Tuesday, May 16, 2023

Madhya Pradesh

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कर्ण का बनवाया मंदिर : आम्रकूट

अमरकंटक मेकलसुता रेवा का उद्गम स्थल है, यह पुण्य स्थली प्राचीन काल से ही ॠषि मुनियों की साधना स्थली रही है। वैदिक काल में महर्षि अगस्त्य के नेतृत्व में ‘यदु कबीला’ इस क्षेत्र में आकर बसा और यहीं से इस क्षेत्र में आर्यों का आगमन शुरू हुआ। वैदिक ग्रंथों के अनुसार विश्वामित्र के 50 शापित पुत्र भी यहाँ आकर बसे। उसके बाद, अत्रि, पाराशर, भार्गव आदि का भी इस क्षेत्र में पदार्पण हुआ। 

नागवंशी शासक नर्मदा की घाटी में शासन करते थे। मौनेय गंधर्वों से जब संघर्ष हुआ तो अयोध्या के इच्छ्वाकु वंश नरेश मान्धाता ने अपने पुत्र पुरुकुत्स को नागों की सहायता के लिए भेजा जिसने गंधर्वों को पराजित किया। नाग कुमारी नर्मदा का विवाह पुरुकुत्स के साथ कर दिया गया। 

इसी वंश के राजा मुचुकुंद ने नर्मदा तट पर अपने पूर्वज मान्धाता के नाम पर मान्धाता नगरी स्थापित की थी। यदु कबीले के हैहयवंशी राजा महिष्मत ने नर्मदा के किनारे महिष्मति नगरी की स्थापना की। उन्होंने इच्छवाकुओं और नागों को पराजित किया। कालांतर में गुर्जर देश के भार्गवों से संघर्ष में हैहयों का पतन हुआ। उनकी शाखाओं में तुण्डीकैर (दमोह), त्रिपुरी, दशार्ण (विदिशा), अनूप (निमाड़) और अवंति आदि जनपदों की स्थापना की गयी। महाकवि कालिदास इसी अमरकंटक शिखर को अपने अमर ग्रंथ मेघदूत में आम्रकूट कहकर सम्बोधित करते हैं।

अमरकंटक का में कलचुरी राजा कर्ण ने मंदिरों का निर्माण कराया था, इन्हें कर्ण मंदिर समूह कहा जाता है। कर्ण मंदिर समूह तीन स्तरों पर है। परिसर में प्रवेश करते ही पंच मठ दिखाई देता है। इसकी शैली बंगाल एवं असम में बनने वाले मठ मंदिरों जैसी है। इससे प्रतीत होता है कि यह स्थान कभी वाममार्गियों का भी साधना केन्द्र रहा है। इस तरह के मठों में अघोर एकांत साधनाएँ होती थी। पंच मठ के दाएँ तरफ़ कर्ण मंदिर एवं शिव मंदिर हैं। शिवमंदिर में श्वेतलिंग है तथा इससे समीप वाले मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है। 

 इन मंदिरों के सामने ही जोहिला (नदी) मंदिर एवं पातालेश्वर शिवालय है। इसके समीप पुष्करी भी निर्मित है।, इन मंदिरों से आगे बढने पर उन्नत शिखर युक्त तीन मंदिरों का समूह है जिनका निर्माण ऊंचे अधिष्ठान पर हुआ है। यहाँ भी कोई प्रतिमा नहीं है तथा द्वार पर ताला लगा हुआ है। इन मंदिरों का निर्माण बाक्साईट मिश्रित लेट्राईट से हुआ है। 

पातालेश्वर मंदिर, शिव मंदिर पंचरथ नागर शैली में निर्मित हैं। इनका मंडप पिरामिड आकार का बना हुआ है। पातालेश्वर मंदिर एवं कर्ण मंदिर समूह का निर्माण कल्चुरी नरेश कर्णदेव ने कराया। यह एक प्रतापी शासक हुए,जिन्हें ‘इण्डियन नेपोलियन‘ कहा गया है। उनका साम्राज्य भारत के वृहद क्षेत्र में फैला हुआ था। 

सम्राट के रूप में दूसरी बार उनका राज्याभिषेक होने पर उनका कल्चुरी संवत प्रारंभ हुआ। कहा जाता है कि शताधिक राजा उनके शासनांतर्गत थे। इनका काल 1041 से 1073 ईस्वीं माना गया है। वैसे इस स्थान का इतिहास आठवीं सदी ईस्वीं तक जाता है। मान्यता है कि नर्मदा नदी का स्थान निश्चित करने के लिए सूर्य कुंड का निर्माण आदि शंकराचार्य ने करवाया था।

बुंदेलखंड के दो प्राचीन नगर हैं, ओरछा एवं गढकुंढार

बुंदेलखंड के दो प्राचीन नगर हैं, ओरछा एवं गढकुंढार। गढ कुंढार तो नहीं देख सके पर गत वर्ष पहाड़ों से लौटते हुए ओरछा जाना हुआ और इस वर्ष भी पहाड़ों से लौटते हुए ओरछा पहुंच गए। वैसे तो ओरछा का इतिहास 8 वीं सदी से प्रारंभ होता है, परन्तु यहां रौनक बुंदेलाओं के कार्यकाल में आई एवं बुंदेलाओं ने भव्य निर्माण कार्य करवाए। 

निर्माण कार्यों में जहाँगीर महल, राज महल, राम राजा मंदिर, रायप्रवीण महल, लक्ष्मीनारायण मंदिर, फ़ुल बाग, पालकी महल, सावन भादो, चतुर्भुज मन्दिर प्रमुख हैं। इसके साथ ही राजाओं की भव्य छतरियाँ (मृतक स्मारक) आकर्षक हैं। बेतवा नदी के तट पर बनी यह छतरियाँ भव्य दिखाई देती हैं। कहा जा सकता है कि ओरछा नगर की पहचान हैं।

वर्तमान में ओरछा एक बड़ा पर्यटन केन्द्र बनता जा रहा है। यहाँ पांच सितार स्तर के कई होटल एवं रिसोर्ट बन चुके हैं। इससे साबित होता है कि पर्यटकों की आवा जाही अच्छी है। 

झांसी रेल्वे स्टेशन के समीप होने का लाभ भी इस स्थान को मिला। जिसके कारण झांसी पहुंचने वाले पर्यटक पहले ओरछा आते और फ़िर खजुराहो की ओर निकल जाते हैं, इस बीच झांसी छूट जाता है। मेरे साथ भी यही हुआ और झांसी छूट गया।

वर्तमान में ओरछा छोटा सा नगर है, जिसमें लोगों का पता मंदिर के आगे और पीछे लिखने से चिट्ठी पहुंच जाती है, बुंदेलाओं के समय में इसकी चमक चरम सीमा पर थी। बुंदेलाओं का राज1783 में खत्म होने के साथ ही ओरछा की कीर्ति एवं चमक घने जंगलों में खो गई। यह पुन: स्वतंत्रता संग्राम के समय सुर्खियों में आया जब स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद यहां के एक गांव में आकर छिपे थे। 

