हम हिन्दुस्तानी चले भूटान
हमारा विशाल भारत देश विश्व के किसी अन्य देश की तुलना में इक्कीस ही बैठता है, यहाँ बारहों महीने सभी मौसम मिल जाएगें, कहीं बारिश तो कहीं सूखा तो कहीं हरियाली से आच्छादित भू प्रदेश। सड़कों पर तफ़री करते बादल यहाँ भी मिलते हैं। शायद ही कोई पर्यटन का शौकीन ऐसा होगा जिसमें पूरा भारत घूम लिया होगा। फ़िर भी लोगों की इच्छा एक बार विदेश यात्रा करने की होती है। अगर वे भारत के एक-एक प्रांत की घुमक्कड़ी विदेश समझ कर ही कर लें तो उन्हें बहुत कुछ जानकारी एवं आनंद मिल जाएगा। परन्तु वे तो सिर्फ़ विदेश घूमना चाहते हैं।
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| भूटान की वादियां |
हमारे कई मित्र विदेश घूमना चाहते थे। पर समस्या पासपोर्ट एवं वीजा की आती है। पहले पासपोर्ट बनवाना पड़ता है फ़िर संबंधित देश से वीजा (अनुमति) लेनी पड़ती है। परन्तु कुछ ऐसे देश हैं, जहाँ भारतीयों के लिए पासपोर्ट की आवश्यकता नहीं होती। जिनमें से भूटान एवं नेपाल हैं। नेपाल में राजनैतिक उथल पुथल के साथ सांस्कृतिक प्रदूषण भी बहुत अधिक हो चुका है। वहां कब हड़ताल हो जाए और कब मार्ग बंद हो जाए, जिसमें पर्यटक फ़ंस जाएँ, पता नहीं चलता। इसलिए घुमक्कड़ी के लिए भूटान को ही प्रथम वरीयता देना चाहता हूँ। वैसे तो गत वर्ष हमने भूटान की सैर की थी, परन्तु समयावधि कम थी, सिर्फ़ सड़कें नापना ही हुआ।
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| भूटान की वादियां |
इस वर्ष मित्रों से चर्चा करके अप्रेल के प्रथम सप्ताह में भूटान घुमक्कड़ी का कार्यक्रम बनाया गया और इसे "हम हिन्दुस्तानी सम्मेलन" का नाम दिया गया। इसकी तैयारी हमने अक्टुबर माह से ही प्रारंभ कर दी थी। टूर आपरेटर से चर्चा होने के पश्चात एडवांस परमिट का फ़ार्म भी भरवाना प्रारंभ कर दिया था। एडवांस परमिट लेने से काफ़ी सुविधा हो जाती है और समय खराब नहीं होता। ज्यों ज्यों यात्रा का समय समीप आ रहा था त्यों त्यों अफ़रातफ़री मचती जा रही थी। कोई फ़ार्म भरने के बाद भी समस्या बता कर हाथ झाड़ रहे थे। कोई नए लोग जुड़ते जा रहे थे। हमसे समय चयन में थोड़ी गलती हो गई थी। मार्च का अंतिम सप्ताह एवं अप्रेल का प्रथम सप्ताह भारत में लेखा वर्ष का अंतिम समय होने के कारण काफ़ी व्यस्त रहता है। इसलिए बहुत सारे मित्र इस कार्यक्रम में नहीं जा पाए।
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| भूटान की वादियां |
मुंबई से रायपुर होते हुए "कर्म भूमि एक्सप्रेस" गोहाटी जाती है। जो हमें सीधे हासीमारा पहुंचाती देती है। जिससे कलकत्ता रुक कर अगली यात्रा के लिए दिन भर का समय खर्च करने की बचत हो जाती है। इसलिए हम सब ने जहां तक हो सका कर्मभूमि एक्सप्रेस की टिकिट ही बनवाई थी। हमारी भूटान यात्रा छ: दिन की थी। इससे अधिक दिन का परमिट भूटान सरकार पर्यटकों को नहीं देती तथा वह पर्यटकों के लिए सीमित परमिट ही साल भर में देती है। ऐसा नहीं है कि कोई भी जब भी आ जाए, उसे परमिट दे दिया जाए। भूटान के राजा अपने देश में किसी तरह का प्रदूषण फ़ैलने नहीं देना चाहते। चाहे वह सांस्कृतिक हो या पर्यवर्णीय प्रदूषण हो। भूटान यात्रा से पहले मैं और पाबला जी दक्षिण की यात्रा कर आए थे। इस बीच तैयारी करने के लिए थोड़ा ही समय बचा था।
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| भूटान की वादियां |
हम कुल 21 लोग हो रहे थे, जिसके लिए सारी व्यवस्था कर ली गई थी। कलकत्ता से हमारी कैटरिंग सर्विस भी जा रही थी। जो हमें भूटान में खाना बनाकर खिलाएगी। कर्मभूमि एक्सप्रेस 31 मार्च को रायपुर से सुबह 6 बजे थी। छोटा भाई मुझे सुबह जल्दी स्टेशन पहुंचा आया था। यहाँ से नवीन तिवारी जी, पथिक तारक जी सपत्नी, ललित वर्मा जी, टीकाराम वर्मा जी एवं मैं ट्रेन में सवार हुए। अकलतरा से अजय खंडेलिया जी को बिलासपुर आकर ट्रेन में चढना था, सुबह मैने कई बार फ़ोन लगाया लेकिन उन्होने नहीं उठाया।
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| आत्मकथा के लेखक द्वारिका प्रसाद अग्रवाल जी |
बिलासपुर से द्वारिका प्रसाद जी सपत्नी एवं नातिन, राजेश अग्रवाल जी ट्रेन में चढे, पर अजय खंडेलिया जी नहीं आए। रायगढ से प्रकाश यादव जी को छुट्टी नहीं मिली एवं अंतिम समय गिरीश बिल्लौरे जी एवं बैकुंठपुर से चंद्रकांत पारगीर जी ने आवश्यकर कारण बताते हुए मना कर दिया। इस तरह हमारे चार यात्री यहीं कम हो गए। हमारी टोली के राजेश सेहरावत जी पहले पहुंच चुके थे। द्वारिका प्रसाद जी के साले, सलहज, अंकित मिश्रा एवं हेमंत पाणिग्रही को हासीमारा में तथा बिकास शर्मा को न्यू जलपाई गुड़ी में मिलना था।
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| हासीमारा स्टेशन |
हम एक अप्रेल को सुबह साढे नौ बजे न्यु जलपाईगुड़ी पहुंचे, यहां बिकास शर्मा मिल गए। आगे चलकर दस बजे करीब राजेश सेहरावत भी पहुंच गए। हमारी ट्रेन विलंब से चल रही थी। हम लगभग पौने दो बजे हासीमारा स्टेशन पर पहुंचे। अंकित और हेमंत यहां नही पहुंच पाए थे। यहां से जयगांव होते हुए भूटान की सीमा आधे घंटे की दूरी पर है। चार गाड़ियों में सवार होकर हम पन्द्रह लोग फ़ुंसलिंग की ओर चल पड़े। हमें जाने की जल्दी इसलिए थी कि द्वारिका प्रसाद जी नातिन एवं उनके साले, सलहज का वीजा ऑन एरायवल बनवाना था। यह ऑफ़िस चार बजे बंद हो जाता है। फ़ुंसलिंग पहुंच कर सीमा पर स्थित ऑफ़िस में द्वारिका प्रसाद जी एवं उनके परिवार को छोड़ कर हम होटल मिडटाऊन पहुंच गए।
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| सीमा पर भूटान गेट |
यह फ़ुंसलिंग का एकमात्र स्विमिंग पुल वाला तीन मंजिला होटल है। यहां हमारा स्वागत होटल की परिचारिकाओं ने फ़ूल एवं रोली से किया। होटल वालों ने सभी को उनके कमरे बांट दिए गए। ऊपर की मंजिल में पांच लोगों के रहने के लिए सुईट जैसा था वह द्वारिका प्रसाद जी को दे दिया गया। सभी लोग स्नानादि दैनिक क्रिया में लग गए और मैं अपने रुम में आ गया। उसके बाद सिलीगुड़ी से अंकित का फ़ोन आया कि कहां पहुंचना है, उसे पता बताया गया। उन लोग भी शाम सात बजे तक होटल पहुंच गए। तब तक द्वारिका प्रसाद जी भी परमिट की व्यवस्था कर लौट आए। होटल पहुंच कर मैने देखा कि चश्मा ही गायब है, हासीमारा से आते समय कहीं गिर गया। मेरी समस्या को देखते हुए द्वारिका प्रसाद जी ने अपना चश्मा दिया, उसके बाद मैने सारा भूटान उनके चश्मे से ही देखा।
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| फ़ुंतशोलिन का होटल (फ़ाईल फ़ोटो) |
उन्होने मुझसे ऊपर के कमरे की शिकायत की। उनकी श्रीमती जी की बायपास सर्जरी हुई है, इसलिए सीढियाँ चढने में तकलीफ़ का होना बताया। अब सभी लोग अपने कमरे में शिफ़्ट हो चुके थे, इसलिए नई व्यवस्था करना संभव नहीं था। यहां सिर भोजन करके एक रात गुजारना था। इसलिए आगे से नीचे का कमरा देने की बात कही। टीकाराम वर्मा भी शिकायत करने लगे कि उनसे ऊपर के कमरे लिए सीढियाँ चढने में तकलीफ़ होती है। आगे चलकर इनकी समस्याओं का समाधान हो सकता था। आज तो किसी हालत में संभव नहीं था।
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| होटल से तारसा नदी |
हम कुल सत्रह लोग थे, टूर आपरेटर ने सामिष एवं निरामिष खाने वालों के बारे में पूछा तो मैने कह दिया कि दोनो तरह का भोजन आधा-आधा तैयार करवा लो। जो-जो निरामिष में चम्मच डालेगा, वह नोट कर लेना और अगले दिन से उतने लोगों के लिए निरामिष एवं सामिष भोजन बना लेना। वैसे भी मुझे लग रहा था कि सिर्फ़ दो-चार लोग ही निरामिष खाने वाले थे। नीचे डायनिंग हॉल में खाना बनकर तैयार था। सभी डायनिंग हॉल में आ गए। भोजन प्रारंभ हुआ, निरामिष खाने वालों की संख्या हमारी सोच से दुगने से भी अधिक निकली। आंकड़ा दस से अधिक पार कर गया। अब कैटरिंग वाले को भी आंकड़ा मिल गया था।
फ़ुंतशोलीन से थिम्पू की रोमांचक यात्रा
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दो अप्रेल की सुबह का कार्यक्रम टूर आपरेटर ने रात को ही बता दिया। सुबह का नाश्ता स्विमिंग पुल के किनारे हुआ। सभी ने अपना सामान पैक करके बस में चढा दिया। हमें क्रोकोडायल पार्क एवं कारबंदी मठ फ़ुंतशोलिन (फ़ुंशलिंग) में देखना था। होटल से साढे आठ बजे निकले, बस में डीजल डलवाते हुए साढे नौ बजे क्रोकोडायल पार्क पहुंचे। यहां देखने के लिए पचास रुपए की टिकिट लगाई हुई है। वैसे कुछ खास नहीं है, इतने मगरमच्छ तो हमारे यहां नदियों में घूमते रहते हैं। कोटमी सोनार के तालाब में ही दो तीन सौ होंगे। यहां घड़ियाल एवं मगरमच्छ दोनों का संरक्षण किया जा रहा है। सभी लोग क्रोकोडायल पार्क से जल्दी ही निकल आए।
दो अप्रेल की सुबह का कार्यक्रम टूर आपरेटर ने रात को ही बता दिया। सुबह का नाश्ता स्विमिंग पुल के किनारे हुआ। सभी ने अपना सामान पैक करके बस में चढा दिया। हमें क्रोकोडायल पार्क एवं कारबंदी मठ फ़ुंतशोलिन (फ़ुंशलिंग) में देखना था। होटल से साढे आठ बजे निकले, बस में डीजल डलवाते हुए साढे नौ बजे क्रोकोडायल पार्क पहुंचे। यहां देखने के लिए पचास रुपए की टिकिट लगाई हुई है। वैसे कुछ खास नहीं है, इतने मगरमच्छ तो हमारे यहां नदियों में घूमते रहते हैं। कोटमी सोनार के तालाब में ही दो तीन सौ होंगे। यहां घड़ियाल एवं मगरमच्छ दोनों का संरक्षण किया जा रहा है। सभी लोग क्रोकोडायल पार्क से जल्दी ही निकल आए।
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| हम हिन्दुस्तानी दल का फ़ुंतशोलिन से थिम्पू की ओर प्रस्तान |
क्रोकोडायल पार्क से हम थिम्पू की ओर चल पड़े। फ़ुंतशोलिन (Phuentsholing) से ही चढाई प्रारंभ हो जाती है। अब हमको लगातार ऊपर पहाड़ों पर ही चलना होगा। एक भी स्थान ऐसा नहीं है, जहां मैदान हो। यह भारत के पश्चिम बंगाल के जयगाँव का सीमावर्ती कस्बा है। यह सड़क मार्ग से भूटान का प्रवेश द्वार है, यहीं रायल भूटान का इमिग्रेशन दफ़्तर है, जहाँ से भारतीयों के लिए परमिट एवं विदेशियों के लिए वीजा दिए जाते हैं। यहाँ कारबंदी मोनेस्ट्री है। नगर में ही थोड़ी दूर पर ऊंचाई पर स्थित इस मठ से भारतीय सीमा के जयगांव और तुरसा नदी का हवाई दृश्य देखा जा सकता है।
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| क्रोकोडायल पार्क के बाहर चर्चा |
इस मठ में उष्णकटिबंधीय पौधे लगे हुए हैं, जिनके सुंदर फ़ूलों से बगीचा भरा रहता है। इसका निर्माण राजमाता आशी फ़ुंसो चोदेन ने 1967 में कराया था। यहां वे सर्दियों के मौसम में निवास करती थी। उनका एक घर भी पहाड़ी पर बना हुआ है। यह मठ 400 मीटर की ऊंचाई पर निर्मित है। यहां से पहाड़ियों एवं नदी की सुंदर दृश्यावली दिखाई देती है। यहाँ 5 तिब्बती शैली के स्तूप बनाए गए हैं। इस मठ में शाक्य मुनि बुद्ध, गवांग नामग्याला एवं गुरु रिनपोछे की प्रतिमा स्थापित है।
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| कारबंदी मठ फ़ुंतशोलीन |
