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जानिए क्या होता है बस्तर का लांदा और सल्फ़ी
जब भी बस्तर जाना होता है तब बस्तरिया खाना, पेय पदार्थ का स्वाद लेने का मन हो ही जाता है, चाहे, लांदा हो, सल्फ़ी हो या छिंदरस। बस्तर की संस्कृति पहचान ही अलग है। गत बस्तर यात्रा के दौरान अंचल के विशेष पेय पदार्थ एवं भोजन विकल्प सल्फी का रस तथा चावल का लांदा का स्वाद लिया गया। सल्फी का वृक्ष बस्तर अंचल में ही पाया जाता है. चावल को खमीर उठा कर उसका लांदा नामक पेय पदार्थ बनाया जाता है. हाट बाजार में ग्रामीण इसे बेचने आते हैं।
भाई चंद्रा मंडावी लांदा बनाने की रेसीपी और तरीका बताते हुए कहते हैं, लांदा बनाने के लिये चावल को पीस कर उसके आटे को भाप में पकाया जाता है, इसे पकाने के लिए चूल्हे के ऊपर मिटटी की हांड़ी रखी जाती है जिस पर पानी भरा होता है और हांड़ी के ऊपर टुकना जिस पर चावल का आटा होता है। इसे अच्छी तरह भाप में पकाया जाता है, फिर उसे ठंडा किया जाता है।
इसके पश्चात एक अन्य हंडी में पानी आवश्यकता अनुसार लेकर उसमे पके आटे को डाल देते है, साथ ही हंडी में अंकुरित किये मक्का (जोंधरा) के दाने, जिसे अंकुरित करने के लिये ग्रामीण रेत का उपयोग करते है। भुट्टे के अंकुरण के पश्चात उसे भी धुप में सूखा कर उसका भी पावडर बनाया जाता है। लेकिन इसे जांता (ग्रामीण चक्की) में पिसा जाना उपयुक्त माना जाता है। फिर इसे भी कुछ मात्रा में चावल वाले हंडी में डाल दिया जाता है। जिसका उपयोग खमीर के तौर पर किया जाना बताते है और गर्मी के दिनों में 2-3 दिन, ठण्ड में थोडा ज्यादा समय के लिए रख देते है। तैयार लांदा को 1-2 दिन में उपयोग करना होता है अन्यथा इसमें खट्टापन बढ़ जाता है। बस्तर में दुःख, त्यौहार या कहीं मेहमानी करने जाने पर भी लोग इसे लेकर चलते है।
सल्फ़ी के विषय में बताते हुए चंद्रा मंडावी कहते हैं, वहीं सल्फी पेड़ का रस है, जो ताज़ा निकला मीठा होता है और दिन चड़ने के साथ इसमें भी कडवाहट आती जाती है। इसका उपयोग नशे के लिए तो किया जाता है पर सामाजिक क्रियाकलापों में इसकी भी भूमिका अहम् है।| इन दिनों सल्फी पेड़ की जड़ में एक बेक्टीरिया के संक्रमण के कारण सल्फी के पेड़ मर रहे है, जिस पर हमारे बस्तर के वैज्ञानिक शोध कर रहे है और जहाँ तक रोकथाम के उपाय भी खोज लिये गये है।
भाई चंद्रा मंडावी लांदा बनाने की रेसीपी और तरीका बताते हुए कहते हैं, लांदा बनाने के लिये चावल को पीस कर उसके आटे को भाप में पकाया जाता है, इसे पकाने के लिए चूल्हे के ऊपर मिटटी की हांड़ी रखी जाती है जिस पर पानी भरा होता है और हांड़ी के ऊपर टुकना जिस पर चावल का आटा होता है। इसे अच्छी तरह भाप में पकाया जाता है, फिर उसे ठंडा किया जाता है।
इसके पश्चात एक अन्य हंडी में पानी आवश्यकता अनुसार लेकर उसमे पके आटे को डाल देते है, साथ ही हंडी में अंकुरित किये मक्का (जोंधरा) के दाने, जिसे अंकुरित करने के लिये ग्रामीण रेत का उपयोग करते है। भुट्टे के अंकुरण के पश्चात उसे भी धुप में सूखा कर उसका भी पावडर बनाया जाता है। लेकिन इसे जांता (ग्रामीण चक्की) में पिसा जाना उपयुक्त माना जाता है। फिर इसे भी कुछ मात्रा में चावल वाले हंडी में डाल दिया जाता है। जिसका उपयोग खमीर के तौर पर किया जाना बताते है और गर्मी के दिनों में 2-3 दिन, ठण्ड में थोडा ज्यादा समय के लिए रख देते है। तैयार लांदा को 1-2 दिन में उपयोग करना होता है अन्यथा इसमें खट्टापन बढ़ जाता है। बस्तर में दुःख, त्यौहार या कहीं मेहमानी करने जाने पर भी लोग इसे लेकर चलते है।
सल्फ़ी के विषय में बताते हुए चंद्रा मंडावी कहते हैं, वहीं सल्फी पेड़ का रस है, जो ताज़ा निकला मीठा होता है और दिन चड़ने के साथ इसमें भी कडवाहट आती जाती है। इसका उपयोग नशे के लिए तो किया जाता है पर सामाजिक क्रियाकलापों में इसकी भी भूमिका अहम् है।| इन दिनों सल्फी पेड़ की जड़ में एक बेक्टीरिया के संक्रमण के कारण सल्फी के पेड़ मर रहे है, जिस पर हमारे बस्तर के वैज्ञानिक शोध कर रहे है और जहाँ तक रोकथाम के उपाय भी खोज लिये गये है।
जनमानस में राम - सारासोर सरगुजा
छत्तीसगढ़ अंचल की प्राकृतिक सुंदरता का कोई सानी नहीं है। नदी, पर्वत, झरने, गुफ़ाएं-कंदराएं, वन्य प्राणी आदि के हम स्वयं को प्रकृति के समीप पाते हैं। अंचल के सरगुजा क्षेत्र पर प्रकृति की विशेष अनुकम्पा है, चारों तरफ़ हरितिमा के बीच प्राचीन स्थलों के साथ रमणीय वातावरण मनुष्य को मोहित कर लेता है।
ऐसा ही एक स्थान अम्बिकापुर-बनारस मार्ग पर 40 किलोमीटर भैंसामुड़ा से 15 किलोमीटर की दूरी पर है, जिसे सारासोर कहा जाता है। इस स्थान का पौराणिक महत्व सदियों से है। यहाँ महान नदी की निर्मल जलधारा दो पहाड़ियों को चीरते हुए बहती है तथा इस स्थान पर हिन्दुओं का धामिक स्थल भी है। सारासोर जलकुण्ड है, यहाँ महान नदी खरात एवं बड़का पर्वत को चीरती हुई पूर्व दिशा में प्रवाहित होती है।
पौराणिक महत्व - किंवदन्ति है कि पूर्व काल में खरात एवं बड़का पर्वत दोनों आपस में जुड़े हुए थे। राम वन गमन के समय राम-लक्ष्मण एवं सीता जी यहाँ आये थे तब पर्वत के उस पार यहाँ ठहरे थे। पर्वत में एक गुफा है जिसे जोगी महाराज की गुफा कहा जाता है। सारासोर के पार सरा नामक राक्षस ने उत्पात मचाया था तब उनके संहार करने के लिये रामचंद्रजी के बाण के प्रहार से ये पर्वत अलग हो गए और उस पार जाकर उस सरा नामक राक्षस का संहार किया था। तब से इस स्थान का नाम सारासोर पड़ गया।
सारासोर में दो पर्वतों के मध्य से अलग होकर उनका हिस्सा स्वागत द्वार के रूप में विद्यमान है। नीचे के हिस्से में नदी कुण्डनुमा आकृति में काफी गहरी है इसे सीताकुण्ड कहा जाता है। सीताकुण्ड में सीताजी ने स्नान किया था और कुछ समय यहाँ व्यतीत कर नदी मार्ग से पहाड़ के उस पार गये थे। आगे महान नदी ग्राम ओडगी के पास रेण नदी से संगम करती है। दोनो पर्वतों की कटी हुई चट्टाने इस तरह से दिखाई देती हैं जैसे किसी ने नदी को इस दिशा में प्रवाहित करने के लिए श्रम पूर्वक पर्वत को काटा हो।
वर्तमान में नदी बीच की छोटी पहाड़ी पर मंदिर बना हुआ है। यहाँ कुछ साधू पर्णकुटी बना कर निवास करते हैं और वे भी मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं। इस स्थान पर श्रद्धालुओं का सतत प्रवास रहता है। इस सुरम्य स्थल पर पहुंचने के बाद यहाँ एक-दो दिन नदी के तीर पर ठहरने का मन करता है। यहाँ मंदिर समिति द्वारा निर्मित यात्री निवास भी हैं। जहाँ समिति की आज्ञा से रात्रि निवास किया जा सकता है।
कैसे पहुंचे? - अम्बिकापुर से बनारस मार्ग पर सतत वाहन सुविधा है तथा भैंसा मुड़ा पहुंच कर स्थानीय संसाधनों प्रयोग किया जा सकता है। स्वयं के साधन से जाना उत्तम रहेगा।
मिट्टी का कूकर : छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ के बालोद जिला मुख्यालय से लगभग दस किमी दूर दिसम्बर 2010 में एक गांव में कुम्हार परिवार से मिलने गया था। गांव का नाम भूल रहा हूँ। उस कुम्हार ने मिट्टी के भाण्डों को नवोन्मेष कर नया रुप दिया था।
उपरोक्त चित्र में दिख रहा मिट्टी का कूकर उसने तैयार किया था, जो धातु के कूकर जैसे ही कार्य करता है एवं इसमें पकाया गया भोजन माटी की सौंधी खुश्बू लिए होता है।
औद्योगिकरण ने सबसे अधिक चोट भारत के परम्परागत शिल्प पर की, जबकि यह हमारी प्राचीन अर्थ व्यवस्था की रीढ़ था। इसके एवज में मशीनें खड़ी की और परम्परागत शिल्प को मटियामेट कर दिया।
जो कुशल हाथ अद्भुत कृतियों को गढ़ते थे वे जीवनयापन करने के लिए परम्परागत व्यवसाय को त्याग कर मजदूरी कर रहें हैं। आजादी के बाद की सरकारें अंग्रेजों की परिपाटी पर चली और परम्परागत शिल्प व्यवसाय चौपट हो गया।
नये शोध आने पर अब लोग पुनः जागरूक होते दिखाई दे रहे हैं, शहरों में मिट्टी के तवे बिकते दिखाई देते हैं। यह पता नहीं कि लोग इनकी खरीदी ड्राइंग रुम की शोभा बढ़ाने के लिए करते हैं या भोजन पकाने के लिए।
वैसे भोजन पकाने के लिए मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग स्वास्थ्य एवं देश की अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी है। मिट्टी के बर्तनों में चूल्हे की धुंगिया खुशबू के साथ बने भोजन का कहना ही क्या है।
खजुराहो शैली की प्रतिमाएँ : फ़णीकेश्वर महादेव
रायपुर से 70 किमी की दूरी पर फ़िंगेश्वर कस्बे में त्रिआयतन शैली का प्राचीन शिवालय है। त्रिआयतन से तात्पर्य है कि तीन गर्भगृह और संयुक्त मंडप। इन तीन गर्भ गृहों में मुख्य में फ़णीकेश्वर महादेव विराजे हैं और द्वितीय में शंख, गदा, पद्म चक्रधारी विष्णु स्थानक मुद्रा में हैं और तीसरे में मंदिर का कलश रखा हुआ है।
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| फ़णीकेश्वर महादेव फ़िंगेश्वर |
इस मंदिर का मंडप सोलह स्तंभो पर निर्मित है। मंदिर का स्थापत्य उतना सुडौल एवं सुंदर नहीं है, जितना पाली एवं जांजगीर के कल्चुरी कालीन मंदिरों का शिल्प है। शिल्प की दृष्टि से यह परवर्ती काल तेरहवीं या चौदहवीं शताब्दी का माना जा सकता है।
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| मिथुन प्रतिमा फ़णीकेश्वर महादेव |
मंदिर की भित्तियों पर दो थरों में हल्के काले रंग के पत्थरों पर उकेरी गई प्रतिमाएँ जड़ी हुई हैं। इनमें भक्ति एवं भोग दोनों प्रदर्शित किए गए हैं। मिथुन प्रतिमाएं उस काल की शिल्प परम्परा का पालन करती दिखाई देती हैं। इन मिथुन प्रतिमाओं में वात्सायन के काम सूत्र में वर्णित, चुंबन, आलिंगन, मैथुन आदि को प्रदर्शित किया गया है। इसके साथ ही राम एवं कृष्ण से संबंधित प्रतिमाएँ भी दिखाई देती है।
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| गंधर्व नृत्य गान |
भित्ति शिल्प में मुरलीधर, अहिल्या उद्धार, हनुमान द्वारा शिव पूजन, उमा महेश्वर, नृसिंह अवतार, मत्स्यावतार, वराह अवतार, मेघनाद एवं लक्ष्मन का युद्ध, नृत्यांगनाएं एवं बादक, दर्पणधारी अप्सरा मुग्धा को भी स्थान दिया है।
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| मिथुन शिल्प फ़्णीकेश्वर महादेव |
इस मंदिर के निर्माण के पार्श्व में छ: मासी रात वाली किंवदन्ति प्रचलित है। निश्चित तिथि पर मंदिर तैयार हो गया परन्तु कलश चढाने की समयावधि निकलने के कारण कलश नहीं चढ़ पाया और उसे एक गर्भ गृह में ही स्थापित कर दिया गया।
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| रामायण के प्रसंग का अंकन |
तिरानवे वर्षीय राजा महेन्द्र बहादुर कहते हैं कि उनके नाना के पुर्वज दो ढाई सौ वर्ष पहले जंगल में शिकार करने आए थे। यहाँ आकर उन्होंने झाड़ झंखाड़ के घिरे हुए इस सुंदर मंदिर को देखा तो इस स्थान पर ही बसने का निश्चय कर लिया। उन्होंने अपनी जमीदारी का मुख्यालय फ़िंगेश्वरी को बना लिया और समस्त धार्मिक कर्मकांड इस शिवालय से ही सम्बद्ध हो गए।
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| मिथुनांकन फ़णीकेश्वर महादेव |
फ़णीकेश्वर महादेव पंचकोसी यात्रा में सम्मिलित महादेव हैं, यहाँ मकर संक्राति के समय पंचकोसी यात्रा होती है। मान्यता है कि विष्णु के नाभि पद्म की पांच पंखुड़ियाँ चम्पारण, पटेवा, फ़िंगेश्वर, कोपरा एवं बहम्नेश्वर नामक स्थाक पर गिरी एवं उनसे चम्पेश्वर, पाटेश्वर, फ़णीकेश्वर, कर्पुरेश्वर, एवं बह्मनेश्वर नामक शिवलिंग पांच कोस में प्रकट हुए और तभी से श्रद्धालुओं द्वारा पंचकोसी यात्रा की जाती है।
फ़णीकेश्वर महादेव नाम से प्रतीत होता है कि इसका निर्माण कलचुरी राजाओं के अधिन फ़णिनागवंशी शासकों ने कराया होगा। परवर्ती काल का होने कारण इसके प्रतिमा शिल्प में सुंदर सुडौलता नहीं होने पर इसका महत्व कम नहीं हो जाता।
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| ऊमा महेश्वर दरबार |
यहाँ शक्ति उपासना का त्यौहार दशहरा उत्सव भी परम्परागत रुप से दो ढाई शताब्दियों से मनाया जाता है। यह पर्व दशमी तिथि को न मनाकर त्रयोदशी को मनाया जाता है।
इस दिन समस्त मंदिरों में ध्वजारोहण के साथ पूजा पाठ किया जाता है। फ़िर महल से सवारी निकाली जाती है और नगर भ्रमण किया जाता है। इसके पश्चात महल में पान सुपारी (अतिथि स्वागत) की परम्परा का पालन किया जाता है।
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| लो भई आखिर में हम भी आ गए |
इस शिवालय की भित्तियों में जड़ी मिथुन प्रतिमाएँ किसी अन्य मंदिर से कम नहीं है और यह छत्तीसगढ़ के इतिहास की बहुमूल्य धरोहर है।
श्रीपुर की महारानी वासटा की शिलालेखीय आज्ञा
छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध 7वीं शताब्दी ईस्वीं में ईष्टिका निर्मित मंदिर (लक्ष्मण मंदिर) का निर्माण महारानी (राजमाता) वासटा ने करवाया था। मंदिर निर्माण एवं उसकी व्यवस्था को लेकर एक शिलालेख खंडित मंदिर का मलबा साफ़ करते हुए प्राप्त हुआ था।
महाशिवगुप्त बालार्जुन की माता वासटा मगध के राजा सूर्यवर्मा की पुत्री थी। इस शिलालेख में लिखा है कि अपने वैष्णव पति की स्मृति में राजमाता वासटा ने हरि (विष्णु) मंदिर का निर्माण कराया।
इस शिलालेख की प्रशस्ति रचना करने वाले का नाम कवि ईशान उल्लेखित है जिसका उपनाम चिंतातुरांक था। इस लेख में 26 पंक्तियाँ और छंदबद्ध 42 श्लोक रचे गए हैं।
महाशिवगुप्त बालार्जुन की माता वासटा मगध के राजा सूर्यवर्मा की पुत्री थी। इस शिलालेख में लिखा है कि अपने वैष्णव पति की स्मृति में राजमाता वासटा ने हरि (विष्णु) मंदिर का निर्माण कराया।
इस शिलालेख की प्रशस्ति रचना करने वाले का नाम कवि ईशान उल्लेखित है जिसका उपनाम चिंतातुरांक था। इस लेख में 26 पंक्तियाँ और छंदबद्ध 42 श्लोक रचे गए हैं।
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| सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर, जिसका निर्माण महारानी वासटा ने कराया था |
मैं विशेष रुप से मंदिर की संचालन व्यवस्था की जानकारी हेतु इसका उल्लेख कर रहा हूँ। प्रशस्ति के उत्तरार्ध में मंदिर के प्रतिपालन एवं प्रबंधन के लिए की गई व्यवस्था का उल्लेख है।
बताया गया है कि तोडंकण, मधुवेढ, नालीपद्र, कुरुपद्र और वाणपद्र नामक पाँच गांव मंदिर में दिए गए थे। उन गाँव से होने वाली आय को चार भागों में विभाजित किया गया था।
इसमें से एक-एक भाग मंदिर में आयोजित सत्र (सामूहिक भोजन), मंदिर चालू मरम्मत, और पुजारी के परिवार के पोषण हेतु क्रमश: दिया गया था।
आय का चौथा हिस्सा बचाकर उसके बराबर पन्द्रह भाग किए गए और 1- त्रिविक्रम, 2-अर्क, 3-विष्णुदेव, 4-महिरदेव, इन चारों ॠग्वेदी ब्राह्मणों, 5- कर्दपोपाध्याय, 6- भास्कर, 7-मधुसूदन तथा 8- वेदगर्भ, इन चार यजुर्वेदी ब्राह्मणों, 9- भास्कर देव, 10- स्थिरोपाध्याय, 11-त्रैलोक्यहंस तथा 12- मोउट्ठ, इन चार सामवेदी ब्राह्मणों तथा 13 - स्वस्तिकवाचक वासवनन्दी, 14 - वामन एवं 15 - श्रीधर नामक भागवत ब्राह्मणों को एक-एक भाग दान दिया गया था।
यह आय उनके पुत्र-पौत्रों को भी प्राप्त होते रहने की व्यवस्था की गई थी। यदि वे लोग भी छ: अंग युक्त और अग्निहोत्री रहें तथा जुआ, वेश्यागमन आदि के व्यसनी न हों और न ही किसी की चाकरी करें।
बताया गया है कि तोडंकण, मधुवेढ, नालीपद्र, कुरुपद्र और वाणपद्र नामक पाँच गांव मंदिर में दिए गए थे। उन गाँव से होने वाली आय को चार भागों में विभाजित किया गया था।
इसमें से एक-एक भाग मंदिर में आयोजित सत्र (सामूहिक भोजन), मंदिर चालू मरम्मत, और पुजारी के परिवार के पोषण हेतु क्रमश: दिया गया था।
आय का चौथा हिस्सा बचाकर उसके बराबर पन्द्रह भाग किए गए और 1- त्रिविक्रम, 2-अर्क, 3-विष्णुदेव, 4-महिरदेव, इन चारों ॠग्वेदी ब्राह्मणों, 5- कर्दपोपाध्याय, 6- भास्कर, 7-मधुसूदन तथा 8- वेदगर्भ, इन चार यजुर्वेदी ब्राह्मणों, 9- भास्कर देव, 10- स्थिरोपाध्याय, 11-त्रैलोक्यहंस तथा 12- मोउट्ठ, इन चार सामवेदी ब्राह्मणों तथा 13 - स्वस्तिकवाचक वासवनन्दी, 14 - वामन एवं 15 - श्रीधर नामक भागवत ब्राह्मणों को एक-एक भाग दान दिया गया था।
यह आय उनके पुत्र-पौत्रों को भी प्राप्त होते रहने की व्यवस्था की गई थी। यदि वे लोग भी छ: अंग युक्त और अग्निहोत्री रहें तथा जुआ, वेश्यागमन आदि के व्यसनी न हों और न ही किसी की चाकरी करें।
यदि कोई इसके विपरीत आचरण करे अथवा कोई निपूता मर जाय तो उसके स्थान पर विद्या और वय से वृद्ध संबंधी को सम्मिलित कर लेने की व्यवस्था कर दी गई थी। किन्तु यह चुनाव उपर्युक्त ब्राह्मणों की सहमति से ही हो सकता था, राजाज्ञा से नहीं।
ब्राह्मण अपने भाग को न तो किसी को दान में दे सकते थे, न बेच सकते थे और न ही गहन धर सकते थे। इन सबके भोजन की भी व्यवस्था की गई थी और महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रशस्ति के लेखक आर्य गोण्ण के भोजन की व्यवस्था भी की गई थी।
ब्राह्मण अपने भाग को न तो किसी को दान में दे सकते थे, न बेच सकते थे और न ही गहन धर सकते थे। इन सबके भोजन की भी व्यवस्था की गई थी और महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रशस्ति के लेखक आर्य गोण्ण के भोजन की व्यवस्था भी की गई थी।
एक अन्य ग्राम वर्गुल्लक भगवान के लिए बलि, चरु, नैवेद्य तथा सत्र के लिए अलग से दिया गया था। इसका प्रबंध पुजारी, मुख्य मुख्य ब्राह्मणों की सलाह से करता था।
भावी राजाओं से प्रार्थना की गई है कि वे इस स्थिति का पालन करेगें। इसके साथ ही मंदिर का निर्माण करने वाले कारीगर केदार के नाम का उल्लेख है।
परन्तु कारीगर के जीविकोपार्जन के लिए क्या व्यवस्था की गई है, इसका उल्लेख नहीं मिलता। ईष्टिका निर्मित यह भव्य मंदिर आज भी शान से अटल है और दर्शनीय है।
भावी राजाओं से प्रार्थना की गई है कि वे इस स्थिति का पालन करेगें। इसके साथ ही मंदिर का निर्माण करने वाले कारीगर केदार के नाम का उल्लेख है।
परन्तु कारीगर के जीविकोपार्जन के लिए क्या व्यवस्था की गई है, इसका उल्लेख नहीं मिलता। ईष्टिका निर्मित यह भव्य मंदिर आज भी शान से अटल है और दर्शनीय है।
हिंगलाज माता का बलोचिस्तान से छत्तीसगढ़ का सफ़र
सरगुजा भ्रमण के दौरान सुरजपुर जिले के प्रतापपुर के प्राचीन मंदिरों का छायांकन किया। यहाँ राजा के बनवाए हुए कई मंदिर हैं जो सतत पूजित हैं। साथी अजय चतुर्वेदी एक स्थान पर मुझे ले गए जो अम्बिकापुर रोड़ पर एक रिहायशी मकान के पीछे था।
यहाँ चबूतरे पर गोल पाषाण की एक चट्टान रखी है। इसे उन्होनें "हिंगलाज" माता का स्थान बताया। जिसे देख कर मैं चकित रह गया। चकित होने का कारण भी था। जिस तरह ग्रामीण अंचल में देवगुड़ी होती है और ठाकुर देवता बिना किसी छत के चबूतरे विराजते हैं उसी तरह "हिंगलाज" माई भी यहां विराजमान थी।
छत्तीसगढ़ में मैने अन्य किसी स्थान पर हिंगलाज माता की विराजित होना नहीं पाया। न हि कहीं उत्खनन में उनकी कोई प्रतिमा प्राप्त होने की जानकारी मुझे है। पूछने पर पता चला कि प्रतापपुर के सभी देवता रक्सेल राजाओं की रियासत के पूर्व से हैं। उस समय यहाँ गोंड़ राजाओं का शासन होता था।
यहाँ चबूतरे पर गोल पाषाण की एक चट्टान रखी है। इसे उन्होनें "हिंगलाज" माता का स्थान बताया। जिसे देख कर मैं चकित रह गया। चकित होने का कारण भी था। जिस तरह ग्रामीण अंचल में देवगुड़ी होती है और ठाकुर देवता बिना किसी छत के चबूतरे विराजते हैं उसी तरह "हिंगलाज" माई भी यहां विराजमान थी।
छत्तीसगढ़ में मैने अन्य किसी स्थान पर हिंगलाज माता की विराजित होना नहीं पाया। न हि कहीं उत्खनन में उनकी कोई प्रतिमा प्राप्त होने की जानकारी मुझे है। पूछने पर पता चला कि प्रतापपुर के सभी देवता रक्सेल राजाओं की रियासत के पूर्व से हैं। उस समय यहाँ गोंड़ राजाओं का शासन होता था।
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| हिंगलाज माता प्रतापपुर सरगुजा छत्तीसगढ़ |
मेरी जानकारी में हिंगलाज माता के 3 तीन स्थान, पहला पाकिस्तान के बलोचिस्तान में, दूसरा उड़ीसा के तालचर से 14 किमी की दूरी पर और तीसरा वाराणसी की एक गुफा क्रीं कुण्ड में बाबा कीनाराम द्वारा स्थापित हिंगलाज माता की प्रतिमूर्ति है।
पाकिस्तान के बलोचिस्तान राज्य में हिंगोल नदी के समीप हिंगलाज क्षेत्र में स्थित हिंगलाज माता मंदिर हिन्दू भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र और प्रधान 51 शक्तिपीठों में से एक है।
पौराणिक कथानुसार जब भगवान शंकर माता सती के मृत शरीर को अपने कंधे पर लेकर तांडव नृत्य करने लगे, तो ब्रह्माण्ड को प्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता के मृत शरीर को 51 भागों में काट दिया. मान्यतानुसार हिंगलाज ही वह जगह है जहां माता का सिर गिरा था.
यहां माता सती कोटटरी रूप में जबकि भगवान भोलेनाथ भीमलोचन भैरव रूप में प्रतिष्ठित हैं। माता हिंगलाज मंदिर परिसर में श्रीगणेश, कालिका माता की प्रतिमा के अलावा ब्रह्मकुंड और तीरकुंड आदि प्रसिद्ध तीर्थ हैं।
पाकिस्तान के बलोचिस्तान राज्य में हिंगोल नदी के समीप हिंगलाज क्षेत्र में स्थित हिंगलाज माता मंदिर हिन्दू भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र और प्रधान 51 शक्तिपीठों में से एक है।
पौराणिक कथानुसार जब भगवान शंकर माता सती के मृत शरीर को अपने कंधे पर लेकर तांडव नृत्य करने लगे, तो ब्रह्माण्ड को प्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता के मृत शरीर को 51 भागों में काट दिया. मान्यतानुसार हिंगलाज ही वह जगह है जहां माता का सिर गिरा था.
यहां माता सती कोटटरी रूप में जबकि भगवान भोलेनाथ भीमलोचन भैरव रूप में प्रतिष्ठित हैं। माता हिंगलाज मंदिर परिसर में श्रीगणेश, कालिका माता की प्रतिमा के अलावा ब्रह्मकुंड और तीरकुंड आदि प्रसिद्ध तीर्थ हैं।
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| गुफ़ा में बिराजी हिन्गलाज माता बलोचिस्तान पाकिस्तान |
वैसे छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में माता सेवा में गाए जाने वाली पारम्परिक सेवा गीतों (जस गीत) में माता हिंगलाज का उल्लेख आता है तथा देवी के मान्य रुपों के साथ हिंगलाज माता की आराधना भी की जाती है। महामाई की आरती में भी हिंगलाज माता का स्मरण किया जाता है। यथा -
गढ़ हिंगलाज में गड़े हिंडोला
लख आये लख जाए
लख आये लख जाए
माता लख आए लख जाए
एक नइ आवय लाल लगुंरवा
जियरा के परान अधार
महामाई ले लो आरती हो माय
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| गुफ़ा में बिराजी हिन्गलाज माता बलोचिस्तान पाकिस्तान में भक्तगण |
सारंगढ बिलासपुर रोड पर भटगाँव के समीप देवसागर में हिंगलाज माता है, सुना है सारंगढ राजा कही से ला रहे थे तो वही विराजमान हो गई।छिन्दवाड़ा जिले में हिंगलाज का भव्य मंदिर है।यह आदि संस्कृति के मातृ पूजा का ही एक रूप है...
मातृ पूजा या शक्ति पूजा भारतीय संस्कृति की मुख्यधाराओं में से एक है और लोक संस्कृतियों में झलक मिलती है...नाम, स्थान और भाषा भिन्न हो सकती है..जैसे छत्तीसगढ़ में हिंगलाज माता को बंजारी, बूढीमाई, माई, महामाई, इत्यादि कहा जाता है।
यह प्रायः अनगढ़ शिला खंड के रूप में पाई जाती है। सुतियापाठ (सहसपुर लोहारा से करीब 15 km दूर) पहाड़ ऊपर हिंगलाज माई बिराजी हैं यहाँ दुर्गम रास्ता तय करके पहुंचा जा सकता है। इसके समीप गहरी सुरंग हैं और नदी भी प्रवाहित होती है।
अब किस तरह हिंगलाज माता बलोचिस्तान से छत्तीसगढ़ का सफ़र तय करते हुए लोकगीतों में समाहित हुई और अन्य देवी के साथ आराध्य हुई, यह शोध का विषय है। इसके साथ ही सरगुजा के प्रतापपुर के अलावा अन्य स्थानों पर मिलना भी कम रोचक नहीं है।
मातृ पूजा या शक्ति पूजा भारतीय संस्कृति की मुख्यधाराओं में से एक है और लोक संस्कृतियों में झलक मिलती है...नाम, स्थान और भाषा भिन्न हो सकती है..जैसे छत्तीसगढ़ में हिंगलाज माता को बंजारी, बूढीमाई, माई, महामाई, इत्यादि कहा जाता है।
यह प्रायः अनगढ़ शिला खंड के रूप में पाई जाती है। सुतियापाठ (सहसपुर लोहारा से करीब 15 km दूर) पहाड़ ऊपर हिंगलाज माई बिराजी हैं यहाँ दुर्गम रास्ता तय करके पहुंचा जा सकता है। इसके समीप गहरी सुरंग हैं और नदी भी प्रवाहित होती है।
अब किस तरह हिंगलाज माता बलोचिस्तान से छत्तीसगढ़ का सफ़र तय करते हुए लोकगीतों में समाहित हुई और अन्य देवी के साथ आराध्य हुई, यह शोध का विषय है। इसके साथ ही सरगुजा के प्रतापपुर के अलावा अन्य स्थानों पर मिलना भी कम रोचक नहीं है।
मीना बाज़ार का इतिहास एवं वर्तमान
नगर में मीना बाज़ार लगा हुआ है, सांझ होते ही उदय भैया का मन मीना बाजार घूमने का करता है। यहाँ मनोरंजन के कई साधन जुटाए गए हैं।
जिसमें कई तरह के झुले, मौत का कुंआ, नाचने वाली सोलह साल की नागिन के साथ खिलौनों, टिकुली फ़ुंदरी की दुकान एवं खाने के लिए चाट पकौड़ी की दुकाने भी लगी हैं।
कुल मिलाकर बच्चों एवं महिलाओं के मनोरंजन का समस्त साधन जुटाया गया है। वैसे तो वर्तमान में मीना बाजार मेले-ठेलों में दिखाई देते हैं, परन्तु बरसाती खर्चा निकालने के लिए मीना बाजार वाले कस्बों का रुख कर लेते हैं।
जिसमें कई तरह के झुले, मौत का कुंआ, नाचने वाली सोलह साल की नागिन के साथ खिलौनों, टिकुली फ़ुंदरी की दुकान एवं खाने के लिए चाट पकौड़ी की दुकाने भी लगी हैं।
कुल मिलाकर बच्चों एवं महिलाओं के मनोरंजन का समस्त साधन जुटाया गया है। वैसे तो वर्तमान में मीना बाजार मेले-ठेलों में दिखाई देते हैं, परन्तु बरसाती खर्चा निकालने के लिए मीना बाजार वाले कस्बों का रुख कर लेते हैं।
भारत में मीना बाजार रजवाड़ों में लगाए जाते थे, जिसमें सिर्फ़ महिलाओं का प्रवेश ही होता था। रजवाड़ों की महिलाओं की सौंदर्य प्रसाधन एवं अन्य आवश्यकता की वस्तुओं की पूर्ति मीना बाजारों के माध्यम से की जाती थी।
आमेर के किले रनिवास में मीना बाजार लगने का उल्लेख मिलता है, जहाँ रनिवास की महिलाएँ, गहने गुंथे, चूड़ियां, कपड़े इत्यादि की खरीदी करती थी। इसके साथ ही मनोरंजन भी हो जाता था।
मीना बाजार नामकरण के पीछे प्रतीत होता है कि गहनों पर की जाने वाली मीनाकारी के नाम पर ही इसका नाम मीना बाजार पड़ा होगा।
आमेर के किले रनिवास में मीना बाजार लगने का उल्लेख मिलता है, जहाँ रनिवास की महिलाएँ, गहने गुंथे, चूड़ियां, कपड़े इत्यादि की खरीदी करती थी। इसके साथ ही मनोरंजन भी हो जाता था।
मीना बाजार नामकरण के पीछे प्रतीत होता है कि गहनों पर की जाने वाली मीनाकारी के नाम पर ही इसका नाम मीना बाजार पड़ा होगा।
इतिहास में पीछे मुड़कर देखें तो अकबर में काल में मीना बाजार बहुत बदनाम हुए। अकबर की काम लालसा ने दिल्ली में मीना बाजार लगवाना प्रारंभ किया, जिसमें सिर्फ़ स्त्रियों का ही प्रवेश होता था और बाजार की चौकीदारी के लिए तातारी महिलाएं नियुक्त कर रखी थी।
बाजार में आने वाली कोई भी महिला उसे पसंद आ जाती तो उठवा लिया करता था। बीकानेर के राव कल्याणमल की पुत्रवधु सिसौदिया वंश की किरण कुंवर से लात खाने के बाद उसने मीना बाजार की नौटंकी बंद की।
बाजार में आने वाली कोई भी महिला उसे पसंद आ जाती तो उठवा लिया करता था। बीकानेर के राव कल्याणमल की पुत्रवधु सिसौदिया वंश की किरण कुंवर से लात खाने के बाद उसने मीना बाजार की नौटंकी बंद की।
भोपाल में भी रिसायती दौर में मीना बाजार लगने की जानकारी मिलती है, जहाँ इसे परी बाजार कहा जाता था। ब्रिटेन की महारानी सन् 1909 में जब भोपाल आई तो प्रिंसेस ऑफ वेल्स क्लब की स्थापना हुई।
वर्ष 1916 में बेगम सुल्तानजहाँ ने महिला क्लब के माध्यम से मीना बाजार लगाया। बाजार में महिलाओं द्वारा निर्मित हस्तशिल्प सामग्री बिक्री के लिये रखी जाती थी उस दौर में मीना बाजार को परी-बाजार इसलिये कहा जाता था,
क्योंकि पढ़ी-लिखी बच्चियाँ सुंदर वस्त्र धारण कर परी के रूप में इन मेलों में भाग लेती थीं। पुराने भोपाल में आज भी एक मोहल्ला परी बाजार कहलाता है।
वर्ष 1916 में बेगम सुल्तानजहाँ ने महिला क्लब के माध्यम से मीना बाजार लगाया। बाजार में महिलाओं द्वारा निर्मित हस्तशिल्प सामग्री बिक्री के लिये रखी जाती थी उस दौर में मीना बाजार को परी-बाजार इसलिये कहा जाता था,
क्योंकि पढ़ी-लिखी बच्चियाँ सुंदर वस्त्र धारण कर परी के रूप में इन मेलों में भाग लेती थीं। पुराने भोपाल में आज भी एक मोहल्ला परी बाजार कहलाता है।
इस तरह अन्य स्थानों पर नवाबों द्वारा मीना बाजार लगाने का उल्लेख मिलता है। लखनऊ के कैसर बाग से लेकर पाकिस्तान के लाहौर तक मीना बाजार महिलाओं की आवश्यकता वस्तुओं की पूर्ति करते थे।
राजे रजवाड़े खत्म हो गए, परन्तु आज भी मीना बाजार चल रहे हैं, उनकी वही रौनक है, जो पहले हुआ करती थी। अब मेलों-ठेलों में मीना बाजार दिखाई देते हैं, जो एक स्थान से दूसरे स्थान तक सफ़र करते रहते हैं।
राजे रजवाड़े खत्म हो गए, परन्तु आज भी मीना बाजार चल रहे हैं, उनकी वही रौनक है, जो पहले हुआ करती थी। अब मेलों-ठेलों में मीना बाजार दिखाई देते हैं, जो एक स्थान से दूसरे स्थान तक सफ़र करते रहते हैं।
कई स्थानों के हाट अब स्थाई बाजारों में बदल गए, सूरत का चौटा बाजार, रायपुर की टुरी हटरी, बिलासपुर का गोलबाजार इस तरह सभी स्थानों पर स्थाई बाजार हो गए हैं।
भले ही मीना बाजारों के ढांचे में बदलाव आया है परन्तु मीना बाजारों को देखकर लगता है कि इतिहास की एक महत्वपूर्ण परम्परा हमारे बीच जीवित है।
भले ही मीना बाजारों के ढांचे में बदलाव आया है परन्तु मीना बाजारों को देखकर लगता है कि इतिहास की एक महत्वपूर्ण परम्परा हमारे बीच जीवित है।
प्रकृति का अजूबा जलजली (दलदली) मैनपाट
राजधानी रायपुर से 352 किलोमीटर अम्बिकापुर एवं अम्बिकापुर से 45 किलोमीटर छत्तीसगढ़ का शिमला एवं निर्वासित तिब्बतियों की शरण स्थली मैनपाट स्थित है।
मैनपाट के ग्राम कमलेश्वरपुर के इर्द गिर्द शरणार्थी तिब्बतियों के कैम्प हैं। यहीं पर पर्यटन विभाग के शैला रिसोर्ट से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर जलजली (दलदली) नदी है।
इस नदी का लगभग 3 एकड़ का क्षेत्र ऐसा है कि इस पर कूदने से यह हिलता है। इसे जम्पिंग लैंड भी कह सकते हैं। जब इस भूमि पर कोई कूदता है तो यह स्पंज की गेंद जैसी प्रतिक्रिया देती है। यहाँ आने के बाद लोग बच्चों की तरह उछल कूद कर इसे परखते हैं।
मैनपाट के ग्राम कमलेश्वरपुर के इर्द गिर्द शरणार्थी तिब्बतियों के कैम्प हैं। यहीं पर पर्यटन विभाग के शैला रिसोर्ट से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर जलजली (दलदली) नदी है।
इस नदी का लगभग 3 एकड़ का क्षेत्र ऐसा है कि इस पर कूदने से यह हिलता है। इसे जम्पिंग लैंड भी कह सकते हैं। जब इस भूमि पर कोई कूदता है तो यह स्पंज की गेंद जैसी प्रतिक्रिया देती है। यहाँ आने के बाद लोग बच्चों की तरह उछल कूद कर इसे परखते हैं।
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| मैनपाट जलजली |
जलजली की इस विशेषता से बाहरी दुनिया के लोग अधिक परिचित नहीं है। फ़िर भी कुछ सैलानी प्रतिदिन कुदरत के इस अजूबे को देखने के लिए पहुंचते हैं।
जब संसार में कहीं पर धरती हिलती है तो हलके से भी कंपन से घबराहट फ़ैल जाती है और इससे भारी क्षति भी होती है।
यही एकमात्र ऐसा भूचाल है जिसका आनंद लेने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं और प्रकृति के इस अजूबे को देख कर दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं।
इस स्थल से थोड़ी दूर झरना भी है लेकिन वन क्षेत्र होने कारण यहाँ तक पहुंचने का मार्ग नहीं बना है।
जब संसार में कहीं पर धरती हिलती है तो हलके से भी कंपन से घबराहट फ़ैल जाती है और इससे भारी क्षति भी होती है।
यही एकमात्र ऐसा भूचाल है जिसका आनंद लेने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं और प्रकृति के इस अजूबे को देख कर दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं।
इस स्थल से थोड़ी दूर झरना भी है लेकिन वन क्षेत्र होने कारण यहाँ तक पहुंचने का मार्ग नहीं बना है।
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| मैनपाट जलजली (वेट लैंड) |
मेरा मानना है कि यह स्थान देश में धरती बनने की प्रक्रिया का प्रथम उदाहरण है। जब धरती पर जल ही जल था और उसके बाद धीरे-धीरे जल में वनस्पति का जमाव होने लगा और जल दलदल में परिवर्तित होकर ठोस होते गया.