गत वर्ष ओरछा को मैने अपने कैमरे की आँख से देखा था। कुछ चित्र लिए थे, इस नगरी के श्वेत श्याम चित्र आपको पसंद आएंगे क्योंकि श्वेत श्याम चित्रों का अपना अलग ही आनंद है। इस यात्रा में मेरे सूत्रधार मुकेश पाण्डेय जी Chandan बने। उनके साथ ही ओरछा भ्रमण संभव हुआ। अगर आज कहा जाए तो वे ओरछा के पुरातत्व एवं इतिहास के अच्छे जानकार हैं। 

उदयगिरि की प्राचीन गुफ़ाएँ

विश्व हिन्दी सम्मेलन के बाद 13 सितम्बर 2015 को सांची होते हुए उदयगिरि जाना हुआ। उदयगिरि विदिशा से वैसनगर होते हुए भी पहुँचा जा सकता है। नदी से यह गिरि लगभग 1 मील की दूरी पर है। पहाड़ी के पूरब की तरफ पत्थरों को काटकर गुफाएँ बनाई गई हैं। इन गुफाओं में प्रस्तर- मूर्तियों के प्रमाण मिलते हैं, जो भारतीय मूर्तिकला के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है। 
उदयगिरि में ललित शर्मा
गुफ़ा नम्बर 5 वराह अवतार
उत्खनन से प्राप्त ध्वंसावशेष अपनी अलग कहानी कहते हैं।उदयगिरि को पहले नीचैगिरि के नाम से जाना जाता था। कालिदास ने भी इसे इसी नाम से संबोधित किया है। १० वीं शताब्दी में जब विदिशा धार के परमारों के हाथ में आ गया, तो राजा भोज के पौत्र उदयादित्य ने अपने नाम से इस स्थान का नाम उदयगिरि रख दिया।
उदयगिरि
गुफ़ा नम्बर 4
गुफा संख्या - 5 वाराह गुफा के नाम से जाना जाता है तथा उदयगिरि की समस्त गुफाओं में सर्वश्रेष्ठ है। इसे पांचवी छठी शताब्दी की माना जाता है। वास्तव में यह पहाड़ी को काटकर एक दालान के रुप में बनाई गई है, जो २२ फीट लंबी तथा १२ फीट ८ इंच ऊँची एवं ३ फीट ४ इंच पत्थर में भीतर की ओर गहरी है।
उदयगिरि वराह अवतार
वराह अवतार

यहाँ पत्थर को काटकर बनाई गई वाराह अवतार की मूर्ति पूरे भारत में सर्वश्रेष्ठ उदाहरणों में से एक मानी जाती है। मूर्ति का मुख भाग वाराह के रुप में है तथा शेष हिस्सा मानवाकृति का है। बलिष्ठ भुजाएँ, मांसल जंघाओं तथा सुडौल बनावट ने मूर्ति को बल, शौर्य तथा सुंदरता का प्रतीक बना दिया है। मूर्ति पीतांबर पहने हुए है तथा साथ- साथ कंठहार, वैजयंतीमाला तथा कंगन भी उत्कीर्ण किये गये हैं।
उदयगिरि जैन मंदिर
उदयगिरि 
बांये पैर को मुकुट पहने किसी विशेष व्यक्ति के हृदय पर रखा हुआ दिखलाया गया है, जिसके मस्तक के ऊपर विशाल १३ फणों वाला नाग स्थित है। वह वाराह की स्तुति करने की मुद्रा में है। इस विशेष व्यक्ति की पहचान के संबंध में मतैक्य नहीं है। कुछ विद्धान इसे राजा बताते हैं, तो कुछ देवता या विष्णु की मूर्ति। मुझे यह शेषनाग की प्रतिमा लगी क्योंकि कुंडली मारे शेषनाग पर वराह ने अपने चरण स्थिर कर रखे हैं। 
उदयगिरि शेष शैया पर विष्णु
शेष शैया पर विष्णु
पुराणों के अनुसार वाराह भगवान ने हिरण्याक्ष राक्षस से पृथ्वी का उद्धार किया था। अतः कुछ विद्वान इसे हिरण्याक्ष की मूर्ति मानते हैं। परंतु मूर्ति का मुख असुर सदृश नहीं दिखलाया गया है। मूर्ति के ऊपर नाग फणों का घेरा होने के कारण लोग इसे पाताल का स्वामी भी मानते हैं या फिर समुद्रराज। वाराह के बायीं ओर स्तुति करती हुई दिखाई गई रानी, संभवतः नीची की मूर्ति की राजमहिषी हो सकती हे।
उदयगिरि राजनिवास
राज निवास के भग्नावशेष
वाराह के कंधे पर नारी रुपी पृथ्वी को दिखलाया गया है। पृथ्वी के दोनों पैर नीचे लटके हुए दिखाए गये हैं। अंग- प्रत्यंग में करुणा भाव दिखलाया गया है। चोली में स्थित पुष्ट पयोधर पृथ्वी की पोषणात्मक शक्ति के प्रतीक हैं। नीचे स्थित लेटे अवस्था में दिख रही मूर्ति के पीछे स्थित कलश लिए देवता वरुण का प्रतीक प्रतीत होता है। साथ में दिखाई दे रही दो जल- धाराएँ गंगा तथा यमुना की प्रतीक हैं, जो स्वर्ग से नीचे की तरफ अवतरण करती हुई दिखाई गई हैं। 
उदयगिरि का प्रस्तर स्तंभ
भग्न प्रस्तर स्तंभ
गंगा तथा यमुना को अपने- अपने वाहन मकर तथा कच्छप पर दिखलाया गया है। ऊपर अप्सराएँ दिखाई गई हैं तथा बाई ओर पाँच पंक्तियों में यक्ष, किन्नर, गंर्धव व मरुत गणों को स्तुति- गान करते हुए दर्शाया गया है। ऊपरी पंक्ति में दिख रहे गंधर्व के हाथों में स्थित वायलिन जैसा वाद्य यंत्र इस बात के साक्ष्य हैं कि ऐसे यंत्र की उत्पति भारत में ही हुई होगी। दांयी ओर यक्ष व महर्षिगण चार पंक्तियों में दर्शाये गये हैं। ब्रह्मा तथा नंदी वाहन समेत शिव को सबसे ऊपरी पंक्ति में दर्शाया गया है।
उदयगिरि शिकारगाह
ग्वालियर स्टेट द्वारा निर्मित शिकारगाह
उदयगिरि की पहाड़ी पर शंख लिपि के बहुत सारे लेख हैं। इसके साथ ही एक गुफ़ा में प्रस्तर निर्मित किरिट धारित शेष शैया पर विष्णु को शयन करते हुए दिखाया गया है। आगे चलने पर पहाड़ी पर एक विशाल भवन के भग्नावशेष हैं, जिसके समक्ष विशाल प्रस्तर स्तंभ भग्न पड़ा है। इससे आगे बढने पर ग्वालियर स्टेट द्वारा निर्मित शिकार गाह भी है, जो अभी सलामत है।

