल निर्णय ले लिया कि अब एक बड़े पत्थर से कोई कांच फ़ोड़ा जाए और समस्या का हल निकाला जाए। पाबला जी थोड़ी देर पेड़ की नीचे खड़े रहे और मारुती एजेंसी में फ़ोन लगाया। उसने कहा कि थोड़ी देर में सोच के बताता हूँ क्या किया जाए। फ़िर उसे फ़ोन लगाया तो बोला स्केल से लॉक खुल सकता है। इतना तो हमें पता था, पर स्केल कहाँ से लाएं? हमारे सारे औजार तो गाड़ी में बंद हो चुके थे। तब मैं पास ही खेत में मिर्च तोड़ रहे लोगों के पास गया कि कोई स्केल या पट्टी मिल जाए। पर उन्हें सिर्फ़ तेलगु या कन्नड़ बोली आती थी। न वे मेरी बात समझ पाए, न मैं उन्हें समझा पाया, गाड़ी के पास लौट आया।
कपास के खेत
लगभग आधे घंटे से अधिक समय बीत चुका था। हम किंकर्तव्यविमूढ होकर सड़क पर खड़े थे। सोच रहे थे कि इस समस्या का क्या समाधान निकाला जाए। फ़िर मैने एक युटिलिटी वाहन वाले को रोका, उससे स्क्रूडायवर मांगा तो उसके पास छोटा स्क्रूडायवर मिला। ड्रायवर साईड के दरवाजे को उससे खोलने की कोशिश की। उस गाड़ी के ड्रायवर ने अपनी गाड़ी की चाबियाँ लगाकर देखी कि दरवाजा खुल जाए, पर सारे प्रयास विफ़ल रहे। आखिर निर्णय लिया गया कि पीछे के साईड कांच का रबर लॉक निकाल कर कांच निकाला जाए, फ़िर उस रास्ते से लॉक खोला जाए। स्क्रूडायवर से रबर लॉक खोला गया तो कांच बाहर आ गया।
चाबी निकालने में सहयोग देन वाले 
उस समय खेत से एक लड़का भी आ गया था, उसे गाड़ी के भीतर घुसाया गया और उसने दरवाजे की खूंटी उठाई और वह खुल गया। इस प्रक्रिया में एक घंटा लग गया। गाड़ी एक घंटे तक स्टार्ट रही। फ़िर हमने कांच का रबर लगाया और वह फ़िट हो गया। तब चलकर आगे की यात्रा प्रारंभ हुई। हुआ यूँ कि जब पाबला जी ने ड्रायवर साईड का दरवाजा खोलकर कैमरा रखा और उसे बंद किया तो झटके से लॉक की खूंटी थोड़ी सी नीचे सरक गई और गाड़ी के सभी दरवाजे लॉक हो गए। एक घंटे तक स्टार्ट गाड़ी में तेल अलग जला और समय के साथ दिमाग अलग खराब हुआ। पर हर हादसा एक सबक देता है। हमने इससे भी सीखा, सफ़र चलते एक चुनौती सामने आई और उसका हल भी ढूंढ़ा और कांच तोड़ने जैसे नुकसान से भी बचे।
ग्रामीण अंचल की बैल गाड़ी
एक घंटे की मशक्कत के बाद हमारी गाड़ी आगे बढी। पाबला जी सपाटे से ड्राईव कर रहे हैं, उनके मन में क्या चल रहा था ये तो मुझे पता नहीं, पर मैं एक घंटा बरबाद होने की सोच रहा था। क्योंकि हमें लेपाक्षी जाना था और अंधेरा होने से कुछ नहीं देख पाते। ग्रामीण इलाके की सड़क ने हमारा बहुत समय बरबाद किया। अगर इसे सकारात्मक तौर पर ले तो हमने यहां से बहुत कुछ सीखा तथा कर्नाटक एवं आंध्र की सीमा के गांव भी देख लिए। इस इलाके में बंजर जमीन बहुत अधिक है। इसलिए लोग मिर्च कपास आदि की खेती करते हैं। ग्रामीण इलाके से निकल पर हम हाईवे पर आ गए। हाईवे पर गाड़ी अपनी रफ़्तार में आ गयी। एक होटल में रुक कर भोजन किए और फ़िर लेपाक्षी की ओर चल दिए।

वीरभद्र स्वामी मंदिर लेपाक्षी का झूलता हुआ स्तंभ : दक्षिण यात्रा 20

आरम्भ से पढ़ें 