करोड़ों वर्षों की प्रक्रिया के पश्चात जल ठोस भूमि में परिवर्तित हो गया। यहाँ पर जल से भूमि बनने की यह प्रक्रिया अभी भी चल रही है। सैकड़ों वर्षों के पश्चात यह भूमि भी ठोस हो जाएगी।
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| मैनपाट जलजली (वेट लैंड) |
दलदली की इस भूमि के नीचे नदी बहती है। वनस्पति ने इस भूमि को इतना अधिक जकड़ रखा है कि इसका क्षरण भी नहीं होता और कूदने पर हमेशा यह इसी तरह की प्रतिक्रिया करती है।
नदी के जल के ऊपर मिट्टी और वनस्पति की लगभग 4-5 मीटर मोटी परत है, इस पर मैने पत्थर से भरी ट्राली लेकर ट्रेक्टर को भी जाते हुए देखा है, यह जमीन इतने वजन के बाद भी फ़टती नहीं है और न ट्रेक्टर के पहिए इसमें धंसते हैं। प्रकृति का यह अजूबा मैने मैनपाट में देखा और कहीं नहीं।
खारुन नदी के संग-संग सफ़र: उद्गम से पदयात्रा
कभी आप वनों में उबड़-खाबड़ पथरीले रास्तो के साथ बहती किसी अल्हड़ सी नदी के साथ-साथ चले हैं? नहीं न। फ़िर आज चलते हैं प्राकृतिक सुषमा के बीचे वनों से आच्छादित भूधरा पर प्रवाहित सलिला खारुन नदी के साथ उसके उद्गम के सफ़र पर।
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| कंकालिन मंदिर पेटेचुवा |
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| खारुन उद्गम नायक तालाब |
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| नदी के साथ साथ पदयात्रा का आरंभ |
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| पदयात्रा के साथी, नारायण साहू, बन्नु राम |
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| खारुन नदी में भालू खांचा |
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| जंगल के मध्य भकाड़ू डबरी |
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| दोपहर का भोजन कुकुर कोटना में |
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| अइरी बुड़ान |
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| नाहर डबरी में बेचांदी कंद की प्रोसेसिंग |
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| नदी का बीहड़ मार्ग |
खारुन नदी की रोमाचंक पदयात्रा
वनांचल के निवासी निरंतर प्रकृति से जुड़े रहते हैं, नदी, पर्वत, वन एवं वन्य पशुओं के साथ अपनी संस्कृति एवं परम्पराओं के पोषक होते हैं। शुद्ध वायु के साथ हरियाली सेहत को बनाए रखती है। शहर का व्यक्ति भी प्रकृति से जुड़ना चाहता है, उसे देखना, समझना एवं परखना चाहता है, परन्तु जीवन की आपा-धापी में उसके पास भौतिक सुविधाओं की कमी नहीं है, परन्तु प्रकृति से जुड़ने के लिए समय नहीं है। फ़िर भी वह व्यस्ततम समय में से कुछ समय चुरा कर वनों की तरफ़ चल पड़ता है। कुछ ऐसा ही हाल मेरा भी है, मुझे जंगल, नदी, पर्वत हमेशा आकर्षित करते हैं और इनकी समीपता पाने का प्रयत्न करता रहता हूँ। समय मिलते ही निकल जाता हूँ प्रकृति को जानने, मानव संस्कृति समझने।
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| कंकालीन मंदिर पेटेचुआ |
इसी कड़ी में एक दिन खारुन नदी की ट्रेकिंग करने का ख्यान मन में आया। क्योंकि सभ्यताएँ, संस्कृतियाँ नदियों के किनारे ही पुष्पित पल्लवित हुई और उनका पतन भी हुआ। उनके अवशेष इन स्थानों पर मिलते हैं। खारुन नदी रायपुर शहर की प्राणदायिनी है। शहर में पेय एवं उद्योगों आदि के लिए इसी नदी से जल लिया जाता है। इसलिए तय हुआ कि खारुन नदी के उद्गम से संगम तक की पदयात्रा की जाए, इस पदयात्रा से खारुन द्वारा पोषित ग्रामों का इतिहास, संस्कृति एवं वर्तमान जान पाऊंगा।
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| खारुन उद्गम पेटेचुवा में नारायण साहू के साथ |
अब बारी थी योजना को अमलीजामा पहनाने की। नये स्थान से पदयात्रा प्रारंभ करना और जहाँ कोई पहचान का भी न हो तो काफ़ी कठिन कार्य हो जाता है, यदि स्थानीय निवासियों का सहयोग न मिले तो। इस विषय में एक दिन मैने मित्र नारायण साहू से चर्चा की, वे तैयार हो गए। मैने तय किया था कि उद्गम तक मोटर सायकिल से जाएंगे। परन्तु नारायण साहू ने कहा कि कार से चलेंगे। मामला फ़िट हो गया और अगले दिन सुबह हम खारुन के उद्गम की ओर चल दिए। खारुन का उद्गम पेटेचुवा ग्राम में है, जिसे स्थानीय लोग कंकालीन भी कहते हैं। रायपुर से पेटेचुआ की दूरी 115 किमी है। चारामा घाट के नीचे से मरका टोला नामक ग्राम है, यहाँ से पेटेचुवा लगभग तीन-चार किमी की दूरी पर है।
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| खारुन नदी |
हमने ठंड से बचने का सामान ले लिया था, परन्तु ओढने एवं बिछाने के सामान का ध्यान नहीं रहा। इसकी जरुरत वहाँ पहुंचने पर पता चली। पेटेचुवा हम दोपह्रर को पहुंचे, कंकालीन माता के मंदिर के समीप गाड़ी खड़ी की। मंदिर के समीप ही सायकिल पंचर बनाने की एक दुकान एवं छोटा सा चायपानी का होटल था। इस ग्राम में हम पहली बार आए थे, इसलिए कोई पहचान का नही था।
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| मंदिर परिसर का भीतरी पैनारामा दृश्य |
होटल में चाय बनवाई और चाय पीते हुए खारुन नदी के उद्गम की चर्चा की। सायकिल दुकान वाला हमें खारुन नदी के उद्गम पर ले जाने के लिए तैयार हो गया। उसके साथ हम पैदल चलकर नायक तालाब पहुंचे, इस तालाब से झरिया से पानी निकलता है, जो खेतों से बहते हुए आगे चलकर कंकालीन नाले का रुप ले लेता है। यह नाला मंदिर के दाईं तरह से होकर जंगल में चला जाता है और मैदान में पहुंच कर खारुन नदी नाम पाता है।
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| खारुन नदी के प्रारंभ स्थल पर |
तालाब बहुत बड़ा था, मंदिर के पुजारी रामकुमार ने बताया कि इस तालाब का रकबा सत्रह एकड़ है। पुरखे बताते थे कि इसका निर्माण नायक लोगों ने कौड़ी पैसे में कराया था, पहले इस जगह पर एक झरिया था, जिसमें पेड़ का खोल गाड़ा हुआ था, ग्रामवासी उसी जल से अपना निस्तार करते थे। प्राचीन काल में नायक बंजारे अपनी गाड़ियों में सामान भर कर बेचने आते थे। उनके काफ़िले के लिए पानी की जरुरत पड़ती थी,
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| नायक तालाब पेटेचुवा, इसी तालाब से खारुन नदी का उद्गम हुआ |
पानी की जरुरत को पूरा करने के लिए उन्होंने गांव वालों को मजदूरी देकर इस तालाब का निर्माण कराया, जिसके कारण इसे नायक तालाब कहा जाता है। रामकुमार की बातों से पता चला कि यह तालाब प्राचीन है। छत्तीसगढ़ में अन्य स्थानों पर भी बनजारों ने तालाबों का निर्माण कराया। अभनपुर के जनपद के एक ग्राम का नाम ही नायकबांधा है। अवश्य ही इसका संबंध नायकों द्वारा बनवाए गए तालाब से ही है। इसके बाद मुझे नायकबांधा नामक एक अन्य ग्राम महासमुंद के समीप भी मिला तथा पिथौरा में नायक लोग अभी भी रहते हैं।
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| नायक तालाब का निरीक्षण करते हुए |
कंकालिन मंदिर से खैरडिगी ग्राम की दूरी लगभग सात किमी है। इस सात किमी में सघन वन है, इसके बाद मैदानी क्षेत्र प्रारंभ हो जाता है। हमारी नदी ट्रेकिंग का यही कठिन हिस्सा था। इसलिए हमने ट्रेकिंग को अगले दिन पर टाल दिया और रात के खाने का सामान लेने गुरुर ग्राम चले गये। हमारे साथ धमतरी से सुनील बरड़िया भी आये थे, उन्हें भी गुरुर से धमतरी वापसी के लिए बस पकड़वा दी। हम रात का खाना लेकर कंकालीन लौट आये
भालु खांचा: खारुन नदी की रोमांचक पदयात्रा
कंकालीन मंदिर में पक्का हाल भी बना हुआ है, वहाँ रात काटने के लिए हमने रामकुमार से चर्चा की तो वह हमें स्थान देने के लिए तैयार हो गया और एक दरी हमारे सोने के लिए भी बिछा दी। रात बातचीत करते हुए सुबह का कार्यक्रम बनाते हुए गहरी होती गई।
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| सफ़र का साथी पोयाम |
लगभग बारह बजे के बाद नींद आई। सुबह की चाय के लिए मैने रामकुमार से कह दिया था। सुबह के खाने के लिए मैने रामकुमार कोमर्रा को घर से अंगाकर रोटी और टमाटर की चटनी बनाने के लिए रुपए दे दिए। ग्राम के तीन चार लोग हमारा मार्ग दर्शन करने के लिए तैयार हो गए।
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| दोपहर का भोजन अंगाकर रोटी |
इस यात्रा में मेरा एक साथी बना बन्नु सिंह उकै। इसके पास छ: एकड़ की किसानी एवं बीबी-बच्चे सब हैं, पर घुमक्कड़ जीवन व्यतीत कर रहा है। भोजन बनाने के लिए जर्मन के दो बर्तन, एक लाल रिफ़िल का पेन, फ़ुल स्केप का पेपर, थैली में तम्बाखू चूना की पुड़िया तथा चिलम ही इसकी कुल सम्पत्ति है। जिसे हमेशा साथ रखता है। सुबह हमारी नींद खुली तो बन्नु राम ने नदी के किनारे चूल्हा बना एवं जलाकर गुड़ की लाल चाय पिलाई। चाय पीकर तबियत तर हो गई क्योंकि मुझे सुबह की चाय की आवश्यकता होती है। उसके बाद दिन भर चाय की कोई दरकार नहीं। लगा कि बिगबॉस का लक्जरी आयटम मिल गया।
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| बन्नु सिंह ऊकै |
हम लोगों के दैनिक कार्यों से निवृत्त होते तक बन्नु सिंह नदी में नहाकर आ गया और उसने चूल्हे में राहर दाल बनने के लिए चढा दी थी। मेरे लिए आंवला वृक्ष की दातौन तोड़ लाया। मेरे दातौन मुखारी करते तक भोजन तैयार हो गया। भोजन करने से पहले उसने बालों में तेल लगाया और डबरा के जल में चेहरा देखकर जुल्फ़ों को संवारा। फ़िर लहसुन, टमाटर एवं मिर्च का तड़का देकर दाल फ़्राई की। जिस सलीके से उसने सीमित संसाधन में भोजन तैयार किया उससे लगा कि बन्नु सिंह भोजन का शौकीन है।
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| खारुन नदी पदयात्रा प्रारंभ |
सुबह छ: बजे रामकुमार अपने साथियों के साथ आ गया, साथ में बड़ी-बड़ी तीन अंगाकर रोटी एवं टमाटर मिर्च की चटनी भी लाया। रोटी के एक टुकड़े का नाश्ता करके हम ट्रेकिंग पर चल पड़े। कंकालीन मंदिर से पथरीला उबड़ खाबड़ क्षेत्र प्रारंभ हो जाता है। हम नदी के साथ-साथ ही चल रहे थे। जंगल के भी अपने नियम और कायदे होते हैं। यहाँ अनजान आदमी तो चक्कर काटते ही रह जाएगा।
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| सुबह तालाब का दृश्य |
जिस तरह शहरों में गली मोहल्लों को नाम रख कर चिन्हित किया जाता है उसी तरह जंगल में स्थानीय ग्रामीण स्थानों को विभिन्न नामों से चिन्हित करके रखते हैं, यही चिन्ह जंगल में रास्ता न भूलने में सहायक होते हैं। बन्नु सिंह बड़ा ही फ़क्कड़ एवं मस्त मलंग है, इसके साथ नदी के आस-पास देखते हुए बात चीत करते रास्ता कट रहा था।
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| यात्रा मार्ग में भालु खांचा - यहाँ बारहो महीने पानी रहता है। |
प्राकृतिक वनों विभिन्न प्रजाति के पेड़ पौधे एवं वनस्पति होती हैं। जिन्हें जंगल का आदमी बराबर पहचानता है और स्थानीय भाषा में उसका नाम रखकर चिन्हांकित कर लेता है। कुछ दूर चलने पर पथरीली धरती पर एक स्थान पर चारों तरफ़ से पानी आकर जमा होता है। इसे भालू खांचा नाम दिया गया है। जंगल में जब पानी की कमी हो जाती है तो भालु इस खांचे में आकर पानी पीते हैं
भकाड़ू डबरी: खारुन नदी की रोमांचक पद यात्रा
भालु खांचा से आगे बढने पर घना जंगल प्रारंभ हो जाता है, पेड़ों पर लटकती लताओं की बेलें मोटी हो जाती हैं। दीमक की बांबियाँ आठ-दस फ़ुट ऊंची हो जाती हैं। इन बांबियों में सांपों का बसेरा रहता है और भालू भी इनके आस पास दीमकों की तलाश में पहुंचते हैं।
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| पदयात्रा दल: लगभग दस फ़ुट ऊंची बांबी के साथ |
नदी अब चट्टानों के बीच से होकर बहने लगती है। नदी के मार्ग में बड़े बड़े बोल्डर दिखाई देने लगते हैं। बोल्डरों पर से होकर चलना कठिनाई भरा था। पैर फ़िसलने पर चोट लगने की आशंका बढ जाती है। इसलिए चाल धीमी हो गई और हर कदम जमीन देख कर रखना पड़ रहा था।
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| भकाड़ू डबरी |
आगे बढ़ने पर एक तालाब दिखाई दिया। पूछने पर बन्नु सिंह ने बताया कि इसे भकाड़ू डबरी कहते हैं। इसका निर्माण जंगलात वालों ने वन्य पशुओं के पानी पीने के लिए बनाया है। नामकरण के पीछे की कहानी पूछने पर रामकुमार ने कहा कि हमारे गाँव में निषाद जाति का भकाड़ू नाम व्यक्ति रहता था। उसका विवाह नहीं हुआ। गांव में अविवाहित आदमी की कोई कदर नहीं होती और भले ही न हो, पर उसे हमेशा नीयतखोर समझा जाता है।
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| भकाड़ू डबरी में धुंए के छल्ले बनाता बन्नु सिंह |
भकाड़ू की वृद्धावस्था में मृत्यु हो गई तो गांव वालों ने उसके दाह संस्कार के लिए गांव में जगह नहीं थी। जगह न देने की पीछे डर था कि मरने बाद वह रक्सा (कुंवारा प्रेत) बनकर गांव वालों को हलाकान करेगा। गांव वालों ने सहमति से इस तालाब के किनारे उसका दाह संस्कार किया। तब से इस तालाब को भकाड़ू डबरी कहा जाता है।
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| नदी में बेचांदी कांदा प्रसंस्करण: नाहर डबरी |
बातचीत करते हुए हम संभल कर चल रहे थे। आगे चलकर नदी का पाट थोड़ा चौड़ा हो जाता है, दोनों किनारों पर बड़ी बड़ी चट्टाने हैं। इस जगह पर नदी का पानी थोड़ी गहराई लिए हुए ठहरता है। दूर से हमें कुछ लोग नदी के किनारे कुछ चमकीली सी चीज धोते हुए दिखाई दिए। समीप पहुंचने पर देखा कि ये लोग एक कंद की चिप्स बनाकर धो रहे थे। इस काम में चार पांच परिवार लगे हुए थे। चिप्स को धो कर चट्टानों पर सुखाया हुआ था। इस स्थान को नाहर डबरी कहते हैं।
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| बेचांदी कांदा की चिप्स धोते हुए |
यहां हमारी भेंट तिहारु राम सोरी से हुई। उनका परिवार भी कंद का प्रसंस्करण कर रहा था। उसने इस कंद का नाम बेचांदी कांदा बताया तथा कहा कि इसमें बहुत नशा होता है। अगर इस कंद का गेंहूं के बराबर का दाना किसी को खिला दिया जाए तो उसके मांस पेशियां जाम हो जाती है अत्यधिक नशे में व्यक्ति शिथिल हो जाता है।
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| नाहर डबरी: खारुन पदयात्रा |
डाक्टरी इलाज से भी इसका नशा नहीं उतरता। जब इसके नशे की मियाद पूरी होती है तो स्वत उतरता है। इस कंद के चिप्स बनाकर ये बाजार में ले जाते हैं, जहाँ व्यापारी दवाई बनाने के लिए अस्सी रुपए किलों में खरीदते हैं। यहाँ आधे घंटे विश्राम कर हमने जल ग्रहण किया। अब हमारे दल में तिहारु राम भी जुड़ चुके थे।
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| अइरी बुड़ान |
उबड़ खाबड़ चट्टानों पर चलना दुखदाई भी था, परन्तु आगे की सोच कर रोमांच भी हो रहा था। यही रोमांच हमें आगे खींच कर ले जा रहा था। आगे चलकर अरई बुड़ान नामक स्थान आया। यहाँ पर नदी की धार में एक छोटा सा रेतीला टीला है, जिसके आस पास काफ़ी जानवरों के खुरों के चिन्ह दिखाई दिए।
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| नमकीन मिट्टी: यहां जानवर नमकीन मिट्टी चाटने आते हैं। |
इस स्थान की मिट्टी नमकीन है, जिसे चाटने के लिए वन्य पशु आते हैं। इस स्थान पर मछलियां भी खूब मिलती है, इसलिए अइरी नामक पक्षी भोजन की तलाश में डेरा डाले रहते हैं। अइरी पक्षी के नाम पर इस स्थान का नाम अइरी बुड़ान हो गया।
कलचुरीकालीन छत्तीसगढ़ का गढ़ मोंहदीगढ़
कई विद्वानों का मत है कि मध्यकाल में कलचुरीकालीन छत्तीसगढ़ों को लेकर छत्तीसगढ़ का निर्माण हुआ। ये गढ़ कलचुरी शासन काल में प्रशासन की महत्वपूर्ण इकाई थे। कालांतर में कलचुरी दो शाखाओं में विभक्त हुए, शिवनाथ नदी के उत्तर में रतनपुर शाखा एवं दक्षिण में रायपुर शाखा का निर्माण हुआ।
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| मोंहदीगढ़ के पठार की ओर ले जाती पैड़ियाँ |
ये गढ़ इस प्रकार हैं - रतनपुर के १८ गढ़ : रतनपुर, उपरोड़ा, मारो, विजयपुर, खरौद, कोटगढ़, नवागढ़, सोढ़ी, ओखर, पडरभट्ठा, सेमरिया, मदनपुर, कोसगई, करकट्टी, लाफा, केंदा, मातीन, पेण्ड्रा एवं रायपुर के १८ गढ़ : रायपुर, पाटन, सिमगा, सिंगारपुर, लवन, अमेरा, दुर्ग, सारधा, सिरसा, मोहदी, खल्लारी, सिरपुर, फिंगेश्वर, सुवरमाल, राजिम, सिंगारगढ़, टेंगनागढ़, अकलवाड़ा।
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| मोंहदीगढ़ का पठार |
समय ने करवट ली और कलचुरी राज का पतन हो गया। मराठों ने रायपुर शाखा के अंतिम शासक अमरसिंह की मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र शिवराज सिंह को पांच गाँव (बड़गांव, मुढेना, भलेसर, गोईंदा, नांदगाँव) माफ़ी के देकर एवं पुर्वजों के प्रत्येक गांव से एक रुपया खर्च देकर इनका अधिकार समाप्त कर दिया।
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| ऊपर चढे चलो भाई |
वर्तमान में इन कलचुरियों के वंशज महासमुंद जिले के इन पांच गांवों में निवास करते हैं। इनके विषय में वैसे तो मुझे पूर्व में भी जानकारी थी। परन्तु कलचुरी वंशजों से मिलना कल हुआ। लाल विजय सिंहदेव एक अरसे से मेरे फ़ेसबुक मित्र थे, परन्तु इनसे कभी मिलना, भेंटना नहीं हुआ था। कल महासमुंद से इनसे मुलाकात हुई। सरल स्वभाव के उर्जावान युवक हैं और अपने इतिहास एवं धरोहरों के प्रति भी जागरुक दिखाई दिए।
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| रायपुर कलचुरी वंशज लाल विजय सिंह देव |
सुबह इनके साथ रायपुर शाखा के अठारह गढ़ों में से एक मोंहदीगढ़ जाना हुआ। यह महासमुंद से खल्लारी मार्ग पर 12 किमी की दूरी पर मोंहदी नामक ग्राम की डुंगरी पर है। यहाँ गढीन माई (चम्पई माता) का स्थान है। जिन्हें आस पास के ग्रामीण अपनी आराध्या मानते हैं और पूजन करते हैं। मोंहदी ग्राम के सरपंच खेमराज दीवान हैं, जो गौंटिया परिवार से ही हैं। इनके साथ हमने गढीन दाई के दर्शन एवं गढ के अवशेषों की खोज में डुंगरी पर चढाई की।
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| मोंहदी सरपंच खेमराज दीवान |
डुंगरी के शीर्ष पर पढार है, इससे जुड़ा हुआ अमली पठार भी है और उपर से बेलर गांव की तरफ़ जाने का रास्ता भी है। वर्तमान में हुए निर्माणों के अलावा अन्य प्राचीन निर्माण के अवशेष यहाँ दिखाई नहीं देते। परन्तु डुंगरी में सुरंग एवं गुफ़ाएं होने की कथा सुनाई देती है। ऐसी एक सुरंग नुमा खोह में चम्पई माता विराजित हैं। अनगढ़ पाषाण की यहाँ दो प्रतिमाएँ हैं, जिनमें आँखे जड़ी हुई हैं। नवरात्रि के अवसर पर यहाँ ज्योति जलाई जाती है और मेला भी भरता है।
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| मोंहदीगढ़ की कंदराएँ |
यहाँ से पठार पर चलकर बेलर गांव के रास्ते में एक मानव निर्मित प्रस्तर भित्ति जैसी संरचना दिखाई देती है। जहाँ स्थानीय देवता विराजमान हैं। इसके अतिरिक्त अन्य कुछ दिखाई नहीं देता। अधिक जानकारी एवं शोध के लिए डुंगरी का चप्पा चप्पा छानना होगा। हो सकता है कि प्राचीन मानव बसाहट के चिन्ह मिल जाएं।
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| झुरमुटों के बीच से रास्ता |
समय कम होने के कारण मैं यह कार्य नहीं कर सका। डुंगरी से नीचे उतरने पर एक फ़र्लांग की दूरी पर दस पन्द्रह घरों की प्रस्तर नींव दिखाई देती है, जिससे लगता है कि कभी यहाँ मानव की बसाहट रही होगी। सरपंच खेमराज ने बताया कि यहाँ पर एक प्राचीन कुंआ भी है।
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| चम्पई माता मोंहदीगढ़ |
वैसे छत्तीसगढ़ में मोंहदी नामक कई गांव मिलते हैं, परन्तु भौगौलिक परिस्थितियों को देखने पर प्रतीत होता है कि यही स्थान मोंहदीगढ़ रहा होगा। क्योंकि खल्लारी, सुअरमाल, फ़िंगेश्वर, सिरपुर आदि गढ़ इसके आस पास ही हैं। इस यात्रा के लिए लाल विजय सिंहदेव का आभार। फ़िर कभी समय एवं अवसर मिला तो इस क्षेत्र की तपास की जाएगी
समुद्र जैसा तालाब : बालसमुंद पलारी
तालाबों की कथा किसी तिलस्म से कम नहीं है, इनकी प्राचीनता के साथ कथा कहानियाँ भी जुड़ जाती हैं और पीढी दर पीढी अग्रेषित होती रहती हैं। ऐसा ही एक तालाब है जिसे बालसमुंद कहते हैं। यह रायपुर से बलौदाबाजार रोड़ पर 70 किमी की दूरी पर पलारी ग्राम की पहचान बना हुआ है। इस तालाब का विस्तार लगभग 120 एकड़ में बताया जाता है।
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| बालसमुंद पलारी |
मानव निर्मित यह तालाब अपनी विशालता के कारण जलाशय कहलाता है। इसके बीच में एक टापू बना हुआ है, कहते हैं कि तालाब खोदने वाले संझाकाल में घर जाने वक्त अपनी मिट्टी फ़ेंकने की टोकरियाँ (बांस का झौंआ) झाड़ते थे। जिसके कारण इस टापू का निर्माण हो गया। इससे तालाब निर्माण के दौरान नियोजित श्रमिकों की संख्या का अंदाजा लगाया जा सकता है।
दक्षिण कोसल में ईंटों से मंदिर निर्माण की परम्परा रही है। इस तालाब के किनारे भी ईंटो बना हुआ सिद्धेश्वर नामक शिवालय है। पुराविद इसका निर्माण काल 7 वीं 8 शताब्दी निर्धारित करते हैं, इस पश्चिमाभिमुख मंदिर में द्वार शाखा पर नदी देवी गंगा एवं यमुना अपने परिचारको के साथ त्रिभंग मुद्रा में प्रदर्शित की गई है।
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| शिवालय बालसमुंद पलारी |
सिरदल पर त्रिदेवों का अंकन है। द्वारशाखाओं पर अष्ट दिक्पालों के अंकन के साथ प्रवेश द्वार के सिरदल पर शिव विवाह का सुंदर अंकन किया गया है। इस मंदिर का शिखर भाग कीर्तिमुख, गजमुख एवं व्याल की आकृतियों से अलंकृत है जो चैत्य गवाक्ष के भीतर निर्मित हैं। विद्यमान छत्तीसगढ़ के ईंट निर्मित मंदिरों का यह उत्तम नमूना है।
कहते हैं कि इस तालाब का निर्माण घुमंतू नायक जाति के राजा ने छैमासी रात में करवाया था। घुमंतू नायक एक बार अपने लाव लश्कर के साथ इस स्थान पर डेरा लगाए। उस समय यह जंगल था और निस्तारी के लिए पानी उपलब्ध नहीं था। तब नायक राजा ने यहाँ तालाब बनवाने का निर्णय लिया। उसने 120 एकड़ में इस तालाब का निर्माण कराया, परन्तु तालाब में पानी नहीं भरा, वह सूखा का सूखा रहा।
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| नदी देवी शिवालय बालसमुंद पलारी |
तब सयानों के कहने पर नायक राजा ने अपने नवजात शिशु को परात में रख कर तालाब में छोड़ दिया। इस टोटके के बाद रात में तालाब भर गया और बालक भी परात सहित ऊपर आ गया। तब से इस तालाब का नाम बालसमुंद हो गया। इस तालाब में बारहों महीना पानी रहता है तथा यहाँ का जल नीला एवं निर्मल है। तालाब के किनारे खड़े होने पर जल का विस्तार देखकर समुद्र के किनारे खड़े होने का भान होता है। इसकी विशालता अपना नाम सार्थक करती है।
सरगुजा की कैलाश गुफ़ा
छत्तीसगढ़ प्रदेश का प्राकृतिक सौंदर्य अद्वितीय होने के साथ यहाँ का इतिहास भी उतना ही समृद्ध है। प्रदेश के सरगुजा अंचल हरित वनों, पर्वतों, नदियों का सौंदर्य रमणीय है। प्रत्येक स्थान पौराणिक इतिहास से भरा पुरा है और यहाँ सुरम्यता रमणीय है। रायपुर से हम इस अंचल के कैलाश गुफ़ा क्षेत्र के पर्यटन के लिए चल पड़े। रायपुर से अम्बिकापुर 358 किलोमीटर की दूरी पर है। इस नगर की पूर्व दिशा में सामरबार नामक स्थान पर 80 किलोमीटर की दूरी पर कैलाश गुफ़ा स्थित है। हम अम्बिकापुर से बतौली होते हुए पठार पर पहुंचे, यहाँ से जंगल के रास्ते पर चलते हुए गायबुड़ा नामक ग्राम से बांए सड़क पर चलकर कैलाश गुफ़ा तक पहुंचे। गायबुड़ा से सड़क सीधी पंडरापाट होते हुए बगीचा एवं जशपुर चली जाती है। धार्मिक दृष्टि से भी यह स्थान महत्वपूर्ण है।
यहाँ आदिवासी समाज के संत रामेश्वर गहिरा गुरु जी ने प्राकृतिक गुफ़ा की चट्टानों को तराश कर वर्तमान रुप दिया है। कैलाश गुफ़ा के नीचे झरना बहता है, जहाँ स्थानीय लोग धार्मिक कर्मकांड सम्पन्न करते हैं। इस स्थान पर आने के पश्चात मन को शांति मिलती है और मनुष्य के प्रकृति से जुड़ जाता है।
इस स्थान के प्राकृतिक सौंदर्य एवं महत्ता को देखते हुए गहिरा गुरु जी ने अपनी उपासना के लिए चयन किया। सघन वन के बीच आश्रम, गुफ़ाएं, कल-कल करता झरना एवं पक्षियों का मधुर स्वर में आगंतुकों का स्वागत मन को मोह लेता है। ऐसा लगता है कि शहरी भाग दौड़ के से थोड़ा अलग रह कर दो चार दिन इस प्राकृतिक स्थल पर व्यतीत किए जाएं।
प्रकृति से एकाकार होने के लिए यह बहुत ही आदर्श स्थान है। यहाँ श्रद्धालुओं, दर्शनार्थियों एवं पर्यटकों का बारहों मास आना लगा रहता है। यह खुबसूरत स्थान अपने साथ अनेक पौराणिक कथाओं को भी समेटे हुए है। वर्षा काल में इस स्थान की सुंदरता और भी बढ़ जाती है। झरना अपने पूरे यौवन पर होता है, वनांचल में छोटे-मोटे वन्य प्राणी भी दिखाई देते हैं। हमें इस सुंदर स्थान का भ्रमण कर अपूर्व आनंद की अनुभूति हुई। सांझ तक यहाँ रहने के पश्चात हम पंड्रापाट से बगीचा होते हुए मैनपाट के अपने अस्थाई डेरे सैला रिजोर्ट में लौट आए।
जतमई में नैसर्गिक सौंदर्य का आनंद
छत्तीसगढ़ में गरियाबंद जिले के छुरा ब्लॉक अंतर्गत जतमई नामक प्राकृतिक झरना है। हरितिमा से आच्छादित पहाड़ी से यह झरता हुआ यह झरना बरसात के दिनों में सैलानियों के आकर्षण का केन्द्र होता है। रायपुर से लगभग 75 किलोमीटर की दूरी पर होने के कारण शहर एवं आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों के सैलानी सप्ताहांत में यहाँ पहुंच जाते हैं और जतमई माता के दर्शन के साथ झरने में जलकिलोल करने का लुफ़्त उठाते हैं।
रविवार के दिन तो यहाँ पर रेलमपेल मची रहती है। वनक्षेत्र के रमणीय वातावरण का आनंद इस स्थान पर लिया जा सकता है। वनांचल में प्राकृतिक झरना होने के कारण कुछ वर्षों से पर्यटकों की बड़ी संख्या इस स्थान पर मनोरंजन के लिए पहुंचती है, इसके साथ ही वनदेवी जतमई के दर्शन करने के लिए भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। वैसे तो जतमई का बरसाती झरना जुलाई से दिसम्बर तक ही रहता है। नववर्ष के दिन पिकनिक मनाने वालों का भीड़ अत्यधिक रहती है।
ग्राम पटेवा के निकट यह स्थान होने के कारण स्थानीय लोग एक समिति बनाकर इस स्थान का विकास कर रहे हैं। यह झरना 70 फ़ुट की ऊंचाई से गिरता है। यहां विशालकाय चट्टाने एक के ऊपर एक इस तरह से रखी हैं कि लगता है किसी कुशल कारीगर ने इन्हें स्थापित कर दिया हो। जतमई मंदिर के निकट सिद्ध बाबा का प्राचीन स्थान है, यहां पर एक चिमटा रखा हुआ है। कहते हैं कि इस स्थान पर 400 बरस पहले कोई सिद्ध बाबा रहते थे। उनके कारण इस स्थान की मान्यता अधिक हो गई।
यहीं पर एक शेर माड़ा भी है, जिसे लोग शेरगुफ़ा कहते हैं। पहले इस स्थान पर जंगली जानवर भी बड़ी संख्या में रहते थे। भालुओं की आमदरफ़्त तो अभी भी रहती है। शहर के समीप रविवारिय मनोरंजन के लिए यह एक आदर्श प्राकृतिक स्थल है। इस स्थान का सौंदर्य देखने लायक है। एक बात गौर करने लायक यह भी है कि अत्यधिक पर्यटकों के पहुंचने के कारण इस स्थान पर प्लाटिक की पन्नियों, खाने की सामग्री के रैपरों एवं पर्यटकों द्वारा फ़ैलाई गई गंदगी के कारण प्रदूषण बढ़ रहा है। प्लास्टिक के सामानों पर यहां प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।
चीतल मृग - बार नवापारा अभ्यारण्य छत्तीसगढ़
अभ्यारण्य में भ्रमण करते हुए चीतलों का झूंड कई जगह दिखाई दिया। परन्तु मनचाहे चित्र नहीं मिल पाए। इस वन में बुंदिया बाघ (तेंदुआ - बिल्ली का फ़ूफ़ा) भी खासी संख्या है। इसलिए संझा के समय अतिरिक्त सावधानी की आवश्यकता होती है। घास चरने वाले प्राणी सांझ के समय दिन ढलने से पूर्व जल स्रोतों के समीप पानी पीने आते हैं। हमें दूर से तालाब की ओर एक झूंड आते हुए दिखाई दिया। बस अच्छी फ़ोटो की चाह में रुक गए। मादा चीतलों के साथ नर चीतल भी था।
मैने तालाब के किनारे एक पेड की आड़ ले ली, तालाब तक आने के लिए इनका आधा घंटा इंतजार करना पड़ा। चौकन्ने चीतल धीरे-धीरे अगल-बगल देखते हुए जल पीने के लिए तालाब में उतरे। नर चीतल तालाब की मेड़ पर चौकस खड़ा हो कर चौकीदारी कर अपने नर होने का दायित्व निभा रहा था। मैने पेड़ की आड़ से एक के बाद एक कई चित्र लिए। तभी मेडाडोर में सवार पीए-खाए लोग हल्ला मचाते पहुंच गए।
उनकी आवाज सुनकर सारे चीतल भाग गए। गुस्सा तो इतना आया कि मत पूछो। पर क्रोध पर नियंत्रण करना भी योग ही माना जाता है। खुले में वन्य प्राणियों के अच्छे चित्र मिलना भी किस्मत की बात ही होती है। चीतलों के शिकार की खबर अखबारों में आते रहती है। शिकारी इसे मांस के लिए मारते हैं। फ़िर भी भारत में ये काफ़ी संख्या में दिखाई देते है, पर पाकिस्तान में तो सारे चीतलों को मार कर खा गए, इसलिए वहाँ इनकी संख्या बहुत ही कम है।
बार नवापारा अभयारण्य रायपुर से लगभग 100 किमी की दूरी पर कलकत्ता मार्ग पर है। यहाँ पिथौरा होते हुए भी जा सकते हैं और बलौदाबाजार से भी जाना हो सकता है। बार नवापारा के अतिरिक्त श्री लंका, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश में भी चीतल पाए जाते हैं। बार के जंगल में इनका उन्मुक्त विचरण काफ़ी राहत देता है। जरुरत है इन्हें इस प्राकृतिक आवास में शिकारियों से बचाने की……।
मैने तालाब के किनारे एक पेड की आड़ ले ली, तालाब तक आने के लिए इनका आधा घंटा इंतजार करना पड़ा। चौकन्ने चीतल धीरे-धीरे अगल-बगल देखते हुए जल पीने के लिए तालाब में उतरे। नर चीतल तालाब की मेड़ पर चौकस खड़ा हो कर चौकीदारी कर अपने नर होने का दायित्व निभा रहा था। मैने पेड़ की आड़ से एक के बाद एक कई चित्र लिए। तभी मेडाडोर में सवार पीए-खाए लोग हल्ला मचाते पहुंच गए।
उनकी आवाज सुनकर सारे चीतल भाग गए। गुस्सा तो इतना आया कि मत पूछो। पर क्रोध पर नियंत्रण करना भी योग ही माना जाता है। खुले में वन्य प्राणियों के अच्छे चित्र मिलना भी किस्मत की बात ही होती है। चीतलों के शिकार की खबर अखबारों में आते रहती है। शिकारी इसे मांस के लिए मारते हैं। फ़िर भी भारत में ये काफ़ी संख्या में दिखाई देते है, पर पाकिस्तान में तो सारे चीतलों को मार कर खा गए, इसलिए वहाँ इनकी संख्या बहुत ही कम है।
बार नवापारा अभयारण्य रायपुर से लगभग 100 किमी की दूरी पर कलकत्ता मार्ग पर है। यहाँ पिथौरा होते हुए भी जा सकते हैं और बलौदाबाजार से भी जाना हो सकता है। बार नवापारा के अतिरिक्त श्री लंका, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश में भी चीतल पाए जाते हैं। बार के जंगल में इनका उन्मुक्त विचरण काफ़ी राहत देता है। जरुरत है इन्हें इस प्राकृतिक आवास में शिकारियों से बचाने की……।
छत्तीसगढ़ का मॉरिशस बुका
राजधानी रायपुर से कटघोरा होते हुए 230 किलोमीटर की दूरी पर मड़ई गांव से 5 किलोमीटर की दूरी पर हसदेव बांगो बांध के डुबान क्षेत्र में विकसित पर्यटन केन्द्र बुका में नौका विहार का मजा ले सकते हैं। वन विभाग ने यहां पर्यटकों के लिए काटेज का निर्माण कराया है। जहां शुल्क जमा कर रूक सकते हैं।
छत्तीसगढ़ में भले ही समुद्र नहीं है लेकिन ‘सी बीच’ की सैर करने और बोटिंग की तमन्ना रखने वालों को मायूस होने की जरूरत नहीं। शहरों की आपाधापी से दूर प्राकृतिक सौंदर्य से भरी यह ऐसी जगह है, जहाँ गर्मी में भी दिलोदिमाग को सुकून मिलता है। यहां मीलों तक 400-450 फीट की गहराई में पानी ही पानी है। हरे-भरे जंगल और पहाड़ों के बीच झीलनुमा इस जगह पर नीला जल दिल-ओ-दिमाग पर छा जाता है।
झील के बीच में प्राकृतिक रूप से उभरे टापू और उस पर खड़े दरख्तों की हरियाली की वजह से इसे छत्तीसगढ़ का मॉरिशस कहा जाने लगा है। कटघोरा के पास स्थित जल विहार ‘बुका’ खूबसूरती अनूठी है। पहाड़ियों से घिरे बुका के गहरे पानी के बीच स्थित टिहरीसराई के मध्य निकली एक चट्टान में प्राकृतिक रुप से बने गणेश का स्वरूप दिखाई देता है।