निर्माणाधीन जैन मंदिर अमरकंटक : अद्भुत कारीगरी


ल्याण आश्रम से उत्तर की तरफ़ ऊपर देखने पर जैन मंदिर दिखाई देता है। इस मंदिर का निर्माण विगत कई वर्षों से हो रहा है। गत वर्ष भी मैं यहाँ आया था, उस समय मंदिर का कार्य प्रगति पर था। राजस्थान के कारीगरों की छेनी हथौड़ियाँ बज रही थी। छेनी हथौड़ियों की आवाजें मुझे मंदिर तक खींच ले गई। पहले नर्मदा कुंड के सामने से ही यहाँ पहुंचने का रास्ता था। अब इस रास्ते को खूंटे लगा कर बंद कर दिया गया है। हमें मंदिर तक पहुंचने के लिए उससे थोड़ा आगे चलकर विश्राम गृह का एक लम्बा चक्कर काटते हुए जाना पड़ा। सूर्यदेव ने हीटर का वाल्यूम थोड़ा और बढा दिया था। मंदिर निर्माण स्थल पर अब कई खिलौनों की दुकाने एवं होटल खुल चुके हैं। इससे जाहिर होता है कि मंदिर देखने बड़ी संख्या में पर्यटक निरंतर पहुंच रहे हैं।  
निर्माणाधीन जैन मंदिर एवं विशाल क्रेन
मंदिर के समक्ष वृक्ष के नीचे गाड़ी खड़ी कर दी, सामने मंदिर का विशाल गुम्बद दिखाई दे रहा था। कलचुरियों के बाद यदि किसी मंदिर का निर्माण हो रहा है तो यही तीर्थंकर आदिनाथ मंदिर है। धौलपुर के गुलाबी पाषाणों की कटाई-छटाई की आवाजें दूर तक आ रही थी। निर्माण योजना के अनुसार मंदिर ऊँचाई 151 फ़ुट,  चौड़ाई 125 फ़ुट तथा लम्बाई 490 फ़ुट है। इसके निर्माण में 25-30 टन वजन के पाषाणो का भी प्रयोग किया गया है। जब मंदिर निर्माण की योजना बनी थी तब इसकी लागत लगभग 60 करोड़ रुपए आँकी गई थी। बढ़ती हुई मंहगाई को देखते हुए लगता है कि यह लागत बढकर 1 अरब रुपए तक पहुंच जाएगी। 
द्वीस्तरीय मंडप एवं गर्भ गृह
गर्भगृह में भगवान आदिनाथ विराजित हैं, इसके साथ परम्परानुसार अष्टमंगल चिन्ह उत्कीर्ण किए गए हैं। प्रतिमा का आभामंडल विशाल है, दाँए-बाँए चंवरधारिणी तथा इनके ऊपर मंगल कलश स्थापित है। द्वार शाखाओं एवं सिरदल पर कमल पुष्पांकन है। मंदिर में प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की 24 टन भारी अष्टधातु की प्रतिमा विराजित है। इसे आचार्य श्री विद्यासागरजी ने 6 नवम्बर 2006 को विधि-विधान से स्थापति किया। अष्टधातू से निर्मित यह प्रतिमा 28 टन के  अष्टधातू निर्मित कमल पुष्प पर विराजित है। प्रतिमा के वक्ष स्थल पर जैन प्रतिमा लांछन श्री वत्स बना हुआ है। बल्ब की रोशनी में धातू प्रतिमा प्रभाव उत्पन्न कर रही थी।
भगवान आदिनाथ
कारीगर छेनी हथौड़ी लिए प्रस्तर स्तंभों को अलंकृत कर रहे थे। शिल्पांकन की दृष्टि से धौलपुर का पत्थर उत्तम प्रतीत होता दिखाई देता है। छेनी की मार से पत्थर से से "चट" उखड़ती दिखाई नहीं दे रही थी। जिस तरह सागौन की लकड़ी को खरोंच कर प्रतिमाएं बना दी जाती हैं वैसा ही कुछ प्रतीत हो रहा था। पर यह पत्थर लकड़ी के इतना नरम नहीं है।  प्रस्तर पर अलंकरण करना श्रम साध्य कार्य है। मंदिर के वितान में सुंदर कमलाकृति का निर्मित की गई है। जिसकी पंखुड़ियाँ अलग दिखाई देते है। छत का निर्माण देखकर तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्रत्थरों को गढ़कर स्थापित करने के दौरान कम्प्यूटर की गणना भी चूक जाएगी पर शिल्पकारों की गणना नहीं चूकने वाली।
अलंकृत भव्य वितान
मंदिर निर्माण में एक बड़ी क्रेन सहायक बनी है। बिना क्रेन के निर्माण संभव नहीं था। प्राचीन काल में माल परिवहन के साधन नहीं होने के कारण मंदिर निर्माण सामग्री जहाँ समीप में उपलब्ध होती है, वहीं मंदिरों का निर्माण कराया जाता था। जिसका उदाहरण हमें कर्ण मंदिर में देखने मिलता है। कल्पना करें कि हजार दो हजार साल बाद जब कोई नई सभ्यता होगी वह इन मंदिरों की विशालता को देखकर आश्चर्य चकित रह जाएगी तथा मंदिर में प्रयुक्त पत्थरों की खदान ढूंढना चाहेगी तो प्रमाण के लिए उन्हें धौलपुर की प्रस्तर खानों की भी खोज करनी होगी। वर्तमान में परिवहन की सुविधा होने के कारण सुदूर से भी कारीगर एवं निर्माण सामग्री मंगाई जा सकती है।
शिल्पकार और छेनी हथौड़ी
प्राचीन काल से निर्माणादि कार्यों में हिन्दू धर्म के मानने वाले शिल्पियों का बोलबाला था तथा इनका ही एकाधिकार था। कालांतर में शिल्पियों के वंशजों ने कार्य की कठिनाई एवं कम आमदनी को देखते हुए जीवन यापन के लिए अन्य व्यवसाय अपना लिए। शिल्पियों की कमी होने के कारण मुख्य शिल्पियों ने मुसलमान लड़कों को यह कार्य सिखाना प्रारंभ कर दिया। जिसके कारण अब मंदिर निर्माण में मुसलमान कारीगर दिखाई देने लगे। इस मंदिर का निर्माण शिल्प शास्त्रों के दिशा निर्देशानुसार राजस्थान के नागौर जिले से आए हुए मुसलमान शिल्पी कर रहे है। शिल्पांकन में अब पहले जैसी कठिनाईयाँ नहीं रह गई। पत्थर काटने से लेकर बेल-बूटे बनाने तक का कार्य मशीनों से होता है। सिर्फ़ अंतिम रुप प्रदान करने के लिए मानव श्रम का उपयोग होता है।