नंतपुर बैंगलोर हाईवे पर लगभग 110 किमी की दूरी पर कोडीकोन्डा नामक गाँव है, यहीं से 17 किमी पश्चिम में लेपाक्षी मंदिर स्थित है। सांझ ढलने लगी थी और हम सपाटे से लेपाक्षी ओर बढ रहे थे। लेपाक्षी जाने का कार्यक्रम पाबला जी के राडार पर पहले से ही फ़िक्स था। उन्हें यहाँ झूलता स्तंभ देखना था। आज बहुत सारी बाधाओं को पार करते हुए हम छ: बजे लेपाक्षी पहुंच ही गए। आधे घंटे से भी कम समय में अंधेरा होने वाला था।
लेपाक्षी में एकाश्म शिला से निर्मित भव्य नंदी
लेपाक्षी गाँव में प्रवेश करते ही दांए तरफ़ विशाल नंदी दिखाई देता है। भगवान रुद्र को अर्पित यह नंदी एकाश्म शिला पर बना हुआ है। इसको देखने से यह पता चलता है कि नंदी निर्माण के लिए शिला कहीं अन्य स्थान से लाई नहीं गई है, यहीं मौजूद शिला खंड को शिल्पकारों ने अपनी मेहनत एवं छेनी हथौड़ी से शिव वाहन नंदी में बदल दिया और यहाँ शिला से नंदी प्रकट हो गए। हमने तत्काल गाड़ी रोकी और इसके चित्र लेने लगे। यहां पर्यटकों की खासी संख्या थी जो नंदी के साथ स्मृति चित्र ले रहे थे।  
वीरभद्र स्वामी मंदिर लेपाक्षी का गोपुरम
एकाश्म शिला से निर्मित यह नंदी प्रतिमा लगभग 15 फ़ुट ऊंची एवं 25 फ़ुट से अधिक लम्बी है। आभुषणों से अलंकृत यह प्रतिमा सजग है, कान खड़े हुए और आँखे शिवादेश की प्रतीक्षा करती प्रतीत होती हैं कि जैसे ही भगवान का आदेश मिले, वह उसे पूर्ण करने में तत्पर हो। यह स्मारक भारतीय पुरात्व सर्वेक्षण के अधीन है। हमने फ़टाफ़ट चित्र लिए, क्योंकि लेपाक्षी मंदिर भी देखना था। फ़ोटो लेने के बाद हम यहां से लगभग 200 मीटर की दूरी पर स्थित लेपाक्षी मंदिर की ओर बढे। ज्यों ज्यों दिन ढल रहा था, व्यग्रता के कारण नाड़ी ठंडी होती जा रही थी। कहीं विलंब से दिन न डूब जाए और आज लगभग 300 किमी की यात्रा के बाद भी हम झूलते स्तंभ देखने से वंचित न रह जाएं।
वीरभद्र स्वामी मंदिर समूह लेपाक्षी में अन्य मंदिर
आखिर हम लेपाक्षी मंदिर पहुंच गए। यह मंदिर कुर्म शिला पर निर्मित है, कुर्म शिला अर्थात कछुए के खोल की तरह चट्टान। यह मंदिर परिसर 25 फ़ुट ऊंचे स्थान पर निर्मित है। यहां हमें सर्वे के चौकीदार नारायण अन्ना मिले। इसके बाद उनके मार्गदर्शन में हमने मंदिर का भ्रमण किया। सबसे पहले हम बैलेंसिग पिलर की और ही दौड़े। मंदिर की संरचना में द्वार मंडप, महामंडप एवं गर्भगृह है। महामंडप में 84 स्तंभ बताए जाते हैं। इनमें से ही एक स्तंभ झूलता है, जो भूमि पर नहीं टिका है। नारायण अन्ना एवं उनके सहयोगी ने इस स्तंभ के नीचे से हमें तौलिया निकाल कर दिखाया। यह वास्तुकला का चमत्कार ही है, जो चार सौ वर्षों से चला आ रहा है और अभी तक भूमि पर नहीं टिका है।
लेपाक्षी का प्रसिद्ध बैलेंसिंग पिलर (झूलता स्तंभ) के नीचे से कपड़ा निकालते हुए नारायण अन्ना एवं साथी