सूर्योदय के समय ग्लास हाउस से आसमान में उगते सूरज का अप्रतिम होता है। मौसम के अनुसार दिन चढ़ने से शाम ढलने तक अलग-अलग रंग देखने को मिलते हैं। गर्मियों में बुका में सुबह-शाम स्वीमिंग और बोटिंग का लुत्फ उठाने लोग दूर-दूर से आते हैं। बोट से 16 किमी के सफर में कई छोटे-छोटे टापू हैं तो साल, सागौन, साजा, सेन्हा आदि के पेड़ों की श्रृंखला मन को सुकून देती है।
थकान मिटाने के लिए टेंट, रेस्ट हाउस और ग्लास हाउस हैं, जहां सौर ऊर्जा की रोशनी तो तमाम सुविधाएं उपलब्ध हैं। बुका प्रदेश का संभवत: पहला पर्यटक स्थल है, जहां कई टूरिस्ट प्लेस का सफर बोट से किया जाता है। बुका से बांगो डैम का फासला 25 किमी का है। बुका से बोट के जरिए दो घंटे में वहां पहुंचा जा सकता है। इसी तरह डेढ़ घंटे में सतरेंगा, घंटेभर में गोल्डन आईलैंड तथा केंदई जल प्रपात, मंजूरखोर आदि टूरिस्ट प्लेस तक जा सकते हैं।
तीरथगढ़ जलप्रपात बस्तर
बड़े बूढे कह गए हैं कि जल, वायू और अग्नि से कभी खिलवाड़ नहीं करना चाहिए और न ही इनकी शक्ति को कम करके आंकना चाहिए। खासकर बरसात के दिनों में नदी, नालों, झरनो में वर्षा जल कब बढ़ जाए इसका पता नहीं चलता। नदी किलोमीटरों दूर से बहकर आती है इसलिए अगर 25 किलोमीटर दूर मुसलाधार वर्षा हो रही हो और आप जहाँ है वहाँ वर्षा न हो रही हो तो नदी का जल तेज गति से आकर आपको घेर सकता है। इसलिए नदी, नालों एवं झरनों में अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।
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| तीरथगढ़ जलप्रपात बस्तर |
अब बात करते हैं तीरथगढ़ जलप्रपात की, यह जल प्रपात जगदलपुर की दक्षिण-पश्चिम दिशा में 35 किमी की दूरी पर स्थित है। तीरथगढ़ की ऊंचाई 300 फ़ुट होने के कारण यह भारत के सबसे ऊँचे झरनों में से एक है। कुछ दिनों पूर्व हम तीरथगढ़ जलप्रपात घूमने चले गए। गहराई में उतरने से पहले हम ऊपर से ही फ़ोटो लेने लगे, तभी बारिश आ गयी। हम लोगों ने वहीं पर बनी एक जर्जर ईमारत की शरण ली। वहाँ से देखा कि कुछ लोग झरने में नीचे उतरे हुए हैं और बारिश होने के कारण वहीं पर बनी एक छोटी सी पुलिया के नीचे घुस गए।
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| तीरथगढ जलप्रपात बस्तर में पुलिया के नीचे लोग |
उनके हाथ में मोबाईल था जिससे खेलते हुए बारिश रुकने का इंतजार करने लगे। बारिश रुकने पर हम नीचे गए और अच्छी लोकेशन देख कर कुछ चित्र लिए। बस्तर में मानसून पहुंचने के कारण पिछले 48 घंटों तक लगातार बारिश हुई। जगदलपुर से बैंक ऑफ़ इंडिया के मैनेजर के परिवार के 4 सदस्य अपरान्ह 3 बजे तीरथगढ़ पहुंचे और जलप्रपात में नीचे उतर गए। उन्हें पहुंचे 15 मिनट ही हुए थे कि बरसात शुरु हो गयी, तो वहां के मंदिर के पुजारी ने बारिश से बचने के लिए उन्हें अपने पास बुला लिया। इसके बाद जो मुसलाधार बारिश शुरु हुई कि रुकने का नाम ही नहीं लिया।
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| तीरथगढ़ जलप्रपात में रेस्क्यू ऑपरेशन |
झरने में जल का स्तर बढ़ने से वे टापू पर फ़ंस गए और वापस भी नहीं आ सकते थे। मोबाईल का नेटवर्क भी नहीं बता रहा था। किसी तरह थोड़ा नेटवर्क आने पर उन्होने अपने परिचित फ़ोन किया और उन्होने पुलिस को। पुलिस की रेस्क्यू टीम वहां रात को पहुंच गई। लेकिन जल का बहाव तेज होने के कारण कार्यवाही करने में अक्षम हो गई। उन्होने सुबह होने का इंतजार किया। 16 घंटे मौत के साये में गुजारने के बाद उन्हें पुलिस की रेस्क्यू टीम ने बचाया। इसलिए बारिश के मौसम में नदी, नालों एवं झरनों में अतिउत्साह में खतरा मोल न लें।
बालसमुंद एवं सिद्धेश्वर मंदिर : पलारी छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से बलोदाबाजार रोड पर 70 कि॰मी॰ दूर स्थित पलारी ग्राम में बालसमुंद तालाब के तटबंध पर यह शिवालय स्थित है। इस मंदिर का निर्माण लगभग ७-८वीं शती ईस्वी में हुआ था। ईष्टिका निर्मित यह मंदिर पश्चिमाभिमुखी है। मंदिर की द्वार शाखा पर नदी देवी गंगा एवं यमुना त्रिभंगमुद्रा में प्रदर्शित हुई हैं।
प्रवेश द्वार स्थित सिरदल पर शिव विवाह का दृश्य सुन्दर ढंग से उकेरा गया है एवं द्वार शाखा पर अष्ट दिक्पालों का अंकन है। गर्भगृह में सिध्देश्वर नामक शिवलिंग प्रतिष्ठापित है। इस मंदिर का शिखर भाग कीर्तिमुख, गजमुख एवं व्याल की आकृतियों से अलंकृत है जो चैत्य गवाक्ष के भीतर निर्मित हैं। विद्यमान छत्तीसगढ़ के ईंट निर्मित मंदिरों का यह उत्तम नमूना है।
जनश्रुतियों के अनुसार इस मंदिर एवं तालाब का निर्माण नायकों ने छैमासी रात में किया गया। इस अंचल में घुमंतू नायक जाति होती है जो नमक का व्यापार करती थी। उनका कबीला नमक लेकर दूर दूर तक भ्रमण करता था। कहते हैं कि इस पड़ाव पर नायकों को जल की समस्या हमेशा बनी रहती थी। उन्होने यहां तालाब बनवाने का कार्य शुरु किया। (नायकों द्वारा तालाब निर्माण की कहानी अन्य स्थानों पर भी सुनाई देती हैं, खारुन नदी के उद्गम पेटेचुआ का तालाब भी नायकों ने बनवाया था। इससे प्रतीत होता है कि नायक अपने व्यापार के मार्ग में जलसंसाधन का निर्माण करते थे।)
तालाब का निर्माण होने के बाद इस तालाब में पानी नहीं आया तो किसी बुजूर्ग के कहने से नायकों के प्रमुख ने अपने नवजात शिशु को परात में रख कर तालाब में छोड़ दिया, इसके बाद तालाब में भरपूर पानी आ गया और यह लबालब भर गया। बालक भी सुरक्षित परात सहित उपर आ गया। तब से इस तालाब का नाम बालसमुंद रखा गया। इस तालाब का विस्तार 120 एकड़ में है। जल साफ़ एवं सुथरा है। तालाब का पानी कभी नहीं सूखता।
तालाब के मध्य में एक टापू बना हुआ है, कहते हैं इसका निर्माण तालाब खोदने के दौरान तगाड़ी झाड़ने से झड़ी हुई मिट्टी से हुआ। इस मंदिर का जीर्णोद्धार तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री बृजलाल वर्मा ने 1960-61 के दौरान करवाया तथा गर्भ गृह में शिवलिंग स्थापित करवाया। इस स्थान पर प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा दे दिन मेला भरता है, जिसमें हजारों श्रद्धालू आकर बालसमुंद में स्नान कर पूण्यार्जित करते हैं।
अभनपुर जंक्शन: सवा सौ बरस पुरानी रेल
रायपुर से चलनी वाली छुकछुक रेलगाड़ी (नेरोगेज) वर्तमान में राजिम एवं धमतरी तक का सफ़र तय करती है। देश में अन्य स्थानों पर तो अमान परिवर्तन हो गया परन्तु हमारे यहाँ अभी भी चल रही है। पहले स्टीम इंजन था अब डीजल इंजन चलता है। रायपुर राजधानी बनने के बाद इस ट्रेन के यात्रियों में बेतहाशा वृद्धि हुई। राजधानी में नवनिर्माण होने लगे तो धमतरी एवं राजिम से काम करने के लिए कम खर्च में इसी ट्रेन से रायपुर तक का सफ़र तय करते हैं। यह ट्रेन अपनी शताब्दी पूर्ण कर चुकी है। यह क्षेत्र वन सम्पदा से भरपूर था और उसके दोहन के लिए अंग्रेजों ने रेल लाईन बिछाई।
इस मार्ग पर 1896 में 45.74 मील लंबी रेल लाइन बनाने का काम शुरू हुआ, जो 5 साल बाद 1901 में पूरा कर लिया गया। यह रेल लाइन ब्रिटिश इंजीनियर एएस एलेन की अगुवाई में में बनाई गई। छत्तीसगढ़ में अकाल के दौरान ग्रामीणों को रोजगार देने के नाम पर इस रेल लाईन का निर्माण किया गया। बताते हैं कि धमतरी मार्ग पर नगरी तक रेल पटरियां बिछाई गई और राजिम मार्ग पर गरियाबंद के जंगलों तक। इसके परिचालन के लिए महानदी पर लकड़ी का पुल बनाया गया। तब कहीं जाकर यह ट्रेन गरियाबंद के जंगलों तक पहुंची। इस ट्रेन के माध्यम से वन संपदा का दोहन युद्ध स्तर पर किया गया। पहले इसे ग्रामीण "दू डबिया गाड़ी" कहते थे। शुरुवाती दिनों में इसमें दो डिब्बे लगाकर ही चलाया जाता था। ग्रामीण इसके इंजन की सीटी सुन कर समय का पता लगाते थे। इसमें भाप का ईंजन 1980 तक चला। इसके बाद डीजल के इंजन लगे और सफ़र थोड़ी अधिक गति से होने लगा।
सैकड़ों साल पहले रेल परिचालन किस तरह से होता है अगर यह जानना है तो इस छोटी ट्रेन का सफ़र करना चाहिए। यातायात के उसी साधनों का प्रयोग आज भी किया जाता है जो सैकड़ों साल पहले किया जाता था। ट्रेन का ड्रायवर आज भी गोला बंधा रिंग फ़ेंकता है जिसे लोहे की मशीन में डाल कर दो बड़ी चाबियाँ लगा कर फ़िर फ़ोन किया जाता है तब लाईन क्लियर की जाती है। सड़क मार्ग के गेट आज उन बड़ी चाबियों से खुलते हैं। इस मार्ग पर अभनपुर महत्वपूर्ण जंक्शन है। यहाँ से राजिम एवं धमतरी के लिए रेलमार्ग पृथक हो जाता है। स्टेशन पर आज भी वैसा ही है जैसा सवा सौ साल पहले था, रत्ती भर भी बदलाव नहीं आया है। सिर्फ़ टिकिट देने वाली मशीन की जगह अब कम्पयूटर लग गया है। डीजल इंजन लगने के कारण पानी की टंकियाँ हटा दी गई हैं। पूर्व राष्ट्रपति अब्दूल कलाम जब डी आर डी ओ के हेड थे तब उन्होने अपनी एक गोपनीय यात्रा इस ट्रेन द्वारा रायपुर से धमतरी तक की थी।
अब इस ट्रेन के दिन भी लदने वाले हैं। रायपुर से रेल्वे स्टेशन से हटा कर अब इसका परिचालन तेलीबांधा से किया जा रहा है। नई राजधानी से केन्द्री तक बड़ी रेल लाईन बिछाने का कार्य युद्ध गति से चल रहा है और समाचार मिला है कि केन्द्री से धमतरी तक भी इसका अमान परिवर्तन कर नेरोगेज को ब्राड गेज में तब्दील किया जाएगा। परन्तु छोटी गाड़ी के सफ़र का आनंद ही अलग है। इसे नए रायपुर में लोकल ट्रेन जैसे चलाना चाहिए। जिससे आने वाले पर्यटक सुबह शाम राजधानी भ्रमण का आनंद इस ट्रेन के माध्यम से कर सकें। वैसे इस ट्रेन के बंद होने में साल भर तो लग सकता है तब तक इसकी यात्रा का आनंद उठाया जा सकता है।
रानी माई की रहस्यमय दुनिया: बस्तर अंचल
गोड़ मा पैरी, माथा म लाली वो SS, कान मा झुमका तिकोनी वाली होSS मोर गांवे म हाबे मड़ई, देखे ल आबे वोSS… वाहन में बज रहा छत्तीसगढ़ी गीत बसंत के इस मौसम में गाँव की मड़ई देखने का निमंत्रण दे रहा था।
हम भी गांव की ओर जाने वाली सर्पीली सड़क पर गीत सुनते हुए बढ़े जा रहे थे, मड़ई वाला गाँव था रायपुर राजधानी से एक सौ चालिस किमी दूर कांकेर जिले की चारामा तहसील का हल्बा टिकरापारा।
यह गाँव रानी डोंगरी ग्राम पंचायत का आश्रित ग्राम है, बस हमारी कहानी इस गाँव की ही कहानी है। हमारी गाड़ी जब गाँव में पहुंचती है तो बच्चे गाड़ी के पीछे दौड़ने लगते हैं, ऊंघती दोपहरिया में लोग चौकन्ने हो जाते हैं। एक घर के सामने कुछ आदमी औरतें बीड़ी बनाते दिखाई देते हैं और हमारी गाड़ी यही रुक जाती है।
सरपंच तिलक राम कुंजाम के आने के बाद चर्चा शुरु होती है। इस इस गाँव में लगभग 150 छानी (छतें) हैं, जिनमें बसने वाले सर्वाधिक गोंड़ जनजाति के लोग हैं, उसके बाद अधिक जनसंख्या कलार जाति के लोगों की है। धोबी, लोहार के साथ एक घर साहू जाति का भी है। गाँव में पेयजल का साधन नलकूप हैं और बाकी निस्तारी दो तालाबों से होती हैं।
गांव में दो-तीन मंदिर भी हैं, जिसमें शीतला माता, शिव जी के साथ हनुमान जी भी विराजित हैं। प्रायमरी तक का स्कूल शिक्षा के लिए है, इसके बाद पास के ही हल्बा कस्बे में शिक्षा हेतू जाना पड़ता है।
गैर अपासी गाँव होने के कारण सिंचाई के साधन उपलब्ध नहीं है, इसलिए बरसात पर आधारित धान की खेती करनी पड़ती है, वर्षा पर ही यहाँ का जीवन आधारित है, अन्य कोई रोजगार के साधन यहां उपलब्ध नहीं है।
हम भी गांव की ओर जाने वाली सर्पीली सड़क पर गीत सुनते हुए बढ़े जा रहे थे, मड़ई वाला गाँव था रायपुर राजधानी से एक सौ चालिस किमी दूर कांकेर जिले की चारामा तहसील का हल्बा टिकरापारा।
यह गाँव रानी डोंगरी ग्राम पंचायत का आश्रित ग्राम है, बस हमारी कहानी इस गाँव की ही कहानी है। हमारी गाड़ी जब गाँव में पहुंचती है तो बच्चे गाड़ी के पीछे दौड़ने लगते हैं, ऊंघती दोपहरिया में लोग चौकन्ने हो जाते हैं। एक घर के सामने कुछ आदमी औरतें बीड़ी बनाते दिखाई देते हैं और हमारी गाड़ी यही रुक जाती है।
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| हल्बा टिकरापारा की दुपहरिया |
गांव में दो-तीन मंदिर भी हैं, जिसमें शीतला माता, शिव जी के साथ हनुमान जी भी विराजित हैं। प्रायमरी तक का स्कूल शिक्षा के लिए है, इसके बाद पास के ही हल्बा कस्बे में शिक्षा हेतू जाना पड़ता है।
गैर अपासी गाँव होने के कारण सिंचाई के साधन उपलब्ध नहीं है, इसलिए बरसात पर आधारित धान की खेती करनी पड़ती है, वर्षा पर ही यहाँ का जीवन आधारित है, अन्य कोई रोजगार के साधन यहां उपलब्ध नहीं है।
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| रानी डोंगरी |
ग्राम परम्परा के अनुसार वहाँ पूजा करने के लिए बैगा किरपा राम सोरी नियुक्त है। जब भी देवी की पूजा करनी होती है या उन्हें ग्राम में आमंत्रित करना होता है तो बैगा के माध्यम से ही इस कार्य को सम्पन्न किया जाता है।
मड़ई के दिन सारे गाँव वासी रानी माई होम धूप देकर गाँव आने का निमंत्रण देते हैं, तथा उसके आदेश के बाद मड़ई की डांग लेकर गाँव आया जाता है, देवी मड़ई के कार्य को सफ़ल बनाने के लिए गाँव में पधारती हैं, साथ ही अनुषांगी देवता भी ग्राम में पहुंचते हैं।
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| रानी माई के दरबार का रास्ता |
देवी के स्थान तक पहुंचने के लिए पैड़ियों का निर्माण भी कर दिया गया है। नवरात्रि में यहाँ मेला लगता है और देवी का आशीर्वाद लेने के लिए वृहद संख्या में भक्त जन आते हैं तब यह वनांचल गुलजार हो जाता है माता के सेवा गीतों से।
पैड़ियां जहाँ जाकर समाप्त होती हैं वहीं लगभग 50 फ़ुट ऊंची एकाश्म चट्टान है और इस चट्टान पर एक बड़ी चट्टान छत की तरह प्राकृतिक रुप से रखी हुई है। यहाँ खुले में रानी माई का स्थान है, इनकी कोई प्रतिमा नहीं है, यहाँ सिर्फ़ आभासी रुप में विराजमान होकर बैगा के माध्यम से अपना पर्चा देती हैं।
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| रानी माई के दरबार में बैगा किरपा राम सोरी |
रानी माई के स्थान पर उनकी सेवा के लिए घोड़ा रखा गया है और पोला के दिन लोग यहाँ पर मिट्टी के बैल भी चढाने आते हैं। रानी माई आस-पास के रानी डोंगरी, टिकरापारा, कुरुभाट, कोटेला, टोंकोपाट आदि सात गांव की आराध्या हैं। इन गांव के लोग किसी दैवीय समस्या के निवारण के लिए रानी माई के स्थान पर आते हैं।
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| रानी माई के दरबार में चंदूलाल जैन, उनके भानजे, उनके मित्र, सरपंच तिलकराम कुंजाम एवं श्रीकांत दामले |
इसके बाद इनका सारा परिवार पति देशमात्र,बेटा कुंवर पाट एवं बहु बिजली कैना, जोगड़ा बाबा, गढ़ हिंगलाज देवी, राजाराव देव भी आ गए हैं। इस तरह रानी माई का पूरा कुनबा ही इस स्थान पर जुट गया। बावन कोरी में बाकी देवता महानदी के पास ही रह गए, उनकी पूजा उनके ठहरने के स्थान पर जाकर ही की जाती है।
यहां रानी माई के पति देशमात्र नहीं रहते, उन्हें अन्य स्थान पर रहना पड़ रहा है। बैगा बताते हैं कि इस स्थान पर एक बूढा सिंह भी रहता था जो देवी के स्थान के ईर्द गिर्द ही मंडराता रहता था। जब कोई पूजा करने आता था तब बह गुफ़ा में चला जाता था और पूजा करके लौटने पर फ़िर बाहर निकल आता था। लगभग बारह वर्षों से अब सिंह दिखाई नहीं देता। शायद गुफ़ा में बंद हो गया होगा।
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| रानी माई दरबार के पार्श्व की गुफ़ा से निकलते हुए लेखक |
उनके पति देशमात्र ने खेत जोतने के लिए हल में भैंसा फ़ांद रखा था और खेत जोत रहे थे, उन्हें भूख लगने लगी, इधर रानी माई को भक्तों की फ़रियाद सुनते हुए विलंब हो गया और खाना पहुंचाने में देर हो गई। खाना न लाते देख देशमात्र नें भूख के कारण भैंसे का सींग तोड़ कर आग में भूंज लिया और उसे खाने लगे।
रानी तभी खाना लेकर पहुंची तो उन्हें हड्डी जलने की बदबू आई, देखा कि उनका पति भैंसे का सींग तोड़ कर भूंज कर खा रहा है, उन्हें गुस्सा आ गया और उसे अपने स्थान पर कभी न आने चेतावनी दे दी। इससे देशमात्र भिरावर की पहाड़ी पर बस गए, उन्हें लगभग 12 गांव के लोग अपने अराध्य के रुप में मानते हैं।
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| रानी माई के दरबार का मनोरम दृश्य |
पौराणिक देवताओं की तरह कोई बहुत बड़ा प्रभामंडल नहीं है, वे मानवीय गुणों से परिपूर्ण देवी हैं, उनका स्वभाव इससे ही पता चलता है कि पति द्वारा अनैतिक कार्य करने पर उसे भी उन्होने ने नहीं बख्शा तथा बेटे और बहू को अपने स्थान पर साथ ही रखा है। उनकी बहू बिजली कैना अर्थात बिजली की कन्या भी उनके साथ ही बेटी की तरह रहती है।
सजा का भागी सिर्फ़ उनका पति ही बनता है। देवी के इस मनोरम स्थल पर पहुंच कर मन प्रसन्न हो जाता है। बस बिना किसी योजना के यहां शासकीय निर्माण कार्य इस स्थान की सुंदरता में धब्बा लगा रहे हैं। इस स्थान को प्राकृतिक रुप में रखने की आवश्यकता है तभी इसकी सुंदरता कायम रह सकती है। सांझ ढ़ल रही थी और हम भी विहंगों के साथ अपने नीड़ की ओर लौट रहे थे।
तुरतुरिया: वाल्मीकि आश्रम एवं लवकुश की जन्मभूमि
सुबह का मौसम खुशखवार और गमख्वार था, सोचा कि एक बार फ़िर तुरतुरिया चला जाए। मोहदा रिसोर्ट से तुरतुरिया की दूरी 22 किमी और रायपुर से पटेवा-रवान-रायतुम होते हुए लगभग 118 किमी है। रायतुम के बाद यहाँ तक कच्ची सड़क है। शायद अभयारण्य में पक्की सड़क बनाने की अनुमति नहीं है। बाईक से सपाटे से चलते हुए ठंडी हवाओं के झोंकों के बीचे वन के प्राकृतिक वातावरण का आनंद लेते हुए तुरतुरिया पहुंच गया। सड़क के दांई तरफ़ वाल्मीकि आश्रम बना हुआ और दांई तरफ़ नाले के किनारे मैदान में कुछ दुकाने सजी हुई थी। पता चला कि पुन्नी मेला का कार्यक्रम चल रहा है। आश्रम में कुछ भवन बने हुए हैं, समीप ही निर्मित कुंड में कुछ लोग स्नान कर रहे थे।
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| वाल्मीकि आश्रम तुरतुरिया |
पहाड़ी की तलहटी में यह मनोरम स्थान है, जनश्रुति है कि त्रेतायुग में वाल्मीकि यहां पर वैदेही सीता को लेकर आए थे और यहीं पर लवकुश का जन्म हुआ था। पहाड़ी से एक तुर्रा निकलता है जिसमें पुष्कल जल का प्रवाह बारहो महीने रहता है। तुर्रे से प्रवाहित होता जल "तुर-तुर" की ध्वनि के साथ भूमि पर गिरता है इसलिए इस स्थान का नाम तुरतुरिया रुढ़ हो गया। तुर्रे के मुंह पर अब गोमुख बना दिया गया है तथा इसके दोनो तरफ़ प्रस्तर प्रतिमाएं रखी हुई हैं।
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| तुरतुर की ध्वनि करती जलधारा |
विष्णु की एक स्थानक प्रतिमा है तथा दूसरी प्रतिमा भी पद्मासन में बैठे कीरिटधारी विष्णु की योगमुद्रा में है। इसे देख कर लोगों को बुद्ध का भान होता है। सन 1914 में तत्कालीन अंग्रेज कमिश्नर एच.एम्.लारी ने इस स्थल का महत्त्व समझने पर यहाँ खुदाई करवाई थी, जिसमे अनेक मंदिर और प्राचीन प्रतिमाएं प्राप्त हुयी थी। एच एम लारी के नाम का शिलालेख गोमुख के ऊपर लगा हुआ है। मेला लगा होने के कारण जलस्रोत में स्नान करने वालों का तांता लगा हुआ था। महिलाओं एवं पुरुषों के लिए पृथक-पृथक स्नान कुंड की व्यवस्था बनाई हुई है।
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| जल कुंड |
प्राचीन मंदिर के भग्नावशेष यहां पर चारों तरफ़ बिखरे पड़े हैं। जिन्हें इस आश्रम में एक तरफ़ समेट दिया गया है और नवनिर्मित मंदिरों में स्थापित कर दिया गया है। द्वार पाल, दंडधर, गणेश, शिवलिंग, नंदी, केशीवध इत्यादि की प्रतिमाएं यहाँ रखी हुई हैं। योनीपीठ में स्थापित शिवलिंग किसी मंदिर के प्रस्तर कलश सा दिखाई देता है। जिसके शीर्ष पर नारियल एवं नीचे पद्म बना हुआ है। जब कहीं पर कोई पुरातन प्रतिमा प्राप्त होती है तो लोग स्वयं ही उसकी पहचान के विषय में अनुमान लगा लेते हैं, जैसे अंधो का हाथी। सब स्वविवेक से नामकरण कर लेते हैं।
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| तुरतुरिया |
लव कुश की जन्मभूमि मानने का कारण यहाँ प्राप्त हुई दो प्रतिमाएं है, इन प्रतिमाओं में एक खड्गधारी की कोहनी को अश्व ने अपने मुंह में दबा रखा है और वह अश्व के साथ युद्धरत है, दूसरी प्रतिमा एक व्यक्ति वृषभ के साथ युद्धरत है। इन्ही प्रतिमाओं से अनुमान लगाया गया कि लवकुश ने अश्वमेघ के घोड़े को रोक रखा है और यह स्थान लवकुश की जन्मभूमि कहलाने लगा। इन दोनो प्रतिमाओं में पहली प्रतिमा कृष्ण द्वारा केशीवध की है तथा दूसरी प्रतिमा वत्सासुर वध की है। यह दोनो प्रतिमाएं कृष्ण लीला से संबंध रखती है। अब इन दोनों प्रतिमाओं के कारण इस स्थान की मान्यता लवकुश की जन्मभूमि की पहचान के रुप में स्थापित हो गई। पर आंचलिक लोगों की जो श्रद्धा इस आस्था पर बनी हुई है, वह आगे सदियों तक चलने वाली है।
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| केशी वध एवं वत्सासुर वध की इन प्रतिमाओं को लवकुश माना जाता है। |
इस स्थान पर प्राप्त भग्नावशेषों से मेरे अनुमान के अनुसार यहां आस पास सातवीं आठवी शताब्दी में निर्मित कोई भव्य मंदिर रहा होगा। जिसके भग्नावशेषों को इस स्थान पर एकत्रित कर दिया गया है। मंदिर के प्रस्तर स्तंभों का अलंकरण देख कर लगता है कि इसे उड़ीसा के शिल्पकारों ने निर्मित किया होगा। क्योंकि स्तंभों का अलंकरण उसी शैली में दिखाई देता है। आश्रम के आस-पास बहुत सारी खंडित प्रतिमाएं पड़ी हैं, जिन्हें सहेज कर रखने की आवश्यकता है। कुल मिलाकर यह स्थान रमणीय है, जहाँ जल की व्यवस्था हो ऐसे वनक्षेत्र में कई दिनों तक ठहरा जा सकता है। आश्रम के ऊपर स्थित पहाड़ी पर भालुओं एवं चीतलों का उन्मुक्त विचरण प्राकृतिक वातावरण को भव्यता प्रदान करता है
छत्तीसगढ़: सबरी का सबरीनारायण
जिसका मन सुंदर हो, उसे सारी दुनिया सुंदर नजर आती है। मन से सभी तरह के भेद मिट जाते है। ईश्वर की बनाई सारी रचना खूबसूरत जान पड़ती है। ऐसे ही भगवान राम हैं, उनके दर्शनों के लिए व्याकुलता से प्रतीक्षा करती सबरी से राम जी की भेंट का वर्णन करते हुए बाबा तुलसीदास कहते हैं - "कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता।।"
राम जी सबरी को "भामिनि" कह संबोधित करते हैं। भामिनि का अर्थ यहां पर "सुंदरी" होता है। राम की बात सुनकर सबरी गदगद हो जाती है और "प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा।। सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे।।"
राम जी के वचन सुनकर सबरी के मुंह से बोल नहीं फ़ूटते, वह मगन हो जाती है। यहीं सबरी से भगवान राम उसके चखे बेर खाते हैं। जहाँ यह मिलन होता है, यह स्थान छत्तीसगढ़ में शिवरीनारायण कहलाता है।
राम जी सबरी को "भामिनि" कह संबोधित करते हैं। भामिनि का अर्थ यहां पर "सुंदरी" होता है। राम की बात सुनकर सबरी गदगद हो जाती है और "प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा।। सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे।।"
राम जी के वचन सुनकर सबरी के मुंह से बोल नहीं फ़ूटते, वह मगन हो जाती है। यहीं सबरी से भगवान राम उसके चखे बेर खाते हैं। जहाँ यह मिलन होता है, यह स्थान छत्तीसगढ़ में शिवरीनारायण कहलाता है।
सुबह नीलकमल वैष्णव जी के निवास पर नाश्ता किए, सूर्यनारायण आसमान में प्रभा बिखेर रहे थे और हम कोसीर से भटगांव होते हुए शिवरीनारायण पहुंच गए।
महानदी के तट पर स्थित प्राचीन शिवरीनारायण नगर जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत जांजगीर से 60 कि. मी., बिलासपुर से 64 कि. मी., कोरबा से 110 कि. मी., रायगढ़ से व्हाया सारंगढ़ 110 कि. मी. और राजधानी रायपुर से व्हाया बलौदाबाजार 120 कि. मी. की दूरी पर स्थित है।
यहां महानदी, शिवनाथ और जोंक नदी का त्रिधारा संगम प्राकृतिक सौंदर्य का अनुपम उदाहरण है। इसे ''प्रयाग'' जैसी मान्यता है। मैकल पर्वत श्रृंखला की तलहटी में अपने अप्रतिम सौंदर्य के कारण और चतुर्भुजी विष्णु मूर्तियों की अधिकता के कारण स्कंद पुराण में इसे ''श्री नारायण क्षेत्र'' और ''श्री पुरूषोत्तम क्षेत्र'' कहा गया है।
प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा से यहां एक बृहद मेला का आयोजन होता है, जो महाशिवरात्रि तक लगता है।
महानदी के तट पर स्थित प्राचीन शिवरीनारायण नगर जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत जांजगीर से 60 कि. मी., बिलासपुर से 64 कि. मी., कोरबा से 110 कि. मी., रायगढ़ से व्हाया सारंगढ़ 110 कि. मी. और राजधानी रायपुर से व्हाया बलौदाबाजार 120 कि. मी. की दूरी पर स्थित है।
यहां महानदी, शिवनाथ और जोंक नदी का त्रिधारा संगम प्राकृतिक सौंदर्य का अनुपम उदाहरण है। इसे ''प्रयाग'' जैसी मान्यता है। मैकल पर्वत श्रृंखला की तलहटी में अपने अप्रतिम सौंदर्य के कारण और चतुर्भुजी विष्णु मूर्तियों की अधिकता के कारण स्कंद पुराण में इसे ''श्री नारायण क्षेत्र'' और ''श्री पुरूषोत्तम क्षेत्र'' कहा गया है।
प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा से यहां एक बृहद मेला का आयोजन होता है, जो महाशिवरात्रि तक लगता है।
मान्यता है कि इस दिन भगवान जगन्नाथ यहां विराजते हैं और पुरी के भगवान जगन्नाथ के मंदिर का पट बंद रहता है। इस दिन उनका दर्शन मोक्षदायी होता है।
तत्कालीन साहित्य में जिस नीलमाधव को पुरी ले जाकर भगवान जगन्नाथ के रूप में स्थापित किया गया है, उसे इसी शबरीनारायण-सिंदूरगिरि क्षेत्र से पुरी ले जाने का उल्लेख 14 वीं शताब्दी के उड़िया कवि सरलादास ने किया है। इसी कारण शिवरीनारायण को छत्तीसगढ़ का जगन्नाथ पुरी कहा जाता है.
शिवरीनारायण दर्शन के बाद राजिम का दर्शन करना आवश्यक माना गया है क्योंकि राजिम में ''साक्षी गोपाल'' विराजमान हैं। इसी कारण यहां के मेले को ''छत्तीसगढ़ का कुंभ'' कहा जाता है जो प्रतिवर्ष लगता है।
तत्कालीन साहित्य में जिस नीलमाधव को पुरी ले जाकर भगवान जगन्नाथ के रूप में स्थापित किया गया है, उसे इसी शबरीनारायण-सिंदूरगिरि क्षेत्र से पुरी ले जाने का उल्लेख 14 वीं शताब्दी के उड़िया कवि सरलादास ने किया है। इसी कारण शिवरीनारायण को छत्तीसगढ़ का जगन्नाथ पुरी कहा जाता है.
शिवरीनारायण दर्शन के बाद राजिम का दर्शन करना आवश्यक माना गया है क्योंकि राजिम में ''साक्षी गोपाल'' विराजमान हैं। इसी कारण यहां के मेले को ''छत्तीसगढ़ का कुंभ'' कहा जाता है जो प्रतिवर्ष लगता है।
शबरी का असली नाम श्रमणा था, वह भील सामुदाय के शबर जाति से सम्बन्ध रखती थीं। उनके पिता भीलों के राजा थे। बताया जाता है कि उनका विवाह एक भील कुमार से तय हुआ था, विवाह से पहले सैकड़ों बकरे-भैंसे बलि के लिए लाये गए जिन्हें देख शबरी को बहुत बुरा लगा कि यह कैसा विवाह जिसके लिए इतने पशुओं की हत्या की जाएगी।
शबरी विवाह के एक दिन पहले घर से भाग गई। घर से भाग वे दंडकारण्य पहुंच गई। दंडकारण्य में ऋषि तपस्या किया करते थे, शबरी उनकी सेवा तो करना चाहती थी पर वह हीन जाति की थी और उनको पता था कि उनकी सेवा कोई भी ऋषि स्वीकार नहीं करेंगे।
इसके लिए उन्होंने एक रास्ता निकाला, वे सुबह-सुबह ऋषियों के उठने से पहले उनके आश्रम से नदी तक का रास्ता साफ़ कर देती थीं, कांटे बीन कर रास्ते में रेत बिछा देती थी। यह सब वे ऐसे करती थीं कि किसी को इसका पता नहीं चलता था।
शबरी विवाह के एक दिन पहले घर से भाग गई। घर से भाग वे दंडकारण्य पहुंच गई। दंडकारण्य में ऋषि तपस्या किया करते थे, शबरी उनकी सेवा तो करना चाहती थी पर वह हीन जाति की थी और उनको पता था कि उनकी सेवा कोई भी ऋषि स्वीकार नहीं करेंगे।
इसके लिए उन्होंने एक रास्ता निकाला, वे सुबह-सुबह ऋषियों के उठने से पहले उनके आश्रम से नदी तक का रास्ता साफ़ कर देती थीं, कांटे बीन कर रास्ते में रेत बिछा देती थी। यह सब वे ऐसे करती थीं कि किसी को इसका पता नहीं चलता था।
एक दिन ऋषि मतंग की नजऱ शबरी पर पड़ी, उनके सेवाभाव से प्रसन्न होकर उन्होंने शबरी को अपने आश्रम में शरण दे दी, इस पर ऋषि का सामाजिक विरोध भी हुआ पर उन्होंने शबरी को अपने आश्रम में ही रखा।
जब मतंग ऋषि की मृत्यु का समय आया तो उन्होंने शबरी से कहा कि वे अपने आश्रम में ही भगवान राम की प्रतीक्षा करें, वे उनसे मिलने जरूर आएंगे। मतंग ऋषि की मौत के बात शबरी का समय भगवान राम की प्रतीक्षा में बीतने लगा, वह अपना आश्रम एकदम साफ़ रखती थीं।
रोज राम के लिए मीठे बेर तोड़कर लाती थी। बेर में कीड़े न हों और वह खट्टा न हो इसके लिए वह एक-एक बेर चखकर तोड़ती थी। ऐसा करते-करते कई साल बीत गए।
जब मतंग ऋषि की मृत्यु का समय आया तो उन्होंने शबरी से कहा कि वे अपने आश्रम में ही भगवान राम की प्रतीक्षा करें, वे उनसे मिलने जरूर आएंगे। मतंग ऋषि की मौत के बात शबरी का समय भगवान राम की प्रतीक्षा में बीतने लगा, वह अपना आश्रम एकदम साफ़ रखती थीं।
रोज राम के लिए मीठे बेर तोड़कर लाती थी। बेर में कीड़े न हों और वह खट्टा न हो इसके लिए वह एक-एक बेर चखकर तोड़ती थी। ऐसा करते-करते कई साल बीत गए।
एक दिन शबरी को पता चला कि दो सुकुमार युवक उन्हें ढूंढ रहे हैं। वे समझ गईं कि उनके प्रभु राम आ गए हैं, तब तक वे बूढ़ी हो चुकी थीं, लाठी टेक के चलती थीं। लेकिन राम के आने की खबर सुनते ही उन्हें अपनी कोई सुध नहीं रही, वे भागती हुई उनके पास पहुंची और उन्हें घर लेकर आई और उनके पाँव धोकर बैठाया।
अपने तोड़े हुए मीठे बेर राम को दिए राम ने बड़े प्रेम से वे बेर खाए और लक्ष्मण को भी खाने को कहा। लक्ष्मण को जूठे बेर खाने में संकोच हो रहा था, राम का मन रखने के लिए उन्होंने बेर उठा तो लिए लेकिन खाए नहीं। कहते हैं कि इसके परिणाम स्वरुप राम-रावण युद्ध में जब शक्ति बाण का प्रयोग किया गया तो वे मूर्छित हो गए थे।
अपने तोड़े हुए मीठे बेर राम को दिए राम ने बड़े प्रेम से वे बेर खाए और लक्ष्मण को भी खाने को कहा। लक्ष्मण को जूठे बेर खाने में संकोच हो रहा था, राम का मन रखने के लिए उन्होंने बेर उठा तो लिए लेकिन खाए नहीं। कहते हैं कि इसके परिणाम स्वरुप राम-रावण युद्ध में जब शक्ति बाण का प्रयोग किया गया तो वे मूर्छित हो गए थे।
यह नगर सतयुग में बैकुंठपुर, त्रेतायुग में रामपुर, द्वापरयुग में विष्णुपुरी और नारायणपुर के नाम से विख्यात था जो आज शिवरीनारायण के नाम से चित्रोत्पला-गंगा (महानदी) के तट पर कलिंग भूमि के निकट दैदीप्यमान है।
यहां सकल मनोरथ पूरा करने वाली मां अन्नपूर्णा, मोक्षदायी भगवान नारायण, लक्ष्मीनारायण, चंद्रचूड़ और महेश्वर महादेव, केशवनारायण, श्रीराम लक्ष्मण जानकी, जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा से युक्त श्री जगदीश मंदिर, राधाकृष्ण, काली और मां गायत्री का भव्य और आकर्षक मंदिर है।
कुल मिलाकर त्रिवेणी संगम पर स्थित यह नगर मंदिरों का नगर है। इसके साथ ही कुछ दूर पर स्थित खरौद में भी प्राचीन मंदिर हैं।
यहां सकल मनोरथ पूरा करने वाली मां अन्नपूर्णा, मोक्षदायी भगवान नारायण, लक्ष्मीनारायण, चंद्रचूड़ और महेश्वर महादेव, केशवनारायण, श्रीराम लक्ष्मण जानकी, जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा से युक्त श्री जगदीश मंदिर, राधाकृष्ण, काली और मां गायत्री का भव्य और आकर्षक मंदिर है।
कुल मिलाकर त्रिवेणी संगम पर स्थित यह नगर मंदिरों का नगर है। इसके साथ ही कुछ दूर पर स्थित खरौद में भी प्राचीन मंदिर हैं।
हम यहाँ मंदिरों के दर्शन करते हुए, महंत जी के मठ में पहुंचे। यह एक अति प्राचीन वैष्णव मठ है जिसका निर्माण स्वामी दयारामदास ने नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों से इस नगर को मुक्त कराने के बाद किया था।
रामानंदी वैष्णव सम्प्रदाय के इस मठ के वे प्रथम महंत थे। तब से आज तक 14 महंत हो चुके हैं, वर्तमान में इस मठ के श्री रामसुन्दरदास जी महंत हैं। नगर के नामकरण के विषय में मान्यता है कि शबरों को वरदान मिला कि उसके नाम के साथ भगवान नारायण का नाम भी जुड़ जायेगा..