भव्य निर्माण को अचंभित होकर देखती देवी
पत्थरों को जोड़ने के लिए सूर्खी चूना एवं गुड़ इत्यादि के प्राचीन मिश्रण का ही उपयोग हो रहा है। मंदिर में सीमेंट का कहीं उपयोग नहीं किया जा रहा। सीमेंट भले ही 53/56 ग्रेड की हो पर कुछ वर्षों के उपरांत अपनी पकड़ छोड़ देती है। सूर्खी, चून, गुड़, उड़द, बेल (बिल्व) गोंद इत्यादि के मिश्रण से बनाए गए मसाले का जोड़ हजारों वर्षों तक अपनी पकड़ नहीं छोड़ते। तभी प्राचीन संरचनाएँ एवं भवनों को आज भी हम देख पा रहे हैं। एक बार का वाकया याद आता है जब एक सभा के दौरान तत्कालीन पीडब्लूडी मंत्री प्राचीन भवनों की तारीफ़ करते हुए भावनाओं के उद्वेग में मानव निर्मित महापाषाणकालीन संरचना "स्टोनहेंज" तक पहुंच गए। तब एक दिलजले ने पूछ लिया कि " वर्तमान में जिन भवनों का निर्माण आपका विभाग करता है उनके 20 वर्षों तक के स्थायित्व की गारंटी लेते हैं क्या? इतना सुनने के बाद मंत्री जी को बगलें झांकना पड़ा।
गर्भ गृह के सामने वाला मंडप, अद्भुत कारीगरी की मिशाल
मंदिर में प्रतिमाओं का अभाव और पुष्प वल्लरियों, लघुघंटिकाओं, बेल-बूटों का अंकन सर्वत्र दिखाई देता है। इसका कारण समझ नहीं आया। बस गर्भगृह में मुख्य देव की प्रतिमा ही विराजमान  है। इनके अनुषांगी तीर्थकंर परिचारक तथा अन्य मान्य देवी देवताओं का अलंकरण मंदिर को और भी भव्यवता प्रदान करता। स्तंभों में प्रतिमाओं का स्थान रिक्त दिखाई देता है। भीतर द्वार के दांई ओर एक प्रतिमा का निर्माण दिखाई देता है परन्तु बांई ओर का स्थान खाली है। देखने के बाद प्रतीत हुआ कि इन पर प्रतिमाओं का अंकन बाद में किया जाएगा। पर इतना तो जाहिर है कि इस मंदिर जैसे भव्य संरचना निर्मित होना इस सदी के गौरव की बात है। ………  इति श्री रेवा खंडे स्थित अमरकंटक अचानकमार यात्रा सम्पन्नम्। 

अमरकंटक : कर्ण मंदिर

प्रारंभ से पढें 


धूप का कहर बढ चुका था, 10 बजे ही सूरज आग के गोले बरसाने लगा था। बाबा, बिरला और बाक्साईट का असर अमरकंटक के मौसम पर भी दिखाई देने लगा है। गर्मी के मौसम में अमरकंटक सूरज की मार से अप्रभावित रहता था। अंधाधूंध वनों की कटाई, बाक्साईट की खुदाई और बाबाओं की जमाई ने यहाँ गर्मी बढा दी। 
जरा देख लिया जाए स्नैप : प्राण चड्डा जी
फ़िर भी शाम का मौसम ठीक ही रहता है। रात को पंखा चलने पर कंबल सुहाता है। अमरकंटक के पर्यावरण को हो रही हानि यही पर ठहर जानी चाहिए। अन्यथा यह स्थान भी गर्मी के मौसम में भ्रमण करने के लायक नहीं रहेगा। मेरे बाहर आते तक चड्डा जी कुंड के समीप वृक्ष के नीचे बैठ कर विश्राम कर रहे थे, मैं भी धूप से बचने के लिए थोड़ी विश्राम करने लगा।
नर्मदा नदी का विहंगम दृश्य
चर्चा के दौरान चड्डा जी कहने लगे - पहले सभी तीर्थ यात्री नर्मदा कुंड में ही स्नान करते थे। वहाँ स्नान बंद करने के बाद बाहर बने हुए इस कुंड में स्नान करते हैं। जब कुंड की धार पतली होने लगी तो नर्मदा उद्गम पर संकट मंडराने लगा। इस संकट से वाकिफ़ होने पर कोटा विधानसभा के विधायक एवं पूर्व विधानसभा अध्यक्ष छत्तीसगढ़ स्व: डॉ राजेन्द्र प्रसाद शुक्ला ने 20 वर्ष पूर्व यहाँ पर एक कार्यक्रम करवाया, जिसमें अजय (राहुल) सिंह भी उपस्थित हुए। मुद्दे पर गंभीरता से विचार विमर्श होने पर स्नान के लिए पृथक कुंड एवं अन्य घाट बनाने का निर्णय लिया, यह कार्य वर्तमान में फ़लीभूत दिखाई देते हैं तथा नर्मदा कुंड को नवजीवन मिल गया।
पंच मठ 
हमारा अगला पड़ाव था कर्ण मंदिर समूह। यह मंदिर समूह तीन स्तरों पर है। परिसर में प्रवेश करते ही पंच मठ दिखाई देता है। इसकी शैली बंगाल एवं असम में बनने वाले मठ मंदिरों जैसी है। इससे प्रतीत होता है कि यह स्थान कभी वाममार्गियों का भी साधना केन्द्र रहा है। इस तरह के मठों में अघोर एकांत साधनाएँ होती थी। पंच मठ के दाएँ तरफ़ कर्ण मंदिर एवं शिव मंदिर हैं। शिवमंदिर में श्वेतलिंग है तथा इससे समीप वाले मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है। 
जोहिला मंदिर
इन मंदिरों के सामने ही जोहिला मंदिर एवं पातालेश्वर शिवालय है। इसके समीप पुष्करी भी निर्मित है।, इन मंदिरों से आगे बढने पर उन्नत शिखर युक्त तीन मंदिरों का समूह है जिनका निर्माण ऊंचे अधिष्ठान पर हुआ है। यहाँ भी कोई प्रतिमा नहीं है तथा द्वार पर ताला लगा हुआ है। इन मंदिरों का निर्माण बाक्साईट मिश्रित लेट्राईट से हुआ है। 
विष्णु मंदिर
पातालेश्वर मंदिर, शिव मंदिर पंचरथ नागर शैली में निर्मित हैं। इनका मंडप पिरामिड आकार का बना हुआ है। पातालेश्वर मंदिर एवं कर्ण मंदिर समूह का निर्माण कल्चुरी नरेश कर्णदेव ने कराया। यह एक प्रतापी शासक हुए,जिन्हें ‘इण्डियन नेपोलियन‘ कहा गया है। उनका साम्राज्य भारत के वृहद क्षेत्र में फैला हुआ था। 
पातालेश्वर
सम्राट के रूप में दूसरी बार उनका राज्याभिषेक होने पर उनका कल्चुरी संवत प्रारंभ हुआ। कहा जाता है कि शताधिक राजा उनके शासनांतर्गत थे। इनका काल 1041 से 1073 ईस्वीं माना गया है। वैसे इस स्थान का इतिहास आठवीं सदी ईस्वीं तक जाता है। मान्यता है कि नर्मदा नदी का स्थान निश्चित करने के लिए सूर्य कुंड का निर्माण आदि शंकराचार्य ने करवाया था।
शिव मंदिर
नर्मदा कुंड के पीछे की तरफ़ बर्फ़ानी बाबा का आश्रम है तथा कर्ण मंदिर समूह के उपर की तरफ़ गायत्री मंदिर निर्मित किया गया है। बाकी अन्य दर्शनीय स्थल भी हैं, जिन्हे वाहन द्वारा देखना ही संभव है। कपिलधारा नर्मदा नदी का पहला झरना है। जो लगभग 100 फ़ुट उपर से गिरता है, वर्तमान में निर्माण के कारण यह सूख गया है। एक पतली सी धारा गिरते हुए दिखाई देती है। जैसे लगता है कि इससे सिर्फ़ पानी का एक गिलास भरा जा सकता है। 
कर्ण मंदिर
कपिलधारा डिंडोरी जिले के करंजिया जनपद के अंतर्गत है। इसके आगे दुधधारा है। जहां उपर से गिरता हुआ पानी दूध जैसे शुभ्र दिखाई देता है। इसके साथ ही विगत 10 वर्षों से तीर्थंकर आदिनाथ मंदिर का भी निर्माण हो रहा है। यह विशाल एवं भव्य जैन मंदिर लगभग 1 अरब रुपए की लागत से बन रहा है। …