जनश्रुति हैं कि एक बार किसी नि:संतान भारतीय जोड़े ने आकर इस मठ के दर्शन किए और उन्होंने संतान प्राप्ति की कामना से पूजा की। उसके पश्चात उन्हे संतान की प्राप्ति हुई। इसके बाद से यहाँ संतान प्राप्ति की आस लिए नि:संतान जोड़े लगातार आते हैं और संतान प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। इस मठ में संतान प्राप्ति के उद्देश्य से नियमित आने वालों की संख्या बहुत अधिक है। भारत का सीमावर्ती नगर होने के कारण इस मंदिर तक पहुंचने के लिए किसी परमिट की आवश्यकता नहीं है, लोग इस मठ तक बेरोक टोक आ सकते हैं।
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| नजारों को कैद करने की जद्दोजहद |
कारबंदी मठ की ऊंचाई पर पहुंचने के बाद जयगांव एवं नदी का सुंदर दृश्य दिखाई देता है। यहां पहुंच कर सभी लोगों के कैमरे खुल गए और तड़ातड़ चलने लगे। पर्यटकों का काम ही यही है, जो स्थान सुंदर दिखे उसे कैमरे में कैद कर लो। पहले तो किसी एकाध के पास कैमरा होता था, अब तो हर हाथ में है। जितनी चाहे उतनी फ़ोटो खींच लो। मठ का मुख्य द्वार इस समय बंद था। फ़िर भी हम सबको यहां एक घंटा लग ही गया। यहां से अब हमें सिर्फ़ दोपहर के भोजन के लिए ही रुकना था। रास्ते में राजेश अग्रवाल जी ने गाने सुनाए, हम हिन्दुस्तानी गाने में तो मजा ही आ गया। द्वारिका प्रसाद जी भी कम रंगीले नहीं है, उन्होंने भी कुछ गाने सुनाए, इस तरह सफ़र चलता रहा।
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| कारबंदी मठ से भारत के जय गाँव नगर का दृश्य |
भूटान में गंदगी फ़ैलाने पर सख्ती से पाबंदी है। आप कहीं भी खाकर कुछ भी फ़ेंक नहीं सकते। बस में भी कूड़ादानी की व्यवस्था की हुई थी। जयगांव से भारत और भूटान के बीच में तुरसा नदी सीमा रेखा बनी हुई, यह भूटान से निकल कर भारत की ओर बढती है यहीं से दोनो राष्ट्र अपनी सीमाओं में विभाजित हो जाते हैं। भूटान की सीमा पर बसा हुआ कस्बा फ़ुंसलिंग है। यहीं से थिम्पू की ओर आगे बढ़ने पर पहाड़ियां प्रारंभ हो जाती हैं, जिनका अंत नजर नहीं आता।
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| गेदू में सड़क पर तफ़री करते बादल |
फ़ुंसलिंग से भारत को थिम्पू जोड़ता हुआ सड़क मार्ग 170 किमी का है। दूरी तो मात्र 170 किमी दिखाई देती है, परन्तु सड़क मार्ग की यात्रा कितनी कठिन होती है, यहीं आकर पता चलता है। यह दूरी लगभग 6 से 7 घंटे में पूरी की जाती है, वो भी अगर कुशल चालक हो तब। अन्यथा नया व्यक्ति तो कहीं न कहीं घाटी में गाड़ी गिरा बैठेगा। फ़ुंसलिंग से आगे बढने पर एक घंटे की ड्राईव के बाद गेदू नामक बस्ती आती है।
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| बादलों के बीच गर्मागर्म चाय का एक कप सुमंत बसु के साथ |
यहाँ पर बादल सड़क पर टहलते मिल जाते हैं और बादलों की धुंध में दृश्यता 5 से 10 फ़ुट ही रह जाती है। इस स्थान पर घाटी 3 हजार मीटर गहरी है। बिना किसी हार्न की चिल्ल पों के ड्रायवर इस स्थान को पार कर लेता है। यह रास्ता इतना खतरनाक है कि अगर धोखे से सड़क की पटरी से एक कदम भी बाहर रख दिया तो स्वर्गवासी होने में देर नहीं लगेगी और बॉडी भी नहीं मिलेगी। यहां हमने गाड़ी रोक कर चाय पी। भूटान सरकार ने स्थानीय निवासियों के लिए सड़क पर गुमटी बना कर दे रखी हैं, वे इसमें अपनी उपज बेचने आते हैं। यहाँ याक के दूध के चीज एवं दूध का अत्यधिक प्रयोग होता है।
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| स्ट्रीट शॉप गेदू |
इस 170 किमी की यात्रा काफ़ी रोमांचक है, छुखा, बुनाखा, चपचा, सकेनांग, खासखा, सेमतोखा, होते हुए थिम्पू पहुंचते तक इतने हेयरपिन आए कि उनकी गिनती ही नही है। पारो के लिए जाने वाले मार्ग से पूर्व एक स्थान पर खड़ी घाटी है, जहाँ दोनो तरफ़ पहाड़ हजारों मीटर की ऊंचाई पर 90 अंश के कोण में खड़े हैं। अगर आप सड़क मार्ग का अवलोकन कर रहे हैं तो यहाँ पर अवश्य ही राम-राम भज ही लेगें। रोमांच तब खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है जब बिना हार्न बजाए गाड़ियाँ एक दूसरे को पार करती हैं। थोड़ी सी भी चूक हुई तो समझो फ़्रेम में जड़ गए।
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| भूटानी शाक सब्जी |
हमारे यहाँ तो ऐसे खतरनाक अंधे मोड़ों पर हार्न प्लीज, ब्लो हार्न का बोर्ड लगा रहता है। भूटान के वाहन चालकों को बिना हार्न बजाए वाहन चलाने की ट्रेनिंग दी जाती है। इस 170 किमी के रास्ते में याद नहीं आता कभी हमारे वाहन चालक ने हार्न बजाया होगा। भूटान में हर तीन महीनें ड्रायवरों को ट्रेनिंग के लिए बुला लिया जाता है। उन्हें तीन दिन मार्गों एवं वाहन चालन की शिक्षा दी जाती है, जो सभी लायसेंसधारियों के लिए अनिवार्य है। अनौपचारिक भेंट में सांसद नीमा ने बताया कि हमारे यहाँ हार्न नहीं बजाने पर जोर दिया जाता है, जिससे ध्वनि प्रदूषण नहीं के बराबर होता है। सारा सफ़र शांति से तय हो जाता है। नियंत्रित गति एवं अपनी लेन में चलने के कारण यहाँ दुर्घटनाएं नगण्य हैं।
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| यहां हमने दोपहर का भोजन किया |
भूटान में ट्रैफ़िक पुलिस नहीं है, आवश्यकता पड़ने पर सामान्य पुलिस ही इस कार्य को अंजाम देती है। किसी भी शहर के चौक चौराहों पर ट्रैफ़िक सिंगल नहीं है। जेब्रा क्रासिंग पर लोग अपने वाहन स्वयमेव धीरे कर लेते हैं और पैदल चलने वालों को रास्ता देते हैं। यहाँ अगर सड़क प्र कोई पशु भी आ जाता है तो उसके लिए वाहन रोक लिया जाता है और उसे सड़क पार करने दिया जाता है। इससे पता चलता कि यहाँ पशुओं के प्रति कितना सम्मान है और मानवीयता तो अपने चरम पर है। अगर कहीं दुर्घटना घट जाती है और कोई घायल भी हो जाता है तो वह बड़ा समाचार हो जाता है, क्योंकि ऐसा कभी कभी घटता है। हवाई जहाज एवं सड़क मार्ग दोनो से ही भूटान की यात्रा रोमांचक है।
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| थिम्पू नगर में प्रवेश |
दोपहर दो बजे हम एक मनोरम स्थान पर भोजन करने के लिए रुके। यहां से घाटी के मध्य से गिरता हुआ झरना सुंदर दृश्य उत्पन्न कर रहा था। इस स्थान को पर्यटकों के भोजन इत्यादि के लिए तय किया हुआ है। यहां पर कूड़ेदान रखा हुआ है, आपको खाने के बाद कचरा कूड़ेदान में ही डालना होगा। इसकी देख-रेख वाहन चालक करते है और जो कचरा इधर उधर फ़ेंकते हैं उन्हें समझाते भी हैं। भोजन करने के बाद हम यहां से चलकर शाम छ: बजे थिम्पू पहुंच गए। यहां हमें वांगचुंग रिसोर्ट में ठहरना था। यह रिसोर्ट शहर से दूर ताबा में हैं, पर है बहुत सुंदर। इसकी संचालिका थिन ले लामा सुसभ्य स्त्री है। रिसोर्ट में पहुंच कर सबको पसंद के हिसाब से कमरे बांट दिए गए।
विश्व की सबसे ऊंची शाक्य मुनि की कांस्य प्रतिमा : थिम्पू भूटान
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आज तीन अप्रेल था और हमें थिम्पू भ्रमण करना था। सुबह आठ बजे सभी तैयार होकर नाश्ते की टेबिल पर आ गए। नाश्ता करने के बाद सब थिम्पू भ्रमण के लिए चल दिए। सबसे पहले थिम्पू जोंग देखा गया। यह भव्य इमारत है। इसका निर्माण 1629 में नावांग नामग्याल ने करवाया था। इस भवन में चारों तरफ़ गलियारा है और अन्य इमारते बौद्ध भिक्षुओं के निवास के लिए बनाई गई हैं। भूटान की आबादी का 75% बौद्ध धर्म को मानने वाला है तथा 25% हिन्दु हैं जो सनातन धर्म को मानते हैं। यहां बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। मैं गत वर्ष भी भूटान भ्रमण के लिए आया था। उस दौरान भी भूटान को देखा और महसूस किया।
आज तीन अप्रेल था और हमें थिम्पू भ्रमण करना था। सुबह आठ बजे सभी तैयार होकर नाश्ते की टेबिल पर आ गए। नाश्ता करने के बाद सब थिम्पू भ्रमण के लिए चल दिए। सबसे पहले थिम्पू जोंग देखा गया। यह भव्य इमारत है। इसका निर्माण 1629 में नावांग नामग्याल ने करवाया था। इस भवन में चारों तरफ़ गलियारा है और अन्य इमारते बौद्ध भिक्षुओं के निवास के लिए बनाई गई हैं। भूटान की आबादी का 75% बौद्ध धर्म को मानने वाला है तथा 25% हिन्दु हैं जो सनातन धर्म को मानते हैं। यहां बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। मैं गत वर्ष भी भूटान भ्रमण के लिए आया था। उस दौरान भी भूटान को देखा और महसूस किया।
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| थिम्पू जोंग |
यहां से हम लोग विश्व की शाक्यमुनि पद्म संभव (द्वितीय बुद्ध) की सबसे ऊंची प्रतिमा के दर्शन करने पहुंचे। जब हम इस स्थान पर पहुंचे तो सूर्य शीर्ष पर था, यह स्थान पर्वत शीर्ष होने के कारण सूर्य की किरणें सीधी पड़ रही थी। हालत यह थी कि सूर्य की चमक से आँखे खोलने में भी कठिनाई हो रही थी। ऐसे समय में सबसे मुझे अपना गॉगल याद आया। मैने बैग से गॉगल निकालकर पहना तभी यहाँ कुछ देख पाया। यहाँ भूटान का सबसे बड़ा निर्माण कार्य चल रहा है। मुझे नहीं लगता कि इससे बड़ी किसी परियोजना पर भूटान में कोई काम हुआ होगा। यहाँ पहुंचकर ग्रुप फ़ोटो लेते तक गर्मी के कारण सबकी हालत खराब हो गई।
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| शाक्य मुनी द्वितीय बुद्ध |
थिम्पू से 12 किमी चलकर एक पहाड़ी के शीर्ष पर बुद्धा दोरदेन्मा निर्मित किया गया है। इसके निर्माण का संकल्प बीसवीं सदी के योगी सोनम जांग्पो ने किया था। उसने भविष्यवाणी की थी कि इस स्थान पर शाक्यमुनि पद्म संभव (द्वितीय बुद्ध) की इतनी ऊंची प्रतिमा का स्थापित होती जो यहाँ से सारे विश्व में शांति एवं मैत्री का संदेश देगी। इस संकल्प के साथ 169 फ़ुट ऊंची कांस्य प्रतिमा का निर्माण प्रारंभ हुआ तथा चौथे राजा जिग्मे सिंग्ये वांगचुक के साठवें जन्म दिन 25 सितम्बर 2015 को सम्पन्न किया गया। इस दिन को उत्सव के रुप में मनाया गया।
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| शाक्य मुनी द्वितीय बुद्ध के समक्ष हम हिन्दुस्तानी दल |
इस प्रतिमा के निर्माण में 47 लाख अमेरिकन डॉलर खर्च हो चुके हैं। इस प्रतिमा के नीचे बनाए गए हॉल में बुद्ध की स्वर्ण मंडित आठ इंच की एक लाख प्रतिमाएँ एवं बारह इंच की पचीस हजार प्रतिमाएं स्थापित की जाएंगी तथा इस हॉल को ध्यान एवं साधना केन्द्र के रुप में भी विकसित किया जा रहा है। इस स्थान के विकास में 100 लाख अमेरिकी डॉलर खर्च करने की योजना है। इस प्रतिमा का निर्माण नानजिंग चीन की कम्पनी एरोसुन कार्पोरेशन द्वारा किया जा रहा है। इसके समस्त भागों को चीन में बनाकर यहाँ लाकर जोड़ा गया है।
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| बुद्धा टॉप पर गरुड़ |
बौद्ध परम्पराओं से संबंधित देवियों को चारों तरफ़ मैदान में स्थापित किया गया है। निर्माण कार्य बहुत ही उम्दा हुआ है और प्रतिमाओं को बारीकी से घड़ा गया है। मुख्य प्रतिमा शाक्यमुनि पद्म संभव को भू-स्पर्श मुद्रा में दिखाया गया है। इनकी आँखे बहुत ही सुंदर बनाई गई है। देखकर ही लगता है कि प्रतिमा अभी बोल उठेगी। प्रतिमा को स्वर्ण मंडित किया है, जिससे खुले में मौसम का असर न हो। वरना कांस्य पर मौसम का असर होता है।
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| बौद्ध देवी तारा |