पहले ''शबर-नारायण'' फिर शबरी नारायण और आज शिवरीनारायण यह नगर कहलाने लगा। मठ में स्थित मंदिरों की फ़ोटो लेते हुए हम खरदूषण की नगरी खरौद ओर चल पड़े………। ( इस यात्रा में कोसीर निवासी मित्र नीलकमल वैष्णव एवं पत्रकार साहित्कार लेखक लक्ष्मीनारायण लहरे जी संगवारी बने )
रामानंदी वैष्णव सम्प्रदाय के इस मठ के वे प्रथम महंत थे। तब से आज तक 14 महंत हो चुके हैं, वर्तमान में इस मठ के श्री रामसुन्दरदास जी महंत हैं। नगर के नामकरण के विषय में मान्यता है कि शबरों को वरदान मिला कि उसके नाम के साथ भगवान नारायण का नाम भी जुड़ जायेगा..
पहले ''शबर-नारायण'' फिर शबरी नारायण और आज शिवरीनारायण यह नगर कहलाने लगा। मठ में स्थित मंदिरों की फ़ोटो लेते हुए हम खरदूषण की नगरी खरौद ओर चल पड़े………। ( इस यात्रा में कोसीर निवासी मित्र नीलकमल वैष्णव एवं पत्रकार साहित्कार लेखक लक्ष्मीनारायण लहरे जी संगवारी बने )
करिया धुरवा
छत्तीसगढ़ अंचल में किसान धान की फ़सल कटाई, मिंजाई और कोठी में धरने के बाद एक सत्र की किसानी करके फ़ुरसत पा जाता है और दीवाली मनाकर देवउठनी एकादशी से अंचल में मड़ई मेलों का दौर शुरु हो जाता है। ये मड़ई मेले आस्था का प्रतीक हैं और सामाजिक संस्था को सुदृढ़ करने के साथ जनचेतना जागृति करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लगभग सभी छोटे बड़े गाँवों में इनका आयोजन होता है और यह उत्सव शिवरात्रि तक निर्बाध चलते रहता है। जनपदों में आज इस गांव में और कल उस गाँव में, मतलब पृथक पृथक दिन मड़ई का आयोजन होता है, जिसमें ग्राम देवताओं की पूजा पाठ के साथ मनोरंजन के नाच गाने का भी प्रबंध होता है। यह पर्व ग्राम समिति के माध्यम से संचालित होते हैं।
वर्तमान में अंचल में मड़ई मेलों का दौर चल रहा है। बड़े मेले तो विशेष पर्व या माह की पूर्णिमा तिथि को नदी तट पर आयोजित होते हैं, पर मड़ई का आयोजन लगभग प्रत्येक ग्राम में हो जाता है। वर्तमान में मुझे महासमुंद जिले पिथौरा तहसील के करिया धुरवा में मड़ई उत्सव देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ। इस स्थान पर कौड़िया राजा करिया धुरवा एंव धुरवीन का स्थान है और पूष माह की पूर्णिमा को यहां प्रतिवर्ष मड़ई का आयोजन होता है। यहाँ करिया धुरवा एवं धुरवीन का कांक्रीट का मंदिर बने हुए हैं और दोनो पृथक स्थानों पर विराजमान हैं।
करिया धुरवा के मंदिर प्रस्तर निर्मित बहुत सारी खंडित प्रतिमाएं सहेज कर रखी हुई हैं तथा इनमें घुड़सवार करिया धुरवा की प्रतिमा स्थापित है। वहीं सड़क के दूसरी तरफ़ धुरवीन भी घोड़े पर सवार होकर मंदिर में विराजमान है और यहां भी अनेक प्रस्तर निर्मित खंडित प्रतिमाएं रखी हुई हैं। ग्रामीण पुरुष एवं महिलाएं इन स्थानों पर नारियल पुष्प अर्पित कर धूप दीप प्रज्जवलित कर सकाम पूजा पाठ करते हैं तथा मनोकामना पूर्ण होने के लिए देवों से प्रार्थना करते हैं। इस दिन यहाँ भक्तों की काफ़ी संख्या देखी जा सकती है।
करिया धुरवा के विषय में जितने मुंह उतनी कहानियां एवं किंवदन्तियाँ सुनने मिलती हैं। मड़ई भ्रमण करते हुए हमारी भेंट मंदिर समिति के सचिव जी से होती है। उनका कहना है कि करिया धुरवा कौड़िया राजा थे, उनका विवाह सिंगा धुरवा की राजकुमारी से होना तय हुआ। विवाह से पूर्व उभय पक्षों में तय होता है कि विवाह के पश्चात दिन में विदाई हो जानी चाहिए और वर पक्ष दुल्हन लेकर सूर्यास्त के पूर्व अपने ग्राम पहुंच जाए।
करिया धुरवा बारात लेकर सिंगा धुरवा जाते हैं, परन्तु विवादि विदाई प्रक्रिया में विलंब हो जाता है। गाँव पहुंचने के पूर्व ही सूर्यास्त हो जाता है। बारातियों एवं दुल्हन के साथ गांव के बाहर ही रात बिताने के लिए डेरा डाल देते हैं। वर पक्ष एवं वधु पक्ष दोनों का डेरा अलग-अलग लगता है, परन्तु दैवीय आपदा के कारण दोनों पक्ष रात को पत्थर में बदल जाते हैं। यही पत्थर में बदले हुए धुरवा और धुरविन कालांतर में लोक देवता के रुप में पुजित होने लगे और लोक मान्य हो गए।
छत्तीसगढ़ अंचल में मैने कचना धुरवा (गरियाबंद मार्ग पर) , सिंगा धुरवा (सिरपुर के 15 किमी दूरी पर पहाड़ी पर स्थित) और करिया धुरवा (अर्जुनी पिथौरा के समीप) तीनों को देखा है। किवदन्ति में तो इन्हें भाई बताया जाता है। परन्तु और भी कोई लोकगाथा प्रचलन में हो सकती है। करिया धुरवा में रखी हुई प्रस्तर प्रतिमाएं किसी मंदिर के भग्नावशेष भी हो सकते हैं, जो खेतों में यत्र-तत्र बिखरे पड़े थे और बाद में किसी ने एकत्रित कर दिए होगें। कुल मिलाकर बात यह है कि ये प्रस्तर प्रतिमाएं हमें इतिहास से जोड़ती हैं और गौरव प्रदान करती है।
मड़ई मेलों में ग्रामीण उपयोग की वस्तुओं की दुकाने सजती हैं। सभी दुकानदार मड़ई के हाकां के अनुसार एक गांव से दूसरे गांव में भ्रमण करते रहते हैं। मिठाई की दुकाने, फ़ोटो स्टूडियों, टिकली फ़ुंदरी वाले, गोलगप्पे चाट वाले, गिलट के जेवर की दुकानें, गोदना वाले और भी तरह-तरह की सामग्रियों के विक्रेता अपनी दुकान सजाए रहते हैं। इसके साथ गांव के दुकानदार भी कुछ कमाई करने की दृष्टि से अपनी दुकाने लगाते हैं। सब्जियों इत्यादि की दुकाने भी सजती हैं। गोदना गोदवाने का प्रचलन आज भी आदिवासी समाज में बहुलता से दिखाई देता है। हम भी मड़ई भ्रमण कर ग्रामीण परिवेश का आनंद लेने के बाद लौट आए।
राजा तालाब : हल्बा टिकरापारा जिला कांकेर
बात 1956-57 की है, बस्तर नरेश प्रवीण चंद भंजदेव वर्तमान कांकेर जिले के हल्बा गाँव के टिकरापारा पहुंचे, उनके स्वागत में सारा गाँव इकट्ठा हुआ। गाँव की चौपाल में उनके लिए खाट बिछाकर ग्रामीणों ने स्वागत किया, वे आकर खाट पर विराज गए। राजा के आगमन पर गाँव के सभी नागरिक इकट्ठे हो गए। राजा उनसे समस्याओं पर चर्चा करने लगे। यह आजादी के बाद का दौर था, जिसमें देश का लोकतंत्र अपना स्वरुप ग्रहण कर रहा था और विकास के पायदान गढ़े जा रहे थे।
ग्राम के सरपंच तिलकराम कुंजाम उस दिन को याद करते हुए कहते हैं कि " हम लोग उस समय बच्चे थे, लेकिन समझने लायक हो गए थे, राजा सफ़ेद कुर्ता पैजामा पहना हुआ था और उनके लम्बे बाल कंधे पर झूल रहे थे। ग्रामीणो ने कहा कि गाँव में निस्तारी के लिए पानी समस्या है और कोई भी तालाब नहीं है, कुछ कुंओं एवं नाले के पानी पर ही आश्रित हैं। तब राजा ने ग्राम वासियों को 500/- रुपए दिए और तालाब बनाना शुरु करने को कहा। राजा के पैसों एवं ग्रामीणों के श्रमदान से तालाब का निर्माण शुरु हो गया।
तालाब के लिए स्थान का चयन करने के बाद सारा गाँव तालाब निर्माण में जुट गया, खंती लग गई। तालाब निर्माण का काम लगभग 3 बरस तक चला तब कहीं जाकर 3 एकड़ की भूमि में "राजा तालाब" का निर्माण हुआ। निर्माण कार्य के दौरान रुपयों की कमी पड़ने पर गांव के कुछ लोग जगदलपुर जाते और राजा से रुपए लेकर आते। इस तरह कुल बारह हजार रुपयों में तालाब का निर्माण कार्य पूर्ण हुआ। राजा तालाब की पार पर शिवालय का निर्माण भी ग्रामवासियों ने किया।
तालाब बनने के बाद समझ आया कि इसके लिए उपयुक्त स्थान का चयन नहीं किया गया। तालाब के चारों तरफ़ खेत थे, इसमें पानी आने का कोई साधन नहीं था, वर्षा जल पर ही इसका भराव संभव होता था। जैसे ही पूस माघ का समय आता है इस तालाब का पानी रिसकर खेतों में चला जाता है। तालाब की मिट्टी भी रेतीली है जिसके कारण पानी नहीं ठहरता॥ हमने जाकर देखा तो तालाब का पानी अंटकर मटमैला हो गया था तब भी लोग उसमें निस्तारी कर रहे थे।
चंदू लाल जैन कहते हैं कि इस तालाब के निर्मान के बाद ग्रामवासी एक मास्टर में खुद की भूमि में तालाब बनवाया, इसे "मास्टर तालाब" के नाम से जाना जाता है। मास्टर तालाब में पानी ठहरता है, निजी तालाब होने के बावजूद भी मास्टर जी ने कभी ग्राम वासियों को तालाब का पानी उपयोग करने के लिए मना नहीं किया। तालाब में पानी कम होने पर उसे नलकूप जल से उसे भर दिया जाता है, ग्राम में पानी के व्यवस्था के लिए कई बोरिंग भी हैं, जिससे निर्वहन हो जाता है।
आजादी के बाद भी बस्तर राजा द्वारा निजी धन से तालाब खुदवाने की जानकारी मुझे यहाँ प्राप्त हुई, बस्तर राजा प्रवीर चंद भंजदेव प्रजावत्सल थे, प्रजा के सुख दुख में सम्मिलित रहते और उसके दुखों एवं समस्याओं का निवारण करने का प्रयास स्वयं करते थे, इसलिए आज भी उन्हें बस्तर अंचल में भगवान की तरह पूजा जाता है। बस्तर के गाँव गाँव में उनकी स्मृतियाँ बगरी हुई हैं और 1966 के बस्तर महल कांड की यादें भी ग्रामीणों की स्मृति में अभी तक ताजा हैं।
बारसूर (बस्तर) की विनायकी प्रतिमा
बाणासुर की नगरी बारसुर (बस्तर छत्तीसगढ़) के संग्रहालय में गणेश की कई प्रतिमाएं रखी हुई हैं, इनकी फ़ोटो लेते वक्त मुझे स्त्री रुप में गणेश जी की प्रतिमा दिखाई दी। यहाँ गणेश की लगभग 20-25 प्रतिमाएँ होगीं तथा सबसे बड़ी गणेश प्रतिमा भी यहीं पाई जाती है। स्त्री गणेश प्रतिमा को देख कर जिज्ञासा हुई तो थोड़ी खोजबीन की गई। हम जानते हैं कि सनातन धर्म में भगवती ही मूल आदि शक्ति के नाम से विख्यात हैं। अलग अलग शक्तियों को स्त्री रूप में पूजा जाता है जैसे विद्या की देवी मां सरस्वती, धन की देवी महालक्ष्मी और समस्त शक्तियों की स्वामी देवी दुर्गा। महादेव को अर्धनारीश्वररूप में पूजा जाता है, तो श्री हरि ने भी जग की भलाई के लिए मोहिनी रूप धारण किया था।
भगवान गणेश के अनेकों नामों में से उनका एक नाम विनायकी भी है अर्थात गणेश-लक्षणों युक्त स्त्री। धर्म शास्त्रों में गणपति को स्त्री रूप में पूजते हुए उन्हें विनायकी, गजानना, विद्येश्वरी और गणेशिनी भी कहा गया है। ये सभी नाम गणेश जी के संबंधित नामों के स्त्रीलिंग रूप हैं। उनकी हाथी जैसी विशेषताओं के कारण, उन्हें आम तौर पर बुद्धि की हाथी जैसी सिर वाले भगवान- गणेश से संबंधित माना गया है, उनका कोई स्थिर नाम नहीं है और उन्हें विभिन्न नामों से जाना जाता है – जैसे गणेशी, विनायकी, गजानना, विघ्नेश्वरी और गणेशणी, ये सभी नाम गणेश के संबंधित नामों के स्त्रीलिंग रूप हैं । इन अभिचिह्नों से उन्हें शक्ति का रूप माना गया है यानी – गणेश का स्त्री रूप या उनसे मिलता-जुलता रूप ।
विनायकी को कभी-कभी चौसठ योगिनियों में से एक भी माना जाता है । बहरहाल, विद्वान कृष्णन का विचार है कि हाथी के सिर वाली देवी विनायकी, गणेश की ब्राह्मणी शक्ति है और तांत्रिक योगिनी तीन विशिष्ट देवियाँ हैं । एक स्वतंत्र देवी के रूप में, हाथीमुख देवी को जैन और बौद्ध परंपराओं में भी देखा जा सकता है । बौद्ध ग्रंथों में उन्हें गणपतिह्रदया कहा गया है । सबसे पहले ज्ञात हाथीमुख देवी की प्रतिमा रैढ़, राजस्थान में पाई गई । यह एक विकृत टैराकोटा फलक था जो पहली सदी बीसीई से लेकर पहली सदी सीई से संबंधित है । इस हाथीमुखी देवी की सूंड दाईं ओर मुड़ी है और उनके दो हाथ हैं । चूँकि उनके हाथों में प्रतीक और अन्य विशेषताएँ विकृत रूप में हैं, उन्हें देवी के रूप में अभिचिह्नित करना संभव नहीं है ।
हाथीमुखी देवी की अन्य मूर्तियाँ दसवीं सदी के बाद से पाई गईं हैं । विनायकी की एक सबसे प्रसिद्ध मूर्ति चौसठ योगिनी मंदिर, भेड़ाघाट, मध्य प्रदेश में इकतालिसवीं योगिनी के रूप में है । यहाँ इस देवी को श्री-ऐंगिनी कहा जाता है । यहाँ इस देवी के झुके हुए बाएँ पैर को एक हाथीमुखी पुरुष, संभवत: श्री गणेश ने सहारा दिया हुआ है । विनायकी की एक दुर्लभ धातु मूर्ति चित्रपूर मठ , शिराली में मिली है । वे गणेश की तरह नहीं, बल्कि इकहरी हैं । उन्होंने अपनी छाती पर यग्नोपवीत और गले में दो आभूषण पहना है । उनके हाथों में अभया और वरदा की मुद्राएँ बनी हैं । उनके दो कंधों पर तलवार और फंदा बना हुआ है । उनकी सूंड बाईं ओर मुड़ी हुई है । यह प्रतिमा संभवत: उत्तरी-पश्चिमी भारत (गुजरात / राजस्थान) से 10वीं सदी की लगती है और तांत्रिक गणपत्य धारा (जो गणेश को सर्वोच्च भगवान मानते हैं) या वामाचार देवी की पूजा करने वाले शाक्त धारा से संबंधित लगती है ।
बिहार की पाला विनायकी भी तोंदयुक्त नहीं हैं । यह चार हाथों वाली देवी गदा, घटा, परशु और संभवत: मूली लिए हुए है । प्रतिहारा चित्र में तोंदयुक्त विनायकी को दर्शाया गया है जिसमें उनके चार हाथों में गदा-परशु, कमल, एक पहचान-रहित वस्तु और मोदकों की थाली है जिन्हें उनका सूंड उठा रहा है । दोनों चित्रों में, सूंड दाईं ओर मुड़ा हुआ है । क्षतिग्रस्त चार हाथों या दो हाथों की विनायकी की प्रतिमाएँ रानीपूर झारियल (ओड़ीसा), गुजरात और राजस्थान में भी पाईं गई हैं । सतना में प्राप्त एक दूसरी प्रतिमा में विनायकी पाँच पशुरूपी देवियों में एक हैं । बीच में गौमुखी योगिनी, वृषभा अपने हाथों में बाल गणेश लिए हुए है । विनायकी जिनकी प्रतिमा छोटी है, तोंद लिए हुए है और गणेश की तरह हाथ में अंकुश लिए हुए है । श्री बालसुब्रमण्या स्वामी मंदिर, चेरियनाड, अलापुझा, केरल में भी विनायकी की प्रतिमा मिलती है।
गणेश जी के जन्म से संबंधित एक कहानी में, हाथीमुखी असुर मालिनी, पार्वती जो गणेश की माँ हैं, के स्नान का पानी पीने के बाद गणेश को जन्म देती है । स्कंद पुराण में, धन-संपत्ति की देवी लक्ष्मी को शाप दिया जाता है कि उनका सिर हाथी के जैसे हो जाए, जिससे वह प्रायश्चित करते हुए भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न कर छुटकारा पाती हैं । इन्हें विनायकी नहीं कहा गया है और माँ (मालिनी) या उसके समरूप (कुछ प्रतिमाओं में लक्ष्मी) के रूप में गणेश से बहुत कम संबद्ध किया गया । हरिवंश, वायु पुराण और स्कंद पुराण में भी हाथी मुखी मात्रिका, ग्रह और गणों का वर्णन किया गया है जिनके गजानन, गजमुखी और गजस्य जैसे नाम हैं । इसके बावजूद, कृशन ने इन मात्रिकाओं को ज्येष्ठा, दुर्भाग्य की देवी जिन्हें हाथीमुखी बताया गया है, से जोड़ा है ।
मत्स्य पुराण में वे एक मात्रिका हैं जिन्हें गणेश जी के पिता भगवान शिव ने राक्षसी अंधका को पराजित करने के लिए सृजित किया था । इस प्रसंग में, उन्हें गणेशजी के बजाय, शिव की शक्ति के रूप में देखा जा सकता है । केवल उनका नाम "विनायकी" जिसका अर्थ "विनायक/गणेश से संबंधित" है, उनसे संबंधित होने का संकेत करता है । लिंग पुराण में भी, शक्तियों की सूची में उनका नाम है । अग्नि पुराण पहला पुराण है जिसमें गणेश की शक्तियों को सूचीबद्ध किया गया है, तथापि, विनायकी उनमें नहीं है, न ही उनमें से कोई गजमुखी है, लेकिन, इसी पुराण में चौसठ योगिनियों की सूची में विनायकी अवश्य हैं ।
बहरहाल, उप-पुराण देवी पुराण में गणेश की शक्ति के रूप में गणनायिका या विनायकी का स्पष्ट उल्लेख मिलता है जिसमें उनके हाथीनुमा सिर और गणेश की तरह विघ्नों को दूर करने की क्षमता बताई गई है और उन्हें नौवीं मात्रिका के रूप में शामिल किया गया है । हांलाकि मूर्तियों और साहित्य में मात्रिकाओं की संख्या सात दर्शाई गई है, फिर भी पूर्वी भारत में नौ मात्रिकाएँ अधिक लोकप्रिय हैं । शास्त्रीय सात मात्रिकाओं के अलावा, आठवीं और नौंवी मात्रिका के रूप में क्रमश: महालक्ष्मी या योगेश्वरी और गणेशणी या गणेशा को शामिल किया गया है ।
मध्यकालीन नाटक गोरक्षसंहिता में विनायकी को गजमुखी, तोंदयुक्त, तीन आँखों और चार भुजाओं वाली देवी बताया गया है जिनके हाथ में परशु और मोडकों की थाली है । श्रीकुमार की सोलहवीं सदी की मूर्तिभंजक शोध प्रबंध पुस्तक शिल्परत्न में गणेश (गणपति) के स्त्री रूप का वर्णन है जिन्हें शक्ति-गणपति कहा गया गया है जो विंध्य में रहती थीं । इस देवी का सिर हाथी के जैसे था और उनके दो सूंड थे । उनका शरीर युवती का था, रंग सिंदूरी लाल था और दस भुजाएँ थीं । उनकी छोटी तोंद थी, स्तन विस्तारित थे और सुंदर श्रोणियाँ थीं । यह प्रतिमा संभवत: हिन्दू देवी की पूजा करने वाली धारा, शक्तिवाद से संबंधित थी । बहरहाल, दो सूंडों के कारण इस रूप को भी गणेश और उनकी शक्ति का संयोजन माना गया ।
बौद्ध साहित्य जिसे आर्यमंजुश्रीमुलकल्प कहा जाता है, में इस देवी को विनायक की सिद्धि कहा गया है । उनमें गणेश के कई अंतर्निहित अभिलक्षण हैं । गणेश की तरह, वे विघ्नों की दूर करती हैं, उनका सिर भी हाथी के जैसा है और एकदंत है । उन्हें भगवान शिव का एक रूप, भगवान ईशान की बेटी भी कहा गया है ।
रामायणकालीन खरदूषण की नगरी : खरौद
तपोभूमि छत्तीसगढ़ को प्राचीन काल में दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था। रामायण में वर्णित यह दण्डकारण्य प्रदेश अपने सघन वनों, सरल एवं सहज निवासियों, वन्य प्राणियों की आदर्श निवास स्थली, खनिजों एवं सुरम्य प्राकृतिक वातावरण के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ तीर्थों की भी कमी नहीं है। यहाँ विभिन्न सम्प्रदायों के मठ-मंदिर, देवालय इस प्रदेश की विशिष्ट संस्कृति एवं परम्पराओं की पहचान हैं, शैव, वैष्णव, शाक्त, जैन, बौद्ध धर्म समान रुप से फ़ले एवं फ़ूले। प्रयागराज राजिम, रतनपुर, डोंगरगढ़, खल्लारी, दंतेवाड़ा, बारसूर, देवभोग, सिहावा, आरंग, भीमखोज, सिरपुर, भोरमदेव, मल्हार, शिवरीनारायण, ताला, जांजगीर, पाली, खरौद, डीपाडीह, दंतेवाड़ा, भैरमगढ़, कवर्धा, अंबिकापुर, दामाखेड़ा, गिरौदपुरी जैसे साधना के पावन केन्द्र इस धरा की अलौकिकता एवं दिव्यता को प्रदर्शित करते हैं।
ऐसा ही एक प्राचीन तीर्थ स्थल खरौद नगर, सबरी तीर्थ शिवरीनारायण से 3 किमी एवं राजधानी रायपुर से लगभग 120 किमी की दूरी पर स्थित है। कहते है कि भगवन राम ने यहाँ पर खर व दूषण का वध किया था इसलिए इस जगह का नाम खरौद पड़ा। खरौद नगर में प्राचीन कालीन अनेक मंदिरों की उपस्थिति के कारण इसे छत्तीसगढ़ की काशी भी कहा जाता है। यहां के लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना भगवान राम ने खर और दूषण के वध के पश्चात भ्राता लक्ष्मण के कहने पर की थी। इसलिए इसे लक्ष्मणेश्वर मंदिर कहा जाता है।
लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर के निर्माण को 8 वीं सदी का माना गया है, इसके गर्भगृह में एक शिवलिंग है जिसके बारे में मान्यता है की इसकी स्थापना स्वयं लक्ष्मण ने की थी। इस शिवलिंग में एक लाख छिद्र है इसलिए इसे लक्षलिंग कहा जाता है। इन लाख छिद्रों में से एक छिद्र ऐसा है जो पातालगामी है, उसमे जितना भी जल डालो वो सब समा जाता है जबकि एक छिद्र अक्षय कुण्ड है जोकि हमेशा जल से भरा ही रहता है। लक्षलिंग पर चढ़ाया जल, मंदिर के पीछे स्थित कुण्ड में चले जाने की भी मान्यता है, क्योंकि कुण्ड कभी सूखता नहीं। लक्ष्य लिंग को स्वयंभू लिंग भी माना जाता है।
यह मंदिर नगर के प्रमुख देव के रूप में पश्चिम दिशा में पूर्वाभिमुख स्थित है। मंदिर में चारों ओर पत्थर की मजबूत दीवार है। इस दीवार के अंदर 110 फ़ुट लंबा और 48 फ़ुट चौड़ा चबूतरा है जिसके ऊपर 48 फुट ऊँचा और 30 फुट की परिधि में मंदिर निर्मित हैं। मंदिर के अवलोकन से पता चलता है कि पहले इस चबूतरे में बृहदाकार मंदिर के निर्माण की योजना थी, क्योंकि इसके अधोभाग स्पष्टत: मंदिर की आकृति में निर्मित है। चबूतरे के ऊपरी भाग को परिक्रमा कहते हैं। सभा मंडप के सामने के भाग में सत्यनारायण मंडप, नन्दी मंडप और भोगशाला हैं।
मंदिर के मुख्य द्वार में प्रवेश करते ही सभा मंडप है। इसके दक्षिण तथा वाम भाग में एक-एक शिलालेख दीवार में लगा है। यहां लगे शिलालेख में आठवी शताब्दी के इन्द्रबल तथा ईशानदेव नामक शासकों का उल्लेख हुआ है। मंदिर के वाम भाग का शिलालेख संस्कृत भाषा में है। इसमें ४४ श्लोक है। चन्द्रवंशी हैहयवंश में रत्नपुर के राजाओं का जन्म हुआ था। इनके द्वारा अनेक मंदिर, मठ और तालाब आदि निर्मित कराने का उल्लेख इस शिलालेख में है। तदनुसार रत्नदेव तृतीय की राल्हा और पद्मा नाम की दो रानियाँ थीं। राल्हा से सम्प्रद और जीजाक नामक पुत्र हुए। पद्मा से सिंहतुल्य पराक्रमी पुत्र खड्गदेव हुए जो रत्नपुर के राजा भी हुए जिसने लक्ष्मणेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। इससे पता चलता है कि मंदिर आठवीं शताब्दी तक जीर्ण हो चुका था जिसके उद्धार की आवश्यकता पड़ी। इस आधार पर कुछ विद्वान इसको छठी शताब्दी का मानते हैं।
मूल मंदिर के प्रवेश द्वार के उभय पार्श्व में कलाकृति से सुसज्जित दो पाषाण स्तम्भ हैं। इनमें से एक स्तम्भ में रावण द्वारा कैलासोत्तालन तथा अर्द्धनारीश्वर के दृश्य खुदे हैं। इसी प्रकार दूसरे स्तम्भ में राम चरित्र से सम्बंधित दृश्य जैसे राम-सुग्रीव मित्रता, बाली का वध, शिव तांडव और सामान्य जीवन से सम्बंधित एक बालक के साथ स्त्री-पुरूष और दंडधरी पुरुष खुदे हैं। प्रवेश द्वार पर गंगा-यमुना की मूर्ति स्थित है। मूर्तियों में मकर और कच्छप वाहन स्पष्ट दिखाई देते हैं। उनके पार्श्व में दो स्त्री प्रतिमाएँ हैं। इसके नीचे प्रत्येक पार्श्व में द्वारपाल जय और विजय की मूर्ति है। मंदिर के बाहर परिक्रमा में राजा खड्गदेव और उनकी रानी हाथ जोड़े स्थापित हैं। प्रति वर्ष यहाँ महाशिवरात्रि के मेले में शिव की बारात निकाली जाती है तथा लक्ष्मणेश्वर महादेव के इस मंदिर में सावन मास में श्रावणी और महाशिवरात्रि में मेला लगता है।
प्राचीन नगरी कुशावती : कोसीर
रामगमन वन मार्ग के शोधार्थी यह मानते हैं कि दंडकवन में भगवान रामचंद्र ने अपने वनवास काल के 13 वर्ष व्यतीत किए। यह तो तय है कि प्राचीन काल में दंडकवन से ही होकर दक्षिणापथ मार्ग उत्तर से दक्षिण को जोड़ता था और इसी मार्ग का उपयोग तीर्थ यात्री तथा अन्य लोग करते थे। जहाँ मान्यता है कि तुरतुरिया के वाल्मीकि आश्रम में वैदेही सीता ने लव और कुश को जन्म दिया था। वहीं एक जन मान्यता और है कि लव की नगरी लवण एवं कुश की नगरी कोसीर को माना जाता है। रायगढ़ जिले का एक बड़ा ग्राम कोसीर है, यह सारंगढ़ से 16 किमी और राजधानी रायपुर से सरायपाली, सरसींवा होते हुए लगभग 212 किमी की दूरी पर स्थित है। इस ग्राम से थोड़ी-थोड़ी दूरी बलौदाबाजार, रायगढ़ एवं जांजगीर जिलों की सीमाएं भी है, इस तरह इसे तिनसिया पर बसा हुआ ग्राम भी कह सकते हैं।
कोसीर से इंटरनेटीय परिचय करवाने वाले दो बंधू लक्ष्मीनारायण लहरे और नीलकमल वैष्णव हैं। ये दोनों कोसीर जैसे दूरस्थ ग्रामवासी होते हुए भी पत्रकारिता एवं साहित्य के क्षेत्र में जागरुकता के साथ सक्रीय हैं और प्रचार-प्रसार के सभी माध्यमों का प्रतिनिधित्व करते हैं। सभी क्षेत्रों में इनकी सक्रियता दिखाई देती है। पिछले कई वर्षों से कुश की नगरी कोसीर देखने की महती इच्छा मन में थी। आखिर वह दिन आ ही गया जब मैं मार्च के महीने की अंतिम तिथियों में बाईक से कोसीर पहुंच गया। अभनपुर से कोसीर पहुंचने में मुझे लगभग 4 घंटे की लगातार बाईक रायडिंग करनी पड़ी। आखिर 12 बजे मैं नीलकमल वैष्णव जी के घर के सामने था और लक्ष्मीनारायण लहरे जी का घर भी इनके घर के सामने ही है।
दोपहर का भोजन लक्ष्मी नारायण जी के यहाँ करने बाद हम कोसीर भ्रमण पर निकले। यहां कौशलेश्वरी देवी का प्रसिद्ध स्थान है, जिसे स्थानीय भाषा में कुसलाई दाई कहते हैं। नवरात्रि के अवसर पर मंदिर में दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है और लोग अपनी मानता को पूर्ण करने के लिए यहां पर "पूजा" भी देते हैं। हम मंदिर पहुंचे, ऊंचे अधिष्ठान पर कांक्रीट से निर्मित मंदिर के गर्भगृह में महिषसुर मर्दिनी की प्राचीन प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के आस-पास मंदिर के प्रस्तर निर्मित भग्नावशेषों का निरीक्षण करने के पश्चात अनुमान है कि इस स्थान पर कलचुरी काल का 11 वीं 12 वीं शताब्दी में यहाँ प्रस्तर निर्मित मंदिर रहा होगा। जिसके ढह जाने के बाद इसका पुनर्निर्माण किया गया है।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि ग्राम के आस-पास खेत खार एवं तालाबों में भी प्राचीन प्रतिमाओं के अवशेष प्राप्त हो जाते हैं। जिस तरह कोसीर ग्राम टीले पर बसा हुआ है, उससे प्रतीत होता है कि इस टीले के नीचे प्राचीन बसाहट रही होगी। प्राचीन बसाहट पर नई बस्ती बसने के कई उदाहरण प्राप्त होते हैं। कई स्थानों पर प्राचीन बसाहट को छोड़ कर उसके समीप ही नए गांव एवं बस्ती आबाद हो जाती हैं। वर्तमान कौशलेश्वरी मंदिर, प्राचीन अधिष्ठान पर ही निर्मित है, इस अधिष्ठान की ऊंचाई लगभग 10 फ़ुट होगी। इस मंदिर के समीप ही पश्चिम दिशा में ढुकूरिया तालाब तथा दक्षिण दिशा में जल कुंड है, जो इसकी प्राचीनता को सिद्ध करता है।
छत्तीसगढ़ अंचल में प्राचीन काल में मृदा भित्ति दुर्ग बनाने की परम्परा रही है। सुरक्षा के लिए परिखायुक्त दुर्ग बनते रहे हैं और इनकी संख्या आज 48 को भी पार कर गई है। वर्तमान में डमरु उतखनन में बौद्ध स्तूप प्राप्त हुए हैं, इससे इन मृदा भित्ति दुर्गों की प्राचीनता सिद्ध होती है। कोसीर की सीमा में चारों तरफ़ कई तालाब हैं, जिन्हें देखकर प्रतीत होता है कि कभी यहां परिखायुक्त मृदा भित्ति दुर्ग रहा होगा। कालांतर में परिखा को मिट्टी से पाटकर खेत बना दिए गए होगें तथा उसका कुछ भाग बच गया होगा जिसका उपयोग सिंचाई एवं ग्रामवासियों की निस्तारी के लिए प्रयोग किया जाता है। कोसीर ग्राम में 56 एकड़ का बड़ा बंधवा तालाब भी है। जो सिंचाई का बड़ा साधन रहा होगा।
कोसीर में साहित्य रसिकों एवं बुद्धिजीवियों की भी कमी नहीं है, यहाँ के निवासियों में साहित्य के प्रति रुचि एवं संस्कार होने के कारण एक साहित्यकारों की संस्था भी है, जिसके द्वारा मंदिर परिसर में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस गोष्ठी में स्थानीय कवियों द्वारा कविता पाठ किया गया। यह काव्य गोष्ठी लगभग 4 घंटे तक चली, जिसमें वरिष्ठ साहित्यकार तीरथ राम चंद्रा, नीलम प्रसाद आदित्य, सुनील एक्सरे, लक्ष्मीनारायण लहने, नीलकमल वैष्णव के साथ मैने भी कविता पाठ किया। शाम को सारंगढ़ का दौरा किया गया। रात्रि विश्राम कोसिर में करने बाद अगले दिन हम गिरौदपुरी धाम के दर्शन के लिए रवाना हुए। (नोट- सभी चित्र लक्ष्मीनारायण लहरे की वाल से)
बालसमुंद एवं सिद्धेश्वर मंदिर : पलारी छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से बलोदाबाजार रोड पर 70 कि॰मी॰ दूर स्थित पलारी ग्राम में बालसमुंद तालाब के तटबंध पर यह शिवालय स्थित है। इस मंदिर का निर्माण लगभग ७-८वीं शती ईस्वी में हुआ था। ईष्टिका निर्मित यह मंदिर पश्चिमाभिमुखी है। मंदिर की द्वार शाखा पर नदी देवी गंगा एवं यमुना त्रिभंगमुद्रा में प्रदर्शित हुई हैं।
प्रवेश द्वार स्थित सिरदल पर शिव विवाह का दृश्य सुन्दर ढंग से उकेरा गया है एवं द्वार शाखा पर अष्ट दिक्पालों का अंकन है। गर्भगृह में सिध्देश्वर नामक शिवलिंग प्रतिष्ठापित है। इस मंदिर का शिखर भाग कीर्तिमुख, गजमुख एवं व्याल की आकृतियों से अलंकृत है जो चैत्य गवाक्ष के भीतर निर्मित हैं। विद्यमान छत्तीसगढ़ के ईंट निर्मित मंदिरों का यह उत्तम नमूना है।
जनश्रुतियों के अनुसार इस मंदिर एवं तालाब का निर्माण नायकों ने छैमासी रात में किया गया। इस अंचल में घुमंतू नायक जाति होती है जो नमक का व्यापार करती थी। उनका कबीला नमक लेकर दूर दूर तक भ्रमण करता था। कहते हैं कि इस पड़ाव पर नायकों को जल की समस्या हमेशा बनी रहती थी। उन्होने यहां तालाब बनवाने का कार्य शुरु किया। (नायकों द्वारा तालाब निर्माण की कहानी अन्य स्थानों पर भी सुनाई देती हैं, खारुन नदी के उद्गम पेटेचुआ का तालाब भी नायकों ने बनवाया था। इससे प्रतीत होता है कि नायक अपने व्यापार के मार्ग में जलसंसाधन का निर्माण करते थे।)
तालाब का निर्माण होने के बाद इस तालाब में पानी नहीं आया तो किसी बुजूर्ग के कहने से नायकों के प्रमुख ने अपने नवजात शिशु को परात में रख कर तालाब में छोड़ दिया, इसके बाद तालाब में भरपूर पानी आ गया और यह लबालब भर गया। बालक भी सुरक्षित परात सहित उपर आ गया। तब से इस तालाब का नाम बालसमुंद रखा गया। इस तालाब का विस्तार 120 एकड़ में है। जल साफ़ एवं सुथरा है। तालाब का पानी कभी नहीं सूखता।
तालाब के मध्य में एक टापू बना हुआ है, कहते हैं इसका निर्माण तालाब खोदने के दौरान तगाड़ी झाड़ने से झड़ी हुई मिट्टी से हुआ। इस मंदिर का जीर्णोद्धार तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री बृजलाल वर्मा ने 1960-61 के दौरान करवाया तथा गर्भ गृह में शिवलिंग स्थापित करवाया। इस स्थान पर प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा दे दिन मेला भरता है, जिसमें हजारों श्रद्धालू आकर बालसमुंद में स्नान कर पूण्यार्जित करते हैं।
अभनपुर जंक्शन: सवा सौ बरस पुरानी रेल
रायपुर से चलनी वाली छुकछुक रेलगाड़ी (नेरोगेज) वर्तमान में राजिम एवं धमतरी तक का सफ़र तय करती है। देश में अन्य स्थानों पर तो अमान परिवर्तन हो गया परन्तु हमारे यहाँ अभी भी चल रही है। पहले स्टीम इंजन था अब डीजल इंजन चलता है। रायपुर राजधानी बनने के बाद इस ट्रेन के यात्रियों में बेतहाशा वृद्धि हुई। राजधानी में नवनिर्माण होने लगे तो धमतरी एवं राजिम से काम करने के लिए कम खर्च में इसी ट्रेन से रायपुर तक का सफ़र तय करते हैं। यह ट्रेन अपनी शताब्दी पूर्ण कर चुकी है। यह क्षेत्र वन सम्पदा से भरपूर था और उसके दोहन के लिए अंग्रेजों ने रेल लाईन बिछाई।