हर हर नर्मदे: अमरकंटक

प्रारंभ से पढें
स्नानोपरांत सबसे पहले दर्शन के लिए नर्मदा कुंड पहुंचे। अन्य तीर्थों की तरह यहाँ भी भिखारियों की भरमार दिखी। एक खास बात और है कि यहाँ तथाकथित वैद्य जड़ी बूटियाँ लेकर बैठे रहते हैं जो जूड़ी ताप से लेकर कैंसर के इलाज तक का दावा करते हैं। कोई न कोई बंदा तो इनके झांसे में फ़ंस ही जाता है। कहते हैं जिस बिमारी की कोई दवा नहीं होती उसके हजार वैकल्पिक इलाज हैं। वैसे भी भारत में मुफ़्त की सलाह देने वाले भी बहुत मिलते हैं। जो ऐसे-ऐसे इलाज बताते हैं कि आदमी खा कर मर जाए या अपना माथा पीट ले। ऐसा ही एक कैंसर का इलाज करने वाला मिला था जिसे चड्डा जी ने फ़टकार दिया। उस बेचारे का मुंह उतर गया।
नर्मदा उद्गम कुंड का प्रवेश द्वार
नर्मदा उद्गम कुंड परिसर में कई मंदिर बने हुए हैं। जिसमें कुंड के समीप ही लगा हुआ नर्मदा माता का मंदिर है, मंदिर  में असित पाषाण की प्रतिमा स्थापित है तथा इसके बांए तरफ़ किसी भग्न मंदिर का आमलक रखा हुआ है। जिस पर लोग फ़ूल चढा कर पूजा करते हैं। मुंडन करवाने वालों की भी अच्छी भीड़ दिखाई दी। समीप ही कार्तिकेय स्वामी जी का मंदिर है जहां लिखा है  - अपस्मार कुष्ट क्षयार्श: प्रमेह ज्वरोन्मादि गुल्मादि रोगा महंत:, पिशाचाश्च सर्वे भवत् पत्र भूतिम् विलोक्य क्षणाक्तारकारे द्रवन्ते।। नर्मदा कुंड के भीतर श्री बंगेश्वर महादेव, लक्ष्मी नारायण, रोहणी माता, शिवालय, सिद्धेश्वर महादेव एवं अन्य मंदिर बने हुए हैं, जिनमें एक मंदिर रक्त पाषाण निर्मित है। परिसर के द्वार पर प्रसाद का काऊंटर बना हुआ है, जहाँ से दर्शनार्थी प्रसाद खरीदते हैं। 
बुलकने का खेला
नर्मदा मंदिर एवं उद्गम कुंड के मध्य असित पाषाण की सिरकटी गज सवार एवं लोहित पाषाण की अश्व सवार की प्रतिमाएं स्थापित हैं। गज प्रतिमा के साथ किंवदन्ति जुड़ी हुई है कि इसके पैरो में मध्य से सिर्फ़ धर्मात्मा ही निकल सकता है चाहे वह कितना ही मोटा हो। अगर कोई पापी रहे तो पतला भी इसमें फ़ंस जाता है। लोग इस खेल का मजा लेते हैं। गज के इस खेल से पंडित जी की दुकान चलती है। वे प्रत्येक से दक्षिणा स्वरुप 10-20 रुपया लेते हैं। कुछ लोग पोल खुलने के भय से ही गज के पैरों से निकलने का प्रयास नहीं करते। गत यात्रा के समय इसके बीच से मैं दो बार निकला था सिर्फ़ थोड़ी सी ट्रिक की आवश्यकता होती है। 
लक्ष्मी नारायण
धार्मिक ग्रंथों में नर्मदा की महिमा अपार बताई गई है। नर्मदा नदी को समस्त तत्वों की जननी कहा गया है। नर्मदा को सरितां वरा माना जाता है। नर्मदा तट पर दाह संस्कार के बाद गंगा तट पर नहीं जाते क्योंकि नर्मदा जी से मिलने के लिए स्वयं गंगा जी आती है। नर्मदा अपने उद्गम स्थान से प्रकट होकर नीचे से उपर की ओर बहती है। कहते हैं कि नर्मदा में प्रवाहित अस्थियाँ एवं लकड़ियां कालांतर में पाषाण में परिवर्तित हो जाती हैं। नर्मदा अपने उदगम स्थान से लेकर समुद्र पर्यन्त उतर एवं दक्षिण दोनों तटों में, दोनों ओर सात मील तक पृथ्वी के भीतर प्रवाहित होती हैं , पृथ्वी के उपर तो वे मात्र दर्शनार्थ प्रवाहित होती हैं | नर्मदा नदी के तट पर जीवाश्म प्राप्त होते हैं। नर्मदा पुराण के अनुसार नर्मदा ही एक मात्र नदी देवी हैं, जो सदा हास्य मुद्रा में रहती है |
नर्मदा स्नान कुंड