इसके समक्ष लगभग 900 एकड़ में बगीचा बनाने की योजना है, इसके निर्माण में अभी समय लगेगा। जब बगीचा बन जाएगा तो यह स्थान स्वर्ग से कम दिखाई नहीं देगा। यहाँ से थिम्पू शहर का एरियल व्यू भी देखा जा सकता है। यहां से थिम्पू शहर चू के दोनो तरफ़ बसा हुआ बहुत ही सुंदर दिखाई देता है। थिम्पू शहर के मैने कुछ चित्र लिए। इस स्थान का निर्माण योगी सोनम जांग्पो के अनुयाइयों ने किया है, इसमें सरकार का धन नहीं लगा है।
नेशनल मेमोरियल चोर्तेन एवं भूटान के वृद्ध
आरम्भ से पढ़ें
हम नेशनल मेमोरियल चोर्तेन देखने पहुंचे। भूटान आने वाला हर यात्री इस स्थान पर पहुंच ही जाता है। ड्रुक ग्यालपो किंग जिग्मे दोरजी वांगचुक (1928-1972) अजदहा (डेग्रन) के देश भूटान के तीसरे ड्रुक थे। उन्हें आधुनिक भूटान का जनक माना जाता है। राजधानी थिम्पू के मध्य भारतीय सैनिक अस्पताल के समीप उनकी याद में एक स्मारक बना हुआ है, जिसे "नेशनल मेमोरियल चोर्तेन" कहा जाता है। इस स्मारक परिकल्पना तिब्बती बौद्ध परम्परा के अनुसार थिनले नोरबू ने की, परन्तु इसका निर्माण ड्रुक की माता फ़ुंतसो चोडेन वांगचुक ने 1974 में कराया था।
हम नेशनल मेमोरियल चोर्तेन देखने पहुंचे। भूटान आने वाला हर यात्री इस स्थान पर पहुंच ही जाता है। ड्रुक ग्यालपो किंग जिग्मे दोरजी वांगचुक (1928-1972) अजदहा (डेग्रन) के देश भूटान के तीसरे ड्रुक थे। उन्हें आधुनिक भूटान का जनक माना जाता है। राजधानी थिम्पू के मध्य भारतीय सैनिक अस्पताल के समीप उनकी याद में एक स्मारक बना हुआ है, जिसे "नेशनल मेमोरियल चोर्तेन" कहा जाता है। इस स्मारक परिकल्पना तिब्बती बौद्ध परम्परा के अनुसार थिनले नोरबू ने की, परन्तु इसका निर्माण ड्रुक की माता फ़ुंतसो चोडेन वांगचुक ने 1974 में कराया था।
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| नेशनल चोर्तेन थिम्पू |
यहां बने हुए स्तूप में अन्य स्तूपों की तरह राजा की कोई खास सामग्री (अस्थियाँ) नहीं रखी गई है। अन्य स्तूपों के विपरीत यहाँ सिर्फ़ ड्रुक की तश्वीर रखी हुई है। किंग जिग्में दोरजी वांगचुक के मन में ऐसा स्मारक बनाने की इच्छा थी जो बौद्ध धर्म का प्रतिनिधित्व करता हो और थिम्पू शहर की एक पहचान (लैंड मार्क) के नाम से जाना जाए। उनकी इच्छा की पूर्ती राजमाता ने की। यहाँ श्रद्धालू आते हैं और अपने धार्मिक कर्मकांड पूर्ण करते हैं।
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| शिखर छूने की चाह: राजेश सेहरावत |
इस स्थान पर 4 बड़े मणिचक्र भी स्थाप्ति है, चारों तफ़ खुला स्थान है जिसमें बगीचा बना हुआ है और फ़ूलों की क्यारियाँ सजाई गई है। शहर के वृद्ध यहाँ आकर सप्ताहांत का दिन बिताते हैं और नौजवान बौद्ध धर्म के अनुसार आराधना करते हैं। इस स्तूप का स्वर्ण कलश आकाश को छूता हुआ प्रतीत होता है। यहाँ एक घंटा भी लगाया गया है जिसे विशेष अवसरों पर बजाया जाता है। 2004 में इसका नवीनीकरण किया गया था था तथा यह भूटान के धार्मिक चिन्हों के रुप में जाना जाता है।
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| भूटान के वृद्ध |
रविवार का दिन होने के कारण यहां बहुत सारे वृद्ध दिखाई दे रहे थे। वे चोर्तेन की परिक्रमा करते हेउ जाप कर रहे थे। ऐसा लग रहा था कि भूटान वृद्धों का ही देश है। मैने वहां उपस्थित लोगों से वृद्धों के विषय में चर्चा करके भूटानी समाज में उनकी स्थिति के विषय में जानकारी ली। लोगों ने बताया कि भूटान में वृद्धों की हालत अन्य स्थानों बेहतर है। स्वास्थय सुविधाओं एवं प्रदूषण मुक्त प्राकृतिक वातावरण ने इनकी उम्र बढाई है।
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| भूटान के वृद्ध |
यहाँ के अधिकांश वृद्धों का समय आमतौर पर या तो माला जपते हुए बीतता है, या फिर मंदिर-देवालयों में परिक्रमा कर इष्ट-देवों को प्रसन्न करते हुए। उम्र के साथ ईश्वर के प्रति आस्था का बढ़ना एक सहज प्रक्रिया है। भूटान के अधिकतर नागरिक बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं, अतः लोगों की, विशेष तौर पर उम्र के ढलते पड़ाव पर पहुँच गये व्यक्तियों के जीवन में धर्म अत्यंत विशेष महत्त्व रखता है.
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| दंडवत करते हुए युवती |
अन्य समुदायों की तरह भूटानी समाज भी वृद्ध व्यक्तियों के अनुभव और सूझ-बूझ को आदर भाव से देखता है, घर के मुखिया मन-मुटाव दूर करवाने वाले सलाहकार के रूप में पारिवारिक-सामाजिक इकाई का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। यही कारण है कि वहां बुज़ुर्ग समाज इज्ज़तदार जीवन व्यतीत करता है. परन्तु, वर्तमान में आधुनिकरण, शहरीकरण और पाश्चात्य संस्कृति की आंधी ने भूटानी पारिवारिक इकाई को भी अपनी चपेट में ले लिया है, और वृद्धावस्था बदलते पारिवारिक ढांचे, पलायन और बदलती जीवनशैली के बीच खुद को असहाय खड़ा पा रही है।
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| पुत्र वल्लभा |
चूँकि स्थानीय लोग अधिक संख्या में शहरों की ओर कूच कर रहे हैं, इसलिए घर के बुज़ुर्ग प्रायः ही गाँव में पीछे छूट जाते हैं. अपने भरण-पोषण की संपूर्ण ज़िम्मेदारी वृद्धावस्था में भी उनके कन्धों पर ही आ पड़ती है। नगर-शहरों में एकल परिवार की संस्कृति सुरसा की भांति संयुक्त परिवारों को निगल रही है। ये बदलती परिस्थितियाँ परिवार में बुजुर्गों की अहमियत तो कमतर करती जाती है, जिसके कारण पारिवारिक इकाईमें उनका स्थान महज़ एक विकल्प बनता जाता है. यही कारण है कि उनकी बेबसी के साथ ही जीवनयापन के लिए उनकी आश्रयता दिन-पर-दिन बढती जा रही है।
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| परिक्रमा करते हुए भक्त जन |
मित्र थिनले से इस विषय पर चर्चा हुई उनके अनुसार, हालाँकि भूटानी लोग ‘कुल राष्ट्रीय प्रसन्नता’ (ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस) के इकाई स्तर पर स्वयं का मूल्यांकन करते हैं और समता,न्याय इत्यादि का दम भरते हैं, परन्तु समाज का एक छोटा सा तबका ऐसा भी है जो प्रगति की इस दौड़ में बिना सहायता के भाग नहीं ले सकता। यद्यपि गांवों में अभी भी बड़े-बुजुर्गों की ज़रूरतों का मिलजुलकर ध्यान रखा जाता है, पर कानूनी तौर पर कुछ ऐसी नीतियाँ लागू करना अत्यावश्यक है जो समाज के इस वर्ग को स्वाभिमान का जीवन जीने की सुविधाएं उपलब्ध करवा सकें”।
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| ्होरी भजो मन्ना |
फ़िर भी भूटान के वृद्ध बेहतर अवस्था में हैं। आधुनिकीकरण की आंधी के बावजूद उन्हें भीख मांगने के लिए सड़क पर नहीं छोड़ा जाता। भूटान के विभिन्न शहरों एवं गांवों में भ्रमण के पश्चात मुझे एक भी वृद्ध भीख मांगते नहीं मिला। इससे जाहिर होता है कि समाज एवं उनका परिवार वृद्धों की आवश्यकता की पूर्ति करता है, उनका ख्याल रखता है और वृद्ध नाम जपते हुए, मणि चक्र फ़िराते हुए अपना बुढापा काट रहे हैं। नेशनल चोर्तेन से हम लोगों ने चिड़ियाघर पहुंच कर भूटान के राष्ट्रीय पशु टॉकिन को देखा। इसके विषय में अन्य जानकारी एवं किंवदंतियां मेरी इस पोस्ट में लिखी है।
हम हिन्दुस्तानी सम्मेलन एवं अलंकरण समारोह थिम्पू भूटान 2016
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थिम्पू भ्रमण करने के पश्चात हम वांगचुंग रिसोर्ट में लौट आए। भोजन के उपरांत यहां पर "हम हिन्दुस्तानी सम्मेलन" एवं अलंकरण समारोह के साथ परिचर्चा का आयोजन भी होना था। हमारे इस कार्यक्रम की चीफ़ गेस्ट भूटान ब्राडकास्टिंग सर्विस की शेराब जांगमो थी। भोजनोपरांत सभी कार्यक्रम स्थल पर चले आए।
थिम्पू भ्रमण करने के पश्चात हम वांगचुंग रिसोर्ट में लौट आए। भोजन के उपरांत यहां पर "हम हिन्दुस्तानी सम्मेलन" एवं अलंकरण समारोह के साथ परिचर्चा का आयोजन भी होना था। हमारे इस कार्यक्रम की चीफ़ गेस्ट भूटान ब्राडकास्टिंग सर्विस की शेराब जांगमो थी। भोजनोपरांत सभी कार्यक्रम स्थल पर चले आए।
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| मुख्यातिथि शेराब जांगमों का स्वागत करते हुए द्वारिका प्रसाद अग्रवाल जी |
पूर्व निर्धारित सदस्यों की संख्या कम हो गई थी, कुछ मुख्य लोग नहीं पहुंच पाए थे, जिन्हें चर्चा में विशेष रुप से भाग लेना था। शेराब जांगमों समय से कार्यक्रम में पहुंच गई। इसके बाद बिकाश शर्मा के संचालन में कार्यक्रम प्रारंभ हो गया।
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| हम हिन्दुस्तानी सम्मेलन प्रारंभ |
निर्धारित विषयों पर चर्चा करने के क्रम में सबसे पहले पर्यटन साहित्य और पत्रकारिता विषय पर चर्चा प्रारंभ हुई, जिसमें संतराम तारक एवं नवीन तिवारी ने भाग लिए। चर्चा के माडरेटर ललित शर्मा थे। दूसरे सत्र में राजेश अग्रवाल की अध्यक्षता में लोकल में ग्लोबल की अवधारणा एवं बदलता मीडिया पर हेमंत पाणिग्रही एवं नवीन तिवारी ने अपने विचार प्रगट किए।
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| हम हिन्दुस्तानी सम्मेलन भूटान |
तीसरे सत्र में बदलाव का सिनेमा एवं सिनेमा में बदलाव विषय पर संतराम तारक की अध्यक्षता में अंकित मिश्रा, बिकाश शर्मा एवं द्वारिका प्रसाद अग्रवाल ने अपने विचार व्यक्त किए। इसके साथ ही शेराब जांगमों ने भी भूटानी फ़िल्मों पर अपने विचार व्यक्त किए। भूटान में भारत के सभी चैनल देखे जाते हैं और धारावाहिक यहाँ बहुत लोकप्रिय हैं।
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| ह्म हिन्दुस्तानी सम्मेलन |
इसके बाद शेराब जांगमों के मुख्य आतिथ्य एवं ललित शर्मा की अध्यक्षता में अलंकरण समारोह प्रांरंभ हुआ। जिसमें श्री राजेश अग्रवाल को पत्रकारिता भूषण सम्मान, श्री नवीन तिवारी को छत्तीसगढ़ गौरव सम्मान, श्री द्र्वारिका प्रसाद अग्रवाल को हिन्दी गौरव सम्मान, श्री ललित कुमार वर्मा को जागरुक नागरिक सम्मान, श्री हेमंत पाणिग्रही को युवा निर्भीक पत्रकारिता सम्मान,
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| फ़िल्मों पर बोलते हुए अंकित मिश्रा |
श्री संतरम तारक को साहित्य भूषण सम्मान, श्री टीका राम वर्मा को वरिष्ठ नागरिक सम्मान एवं श्री - राजेश सेहरावत को समाज गौरव सम्मान दिया गया। इसके पश्चात उपस्थित अतिथियों को भी हिन्दुस्तानी सम्मेलन की तरफ़ से प्रतीक चिन्ह दिए गए।
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| हम हिन्दुस्तानी सम्मेलन के साथी |
इसके बाद बिकाश शर्मा, हेमंत पाणिग्रही एवं मैं भूटान ब्राडकास्टिंग सर्विस देखने के लिए शेराब जांगमों के साथ उनके ऑफ़िस पहुंचे। यहां भूटान की नेशनल असेम्बली के सांसद नीमा से भेंट हुई, इनके जुड़वा भाई दावा भी भूटान ब्राडकास्टिंग सर्विस में कार्य करते हैं। इनके साथ भूटान की राजनैतिक आर्थिक एवं सांस्कृतिक विषयों पर औपचारिक चर्चा हुई।
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| बिकास शर्मा एवं राजेश अग्रवाल |
ये बहुत अच्छी हिन्दी बोलते हैं। भारतीय टेलीविजन मीडिया पर पेनलिस्टों की जूतम पैजार के पर भी एक नजर डाली गई। नीमा दावा ने हमारे पहुंचने से पहले ही चाय का बनवा रखी थी। यहां से चाय पीकर हम थिम्पू के बाजार की तरफ़ पैदल-पैदल पहुंच गए। यहां हमारे साथी भी बस से पहुंच चुके थे।
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| हेमंत पाणिग्रही |