मान्यता है कि कि बैलेंसिग पिलर के नीचे से अपना कपड़ा निकालने पर सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है। प्रत्येक प्राचीन मंदिर या स्थान के इतिहास के साथ मिथक, किंवदन्तियां एवं जन श्रुतियां जुड़ी रहती है। सोलहवीं शताब्दी में निर्मित लेपाक्षी मंदिर भी इससे अछूता नहीं है। वैसे तो यह मंदिर भगवान शिव के एक रुप वीरभद्र को समर्पित है। प्राचीन अभिलेख के अनुसार इसका निर्माण 1583 ईस्वीं में विजयनगर साम्राज्य के राजा कृष्ण देव राय के शैव सामंत विरुपन्ना एवं वीरन्ना नामक भाईयों ने करवाया था। जबकि पौराणिक मान्यता के अनुसार इस मंदिर का निर्माण ॠषि अगस्त के द्वारा कराया माना जाता है।
अन्य मंदिरों के भग्नावशेष
मंदिर के गर्भगृह की छत में सुंदर चित्रकारी है। जो समय के साथ धुंधली हो गई है। मंदिरों में दीप एवं धूपदान के कारण हमेशा धुंआ रहता है, इससे भित्ति चित्र खराब हो जाते हैं। इनके संरक्षण की आवश्यकता है। गर्भगृह में कृष्ण कणाश्म पाषाण से निर्मित  स्वामी वीरभद्र की स्थानक चतुर्भुजी प्रतिमा स्थापित है। जिससे स्वर्ण पत्र से मढा गया है। गर्भगृह का द्वारपट पुष्प एवं लता वल्लरियों द्वारा अलंकृत है। इसके सभी स्तंभों में पृथक पृथक अलंकरण है। इसी परिसर में अन्नपूर्णा देवी विराजित हैं। हमारे पास इतना समय नहीं था कि मंदिर के स्थापत्य का विस्तार से निरीक्षण कर सकें। 
मंदिर की छत पर प्राकृति रंगों से निर्मित चित्रकारी
मंदिर परिसर में बहुत सारे बरामदे हैं, जिनका उपयोग उत्सव के अवसर पर किया जाता है। इस इलाके लोग यहाँ विवाह करने आते हैं। लेपाक्षी मंदिर के पाश्व में एकाश्म पत्थर से निर्मित नागलिंग भी है, जिसे भू-भाग पर मानव निर्मित सबसे बड़े नागलिंग की मान्यता मिली हुई है। नागलिंग पर सप्तफ़णी सर्प की छाया बनी हुई है तथा यह लगभग 4 फ़ुट ऊंचे अधिष्ठान पर स्थापित है।  शिवलिंग पर नाग की तीन लपेट दिखाई देती हैं।

मंदिर परिसर में अन्य भी स्थान देखने योग्य हैं। नागलिंग के पास ही सीता झूला लगा हुआ बताया जाता है, जिसमें झूलते हुए कूद जाने के कारण पत्थर पर सीता जी के पंजे का निशान बन गया। कुछ लोग इसे राम पंजा कहते हैं। इसके समीप ही एक बड़े मंदिर का भग्न मंडप दिखाई देता है। जिसके स्तंभ सलामत हैं परन्तु छत नहीं है, हो सकता है कि निर्माण कार्य अधूरा रह गया है। 
रामपद या सीता पंजा
इसके समीप ही प्रस्तर पर बड़ी बड़ी थालियां बनी हुई हैं। नारायण अन्ना ने बताया कि मंदिर का निर्माण करने वाले कारीगर इन थालियों में भोजन करते थे। नारायण अन्ना ने तो मान्यता की बात की परन्तु मुझे ये कलर प्लेट दिखाई दी। मंदिर में चित्रकारी का काम काफ़ी हुआ है, इन प्लेटों का निर्माण चित्रकारों ने रंग सयोजन के लिए किया होगा, ऐसा प्रतीत होता है। किन्तु कभी कभी सत्य पर मान्यताएं भारी पड़ जाती है, इसलिए मैने भी इन्हें कारीगरों के भोजन करने की थाली ही मान लिया। विशाल मंदिर परिसर में भगवान शिव, भगवान विष्‍णु और भगवान वीरभद्र को समर्पित तीन मंदिर हैं। जिनमें मुझे वीरभद्र मंदिर ही सतत पूजित दिखाई दिया।
कलर प्लेट या कारीगरों के भोजन की थाली