इस मार्ग पर 1896 में 45.74 मील लंबी रेल लाइन बनाने का काम शुरू हुआ, जो 5 साल बाद 1901 में पूरा कर लिया गया। यह रेल लाइन ब्रिटिश इंजीनियर एएस एलेन की अगुवाई में में बनाई गई। छत्तीसगढ़ में अकाल के दौरान ग्रामीणों को रोजगार देने के नाम पर इस रेल लाईन का निर्माण किया गया। बताते हैं कि धमतरी मार्ग पर नगरी तक रेल पटरियां बिछाई गई और राजिम मार्ग पर गरियाबंद के जंगलों तक। इसके परिचालन के लिए महानदी पर लकड़ी का पुल बनाया गया। तब कहीं जाकर यह ट्रेन गरियाबंद के जंगलों तक पहुंची। इस ट्रेन के माध्यम से वन संपदा का दोहन युद्ध स्तर पर किया गया। पहले इसे ग्रामीण "दू डबिया गाड़ी" कहते थे। शुरुवाती दिनों में इसमें दो डिब्बे लगाकर ही चलाया जाता था। ग्रामीण इसके इंजन की सीटी सुन कर समय का पता लगाते थे। इसमें भाप का ईंजन 1980 तक चला। इसके बाद डीजल के इंजन लगे और सफ़र थोड़ी अधिक गति से होने लगा।
सैकड़ों साल पहले रेल परिचालन किस तरह से होता है अगर यह जानना है तो इस छोटी ट्रेन का सफ़र करना चाहिए। यातायात के उसी साधनों का प्रयोग आज भी किया जाता है जो सैकड़ों साल पहले किया जाता था। ट्रेन का ड्रायवर आज भी गोला बंधा रिंग फ़ेंकता है जिसे लोहे की मशीन में डाल कर दो बड़ी चाबियाँ लगा कर फ़िर फ़ोन किया जाता है तब लाईन क्लियर की जाती है। सड़क मार्ग के गेट आज उन बड़ी चाबियों से खुलते हैं। इस मार्ग पर अभनपुर महत्वपूर्ण जंक्शन है। यहाँ से राजिम एवं धमतरी के लिए रेलमार्ग पृथक हो जाता है। स्टेशन पर आज भी वैसा ही है जैसा सवा सौ साल पहले था, रत्ती भर भी बदलाव नहीं आया है। सिर्फ़ टिकिट देने वाली मशीन की जगह अब कम्पयूटर लग गया है। डीजल इंजन लगने के कारण पानी की टंकियाँ हटा दी गई हैं। पूर्व राष्ट्रपति अब्दूल कलाम जब डी आर डी ओ के हेड थे तब उन्होने अपनी एक गोपनीय यात्रा इस ट्रेन द्वारा रायपुर से धमतरी तक की थी।
अब इस ट्रेन के दिन भी लदने वाले हैं। रायपुर से रेल्वे स्टेशन से हटा कर अब इसका परिचालन तेलीबांधा से किया जा रहा है। नई राजधानी से केन्द्री तक बड़ी रेल लाईन बिछाने का कार्य युद्ध गति से चल रहा है और समाचार मिला है कि केन्द्री से धमतरी तक भी इसका अमान परिवर्तन कर नेरोगेज को ब्राड गेज में तब्दील किया जाएगा। परन्तु छोटी गाड़ी के सफ़र का आनंद ही अलग है। इसे नए रायपुर में लोकल ट्रेन जैसे चलाना चाहिए। जिससे आने वाले पर्यटक सुबह शाम राजधानी भ्रमण का आनंद इस ट्रेन के माध्यम से कर सकें। वैसे इस ट्रेन के बंद होने में साल भर तो लग सकता है तब तक इसकी यात्रा का आनंद उठाया जा सकता है।
रानी माई की रहस्यमय दुनिया: बस्तर अंचल
गोड़ मा पैरी, माथा म लाली वो SS, कान मा झुमका तिकोनी वाली होSS मोर गांवे म हाबे मड़ई, देखे ल आबे वोSS… वाहन में बज रहा छत्तीसगढ़ी गीत बसंत के इस मौसम में गाँव की मड़ई देखने का निमंत्रण दे रहा था।
हम भी गांव की ओर जाने वाली सर्पीली सड़क पर गीत सुनते हुए बढ़े जा रहे थे, मड़ई वाला गाँव था रायपुर राजधानी से एक सौ चालिस किमी दूर कांकेर जिले की चारामा तहसील का हल्बा टिकरापारा।
यह गाँव रानी डोंगरी ग्राम पंचायत का आश्रित ग्राम है, बस हमारी कहानी इस गाँव की ही कहानी है। हमारी गाड़ी जब गाँव में पहुंचती है तो बच्चे गाड़ी के पीछे दौड़ने लगते हैं, ऊंघती दोपहरिया में लोग चौकन्ने हो जाते हैं। एक घर के सामने कुछ आदमी औरतें बीड़ी बनाते दिखाई देते हैं और हमारी गाड़ी यही रुक जाती है।
सरपंच तिलक राम कुंजाम के आने के बाद चर्चा शुरु होती है। इस इस गाँव में लगभग 150 छानी (छतें) हैं, जिनमें बसने वाले सर्वाधिक गोंड़ जनजाति के लोग हैं, उसके बाद अधिक जनसंख्या कलार जाति के लोगों की है। धोबी, लोहार के साथ एक घर साहू जाति का भी है। गाँव में पेयजल का साधन नलकूप हैं और बाकी निस्तारी दो तालाबों से होती हैं।
गांव में दो-तीन मंदिर भी हैं, जिसमें शीतला माता, शिव जी के साथ हनुमान जी भी विराजित हैं। प्रायमरी तक का स्कूल शिक्षा के लिए है, इसके बाद पास के ही हल्बा कस्बे में शिक्षा हेतू जाना पड़ता है।
गैर अपासी गाँव होने के कारण सिंचाई के साधन उपलब्ध नहीं है, इसलिए बरसात पर आधारित धान की खेती करनी पड़ती है, वर्षा पर ही यहाँ का जीवन आधारित है, अन्य कोई रोजगार के साधन यहां उपलब्ध नहीं है।
हम भी गांव की ओर जाने वाली सर्पीली सड़क पर गीत सुनते हुए बढ़े जा रहे थे, मड़ई वाला गाँव था रायपुर राजधानी से एक सौ चालिस किमी दूर कांकेर जिले की चारामा तहसील का हल्बा टिकरापारा।
यह गाँव रानी डोंगरी ग्राम पंचायत का आश्रित ग्राम है, बस हमारी कहानी इस गाँव की ही कहानी है। हमारी गाड़ी जब गाँव में पहुंचती है तो बच्चे गाड़ी के पीछे दौड़ने लगते हैं, ऊंघती दोपहरिया में लोग चौकन्ने हो जाते हैं। एक घर के सामने कुछ आदमी औरतें बीड़ी बनाते दिखाई देते हैं और हमारी गाड़ी यही रुक जाती है।
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| हल्बा टिकरापारा की दुपहरिया |
गांव में दो-तीन मंदिर भी हैं, जिसमें शीतला माता, शिव जी के साथ हनुमान जी भी विराजित हैं। प्रायमरी तक का स्कूल शिक्षा के लिए है, इसके बाद पास के ही हल्बा कस्बे में शिक्षा हेतू जाना पड़ता है।
गैर अपासी गाँव होने के कारण सिंचाई के साधन उपलब्ध नहीं है, इसलिए बरसात पर आधारित धान की खेती करनी पड़ती है, वर्षा पर ही यहाँ का जीवन आधारित है, अन्य कोई रोजगार के साधन यहां उपलब्ध नहीं है।
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| रानी डोंगरी |
ग्राम परम्परा के अनुसार वहाँ पूजा करने के लिए बैगा किरपा राम सोरी नियुक्त है। जब भी देवी की पूजा करनी होती है या उन्हें ग्राम में आमंत्रित करना होता है तो बैगा के माध्यम से ही इस कार्य को सम्पन्न किया जाता है।
मड़ई के दिन सारे गाँव वासी रानी माई होम धूप देकर गाँव आने का निमंत्रण देते हैं, तथा उसके आदेश के बाद मड़ई की डांग लेकर गाँव आया जाता है, देवी मड़ई के कार्य को सफ़ल बनाने के लिए गाँव में पधारती हैं, साथ ही अनुषांगी देवता भी ग्राम में पहुंचते हैं।
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| रानी माई के दरबार का रास्ता |
देवी के स्थान तक पहुंचने के लिए पैड़ियों का निर्माण भी कर दिया गया है। नवरात्रि में यहाँ मेला लगता है और देवी का आशीर्वाद लेने के लिए वृहद संख्या में भक्त जन आते हैं तब यह वनांचल गुलजार हो जाता है माता के सेवा गीतों से।
पैड़ियां जहाँ जाकर समाप्त होती हैं वहीं लगभग 50 फ़ुट ऊंची एकाश्म चट्टान है और इस चट्टान पर एक बड़ी चट्टान छत की तरह प्राकृतिक रुप से रखी हुई है। यहाँ खुले में रानी माई का स्थान है, इनकी कोई प्रतिमा नहीं है, यहाँ सिर्फ़ आभासी रुप में विराजमान होकर बैगा के माध्यम से अपना पर्चा देती हैं।
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| रानी माई के दरबार में बैगा किरपा राम सोरी |
रानी माई के स्थान पर उनकी सेवा के लिए घोड़ा रखा गया है और पोला के दिन लोग यहाँ पर मिट्टी के बैल भी चढाने आते हैं। रानी माई आस-पास के रानी डोंगरी, टिकरापारा, कुरुभाट, कोटेला, टोंकोपाट आदि सात गांव की आराध्या हैं। इन गांव के लोग किसी दैवीय समस्या के निवारण के लिए रानी माई के स्थान पर आते हैं।
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| रानी माई के दरबार में चंदूलाल जैन, उनके भानजे, उनके मित्र, सरपंच तिलकराम कुंजाम एवं श्रीकांत दामले |
इसके बाद इनका सारा परिवार पति देशमात्र,बेटा कुंवर पाट एवं बहु बिजली कैना, जोगड़ा बाबा, गढ़ हिंगलाज देवी, राजाराव देव भी आ गए हैं। इस तरह रानी माई का पूरा कुनबा ही इस स्थान पर जुट गया। बावन कोरी में बाकी देवता महानदी के पास ही रह गए, उनकी पूजा उनके ठहरने के स्थान पर जाकर ही की जाती है।
यहां रानी माई के पति देशमात्र नहीं रहते, उन्हें अन्य स्थान पर रहना पड़ रहा है। बैगा बताते हैं कि इस स्थान पर एक बूढा सिंह भी रहता था जो देवी के स्थान के ईर्द गिर्द ही मंडराता रहता था। जब कोई पूजा करने आता था तब बह गुफ़ा में चला जाता था और पूजा करके लौटने पर फ़िर बाहर निकल आता था। लगभग बारह वर्षों से अब सिंह दिखाई नहीं देता। शायद गुफ़ा में बंद हो गया होगा।
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| रानी माई दरबार के पार्श्व की गुफ़ा से निकलते हुए लेखक |
उनके पति देशमात्र ने खेत जोतने के लिए हल में भैंसा फ़ांद रखा था और खेत जोत रहे थे, उन्हें भूख लगने लगी, इधर रानी माई को भक्तों की फ़रियाद सुनते हुए विलंब हो गया और खाना पहुंचाने में देर हो गई। खाना न लाते देख देशमात्र नें भूख के कारण भैंसे का सींग तोड़ कर आग में भूंज लिया और उसे खाने लगे।
रानी तभी खाना लेकर पहुंची तो उन्हें हड्डी जलने की बदबू आई, देखा कि उनका पति भैंसे का सींग तोड़ कर भूंज कर खा रहा है, उन्हें गुस्सा आ गया और उसे अपने स्थान पर कभी न आने चेतावनी दे दी। इससे देशमात्र भिरावर की पहाड़ी पर बस गए, उन्हें लगभग 12 गांव के लोग अपने अराध्य के रुप में मानते हैं।
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| रानी माई के दरबार का मनोरम दृश्य |
पौराणिक देवताओं की तरह कोई बहुत बड़ा प्रभामंडल नहीं है, वे मानवीय गुणों से परिपूर्ण देवी हैं, उनका स्वभाव इससे ही पता चलता है कि पति द्वारा अनैतिक कार्य करने पर उसे भी उन्होने ने नहीं बख्शा तथा बेटे और बहू को अपने स्थान पर साथ ही रखा है। उनकी बहू बिजली कैना अर्थात बिजली की कन्या भी उनके साथ ही बेटी की तरह रहती है।
सजा का भागी सिर्फ़ उनका पति ही बनता है। देवी के इस मनोरम स्थल पर पहुंच कर मन प्रसन्न हो जाता है। बस बिना किसी योजना के यहां शासकीय निर्माण कार्य इस स्थान की सुंदरता में धब्बा लगा रहे हैं। इस स्थान को प्राकृतिक रुप में रखने की आवश्यकता है तभी इसकी सुंदरता कायम रह सकती है। सांझ ढ़ल रही थी और हम भी विहंगों के साथ अपने नीड़ की ओर लौट रहे थे।
तुरतुरिया: वाल्मीकि आश्रम एवं लवकुश की जन्मभूमि
सुबह का मौसम खुशखवार और गमख्वार था, सोचा कि एक बार फ़िर तुरतुरिया चला जाए। मोहदा रिसोर्ट से तुरतुरिया की दूरी 22 किमी और रायपुर से पटेवा-रवान-रायतुम होते हुए लगभग 118 किमी है। रायतुम के बाद यहाँ तक कच्ची सड़क है। शायद अभयारण्य में पक्की सड़क बनाने की अनुमति नहीं है। बाईक से सपाटे से चलते हुए ठंडी हवाओं के झोंकों के बीचे वन के प्राकृतिक वातावरण का आनंद लेते हुए तुरतुरिया पहुंच गया। सड़क के दांई तरफ़ वाल्मीकि आश्रम बना हुआ और दांई तरफ़ नाले के किनारे मैदान में कुछ दुकाने सजी हुई थी। पता चला कि पुन्नी मेला का कार्यक्रम चल रहा है। आश्रम में कुछ भवन बने हुए हैं, समीप ही निर्मित कुंड में कुछ लोग स्नान कर रहे थे।
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| वाल्मीकि आश्रम तुरतुरिया |
पहाड़ी की तलहटी में यह मनोरम स्थान है, जनश्रुति है कि त्रेतायुग में वाल्मीकि यहां पर वैदेही सीता को लेकर आए थे और यहीं पर लवकुश का जन्म हुआ था। पहाड़ी से एक तुर्रा निकलता है जिसमें पुष्कल जल का प्रवाह बारहो महीने रहता है। तुर्रे से प्रवाहित होता जल "तुर-तुर" की ध्वनि के साथ भूमि पर गिरता है इसलिए इस स्थान का नाम तुरतुरिया रुढ़ हो गया। तुर्रे के मुंह पर अब गोमुख बना दिया गया है तथा इसके दोनो तरफ़ प्रस्तर प्रतिमाएं रखी हुई हैं।
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| तुरतुर की ध्वनि करती जलधारा |
विष्णु की एक स्थानक प्रतिमा है तथा दूसरी प्रतिमा भी पद्मासन में बैठे कीरिटधारी विष्णु की योगमुद्रा में है। इसे देख कर लोगों को बुद्ध का भान होता है। सन 1914 में तत्कालीन अंग्रेज कमिश्नर एच.एम्.लारी ने इस स्थल का महत्त्व समझने पर यहाँ खुदाई करवाई थी, जिसमे अनेक मंदिर और प्राचीन प्रतिमाएं प्राप्त हुयी थी। एच एम लारी के नाम का शिलालेख गोमुख के ऊपर लगा हुआ है। मेला लगा होने के कारण जलस्रोत में स्नान करने वालों का तांता लगा हुआ था। महिलाओं एवं पुरुषों के लिए पृथक-पृथक स्नान कुंड की व्यवस्था बनाई हुई है।
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| जल कुंड |
प्राचीन मंदिर के भग्नावशेष यहां पर चारों तरफ़ बिखरे पड़े हैं। जिन्हें इस आश्रम में एक तरफ़ समेट दिया गया है और नवनिर्मित मंदिरों में स्थापित कर दिया गया है। द्वार पाल, दंडधर, गणेश, शिवलिंग, नंदी, केशीवध इत्यादि की प्रतिमाएं यहाँ रखी हुई हैं। योनीपीठ में स्थापित शिवलिंग किसी मंदिर के प्रस्तर कलश सा दिखाई देता है। जिसके शीर्ष पर नारियल एवं नीचे पद्म बना हुआ है। जब कहीं पर कोई पुरातन प्रतिमा प्राप्त होती है तो लोग स्वयं ही उसकी पहचान के विषय में अनुमान लगा लेते हैं, जैसे अंधो का हाथी। सब स्वविवेक से नामकरण कर लेते हैं।
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| तुरतुरिया |
लव कुश की जन्मभूमि मानने का कारण यहाँ प्राप्त हुई दो प्रतिमाएं है, इन प्रतिमाओं में एक खड्गधारी की कोहनी को अश्व ने अपने मुंह में दबा रखा है और वह अश्व के साथ युद्धरत है, दूसरी प्रतिमा एक व्यक्ति वृषभ के साथ युद्धरत है। इन्ही प्रतिमाओं से अनुमान लगाया गया कि लवकुश ने अश्वमेघ के घोड़े को रोक रखा है और यह स्थान लवकुश की जन्मभूमि कहलाने लगा। इन दोनो प्रतिमाओं में पहली प्रतिमा कृष्ण द्वारा केशीवध की है तथा दूसरी प्रतिमा वत्सासुर वध की है। यह दोनो प्रतिमाएं कृष्ण लीला से संबंध रखती है। अब इन दोनों प्रतिमाओं के कारण इस स्थान की मान्यता लवकुश की जन्मभूमि की पहचान के रुप में स्थापित हो गई। पर आंचलिक लोगों की जो श्रद्धा इस आस्था पर बनी हुई है, वह आगे सदियों तक चलने वाली है।
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| केशी वध एवं वत्सासुर वध की इन प्रतिमाओं को लवकुश माना जाता है। |
इस स्थान पर प्राप्त भग्नावशेषों से मेरे अनुमान के अनुसार यहां आस पास सातवीं आठवी शताब्दी में निर्मित कोई भव्य मंदिर रहा होगा। जिसके भग्नावशेषों को इस स्थान पर एकत्रित कर दिया गया है। मंदिर के प्रस्तर स्तंभों का अलंकरण देख कर लगता है कि इसे उड़ीसा के शिल्पकारों ने निर्मित किया होगा। क्योंकि स्तंभों का अलंकरण उसी शैली में दिखाई देता है। आश्रम के आस-पास बहुत सारी खंडित प्रतिमाएं पड़ी हैं, जिन्हें सहेज कर रखने की आवश्यकता है। कुल मिलाकर यह स्थान रमणीय है, जहाँ जल की व्यवस्था हो ऐसे वनक्षेत्र में कई दिनों तक ठहरा जा सकता है। आश्रम के ऊपर स्थित पहाड़ी पर भालुओं एवं चीतलों का उन्मुक्त विचरण प्राकृतिक वातावरण को भव्यता प्रदान करता है
छत्तीसगढ़: मातागढ़ तुरतुरिया
सूर्यरथ आकाशचारी था और हम वनभ्रमण कर रहे थे, वन में चारों ओर प्रकृति प्रदत्त सुगंध फ़ैली हुई है, यहाँ सुंगध फ़ैलाने के लिए किसी "फ़ॉग" की जरुरत नहीं है। यह अभयारण्य है, जहाँ पशु पक्षियों को शासकीय अभय प्राप्त है। कोई कहीं भी विचरण कर सकता है। परन्तु अभयारण्य में चलभाष तरंगों को उन्मुक्त विचरण की छूट नहीं है। तरंगें नहीं होने के कारण बार-नवापारा, तुरतुरिया, मोहदा रिसोर्ट कहीं पर भी चलभाष कार्य नहीं करता। आश्रम के ऊपर पहाड़ी पर वनविभाग में एक अठपहला भवन बना रखा है, जो वर्तमान में जानवरों का डेरा है। आश्रम के सामने से वहां जाने के लिए पैड़िया बनाई हुई हैं और इस पर "वैदेही विहार" का शिलापट लगाया हुआ है। ऊपर चढ़ने का मतलब है फ़ालतु में टांगे तुड़वाना। हाँ! अगर किसी को चलभाष पर बात करनी हो तो इस स्थान पर तरंगे मिल जाती हैं और बात हो जाती है। इसके लिए वैदेही विहार तक चढ़ना सार्थक है। यहीं से हमने भी घर पर बात करके सूचनाओं का आदान-प्रदान किया।
तुरतुरिया में पूष माह की पूर्णिमा को तीन दिवसीय मड़ई (मेला) का आयोजन होता है। साथ ही रविवार होने के कारण सुबह से ही ग्रामीण स्नान-पूजन करने पहुंचे हुए थे। यहाँ स्थानीय ग्रामीणों ने मेला समिति भी बना रखी है, उसी के माध्यम से मेला का संचालन होता है। दुकानदारों के ठीए सुबह से ही जम गए हैं। ग्रामीण अंचल का मेला मड़ई आपसी भेंट मुलाकात का भी केन्द्र होता है। हमारे यहाँ देवऊठनी के बाद से मेलों की शुरुआत हो जाती है। स्थान का महत्व बढ़ने के साथ नाले को "सुरसरी गंगा" नाम दे दिया गया है। इसे पार करने के बाद सामने की पहाड़ी पर माता का मंदिर है और इस स्थान को मातागढ़ कहते हैं, देवी स्थान तक पहुंचने के लिए पैड़ियों का निर्माण कर दिया गया है।
बलौदाबाजार वाले पत्रकार साथी राजेश मिश्रा जी के साथ हम इस स्थान पर पहुंचे। नाले से थोड़ी दूर पर एक झोपड़ी में यज्ञ कुंड बनाया हुआ है और किनारे पर धम्म प्रवर्तन मुद्रा में मुख विहीन बुद्ध विराजमान हैं और कुछ अन्य प्रतिमाएं भी रखी हुई हैं। बुद्ध प्रतिमा के मुख को किसी ने भग्न कर दिया है। इस घर की दीवार पर दो स्थानक प्रतिमाएं भी रखी हुई हैं। अलंकरण की दृष्टि से शिल्प उत्तम है। परिधानों का भी महीनता से अंकन किया गया है। यहाँ से आगे बढ़ने पर पहाड़ी चढने के बाद मैदान है, जहाँ दाहिने तरफ़ भग्न भवन के स्तंभ दिखाई देते हैं तथा इस स्थान पर बड़ी ईंटे भी पड़ी हुई हैं। प्रस्तर स्तंभों के समक्ष किसी ने काली की पतिमा स्थापित कर दी है। पुराविद अरुणकुमार शर्मा के अनुसार यह भग्नावशेष बुद्ध विहार के हैं, परन्तु मुझे किसी शिवालय के भग्न अवशेष लगते हैं।
मातागढ़ मंदिर के समीप पहले बलि दी जाती थी, परन्तु यह बलि प्रक्रिया अब मंदिर के समीप पूर्ण नहीं की जाती। बकरे को मंदिर तक चावल चबवाने के लिए ले जाया जाता है (मान्यता है कि देवी में चढ़ाए हुए चावलों को अगर बकरा चाब या खा लेता है तो देवी बलि स्वीकार कर लेती है) चावल चबवाने के बाद नाले के आस पास ही काटा जाता है। राजेश मिश्रा बताते हैं कि समिति प्रति बकरा 50 रुपए के हिसाब से कर लेती है। उसके बाद ही यहाँ बकरा काटने दिया जाता है। नाले के समीप सैकड़ों वाहन खड़े थे, जिसमें लोग खाना पकाने की सामग्री लेकर आए थे और वहीं चूल्हा बनाकर कुछ लोग भोजन पकाने में लगे हुए थे। सांझ तक मेला भरपूर होने की संभावना थी।
यहाँ से लौटने के बाद हम पुन: आश्रम स्थल पर आ गए, थोड़ी देर विश्राम और चर्चा होते रही। यहां वैष्णव पंथ के महंत रामकिशोर दास निवास करते हैं। महंत जी भोजन के लिए बार बार आग्रह करते रहे, परन्तु हमारा भोजन तो रिसोर्ट में होना तय था। इसलिए विनम्रता से उनके आग्रह को टालते हुए वापस अपने डेरे की ओर चल पड़ा। इस समय 23 किमी का सफ़र सपाटे के साथ निपट गया, वरना आते हुए मार्ग कुछ लम्बा लगा और समय भी अधिक। नए रास्ते पर संभल कर चलना होता है और जब रास्ता देख समझ लिया जाता है सफ़र जल्दी कट जाता है। फ़ूलचुहकी चिड़ियों ने पुन: आने का निमंत्रण दिया, मै भी उन्हें आश्वासन देकर लौट आया।
छत्तीसगढ़: सबरी का सबरीनारायण
जिसका मन सुंदर हो, उसे सारी दुनिया सुंदर नजर आती है। मन से सभी तरह के भेद मिट जाते है। ईश्वर की बनाई सारी रचना खूबसूरत जान पड़ती है। ऐसे ही भगवान राम हैं, उनके दर्शनों के लिए व्याकुलता से प्रतीक्षा करती सबरी से राम जी की भेंट का वर्णन करते हुए बाबा तुलसीदास कहते हैं - "कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता।।"
राम जी सबरी को "भामिनि" कह संबोधित करते हैं। भामिनि का अर्थ यहां पर "सुंदरी" होता है। राम की बात सुनकर सबरी गदगद हो जाती है और "प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा।। सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे।।"
राम जी के वचन सुनकर सबरी के मुंह से बोल नहीं फ़ूटते, वह मगन हो जाती है। यहीं सबरी से भगवान राम उसके चखे बेर खाते हैं। जहाँ यह मिलन होता है, यह स्थान छत्तीसगढ़ में शिवरीनारायण कहलाता है।
राम जी सबरी को "भामिनि" कह संबोधित करते हैं। भामिनि का अर्थ यहां पर "सुंदरी" होता है। राम की बात सुनकर सबरी गदगद हो जाती है और "प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा।। सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे।।"
राम जी के वचन सुनकर सबरी के मुंह से बोल नहीं फ़ूटते, वह मगन हो जाती है। यहीं सबरी से भगवान राम उसके चखे बेर खाते हैं। जहाँ यह मिलन होता है, यह स्थान छत्तीसगढ़ में शिवरीनारायण कहलाता है।
सुबह नीलकमल वैष्णव जी के निवास पर नाश्ता किए, सूर्यनारायण आसमान में प्रभा बिखेर रहे थे और हम कोसीर से भटगांव होते हुए शिवरीनारायण पहुंच गए।
महानदी के तट पर स्थित प्राचीन शिवरीनारायण नगर जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत जांजगीर से 60 कि. मी., बिलासपुर से 64 कि. मी., कोरबा से 110 कि. मी., रायगढ़ से व्हाया सारंगढ़ 110 कि. मी. और राजधानी रायपुर से व्हाया बलौदाबाजार 120 कि. मी. की दूरी पर स्थित है।
यहां महानदी, शिवनाथ और जोंक नदी का त्रिधारा संगम प्राकृतिक सौंदर्य का अनुपम उदाहरण है। इसे ''प्रयाग'' जैसी मान्यता है। मैकल पर्वत श्रृंखला की तलहटी में अपने अप्रतिम सौंदर्य के कारण और चतुर्भुजी विष्णु मूर्तियों की अधिकता के कारण स्कंद पुराण में इसे ''श्री नारायण क्षेत्र'' और ''श्री पुरूषोत्तम क्षेत्र'' कहा गया है।
प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा से यहां एक बृहद मेला का आयोजन होता है, जो महाशिवरात्रि तक लगता है।
महानदी के तट पर स्थित प्राचीन शिवरीनारायण नगर जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत जांजगीर से 60 कि. मी., बिलासपुर से 64 कि. मी., कोरबा से 110 कि. मी., रायगढ़ से व्हाया सारंगढ़ 110 कि. मी. और राजधानी रायपुर से व्हाया बलौदाबाजार 120 कि. मी. की दूरी पर स्थित है।
यहां महानदी, शिवनाथ और जोंक नदी का त्रिधारा संगम प्राकृतिक सौंदर्य का अनुपम उदाहरण है। इसे ''प्रयाग'' जैसी मान्यता है। मैकल पर्वत श्रृंखला की तलहटी में अपने अप्रतिम सौंदर्य के कारण और चतुर्भुजी विष्णु मूर्तियों की अधिकता के कारण स्कंद पुराण में इसे ''श्री नारायण क्षेत्र'' और ''श्री पुरूषोत्तम क्षेत्र'' कहा गया है।
प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा से यहां एक बृहद मेला का आयोजन होता है, जो महाशिवरात्रि तक लगता है।
मान्यता है कि इस दिन भगवान जगन्नाथ यहां विराजते हैं और पुरी के भगवान जगन्नाथ के मंदिर का पट बंद रहता है। इस दिन उनका दर्शन मोक्षदायी होता है।
तत्कालीन साहित्य में जिस नीलमाधव को पुरी ले जाकर भगवान जगन्नाथ के रूप में स्थापित किया गया है, उसे इसी शबरीनारायण-सिंदूरगिरि क्षेत्र से पुरी ले जाने का उल्लेख 14 वीं शताब्दी के उड़िया कवि सरलादास ने किया है। इसी कारण शिवरीनारायण को छत्तीसगढ़ का जगन्नाथ पुरी कहा जाता है.
शिवरीनारायण दर्शन के बाद राजिम का दर्शन करना आवश्यक माना गया है क्योंकि राजिम में ''साक्षी गोपाल'' विराजमान हैं। इसी कारण यहां के मेले को ''छत्तीसगढ़ का कुंभ'' कहा जाता है जो प्रतिवर्ष लगता है।
तत्कालीन साहित्य में जिस नीलमाधव को पुरी ले जाकर भगवान जगन्नाथ के रूप में स्थापित किया गया है, उसे इसी शबरीनारायण-सिंदूरगिरि क्षेत्र से पुरी ले जाने का उल्लेख 14 वीं शताब्दी के उड़िया कवि सरलादास ने किया है। इसी कारण शिवरीनारायण को छत्तीसगढ़ का जगन्नाथ पुरी कहा जाता है.
शिवरीनारायण दर्शन के बाद राजिम का दर्शन करना आवश्यक माना गया है क्योंकि राजिम में ''साक्षी गोपाल'' विराजमान हैं। इसी कारण यहां के मेले को ''छत्तीसगढ़ का कुंभ'' कहा जाता है जो प्रतिवर्ष लगता है।
शबरी का असली नाम श्रमणा था, वह भील सामुदाय के शबर जाति से सम्बन्ध रखती थीं। उनके पिता भीलों के राजा थे। बताया जाता है कि उनका विवाह एक भील कुमार से तय हुआ था, विवाह से पहले सैकड़ों बकरे-भैंसे बलि के लिए लाये गए जिन्हें देख शबरी को बहुत बुरा लगा कि यह कैसा विवाह जिसके लिए इतने पशुओं की हत्या की जाएगी।
शबरी विवाह के एक दिन पहले घर से भाग गई। घर से भाग वे दंडकारण्य पहुंच गई। दंडकारण्य में ऋषि तपस्या किया करते थे, शबरी उनकी सेवा तो करना चाहती थी पर वह हीन जाति की थी और उनको पता था कि उनकी सेवा कोई भी ऋषि स्वीकार नहीं करेंगे।
इसके लिए उन्होंने एक रास्ता निकाला, वे सुबह-सुबह ऋषियों के उठने से पहले उनके आश्रम से नदी तक का रास्ता साफ़ कर देती थीं, कांटे बीन कर रास्ते में रेत बिछा देती थी। यह सब वे ऐसे करती थीं कि किसी को इसका पता नहीं चलता था।
शबरी विवाह के एक दिन पहले घर से भाग गई। घर से भाग वे दंडकारण्य पहुंच गई। दंडकारण्य में ऋषि तपस्या किया करते थे, शबरी उनकी सेवा तो करना चाहती थी पर वह हीन जाति की थी और उनको पता था कि उनकी सेवा कोई भी ऋषि स्वीकार नहीं करेंगे।
इसके लिए उन्होंने एक रास्ता निकाला, वे सुबह-सुबह ऋषियों के उठने से पहले उनके आश्रम से नदी तक का रास्ता साफ़ कर देती थीं, कांटे बीन कर रास्ते में रेत बिछा देती थी। यह सब वे ऐसे करती थीं कि किसी को इसका पता नहीं चलता था।
एक दिन ऋषि मतंग की नजऱ शबरी पर पड़ी, उनके सेवाभाव से प्रसन्न होकर उन्होंने शबरी को अपने आश्रम में शरण दे दी, इस पर ऋषि का सामाजिक विरोध भी हुआ पर उन्होंने शबरी को अपने आश्रम में ही रखा।
जब मतंग ऋषि की मृत्यु का समय आया तो उन्होंने शबरी से कहा कि वे अपने आश्रम में ही भगवान राम की प्रतीक्षा करें, वे उनसे मिलने जरूर आएंगे। मतंग ऋषि की मौत के बात शबरी का समय भगवान राम की प्रतीक्षा में बीतने लगा, वह अपना आश्रम एकदम साफ़ रखती थीं।
रोज राम के लिए मीठे बेर तोड़कर लाती थी। बेर में कीड़े न हों और वह खट्टा न हो इसके लिए वह एक-एक बेर चखकर तोड़ती थी। ऐसा करते-करते कई साल बीत गए।
जब मतंग ऋषि की मृत्यु का समय आया तो उन्होंने शबरी से कहा कि वे अपने आश्रम में ही भगवान राम की प्रतीक्षा करें, वे उनसे मिलने जरूर आएंगे। मतंग ऋषि की मौत के बात शबरी का समय भगवान राम की प्रतीक्षा में बीतने लगा, वह अपना आश्रम एकदम साफ़ रखती थीं।
रोज राम के लिए मीठे बेर तोड़कर लाती थी। बेर में कीड़े न हों और वह खट्टा न हो इसके लिए वह एक-एक बेर चखकर तोड़ती थी। ऐसा करते-करते कई साल बीत गए।
एक दिन शबरी को पता चला कि दो सुकुमार युवक उन्हें ढूंढ रहे हैं। वे समझ गईं कि उनके प्रभु राम आ गए हैं, तब तक वे बूढ़ी हो चुकी थीं, लाठी टेक के चलती थीं। लेकिन राम के आने की खबर सुनते ही उन्हें अपनी कोई सुध नहीं रही, वे भागती हुई उनके पास पहुंची और उन्हें घर लेकर आई और उनके पाँव धोकर बैठाया।
अपने तोड़े हुए मीठे बेर राम को दिए राम ने बड़े प्रेम से वे बेर खाए और लक्ष्मण को भी खाने को कहा। लक्ष्मण को जूठे बेर खाने में संकोच हो रहा था, राम का मन रखने के लिए उन्होंने बेर उठा तो लिए लेकिन खाए नहीं। कहते हैं कि इसके परिणाम स्वरुप राम-रावण युद्ध में जब शक्ति बाण का प्रयोग किया गया तो वे मूर्छित हो गए थे।
अपने तोड़े हुए मीठे बेर राम को दिए राम ने बड़े प्रेम से वे बेर खाए और लक्ष्मण को भी खाने को कहा। लक्ष्मण को जूठे बेर खाने में संकोच हो रहा था, राम का मन रखने के लिए उन्होंने बेर उठा तो लिए लेकिन खाए नहीं। कहते हैं कि इसके परिणाम स्वरुप राम-रावण युद्ध में जब शक्ति बाण का प्रयोग किया गया तो वे मूर्छित हो गए थे।
यह नगर सतयुग में बैकुंठपुर, त्रेतायुग में रामपुर, द्वापरयुग में विष्णुपुरी और नारायणपुर के नाम से विख्यात था जो आज शिवरीनारायण के नाम से चित्रोत्पला-गंगा (महानदी) के तट पर कलिंग भूमि के निकट दैदीप्यमान है।
यहां सकल मनोरथ पूरा करने वाली मां अन्नपूर्णा, मोक्षदायी भगवान नारायण, लक्ष्मीनारायण, चंद्रचूड़ और महेश्वर महादेव, केशवनारायण, श्रीराम लक्ष्मण जानकी, जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा से युक्त श्री जगदीश मंदिर, राधाकृष्ण, काली और मां गायत्री का भव्य और आकर्षक मंदिर है।
कुल मिलाकर त्रिवेणी संगम पर स्थित यह नगर मंदिरों का नगर है। इसके साथ ही कुछ दूर पर स्थित खरौद में भी प्राचीन मंदिर हैं।
यहां सकल मनोरथ पूरा करने वाली मां अन्नपूर्णा, मोक्षदायी भगवान नारायण, लक्ष्मीनारायण, चंद्रचूड़ और महेश्वर महादेव, केशवनारायण, श्रीराम लक्ष्मण जानकी, जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा से युक्त श्री जगदीश मंदिर, राधाकृष्ण, काली और मां गायत्री का भव्य और आकर्षक मंदिर है।
कुल मिलाकर त्रिवेणी संगम पर स्थित यह नगर मंदिरों का नगर है। इसके साथ ही कुछ दूर पर स्थित खरौद में भी प्राचीन मंदिर हैं।
हम यहाँ मंदिरों के दर्शन करते हुए, महंत जी के मठ में पहुंचे। यह एक अति प्राचीन वैष्णव मठ है जिसका निर्माण स्वामी दयारामदास ने नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों से इस नगर को मुक्त कराने के बाद किया था।
रामानंदी वैष्णव सम्प्रदाय के इस मठ के वे प्रथम महंत थे। तब से आज तक 14 महंत हो चुके हैं, वर्तमान में इस मठ के श्री रामसुन्दरदास जी महंत हैं। नगर के नामकरण के विषय में मान्यता है कि शबरों को वरदान मिला कि उसके नाम के साथ भगवान नारायण का नाम भी जुड़ जायेगा..
पहले ''शबर-नारायण'' फिर शबरी नारायण और आज शिवरीनारायण यह नगर कहलाने लगा। मठ में स्थित मंदिरों की फ़ोटो लेते हुए हम खरदूषण की नगरी खरौद ओर चल पड़े………। ( इस यात्रा में कोसीर निवासी मित्र नीलकमल वैष्णव एवं पत्रकार साहित्कार लेखक लक्ष्मीनारायण लहरे जी संगवारी बने )
रामानंदी वैष्णव सम्प्रदाय के इस मठ के वे प्रथम महंत थे। तब से आज तक 14 महंत हो चुके हैं, वर्तमान में इस मठ के श्री रामसुन्दरदास जी महंत हैं। नगर के नामकरण के विषय में मान्यता है कि शबरों को वरदान मिला कि उसके नाम के साथ भगवान नारायण का नाम भी जुड़ जायेगा..