कल हमने भूटान के सिम लिए थे। जिससे आपस में चर्चा हो सके। नए शहर में कोई कहीं गुम न जाए, इस बात की चिंता अधिक रहती है। हमारे साथी टीका राम वर्मा जी मोबाईल की दुकान पर रिचार्ज कराने के बाद अपना पर्स भूल आए। जब हमसे मिले तो हड़बड़ाए हुए थे। हमने कहा कि आपका पर्स वहीं मिल जाएगा। जाकर देखिए,
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| भूटान के सांसद नीमा एवं उनके भाई दावा |
उनके दुकान में पहुंचने से पूर्व ही दुकानदार का फ़ोन आ गया कि आपका पर्स यहां छूट गया है। भूटान में इस बाद की ईमानदारी तो है कि आप बिंदास घूम सकते हैं, न कोई चोरी, न कोई जेबकतरी। नेपाल से लाख गुना बेहतर। बाजार की खरीददारी कर हम रिसोर्ट में लौट आए। सुबह हमको यहां से पुनाखा जोंग जाना था।
दोचु ला एवं पुनाखा जोंग : भूटान
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आज चार अप्रेल की सुबह थी, हम सबको पुनाखा जाना था। यहां के लिए परमिट थिम्पू से बनवाना पड़ता है। इसलिए यात्रा विलंब से प्रारंभ होने वाली थी। रिसोर्ट से निकलते वक्त मैने वहां रखे अलंकृत लिंग की फ़ोटो ली। भूटान का एक सम्प्रदाय लिंग की पूजा करता है और इसे सृष्टि एवं उर्जा का स्रोत मानता है। सुबह हमें साढे दस बजे परमिट तैयार हो कर मिले। अब हमारी यात्रा पुनाखा जोंग की प्रारंभ हो गई। पुनाखा के बारे में प्रारंभिक जानकारी यह है कि थिम्पू राजधानी से पुनाखा जोंग लगभग 71 किमी की दूरी पर है। यह दूरी 4 घंटे के सफ़र के बाद तय होती है। जोंग किले को कहा जाता है, पुनाखा जोंग भूटान की पूर्व राजधानी रही है। वर्तमान में यह पुनाखा जिले का प्रशासनिक केन्द्र है तथा लामाओं के अध्ययन का केन्द्र भी है।
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| बुद्धा टॉप की फ़ोटो कई किमी दूर पहाड़ी से |
इसका निर्माण फ़ो चू (पिता नद) एवं मो चू (माता नदी) के संगम पर 1637-38 में गवांग नामग्याल रिन्पोछे ने कराया था। यहां संगम के पश्चात फ़ो चू एवं मो चू नदी का नाम त्सांग चू (संकोश नदी) हो जाता है, जो आगे चलकर ब्रह्मपुत्र में समाहित हो जाती है। यह भूटान का दूसरा सबसे पुराना जोंग है। सुरक्षा की दृष्टी से जोंग के निर्माण में उपयुक्त स्थान का चयन किया गया है। फ़ो चू पार करके किले तक जाने के लिए एक लकड़ी के पुल का निर्माण किया गया है। यहाँ गवांग नामग्याल के पवित्र अवशेष रखे गए हैं। भूटान नरेश जिग्मे खेसर नामग्येल वांगचुक भारत में शिक्षा प्राप्त करने वाली जेटसन पेमा का विवाह भी इसी जोंग में हुआ था।
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| खुरुथंग घाटी की सुंदर नदी |
पुनाखा का सफ़र राजेश अग्रवाल के सुमधुर फ़िल्मी गानों से हुआ। इसके बाद द्वारिका प्रसाद अगवाल ने भी जनता की फ़रमाईश पर गाने सुनाए। बिकाश बाबू ने भी हाथ आजमाया। नवीन तिवारी एवं संतराम तारक जी ने कविताएं सुनाई। इस तरह सफ़र कट रहा था। रास्ते में एक स्थान पर बादल पुन: सड़क पर आ गए। यहां से हिमालय पर्वत की कुछ चोटियां दिखाई देती हैं परन्तु धुंध के कारण यह संभव नहीं हो सका। इस स्थान को दोचु ला कहते हैं। यहां युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की याद में स्मारक बनाया गया है।
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| दोचु ला शहीद स्मारक |
भूटान की सैनिक शक्ति मात्र थल सेना में निहीत है, भूटान के पास न तो जल सेना है, न वायू सेना। आकाशीय सुरक्षा देने की जिम्मेदारी भारतीय सेना की है। 2003 में भूटान के सीमावर्ती वन क्षेत्र में जब उल्फ़ा के उग्रवादियों ने कैम्प लगा लिए थे, भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में सक्रिय विद्रोहियों ने भूटान में भी अपने ठिकाने बना रखे थे जिन्हें वहाँ से बाहर निकालने के लिए भूटान ने सैनिक कार्रवाई चलाई और भूटान की सेना ने भारतीय सेना के सहयोग से उन्हें मार गिराया। इसमें 200 से अधिक भूटानी सैनिक शहीद हो गए। इस युद्ध में भूटान ने अपनी धरती से उल्फ़ा के उग्रवादियों को खदेड़ दिया।
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| पुनाखा की सुंदर घाटियां और नदी |
इन सैनिकों की शहादत की याद में दोचू ला में स्मारक बनाया गया है। भूटानी सैनिकों का प्रशिक्षण भी भारतीय सेना करती है। भूटान हमारा परम मित्र राष्ट्र है, उसने अपने सैनिक गंवा कर भारत विरोधी शक्तियों को भूटान की जमीं पर टिकने नहीं दिया। इसी से उसकी दोस्ती की प्रतिबद्धता दिखाई देती है। जबकि बंग्लादेश को भारतीय इमदाद कम नहीं मिलती, फ़िर अलगाववादियों वहीं जाकर पनाह लेते हैं और भारत में आतंकवादी गतिविधियाँ बंगलादेश से संचालित करते हैं। भूटानी शहीद सैनिकों को हम नमन करके आगे की यात्रा में चल दिए। दोपहर का भोजन तैयार करके हमारे साथ ही रख दिया गया था।
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| पुनाखा जोंग के भीतर का प्रांगण |
हम खुरुथंग घाटी में पहुंचे, यह बहुत ही सुंदर घाटी है। यहां से नदी प्रवाहित होती है, जिसमें राफ़्टिंग भी की जाती है। जिसके लिए अलग से अनुज्ञा लेनी पड़ती है। नदी किनारे स्थित दामचेन रिसोर्ट के लॉन में हमने दोपहर का भोजन किया। यहां हम लगभग पौने दो बजे पहुंचे थे। मौसम ठंडा ही था। भोजन करने के पश्चात पुन: यात्रा पर निकल लिए और पौने तीन बजे हम पुनाखा जोंग पहुंचे। यहां पहुंच कर फ़ोटोग्राफ़ी की और पुनाखा जोंग के विषय में जानकारी प्राप्त की। सभी को यह स्थान पसंद आया। विशेषकर फ़ो चू पर बने हुए लकड़ी के पुल ने मन मोह लिया। इस स्थान की हिफ़ाजत के भूटानी सेना भी लगी दिखाई दी। हमने उनके साथ चित्र भी खिंचावाए।
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| फ़ो चु नदी पुनाखा पर लकड़ी का पुल |
पुनाखा जोंग में पुल के द्वार पर मुझे नेपाली मूल की भूटानी स्त्रियां मिली। वे यहां की गैलरी में नौकरी करती हैं। इनसे हिन्दी में ही चर्चा हुई है। वैसे सभी व्यावसायी भूटानी हिन्दी समझते एवं बोलते हैं। मैं भूटान का कोई गांव देखना चाहता था, मेरे मन में हमारे किसी पहाड़ी गांव जैसे ही यहां के गांव की कल्पना थी, परन्तु शेराब जांगमों ने बताया कि यहां गांव दो या तीन घरों के ही होते हैं। इसलिए गांव देखने की इच्छा धरी की धरी रह गई। हमें यहां से लम्बा सफ़र तय करके आज की रात पारो पहुंचना था। रास्ते में एक स्थान पर भू स्खलन हो रहा था, जहां ट्रैफ़िक जाम था। पहाड़ों में भूस्खलन आम बात है।
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| फ़ो चु एवं मो चु नदी के संगम पर पुनाखा जोंग |
भारत में भी पहाड़ी रास्तों पर आए दिन भू स्खलन होने से रास्ते बंद होने की खबरें मिलती हैं। यह एक त्रासदी ही है, जिससे नित्य जन जीवन प्रभावित होता है। भू स्खलन के कारण मार्ग बंद हो जाता है और जब तक मलबा हटा कर रास्ता नहीं खोला जाता तब तक यात्री फ़ंसे रहते हैं। मलबा हटाने की कोई समय सीमा नहीं होती, कभी तो आधे दिन में हट जाता है तो कभी दो तीन दिन लग जाते हैं। ये दिन यात्रियों के त्रासदी भरे होते हैं। हम जानते हैं हिमालयिन पर्वत शृंखला समुद्र से बनी है और बरसात के दिनों में पहाड़ों की जमीन वर्षा के कारण पोली हो जाती है, जिसके कारण थोड़ी भी ध्वनि या कंपन से वह पोला हिस्सा ढह जाता है।
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| भू स्खलन |
पहाड़ी रास्ते एक के ऊपर एक बने होते हैं, अगर भू स्खलन होता है तो रास्तों की कई परतें प्रभावित होती है। मिट्टी पत्थर ऊपर से गिरते हुए नीचे कई कई घूमाव पर रास्तों को बंद कर देते हैं। यहाँ मलबा हटाना भी बड़ी समस्या होती है अगर ऊपर का मलबा नीचे गिरा दिया जाए तो नीचे की सड़क बंद हो जाएगी। ऐसा ही हिम स्खलन से भी होता है। जहाँ बर्फ़ पोली हो जाती है, वह थोड़ी भी थरथराहट या ध्वनि से ट्रिगर हो जाती है, इसे एवलांच कहते हैं, ट्रिगर होने के बाद यह भी बहुत बड़ा नुकसान करती है। मार्ग बंद होने पर इसे भी हटाया जाता है, कई बार तो भू एवं हिमस्खलन से गाड़ियां भी मलबे में दब जाती है और जन हानि हो जाती है।
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| भूस्खलन के लिए जिम्मेदार कच्ची मिट्टी को हटाते हुए |
भू एवं हिमस्खलन की समस्या से बचने के लिए सजग सरकारें मार्ग के समीप उन स्थानों का चयन करती है, जहां भू स्खलन या हिम स्खलन की संभावना बन रही है, मिट्टी या बर्फ़ पोली होती जा रही है, कई बार बादलों की गड़गड़ाहट से ही ट्रिगर हो जाता है और मलबा सड़क पर पहुंच जाता है। ग्रीष्म काल में ऐसे स्थानों को चिन्हित कर उस स्थानी पोली मिट्टी को मशीनो के द्वारा या बारुद लगा कर गिरा दिया जाता है। ऐसी ही प्रक्रिया बर्फ़ीले रास्तों के लिए भी अपनाई जाती है,
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| पुनाखा जोंग में एक विद्यार्थी |
यहाँ गोले दाग कर बर्फ़ को ट्रिगर कर दिया जाता है और फ़िर रास्ता साफ़ कर दिया जाता है। ताकि कोई दुर्घटना न हो सके। भूटान के लौटते हुए एक स्थान पर ऐसे ही पोली मिट्टी को हटा कर भू स्खलन की समस्या से निजात पाई जा रही थी। जिसके चित्र लेने का मुझे अवसर मिला। यहां के ट्रैफ़िक जाम से हमें जल्द ही रिहाई मिल गई। थिम्पू के पहले हमने एक स्थान पर पहुंच कर चाय पी जब थिम्पू पहुंचे तो रात के आठ बज चुके थे। यहां से हमें पारो जाना था।
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| संझा के समय अंकित के साथ चाय चर्चा |
थिम्पू से पारो का सफ़र लगभग एक घंटे का है, पारो में एयरपोर्ट होने के कारण सड़क बहुत बढिया बनी हुई है। सपाटे से चलते हुए हम रात नौ बजे के लगभग पारो पहुंच गए। यहां के रिसोर्ट का नाम दाचेन हिल रिसोर्ट था। सभी ने अपना सामान बस से नीचे उतार दिया, जिसे यहां काम करने वाली लड़कियों ने कमरे में शिफ़्ट कर दिया। यहां भी कमरे ऊपर नीचे बने हुए थे। टीकाराम वर्मा जी ने एक बार फ़िर शिकायत की उन्हें ऊपर का कमरा दे दिया गया है। अब इस समस्य का समाधान तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं था। कल कार्यक्रम पारो भ्रमण का था। कुछ लोगो को टायगर मोनेस्ट्री देखने जाना था। खड़ी चढाई होने के कारण कुछ लोग मना कर रहे थे। दल दो हिस्सों में बंट गया था।
रहस्यमय टायगर मोनेस्ट्री की ट्रेकिंग : पारो भूटान
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सुबह तैयार होकर हमने टायगर मोनेस्ट्री जाना तय किया। बस हमें वहां तक छोड़ आएगी फ़िर बाकी साथियों को पारो घुमाकर शाम को हमें वापस लेने आ जाएगी। इसे भूटान की रहस्यमय मोनेस्ट्री माना जाता है। यह भूटानी पर्यटकों का प्रमुख आकर्षण है। यह मठ पारो से उत्तर दिशा में 12 किमी की दूरी पर है, पारो से यहाँ पहुंचने में आधा घंटा लगता है। इस स्थान को ताकसंग कहते हैं। ताकसंग से टाइगर नेस्ट तक जाने के लिए ट्रेकिंग करनी पड़ती है। पहाड़ की चोटी पर स्थित यह मोनेस्ट्री 3120 मीटर (10240 फ़ुट) की ऊंचाई पर है। पहाड़ के किनारे पर बना हुआ यह मठ चारों तरफ़ घूमते बादलों से ढका रहता है। यहाँ तक पहुंचना ही रोमांचक अहसास कराता है।