इस स्थान का नाम लेपाक्षी होने के पीछे मान्यता है कि इस क्षेत्र में वनवास के दौरान भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता यहां आए थे। जब सीता का अपहरण कर रावण अपने साथ लंका लेकर जा रहा था, तब पक्षीराज जटायु ने रावण से युद्ध किया, जिसे रावण ने अपनी खड्ग से उसके पंख काट दिए और वह घायल हो गए। जटायू घायल हो कर इसी स्थान पर गिरे थे। जब श्रीराम सीता की तलाश में यहां पहुंचे तो उन्हें इस स्थान पर जटायू मिले, उनसे सीता हरण की कथा सुनने के बाद भगवान राम ने 'ले पाक्षी' कहते हुए जटायु को अपने गले लगा लिया। ले पाक्षी एक तेलुगु शब्द है जिसका मतलब है 'उठो पक्षी'।
मंडप एवं गर्भ में दिखाई देता वीरभद्र स्वामी विग्रह
लेपाक्षी से दर्शन करके हम अपने रास्ते पर बैगलोर की ओर दिए।  दिन ढल गया था, सूर्य देव अस्ताचल की ओर जा चुके थे और हमें भी अपनी अस्थाई मंजिल बैंगलोर पहुंचना था। हम लगभग सात बजे लेपाक्षी से बैंगलोर की ओर निकले। हाईवे पर सफ़र जल्दी कटता है, एक घंटे की ड्राईव के बाद हम बैंगलोर की सीमा में प्रवेश कर गए। बैंगलोर शहर ही चालिस किमी पहले शुरु हो जाता है। हमारा होटल इलेक्ट्रानिक सिटी फ़ेज 2 में था। यहां पहुंचने के लिए एक लम्बे ओव्हर ब्रिज को पार करना पड़ता है। पहले दिन तो मुझे लगा कि हम हवा में उड़े जा रहे है, ओव्हर ब्रिज खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। पता नहीं कहाँ ले जाकर पटकेगा। यह ओव्हर ब्रिज साढे नौ किमी लम्बा है। साढे दस बजे के लगभग हम होटल पहुंच गए।

हैदराबाद में भटक कर ब्लॉगर पहुंचे अपने धाम : दक्षिण यात्रा सम्पन्न 21

आज का दिन हमने विप्रो भ्रमण के लिए नियत किया था। बाहरी आगंतुकों को शनिवार को इस परिसर में प्रवेश दिया जाता है। इसके लिए बाकायदा पहले से अनुमति लेने की आवश्यकता पड़ती है। उसके बाद वहां से परिचय पत्र जारी किया जाता है, उसे लेकर ही परिसर में प्रवेश दिया जाता है। जाहिर है विप्रो बड़ी कम्पनी है और इसने अपने कर्मचारियों के लिए परिसर में दोस्ताना वातावरण निर्मित कर रखा है, जिसमें बहुत बड़ी कैंटिन, बगीचा एवं ओपन थियेटर भी है। 
विप्रो बैंगलोर में पाबला जी के साथ
हम लगभग एक बजे विप्रो पहुंच गए। एक लम्बे सफ़र के बाद सुबह उठने में विलंब हो गया। यहां एक आकर्षक डोम बना हुआ है, जिसकी छत में कांच लगे हुए हैं, यह बहुत ही सुंदर दिखाई देता है। हमने दोपहर का नाश्ता यहां की कैंटीन में ही किया और परिसर का भ्रमण किया। विप्रो ने अपने परिसर में खूब हरियाली कर रखी है। बैगलोर जैसे शहर में शुद्ध वायु एवं वातावरण के लिए इसकी निहायत ही आवश्यकता दिखाई देती है। अन्य कम्पनियों और कारखानों को भी इससे सीख लेनी चाहिए कि कर्मचारियों की कार्यक्षमता बढाने के लिए अच्छे माहौल की आवश्यकता पड़ती है।
विप्रो का ग्लास डोम
विप्रो भ्रमण के बाद हम होटल आ गए। विचार विमर्श कर फ़ैसला किया कि आज की रात 9 बजे हम यहां से प्रस्थान कर लें और रात भर गाड़ी चला कर हैदराबाद में विश्राम करें। ब्लॉगर मित्र विजय सप्पति जी का भी कई बार फ़ोन आ चुका था और वे रविवार को हैदराबाद में हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। दिन भर आराम करने के बाद हमने रात नौ बजे के आस पास होटल छोड़ दिया और वापसी के लिए गाड़ी चल पड़ी। वैसे रात का सफ़र करना तो नहीं चाहिए। परन्तु एक फ़ायदा यह रहता कि रात को ट्रैफ़िक कम रहता और सफ़र जल्दी कटता है। परन्तु नींद के झोंकों पर भी काबू करना पड़ता है।