जनमान्यता है कि नर्मदा (प्रवाहित ) जल में नियमित स्नान करने से असाध्य चर्मरोग मिट जाता है। नर्मदा कभी भी मर्यादा भंग नहीं करती है, वर्षा काल में पूर्व दिशा से प्रवाहित होकर, पश्चिम दिशा के ओर ही जाती हैं। अन्य नदियाँ, वर्षा काल में अपने तट बंध तोडकर अन्य दिशा में भी प्रवाहित होने लगती हैं। नर्मदा पर्वतो का मान मर्दन करती हुई पर्वतीय क्षेत्र में प्रवाहित होकर जन ,धन हानि नहीं करती हैं (मानव निर्मित बांधों को छोडकर )अन्य नदियाँ मैदानी, रेतीले भू-भाग में प्रवाहित होकर बाढ़ रूपी विनाशकारी तांडव करती हैं। नर्मदा ही विश्व में एक मात्र नदी हैं जिनकी परिक्रमा का विधान हैं, अन्य नदियों की परिक्रमा नहीं होती हैं। नर्मदा के दक्षिण और गुजरात के भागों में विक्रम सम्बत का वर्ष कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को प्रारंभ होता हैं।
नर्मदा कुंड स्थित श्री बंगेश्वर महादेव
होशंगाबाद मध्यप्रदेश की जीवनदायिनी नर्मदा का जल गंगाजल से भी ज्यादा शुद्ध है। इस तथ्य का खुलासा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट में हुआ है। नर्मदा के पानी में घुलित आक्सीजन का निम्नतम स्तर गंगा नदी से काफी ज्यादा है, इस कारण नदियों की ग्रेडिंग में नर्मदा को बी और गंगा को सी ग्रेड दी गई है। बोर्ड विभिन्न स्रोतों से प्राप्तजल की मासिक सेंपलिंग कर उसका परीक्षण करता है। इसमे देश भर की विभिन्न नदियों के पानी काभी परीक्षण किया जाता है। परीक्षण के आधार पर नदी जल की ग्रेडिंग होती है।प्राकृतिक स्रोत से प्राप्त जल में नर्मदा नदी के पानी को सर्वाधिक उच्च गुणवत्तायुक्त पाया गया है।
परिसर स्थित शिवालय
नर्मदा जी वैराग्य की अधिष्ठात्री मूर्तिमान स्वरूप है। गंगा जी ज्ञान की, यमुना जी भक्ति की, ब्रह्मपुत्रा तेज की, गोदावरी ऐश्वर्य की, कृष्णा कामना की और सरस्वती जी विवेक के प्रतिष्ठान के लिये संसार में आई हैं। सारा संसार इनकी निर्मलता और ओजस्विता व मांगलिक भाव के कारण आदर करता है व श्रद्धा से पूजन करता है। मानव जीवन में जल का विशेष महत्व होता है। यही महत्व जीवन को स्वार्थ, परमार्थ से जोडता है। प्रकृति और मानव का गहरा संबंध है। नर्मदा तटवासी माँ नर्मदा के करुणामय व वात्सल्य स्वरूप को बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। बडी श्रद्धा से पैदल चलते हुए इनकी परिक्रमा करते हैं।
कुंड के पश्चात नर्मदा का प्रवाह राम घाट 
नर्मदा जी की परिक्रमा 3 वर्ष 3 माह और तेरह दिनों में पूर्ण होती है। अनेक देवगणों ने नर्मदा तत्व का अवगाहन ध्यान किया है। ऐसी एक मान्यता है कि द्रोणपुत्र अभी भी माँ नर्मदा की परिक्रमा कर रहे हैं। इन्हीं नर्मदा के किनारे न जाने कितने दिव्य तीर्थ, ज्योतिर्लिंग, उपलिंग आदि स्थापित हैं। जिनकी महत्ता चहुँ ओर फैली है। परिक्रमावासी लगभग तेरह सौ बारह किलोमीटर के दोनों तटों पर निरंतर पैदल चलते हुए परिक्रमा करते हैं। श्री नर्मदा जी की जहाँ से परिक्रमावासी परिक्रमा का संकल्प लेते हैं वहाँ के योग्य व्यक्ति से अपनी स्पष्ट विश्वसनीयता का प्रमाण पत्र लेते हैं। परिक्रमा श्री नर्मदा पूजन व कढाई चढाने के बाद प्रारंभ होती है।
मंदिर परिसर का दृश्य
नर्मदा की इसी ख्याति के कारण यह विश्व की अकेली  नदी है जिसकी विधिवत परिक्रमा की जाती है । प्रतिदिन नर्मदा का दर्शन करते हुए उसे सदैव अपनी दाहिनी ओर रखते हुए, उसे पार किए बिना दोनों तटों की पदयात्रा को नर्मदा प्रदक्षिणा या परिक्रमा कहा जाता है । यह परिक्रमा अमरकंटक या ओंकारेश्वर से प्रारंभ करके नदी के किनारे-किनारे चलते हुए दोनों तटों की पूरी यात्रा के बाद वहीं पर पूरी की जाती है जहाँ से प्रारंभ की गई थी । व्रत और निष्ठापूर्वक की जाने वाली नर्मदा परिक्रमा 3 वर्ष 3 माह और 13 दिन में पूरी करने का विधान है, परन्तु कुछ लोग इसे 108 दिनों में भी पूरी करते हैं । आजकल सडक मार्ग से वाहन द्वारा काफी कम समय में भी परिक्रमा करने का चलन हो गया है । मोटर सायकिल से नर्मदा परिक्रमा करने की मेरी भी इच्छा है अब समय ही बताएगा इच्छा कब पूरी होती है।