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| बादलों से घिरी हुई दिखाई देती टायगर मोनेस्ट्री |
विदेशी यात्री तो पारो हवाई अड्डे से सीधे यहाँ पहुंच कर ट्रेकिंग आरंभ कर देते हैं और मोनेस्ट्री की यात्रा करके लौट जाते हैं, उनके लिए भूटान में मुख्य आकर्षण यह मोनेस्ट्री ही है। जो भूटान यात्रा पर गया और उसने यह मोनेस्ट्री नहीं देखी, तो उसका दुर्भाग्य ही कहा जाएगा, जो प्राकृतिक सौंदर्य नहीं देख पाया। मोनेस्ट्री के लिए चढाई ताकसंग से प्रारंभ होती है, पहाड़ की तराई में यह स्थान है, यहाँ पोनी भी मिलते हैं जो आधी चढाई ( कैफ़ेटेरिया ) तक पहुंचाते हैं, फ़िर आपको अपने दम पर ही आगे बढना पड़ता है।
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| टायगर मोनेस्ट्री |
अब जरा टाईगर मोनेस्ट्री का इतिहास जानते हैं, इस स्थान की खोज आठवीं सदी में भारतीय गुरु पद्म संभव ने की थी, वे तिब्बत से लाए गए थे। किंवदन्ति है कि सम्राट पूर्व पत्नी येशे सोग्याल स्वेच्छा से गुरु रिम्पोचे (पद्म संभव को कई नामों से जाना जाता है) की शिष्य बन गई और खुद को बाघिन के रुप में बदल लिया और गुरु रिम्पोचे को अपनी पीठ पर सवार कर इस स्थान पर लेकर आई। कहते हैं कि यह बाघिन दुर्गम गुफ़ा तक उड़ कर पहुंची और गुरु रिम्पोचे को यहाँ तक पहुंचाया।
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| कैफ़ेटेरिया से टायगर मोनेस्ट्री |
यहाँ आठ गुफ़ाएं है, जो भिन्न भिन्न गुरुओं के नाम से जानी जाती है। आठवीं सदी में यहाँ आकर गुरु पद्मसंभव (रिम्पोचे) ने तीन साल, तीन महीने, तीन सप्ताह, तीन दिन और तीन घंटे के लिए प्रचंड ध्यान साधना की। भूटान में बौद्ध धर्म प्रारंभ करने का श्रेय इन्ही पद्म संभव को दिया जाता है। यहाँ की मोनेस्ट्री में बुद्ध के साथ इनकी प्रतिमाएं भी स्थापित की जाती है। इन्हें द्वितीय बुद्ध कहा जाता है। बुद्ध की प्रतिमा एवं इनकी प्रतिमा में सिर्फ़ मूंछो का ही अंतर है, इनके मुख पर पतली मूंछे बनाई जाती है और इन्हें भूटान का संरक्षक देवता माना जाता है।
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| टायगर मोनेस्ट्री की ट्रेकिंग पर अंकित मिश्रा |
गुरु पद्मसंभव ने घाटी में आकर इसे बुरी ताकतो से निजात दिलाई और पवित्र किया। इनके सम्मान में त्यौहार आयोजित किया जाता है, यह त्यौहार पारो घाटी में मार्च या अप्रैल के दौरान मनाया जाता है। वर्तमान में दिखाई देने वाले मठ का निर्माण तेनजिन राब्ग्ये ने 1692 में कराया। तेनजिन राब्ग्ये के रुप में गुरु पद्म संभव का पुनर्जन्म माना जाता है, उन्हें भी उतनी ही मान्यता और सम्मान मिला। कहा जाता है कि तेनजिन के पास ऐसी शक्ति थी कि वे थोड़े से भी भोजन से हजारों भक्तों को संतुष्ट कर देते थे। चाहे कितने ही भक्त आ जाएं, वे अपनी छोटी सी थाली से सबको भोजन बांटते और भोजन खत्म नहीं होता था और उनके प्रभाव से फ़िसलन भरी इस घाटी में कभी कोई फ़िसलकर नहीं गिरा।
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| अपन पोनी पर |
बस वाला हमें ताकसग तक छोड़ कर चला गया। चढाई के प्रारंभ में भूटानी महिलाएं दुकान लगा रखी हैं, यहां पहाड़ की चढाई के लिए सहयोगी सामान मिलता है, जैसे पानी एवं स्टिक (नुकीली लाठी)। हमने स्टिक 50 रुपए में खरीदी। यहाँ हर चीज मंहगी है, जो सामान भारत में 10 रुपए का मिल जाता है, उसकी कीमत यहाँ 100 रुपए मान कर चलिए। कोई भी दुकानदार इससे कम में सामान देने को तैयार नहीं होता। यहाँ सामान के भाव सौ से शुरु होते हैं।
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| टायगर मोनेस्ट्री |
हमने नौ बजे ट्रेकिंग प्रारंभ कर दी। हमारे साथ इस ट्रेकिंग में रायपुर से बिकास शर्मा, अंकित मिश्रा, नवीन तिवारी, ललित वर्मा एवं टीकाराम वर्मा जी थे। बजरंग बली का स्मरण करके चढाई प्रारंभ कर दी गई। अन्य यात्रियों के दल भी साथ चल रहे थे, जो फ़्रांस, अमेरिका, जापान, इंडोनेशिया, भारत, फ़िलिपिंस से आए हुए थे। उनके साथ गाईड और पोनी भी थे। रास्ते में प्राकृतिक पेयजल की व्यस्था भी है, जहां आप पहाड़ से आ रहे मिनरल वाटर (शुद्ध खनिज जल) का सेवन कर सकते हैं।
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| बाईकर हरकिशन लाल मेहता के संग |
एक किमी चलने के बाद चढाई प्रारंभ हो गई। चढाई में मेरा दम फ़ूलने लगा तो बिकास एक घोड़े वाले को पांच सौ रुपए में तय करके ले आया। ये आगे बढ गए और मैं घोड़े पर सवार होकर चल पड़ा। घोड़े वाले ने कैफ़ेटेरिया तक पहुंचा दिया और कहा कि घोड़ा यहीं तक जाता है, इसके आगे आपको पैदल ही जाना होगा। मुझे लग रहा था कि इस ऊंचाई तक स्वास्थ्य साथ नहीं देने वाला तो बिकास और अंकित को आगे भेज कर मैं कैफ़ेटेरिया में ही रुक गया। मोनेस्ट्री तक पहुंचने के लिए पतली सी पगडंडी है, जिस पर संभल कर चलना होता है, अगर पैर फ़िसला तो हजारों फ़ूट गहरी खाई में राम नाम सत्य समझो। चीड़ के सघन वन से रास्ता गुजरता है।
रास्ते में भारत से आए हुए कई दल मिले। एक दल में कुछ कॉलेज के लड़के लड़कियां थे। वे आगे चलने पर अपने दल की एक लड़की को छोड़ कर आगे चले गए, वो लड़की चलने के लिए संघर्ष कर रही थी। पर आगे नहीं बढ़ पा रही थी। आगे पहुंचे पर उनका दल मिला। पूछने पर वो बोले कि वह अपने आप आ जाएगी। चिंता करने की जरुरत नहीं है। मैं कैफ़ेटेरिया में ही बैठा रहा, बिकाश और अंकित मोनेस्ट्री की ओर चले गए। इनका मुझे तीन घंटे तक इंतजार करना पड़ा। यह कैफ़ेटेरिया बहुत मंहगा है। एक चाय के एक सौ तीस रुपए लगते हैं, भोजन के साढे पांच सौ।
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| फ़्रांसिसी फ़्रेंड के साथ लौटते हुए |
मैं कैफ़ेटेरिया में बैठ कर फ़ोटो खींचने लगा। यहाँ विदेशों से कई दल आये हुए थे। वो भी यहां बैठकर मोनेस्ट्री की फ़ोटों खींच रहे थे। इनके साथ भूटानी गाईड भी थी। थोड़ी देर बाद एक उड़िया स्त्री पहुंची, उसने सिर पर भीगा हुआ रुमाल डाल रखा था। चेहरे से लग रहा था कि पीड़ा में हैं। पूछने पर पता चला कि पोनी से गिरने के कारण चोट लग गई। गनीमत रही कि खाई में नहीं गिरी। इसके साथ बेटी और पति भी थे, वो इसे छोड़ कर मोनेस्ट्री चले गए। इसके बाद बंगाली दादा के साथ एक व्यक्ति आए, उन्होने परिचय कराया। ये बाईकर हरकिशन लाल मेहता थे, इन्होने बाईक से विश्व भ्रमण किया है। इनके नाम तीन बार गिनिज वर्ड रिकार्ड भी है। अच्छा लगा इनसे मिलकर, आधा घंटा साथ रहे और बातचीत भी हुई।
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| टायगर मोनेस्ट्री के रास्ते में मार्केट |
एक कोल्ड ड्रिंक भी पी। तब तक हमारा यात्री दल भी आ गया। यहीं एक फ़्रांस की महिला से भी परिचय हुआ, हम साथ साथ, धीरे धीरे नीचे की ओर चल पड़े। लाने के लिए घोड़ा था परन्तु लौटना तो पैदल ही था। नीचे पहुंचने पर बिकाश बाबू ने दुकानों से कुछ सामान खरीदा, मैने भी एक हंटिंग नाईफ़ लिया। जंगल यात्रा के समय जरुरत पड़ती है। उसके बाद हमारी बस आ गई और हम अपने रिसोर्ट में पहुंच गए।
कैम्प में फ़ायर एवं पारो का खतरनाक एयरपोर्ट : भूटान
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अब आगे की कथा यह है कि फ़ुंतशोलिन से टीका राम वर्मा जी अपने घुटनों की दशा बताते हुए हमेशा नीचे का रुम ही मांगते रहे और समस्या यह थी कि उनसे पैड़ी नहीं चढी जाती। वो आज टायगर मोनेस्ट्री की खड़ी चढाई चढकर सकुशल नीचे तक पहुंच गए और मैं आधी दूर से लौट आया। इससे मुझे लगा कि कुछ लोग जानबूझकर ही मौज लेते हैं। आज की रात कैम्प फ़ायर का आयोजन किया गया था। हमारी बस आते ही हम रिसोर्ट में लौट आए। जब मैं अपने रुम का ताला खोलने पहुंचा तो ठंड के मारे मुझे कंपकंपी चढ़ गई। टूर आपरेटर तुरंत चाय लेकर आए और मै तीन कंबल रजाई ओढकर सो गया, सांसे लम्बी लम्बी चल रही थी। थामने से रुक नहीं रही थी। एक घंटे के बाद जाकर कहीं तबियत ठिकाने लगी।
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| कैम्प फ़ायर पारो भूटान |
कैम्प फ़ायर की लकड़ियां जल रही थी, परन्तु वहां कोई नहीं था। मैने सबको आवाज देकर बुलाया। स्टीरियो की व्यवस्था भी की गई थी। परन्तु उनके पास भूटानी गानों के अलावा हिन्दी गाने नहीं थे और मेरे पास भी मुकेश के सैड सांग के अतिरिक्त छत्तीसगढ़ी गाने थे। मोबाईल की चिप निकाल कर लगाने पर छत्तीसगढी गाने बजने लगे। छत्तीसगढ़ी गानों का आनंद की कुछ अलग है। माधुरी अग्रवाल जी ने कहा कि इसे बंद कर दो, मेरा सिर दर्द होने लगा है, अगर हिन्दी गाने हैं तो लगाओ। बाकी लोग छत्तीसगढ़ी गाना सुनना चाहते थे। यहीं से कैम्प फ़ायर का वातावरण खराब होना शुरु हो गया। इस तू-तू मैं-मैं से सब चुप हो गए। जिस आनंद लेने के प्रयोजन से एक क्विंटल लकड़ी जलवाई गई थी वो स्वाहा हो गई।
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| आग तापते हुए |
इतने में टूर आपरेटर ने कहा कि कल सुबह हम जल्दी आठ बजे निकल जाएंगे, क्योंकि कल हमको न्यू जलपाईगुड़ी तक जाना है, यह लम्बी दूरी का सफ़र है, तो द्वारिका प्रसाद जी कहने लगे कि आपने आज हमारा दिन खराब कर दिया, हम नहाए भी नहीं, सबसे पहले तैयार हो गए थे और योग भी छूट गया। हम तो योग करके निकलेंगे चाहे नौ बज जाए। संतराम तारक जी ने कहा कि आपको सबका ध्यान रखना चाहिए। दल में आप अकेले ही नहीं है। तो द्वारिका प्रसाद जी बोले कि आप लोग चले जाना हम अपनी गाड़ी करके आ जाएंगे। इस तरह नाहक ही ठंड में वातावरण गर्म हो गया।
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| टीका राम वर्मा जी एवं द्वारिका प्रसाद अग्रवाल जी |
मुझे द्वारिका प्रसाद जी का यह व्यवहार बिलकुल पसंद नहीं आया। जो प्रभा मंडल उनकी आत्मकथा पढकर बना हुआ था वो सारा एक पल में ही चूर चूर हो गया। इसके बाद सभी रात का भोजन करने चले गए। रात की बात आई गई हो गई। सभी भोजन करने के उपरांत सोने चले गए। हम भी अपने बिस्तर के हवाले हो गए। अकेले दुकेले मित्रों के साथ 1985 से सफ़र कर रहा हूँ, भारत में तो डेढ सौ लोगों को भी एक साथ लम्बा टूर करवा चुका हूँ परन्तु पन्द्रह बीस लोगों को अपनी जिम्मेदारी लेकर पहली बार विदेश लेकर आया था, इसलिए बहुत कुछ सीखने भी मिला।
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| पारो की हवाई पट्टी |
छ: अप्रेल की सुबह सभी नहा धोकर आठ बजे निवृत हो गए। बस तक सामान पहुंचाने एवं निकलने वही नौ बज गए। पारो से हम जब निकल रहे थे यहां का एयरपोर्ट भी देखना था। इस एयरपोर्ट को दुनिया के दस खतरनाक हवाई अड्डों में से एक माना गया है। हमारी बस जब एयरपोर्ट से निकल रही थी तो एक प्लेन लैंड कर रहा था। बहुत ही सुंदर अवसर था विमान की लैंडिग देखने का। यह कभी कभी ही मुनासिब हो पाता है, जब आप निकल रहे हो और आपको टेक ऑफ़ करता या लैंड करता प्लेन दिख जाए। एक स्थान पर हमने बस रुकवा ली। सभी उतरकर यह नजारा अपने कैमरे में कैद करने लगे।
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| लाल घेरे में लैंड करता हूआ प्लेन |