रात का सफ़र, बैंगलोर से निकलते हुए
चलते मुझे भोजन करने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। पाबला जी खाने के मूड में नहीं थे क्योंकि खा लिए तो फ़िर गाड़ी चलाना मुश्किल हो जाएगा। बैंगलोर शहर के बाहर निकलते हुए हमने सोचा कि हाईवे पर कोई ढाबा मिलेगा तो खाना खा लिया जाएगा। परन्तु चलते हुए समस्या यह रहती है कि थोड़ा और चल लिया जाए, फ़िर देखा जाएगा। यही हमारे साथ हो रहा था। रात एक बजे ढाबा दिखाई दिया, हमने गाड़ी लगाई, जैसे ही भीतर प्रवेश किया तो माहौल समझ नहीं आया। हर जगह लोग दारु की बोतल लिए बैठे थे और कुछ अजीब से संदिग्ध चेहरे भी दिख रहे थे। मैं भीतर जाकर लौट आया, लम्बे सफ़र में सुरक्षा भी जरुरी होती है। पाबला जी को मना किया और गाड़ी फ़िर स्टार्ट कर ली।
रास्ते में एक मंदिर में पर्व
आगे चलकर एक स्थान पर सरदार जी का ढाबा दिखाई दिया। हमने गाड़ी वहीं रोक ली। लेमन राईस का आर्डर दे दिया, तब तक पाबला जी ने आराम कर लिया। लेमन राईस में मुंगफ़ली इतनी अधिक डाल दी कि मेरा मन उखड़ गया। पर खाना भी जरुरी था। अधूरे मन से भोजन किया और फ़िर हम आगे की यात्रा पर चल पड़े। देश में विकास हो रहा है और हाईवे बन रहे हैं। अच्छी स्पीड वाली सड़कों का निर्माण हो रहा है। हैदराबाद बैंगलोर हाईवे भी फ़ोर लाईन का बना है। परन्तु बीच का डिवाईडर पार करके कौन, कब आपकी गाड़ी के सामने आ जाए, इसका पता ब्रह्मा को भी नहीं चलता। 
जान जाए  चाहे लूले लंगड़े हों, पर सफ़र ऐसे ही करेंगे
हमने डिवाईडर पार निकलने वालों के कई एक्सीडेंट सुबह सुबह देखे, मन खराब हो गया। थोड़ी सी जल्दी मचाने के कारण लोग जान से हाथ धो बैठते हैं और सड़क दुर्घटना में सबसे अधिक जवान मौते होती हैं। पीछे माँ बाप औलादें बिलखती रह जाती है। बैरिकेट लगाकर बनाए गए हाईवे पर भी लोग घुस जाते हैं। इस यात्रा में मेरा पूरा ध्यान सड़क पर ही रहा। जहाँ भी रोड़ क्रासिंग दिखाई देती, पाबला जो हाथ का इशारा कर स्पीड कम करवाता, वरना इनसे गाड़ी एक सौ बीस से कम चलती ही नहीं है। सारी यात्रा में मेरा यही काम रहा। कभी-कभी तो मुझे भी इमरजेंसी ब्रेक लगाने पड़ते थे। :)
चिकनी फ़र्राटेदार सड़क
अब हमारा टारगेट हैदराबाद था, सुबह से कई बार विजय जी का फ़ोन आ चुका था, वो समझ रहे थे कि हम सुबह नाश्ते के टैम पर पहुंच जाएगें, परन्तु हम तो झपकियां लेते हुए आ रहे थे। इसलिए इतनी जल्दी पहुंचना संभव नहीं था। हम पौने एक बजे के लगभग हैदराबाद शहर में प्रवेश कर गए। विजय जी बताए पते को ढूंढते रहे, उनसे संपर्क करते हुए। उन्होंने एक ही स्थान के तीन तीन पते बता दिए, हमारा जीपीएस और कहीं ले गया। फ़िर मुड़ कर वापस आए। एक घंटे तक सिकंदराबाद कैन्ट एरिए में ही घूमते रहे, आखिर घूमते घूमते थक गए पर उनका घर का पता नहीं मिला। 