कल्याण आश्रम अमरकंटक


चीं चीं चीं चीं ……… की ध्वनि से आँखें खुल गई, लगा कि सुबह हो गई। आँख खुली तो दिखा चलभाष पर कोई याद कर रहा है। नम्बर पर निंगाह पड़ी तो झुंझलाहट आई ब्लॉग़र भी कब सोते हैं कब उठते हैं पता नहीं? जबलपुरिया ब्रिग्रेड के ब्रिगेडियर गिरीश बिल्लौरे जी का बातचीत का आहवान था। अल सुबह उनका डिंडौरी आने का निमंत्रण था। कहने लगे कि अमरकंटक तक आ गए तो डिंडौरी पहुंच जाओ। दो दिन यहाँ घुमक्कड़ी कर के चले जाना। हमने कहा कि अभी नर्मदे हर  कर लेते हैं फ़िर सोच कर बताते हैं। सुबह के 5 बजे ही नींद खुल गई, बाहर निकल कर देखा तो उजाला हो गया था। कल्याण आश्रम परिसर में बने हुए मंदिर एवं उसके बगीचे की छटा मनमोहक थी। इसकी एक फ़ोटो हमने फ़ेसबुक पर लगाकर दिन की शुरुआत की।
आवासीय परिसर से दिखाई देता मंदिर
चड्डा जी पहले ही उठ गए थे, शायद आरती की घंटिका की आवाज सुनकर नींद खुल गई। हिमाद्री मुनि सुबह ही उठकर दैनिक उपासना में लग जाते हैं। चड्डा जी कैमरा लेकर बाग बगीचे की फ़ोटो खींच रहे थे, हमने भी अपना कैमरा उठा लिया क्योंकि फ़ोटो खींचने के लिए सुबह और शाम का समय ही श्रेयकर होता है। बगीचे में तरह-तरह के फ़ूल खिले हुए थे। दूब की हरियाली की छटा देखते ही बन रही थी। मंदिर को विभिन्न रंगों से सजाया गया है। विशाल परिसर में निर्मित मंदिर के वास्तु पर उड़ीसा शैली का प्रभाव दिखाई देता है।  मंदिर के एक तरफ़ अन्न सत्र बना हुआ है। जहां नियत समय पर भोजन की व्यवस्था की जाती है। 
कल्याण आश्रम का भव्य मुख्य द्वार
मंदिर के समक्ष तिमंजला आवासीय भवन है। जिसकी लम्बाई लगभग 300 फ़ुट होगी। मध्य में बगीचा बनाकर इसे सुंदर रुप प्रदान किया गया है। आश्रम के विशाल द्वार के दोनो तरफ़ शार्दुल बनाए गए हैं और मंदिर के सामने दो द्वारपालों की प्रतिमा भी बनी हुई है। मुख्य द्वार के बांए तरफ़ पुस्तकालय एवं एवँ दांए तरफ़ सुरक्षा व्यवस्था के साथ दान ग्रहण करने का काऊंटर भी बना है। इसके साथ पूजा सामग्री एवं रत्न विक्रय करने की दुकान भी दिखाई दी।
मेघों से आच्छादित मंदिर शिखर 
कुछ चित्र लेने के बाद स्नान करके नर्मदे दर्शन करना था। आश्रम के विषय में चड्डा जी से बात शुरु हो गई। रात को जब हम आए तो चड्डा जी ने आश्रम के व्यावस्थापक हिमाद्री मुनि से भेंट करवाई, इस आश्रम की देख-रेख की जिम्मेदारी इन्हीं के कंधो पर है। कल्याण आश्रम द्वारा सीबीएसई से संबंधित भव्य विद्यालय कल्यानिका संचालित होता है। इसके साथ ही उन्होने स्नातक स्तर पर कोई तकनीकि कोर्स भी चलाने की बात कही। आश्रम के द्वारा अस्पताल भी चलाया जाता है, चिकित्सकों की कमी होने के कारण सिर्फ़ बाह्य चिकित्सा लाभ ही मरीजों को मिल पाता है। किसी भी संस्था को चलाने के लिए लगन की आवश्यकता होती है, फ़िर संसाधन तो जुड़ते चले जाते हैं।
विद्यालय परिसर
इस आश्रम के निर्माण के विषय में चड्डा जी ने एक बात और बताई - जब अजीत जोगी शहडोल के कलेक्टर थे तब अमकंटक में कोई बड़ी डकैती पड़ गई। जिसकी जाँच करने के लिए वे भी एस पी के साथ आए। रात को जब इस जगह से निकले तो देखा कि एक साल के पेड़ के नीचे बाबाजी धूनी रमा कर बैठे हैं तभी बरसात के ओले गिरने लग गए। बाबा जी अपने स्थान से हिले नहीं, उन्होने ओलावृष्टि से बचने के लिए अपनी जटाओं को मुंह के सामने कर लिया, जिससे मुंह पर चोट न लगे। यह देख कर अजीत जोगी आगे बढ गए और रेस्ट हाऊस चले गए।
आवासीय परिसर एवं उपवन
सुबह की सैर के वक्त उनके मन में धूनी रमाए बाबा जी से मिलने की इच्छा जगी। वे इधर ही चले आए, देखा तो बाबा जी वर्षा से शीतल हुई धूने की अग्नि को पुन: प्रज्जवलित करने के प्रयास में लगे हैं। अजीत जोगी ने उनसे नाम पूछा तो उन्होने कल्याण बाबा बताया। अमरकंटक आने का प्रयोजन नर्मदा दर्शन एवं साधना करना बताया और कहा कि दो-चार दिन रुक कर चले जाएगें। जोगी जी ने उनसे रुकने का आग्रह किया तो उन्होने ठहरने के लिए झोपड़ी इत्यादि की समस्या बताई। 
नर्मदा तट को जाता रास्ता एव साल वृक्षों की दीवार
जोगी जी ने उन्हें झोपड़ी बनवाकर देने का आश्वासन दिया और पूछा कि आश्रम के लिए कितनी जमीन चाहिए। बाबा जी ने इशारा कर के बताया तो जोगी जी ने उतनी जमीन का नक्शा सिगरेट की पन्नी पर खींच कर उनके नाम करने का आदेश एस डी एम तहसीलदार को कर दिया। पटवारी ने जमीन नापकर प्रतिवेदन संबंधित अधिकारियों को भेज दिया और इस तरह कल्याण आश्रम की नींव पड़ी। आश्रम निर्माण के उपरांत बाबाजी सूखे हुए साल के वृक्ष के नीचे ही तपस्या करते थे। उन्होने आश्रम में प्रवेश नहीं किया था। तब रायपुर स्थित रामकृष्ण आश्रम के संचालक स्वामी आत्मानंद अमरकंटक पधारे। उन्होने बाबा जी से निवेदन किया कि अब आत्म साधना बहुत हो गई, आपकी आवश्यकता समाज को है और आप जनकल्याण के कार्यों में अपने को समर्पित कीजिए। तब बाबा जी ने उनका आग्रह मान कर आश्रम प्रवेश किया और जनकल्याण के कार्य प्रारंभ हो गई। साधना के साथ जनकल्याण का कार्य भी प्रारंभ हो गया। जो आज विशाल रुप में हमारे सामने दिखाई देता है। संकल्प शक्ति में बहुत बल होता है, जो मानव से देवता सदृश्य महान कार्य करवा देता है। 