इसे खतरनाक माने जाने का कारण यह है कि यह चारों तरफ़ पहाड़ियों से घिरा है और यहाँ विमान उतारना एवं उड़ाना दोनो ही कठिन है। इसलिए यहाँ सिर्फ़ रायल भूटान की फ़्लाईट उसके कुशल पायलटों द्वारा उतारी जाती है। यहाँ के राजा के पास दो प्लेन हैं, जो कोलकाता से सवारियां लाने ले जाने का काम करते हैं। ये प्लेन अस्सी सीटर हैं, परन्तु सुरक्षा के लिहाज से सत्तर सवारियों को ही स्थान दिया जाता है, दस सीटें खाली रखी जाती हैं। यहाँ के पायलटों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है, इन पायलेटों एक भूटान के राजा के ससुर भी हैं। जो बड़ी जिम्मेदारी के तहत निरंतर पारो से विमान उड़ान का कार्य करते हैं।
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| ड्रुक एयर भूटान |
यह विमानतल पारो नदी के तट पर उसके कैचमेंट एरिया में बना हुआ है। यहाँ से थिम्पू राजधानी की दूरी एक डेढ घंटे की है। हवाई जहाज से आने वाले यात्रियों को पारो में उतरकर थिम्पू जाना पड़ता है। हवाई अड्डे की सजावट किसी बौद्ध मोनेस्ट्री जैसी ही की गई है। प्लेन का हवाई पट्टी पर उतरना बड़ा ही रोमांचक लगा, जब छोटी सी हवाई पट्टी पर पारो नदी के किनारे विमान लैंड कर रहा था। यहाँ की फ़्लाईट की बुकिंग ऑन लाईन नहीं होती, कुछ एजेंटों के माध्यम से मनमाने मुल्य पर टिकिटें बेची जाती है। चारों तरफ़ पहाड़ियों से घिरे होने के कारण विमान यात्रा रोमांचक हो जाती है और चाहे नास्तिक ही क्यों न हो, यात्री एक बार तो अपने ईष्ट देव को स्मरण कर ही लेते हैं।
बाबू घाट की सुनहली सांझ
आरम्भ से पढ़ें
हम पारो से लगातार चलते हुए तीन बजे फ़ुंतशोलिन पहुंचे। यहां से हमे छोटी गाड़ियों से न्यू जलपाईगुड़ी जाना था। फ़ुंतशोलिन पहुंच कर देखा कि वहां सिर्फ़ दो गाड़ियां आई हैं और हम कुल सत्रह लोग थे। टूर आपरेटर ने फ़ोन करके और गाड़ियों के लिए बोला तो पता चला कि मोदी जी के आगमन के कारण सभी गाड़ियां बुक हो गई हैं। मैने सोचा कि एक गाड़ी में द्वारिका प्रसाद जी एवं संतराम तारक जी का परिवार कुल सात नग चले जाएंगे। बाकियों के लिए और गाड़ी का इंतजाम हो रहा था।
हम पारो से लगातार चलते हुए तीन बजे फ़ुंतशोलिन पहुंचे। यहां से हमे छोटी गाड़ियों से न्यू जलपाईगुड़ी जाना था। फ़ुंतशोलिन पहुंच कर देखा कि वहां सिर्फ़ दो गाड़ियां आई हैं और हम कुल सत्रह लोग थे। टूर आपरेटर ने फ़ोन करके और गाड़ियों के लिए बोला तो पता चला कि मोदी जी के आगमन के कारण सभी गाड़ियां बुक हो गई हैं। मैने सोचा कि एक गाड़ी में द्वारिका प्रसाद जी एवं संतराम तारक जी का परिवार कुल सात नग चले जाएंगे। बाकियों के लिए और गाड़ी का इंतजाम हो रहा था।
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| पारो का सुंदर दाचेन हिल रिसोर्ट |
इंतजाम नहीं हुआ तो जैसे-तैसे हम लोग एक गाड़ी से पहुंच जाएंगे। इनको तकलीफ़ नहीं होगी, क्योंकि संग में महिलाएं भी थी। संतराम तारक जी का सामान उस गाड़ी में चढा दिया गया। जब ये गाड़ी में बैठे तो श्रीमती द्वारिका अग्रवाल ने कह दिया कि इस गाड़ी में तो हमारी फ़ैमिली जाएगी। तारक जी गाड़ी से उतर गए। अब इतना समय नहीं था कि कैरियर में बंधे हुए सामान को खोलकर फ़िर से निकाला जाए। मैने उस गाड़ी में नवीन तिवारी जी और राजेश अग्रवाल जी को भेज दिया और गाड़ी रवाना कर दी।
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| दाचेन हिल रिसोर्ट के कर्मचारी |
इसके बाद एक छोटी कार आई उसमें ललित वर्मा टीकाराम वर्मा एवं संतराम तारक जी को सपत्नी भेज दिया । इसके बाद एक और गाड़ी की व्यवस्था हो गई, जिसमें मैं बिकाश, हेमंत, अंकित एवं राजेश सेहरावत आदि सबसे आखिर में चले। इसमें बसु दा भी साथ थे, उन्हें हासीमारा छोड़ना था। द्वारिका प्रसाद जी की गाड़ी को निकले आधा घंटा से अधिक हो चुका था। बसु दा को हासीमारा छोड़कर हम आगे बढे। हमारा ड्रायवर होशियार था, उसने गाड़ी सिलीगुड़ी ले जाने की बजाय एक अन्य रोड़ पर डाल दी। हम बांध के उपर से चलते हुए न्यू जलपाईगुड़ी पहुंचे। दार्जलिंग मेल के चलने में मात्र पन्द्रह मिनट का समय बचा था।
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| दाचेन हिल रिसोर्ट के कर्मचारी |
सतराम तारक जी अपने सामान की प्रतीक्षा कर रहे थे। मै द्वारिका प्रसाद जी के फ़ोन में घंटी बजा रहा था पर वे फ़ोन नहीं उठा रहे थे। आखिर में जब पांच मिनट बचे तो राजेश सेहरावत ने संतराम जी का बाकी सामान उठाया और दौड़ते हुए ट्रेन तक पहुंचे। हम लोग चिंतित थे कि इन लोग अभी तक नहीं पहुंचे हैं, गाड़ी के पास पहुंचकर देखा तो सारे लोग पहुंच चुके थे। जिनके कारण हमे विलंब हुआ और हम गेट पर खड़े होकर इंतजार करते रहे। हमारे ट्रेन में चढते ही वह चल पड़ी। अगर हम पारो से आठ बजे भी निकल लिए होते तो भागते हुए ट्रेन नहीं पकड़नी पड़ती। बिकास, अंकित और हेमंत यहीं रह गए। उनकी टेन हमारे बाद थी। हम एक ही बोगी में राजेश सेहरावत, संतराम तारक जी, राजेश अग्रवाल आदि थे। भोजन साथ में किए और सो गए।
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| फ़ुंतसोलिन की चेक पोस्ट |
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| किशन जी बाहेती कोलकाता |
मैं टैक्सी लेकर उनके बताए पते पहुंचा। उनका एक आदमी मुझे लेकर उनकी दुकान तक गया। उनके भाई साहब के दुकान में आने के बाद वे फ़ारिग हो गए और हम कलकता घूमने चल पड़े। सबसे पहले तो कुछ खाने की सोचे तो मैने कहा कि टिपिकल बंगाली खाना खाया जाए। किशन जी मुझे बंगाली रेस्टोरेंट भजो हरि मन्ना लेकर गए। कोलकाता में "भजोहरी मन्ना" परंपरागत बंगाली खाने के प्रसिद्ध रेस्टोरेंट की श्रृंखला है, जो भारत के अन्य मेट्रो सिटी में भी पाई जाती है। मुझे इसकी जानकारी नहीं थी। यह रेस्टोरेंट धरमतल्ला एक्सप्लेनेड मैट्रो के समीप स्थित है। पहुंचने पर देखा तो काफी भीड़ थी, 10 मिनट तक अपनी बारी का इंतजार किया है, भूख चरम सीमा पर थी।
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| खुद खेंचु दंडिका से पहली सेल्फ़ी बड़ा बाजार कोलकाता |
हमने विभिन्न तरह के बंगाली व्यंजनों का ऑर्डर दे डाला। एलिस मछली बंगालियों को सर्वकालिक प्रिय है। इसे विशेष तौर पर मेहमानों के लिए पकाया जाता है। भोजन लगने के बाद विभिन्न तरह की सब्जी दाल चावल सलाद इत्यादि देख कर मन खुश हो गया। एलिस मछली का स्वाद ही कुछ अलग था। इसके साथ ही पातौड़ी माछ का ग्रेडिएंट एवं मसाला बहुत ही पसंद आया। यह एलिस मछली से बाजी मार ले गई। किशन भाई ने निरामिष भोजन किया और हमने दोनों का आनंद लिया। इस तरह कोलकाता की दोपहर एक यादगार बन गई अगली यात्रा में भी कुछ इसी तरह भोजन का आनंद लिया जाएगा।
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| बाबू घाट कोलकाता से दिखाई देता विद्यासागर सेतु |
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| पुत्र उदय एव छोटा भाई कीर्ति |
https://lalitdotcom.blogspot.com/2016/08/blog-post_20.html
शांगरी-ला : भूटान यात्रा - अंतिम किश्त
प्रारम्भ से पढ़ें
सिलीगुड़ी में सुबह हुई, शहर घूमने का कार्यक्रम बना। सिलीगुड़ी में काफ़ी हिन्दी भाषी लोग भी रहते हैं और यहीं से नार्थ ईस्ट के लिए सभी गाड़ियाँ जाती है। गंगटोक, दार्जलिंग जाने वालों को यहीं आना पड़ता है। गोवाहाटी के लिए भी यहां से बस सेवा है। हमारी गाड़ी रात को न्यूजलपाईगुड़ी से थी। सिलीगुड़ी में चाईना मार्केट है और ऐसी ही एक मार्केट बस स्टैंड में भी है जहाँ वही सामान मिलता है जो चाईना मार्केट में मिलता है। हमने कुछ गर्म शाल खरीदे। नार्थ ईस्ट का डिजाईन कुछ अलग होता है और काफ़ी सुंदर भी दिखता है। इसलिए सोचा कि यादगार के तौर पर ले लिया जाए। क्योंकि भूटान में तो कैमरे के लिए सेल और चार्जर लेने में ही 1800 खर्च हो गए थे। वहां यह समान काफ़ी मंहगा मिला। अगर मुझे वहाँ पर ड्यूरो सेल मिल जाते तो दो ढाई सौ में ही काम चल जाता और 500 का सामान 1800 में नहीं खरीदना पड़ता।
सिलीगुड़ी में सुबह हुई, शहर घूमने का कार्यक्रम बना। सिलीगुड़ी में काफ़ी हिन्दी भाषी लोग भी रहते हैं और यहीं से नार्थ ईस्ट के लिए सभी गाड़ियाँ जाती है। गंगटोक, दार्जलिंग जाने वालों को यहीं आना पड़ता है। गोवाहाटी के लिए भी यहां से बस सेवा है। हमारी गाड़ी रात को न्यूजलपाईगुड़ी से थी। सिलीगुड़ी में चाईना मार्केट है और ऐसी ही एक मार्केट बस स्टैंड में भी है जहाँ वही सामान मिलता है जो चाईना मार्केट में मिलता है। हमने कुछ गर्म शाल खरीदे। नार्थ ईस्ट का डिजाईन कुछ अलग होता है और काफ़ी सुंदर भी दिखता है। इसलिए सोचा कि यादगार के तौर पर ले लिया जाए। क्योंकि भूटान में तो कैमरे के लिए सेल और चार्जर लेने में ही 1800 खर्च हो गए थे। वहां यह समान काफ़ी मंहगा मिला। अगर मुझे वहाँ पर ड्यूरो सेल मिल जाते तो दो ढाई सौ में ही काम चल जाता और 500 का सामान 1800 में नहीं खरीदना पड़ता।
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| सिलीगुड़ी में डाभ का स्वाद |
मार्केट से लौटकर भोजन किया और बाकी साथी बागडोगरा एयरपोर्ट मार्केट चले गए और मैं होटल में ही बैठा रहा। ये अंधेरा होने पर पहुंचे। मुझे 5 घंटे बैठे बैठे गुजारने पड़े। इनके आते ही हम आटो लेकर न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन पहुंच गए। सिलीगुड़ी से न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर है और यही एकमात्र है स्टेशन है जो उत्तर पूर्व को भारत से जोड़ता है। न्यू जलपाईगुड़ी में हमारी ट्रेन लग चुकी थी। मैने खाना नहीं नहीं खाया था। स्टेशन पर ही जल्दी से चावल और सब्जी लेकर खाई और ट्रेन में सवार होते ही ट्रेन अगली मंजिल की ओर चल पड़ी।
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| न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन |
सुबह हम 9 बजे हावड़ा जंक्शन में पहुंचे। यहां रिटायरिंग रुम में रुम के लिए इंतजार करना पड़ा। बिना नहाए धोए दिन की शुरुवात करना ठीक नहीं लगता पर मजबूरी थी। क्या करते, कुछ देर बाद नम्बर आया तो पता चला कि रुम चार्ज 1200 रुपए है। हमें तो सिर्फ़ सामान ही रखना था और फ़्रेश होना था। अब फ़्रेश होने के लिए सार्वजनिक शौचालय का उपयोग करना पड़ा और सामान क्लार्क रुम में रख कर हम हावड़ा स्टेशन की जेट्टी की ओर चल दिए। हमारे साथियों को हावड़ा पुल देखना था और ऐसे स्थान की टिकिट लेनी थी जिसका स्टीमर हावड़ा पुल के नीचे से गुजरता हो। 5-5 रुपए में हमने गोलाघाट की टिकिट ली और हावड़ा ब्रिज की खूब फ़ोटुएं खींची।
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| लैंडमार्क ऑफ़ कोलकाता हावड़ा ब्रिज |
इसके पश्चात कुछ अन्य स्थान देखने के लिए बाबू घाट की ओर चल पड़े। स्टीमर ने हमें बाबू घाट छोड़ा और सड़क पर आकर हम बिछड़ गए। भूटान में ठंड के कारण न ठीक से पानी पीया जा रहा था और न ठीक भोजन कर पाया था। बाबू घाट की पटरी पर स्ट्रीट फ़ुड की दुकाने हैं, जहां मैने देखा कि एक स्थान पर गर्मागर्म चावल, दाल, 3 सब्जी, चटनी सलाद के साथ भोजन दिया जा रहा है। बस मैने वहीं बेंच संभाल ली और पेट भर भोजन किया आत्मा तृप्त हो गई। पैसे देते समय मूल्य पूछा तो होटल वाले ने सिर्फ़ 40 रुपए लिए। इस 40 रुपए के भोजन में वह आनंद आया जो 15 दिनों के फ़ाईव स्टार के ढकोसलों में नहीं आया। इसके बाद बस से मैं हावड़ा आकर साथियों का इंतजार करने लगा। कुछ देर बाद वे भी आ गए और हम अपनी ट्रेन पकड़ने के लिए शालीमार स्टेशन आ गए।