पहले ''शबर-नारायण'' फिर शबरी नारायण और आज शिवरीनारायण यह नगर कहलाने लगा। मठ में स्थित मंदिरों की फ़ोटो लेते हुए हम खरदूषण की नगरी खरौद ओर चल पड़े………। ( इस यात्रा में कोसीर निवासी मित्र नीलकमल वैष्णव एवं पत्रकार साहित्कार लेखक लक्ष्मीनारायण लहरे जी संगवारी बने )
करिया धुरवा
छत्तीसगढ़ अंचल में किसान धान की फ़सल कटाई, मिंजाई और कोठी में धरने के बाद एक सत्र की किसानी करके फ़ुरसत पा जाता है और दीवाली मनाकर देवउठनी एकादशी से अंचल में मड़ई मेलों का दौर शुरु हो जाता है। ये मड़ई मेले आस्था का प्रतीक हैं और सामाजिक संस्था को सुदृढ़ करने के साथ जनचेतना जागृति करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लगभग सभी छोटे बड़े गाँवों में इनका आयोजन होता है और यह उत्सव शिवरात्रि तक निर्बाध चलते रहता है। जनपदों में आज इस गांव में और कल उस गाँव में, मतलब पृथक पृथक दिन मड़ई का आयोजन होता है, जिसमें ग्राम देवताओं की पूजा पाठ के साथ मनोरंजन के नाच गाने का भी प्रबंध होता है। यह पर्व ग्राम समिति के माध्यम से संचालित होते हैं।
वर्तमान में अंचल में मड़ई मेलों का दौर चल रहा है। बड़े मेले तो विशेष पर्व या माह की पूर्णिमा तिथि को नदी तट पर आयोजित होते हैं, पर मड़ई का आयोजन लगभग प्रत्येक ग्राम में हो जाता है। वर्तमान में मुझे महासमुंद जिले पिथौरा तहसील के करिया धुरवा में मड़ई उत्सव देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ। इस स्थान पर कौड़िया राजा करिया धुरवा एंव धुरवीन का स्थान है और पूष माह की पूर्णिमा को यहां प्रतिवर्ष मड़ई का आयोजन होता है। यहाँ करिया धुरवा एवं धुरवीन का कांक्रीट का मंदिर बने हुए हैं और दोनो पृथक स्थानों पर विराजमान हैं।
करिया धुरवा के मंदिर प्रस्तर निर्मित बहुत सारी खंडित प्रतिमाएं सहेज कर रखी हुई हैं तथा इनमें घुड़सवार करिया धुरवा की प्रतिमा स्थापित है। वहीं सड़क के दूसरी तरफ़ धुरवीन भी घोड़े पर सवार होकर मंदिर में विराजमान है और यहां भी अनेक प्रस्तर निर्मित खंडित प्रतिमाएं रखी हुई हैं। ग्रामीण पुरुष एवं महिलाएं इन स्थानों पर नारियल पुष्प अर्पित कर धूप दीप प्रज्जवलित कर सकाम पूजा पाठ करते हैं तथा मनोकामना पूर्ण होने के लिए देवों से प्रार्थना करते हैं। इस दिन यहाँ भक्तों की काफ़ी संख्या देखी जा सकती है।
करिया धुरवा के विषय में जितने मुंह उतनी कहानियां एवं किंवदन्तियाँ सुनने मिलती हैं। मड़ई भ्रमण करते हुए हमारी भेंट मंदिर समिति के सचिव जी से होती है। उनका कहना है कि करिया धुरवा कौड़िया राजा थे, उनका विवाह सिंगा धुरवा की राजकुमारी से होना तय हुआ। विवाह से पूर्व उभय पक्षों में तय होता है कि विवाह के पश्चात दिन में विदाई हो जानी चाहिए और वर पक्ष दुल्हन लेकर सूर्यास्त के पूर्व अपने ग्राम पहुंच जाए।
करिया धुरवा बारात लेकर सिंगा धुरवा जाते हैं, परन्तु विवादि विदाई प्रक्रिया में विलंब हो जाता है। गाँव पहुंचने के पूर्व ही सूर्यास्त हो जाता है। बारातियों एवं दुल्हन के साथ गांव के बाहर ही रात बिताने के लिए डेरा डाल देते हैं। वर पक्ष एवं वधु पक्ष दोनों का डेरा अलग-अलग लगता है, परन्तु दैवीय आपदा के कारण दोनों पक्ष रात को पत्थर में बदल जाते हैं। यही पत्थर में बदले हुए धुरवा और धुरविन कालांतर में लोक देवता के रुप में पुजित होने लगे और लोक मान्य हो गए।
छत्तीसगढ़ अंचल में मैने कचना धुरवा (गरियाबंद मार्ग पर) , सिंगा धुरवा (सिरपुर के 15 किमी दूरी पर पहाड़ी पर स्थित) और करिया धुरवा (अर्जुनी पिथौरा के समीप) तीनों को देखा है। किवदन्ति में तो इन्हें भाई बताया जाता है। परन्तु और भी कोई लोकगाथा प्रचलन में हो सकती है। करिया धुरवा में रखी हुई प्रस्तर प्रतिमाएं किसी मंदिर के भग्नावशेष भी हो सकते हैं, जो खेतों में यत्र-तत्र बिखरे पड़े थे और बाद में किसी ने एकत्रित कर दिए होगें। कुल मिलाकर बात यह है कि ये प्रस्तर प्रतिमाएं हमें इतिहास से जोड़ती हैं और गौरव प्रदान करती है।
मड़ई मेलों में ग्रामीण उपयोग की वस्तुओं की दुकाने सजती हैं। सभी दुकानदार मड़ई के हाकां के अनुसार एक गांव से दूसरे गांव में भ्रमण करते रहते हैं। मिठाई की दुकाने, फ़ोटो स्टूडियों, टिकली फ़ुंदरी वाले, गोलगप्पे चाट वाले, गिलट के जेवर की दुकानें, गोदना वाले और भी तरह-तरह की सामग्रियों के विक्रेता अपनी दुकान सजाए रहते हैं। इसके साथ गांव के दुकानदार भी कुछ कमाई करने की दृष्टि से अपनी दुकाने लगाते हैं। सब्जियों इत्यादि की दुकाने भी सजती हैं। गोदना गोदवाने का प्रचलन आज भी आदिवासी समाज में बहुलता से दिखाई देता है। हम भी मड़ई भ्रमण कर ग्रामीण परिवेश का आनंद लेने के बाद लौट आए।
राजा तालाब : हल्बा टिकरापारा जिला कांकेर
बात 1956-57 की है, बस्तर नरेश प्रवीण चंद भंजदेव वर्तमान कांकेर जिले के हल्बा गाँव के टिकरापारा पहुंचे, उनके स्वागत में सारा गाँव इकट्ठा हुआ। गाँव की चौपाल में उनके लिए खाट बिछाकर ग्रामीणों ने स्वागत किया, वे आकर खाट पर विराज गए। राजा के आगमन पर गाँव के सभी नागरिक इकट्ठे हो गए। राजा उनसे समस्याओं पर चर्चा करने लगे। यह आजादी के बाद का दौर था, जिसमें देश का लोकतंत्र अपना स्वरुप ग्रहण कर रहा था और विकास के पायदान गढ़े जा रहे थे।
ग्राम के सरपंच तिलकराम कुंजाम उस दिन को याद करते हुए कहते हैं कि " हम लोग उस समय बच्चे थे, लेकिन समझने लायक हो गए थे, राजा सफ़ेद कुर्ता पैजामा पहना हुआ था और उनके लम्बे बाल कंधे पर झूल रहे थे। ग्रामीणो ने कहा कि गाँव में निस्तारी के लिए पानी समस्या है और कोई भी तालाब नहीं है, कुछ कुंओं एवं नाले के पानी पर ही आश्रित हैं। तब राजा ने ग्राम वासियों को 500/- रुपए दिए और तालाब बनाना शुरु करने को कहा। राजा के पैसों एवं ग्रामीणों के श्रमदान से तालाब का निर्माण शुरु हो गया।
तालाब के लिए स्थान का चयन करने के बाद सारा गाँव तालाब निर्माण में जुट गया, खंती लग गई। तालाब निर्माण का काम लगभग 3 बरस तक चला तब कहीं जाकर 3 एकड़ की भूमि में "राजा तालाब" का निर्माण हुआ। निर्माण कार्य के दौरान रुपयों की कमी पड़ने पर गांव के कुछ लोग जगदलपुर जाते और राजा से रुपए लेकर आते। इस तरह कुल बारह हजार रुपयों में तालाब का निर्माण कार्य पूर्ण हुआ। राजा तालाब की पार पर शिवालय का निर्माण भी ग्रामवासियों ने किया।
तालाब बनने के बाद समझ आया कि इसके लिए उपयुक्त स्थान का चयन नहीं किया गया। तालाब के चारों तरफ़ खेत थे, इसमें पानी आने का कोई साधन नहीं था, वर्षा जल पर ही इसका भराव संभव होता था। जैसे ही पूस माघ का समय आता है इस तालाब का पानी रिसकर खेतों में चला जाता है। तालाब की मिट्टी भी रेतीली है जिसके कारण पानी नहीं ठहरता॥ हमने जाकर देखा तो तालाब का पानी अंटकर मटमैला हो गया था तब भी लोग उसमें निस्तारी कर रहे थे।
चंदू लाल जैन कहते हैं कि इस तालाब के निर्मान के बाद ग्रामवासी एक मास्टर में खुद की भूमि में तालाब बनवाया, इसे "मास्टर तालाब" के नाम से जाना जाता है। मास्टर तालाब में पानी ठहरता है, निजी तालाब होने के बावजूद भी मास्टर जी ने कभी ग्राम वासियों को तालाब का पानी उपयोग करने के लिए मना नहीं किया। तालाब में पानी कम होने पर उसे नलकूप जल से उसे भर दिया जाता है, ग्राम में पानी के व्यवस्था के लिए कई बोरिंग भी हैं, जिससे निर्वहन हो जाता है।
आजादी के बाद भी बस्तर राजा द्वारा निजी धन से तालाब खुदवाने की जानकारी मुझे यहाँ प्राप्त हुई, बस्तर राजा प्रवीर चंद भंजदेव प्रजावत्सल थे, प्रजा के सुख दुख में सम्मिलित रहते और उसके दुखों एवं समस्याओं का निवारण करने का प्रयास स्वयं करते थे, इसलिए आज भी उन्हें बस्तर अंचल में भगवान की तरह पूजा जाता है। बस्तर के गाँव गाँव में उनकी स्मृतियाँ बगरी हुई हैं और 1966 के बस्तर महल कांड की यादें भी ग्रामीणों की स्मृति में अभी तक ताजा हैं।
बारसूर (बस्तर) की विनायकी प्रतिमा
बाणासुर की नगरी बारसुर (बस्तर छत्तीसगढ़) के संग्रहालय में गणेश की कई प्रतिमाएं रखी हुई हैं, इनकी फ़ोटो लेते वक्त मुझे स्त्री रुप में गणेश जी की प्रतिमा दिखाई दी। यहाँ गणेश की लगभग 20-25 प्रतिमाएँ होगीं तथा सबसे बड़ी गणेश प्रतिमा भी यहीं पाई जाती है। स्त्री गणेश प्रतिमा को देख कर जिज्ञासा हुई तो थोड़ी खोजबीन की गई। हम जानते हैं कि सनातन धर्म में भगवती ही मूल आदि शक्ति के नाम से विख्यात हैं। अलग अलग शक्तियों को स्त्री रूप में पूजा जाता है जैसे विद्या की देवी मां सरस्वती, धन की देवी महालक्ष्मी और समस्त शक्तियों की स्वामी देवी दुर्गा। महादेव को अर्धनारीश्वररूप में पूजा जाता है, तो श्री हरि ने भी जग की भलाई के लिए मोहिनी रूप धारण किया था।
भगवान गणेश के अनेकों नामों में से उनका एक नाम विनायकी भी है अर्थात गणेश-लक्षणों युक्त स्त्री। धर्म शास्त्रों में गणपति को स्त्री रूप में पूजते हुए उन्हें विनायकी, गजानना, विद्येश्वरी और गणेशिनी भी कहा गया है। ये सभी नाम गणेश जी के संबंधित नामों के स्त्रीलिंग रूप हैं। उनकी हाथी जैसी विशेषताओं के कारण, उन्हें आम तौर पर बुद्धि की हाथी जैसी सिर वाले भगवान- गणेश से संबंधित माना गया है, उनका कोई स्थिर नाम नहीं है और उन्हें विभिन्न नामों से जाना जाता है – जैसे गणेशी, विनायकी, गजानना, विघ्नेश्वरी और गणेशणी, ये सभी नाम गणेश के संबंधित नामों के स्त्रीलिंग रूप हैं । इन अभिचिह्नों से उन्हें शक्ति का रूप माना गया है यानी – गणेश का स्त्री रूप या उनसे मिलता-जुलता रूप ।
विनायकी को कभी-कभी चौसठ योगिनियों में से एक भी माना जाता है । बहरहाल, विद्वान कृष्णन का विचार है कि हाथी के सिर वाली देवी विनायकी, गणेश की ब्राह्मणी शक्ति है और तांत्रिक योगिनी तीन विशिष्ट देवियाँ हैं । एक स्वतंत्र देवी के रूप में, हाथीमुख देवी को जैन और बौद्ध परंपराओं में भी देखा जा सकता है । बौद्ध ग्रंथों में उन्हें गणपतिह्रदया कहा गया है । सबसे पहले ज्ञात हाथीमुख देवी की प्रतिमा रैढ़, राजस्थान में पाई गई । यह एक विकृत टैराकोटा फलक था जो पहली सदी बीसीई से लेकर पहली सदी सीई से संबंधित है । इस हाथीमुखी देवी की सूंड दाईं ओर मुड़ी है और उनके दो हाथ हैं । चूँकि उनके हाथों में प्रतीक और अन्य विशेषताएँ विकृत रूप में हैं, उन्हें देवी के रूप में अभिचिह्नित करना संभव नहीं है ।
हाथीमुखी देवी की अन्य मूर्तियाँ दसवीं सदी के बाद से पाई गईं हैं । विनायकी की एक सबसे प्रसिद्ध मूर्ति चौसठ योगिनी मंदिर, भेड़ाघाट, मध्य प्रदेश में इकतालिसवीं योगिनी के रूप में है । यहाँ इस देवी को श्री-ऐंगिनी कहा जाता है । यहाँ इस देवी के झुके हुए बाएँ पैर को एक हाथीमुखी पुरुष, संभवत: श्री गणेश ने सहारा दिया हुआ है । विनायकी की एक दुर्लभ धातु मूर्ति चित्रपूर मठ , शिराली में मिली है । वे गणेश की तरह नहीं, बल्कि इकहरी हैं । उन्होंने अपनी छाती पर यग्नोपवीत और गले में दो आभूषण पहना है । उनके हाथों में अभया और वरदा की मुद्राएँ बनी हैं । उनके दो कंधों पर तलवार और फंदा बना हुआ है । उनकी सूंड बाईं ओर मुड़ी हुई है । यह प्रतिमा संभवत: उत्तरी-पश्चिमी भारत (गुजरात / राजस्थान) से 10वीं सदी की लगती है और तांत्रिक गणपत्य धारा (जो गणेश को सर्वोच्च भगवान मानते हैं) या वामाचार देवी की पूजा करने वाले शाक्त धारा से संबंधित लगती है ।
बिहार की पाला विनायकी भी तोंदयुक्त नहीं हैं । यह चार हाथों वाली देवी गदा, घटा, परशु और संभवत: मूली लिए हुए है । प्रतिहारा चित्र में तोंदयुक्त विनायकी को दर्शाया गया है जिसमें उनके चार हाथों में गदा-परशु, कमल, एक पहचान-रहित वस्तु और मोदकों की थाली है जिन्हें उनका सूंड उठा रहा है । दोनों चित्रों में, सूंड दाईं ओर मुड़ा हुआ है । क्षतिग्रस्त चार हाथों या दो हाथों की विनायकी की प्रतिमाएँ रानीपूर झारियल (ओड़ीसा), गुजरात और राजस्थान में भी पाईं गई हैं । सतना में प्राप्त एक दूसरी प्रतिमा में विनायकी पाँच पशुरूपी देवियों में एक हैं । बीच में गौमुखी योगिनी, वृषभा अपने हाथों में बाल गणेश लिए हुए है । विनायकी जिनकी प्रतिमा छोटी है, तोंद लिए हुए है और गणेश की तरह हाथ में अंकुश लिए हुए है । श्री बालसुब्रमण्या स्वामी मंदिर, चेरियनाड, अलापुझा, केरल में भी विनायकी की प्रतिमा मिलती है।
गणेश जी के जन्म से संबंधित एक कहानी में, हाथीमुखी असुर मालिनी, पार्वती जो गणेश की माँ हैं, के स्नान का पानी पीने के बाद गणेश को जन्म देती है । स्कंद पुराण में, धन-संपत्ति की देवी लक्ष्मी को शाप दिया जाता है कि उनका सिर हाथी के जैसे हो जाए, जिससे वह प्रायश्चित करते हुए भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न कर छुटकारा पाती हैं । इन्हें विनायकी नहीं कहा गया है और माँ (मालिनी) या उसके समरूप (कुछ प्रतिमाओं में लक्ष्मी) के रूप में गणेश से बहुत कम संबद्ध किया गया । हरिवंश, वायु पुराण और स्कंद पुराण में भी हाथी मुखी मात्रिका, ग्रह और गणों का वर्णन किया गया है जिनके गजानन, गजमुखी और गजस्य जैसे नाम हैं । इसके बावजूद, कृशन ने इन मात्रिकाओं को ज्येष्ठा, दुर्भाग्य की देवी जिन्हें हाथीमुखी बताया गया है, से जोड़ा है ।
मत्स्य पुराण में वे एक मात्रिका हैं जिन्हें गणेश जी के पिता भगवान शिव ने राक्षसी अंधका को पराजित करने के लिए सृजित किया था । इस प्रसंग में, उन्हें गणेशजी के बजाय, शिव की शक्ति के रूप में देखा जा सकता है । केवल उनका नाम "विनायकी" जिसका अर्थ "विनायक/गणेश से संबंधित" है, उनसे संबंधित होने का संकेत करता है । लिंग पुराण में भी, शक्तियों की सूची में उनका नाम है । अग्नि पुराण पहला पुराण है जिसमें गणेश की शक्तियों को सूचीबद्ध किया गया है, तथापि, विनायकी उनमें नहीं है, न ही उनमें से कोई गजमुखी है, लेकिन, इसी पुराण में चौसठ योगिनियों की सूची में विनायकी अवश्य हैं ।
बहरहाल, उप-पुराण देवी पुराण में गणेश की शक्ति के रूप में गणनायिका या विनायकी का स्पष्ट उल्लेख मिलता है जिसमें उनके हाथीनुमा सिर और गणेश की तरह विघ्नों को दूर करने की क्षमता बताई गई है और उन्हें नौवीं मात्रिका के रूप में शामिल किया गया है । हांलाकि मूर्तियों और साहित्य में मात्रिकाओं की संख्या सात दर्शाई गई है, फिर भी पूर्वी भारत में नौ मात्रिकाएँ अधिक लोकप्रिय हैं । शास्त्रीय सात मात्रिकाओं के अलावा, आठवीं और नौंवी मात्रिका के रूप में क्रमश: महालक्ष्मी या योगेश्वरी और गणेशणी या गणेशा को शामिल किया गया है ।
मध्यकालीन नाटक गोरक्षसंहिता में विनायकी को गजमुखी, तोंदयुक्त, तीन आँखों और चार भुजाओं वाली देवी बताया गया है जिनके हाथ में परशु और मोडकों की थाली है । श्रीकुमार की सोलहवीं सदी की मूर्तिभंजक शोध प्रबंध पुस्तक शिल्परत्न में गणेश (गणपति) के स्त्री रूप का वर्णन है जिन्हें शक्ति-गणपति कहा गया गया है जो विंध्य में रहती थीं । इस देवी का सिर हाथी के जैसे था और उनके दो सूंड थे । उनका शरीर युवती का था, रंग सिंदूरी लाल था और दस भुजाएँ थीं । उनकी छोटी तोंद थी, स्तन विस्तारित थे और सुंदर श्रोणियाँ थीं । यह प्रतिमा संभवत: हिन्दू देवी की पूजा करने वाली धारा, शक्तिवाद से संबंधित थी । बहरहाल, दो सूंडों के कारण इस रूप को भी गणेश और उनकी शक्ति का संयोजन माना गया ।
बौद्ध साहित्य जिसे आर्यमंजुश्रीमुलकल्प कहा जाता है, में इस देवी को विनायक की सिद्धि कहा गया है । उनमें गणेश के कई अंतर्निहित अभिलक्षण हैं । गणेश की तरह, वे विघ्नों की दूर करती हैं, उनका सिर भी हाथी के जैसा है और एकदंत है । उन्हें भगवान शिव का एक रूप, भगवान ईशान की बेटी भी कहा गया है ।
रामायणकालीन खरदूषण की नगरी : खरौद
तपोभूमि छत्तीसगढ़ को प्राचीन काल में दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था। रामायण में वर्णित यह दण्डकारण्य प्रदेश अपने सघन वनों, सरल एवं सहज निवासियों, वन्य प्राणियों की आदर्श निवास स्थली, खनिजों एवं सुरम्य प्राकृतिक वातावरण के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ तीर्थों की भी कमी नहीं है। यहाँ विभिन्न सम्प्रदायों के मठ-मंदिर, देवालय इस प्रदेश की विशिष्ट संस्कृति एवं परम्पराओं की पहचान हैं, शैव, वैष्णव, शाक्त, जैन, बौद्ध धर्म समान रुप से फ़ले एवं फ़ूले। प्रयागराज राजिम, रतनपुर, डोंगरगढ़, खल्लारी, दंतेवाड़ा, बारसूर, देवभोग, सिहावा, आरंग, भीमखोज, सिरपुर, भोरमदेव, मल्हार, शिवरीनारायण, ताला, जांजगीर, पाली, खरौद, डीपाडीह, दंतेवाड़ा, भैरमगढ़, कवर्धा, अंबिकापुर, दामाखेड़ा, गिरौदपुरी जैसे साधना के पावन केन्द्र इस धरा की अलौकिकता एवं दिव्यता को प्रदर्शित करते हैं।
ऐसा ही एक प्राचीन तीर्थ स्थल खरौद नगर, सबरी तीर्थ शिवरीनारायण से 3 किमी एवं राजधानी रायपुर से लगभग 120 किमी की दूरी पर स्थित है। कहते है कि भगवन राम ने यहाँ पर खर व दूषण का वध किया था इसलिए इस जगह का नाम खरौद पड़ा। खरौद नगर में प्राचीन कालीन अनेक मंदिरों की उपस्थिति के कारण इसे छत्तीसगढ़ की काशी भी कहा जाता है। यहां के लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना भगवान राम ने खर और दूषण के वध के पश्चात भ्राता लक्ष्मण के कहने पर की थी। इसलिए इसे लक्ष्मणेश्वर मंदिर कहा जाता है।
लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर के निर्माण को 8 वीं सदी का माना गया है, इसके गर्भगृह में एक शिवलिंग है जिसके बारे में मान्यता है की इसकी स्थापना स्वयं लक्ष्मण ने की थी। इस शिवलिंग में एक लाख छिद्र है इसलिए इसे लक्षलिंग कहा जाता है। इन लाख छिद्रों में से एक छिद्र ऐसा है जो पातालगामी है, उसमे जितना भी जल डालो वो सब समा जाता है जबकि एक छिद्र अक्षय कुण्ड है जोकि हमेशा जल से भरा ही रहता है। लक्षलिंग पर चढ़ाया जल, मंदिर के पीछे स्थित कुण्ड में चले जाने की भी मान्यता है, क्योंकि कुण्ड कभी सूखता नहीं। लक्ष्य लिंग को स्वयंभू लिंग भी माना जाता है।
यह मंदिर नगर के प्रमुख देव के रूप में पश्चिम दिशा में पूर्वाभिमुख स्थित है। मंदिर में चारों ओर पत्थर की मजबूत दीवार है। इस दीवार के अंदर 110 फ़ुट लंबा और 48 फ़ुट चौड़ा चबूतरा है जिसके ऊपर 48 फुट ऊँचा और 30 फुट की परिधि में मंदिर निर्मित हैं। मंदिर के अवलोकन से पता चलता है कि पहले इस चबूतरे में बृहदाकार मंदिर के निर्माण की योजना थी, क्योंकि इसके अधोभाग स्पष्टत: मंदिर की आकृति में निर्मित है। चबूतरे के ऊपरी भाग को परिक्रमा कहते हैं। सभा मंडप के सामने के भाग में सत्यनारायण मंडप, नन्दी मंडप और भोगशाला हैं।
मंदिर के मुख्य द्वार में प्रवेश करते ही सभा मंडप है। इसके दक्षिण तथा वाम भाग में एक-एक शिलालेख दीवार में लगा है। यहां लगे शिलालेख में आठवी शताब्दी के इन्द्रबल तथा ईशानदेव नामक शासकों का उल्लेख हुआ है। मंदिर के वाम भाग का शिलालेख संस्कृत भाषा में है। इसमें ४४ श्लोक है। चन्द्रवंशी हैहयवंश में रत्नपुर के राजाओं का जन्म हुआ था। इनके द्वारा अनेक मंदिर, मठ और तालाब आदि निर्मित कराने का उल्लेख इस शिलालेख में है। तदनुसार रत्नदेव तृतीय की राल्हा और पद्मा नाम की दो रानियाँ थीं। राल्हा से सम्प्रद और जीजाक नामक पुत्र हुए। पद्मा से सिंहतुल्य पराक्रमी पुत्र खड्गदेव हुए जो रत्नपुर के राजा भी हुए जिसने लक्ष्मणेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। इससे पता चलता है कि मंदिर आठवीं शताब्दी तक जीर्ण हो चुका था जिसके उद्धार की आवश्यकता पड़ी। इस आधार पर कुछ विद्वान इसको छठी शताब्दी का मानते हैं।
मूल मंदिर के प्रवेश द्वार के उभय पार्श्व में कलाकृति से सुसज्जित दो पाषाण स्तम्भ हैं। इनमें से एक स्तम्भ में रावण द्वारा कैलासोत्तालन तथा अर्द्धनारीश्वर के दृश्य खुदे हैं। इसी प्रकार दूसरे स्तम्भ में राम चरित्र से सम्बंधित दृश्य जैसे राम-सुग्रीव मित्रता, बाली का वध, शिव तांडव और सामान्य जीवन से सम्बंधित एक बालक के साथ स्त्री-पुरूष और दंडधरी पुरुष खुदे हैं। प्रवेश द्वार पर गंगा-यमुना की मूर्ति स्थित है। मूर्तियों में मकर और कच्छप वाहन स्पष्ट दिखाई देते हैं। उनके पार्श्व में दो स्त्री प्रतिमाएँ हैं। इसके नीचे प्रत्येक पार्श्व में द्वारपाल जय और विजय की मूर्ति है। मंदिर के बाहर परिक्रमा में राजा खड्गदेव और उनकी रानी हाथ जोड़े स्थापित हैं। प्रति वर्ष यहाँ महाशिवरात्रि के मेले में शिव की बारात निकाली जाती है तथा लक्ष्मणेश्वर महादेव के इस मंदिर में सावन मास में श्रावणी और महाशिवरात्रि में मेला लगता है।
प्राचीन नगरी कुशावती : कोसीर
रामगमन वन मार्ग के शोधार्थी यह मानते हैं कि दंडकवन में भगवान रामचंद्र ने अपने वनवास काल के 13 वर्ष व्यतीत किए। यह तो तय है कि प्राचीन काल में दंडकवन से ही होकर दक्षिणापथ मार्ग उत्तर से दक्षिण को जोड़ता था और इसी मार्ग का उपयोग तीर्थ यात्री तथा अन्य लोग करते थे। जहाँ मान्यता है कि तुरतुरिया के वाल्मीकि आश्रम में वैदेही सीता ने लव और कुश को जन्म दिया था। वहीं एक जन मान्यता और है कि लव की नगरी लवण एवं कुश की नगरी कोसीर को माना जाता है। रायगढ़ जिले का एक बड़ा ग्राम कोसीर है, यह सारंगढ़ से 16 किमी और राजधानी रायपुर से सरायपाली, सरसींवा होते हुए लगभग 212 किमी की दूरी पर स्थित है। इस ग्राम से थोड़ी-थोड़ी दूरी बलौदाबाजार, रायगढ़ एवं जांजगीर जिलों की सीमाएं भी है, इस तरह इसे तिनसिया पर बसा हुआ ग्राम भी कह सकते हैं।
कोसीर से इंटरनेटीय परिचय करवाने वाले दो बंधू लक्ष्मीनारायण लहरे और नीलकमल वैष्णव हैं। ये दोनों कोसीर जैसे दूरस्थ ग्रामवासी होते हुए भी पत्रकारिता एवं साहित्य के क्षेत्र में जागरुकता के साथ सक्रीय हैं और प्रचार-प्रसार के सभी माध्यमों का प्रतिनिधित्व करते हैं। सभी क्षेत्रों में इनकी सक्रियता दिखाई देती है। पिछले कई वर्षों से कुश की नगरी कोसीर देखने की महती इच्छा मन में थी। आखिर वह दिन आ ही गया जब मैं मार्च के महीने की अंतिम तिथियों में बाईक से कोसीर पहुंच गया। अभनपुर से कोसीर पहुंचने में मुझे लगभग 4 घंटे की लगातार बाईक रायडिंग करनी पड़ी। आखिर 12 बजे मैं नीलकमल वैष्णव जी के घर के सामने था और लक्ष्मीनारायण लहरे जी का घर भी इनके घर के सामने ही है।
दोपहर का भोजन लक्ष्मी नारायण जी के यहाँ करने बाद हम कोसीर भ्रमण पर निकले। यहां कौशलेश्वरी देवी का प्रसिद्ध स्थान है, जिसे स्थानीय भाषा में कुसलाई दाई कहते हैं। नवरात्रि के अवसर पर मंदिर में दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है और लोग अपनी मानता को पूर्ण करने के लिए यहां पर "पूजा" भी देते हैं। हम मंदिर पहुंचे, ऊंचे अधिष्ठान पर कांक्रीट से निर्मित मंदिर के गर्भगृह में महिषसुर मर्दिनी की प्राचीन प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के आस-पास मंदिर के प्रस्तर निर्मित भग्नावशेषों का निरीक्षण करने के पश्चात अनुमान है कि इस स्थान पर कलचुरी काल का 11 वीं 12 वीं शताब्दी में यहाँ प्रस्तर निर्मित मंदिर रहा होगा। जिसके ढह जाने के बाद इसका पुनर्निर्माण किया गया है।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि ग्राम के आस-पास खेत खार एवं तालाबों में भी प्राचीन प्रतिमाओं के अवशेष प्राप्त हो जाते हैं। जिस तरह कोसीर ग्राम टीले पर बसा हुआ है, उससे प्रतीत होता है कि इस टीले के नीचे प्राचीन बसाहट रही होगी। प्राचीन बसाहट पर नई बस्ती बसने के कई उदाहरण प्राप्त होते हैं। कई स्थानों पर प्राचीन बसाहट को छोड़ कर उसके समीप ही नए गांव एवं बस्ती आबाद हो जाती हैं। वर्तमान कौशलेश्वरी मंदिर, प्राचीन अधिष्ठान पर ही निर्मित है, इस अधिष्ठान की ऊंचाई लगभग 10 फ़ुट होगी। इस मंदिर के समीप ही पश्चिम दिशा में ढुकूरिया तालाब तथा दक्षिण दिशा में जल कुंड है, जो इसकी प्राचीनता को सिद्ध करता है।
छत्तीसगढ़ अंचल में प्राचीन काल में मृदा भित्ति दुर्ग बनाने की परम्परा रही है। सुरक्षा के लिए परिखायुक्त दुर्ग बनते रहे हैं और इनकी संख्या आज 48 को भी पार कर गई है। वर्तमान में डमरु उतखनन में बौद्ध स्तूप प्राप्त हुए हैं, इससे इन मृदा भित्ति दुर्गों की प्राचीनता सिद्ध होती है। कोसीर की सीमा में चारों तरफ़ कई तालाब हैं, जिन्हें देखकर प्रतीत होता है कि कभी यहां परिखायुक्त मृदा भित्ति दुर्ग रहा होगा। कालांतर में परिखा को मिट्टी से पाटकर खेत बना दिए गए होगें तथा उसका कुछ भाग बच गया होगा जिसका उपयोग सिंचाई एवं ग्रामवासियों की निस्तारी के लिए प्रयोग किया जाता है। कोसीर ग्राम में 56 एकड़ का बड़ा बंधवा तालाब भी है। जो सिंचाई का बड़ा साधन रहा होगा।
कोसीर में साहित्य रसिकों एवं बुद्धिजीवियों की भी कमी नहीं है, यहाँ के निवासियों में साहित्य के प्रति रुचि एवं संस्कार होने के कारण एक साहित्यकारों की संस्था भी है, जिसके द्वारा मंदिर परिसर में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस गोष्ठी में स्थानीय कवियों द्वारा कविता पाठ किया गया। यह काव्य गोष्ठी लगभग 4 घंटे तक चली, जिसमें वरिष्ठ साहित्यकार तीरथ राम चंद्रा, नीलम प्रसाद आदित्य, सुनील एक्सरे, लक्ष्मीनारायण लहने, नीलकमल वैष्णव के साथ मैने भी कविता पाठ किया। शाम को सारंगढ़ का दौरा किया गया। रात्रि विश्राम कोसिर में करने बाद अगले दिन हम गिरौदपुरी धाम के दर्शन के लिए रवाना हुए। (नोट- सभी चित्र लक्ष्मीनारायण लहरे की वाल से)
भाजी तेरे कितने रुप : छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ के भोजन में "भाजी" (पत्ते की सब्जी) का स्थान महत्वपूर्ण है। जितने प्रकार की भाजी का प्रयोग भोजन में छत्तीसगढ़वासी करते है, संभवत: भारत के अन्य किसी प्रदेश में नहीं होता होगा। घर के पीछे छोटी सी बखरी "बाड़ी" में मौसम के अनुसार भाजियों का उत्पादन हो जाता है। जब कोई साग न हो तो बाड़ी का एक चक्कर लगाने के बाद भोजन के लिए साग उपलब्ध हो जाता है। जिसने भाजी का स्वाद ले लिया हो, वह जीवन भर नहीं भूल सकता। कभी-कभी सोचता हूँ कि छत्तीसगढ की भाजियों का दस्तावेजीकरण होना चाहिए क्योंकि वर्षा ॠतु में स्वत: उगने वाली बहुत सारी भाजियाँ अब लुप्त होते जा रही हैं, जिन्हें बचपन में देखा और खाया था, वो अब दिखाई नहीं देती।
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| अमारी भाजी का फूल |
छत्तीसगढ़ में बोहार भाजी (लसोड़े के वृक्ष के पत्ते) मुनगा भाजी (सहजन के पत्ते) आदि वृक्ष के पत्तों की भाजी, पोई भाजी, कुम्हड़ा भाजी, कांदा भाजी आदि बेल (नार,लता) के पत्तों की भाजी, लाल भाजी, चौलाई, पालक, भथुआ, चेच भाजी,सरसों, पटवा भाजी, चना भाजी, मेथी भाजी, तिवरा भाजी, जड़ी (खेड़ा - इसमें पौधे का सर्वांग भाजी में उपयोग किया जाता है) भाजी, अमारी भाजी, कुसुम भाजी, मुरई (मूली) भाजी, चरोटा भाजी, प्याज भाजी इत्यादि पौधों के पत्तों की भाजी तथा तिनपनिया, चुनचुनिया, करमत्ता इत्यादि भाजी जल में उत्पन्न होती हैं। यहां पर कुछ ही भाजियों के नाम दिए गए हैं। इसके अतिरिक्त फ़ूलों से भी भाजी बनाई जाती है। ॠतु अनुसार भाजियों का सेवन किया जाता है, किसी-किसी भाजी को पकाने में मही (छाछ) या खट्टे की मुख्य भूमिका होती है। इसे दाल के साथ भी पकाया जाता है।
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| मूली भाजी |
मैदानी क्षेत्र के अलावा वन क्षेत्र की भाजियों के कई प्रकार पाए जाते हैं। गर्मी के दिनों में पत्तों को सुखाकर इनका प्रयोग बरसात के दिनों में भी किया जाता है।बस्तर से लेकर सरगुजा अंचल तक दैनिक जीवन में उपयोग में आने वाली भाजियों का दस्तावेजीकरण किया जाए तो इनकी संख्या हजार तक तो पहुंच सकती है। इनमें औषधीय तत्वों की प्रचुरता रहती है। इनका औषधिय महत्व भी बहुत अधिक है, ॠतुओं के अनुसार भाजियों का सेवन स्वास्थवर्धक होता है तथा मानव शरीर के स्वस्थ रहने योग्य आवश्यक, प्रोटीन, विटामिन, खनिज, लवण की पूर्ती इनके द्वारा सहज ही हो जाती है। इसके अतिरिक्त वृक्ष या पौधे से प्राप्त होने वाले फ़ल-फ़ूल-कंद से बनने वाले साग भी है।
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| केऊ कन्द |
मूली का मौसम होने के कारण वर्तमान में घर-घर में मूली भाजी पकती है। गांव या मोहल्ले में किसी के घर मूली की भाजी पक रही होती है दूर से ही पता चल जाता है। गांव-गांव परिव्राजक की तरह घूम कर बुजूर्गों से भाजियों के विषय में चर्चा करते हुए, स्वाद लेकर, रेसिपी जमा करते हुए इनका दस्तावेजीकरण हो सकता है, जो बड़ा ही श्रम साध्य कार्य है। कोई शोधार्थी इस विषय पर शोध भी कर सकता है जिससे विलुप्त हो रही भाजियां भी सूचिबद्ध हो सकती हैं। भाजियों का राजा बोहार भाजी को माना जा सकता है। क्योंकि जब गर्मी के दिनों में इसका सीजन होता है तो यह सबसे मंहगी (डेढ़ सौ से लेकर दो सौ रुपए किलो तक बिकती है) बिकती है। छत्तीसगढ़ की भाजियों की कथा अनंत है, जिसने इनका स्वाद ले लिया वह जीवन भर नहीं भूल सकता। यही विशेषता है, छत्तीसगढ़ की भाजियों की। बचपन में कहते-सुनते थे, आलू, भांटा, मुरई, बिन पूंछी के चिरई…
छत्तीसगढ़ का शाही साग : जिमीकंद
दीपावली का त्यौहार समीप आते ही छत्तीसगढ़ में लोग बाड़ी-बखरी की भूमि में दबे जिमीकंद की खुदाई शुरु कर देते हैं। किलो दो किलो जिमीकंद तो मिल ही जाता है। वैसे भी वनांचल होने के कारण छत्तीसगढ़ में बहुतायत में पाया जाता है। इसका प्रयोग भोजन में मुख्यत: सब्जी के रुप में तो किया ही जाता है इसके साथ गोवर्धन पूजा के दिन पशुओं को भी खिचड़ी में कोचई के साथ मिलाकर खिलाया जाता है। अन्य कई प्रदेशों में दीवाली के दिन इसकी सब्जी बनाने की परम्परा है, जिसके पीछे मान्यता है कि दीपावली के दिन जिमीकंद की सब्जी खाने से आदमी अगले जन्म में छछुंदर नहीं बनता। इसके औषधीय गुणों के कारण धार्मिक त्यौहार से जोड़ दिया गया है, जिससे व्यक्ति कम से कम वर्ष में एक दो बार इसका सेवन कर ले।
भारत के अन्य प्रदेशों में इसे सूरन, ओल, जिमीकंद इत्यादि नामों से जाना जाता है। गुजरात में तो मुझे सूरनवाला सरनेम भी देखने मिला। देशी जिमीकंद को खाने के बाद खुजली होने के कारण सब्जी बनाने के लिए लम्बी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। परन्तु अब हाईब्रीड जिमीकंद आ गए हैं जिनके खाने या काटने से खुजली नहीं होती। दीवाली के समय यह बाजार में बड़ी मात्रा में दिखाई देता है। यह खोदकर बाहर निकालने के बाद भी साल भर तक खराब नहीं होता। इसे एकमुश्त खरीद कर घर में रखा जा सकता है और बरसात में भूमि में गाड़ने के बाद दीवाली तक यह बड़ा हो जाता है।
आयुर्वेद में इसे स्वास्थ्यकारक बताया है, एक तरह से यह औषधि का ही काम करती है। कहा जाता है कि ठंड के दिनों में प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम इसका दो बार सेवन करना ही चाहिए, जिससे कफ़ जनित रोगों का शमन होता है और ठंड से होने वाली बीमारियों से बचा जा सकता है। यह कफ़ एवं सांस की समस्या में भी कारगर औषधि के रुप में कार्य करता है। इसमें फाइबर, विटामिन सी, विटामिन बी 6, विटामिन बी1, फोलिक एसिड और नियासिन होता है। साथ ही मिनरल जैसे, पोटैशियम, आयरन, मैगनीशियम, कैल्शियम और फॉसफोरस पाया जाता है।
इसमें पाए जाने वाले विटामिन, खनिज आदि औषधि तत्वों के कारण ग्रामीण अंचल में प्रचलन है। इसकी सब्जी दही, टमाटर, ईमली आदि की खटाई के साथ बनाई जाती है, जो इसके खुजलीकारक तत्वों को खत्म कर देती है। विशेषकर दही के साथ बनाई गई सब्जी का आनंद ही कुछ और है। मुझे इसकी सब्जी बहुत ही पसंद है, वैसे भी इसकी सब्जी को शाहीसाग की पदवी मिली हुई है। इसकि सब्जी बनाने के लिए सुबह प्रक्रिया प्रारंभ की जाती है, तब जाकर रात को सब्जी मिल पाती है। चलिए जिमीकंद की सब्जी बनाकर खाईए और स्वस्थ रहने का आनंद लीजिए…।
प्राचीन मंदिरों के वास्तु शिल्प में नागांकन
सर्प एवं मनुष्य का संबंध सृष्टि के प्रारंभ से ही रहा है। यह संबंध इतना प्रगाढ एवं प्राचीन है कि धरती को शेषनाग के फ़न पर टिका हुआ बताया गया है। इससे जाहिर होता है कि धरती पर मनुष्य से पहले नागों का उद्भव हुआ। वैसे भी नाग को काल का प्रतीक माना जाता है। जो शिव के गले में हमेशा विराजमान रहता है। कहा गया है - काल गहे कर केश। इसके पीछे मान्यता है कि काल धरती के जीवों का कभी पीछा नहीं छोड़ता और हमेशा उसके गले में बंधा रहता है। इस मृत्यू के प्रतीक को मनुष्य ने हमेशा अपने समक्ष ही रखा और मानव जीवन में भी महत्वपूर्ण स्थान दिया।
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| राजा रानी मंदिर के द्वार पर स्थापित नागप्रहरी - भुवनेश्वर उड़ीसा |
शासकों के कुल भी नागों से चले, नागवंशी, छिंदक नागवंशी, फ़णीनागवंशी इत्यादि राजकुलों की जानकारी हमें मिलती है। इसके साथ ही हमें मंदिरों के द्वार शाखा एवं भित्तियों पर अधिकतर नाग-नागिन का अंकन मिलता है। वासुकि नाग एवं पद्मा नागिन का पाताल लोक के राजा-रानी के रुप में वर्णन मिलता है। नागों को एक दूसरे से गुंथित या नाग-वल्लरी के रुप में दिखाया जाता जाता है भारतीय शिल्पकला में इन्हें देवों के रुप में प्रधानता से स्थान दिया जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि मंदिर के प्रवेश के समय इनके दर्शन करना शुभ एवं सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