दुर्गाधारा : अमरकंटक


चानकमार अभ्यारण्य के बीच का सफ़र लगभग 60-65 किलोमीटर का होगा। इतने सफ़र में मैने कहीं पर "पढे, लिखे या डॉ फ़लाँ फ़लाँ से मिले" वाला विज्ञापन नहीं देखा। वनवासियों का इन डॉक्टरों के बिना ही काम चल जाता है। वरना भारत का कोई गांव शहर नहीं है जहाँ चाँदसी विज्ञापन देखने न मिलें। चाँद सी मेहबूबा मिले या न मिले पर चाँदसी विज्ञापन जरुर मिल जाते हैं। यहाँ इस तरह के विज्ञापन मिल भी नहीं सकते क्योंकि बैगा स्वयं परम्परागत चिकित्सक हैं जो जड़ी-बूटियों से अपना इलाज करते हैं। एक बार मुझे भी जड़ी बूटियों का शौक चढा था और अपने बाड़ा में लगभग 100 तरह की जड़ी-बूटियाँ लगाई थी। जब तक नुस्खे अनुभूत न हों तब तक दवाईयों पर विश्वास करना कठिन होता है। हाँ सिमगा के पास एक ऐसे ही कैंसर चिकित्सक का सूचना फ़लक दिखाई दे गया।
फ़ायर वाचर की झोपड़ी
एक बाँस की झोपड़ी दिखाई दी, जिसके बाहर बांस का ही तख्त सा बना हुआ था। चड्डा साहब ने इसका नामकरण "हनीमून कॉटेज" किया। खैर जंगल में यह स्थान हनीमून के लिए भी उचित लगा। बस छत के उपर नीचे से कोई साँप न लटके। वरना इससे हारर हनीमून कहीं दूसरा न मनेगा। वास्तव में यह बांस की झोपड़ी अभ्यारण्य के फ़ायर वाचर का ठिकाना है। जहाँ से वह जंगल की रखवाली करता है। कहीं कोई आग न लगा दे। जंगल की आग से बहुत नुकसान होता है। अभी अप्रेल में ही शिकार पकड़ने के लिए लगाई गई आग ने विकराल रुप धारण कर लिया था। वनवासी एक घेरा बना कर आग लगा देते हैं तथा आग से डर कर खरगोश कोटरी आदि बाहर निकलते हैं तो पता कर लेते हैं। कभी महुआ बीनने वालों की लगाई आग भी विकराल रुप धारण कर लेती है। आग की जानकारी रखने के लिए फ़ायर वाचर नियुक्त किए जाते हैं।  
रास्ते में स्पेशल डिग्री वाले डॉ की दुकान
लमनी से केंवची पहुंचने पर पता चला कि टायर की हवा फ़िर कम हो गई है, सोचे कि यहीं पंचर बनवा लें, परन्तु पंचर दुकान वाला नहाने धोने में व्यस्त था। कहने लगा आधे घंटे बाद काम पर लौटुंगा तब पंचर बनेगा। हमने फ़िर हवा भरवा ली और आगे बढ गए। ट्यूब लेस टायर के पंचर भी हर जगह नहीं बनते। नई विधा को सीखने में समय लगता है। केंवची से एक रास्ता अमरकंटक जाता है तथा दूसरा रास्ता गौरेला पेंड्रा। हमें पेंड्रा में थोड़ी देर के लिए आवश्यक काम था। गौरेला पहुंचने पर टायर की हवा फ़िर कम हो गई। वहाँ पंचर दुकान वाले ने बनाने की सहमती दे दी और हमने नए टायर का जोड़ा डालने के लिए दुकान भी ढूंढ ली। परन्तु टायर मिस्त्री ने आधे घंटे में पंचर बना दिया। हम आधे घंटे और बैठे, दुबारा चेक करवाया तो हवा नहीं निकली थी। चलो बन गया काम। 
केंवची का तिराहा (अमरकंटक एवं रायपुर रोड़)
अमरकंटक जाने के लिए 3 रास्ते हैं, पहला 44 किलोमीटर का रास्ता पेंड्रा रोड़ से केंवची होकर जाता है तथा दो रास्ते गौरेला पेंड्रा से जाते हैं। गौरेला पेंड्रा से 20 किलोमीटर का रास्ता दुर्गाधारा होकर तथा दूसरा 25 किलोमीटर का रास्ता जलेश्वर महादेव होकर जाता है। हमने दुर्गाधारा वाला मार्ग पकड़ा। आश्रम में फ़ोन करके बता दिए कि हम विलंब से पहुंचेगे इसलिए द्वार खुला रखें। दुर्गाधारा होकर अमरकंटक मार्ग की दुरी लगभग 25 किलोमीटर है। पर रास्ता पहाड़ी होने के कारण समय अधिक लगता है। इस रास्ते पर हमें हाईना (लकड़बग्घा) दिखाई दिया। कार की रोशनी में कुछ देर खड़ा रहा फ़िर जंगल में भाग गया। पहाड़ी पर एक स्थान पर बाबाजी ने डेरा बना रखा है। हमने कुछ देर के लिए यहाँ गाड़ी रोकी। इस इलाके में बाक्साईट की पहाड़ियाँ हैं।
दुर्गाधारा में अलाव तापते लोग
हम रात के अंधेरे में दुर्गाधारा पहुंचे, तो वहाँ 5-6 लोग दिखाई दिए, उन्होंने मंदिर के बाहर आग जला रखी और ताप रहे थे। बाहर ठंडी हवा चल रही थी। रात होते ही यहाँ का तापमान और अधिक गिरने वाला था इसलिए मंदिर में रहने वालों ने रात की व्यवस्था कर ली थी। मंदिर के पीछे पहाड़ी छोटा झरना गिरता है। जिसे दुर्गाधारा कहते हैं। चड्डा जी ने बैग से टार्च निकाल कर हमारा मार्गदर्शन किया, वरना अमावश के बाद की पहली रात को घुप्प अंधेरे में दुर्गाधारा तक पहुंचना संभव नहीं था। हमने अंधेरे में ही दुर्गाधारा देखी। थोड़ी देर खड़े रहने पर ठंड लगने लगी। मैं अंधेरे में फ़ोटो लेने का प्रयास किया, मुझे संदेह था कि मेरे कैमरे का फ़्लेश घुप्प अंधेरे में काम करेगा या नहीं। पर रात्रि के हिसाब से परिणाम अच्छा ही आया। यहां से चलकर हम 9 बजे लगभग कल्याण आश्रम पहुंच गए। वहाँ पर हमारे लिए 2 कमरे खोल दिए गए। 
दुर्गाधारा का कैमरे के फ़्लेश के साथ चित्र
विलंब होने से आश्रम में भोजन की व्यवस्था नहीं हो सकी,  हम लगभग 11 बजे बाजार की तरफ़ आ गए। बाजार में एक होटल में दाल-चावल, सब्जी रोटी इत्यादि का भोजन मिल गया। किसी ने बताया था कि एम पी टुरिज्म का रेस्टोरेंट भी है जहाँ भोजन मिल जाता है, पर कीमत अधिक होती है। एक सर्वोदय होटल भी है जहाँ भोजन एवं ठहरने की व्यवस्था है। हम भोजन करके आश्रम लौट आए। अमरकंटक में रात का मौसम ठंडा हो जाता है। इसलिए कंबल की आवश्यकता पड़ जाती है। हमें रात को कंबल की आवश्यकता पड़ी। अब कल अमरकंटक भ्रमण करना है इसलिए बिस्तर के हवाले हो गए






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