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| घाटशिला रेल्वे स्टेशन |
शालीमार से हमारी ट्रेन सही समय पर चल पड़ी। मैं अपनी बर्थ पर थोड़ी देर के लिए सो गया। हल्ला गुल्ला होने के बाद नींद खुली तो पता चला कि ट्रेन किसी स्टेशन में खड़ी है और यह अब आगे नहीं जाने वाली। मैने स्टेशन मास्टर से पूछा तो पता चला कि आगे राउरकेला पास कहीं पर कोई विधायक रेल की पटरियों पर अपने सर्मथकों के साथ बैठे और रेल रोको आन्दोलन चला रखा है। सवारियों को ट्रेन छोड़ने की सलाह बार बार माईक से दी जा रही थी। एलाऊंस किया जा रहा था कि यह ट्रेन वापस शालीमार जाएगी और जिन्हें वहां जाना है वह इस ट्रेन से जा सकते हैं और जिन्हे नहीं जाना है वे ट्रेन छोड़ दे। हम झारखंड के सिंहभूम जिले के घाटशिला प्रखंड में थे।
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| बिलासपुर - आखिर छत्तीसगढ़ पहुंच गए |
हमारे साथी तय नहीं कर पा रहे थे कि क्या किया जाए। पर मैने ट्रेन छोड़ना तय कर लिया था और अपना सामान लेकर प्लेटफ़ार्म की बेंच पर बैठ गया। वे भी कुछ देर में स्थिति को समझ कर आ गए। घाट शिला में रिश्तेदारों को फ़ोन किया और वे हमें लेने के लिए स्टेशन आ गए। इस तरह नेता जी एवं रेल्वे विभाग की कारस्तानी के कारण हमें जबरदस्ती एक दिन और 2 रात घाटशिला में गुजारनी पड़ी। इसके अलावा कोई रास्ता भी नहीं था। अगले दिन हमने कुर्ला हावड़ा की टिकिट ली और रात को घर पहुंचे। खुबसूरत भूटान की खुबसूरत यात्रा करके लौट आए। मुझे नेपाल से भूटान बहुत ही अच्छा लगा। कभी समय मिला तो कुछ दिन भूटान में और गुजारना चाहुंगा। आखिर इसे "सांगरिला" (स्वर्ग भूमि) जो कहते हैं।
पारो - भूटान यात्रा 8
प्रारम्भ से पढ़ें
यहाँ बहने वाली पारो चू के कारण ही इस स्थान का नाम पारो पड़ा। भूटान का एकमात्र हवाई अड्डा पारो में ही है। फ़िर यहाँ से ही लोगों को सड़क मार्ग से थिम्पू जाना पड़ता है। विश्व के प्रथम दस सबसे खतरनाक हवाई अड्डों में से एक है तथा स्थान कम होने के कारण यहाँ का रन वे भी काफ़ी छोटा है। यात्री जहाज को यहाँ पर उतारने के लिए काफ़ी कुशल पायलेट की आवश्यकता होती है। यहाँ पहुचने हमें 2 जहाज खड़े दिखाई दे गए। घाटी के रास्ते के साथ साथ चलते हुए रन वे भी दिखाई दे रहा था। यदि फ़्लाईट का समय होता तो हमें यहाँ के जहाज की उड़ान भी देखनी थी, कैसे पायलट दो पहाड़ों के बीचे से जहाज को उड़ा कर ले जाता है।
यहाँ बहने वाली पारो चू के कारण ही इस स्थान का नाम पारो पड़ा। भूटान का एकमात्र हवाई अड्डा पारो में ही है। फ़िर यहाँ से ही लोगों को सड़क मार्ग से थिम्पू जाना पड़ता है। विश्व के प्रथम दस सबसे खतरनाक हवाई अड्डों में से एक है तथा स्थान कम होने के कारण यहाँ का रन वे भी काफ़ी छोटा है। यात्री जहाज को यहाँ पर उतारने के लिए काफ़ी कुशल पायलेट की आवश्यकता होती है। यहाँ पहुचने हमें 2 जहाज खड़े दिखाई दे गए। घाटी के रास्ते के साथ साथ चलते हुए रन वे भी दिखाई दे रहा था। यदि फ़्लाईट का समय होता तो हमें यहाँ के जहाज की उड़ान भी देखनी थी, कैसे पायलट दो पहाड़ों के बीचे से जहाज को उड़ा कर ले जाता है।
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| पारो भूटान की हवाई पट्टी के साथ बहती पारो नदी |
पारो पहुंचने के बाद हमे गाईड सातवी संदी के बने बौद्ध मठ क्यीचू ल्हाखांग में ले गया। इसे तिब्बत के राजा सोङ्ग्त्सेन गेंपो द्वारा बनवाया गया था। सातवीं सदी के प्राचीन इस प्राचीन मठ में बुद्ध के अवतार पद्मसंभव की बड़ी प्रतिमा स्थापित की गई है। पद्म संभव एवं बुद्ध की प्रतिमा सिर्फ़ मूंछों का अंतर पाया जाता है। इसकी मूंछे तिब्बतियों के जैसी पतली होती हैं। इस स्थान पर मैने भी तंत्र के देवता को भूटानी मुद्रा में 20 रुपए अर्पित किए। जब किसी के घर जाते हैं तो परम्परा से उसे नजराना पेश करना ही पड़ता है। यह बौद्द मठ परम्परागत चटक रंगों में ही संवारा गया है।
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| क्यीचू ल्हाखांग मठ |
यहाँ हमें पेलरी कॉटेज रिसोर्ट ले जाया गया। मौसम शाम होने से बिगड़ रहा था कुछ बूंदे माथे पर से टकरा कर अपनी उपस्थिति का अहसास दिला रही थी। यहां पहुंचने पर पता चला कि कॉटेज में रुकना है। बारुद फ़ैक्टरी जैसे सभी मैग्जिन अलग-अलग बनी हुई थी। अच्छा ही था, कवि, लेखक जैसे अति ज्वलनशील और ब्लॉगर फ़ेसबुकिए जैसे अत्यंत विस्फ़ोटक पदार्थ ही थे। इन्हें अलग-अलग रखने में ही भलाई थी। खैर भ्रमण के बाद अब देह विश्राम करना चाहती थी। काफ़ी लम्बा सफ़र तय करके आए थे। हमारी चौकुटिया में पड़ोसी बने डॉ नित्यानंद पाण्डे एवं शुभदा पाण्डे जी, पिछवाड़े में प्रकाश हिन्दूस्तानी कृष्णकुमार यादव, सुनीता यादव एवं कुसुम वर्मा थे।
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| पेलरी कॉटेज पारो |
रुम में पहुंचने पर पता चला कि खिड़कियों से ठंडी हवा आ रही है, वैसे भी तापमान माईनस 8-9 चल रहा था और मौसम देखते हुए रात में 13-14 तक पहुंचने की आशंका थी। मैने खिड़कियों की झिरियों में टेप चिपकवाया तब कहीं जाकर ठंडी हवा आनी बंद हुई। कॉटेज बहुत ही सुंदर स्थान पर था। सामने पर्वतों पर जमी हुई बर्फ़ एवं बहती हुई पारो चू सुंदर दृश्य उत्पन्न कर रही थी। चाय की चुस्कियां लेते हुए हमने बरामदे में ही कुछ समय गुजार दिया। थोड़ी देर बाद कृष्णकुमार यादव की अपना लेपटाप लेकर आ गए, उन्हें फ़ोटोएं चाहिए थे तथा सभी मित्र चाहते थे कि वहीं पर अपने-अपने कैमरे की फ़ोटुओं का आदान-प्रदान हो जाए तो ठीक ही रहेगा। सभी फ़ोटोएं उनके पेनड्राइव में डालकर सुपुर्द कर दिया। और भोजन करके अपनी रजाई गर्म की।
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| कॉटेज में सांझ की चाय की चुस्कियां लेते प्रकाश हिन्दुस्तानी |
सुबह नास्ते के बाद फ़्लाईट की सवारियों को यहीं से एयरपोर्ट जाना था और ट्रेन वाली सवारियों को जलपाईगुड़ी या सिलीगुड़ी तक। इस मौके हमें अलग होना था, सभी ने एक दूसरे को भावभीनी विदाई दी और चल पड़े अपनी-अपनी मंजिल की ओर। लौटते हुए हमने पारो एयरपोर्ट से हवाई जहाज की उड़ान देखी और उसे कैमरे में कैद करने की भी कोशिश की। बस में फ़िर से गजल और कविताओं की महफ़िल प्रारंभ हो गई। सफ़र कटता जा रहा था। धीरे-धीरे चलते हुए हम फ़्यूशलिंग पहुंच गए। सीमा पार करते ही कोलाहल सुनाई देने लगा। समझ आ गया था कि हम भारत में पहुंच गए। यहाँ से हमें फ़िर दो हिस्सों में बंटना था। छत्तीसगढ़ से जाने वाले अलग एवं उत्तर प्रदेश जाने वाले अलग हो गए।
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| जय गाँव में अलग होते यात्री, पप्पू अवस्थी जी, डॉ रामबहादूर मिश्र जी, डॉ अशोक गुलशन जी, मनोज पाण्डे जी |
उन्हें बड़ी गाड़ी में बैठाया और हमें सूमो दे गई। हम सुमो से सिलीगुड़ी पहुंचे। वहां काफ़ी देर तो हमें होटल ढूंढने में लग गया। रात हो गई थी, इसलिए शीघ्र ही होटल ढूंढ कर आराम करना था। आखिर एक होटल मोल तोल करके जम ही गया और हम उसमें शिफ़्ट हो गए। होटल वाले मैनेजर ने सभी की फ़ोटो ली और पहचान पत्र की फ़ोटो कापी कराई। उसने बताया कि होटल में ठहरने वाले सभी ग्राहकों की फ़ोटो आई डी यहाँ के पुलिस विभाग को रात तक मेल करना पड़ता है। जिससे उनके पास भी जानकारी उपलब्ध रहे कि होटल में कौन रुका हुआ है। खैर सुरक्षा के लिहाज से यह ठीक भी था। रात दही पराठा खा कर हम स्लीपिंग मोड में आ गए।
बुद्धा टॉप - भूटान यात्रा -7
प्रारम्भ से पढ़ें
दिन अभी ढलने में कुछ घंटे बाकी थे। हमारी सांझ की सैर भूटान के राष्ट्रीय संग्रहालय से प्रारंभ होने वाली थी। थिम्पू चू के किनारे चलते हुए हमारी बस घाटी के दूसरी तरफ़ स्थित एक पहाड़ी की ओर चल पड़ी। थिम्पू चू का पानी एक दम साफ़ था। यह नदी यहाँ पर उथली है और इसके दोनो तरफ़ ही नगर बसा हुआ है। पहाड़ी पर संग्रहालय बना हुआ है। इसमें प्रवेश शुल्क प्रति व्यक्ति 25 रुपए है। संग्रहालय के कर्मचारी जल्दी कर रहे थे क्योंकि 5 बजे संग्रहालय बंद होने का समय है। सभी ने शुल्क देकर टिकिट ली और संग्रहालय में प्रवेश किया। संग्रहालय में कुछ खास तो दिखाई नहीं दिया। परन्तु भूटानी संस्कृति एवं उसके कुछ योद्धाओं के विषय में जानकारी अवश्य मिली। इसके पश्चात हम बाजार की ओर चल पड़े।
दिन अभी ढलने में कुछ घंटे बाकी थे। हमारी सांझ की सैर भूटान के राष्ट्रीय संग्रहालय से प्रारंभ होने वाली थी। थिम्पू चू के किनारे चलते हुए हमारी बस घाटी के दूसरी तरफ़ स्थित एक पहाड़ी की ओर चल पड़ी। थिम्पू चू का पानी एक दम साफ़ था। यह नदी यहाँ पर उथली है और इसके दोनो तरफ़ ही नगर बसा हुआ है। पहाड़ी पर संग्रहालय बना हुआ है। इसमें प्रवेश शुल्क प्रति व्यक्ति 25 रुपए है। संग्रहालय के कर्मचारी जल्दी कर रहे थे क्योंकि 5 बजे संग्रहालय बंद होने का समय है। सभी ने शुल्क देकर टिकिट ली और संग्रहालय में प्रवेश किया। संग्रहालय में कुछ खास तो दिखाई नहीं दिया। परन्तु भूटानी संस्कृति एवं उसके कुछ योद्धाओं के विषय में जानकारी अवश्य मिली। इसके पश्चात हम बाजार की ओर चल पड़े।
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| राष्ट्रीय संग्रहालय थिम्पू भूटान |
भूटान का बाजार भारतीय एवं चीनी सामानों से अंटा पड़ा है, भारतीय सामान कोलकाता के रास्ते यहाँ तक पहुंचता है और चीनी सामान नेपाल होते हुए सिलीगुड़ी के रास्ते भूटान के बाजारों तक आता है। गर्म कपड़े यहाँ पर अच्छे मिलते हैं, खासकर चमड़े एवं रैग्जिन की जैकेटें काफ़ी उम्दा है, लेकिन इनका मूल्य भी आम आदमी की पहुंच के बाहर है। जूते भी कई रंगों के मिलते हैं, विशेषकर महिलाओं एवं बच्चों के। हिमालय क्षेत्र का देश होने के कारण यहाँ पैरों को गर्म रखने के लिए जूते अनिवार्यत: पहने जाते हैं। थिम्पू का यह बाजार मुझे मंहगा लगा। इस बाजार में वस्तुओं के मूल्य पर्यटक स्थलों की तरह ही कुछ अधिक हैं। यहाँ की अधिकतर दुकानदार महिलाएं ही हैं।
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| पारो का बाजार |
दो-तीन घंटे बाजार की सैर करके जब हम बस के समीप पहुंचे तो कई सदस्य बस तक नहीं पहुंचे थे। बाजार में ही घूम रहे थे। एक घंटे से अधिक खड़े होने के कारण ड्रायवर को 50 रुपए पार्किंग चार्ज देना पड़ा। इसलिए इनके विलंब को लेकर वह बड़बड़ाने लगा और सबसे 100 रुपए इकट्ठे करके देने को कहने लगा। कल भी उसने ही पार्किंग चार्ज दिया था। मेरी हल्की फ़ुल्की उससे बहस भी हो गई। किसी तरह सबके लौट आने पर हम रिजोर्ट में लौट आए। जो भूटान का सिम हमने खरीदा वह किसी काम नहीं आ रहा था। फ़ोन कभी लगता था कभी नहीं। लौट कर आने के बाद उसके बैलेंस के 200 रुपए मैने घर बात करके खत्म कर दिए।
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| संग्रहालय में भूटानी सिपाही |