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| राजीवलोचन मंदिर राजिम छत्तीसगढ़ के मंडप स्तंभ पर अंकित नागपाश |
प्रागैतिहासिक शैलचित्र कला में नाग का चित्रण, मोहनजोदड़ो, हड़प्पा से प्राप्त मुद्राओं पर नागों का अंकन हुआ है, जो नागपूजा का प्राचीनतम प्रमाण माना जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि मानव प्राचीन काल से नागपूजा कर रहा है। नाग का भारतीय धर्म एवं कला से घनिष्ठ संबंध रहा है। कहा जाए तो नागपूजा हड़प्पा काल से लेकर वर्तमान काल तक चली आ रही है। इसके पुरातात्विक एवं साहित्य प्रमाण प्रचुरता में मिलते हैं। मंदिरों की द्वार शाखाओं पर नागाकृतियों का उत्कीर्ण किया जाना, विष्णु की शैय्या के रुप में, शिव के गले में, बलराम एवं लक्ष्मण को शेषावतार के रुप में प्रदर्शित किया जाना।
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| राजीवलोचन मंदिर राजिम छत्तीसगढ़ के मंडप के द्वार शीर्ष पर शेष शैया |
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| छत्तीसगढ़ के प्राचीन नगर सिरपुर से उत्खनन में प्राप्त जैन तीर्थांकर पार्श्वनाथ की प्रतिमा |
पूर्व मध्यकाल एवं उत्तरमध्यकाल से लेकर आज तक लगभग प्रत्येक ग्राम में नागदेवताओं की किसी न किसी रुप में पूजा की जाती है। इसकी प्रतिमाएं आज भी गांवों में मिलती है तथा नागपंचमी का त्यौहार तो वर्ष में एक बार मनाया ही जाता है। इस विषधर जीव की जितने मुंह उतनी कहानियां मिलती हैं। शायद मनुष्य ने भयभीत होकर इस काल के प्रतीक की पूजा प्रारंभ की होगी और कई परिवारों में इसे कुलदेवता के रुप में मान्यता मिली हुई है, मनुष्य आज तक इसके महत्व एवं उपस्थिति के साथ बल को नकार नहीं सका है।
पुरातत्व शास्त्र की वर्णमाला :मृदा भाण्ड
सभ्यता के विकास के साथ मानव चरणबद्ध रुप से दैनिक कार्य में उपयोग में आनी वाली वस्तुओं का निर्माण करता रहा है। इनमें भाण्ड प्रमुख स्थान रखते हैं। जिन्हें वर्तमान में बरतन कहा जाने लगा है। प्राचीन काल में मानव मिट्टी के बरतनों का उपयोग करता था। किसी भी प्राचीन स्थल से उत्खनन के दौरान लगभग सभी चरणों से मिट्टी के बर्तन प्राप्त होते हैं तथा उत्खनन स्थल पर एक बहुत बड़ा यार्ड इनसे बन जाता है। इस यार्ड में इन्हें वैज्ञानिक अन्वेषण के लिए क्रमानुसार रखा जाता है। छत्तीसगढ़ के डमरु में उत्खनन में अन्य पॉटरी के साथ कृष्ण लोहित मृदा भांड भी प्राप्त हुए। इन्हें देखकर मुझे ताज्जुब हुआ कि एक ही बरतन एक तरफ़ काला और एक तरफ़ लाल दिखाई दे रहा है। वैसे तो इन बरतन को रंग कर यह रुप दिया जा सकता था, परन्तु इन बरतनों को लाल और काला रंग पकाने के दौरान ही दिया गया था।
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| मृदाभाण्ड बनाने की तकनीक का निरीक्षण करते हुए लेखक |
कुम्हारों के द्वारा वर्तमान में किस तरह के बरतन बनाए एवं पकाए जा रहे हैं यह देखने के लिए हम समीप के गाँव में कुम्हार के भट्टे पर निरीक्षण करने के लिए गए। वहाँ कुम्हार से चर्चा की और उसके भाण्डों को भी देखा। इन भाण्डों में उत्खनन में प्राप्त भाण्डों जैसी स्निग्धता, चमक एवं मजबूती नहीं थी इससे साबित हुआ कि प्राचीन काल में भाण्ड निर्माण की प्रक्रिया वर्तमान से उन्नत थी और निर्माता भी समाज में उच्च स्थान रखता था। तभी तो सिरपुर स्थित तीवरदेव विहार के मुख्यद्वार की शाखा में शिल्पकार ने चाक सहित कुम्हार को स्थान दिया है। यह उनके सामाजिक मह्त्व को बताता है।
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| मृदा भाण्ड पकाने की वर्तमान तकनीकि |
पिछली शताब्दी में प्राचीन स्थलों का अन्वेषण एवं उत्खनन का लक्ष्य मात्र मुल्यवान एवं कलात्मक सामग्री की खोज करना था। मृदा भांडों एवं उनके टुकड़ों की गणना व्यर्थ समझी जाती थी। प्राय: उत्खननकर्ता इन्हें फ़ेंक देते थे अथवा इतना अनुमान लगाते थे कि उस समय की सभ्यता में लोग किन-किन बर्तनों का उपयोग करते थे, इनसे उस युग का आर्थिक जीवन जोड़ते थे, परन्तु उत्खनन की दृष्टि से इनका कोई महत्व नहीं माना जाता था।
| उत्खनन में पाप्त मृदाभाण्ड के टुकड़े - डमरु जिला बलौदाबाजार छत्तीसगढ़ |
सर्वप्रथम फ़्लिंडर्स पेट्री ने मिश्र में उत्खनन कार्य करते हुए अनुभव किया कि प्रत्येक काल में विभिन्न प्रकार के कौशल से निर्मित मृदाभांडों का प्रचलन रहता है और परम्परानुराग के कारण शीघ्र ही आमूल परिवर्तन नहीं होता। चर्म एवं काष्ठ की सामग्रियाँ जहां मिट्टी में दबे होने के कारण नष्ट हो जाती हैं, वहीं भांड हजारों वर्षों तक मिट्टी में दबे होने के बाद भी नष्ट नहीं होते। अत: पुरातत्व के अध्ययन में इनका महत्वपूर्ण उपयोग हो सकता है। पेट्री की इस दृष्टि ने पुरातन सभ्यताओं के अध्ययन में क्रांति ला दी। तब से मृदा पात्रों एवं भाण्डों का अध्ययन पुरातत्व शास्त्र का एक आवश्यक अंग माना जाने लगा।
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| कुम्हार के आवे पर- डॉ शिवाकांत बाजपेयी, डॉ जितेन्द्र साहू एवं करुणा शंकर शुक्ला |
आज मृदाभाण्डों को पुरातत्व शास्त्र की वर्णमाला कहा जाता है। जिस प्रकार किसी वर्णमाला के आधार पर ही उसका साहित्य पढा जाता है, उसी प्रकार मृदा भाण्ड अपने काल की सभ्यता सामने लाते हैं। इनके निर्माण की एक विशिष्ट शैली का प्रचलन एक काल का द्योतक होता है। उनको एक विशिष्ट शैली में निर्मित एवं रंगों में वेष्टित करते हैं। जैसे कभी अंगुठे के प्रयोग से बर्तन बने तो कभी मिट्टी की बत्तियों से बनाए गए तो कभी चाक से बनाए गए। यह विकास अलग-अलग काल को दर्शाता है तथा बरतनों के आवश्यकतानुसार नवीन प्रकार भी दिखाई देते हैं।
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| पॉटरी यार्ड - तरीघाट उत्खनन जिला दुर्ग छत्तीसगढ़ |
रंगों के संबंध में हम देखते हैं कि भारत में कभी कृष्ण लोहित मृदा भांड बने तो कभी चित्रित धूसर बने, तो कभी कृष्णमार्जित एवं कृष्णरंजित लोहित मृदाभांड बने। ये सारे न तो एक समय में बने है और न एक ही लोगों द्वारा बनाए गए हैं। अलग-अलग कालों में, भिन्न-भिन्न लोगों द्वारा पृथक रंगों के मृदा भाण्डों का विकास हुआ। इससे स्तरीकरण एवं इन मृदा भाण्डों के साथ प्राप्त सामग्रियों से कालनिर्धारण में सहायता मिलती है। अन्य सामग्रियों एवं अभिलेखों की अनुपलब्धता में उत्खननकर्ता मृदाभाण्डों का अध्ययन कर काल का निर्धारण कर सकता है। इसलिए मृदाभाण्ड काल निर्धारण के लिए मह्त्वपूर्ण रुप से सहायक होते हैं। मृदा भाण्डों का महत्व मानव सभ्यता के साथ सतत बना हुआ है और बना भी रहेगा।
इतिहास की खोई हुई कुंजी है शंख लिपि
विचारों को व्यक्त करने का माध्यम वाणी है, यह वाणी विभिन्न भाषाओं के माध्यम से संसार में प्रकट होती है। इन भाषाओं को दीर्घावधि तक स्थाई रुप से सुरक्षित रखने एवं एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने का कार्य लिपि करती है। कहा जाए तो भाषा को जीवंत रखने के लिए हम जिन प्रतीक चिन्हों का प्रयोग करते हैं, उन्हे लिपि कहते हैं। हम गुहा चित्रों, भग्नावशेषों, समाधियो, मंदिरो, मृदाभांडों, मुद्राओं के साथ शिलालेखो, चट्टान लेखों, ताम्रलेखों, भित्ति चित्रों, ताड़पत्रों, भोजपत्रों, कागजो एवं कपड़ों पर अंकित मनुष्य की सतत भाषाई एवं लिपिय प्रगति देख सकते हैं। इन सबको तत्कालीन मानव जीवन का साक्षात इतिहास कहा जा सकता है।
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| उदयगिरि मध्यप्रदेश |
सभ्यता और संस्कृति के विकास के साथ साथ भाषा एवं लेखनकला का विकास भी होता रहा। प्रारंभ में लिखने के साधन गुफाओं की दीवारें, र्इंट, पत्थर, मृद्पात्र एवं शिलापट्ट आदि थे। देश, काल एवं परिस्थिति अनुसार ये साधन बदलते गये और लिपि एवं भाषा परिस्कृत होती गई।विचारों की अभिव्यक्ति के लिए भाषा एवं लिपि प्रथम साधन है। लिपि के अभाव में अनेक भाषाएँ उत्पन्न होकर नष्ट हो गई । आज उनका नामो निशान तक नहीं रहा। लिपियाँ भी समाप्त हो गई, वे भी इससे अछूती नहीं रही। ललितविस्तर आदि प्राचीन ग्रंथों में तत्कालीन प्रचलित लगभग चौंसठ लिपियों का नामोल्लेख मिलता है, लेकिन आज उसमें में अधिकांश लिपियाँ अथवा उनमें लिखित साहित्य उपलब्ध नहीं है।
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| शंख लिपि उदयगिरि |
कुछ प्राचीन लिपियाँ आज भी एक अनसुलझी पहेली बनी हुई हैं। उनमें लिखित अभिलेख आज तक नहीं पढ़े जा सके हैं। आज हम देखते हैं कि भारत में बहुधा प्राचीन स्थालों, पर्वतों एवं गुफाओं में टंकित ‘शंख लिपि’ के सुन्दर अभिलेख प्राप्त होते हैं इनको भी आज तक नहीं पढ़ा जा सका है। इस लिपि के अक्षरों की आकृति शंख के आकार की है। प्रत्येक अक्षर इस प्रकार लिखा गया है कि उससे शंखाकृति उभरकर सामने दिखाई पड़ती है। इसलिए इसे शंखलिपि कहा जाने लगा।
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| शंखलिपि सरगुजा सीता लेखनी पहाड़ |
जब भी मैं प्राचीन स्थलों पर शंख लिपि को देखता हूं तो मन जिज्ञासा से भर उठता है, कि प्राचीन काल का मनुष्य इस लेख के माध्यम से आने वाले पीढी को क्या सूचना एवं संदेश देना चाहता था। परन्तु लिपि की जानकारी की अभाव में यह रहस्य स्थाई हो गया है। विद्वान गवेषक इन लेखों को पढने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन अभी तक योग्य सफलता नहीं मिल सकी है। आज भी विविध सिक्कों, मृद्पात्रों एवं मुहरों पर लिखित ऐसी कई लिपियाँ और भाषाएँ हमारे संग्रहालयों में विद्यमान हैं जो एक अनसुलझी पहेली बनी हुई है। समय को प्रतीक्षा है इन पहेलियों के सुलझने की। जब इनमें कैद इतिहास बाहर निकल कर सामने आएगा और नई जानकारियाँ मिलेगी।
कुंआ: मानव सभ्यता की पहचान
जल ही जीवन है, क्षितिज, जल, अग्नि, गगन एवं हवा आदि पंच तत्वों में अनिवार्य तत्व जल भी है। बिना जल के जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। मानव ने सभ्यता के विकास के क्रम में जल की अनिवार्य आवश्यकता की पूर्ति हेतु नदियों एवं प्राकृतिक झीलों के किनारे अपना बसेरा किया। वह नदियों एवं झीलों के जल से निस्तारी करता था। जब मानव समूह विशाल रुप लेने लगे तो गाँव एवं नगर बसने लगे। निवासियों के लिए जल उपलब्ध कराने की दृष्टि से कुंए, तालाब इत्यादि निर्मित किए जाने लगे। आवागमन के मार्गों पर जल की व्यवस्था कुंए एवं प्याऊ के रुप में की जाने लगी। इस तरह भू-गर्भ जल की उपस्थिति को मनुष्य ने जान लिया और मानवकृत जल के संसाधन विकसित होने लगे।
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| हड़प्पाकालीन नगर लोथल (गुजरात) के कुंए का निरीक्षण करते हुए विनोद गुप्ता जी के साथ |
पेयजल की उपलब्धता के लिए प्राचीन काल से मानव ने कुंए, बावड़ियों एवं तालाबों का निर्माण किया। पुरातात्विक स्थलों के उत्खनन के दौरान प्राचीन नगर बसाहटों में कुंए मिलते हैं। हड़प्पा काल में नगर के मध्य एवं व्यापारिक केन्द्रों में पक्के कुंए होते थे। मोहन जोदड़ो, हड़प्पा, लोथल इत्यादि स्थानों पर उत्खनन के दौरान पक्के कुंए प्राप्त हुए हैं। इसी तरह छत्तीसगढ़ अंचल के सिरपुर में पक्के प्राचीन कुंए उत्खनन में प्राप्त हुए हैं, जिनमें अभी भी मीठा जल उपलब्ध है। इसके साथ ही प्राचीन व्यापार मार्गों पर भी कुंओं के अवशेष मिलते हैं।
तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में रावण की वाटिका वर्णन करते हुए लिखा है - बन बाग उपवन वाटिका, सर कूप वापी सोहाई। जल के बिना जीवन नहीं है, अत: रावण की लंका में भी कूप, वापी सरोवरों की बहुतायता पाई गई। स्नान के लिए सरोवर, पेयजल की प्राप्ति के लिए कूप एवं सिंचाई तथा पशुओं की निस्तारी के लिए बावड़ियों का निर्माण कराया गया था। राज्य द्वारा प्रजा की सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए जल की उत्तम व्यवस्था की जाती थी।
संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध कवि बाण अपनी कृति कादंबरी (सातवीं शताब्दी) में पोखर-सरोवर खुदवाने को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मानते थे. लोक-कल्याण हेतु इस प्रकार के खुदवाए गए जलकोष को चार वर्गों में विभाजित किया गया है- 1.कूप जिसका व्यास 7 फीट से 75 फीट हो सकता है और जिससे पानी डोल-डोरी से निकाला जाए, 2. वापी, छोटा चौकोर पोखर, लंबाई 75 से 150 फीट हो और जिसमें जलस्तर तक पाँव के सहारे पहुँचा जा सके, 3.पुष्करणी, छोटा पोखर, गोलाकार, जिसका व्यास 150 से 300 फीट तक हो, 4.तड़ाग पोखर, चौकोर, जिसकी लंबाई 300 से 450 फीट तक हो.।
जल की व्यवस्था हमारे समाज के लिए कभी मजबूरी रही होगी परन्तु कालांतर में इसने परम्परा का रुप ले लिया। पोखर की चर्चा ऋग्वेद में भी है. गृह्मसूत्र के अनुसार, किसी भी वर्ग या जाति का कोई भी व्यक्ति, पुरूष या स्त्री पोखर खुदवा सकता है और यज्ञ करवाकर समाज के सभी प्राणियों के कल्याण-हेतु उसका उत्सर्ग कर सकता है. आज भी यह काम पुण्य कमाने का समझा जाता है। कुंआ पोखर आदि निर्माण करने को प्रोत्साहित करने के लिए शास्त्रों द्वारा महिमा मंडन किया गया, कहते है - जो धनी पुरुष उत्तम फल के साधन भूत ‘तडाग’ का निर्माण करता है और दरिद्र एक कुआँ बनवाता है, उन दोनों का पुण्य समान होता है। जो पोखरा खुदवाते हैं, वे भगवान् विष्णु के साथ पूजित होते हैं।
महाभारत में भीष्म पर्व के माध्यम से वेदव्यास ने कोई तालाब कितने समय के लिए पानी संचित रख सकता है उसके अनुरूप उनका विभाजन किया है। उन्होंने इस तरह के तालाबों के निर्माण से मिलने वाले पुण्य की भी व्याख्या की है। हिन्दू संस्कृति में इस तरह के जल-स्रोतों का निर्माण एक धार्मिक कृत्य माना जाता रहा है और इसे अपनी कीर्ति रक्षा का सबसे सहज उपाय भी बताया गया है। कूप या कुएं इस श्रृंखला की सब से छोटी इकाई हुआ करते थे जो कि न केवल पेय जल के स्रोत थे वरन उनके आकार के अनुसार उनसे सिंचाई की भी संभावनाएं बनती थीं।
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| सिरपुर के बाजार क्षेत्र के मध्य कुंआ |
कवि केशवदास ने कविप्रिया में नगर वर्णन करते हुए लिखा है - खाई कोट अट ध्वजा, वापी कूप तड़ाग, वार नारी असती सती, वरनहु नगर सभाग। पदमावत में जिक्र है कि वारी सुफ़ल आहि, तुम बालापन में ही फ़ल गई, मध्यकाल में वाटिका लगाने के बाद उसका विवाह किया जाता था। तब तक लगाने वाला उसका फ़ल न खाता था। वाटिका लगाने एवं फ़लने के बाद वापी कूप तड़ाग का विवाह करने के बाद ही स्वामी उनका उपभोग करता था। व्यंग्य करते हुए कहा है कि - तुम्हारी वाटिका तो कुंवारी ही फ़ल गई।
कुंओं का निर्माण करना साधारण कार्य नहीं था। भू-गर्भ से जल निकालने के लिए भू-तल तक उत्खनन करना पड़ता था। कुंओं का निर्माण करने के लिए शिल्पशास्त्रों ने विधान बताया है। शिल्पशास्त्र मयमतम के रचयिता कहते हैं - ग्राम आदि में यदि कूप नैऋत्य कोण में हो तो व्याधि एवं पीड़ा, वरुण दिधा में पशु की वृद्धि, वायव्य कोण में शत्रु-नाश, उत्तर दिशा में सभी सुखों को प्रदान करने वाला तथा ईशान कोण में शत्रु का नाश करने वाला होता है । ऐसा कहा गया है ॥१-२॥ वराह मिहिर ने कहा है - यदि ग्राम के या पुर के आग्नेय कोण में कूप हो तो वह सदा भय प्रदान करता है तथा मनुष्य का नाश करता है । नैऋत्य कोण में कूप होने पर धन की हानि तथा वायव्य कोण में होने पर स्त्री की हाने होती है । इन तीनों दिशाओं को छोड़कर शेष दिशाओं में कूप शुभ होता है ॥४-५॥
स्थान चयन के लिए परम्परागत साधनों से भू जल की उपस्थिति जांचने के बाद समस्त देवताओं का आहवान एवं पूजन करके कूप का निर्माण निश्चित किया जाता था। सही मुहूर्त में कूप का निर्माण प्रारंभ किया जाता था। भूमि के आधार पर कुंओं को खोदने के पृथक पृथक निर्माण विधि प्रयोग में लाई जाती थी। जहाँ मिट्टी मजबूत होती थी वहाँ वांछित गहराई तक कुंआ खोदने के पश्चात उसे ईंटों या पत्थरों से पक्का बांधा जाता था। जहाँ रेत पाई जाती है वहाँ जमीन पर ही कुंओं की चिनाई करके बाद उसके नीचे की रेत धीरे-धीरे सावधानीपूर्वक निकाली जाती है। इसे स्थानीय भाषा में "कोठी गलाना" कहते हैं। यह विधि खतरनाक भी है क्योंकि यहाँ कुंओं में जल सामान्य से अधिक उत्खनन के पश्चात निकलता है। कभी कभी ईटों के भसकने के कारण मजदूरो के दब जाने से जान लेवा दुर्घटनाएँ हो जाती हैं।
शास्त्रकार कूप निर्माणकार के प्रोत्साहन की दृष्टि से नारद पुराण कहता है- एकाहं तु स्थितं पृथिव्यां राजसन्तम। कुलानि तारयेत् तस्य सप्त-सप्त पराण्यपि।।65।। अर्थात्-जिसकी खुदवाई हुई पृथ्वी में केवल एक दिन भी जल स्थित रहता है, वह जल उसके सात कुलों को तार देता है। दीपालोक प्रदानेन वपुष्मान् स भवेन्नरः। प्रेक्षणीय प्रदानेन स्मृतिं मेधां च विंदति।।66।। अर्थात्- ‘दीप दान’ करने से मनुष्य का शरीर उत्तम हो जाता है और जल के दान के कारण उसकी स्मृति और मेधा बढ़ जाती है। -बृहस्पति स्मृति।
शास्त्रों में नृपों के लिए स्पष्ट निर्देश देकर जल प्रदुषित एवं जल साधन नष्ट करने वाले के लिए दंड का विधान किया गया है। लिखित स्मृति कहती है- पूर्णे कूप वापीनां वृक्षच्छेदन पातने। विक्रीणीत गजं चाश्वं गोवधं तस्य निर्द्दिशेत्।। अर्थात्- जो मनुष्य कुआँ या बावड़ी को पाट देता है, वृक्षों को काट कर गिरा देता है तथा हाथी या घोड़े को बेचता है, उसे ‘गौ के हत्यारे’ के समान मानकर दण्डित करना चाहिए। ‘तडाग देवतागार भेदकान् घातयेन्नृपः।।‘ ‘अग्नि पुराण’ में राजाओं के लिए स्पष्ट निर्देश है कि यदि कोई व्यक्ति जलाशय या देवमंदिर को नष्ट करता है तो राजा उसे ‘मृत्युदण्ड’ से दण्डित करे। स्कंद पुराण के माहेश्वर खण्ड में कहा गया है कि जो व्यक्ति पोखरा को बेच देते हैं, जो जल में मैथुन करते हैं तथा जो तालाब और कुओं को नष्ट करते हैं, वे ‘उपपातकी’ हैं। ऐसे व्यक्ति जब दुबारा जन्म लेते हैं तो वे अपने ‘हाथों’ से वंचित होते हैं।
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| सिरपुर के प्राचीन बाजार क्षेत्र के मध्य कुंआ |
जल सर्वकाल में मानव एवं चराचर जगत के लिए जीवन का स्रोत है, इसके महत्व को प्राचीन काल के मानवों ने समझा तथा जल की समुचित व्यवस्था की ओर ध्यान देते हुए जल के संसाधनों के रुप में कूप, तालाबों का निर्माण करवाया। हरियाणा, राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश के हरितक्षेत्र में कुंआ पूजन का विधान है। पुत्र जन्म होने पर स्त्रियाँ सद्य: प्रसुता से कुंए की समारोह पूर्वक पूजा करवाती हैं। यह जल संसाधन के प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता प्रकट करने का सामाजिक नियम निर्मित किया गया है। इस तरह कुंए प्राचीन काल से मानव सभ्यता एवं प्राणी जगत की जलापूर्ति का साधन बने हुए हैं। बढती हुई जनसंख्या के समक्ष जलापूर्ति एक विकराल समस्या के रुप में सामने आ रही है। भू-जल का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है। पर्जन्य से जितना जल पृथ्वी पर आता है उसे बचाकर भू-गर्भ के जल की वृद्धि करने का प्रयत्न करना चाहिए।
मल्हार : पातालेश्वर मंदिर
मल्हार जाने के लिए सुबह का 6 बजे का वक्त तय हुआ। सुबह की शीतलता के साथ मल्हार दर्शन हो जाएगें वरना इस मौसम में सूरज दादा इतने भन्ना जाते हैं कि झुलसा कर ही छोड़ते हैं। द्वारिका प्रसाद अग्रवाल जी सपत्नी (माधुरी जी) के साथ मुकर्रर वक्त पर होटल पहुंच गए। मैं भी अपने औजार (कैमरा, टोपी, पानी की बोतल इत्यादि) लेकर तैयार था। हम मल्हार की ओर चल पड़े।
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| बिलासपुर की सुबह |
मल्हार नगर छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में अक्षांक्ष 21 90 उत्तर तथा देशांतर 82 20 पूर्व में 32 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। बिलासपुर से रायगढ़ जाने वाली सड़क पर 18 किलोमिटर दूर मस्तूरी है। वहां से मल्हार, 14 कि. मी. दूर है। मस्तुरी पहुंचने पर मल्हार जाने वाले मार्ग पर एक बड़ा द्वार बना हुआ है और यहीं से तारकोल की इकहरी सड़क मल्हार की ओर जाती है।
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| मल्हार का मड फ़ोर्ट |
पुरातात्विक दृष्टि से मल्हार महत्वपूर्ण स्थान है। यहाँ कई एकड़ में फ़ैला हुआ मृदा भित्ति दुर्ग भी है। मल्हार के मृदा भित्ती दुर्ग (मड फ़ोर्ट) सर्वप्रथम जिक्र जे. डी. बेगलर ने 1873-74 के अपने भ्रमण के दौरान किया। परन्तु उन्होने इस मड फ़ोर्ट में विशेष रुचि नहीं दिखाई। उन्होने इस शहर में मंदिरों के 2 खंडहरों का जिक्र किया।
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| पंचमुखी गणेश |
के. डी. बाजपेयी मानते हैं कि पुराणों में वर्णित मल्लासुर दानव का संहार शिव ने किया था। इसके कारण उनका नाम मलारि, मल्लाल प्रचलित हुआ। यह नगर वर्तमान में मल्हार कहलाता है। मल्हार से प्राप्त कलचुरीकालीन 1164 ईं के शिलालेख में इन नगर को मल्लाल पत्त्न कहा गया है। विशेष तौर पर इस नगर का प्रचार तब अधिक हुआ जब यहाँ से डिडनेश्वरी देवी की प्राचीन प्रतिमा चोरी हो गई थी। तब समाचार पत्रों में इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता रहा। मैने भी तभी इसका नाम सुना था, पर इस स्थान पर जाना कभी न हो सका था।
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| पातालेश्वर मंदिर का प्रवेश द्वार एवं स्थानक विष्णु लक्ष्मी :) |
चर्चा के दौरान द्वारिका प्रसाद जी ने भी कहा था कि सारी उम्र बिलासपुर में गुजारने के बाद भी वे मल्हार नहीं जा सके। आज आपके साथ जाना हो जाएगा। अब हम मल्हार से अनजान तीन लोग इस नगर की ओर बढ रहे थे। धीमी रफ़्तार से चलते हुए हम लगभग 7 बजे मल्हार पहुंच गए। सूर्य देवता भी अपना हल्का प्रभाव दिखाने लगे थे। मल्हार में प्रवेश करते समय छत्तीसगढ़ पर्यटन के सूचना पट पर पातालेश्वर मंदिर का रास्ता दिखाया गया था। हम भी इसी मंदिर में जाकर रुके।
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| नदी देवियाँ एवं अनुचर |
मंदिर परिसर की सुरक्षा चार दिवारी बना कर की गई है। लोहे का गेट खुला मिला और हम प्रवेश कर गए। यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है, गेट से प्रवेश करते समय 18 अप्रेल विश्व धरोहर दिवस का बैनर टंगा हुआ दिखाई दिया। वैसे तो उदयपुर वाले श्री कृष्ण जुगनु जी ने फ़ेसबुक पर पूछ ही लिया था कि आज आप क्या करने वाले हैं। हमने उन्हें बताया कि मल्हार जाने वाले हैं।
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| जय भोले शंकर-कांटा गड़े न कंकर |
द्वार से प्रवेश करने पर बांई ओर टीन के छत से ढकी मंदिर की विशाल संरचना दिखाई दे रही थी। इसे देखते ही अपुन समझ गए कि यही पातालेश्वर मंदिर है। पालेश्वर मंदिर का मंडप अधिष्ठान ऊंचा है पर गर्भ गृह में जाने के लिए 5-6 पैड़ियाँ उतरना पड़ता है अर्थात गर्भगृह धरातल पर ही है। द्वार के बांई तरफ़ कच्छप वाहिनी यमुना एवं दांई तरफ़ मकर वाहिनी गंगा देवी की स्थानक मुद्रा में आदमकद प्रतिमा है। इनके साथ ही शिव के अन्य अनुचर भी स्थापित हैं।
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| गौमुखी पातालेश्वर शिव |
गर्भ गृह में जाने के लिए पैड़ियों का प्रयोग होने के कारण इस मंदिर का नाम पातालेश्वर प्रचलन में आया तथा शिवलिंग का गौमुखी होना भी इसे विशेष मान्यता देता है। जब हम लोग मंदिर में पहुंचे तो कुछ लोग पूजा पाठ कर रहे थे। माधुरी जी ध्यान करती हैं, उन्होने शिवलिंग के दर्शन करने के पश्चात बताया कि इस स्थान पर उर्जा का स्तर काफ़ी ऊंचा है।
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| ई हमार कौनो जनम के भाई बंधू हैं मूंछधारी |
द्वार पर स्थापित प्रतिमाओं को देखने के बाद मन प्रसन्न हो गया। शिल्पकार ने इन्हें सुडौल बनाया। प्रतिमा निहारने पर कहीं पर भी निगाहें अटकती नहीं हैं। कहा जाए तो सब कुछ "सूत" में निर्मित किया है सूत्रधार ने। इस मंदिर का निर्माण कलचुरी राजा पृथ्वीदेव के पुत्र जाजल्लदेव द्वितीय के समय में सोमराज नामक ब्राह्मण ने कराया, जिसे केदारेश्वर नाम दिया जो वर्तमान में पातालेश्वर प्रसिद्ध है।
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| राम जी की सेना चली - हस्तिदल |
मंदिर की भित्तियों में हस्ति दल, सिंह संघाट प्रतिमा, गणेश, पुष्प वल्लरियों का सुंदर अंकन है। मंदिर की दाईं भित्ति पर मूंछधारी सिंह का अंकन भी मनोहारी दिखाई देता है। मंदिर के सामने ऊंचे अधिष्ठान पर नंदी सजग मुद्रा में विराजमान हैं। कान खड़े हुए और आँखे शिव की ओर एक टक लगी हुई। जैसे आदेश होते ही त्वरित कार्यवाही करने को तत्पर दिखाई देते हैं।
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| नंदी बाबा तैयार हैं कार्यवाही के लिए- आदेश की प्रतीक्षा |
मंदिर के समक्ष ही हनुमान जी की आदमकद प्रतिमा विराजमान है। स्थानक मुद्रा में हनुमान जी ने एक स्त्री पर बांया पैर धर रखा है। एक हाथ सिर पर है तथा दूसरा हाथ अभय मुद्रा में दिखाई देता है। यह प्रतिमा किस पौराणिक आख्यान पर आधारित है, स्मरण नहीं हो पा रहा। मंदिर के आस पास कई आमलक बिखरे पड़े हैं। इसके साथ ही मडफ़ोर्ट की परिखा के तरफ़ पंचमुखी गणेश की आदमकद प्रतिमा भी रखी हुई है।
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| भग्न मंदिरों के खंडहर |
मंदिर परिसर में उत्खनन में प्राप्त कई मंदिरों के भग्नावशेष बिखरे पड़े हैं इससे जाहिर होता है कि इस स्थान पर मंदिरों का समूह रहा होगा। मंदिर के सामने ही कई जैन प्रतिमाएं पड़ी हुई हैं। सामने ही संग्रहालय भी बना हुआ है। परन्तु इस संग्रहालय में इतनी जगह नहीं है कि सभी प्रतिमाएं रखी जा सकें। संग्रहालय में मौजूद प्रतिमाओं का अवलोकन करने लिए हमने संग्रहालय में प्रवेश किया।
मल्हार : प्राचीन प्रतिमाएँ
मल्हार पर प्राण चड्ढा जी से चर्चा हो रही थी। उन्होनें बताया कि 25-30 वर्ष पूर्व मल्हार में प्राचीन मूतियाँ इतनी अधिक बिखरी हुई थी कि महाशिवरात्रि के मेले में आने वाले गाड़ीवान मूर्तियों का चूल्हा बना कर खाना बनाते थे। इसके वे साक्षी हैं। मल्हार पुरा सम्पदा से भरपूर नगर था। वर्तमान मल्हार गाँव मल्लारपत्तन नगर के अवशेषों पर बसा हुआ है। हर घर में किसी न किसी पुराने पत्थर या प्रतिमावशेष का उपयोग दैनिक कार्यों में होता है। कलचुरियों के समय यह नगर अपनी प्रसिद्धी की बुलंदी पर था। पर न जाने ऐसा क्या हुआ जो इसे पतनोन्मुख होना पड़ा। यही सोचते हुए मैं संग्रहालय (संग्रहालय तो नहीं कहना चाहिए, वरन एक बड़ा कमरा जरुर है, जहाँ बेतरतीब प्रतिमाएं पड़ी हैं) की ओर बढा।
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| संग्रहालय |
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| शेष नारायण |
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| कुबेर |
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| वीरभद्र |
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| विष्णु |
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| स्कंद माता |
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| शिव पार्वती |
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| विष्णू |
मल्हार: आस्था का केन्द्र डिड़नेश्वरी माई
डिडनेश्वरी माई का प्रसिद्ध मंदिर मल्हार ग्राम की पुर्व दिशा में लगभग 1 किलोमीटर की दूरी पर है। इसके दांए तरफ़ एक बड़ा तालाब है तथा मंदिर के सामने भी एक पक्का तालब है। जिसमें ग्रामीण निस्तारी करते हैं। मंदिर के द्वार पर पहुंचने पर एक सिपाही खड़ा दिखाई दिया। शायद इसे मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था में तैनात किया गया है। मंदिर के गर्भ गृह को लोहे के दरवाजों से बंद किया गया है, दर्शनार्थी बाहर से ही दर्शन करके जा रहे थे। मंदिर में नवीन निर्माण कार्य प्रारंभ है। गर्भ गृह के सामने बड़े मंडप का निर्माण हो रहा है।
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| डिड़नेश्वरी मंदिर परिसर |
डिड़नेश्वरी नाम के विषय में राहुल सिंह कहते हैं - "डिड़िन दाई से तो जैसे पूरे मल्हार की धर्म-भावना अनुप्राणित हुई है। काले चमकदार पत्थर से बनी देवी। डिड़वा यानि अविवाहित वयस्क पुरुष और डिड़िन अर्थात् कुंवारी लड़की। माना जाता है कि मल्हार के शैव क्षेत्र में डिडिनेश्वरी शक्ति अथवा पार्वती का रूप है, जब वे गौरी थीं, शिव-वर पाने को आराधनारत थीं। डिड़िन दाई का मंदिर पूरे मल्हार और आसपास के जन-जन की आस्था का केन्द्र है।" डिड़नेश्वरी देवी प्रतिमा को कई बार चोरी करने का प्रयास किया पर चोर एक बार कामयाब हो गए। इस दौरान अखबारों में इस प्रतिमा चोरी के समाचार छपने से यह प्रतिमा विश्व प्रसिद्ध हो गई। फ़िर अचानक यह प्रतिमा बरामद भी हो गई।
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| डिड़नेश्वरी माई |
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| राजपुरुष: डिड़नेश्वरी मंदिर मल्हार |
मल्हार : जैन प्रतिमाएँ
रात होटल में सतीश जायसवाल जी से भेंट हुई थी, जब उन्हें हमारी मल्हार यात्रा का पता चला तो उन्होंने सहयोग की दृष्टि से मल्हार निवासी गुलाब सिंह को फ़ोन लगाया, वे घर पर नहीं मिले। फ़िर उन्होने उनका नम्बर द्वारिका प्रसाद जी को दे दिया। जिससे हम मल्हार पहुंचने के बाद उनसे सम्पर्क कर सकें। मल्हार पहुंचने पर उनका नम्बर "नाट रिचेबल" कहने लगा। मल्हार भ्रमण कराने के लिए अन्य सुत्र नहीं मिला तो हम खुदमुख्त्यार हो गए। डिड़नेश्वरी देवी दर्शन के पश्चात हमें पता चला कि बस्ती के भीतर कोई नंद महल नामक मंदिर है। हमने कार बाजार में ही वृक्ष के नीचे खड़ी कर दी और रास्ता पूछते हुए चल पड़े।
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| प्राचीन भवनों के पत्थरों का उपयोग |
कदमों से चल कर किसी बस्ती को नापना मुझे अच्छा लगता है। मल्हार का बाजार छोटा सा है, पर आवश्यकता सभी वस्तुएँ यहाँ उपलब्ध है। बड़ी खरीददारी के लिए इन्हें बिलासपुर जाना पड़ता है। नंद महल के रुप में मैने सोचा था कि कोई बड़ा भवन होगा। जिसमें कोई मंदिर होगा। पैदल चलते हुए बस्ती का निरीक्षण भी हो रहा था। प्राचीन नगरी के भग्नावशेषों पर गांव बसने के कारण पुराने घरों की नींव और दीवालों में पुरा सामग्री प्रयोग की हुई मिल जाती है। जैसे सिरपुर में मकान बनाने के लिए कहीं बाहर से पत्थर लाने की जरुरत नहीं होती थी। किसी भी स्थान को खोदने से प्राचीन दीवाल आदि मिल जाती थी उसके पत्थर ही भवन निर्माण के लिए पर्याप्त होते थे।
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| वैवाहिक जानकारी |
गाँव में घरों की दीवाले होली-दीवाली पोती जाती हैं, अगर शादी का अवसर हो तो दीवालों पर चूना लगाना आवश्यक है। तभी शादी के घर की रौनक बनती है। आदमी अपनी आमदनी के हिसाब से विवाह में खर्च करता है। अगर आमदनी कम हो तो भी रौनक पूरी होनी चाहिए। तभी विवाह का आनंद आता है। ग्रामीण अंचल में विवाहादि अवसरों पर दीवालों पर वर-वधू का नाम लिखना आवश्यक समझा जाता है। ऐसा मैने कई प्रदेशों के गांवों में देखा है। यहाँ भी घर की दीवालों पर वर-वधु के रंग बिरंगे नाम लिखे हुए थे। कम्प्यूटर प्रिंटिंग के कारण पेंटरों का धंधा चौपट हो गया। पेंटरों से साईन बोर्ड या अन्य लेखन-चित्रण कार्य कराने की बजाए लोग फ़्लेक्स बनवाना उचित समझते हैं। दीवाल लेखन देखने के बाद थोड़ी प्रसन्नता तो मिली कि पेंटरों के लिए अभी गाँव में काम बचा है। जिससे रोजगार चल सके।
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| चूल्हा निर्माण |
सुबह के समय गाँव में सभी व्यस्त रहते हैं, बहारी झाड़ू, पानी भरना, नहाना-धोना और मंदिर पाठ-पूजा नित्य का कार्य है। रास्ते में ही झोपड़ी के नीचे एक महिला चूल्हा बनाने के लिए धान के भूसे के साथ मिट्टी सान रही थी। शहरों से और कस्बों से तो लकड़ी का चूल्हा गायब ही हो गया है। गैस ने लकड़ी के परम्परागत चूल्हे को चलन से बाहर कर दिया। यह देख कर खुशी हुई कि गांवों आज भी चूल्हे का चलन है। गृह्स्थ का सारा जीवन इसी चूल्हे के चक्कर में खप जाता है। चूल्हे पर चर्चा चल रही थी तो मैने द्वारिका प्रसाद जी से कहा कि कुछ साल पहले मैने चूल्हे पर एक आलेख लिखा था। जो बहुत सारे अखबारों एवं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ था। चर्चा होने पर उन्होने कहा कि "मैं भी अब चूल्हे पर लिखुंगा। मेरे दिमाग में भी आईडिया आया है।"
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| गाँव की दुकान एवं दुकानदार |
गाँव की छोटी सी दुकान में दैनिक उपयोग की सभी सामग्री मिल जाती है। बच्चों के लिए तो यह महत्वपूर्ण ठिकाना है। जहाँ कहीं से भी रुपया दो रुपया मिला, सीधे भाग कर दुकान में पहुंचते हैं। दुकानदार के पास भी बच्चों को लुभाने वाली सारी चीजें रहती हैं, जिन्हें दुकान के सामने प्रदर्शित करता है। चाकलेट, नड्डा, गोली, बिस्किट बच्चों को आकर्षित करने के लिए काफ़ी हैं। हमें भी जब बचपन में कहीं से आने दो आने मिल जाते थे तो सब्र ही नहीं होता था। सीधे पड़ोस की दुकान में पहुंच कर उन पैसों को ठिकाने लगा कर आते थे। दुकान की रौनक भी बच्चों से बनी रहती थी और दुकानदार भी व्यस्त रहता था। अब भी गांवों में वैसा ही माहौल है। नए जमाने का असर थोड़ा बहुत हुआ है।