हैदराबार 82 किमी और नागपुर 562 किमी
मैने उनसे फ़ोन पर कहा कि हम हमारी जगह बता देते हैं, आप यहां आ जाओ। वे अपना पता ही बताते रहे, लेकिन घर से निकलने को तैयार नहीं हुए। मैने उनसे जी पी एस पता मांगा, वो भी नहीं दिया, जिस तरह विवेक रस्तोगी जी ने अपना जीपीएस पता दे दिया, जीपीएस में वो पता फ़ीड करते ही हम उनके घर के ठीक सामने पहुंच गए थे, किसी से पूछने की आवश्यकता नहीं पड़ी, इधर हम उनका घर ढूंढते हुए नागपुर रोड़ पर पहुंच गए। जहां से माईल स्टोन नागपुर की दूरी 500 किमी के आस पास दिखा रहा था। हम विजय जी का घर ढूंढते हुए एकदम पक चुके थे। माईल स्टोन देखकर सरदार का दिमाग सनक गया और गाड़ी नागपुर रोड़ पर बढ़ा दी। 
हैदराबाद के पार नागपुर की ओर
विजय जी का फ़िर फ़ोन आया, पूछे कहां पर हो, मैने कहा कि हम नागपुर निकल लिए और हैदराबाद से काफ़ी आगे आ चुके हैं। बोले कि मैं सुबह से इंतजार कर रहा हूँ, सारा बनाया हुआ खाना खराब हो जाएगा। मैने कहा कि अब लौटना संभव नहीं है और पाबला जी नाराज है, फ़ोन पर भी बात नहीं करेंगे। इसलिए इस मुलाकात को पेंडिग ही रखा जाए तो ठीक है। उन्होंने निराश होकर फ़ोन बंद कर दिया। नए शहर में घर तक बुलाने के लिए दो तरीके हैं, पहला तो उसे जीपीएस का अंक्षाश देशांश दे दो, जिससे वह बिना असुविधा के पते पर पहुंच जाएगा या फ़िर शहर का ऐसा कोई लैंड मार्क बता तो जहाँ तक कोइ आसानी से पहुंच जाए और उसे लेने आ जाओ। ये दोनो काम विजय जी ने नहीं किए और घर से ही निर्देश देते रहे। हमारा भी समय खराब हुआ और उनका भी खाना।
अस्ताचल  को जाता विरंचीनारायण
हैदराबाद में आराम करने का प्लान बना कर चले थे, वह फ़ेल हो गया। अब गाड़ी फ़िर हाईवे पर थी। रास्ते में एक उड़ीपी रेस्टोंरेंट में भोजन किया और आगे बढ गए। अभी भी हमको लगभग आठ सौ किमी का सफ़र करके घर पहुंचना था। रात भर गाड़ी चला कर थक चुके थे। शाम को ई टीवी की स्टेट हेड प्रियंका कौशल ने राजिम पर कार्यक्रम के प्रसारण की सूचना दी, तो कुछ मित्रों ने वीडियो बनाकर मुझे वाट्सएप पर भेज दिया। गाड़ी चलाते हुए लगातार 27 घंटे हो चुके थे, थककर बुरा हाल था, जैसे तैसे करके रात बारह बजे तक नागपुर पहुंचे और वहां रात रिश्तेदार संध्या सत्येन्द्र शर्मा जी के रात गुजारी। 
एक सेल्फ़ी हो जाए, बाय बाय दक्षिण यात्रा
यहां फ़ुल आराम कर एवं दोपहर का भोजन कर एक बजे के बाद नागपुर से निकले। शाम को भिलाई पहुंचते तक पाबला जी गाड़ी चलाने की हालत में नहीं थे। जैसे तैसे करके घर पहुंचे। मेरे पास सामान कुछ ज्यादा हो गया था। उसे लेकर बस में जाने का मेरा मन नहीं था। पाबला जी बोले कि घर पर ही रात आराम कर लो, सुबह चार बजे अभनपुर छोड़ आऊंगा। घर के समीप पहुंच कर रात रुकना मुझे जम नहीं रहा था तब हम नाम वर्मा जी को फ़ोन किया, उन्होने समस्या का हल निकाल दिया और गाड़ी लेकर पहुंच गए। इस तरह मैं रात ग्यारह बजे घर पहुंचा और हमारी दक्षिण की साप्ताहिक यात्रा निर्विघन सम्पन्न हुई।  इति दक्षिण यात्रा …







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