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| परम्परागत नौबेड़िया किवाड़ |
ग्रामीण अंचल में घरों के दरवाजे भी सुंदर और मोहक होते हैं, जिन्हें चटक रंगों से पेंट किया जाता है। जिसकी जितनी आमदनी होती है उसके घर के दरवाजे भी वैसे ही होते हैं। दरवाजों को देख कर पता चल जाता है कि कौन कितना मालदार है। वर्तमान में शहरों के घरों में इमारती लकड़ी के पेनल डोर, बटन डोर और फ़्लश डोर का चलन है। परन्तु गांवों में अभी भी खेत की लकड़ी से ही दरवाजा बनाए जाने की परम्परा है। देशी बमरी (बबूल) की लकड़ी के दरवाजे मजबूत होते हैं। अगर बमरी के सार की लकड़ी मिल गई तो ये दरवाजे कई पीढियों तक साथ निभाते हैं। बबूल की लकड़ी में गोंद होता है, जो सूखने पर लकड़ी को लोहे जैसे मजबूती देता है। इस लकड़ी से गाँवों के बढई नौबेड़िया और ग्यारह बेड़िया दरवाजे बनाते हैं। अधिकतर घरों में नौबेड़िया दरवाजे मिलते हैं। यहां पर भी मुझे यह दरवाजे देखने मिले।
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| जैन तीर्थंकर पट |
बातचीत करते हम मंदिर तक पहुंच गए, मंदिर के बारे में पता करने पर एक लड़का दौड कर गया और मंदिर के ताले की चाबी ले आया। हम पहुंचे तो मंदिर में लगा लोहे का गेट बंद था। मंदिर में प्रवेश करने पर जैन तीर्थकंरो की स्थापित प्रतिमाओं को देखकर आश्चर्य चकित रह गया। पता नहीं ग्रामीण कब से इन प्रतिमाओं की पूजा कर रहे हैं। इन्होने भी इन प्रतिमाओं को स्थानीय देवताओं के नाम दे दिए होगें तथा इन प्रतिमाओं में अपने किसी देवता को स्थापित कर मान्य कर लिया होगा। जैन तीर्थंकरों का काले ग्रेनाईट से बना हुआ एक तो नौ प्रतिमाओं का पूरा पैनल ही है। साथ में दो देवियों की प्रतिमाएं हैं एक स्थानक मुद्रा में तथा दूसरी ध्यान मुद्रा में। इन प्रतिमाओं को स्थापित करने के लिए ग्रामीणों ने बड़ा मंदिर बना लिया है तथा नित्य पूजन हो रहा है। मंदिर दर्शन करने के पश्चात हम अपने वाहन तक लौट आए।
मल्हार: देऊर मंदिर
प्राचीन नगर की सैर करते हुए सूरज सिर पर चढने लगा था। हमें अभी देऊर मंदिर देखना था। यहीं से एक रास्ता कसडोल एवँ गिरोदपुरी होते हुए रायपुर को जाता है। देऊर मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंचने पर मन प्रसन्न हो गया। देऊर मंदिर की भग्न संरचना देखने से ही पता चलता है कि यह मंदिर विशाल रहा होगा।। इसका अधिष्ठान भूतल पर ही है। गर्भ गृह द्वार पर नदी देवियों की सुंदर प्रतिमाएँ हैं। अलंकृत द्वार की ऊंचाई लगभग 14 फ़ुट होगी। इसकी विशालता से ही मंदिर के महत्व का पता चलता है।
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| भव्य देऊर मंदिर (शिवालाय) |
प्राचीन काल में मल्हार महत्वपूर्ण नगर रहा होगा। इस नगर को राजधानी का दर्जा प्राप्त था या न था। इस पर अध्येताओं के विभिन्न मत हैं। इस नगर का उत्खनन प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति विभाग सागर विश्वविद्यालय के के डी बाजपेयी एवँ एस के पाण्डे ने 1975 से 1978 के दौरान किया था। जिसमें प्रतिमाएँ, विभिन्न संरचनाएँ, सिक्के, पॉटरी, शिलालेख एवं अन्य वस्तुएँ प्राप्त हुई थी।
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| नदी देवियाँ (जमुना एवं गंगा) |
इनके आधार पर आंकलन किया गया कि इस स्थान से पाँच ऐतिहासिक काल खंडों के प्रमाण मिलते है। आद्य ऐतिहासिक काल - 1000 से 350 ई पू, मौर्य, शुंग, सातवाहन काल - 300 से 350 ईसा पूर्व, शरभपुरीय एवं सोमवंशी काल - 300 से 650 ईस्वीं, सोमवंशी काल - 650 से 900 ईंस्वी, कलचुरी काल - 900 से 1300 ईस्वीं माना गया है।
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| भीमा - कीचक |
इस अवधि तक यह नगर आबाद रहा। इसके पश्चात यह टीले रुप में प्राप्त हुआ, जिसके उत्खनन के पश्चात 7 वीं से 8 वीं सदी का यह मंदिर प्राप्त हुआ। इस शिवालय का निर्माण सोमवंशी शासकों ने कराया था। मंदिर के समीप ही प्रांगण में दो बड़ी प्रतिमाओं के शीर्ष भाग रखे हुए हैं। विशालता देखते हुए ग्रामीण जनों में महाभारत कालीन भीमा-कीचक के रुप में उनकी पहचान स्थापित हो गई।
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| शिव परिवार |
मंदिर के द्वार पट पर शिव के गणों की प्रतिमाएं उकेरी गई हैं, मुख्य द्वार शाखा पर परिचारिकाएँ स्थापित हैं। द्वार पर किए गए बेलबूटे के अलंकरण देख कर सिरपुर के तिवर देव विहार का स्मरण हो उठता है। मंदिर की भित्तियों में प्रतिमाएँ लगाई गई हैं तथा मंदिर के निर्माण में बड़े पत्थरों का प्रयोग किया गया। द्वार के एक-एक पट का वजन ही कम से कम 10 टन होगा।
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| यज्ञ करते हुए ब्रह्मा |
मंदिर की भित्तियों पर पशु, पक्षियों, यक्ष, यक्षिणी, गंधर्व, कीर्तीमुख, भारवाहक इत्यादि की प्रतिमाएं प्रमुख हैं। द्वार शाखा पर ब्रह्मा को यज्ञ करते हुए, उमा महेश्वर संग कार्तिकेय उत्कीर्ण किया है। द्वार पर स्थापित नदीं देवियों के वस्त्र अलंकरण मनमोहक हैं। शिल्पकार ने अपने कार्य को महीनता से अंजाम दिया है।
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| शिल्पकार द्वारा अधूरा छोड़ा गया महिषासुर मर्दनी का अंकन |
शिवालय के द्वार पट पर एक अधूरी प्रतिमा का दागबेल दिखाई दिया। यह प्रतिमा महिषासुर मर्दनी की बनाई जानी थी। शिल्पकार ने सुरमई से अंकन के बाद छेनी चलाकर उसे पक्का भी कर दिया था। इसके पश्चात प्रतिमा का अंकन होना था। पता नहीं क्या कारण था जो इतने बड़े एवं भव्य मंदिर में वह सिर्फ़ एक शिल्प अधूरा छोड़ कर चला गया।
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| कीर्तिमुख |
शिवालयों के अलंकरण में कीर्ति मुख का स्थान अनिवार्य माना जाता है। भगवान शिव के इस गण को मंदिरों में आवश्यक रुप से बनाया जाता है। कीर्तिमुख को शिव ने वरदान दिया था। मंदिर की भव्यता देखने के पश्चात लगा कि यदि इस मंदिर का अवलोकन हम नहीं करते तो मल्हार के विषय में काफ़ी कुछ जानने से वंचित रह जाते। मंदिर दर्शन के पश्चात हम बिलासपुर की ओर चल पड़े। …… इति मल्हार यात्रा कथा।
छत्तीसगढ़ का मधुबन धाम
छत्तीसगढ़ अंचल में फ़सल कटाई और मिंजाई के उपरांत मेलों का दौर शुरु हो जाता है। साल भर की हाड़ तोड़ मेहनत के पश्चात किसान मेलों एवं उत्सवों के मनोरंजन द्वारा आने वाले फ़सली मौसम के लिए उर्जा संचित करता है। छत्तीसगढ़ में महानदी के तीर राजिम एवं शिवरीनारायण जैसे बड़े मेले भरते हैं तो इन मेलों के सम्पन्न होने पर अन्य स्थानों पर छोटे मेले भी भरते हैं, जहाँ ग्रामीण आवश्यकता की सामग्री बिसाने के साथ-साथ खाई-खजानी, देवता-धामी दर्शन, पर्व स्नान, कथा एवं प्रवचन श्रवण के साथ मेलों में सगा सबंधियों एवं इष्ट मित्रों से मुलाकात भी करते है तथा सामाजिक बैठकों के द्वारा सामाजिक समस्याओं का समाधान करने का प्रयास होता है। इस तरह मेला संस्कृति का संवाहक बन जाता है और पीढी दर पीढी सतत रहता है।
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| मधुबन धाम का गुगल मैप |
कुछ स्थानों पर मेले स्वत: भरते हैं तो कुछ स्थानों पर ग्रामीणों के प्रयास से लघु रुप में प्रारंभ होकर विशालता ग्रहण कर लेते हैं। ऐसा ही एक स्थान छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले स्थित कुरुद तहसील अंतर्गत रांकाडीह ग्राम हैं। यहाँ 35 वर्षों से मधुबन धाम मेला फ़ाल्गुन शुक्ल पक्ष की तृतीया से एकादशी तक भरता है। मधुबन धाम रायपुर व्हाया नवापारा राजिम 61 किलोमीटर एवं रायपुर से व्हाया कुरुद मेघा होते हुए 69 किलोमीटर तथा ग्लोब पर 20040’4986” उत्तर एवं 81049’4262” पूर्व पर स्थित है।
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| मधुबन धाम का रास्ता और नाला |
मधुबन लगभग 20 हेक्टेयर भूमि पर फ़ैला हुआ है। इस स्थान पर महुआ के वृक्षों की भरमार होने के कारण मधुक वन से मधुबन नाम रुढ हुआ होगा। यह स्थान महानदी एवं पैरी सोंढूर के संगम स्थल राजिम से पहले नदियों के मध्य में स्थित है। राजिम कुंभ स्थल से हम नयापारा से भेंड्री, बड़ी करेली होते हुए मधुबन धाम पहुंचे। यहाँ पर छत्तीसगढ़ शासन द्वारा मेले के दौरान संतों के निवास के लिए संत निवास नामक विश्राम गृह बनाया हुआ है। आस पास के क्षेत्र में चूना से चिन्ह लगाए होने अर्थ निकला कि मेले की तैयारियाँ प्रारंभ हो गई हैं।
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| बोधन सिंह साहू खैरझिटी वाले |
विश्राम गृह का अवलोकन करने के पश्चात मेरी मुलाकात खैरझिटी निवासी 82 वर्षीय बोधन सिंह साहू से होती है। राम-राम जोहार के पश्चात उन्हें कुर्सी देने पर वे कहते हैं - 35 वर्षों से मैं मधुबन क्षेत्र में कुर्सी तख्त इत्यादि पर नहीं बैठता। भूमि पर ही बैठता हूँ और नंगे पैर ही चलता हूँ। ईश्वरीय कृपा से आज तक मेरे पैर में एक कांटा भी नहीं गड़ा है।" वे ईंट की मुंडेर पर बैठ जाते हैं और हमारी चर्चा शुरु हो जाती है। मेला जिस जमीन पर भरता है वह जमीन रांकाडीह गाँव की है। मेरे पूछने पर वो कहते हैं कि इस गाँव में कोई भी डीही नहीं है। जिसके कारण इस गांव का नाम रांकाडीह पड़ा हो।
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| संत निवास मधुबन धाम |
मेले के विषय में मेरे पूछने पर कहते हैं कि - " मेरा गांव खैरझिटी नाले के उस पार है। हमारे गांव में गृहस्थ संत चरणदास महंत रहते थे। वे तपस्वी एवं योगी थे। उनके मन आया कि मधुबन में मंदिर स्थापना होनी चाहिए, रांकाडीह के जमीदार से भूमि मांगने पर उसने इंकार कर दिया। इसके पश्चात वे घर लौट आए। एक दिन उनकी पत्नी ने चावल धो कर सुखाया था और गाय आकर खाने लगी। महंत ने गाय को नहीं भगाया और उसे चावल खाते हुए देखते रहे। यह दृश्य देखकर उनकी पत्नी आग बबूल होकर बोली - आगि लगे तोर भक्ति मा। तो महंत ने कहा कि - मोर भक्ति मा आगि झन लगा। मैं हं काली रात 12 बजे अपन धाम म चल दुहूँ। (मेरी भक्ति में आग मत लगा, मैं कल रात 12 बजे अपने धाम को चला जाऊंगा। अगले दिन रात 12 बजे बाद महंत ने बैठे हुए प्राणोत्सर्ग कर दिया। बात आई गई हो गई।
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| मधुबन धाम के मधुक वृक्ष |
बोधन सिंह आगे कहते हैं कि - पहले यह घना जंगल था तथा जंगल इतना घना था कि पेड़ों के बीच से 2 बैल एक साथ नहीं निकल सकते थे। महंत के जाने के बाद यहां पर कुछ लोगों को बहुत बड़ा लाल मुंह का वानर दिखाई दिया। वह मनुष्यों जैसे दो पैरों पर खड़ा दिखाई देता था। देखने वालों ने पहले उसे रामलीला की पोशाकधारी कोई वानर समझा, लेकिन वह असली का वानर था। उसके बाद हम सब गांव वालों ने इस घटना पर चर्चा की। खैरझिटी गाँव में अयोध्या से बृजमोहन दास संत पधारे। उन्होने यहाँ यज्ञ करने की इच्छा प्रकट की। हम सबने जाकर रांकाडीह के गौंटिया से यज्ञ में सहयोग करने का निवेदन किया तो उन्होने पूर्व की तरह नकार दिया। लेकिन हम सब ने जिद करके यहाँ यज्ञ करवाया जो 9 दिनों तक चला। तब से प्रति वर्ष यहाँ यज्ञ के साथ मेले का आयोजन हो रहा है।
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| मधुबन धाम के विभिन्न समाजों के मंदिर |
रांकाडीह निवासी शत्रुघ्न साहू बताते हैं कि "इस मेले में 11 ग्रामों खैरझिटी, अरौद, गिरौद, कमरौद, सांकरा, भोथीडीह, रांकाडीह, चारभाटा, कुंडेल, मोतिनपुर, बेलौदी के निवासी हिस्स लेते हैं। मेला स्थल पर विभिन्न समाजों के संगठनों ने निजी मंदिर एवं धर्मशाला बनाई हैं। साहू समाज का कर्मा मंदिर, देशहा सेन समाज का गणेश मंदिर, निषाद समाज का राम जानकी मंदिर, आदिवासी गोंड़ समाज का दुर्गा मंदिर, निर्मलकर धोबी समाज का शिव मंदिर, झेरिया यादव समाज का राधाकृष्ण मंदिर, कोसरिया यादव समाज का राधाकृष्ण मंदिर, लोहार समाज का विश्वकर्मा मंदिर, कंड़रा समाज का रामदरबार मंदिर, मोची समाज का रैदास मंदिर, कबीर समाज का कबीर मंदिर, गायत्री परिवार का गायत्री मंदिर, कंवर समाज का रामजानकी मंदिर, मधुबन धाम समिति द्वारा संचालित उमा महेश्वर एवं हनुमान मंदिर, लक्ष्मीनारायण साहू बेलौदी द्वारा निर्मित रामजानकी मंदिर, स्व: मस्त राम साहू द्वारा निर्मित हनुमान मंदिर स्थापित हैं।"
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| सरोवर में विराजे हैं भगवान कृष्ण |
मधुबन में मेला आयोजन के लिए मधुबन धाम समिति का निर्माण हुआ है, यही समिति विभिन्न उत्सवों का आयोजन करती है। फ़ाल्गुन मेला के साथ यहां पर चैत नवरात्रि एवं क्वांर नवरात्रि का नौ दिवसीय पर्व धूमधाम से मनाया जाता है तथा दीवाली के पश्चात प्रदेश स्तरीय सांस्कृति मातर उत्सव मनाया जाता है, जिसकी रौनक मेले जैसी ही होती है। चर्चा आगे बढने पर बोधन सिंह बताते हैं कि - मधुबन की मान्यता पांडव कालीन है, पाँच पांडव में से सहदेव राजा ग्राम कुंडेल में विराजते हैं और उनकी रानी सहदेई ग्राम बेलौदी में विराजित हैं, यहाँ से कुछ दूर पर महुआ के 7 पेड़ हैं , जिन्हें पचपेड़ी कहते हैं। इन पेड़ों को राजा रानी के विवाह अवसर पर आए हुए बजनिया (बाजा वाले) कहते हैं तथा मधुबन के सारे महुआ के वृक्षों को उनका बाराती माना जाता है।
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| हनुमान मंदिर एवं यज्ञ शाला |
ऐसी मान्यता भी है कि भगवान राम लंका विजय के लिए इसी मार्ग से होकर गए थे। इस स्थान को राम वन गमन मार्ग में महत्वपूर्ण माना जाता है। मेला क्षेत्र के विकास के लिए वर्तमान पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री अजय चंद्राकर ने अपने पूर्व विधायक काल विशेष सहयोग किया है। तभी इस स्थान पर शासकीय राशि से संत निवास का निर्माण संभव हुआ। मधुबन के समीप ही नाले पर साप्ताहिक बाजार भरता है। सड़क के एक तरफ़ शाक भाजी और दूसरी मछली की दुकान सजती है। होटल वाले ने बताया कि मेला के दिनों में यहां पर मांस, मछरी, अंडा, मदिरा आदि का विक्रय एवं सेवन कठोरता के साथ वर्जित रहता है। यह नियम समस्त ग्रामवासियों ने बनाया है। यदि कोई इस स्थान पर इनका सेवन करता है तो उसे बजरंग बली के कोप का भाजन बनना पड़ता और विक्रय करने वाले को पुलिस पकड़ लेती है।
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| शत्रुघ्न साहू मधुबन धाम समिति पदाधिकारी |
आस पास से सभी ग्राम साहू बाहुल्य हैं, गावों की कुल आबादी में 75% तेली जाति की हिस्सेदारी है। हम मंदिरों के चित्र लेते हैं, बाजार क्षेत्र में मेले में दुकान लगाने के लिए आबंटन होने से काफ़ी शोर गुल हो रहा था। हनुमान मंदिर एवं यज्ञ शाला के चित्र लेने के पश्चात हम तालाब में स्थित कालिया मर्दन करते हुए श्रीकृष्ण की प्रतिमा का चित्र लेते पहुंचते हैं, तभी वहाँ पर गायों का झुंड आ जाता है, इससे हमारी फ़ोटोग्राफ़ी में चार चाँद लग जाते हैं, कृष्ण प्रतिमा के पार्श्व में गायें चरती हुई दिखाई देती हैं। कृष्ण का गायों के साथ जन्म जन्म का संबंध है। इसलिए गायें भी अपनी भूमिका निभाने चली आती हैं। तालाब में पचरी बनाने का कार्य जारी है। मेले को देखते हुए तैयारियाँ युद्ध स्तर पर हो रही हैं। आगामी फ़ाल्गुन शुक्ल की तृतीया (3 मार्च) से एकादशी (11 मार्च) तक मेला सतत चलेगा। हम मधुबन की सैर करके वापस राजिम कुंभ होते हुए घर लौट आए।
नगाड़ों का सफ़र
वसंतागमन के साथ प्रकृति खिल उठती है, खेतों में रबी की फ़सल के बीच खड़े टेसू के वृक्ष फ़ूलों से लद जाते हैं, मानों प्रकृति धानी परिधान पहन कर टेसू के वन फ़ूलों से अपना श्रृंगार कर वसंत का स्वागत कर रही हो। टेसू के फ़ूलों से प्रकृति अपना श्रृंगार कर पूर्ण यौवन पर होती है तथा वातावरण में फ़ूलों की महक गमकते रहती है। पतझड़ का मौसम होने के कारण पहाड़ों पर टेसू के फ़ूल ऐसे दिखाई देते हैं जानो पहाड़ में आग लग गई हो। विरही नायिका के हृदय को भी अग्निदग्ध करने में यह ॠतू कोई कसर बाकी नहीं रखती। इसी समय होली का त्यौहार आता है और दूर कहीं नगाड़ों के बजने की मधुर ध्वनि सुनाई देती है। साथ ही होली के फ़ाग गीत वातावरण को मादक बनाने में सहायक होते हैं।
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| टेसू (शुक चंचु) के फ़ूल |
"अयोध्या में राम खेलैं होरी, जहाँ बाजे नगाड़ा दस जोड़ी" फ़ाग गीत के साथ नगाड़ों की धमक सांझ होते ही चहूं ओर सुनाई देती है। होली के त्यौहार का स्वरुप बदलते जा रहा है लेकिन गावों में परम्पराएं कायम हैं। नगाड़ा प्राचीन वाद्य है, जिसे दुदूम्भि, धौरा, भेरी, नक्कारा, नगाड़ा, नगारा, दमदमा इत्यादि नामों से भारत में जाना जाता है। छत्तीसगढ़ अंचल में विशेषकर नगाड़ा या नंगाड़ा कहा जाता है। संस्कृत की डम धातू का अर्थ ध्वनि होता है। इसलिए इसे दमदमा भी कहा जाता है। इसका अर्थ लगातार या मुसलसल होता है।
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| कोकड़ा |
शनिचरी बाजार में मेरी मुलाकात नगाड़ों की दुकान सजाए मन्नु लाल हठीले से होती है, नगाड़े बनाने एवं बेचने में इनकी उत्मार्ध बुधकुंवर भी हाथ बटाती दिखाई देती है। मन्नु लाल मिट्टी की हांडियों पर चमड़ा कसते हैं और बुधकुंवर चमड़े को विभिन्न रंगों से सजाती है। इनकी दुकान में 80 रुपए से लेकर 1200 रुपए तक के नगाड़े की जोड़ियाँ विक्रय के लिए रखी हुई हैं। पूछने पर बताते हैं कि इनका पैतृक घर डोंगरगढ में है। गत 20 वर्षों से ये नगाड़ा बनाने एवं बेचने का काम करते हैं। होली के अवसर पर विशेषकर नगाड़ों की बिक्री होती है। बाकी दिनों में जूता चप्पल बेचने का काम करते हैं।
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| मन्नु लाल हठीले एवं बुधकुंवर |
छत्तीसगढ़ अंचल में नगाड़े बनाने का काम विशेषत: चमड़े का व्यवसाय करने वाली मोची, मेहर और गाड़ा जातियाँ करती हैं। फ़ूलकुंवर कहती है कि पहले शादी के अवसर पर दफ़ड़ा एवं निशान बाजा बहुत बिकता था, परन्तु धुमाल बाजा आने के कारण इनकी बिक्री कम हो गई। दफ़ड़ा निशान बजाने वाले भी अब कम ही हैं। होली के बाद नगाड़ों की बिक्री पर विराम लग जाता है, महीनें में कोई एकाध जोड़ी नगाड़ा बिक्री होता है, वह भी कबूलना एवं बदना वाले लोग देवता-धामी मंदिर आदि में चढाने के लिए ले जाते हैं। कबुलना नगाड़े इन नगाड़ों से बड़े बनते हैं।
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| नगाड़ों पर कलमकारी |
नगाड़ा बनाने के लिए मिट्टी की हाँडी के साथ चमड़े का उपयोग होता है। मन्नु लाल बताते हैं कि नगाड़े की जोड़ी में दो सुर होते हैं, जिसे "गद" और "ठिन" कहते हैं। इसका निर्माण बैल या गाय के चमड़े से होता है। पशु के शीर्ष भाग का चमड़ा पतला होता है जिससे "ठिन" एवं पार्श्व भाग का चमड़ा मोटा होता है इससे "गद" नगाड़ा बनाया जाता है। हाँडी पर चमड़ा मढने के लिए भैंसे के चमड़े की रस्सियों उपयोग में लाई जाती हैं। तभी नगाड़ों से "गद" एवं "ठिन" की ध्वनि निकलती है। छोटा नगाड़ा बनाने के लिए बकरा-बकरी और अन्य जानवरों का चमड़ा उपयोग में लाया जाता है। इसे बजाने के लिए दो डंडियों का इस्तेमाल होता है जिन्हें स्थानीय बोली में "बठेना" कहा जाता है। नगाड़े की वास्तविक ध्वनि का आनंद गाय-बैल के चमड़े से मढे नगाड़े में ही आता है।
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| नगाड़े बजा कर "गद" एवं "ठिन" ध्वनि का परिक्षण |
मन्नुलाल कहते हैं कि होली के समय नगाड़े बेचकर 10 -15 हजार रुपए बचा लेते हैं। मंह्गाई बहुत बढ गई है, कच्चे माल का मूल्य भी आसमान छू रहा है। पहले एक ट्रक माल लेकर आते थे, वर्तमान में एक मेटाडोर ही नगाड़े लेकर आए हैं, किराया भी बहुत बढ गया। साथ ही रमन सरकार की तारीफ़ करते हुए कहते हैं कि राशन कार्ड में चावल, गेहूं, नमक, चना इत्यादि मिलने से गुजर-बसर अच्छे से चल रहा है। वरना जीवन भी बहुत कठिनाईयों से चलता था। इसी बीच फ़ूलकुंवर कहती है कि उनका स्मार्ट कार्ड नहीं बना है, आधार कार्ड बन गया है। इतना कहकर वह चूल्हे पर भोजन बनाने की तैयारी करने लगती है।
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| नगाड़े संवारती बुध कुंवर |
इतिहास से ज्ञात होता है कि नगाड़ा प्राचीन संदेश प्रणाली का महत्वपूर्ण यंत्र माना जाता है। इसके माध्यम से एक स्थान से दूसरे स्थान तक संदेश शीघ्र ही पहुंचाया जाता था एवं नगाड़ा का प्रयोग सूचना देने में किया जाता था। जब किसी सरकारी आदेश को जनता तक प्रसारित करना होता था तो नगाड़ा बजाकर संदेश सुनाया जाता था। युद्ध काल में सेना के प्रस्थान के समय नगाड़े बजाए जाते थे, मुगलों के दरबार में फ़ैसले नगाड़ा बजा कर सुनाए जाते थे तथा किसी की जायदाद कुर्की करने की सूचना देने का कार्य भी नगाड़ा बजा कर किया जाता था।
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| पतझड़ का मौसम खड़ुवा के जंगल में |
वर्तमान में नगाड़ा मंदिरों में आरती के समय बजाया जाता है या फ़िर होली के अवसर पर बजाया जाता है। छत्तीसगढ़ अंचल में सामूहिक होलिका दहन स्थल पर फ़ाग गीतों के साथ इसका उपयोग किया जाता है। नगाड़ा बजता है तो गायक का उत्साहवर्धन होता है और सुर ताल बैठने पर फ़ाग गीत रात के सन्नाटे को चीरते हुए दूर तक सुनाई देते हैं। नगाड़ों की ध्वनि के साथ वसंत का रंग सारे वातावरण पर छा जाता है। होली समीप है और नगाड़ों की ध्वनि मन को मोह रही है। आस पास बजते नगाड़े का होली का स्वागत कर रहे हैं …… डम डम डम डम डमक डम डम…………
(डिस्क्लैमर - सभी चित्र एवं लेखन सामग्री लेखक की निजी संपत्ति हैं, इनका बिना अनुमति उपयोग करना कापीराईट के अधीन अपराध माना जाएगा। अनुमति के लिए shilpkarr@gmail.com पर सम्पर्क करें।)
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सरगुजा का रामगिरि
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिला मुख्यालय से 50 किलो मीटर की दूरी पर बिलासपुर सड़क मार्ग पर उदयपुर से दक्षिण में रामगढ़ पर्वत स्थित है। दण्डकारण्य के प्रवेश द्वार स्थिति समुद्र तल से 3,202 फ़ीट की ऊंचाई पर अद्वितीय प्राकृतिक वैभव के साथ प्राचीन इतिहास एवं संस्कृति को अपने आप में संजोए यह सदियों से अटल है। यहाँ घने शीतल छायादार वृक्षों की शीतलता से युक्त विश्व का चिरंतन नाट्य तीर्थ "शैलगुहाकार नाट्यमण्डप" का एकमात्र जीवंत अवशेष है। यहीं रामायण कालीन ॠषि शरभंग का आश्रम माना गया है। यहां सीता बेंगरा एवं जोगी मारा नामक प्राचीन गुफ़ाए हैं। भगवान रामचंद्र के वनवास का कुछ काल माता सीता के साथ रामगढ़ पर्वत की गुफ़ा में निवास करने के कारण उत्तरी गुफ़ा को सीता बेंगरा का नाम दिया गया।
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| रामगढ़ पर मेघदूत |
कविकुलगुरु महाकवि कालिदास ने यहीं मेघदूत की रचना की थी। दक्षिणी गुफ़ा जोगीमारा में मेघदूत का यक्ष निर्वासित था। जोगी मारा गुफ़ा में भित्तिचित्रों के प्राचीन प्रमाण उत्कीर्ण हैं। विद्वान इनका काल ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी मानते हैं। ये भित्ती चित्र अजंता एलोरा की गुफ़ाओं में उत्कीर्ण भित्तीचित्रों जैसे ही हैं जो यहाँ की प्राचीन सांस्कृतिक सम्पन्नता के प्रतीक हैं। कोरिया राज्य के दीवान रघुवीर प्रसाद द्वारा रचित झारखंड झंकार नामक पुस्तक में उल्लेख है कि रकसेल राजवंश के विष्णु प्रताप सिंह ने रामगढ़ में एक किले का निर्माण किया तथा यहां पर 35 वर्षों तक राज किया।
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| हाथी खोल |
रामगढ़ पर्वत में गुफ़ाओं तक पहुचने के लिए हाथीपोल नामक सुरंग है। यह सुरंग 180 फ़ीट लम्बी एवं प्राकृतिक होने के साथ इतनी ऊंची है कि हाथी भी इसमें से सरलता प्रवेश कर सकता है। दोनों ही गुफ़ाओं में दूसरी शती ईसा पूर्व के अभिलेख उत्कीर्ण हैं। जिसमें से सीता बेंगरा प्राचीन नाटयशाला है। कर्नल ओसले ने सन् 1843 में तथा जर्मन विद्वान डॉ ब्लॉख ने इसे 1904 में जर्मन जर्नल में प्रकाशित किया था। इसके पश्चात डॉ बर्जेस ने इंडियन एंटीक्वेरी में इसको विस्तार से वर्णित किया।
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| सीता बेंगरा (प्राचीन नाट्य शाला) |
प्राचीन काल में सीता बेंगरा गुफ़ा पर्वत काट कर बनाई गई है। 44 फ़ीट लम्बी और 15 फ़ीट चौड़ी सीता बेंगरा गुफ़ा के प्रवेश द्वार के समीप दाहिनी ओर श्री राम चरण चिन्ह उत्कीर्ण हैं। इसके मुख्यद्वार के समक्ष शिलानिर्मित चंद्राकार सोपान जैसी बाहर की ओर संयोजित पीठिकाएं है। प्रवेश द्वार के समीप भूमि में खम्भे गाड़ने के लिए दो छिद्र् बनाए गए हैं। इस गुफ़ा का प्रवेश द्वार पश्चिम की ओर है एवं पूर्व में पहाड़ी है। विद्वानों कि अवधारणा है कि भारतीय नाट्य के इस आदिमंच के आधार पर ही भरतमुनि ने अपने ग्रंथ में गुफ़ाकृति नाट्यमंडप को स्थान दिया होगा- कार्य: शैलगुहाकारो द्विभूमिर्नाट्यमण्डप:।
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| रामगढ़ पर्वत की चढाई |
इसी गुफ़ा के प्रवेश करने पर बाएं तरफ़ मागधी भाषा में 3 फ़ीट 8 इंच के दो पंक्तियों के लेख से इस स्थान पर राष्ट्रीय स्तर के कवि सम्मेलन होना पहला शिलालेखिय प्रमाण माना जाता है। प्रो व्ही के परांजपे की "ए फ़्रेश लाईट ऑन मेघदूत के अनुसार यह शिलालेख निम्नानुसार है "आदि पयंति हृदयं सभावगरु कवयो ये रातयं… दुले वसंतिया! हसवानुभूते कुद स्पीतं एवं अलगेति" अर्थात हृदय को आलोकित करते हैं। स्वभाव से महान ऐसे कविगण रात्रि में… वासंती दूर है। संवेदित क्षणों में कुंद पुष्पों की मोटी माला को हि आलिंगित करता है।
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| जोगी मारा गुफ़ा का प्रसिद्ध लेख |
जोगीमारा गुफ़ा में मौर्यब्राह्मी लिपि में शिलालेख अंकित है जिससे सुतनुका तथा उसके प्रेमी देवदत्त के बारे में पता चलता है। जोगीमारा गुफ़ा की उत्तरी भित्ती पर उत्कीर्ण पांच पंक्तियाँ है - शुतनुक नम। देवदार्शक्यि। शुतनुकम। देवदार्शक्यि। तं कमयिथ वलन शेये। देवदिने नम। लुपदखे। अर्थात सुतनुका नाम की देवदासी (के विषय में) सुतनुका नाम की देवदासी को प्रेमासक्त किया। वरुण के उपासक(बनारस निवासी) श्रेष्ठ देवदीन नाम के रुपदक्ष ने। इससे प्रतीत होता है कि जोगीमारा गुफ़ा की नायिका सुतनुका है। आचार्य कृष्णदत्त वाजपेयी के अनुसार भित्तिलेख से यह ध्वनि निकलती है कि सुतनुका नाम की नर्तकी थी, जिसके लिए देवदासी एवं रुपदर्शिका इन दो शब्दों का प्रयोग किया गया है। इसके प्रेमी का नाम देवदत्त था। संभवत: देवदत्त द्वारा गुफ़ाओं में उक्त लेख अंकित कराए गए, ताकि उस स्थान पर उसकी नाट्य-प्रिया सुतनुका का नाम अजर-अमर हो जाए।
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| गुहा शैल चित्र जोगीमारा गुफ़ा |
जोगीमारा गुफ़ा में यक्ष का निवास था। यहाँ प्राकृतिक रंगों से उत्कीर्ण चित्रकला ऐतिहासिक महत्व रखती है। यक्ष के इस प्रवास कक्ष में प्राचीनतम भित्तीचित्र आज भी प्राचीन कला एवं संस्कृति का स्मरण कराते हैं। एक ओर पुष्पों एवं पल्लव तोरणों की पृष्ठ भूमि में तीन अश्वों से खींचा जाता रथ है और दूसरी ओर रंग बिरंगी मछलियाँ चित्रित हैं। मानवीय आकृतियों के साथ सामुहिक नृत्य संगीत के साथ उत्सव मनाते हुए लाल, काले एवं सफ़ेद रंग से रेखांकित चित्र जोगीमारा गुफ़ा में जीवंत दिखाई देते हैं। इन चित्रों को विद्वानों ने ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी का माना है। डॉ हीरालाल इन भित्तीचित्रों को बौद्ध धर्म से संबंधित मानते हैं तथा रायकृष्णदास इन्हे जैन धर्म से संबंधित कहते हैं क्योंकि पद्मासन में एक व्यक्ति की आकृति चित्रित है एवं इन्हे कलिंग नरेश खारवेल का बनवाया मानते हैं। जैन मुनि कांति सागर ने इस गुफ़ा के कुछ चित्रों का विषय जैन धर्म से संबंधित माना है। इन चित्रों में इतिहास समाया हुआ है। आवश्यकता है सिर्फ़ उसे पढने, जानने एवं समझने की।
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| रामगढ में उपेन्द्र दुबे, अमित सिंह देव और ब्लॉगर ललित शर्मा |
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| रामगढ़ पर्वत के शिखर पर स्थित मंदिर में सीता, लक्ष्मण, हनुमान एवं राम विग्रह |
"संस्कृत साहित्य में सरगुजा" लेख में वे अपनी बात को वाल्मीकि रामायण के उद्धरण से और स्पष्ट करते हैं " सरगुजा के प्रशांत, प्रकृति वातावरण ने प्राचीन समय में महर्षि शरभंग के प्रामुख्य में अवस्थित ॠषि कुल को जीवन दिया है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार शरभंग आश्रम ब्रह्मभवन की भांति ऊंचा तथा वेद मंत्रों से अनुकुंचित रहता था। यहाँ प्रतिदिन पूजा एवं नृत्य-संगीत अप्सराएं किया करती थी -पूजितं चोपनृत्तंच नित्यमप्सरसां गणैं:, तद ब्रह्मभवन-प्रख्यं ब्रह्म घोषनिनादितम्।
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| प्राचीन नाट्य शाला में श्री राम चरण चिन्ह |
डॉ भास्कराचार्य जी “रघुपतिपदैरकिंतं मेखलासु” में कहते हैं कि मुक्ति प्रदाता दण्डकारण्य के प्रवेशद्वार पर आज भी त्रेतायुगीन नाट्य शाला अवस्थित है, जिसके समक्ष श्रीराम क पदार्पण होते ही शरभंग आश्रम के कुशल शिल्पियों ने दिवय चरण-चिन्ह छेनियों से उट्टंकित कर सदा के लिए संजो लिए होगें। इन चरण चिन्हों की आराधनाअ से दो हजार वर्ष पूर्व महाकवि कालिदास की काव्य प्रतिभा परवान चढी होगी, तभी रामगिरि की पहचान बताते हुए उन्होने मेघदूत के बारहवें पद्य में कहा है -आपृच्छस्व प्रियसखममुं तुंगमालिंग्य शैलम वन्द्यै: पुंसां रघुपतिपदैरकिंतं मेखलासु। काले काले भवति भवतो यस्य संयोगमेत्य स्नेहव्यक्तिश्चिरविरहजं मुच्ञ्तो वाष्पमुष्णम्। सीता बेंगरा गुफ़ा में श्रीराम के पदचिन्हों के अंकित होने को स्पष्ट रुप से प्रदर्शित किया है। यक्ष मेघ से कहता है कि मेरे मित्र समय-समय पर इस पर्वत पर आते हो मुझे लगता है जितने दिन अलग रहते हो, उन्ही की याद करके पानी की शक्ल में गरम-गरम आँसू गिराया करते हो।
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| रामगढ़ पर्वत पर स्थित मंदिर |
इस आश्रम का तालमेल रामगढ़ में ही दिखाई देता है। जहाँ सात द्वारों से निर्मित विशाल मंदिर के भग्नावशेष अभी भी शिलालेख के माध्यम से सुतनुका देवदासी का नृत्य सुनाया करते हैं। पास ही थार पर्वत से निकल कर मांड नदी प्रवाहित होती है, जिसका किनारा लेकर राम शरभंग के निर्देशन में आगे बढ़े थे। विद्वानों का मत है कि रामगढ़ की गुफ़ाओं में रहकर ही कालीदास ने मेघदूत की रचना की थी। कालिदास ने अपने मेघदूत में रामगढ़ को रामगिरि कहा है। “वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयम” पूर्वमेघ-2 में रामगिरि पर्वत का शिखर विन्यास वप्र क्रीडा करते हुए हाथी जैसा बताया गया है। इससे प्रतीत होता है कि महाकवि कालिदास ने रामगढ से ही मेघदूत की रचना की थी। प्रो परांजपे आदि विद्वानों ने भी यही माना है।
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| “वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयम" रामगिरि पर्वत |
मेघदूत के प्रमाणों का सत्यापन करने के पश्चात विद्वानों ने रामगढ़ पर्वत को ही रामगिरि चिन्हित किया है। इससे सिद्ध होता है कि कालिदास का रामगिरि से गहरा नाता है। यहीं यक्ष ने निवास कर प्रिया को प्रेम का संदेश भेजा था। शरभंग ॠषि का आश्रम एवं भगवान राम एवं सीता का वनवास के दौरान दण्डकारण्य के इस प्रवेश द्वार रामगढ़ में निवास करना इसे त्रेतायुग के साथ जोड़ता है। विश्व की प्राचीन नाट्यशाला हमें संस्कृति की पहचान कराती है तो सीताबेंगरा का शिलालेख राष्ट्रीय स्तर के कवि सम्मेलन का प्रमाण देता है।
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| ब्लॉगर ललित शर्मा एवं सांध्य दैनिक छत्तिसगढ़ के संवाददाता मुन्ना पांडे |
जोगीमारा गुफ़ा में उत्कीर्ण शिलालेख से रुपदर्शिका नर्तकी सुतनुका एवं रुपदक्ष देवीदत्त की शहस्त्राब्दियों पुरानी प्रेम कहानी से परिचय होता है। जोगीमारा की गुफ़ा में अंकित भित्तीचित्र बौद्ध एवं जैन धर्म के साथ रामगढ़ का संबंध प्रदर्शित करते हैं तो सरगुजा राज्य में स्थापित रकसेल राजवंश के प्रथम शासक द्वारा रामगढ़ पर्वत पर किला बनाकर 35 वर्षों तक राज करना भी बताते हैं। यह रामगढ़ का ज्ञात इतिहास है। अभी रामगढ़ परिक्षेत्र में अनेकों ऐसे ऐतिहासिक स्थल होगें जो अज्ञात हैं। रामगढ़ का ऐतिहासिक महत्व किसी भी अन्य स्थान से कम प्रतीत नहीं होता है।
































































































































































































































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