रात सबको भोजन के वक्त बता दिया गया था कि उन्हें सुबह जल्दी तैयार होकर पारो के लिए चलना है और इसी रास्ते में पड़ने वाले कुछ स्थानों की सैर कराई जाएगी। बस इसे ही ध्यान में रख कर हम सुबह जल्दी उठ गए। सभी ने तैयार होकर अपने सामान बस में लाद दिए और बस पारो के लिए चल पड़ी। हमारी बस सबसे पहले भूटान के चिड़ियाघर पहुंची। यहाँ पर कुछ पैदल चलना पड़ता है। लगभग आधा किलोमीटर पैदल चलने के पश्चात तारों की फ़ेंसिग से घिरा एक बाड़ा दिखाई दिया जिसमें भूटान का राष्ट्रीय पशु "टाकिन" रखा गया था। इसका पीछे का आधा हिस्सा गाय जैसा एवं सिर बकरे के जैसा है। ऐसा लगता है किसी ने गाय और बकरे को जोड़ दिया हो।
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| बस के यात्री |
ऐसा जानवर मैं पहली बार देख रहा था। इसके विषय किंवदन्ती है कि सन् 1455 के आसपास एक चमत्कारी लामा जी को एक दिन गाय और बकरी की हड्डियां बिखरी पड़ी मिली। उन्हें चमत्कार दिखाने को कहा गया। लामा ने बिखरी हड्डियों को जोड़कर उन पर प्राण का संचार किया तो वह टाकिन बन कर जंगल में भाग गया। ये टाकिन उसी के वंशज बताए जाते हैं। इस लामा के चमत्कार की कई कहानियां बताई जाती हैं। इस प्रकार उत्तरी भूटान के जंगलों में टाकिन पाया जाता है तथा इसके नाम पर ही भूटान की रेड वाईन का नामकरण किया गया है। इसके मैने कई फ़ोटो लिए और हम वापस बस में लौट आए।
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| भूटान का राष्ट्रीय पशु - टॉकिन |
इसके बाद हमारी बस शहर में ही बने एक मंदिर चंगघा ल्हाखंग में पहुची। इसे लोग हनुमान मंदिर भी कह रहे थे। यहाँ लोग अपने बच्चों के स्वास्थ्य की कामना करते हुए लामा से आशीर्वाद दिलाने आते हैं। इसके बाद हम वांगचुग मेमोरियल पहुचे। यहाँ पर हमें हिन्दी भाषी श्री लंका में शिक्षित भूटानी गाईड कुमार मिला। उसने बताया कि इस स्मारक को तीसरे राजा ड्रूक ग्यालपो किंग जिग्मे दोरजी वांगचुक की याद में उसकी माता रानी फ़ुंत्शो चोदेन वांगचुक ने 1974 में बनवाया था यह स्मारक बहुत ही सुंदर है। इसमें भूटानी संस्कृति की झलक दिखाई देने के साथ अपने राजा के प्रति अथाह सम्मान भी दिखाई देता है। इस अवधि में मुझे भूटान में एक भी भिखारी नहीं दिखाई। नहीं कोई पैसे लिए हाथ फ़ैलाते दिखा।
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| पुण्यार्थी - शुभदा पाण्डे, कुसुम वर्मा, डॉ नित्यानंद पाण्डे, रविन्द्र प्रभात, कृष्णकुमार यादव, मनोज पाण्डे |
इस मंदिर से हम लोग बुद्धा टॉप की सैर पर चले। इस पहाड़ की चोटी पर चीन सरकार के सहयोग से भूमि स्पर्श मुद्रा में बुद्ध (शाक्य मुनि) की 169 फुट (51.5 मीटर) ऊंची प्रतिमा विशाल कांस्य प्रतिमा स्थापित की गई है। अवश्य ही कुछ वर्षों के बाद यह स्थान भूटान टुरिज्म का एक लैंड मार्क बनकर तैयार होगा तथा भूटान को पहचान दिलाएगा। बुद्ध की कांस्य प्रतिमा यहाँ पर आकाश से होड़ लगाती दिखाई देती है। इसके समक्ष बहुत बड़ा मैदान है जिसमें टाईल्स बिछाने का काम चल रहा था। यात्री दल ने यादगार के लिए यहाँ पर कई चित्र खींचे एवं खिंचवाए। इस स्थान पर अगर बगीचा बना दिया जाता और उसमें कुछ फ़ूल एवं फ़ल के वृक्ष लगा दिए जाते तो यह स्थान काफ़ी मनोरम हो जाएगा। अब यहाँ से हमारा अंतिम पड़ावा पारो था। जहाँ हमें एक रात व्यतीत करनी थी।
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| भूटान यात्रा दल बुद्धा टॉप में |
बुद्धा टॉप से हम चल पड़े पारो की ओर, अभी तक का सफ़र सुनीता दो लाईनर कविताओं के साथ कट गए। कृष्णकुमार यादव जी एवं कुसुम वर्मा जी इसमे पूर्ण रुपेण सहभागी बनी थी। पप्पू अवस्थी जी खड़े खड़े इसे रिकार्ड कर रहे थे। उन्हें रिकार्डिंग में आनंद आ रहा था और मुझे सुनीता की कविताओं में तीसरी लाइन जोड़ने का मजा आ रहा था। इस तरह सफ़र मजे से कट रहा था। लम्बे सफ़र की यही मौज है कि बोलते बतियाते कट जाता है और यदि कवि, लेखक या गायक कलाकारों का संग हो तो तख्ते लंदन तक का सफ़र बस में कट जाएगा। अब एक यात्रा ऐसे ही मित्रों के साथ शिप में अंडमान की करनी है जहाँ सारे रास्ते भर कविताएं बरसती रहेगीं।
मोक्षार्थियों द्वारा लिंग पूजा की परम्परा………… भूटान यात्रा - 6
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थिम्पू में होटल ताज के सामने भूटान की स्ट्रीट मार्केट है। जहां भूटान के हस्त शिल्प की झलक मिलती है तथा हस्त शिल्प की बिक्री भी होती है। सभी दुकानदार महिलाएं ही हैं और आगे की कहानी इसी स्ट्रीट से प्रारंभ होती है। मैने देखा की इन दुकानों में विभिन्न तरह से सजाए हुए एवं बिना सजावट के भी "पुरुष लिंग" विक्रय के लिए रखे हुए थे। इस तरह खुले आम दुकानों में सामने रख कर पहली बार मैंने कहीं लिंग बिकते देखे। साथ में घूम रही भारतीय महिलाएं एवं पुरुष देख कर झिझक रहे थे। हमारे यहाँ सेक्स को टैबू समझा जाता है। यह प्रदर्शन की वस्तु नहीं मानी जाती और सेक्स से संबंधित चर्चा भी करना वर्जित समझा जाता है। इस तरह खुले आम लिंगों की बिक्री देख कर मेरी जिज्ञासा बढी और मैने दुकानदारों से इस विषय में चर्चा करना उपयुक्त समझा। उनसे ही सही जानकारी मिल सकती थी।
थिम्पू में होटल ताज के सामने भूटान की स्ट्रीट मार्केट है। जहां भूटान के हस्त शिल्प की झलक मिलती है तथा हस्त शिल्प की बिक्री भी होती है। सभी दुकानदार महिलाएं ही हैं और आगे की कहानी इसी स्ट्रीट से प्रारंभ होती है। मैने देखा की इन दुकानों में विभिन्न तरह से सजाए हुए एवं बिना सजावट के भी "पुरुष लिंग" विक्रय के लिए रखे हुए थे। इस तरह खुले आम दुकानों में सामने रख कर पहली बार मैंने कहीं लिंग बिकते देखे। साथ में घूम रही भारतीय महिलाएं एवं पुरुष देख कर झिझक रहे थे। हमारे यहाँ सेक्स को टैबू समझा जाता है। यह प्रदर्शन की वस्तु नहीं मानी जाती और सेक्स से संबंधित चर्चा भी करना वर्जित समझा जाता है। इस तरह खुले आम लिंगों की बिक्री देख कर मेरी जिज्ञासा बढी और मैने दुकानदारों से इस विषय में चर्चा करना उपयुक्त समझा। उनसे ही सही जानकारी मिल सकती थी।
भूटानी नाम मुझे बड़े कठिन लगे, याद ही नहीं रहते इसलिए दुकानदार का नाम तो मुझे याद नहीं पर उसने बताया कि उनके यहाँ लिंग की पूजा होती है। प्रतीक के रुप में छोड़े लिंगविग्रह से लेकर बड़े बड़े लिंग बनाए जाते हैं। आंखों वाले लिंग एवं मानवाकृति में दाढी मूंछ वाले लिंग बनाए जाते हैं। ड्रेगन जैसे लिंग भी मिलते है। इन्हें कपड़े आदि पहना कर सजाया जाता है तथा रिबन से बांधा जाता है, जैसे कोई गिफ़्ट आयटम बांधा जाता है। भूटान में लिंग को सृजन का कारक एवं रचनात्मक सकारात्मक उर्जा का प्रतीक माना जाता है। प्रत्येक घर में इसे रखा जाता है। घर के द्वार के दोनों तरफ़ लिंग चित्रित किए जाते हैं। इनके चित्र बड़े ही कलात्मक एवं सुंदर ढंग से चटक रंगों से तैयार किए जाते हैं। इन्हें सुख समृद्धि का द्योतक माना जाता है। भूटानी लिंग को अपने घरों में इसलिए टांगते हैं कि बुरी आत्माओं से बचाव होता रहे एवं मर्दों में सेक्स की क्षमता में इजाफ़ा हो।
लिंग पूजन तो भारत में लगभग 8 वीं 9 वीं शताब्दी से हो रहा है। हमारे यहां लिंग योनिपीठ में स्थापित होता है। लिंग एवं योनि दोनों की ही पूजा होती है। इसके साथ ही वाममार्ग में जननांगों की पूजा का विशेष महत्व है। पंच मकारों में मैथुन को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है तथा इसे मोक्ष का साधन माना गया है। "मद्यं मांसं मीनं मुद्रां मैथुनं एव च, ऐते पंचमकार: स्योर्मोक्षदे युगे युगे।" भूटान हमारा पड़ोसी देश है जो हमारी धरती से भी जुड़ा हुआ है। किसी जमाने में सुदूर देशों से भी विद्याथी, विद्याध्ययन के लिए भारत आते थे। ऐसे में यहाँ के संस्कारो एवं संस्कृति का भी विशेष प्रभाव उन पर पड़ता ही होगा और वाममार्गी लिंग पूजन इसी रास्ते से भूटान पहुंचा होगा। ऐसी मेरी मान्यता है।
यहाँ से खोज-बीन आगे बढ़ती है तो पता चलता है कि मनुष्य ने सेक्स के जरिए मोक्ष का मार्ग ढूंढने का प्रयास किया। मोक्ष मिला या नहीं। इसकी तो कहीं जानकारी नहीं मिलती पर सेक्सजनित रोगो से परलोक अवश्य सिधार गए होगें। वाममार्गियों से लेकर आचार्य रजनीश तक ने सेक्स के माध्यम से मोक्ष का मार्ग ढूंढने का प्रयास किया और इस पर खुली चर्चा भी की। संभोग से समाधि तक उनका प्रवचन भी काफ़ी प्रसिद्ध रहा तथा युवाओं में यह प्रवचन चर्चित भी रहा। ऐसे ही एक संत 500 वर्ष पूर्व भूटान में भी हुए। भूटानी संत द्रुकपा कुनले का भी मानना था कि सेक्स के माध्यम से मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है। कहते हैं इस संत ने 5000 महिलाओं से यौन संबंध स्थापित किया।
कुनले का जन्म 1455 में तिब्बत के पश्चिमी क्षेत्र सांग में बौद्ध धर्म के ग्या वंश के रालुंग मांनेस्ट्री में हुआ था। उसे कुनगा लेगपाई जैगपो के नाम से भी जाना जाता है। उसके पिता का नांग सो रिन चेन जांग पो थे। दंतकथा के अनुसार कुनले में दुष्टों को भी रक्षा करने वाले देवताओं में बदल देने की शक्ति थी। वह मात्र अपने लिंग को छुआकर ऐसा करिश्मा कर दे्ता था। कुनले के लिंग को थंडरबोल्ड ऑफ फ्लेमिंग विजडम कहा जाता था। कुनले का दावा था कि वह पुरोहितों के पाखंड को दूर करना चाहता है। वह शराब पीकर मस्त रहने के समर्थक था। दुनिया के कई देशों से महिलाएं उसका आशीर्वाद पाने के लिए इस विचित्र बौद्ध संन्यासी के मठ में आती थीं। उसने बहुत ही कम समय में बड़ी ख्याति प्राप्त कर ली थी। संन्यासी कुनले के उपदेश का प्रभाव आज भी हमने भूटान में देखा, यहां विभिन्न तरह के लकड़ी से बने हुए लिंग दिखाई देना कुनले की ही परम्परा है।
भूटान के लोगो के अनुसार बौद्ध धर्म में जन्म लेकर कुनले ने अपनी एक अलग शाखा बना ली बौद्ध मत के अन्दर जो कि लिंग कि पूजा किया करते थे। कुनले सबको एवं खासकर स्त्रियों के साथ सेक्स करके उन्हें आशीर्वाद दिया करता था। वह तिब्बत, भूटान आदि देशों में घूम घूमकर स्त्री और कन्याओ का कौमार्य तोड़ता था और सबके साथ सेक्स करता था। उसकी इसी प्रवृत्ति के कारण लोगो ने उसके सम्मान में उसका एक मंदिर भी बना दिया। कुनले ने एक बुरी, मांसभक्षी स्त्री के साथ सेक्स कर उसका गर्भ ठहरा दिया था जिसका मंदिर भी कुनले के साथ ही बनाया गया है।
लोगो के अनुसार कुनले स्त्री प्रेमी था और हमेशा उनका भला चाहता था.. आज भी भूटान के लोग उसके मंदिर में जाते हैं और वहां भिक्षु उनको पुरुष लिंग से आशीर्वाद देता है ताकि उनकी सेक्स लाइफ अच्छी चलती रहे। इस तरह हमने भारतीय वाममार्गी दर्शन का प्रभाव कुनले के माध्यम से भूटान में भी देखा। जो सेक्स के माध्यम से मोक्ष प्राप्त कराना चाहता था और भूटान में आज भी पूजनीय है और परम्परा में समाहित होने के कारण यह लिंग पूजा सहत्राब्दियों तक चलते भी रहेगी। भले ही विदेशियों के लिए भूटान में सार्वजनिक रुप से लिंग प्रदर्शन कौतुहल का कारक बनता हो परन्तु भूटानियों के लिए सामान्य जन-जीवन का एक हिस्सा है।
थिम्पू की सुबह एवं परिकल्पना सम्मान समारोह - भूटान यात्रा -5
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पौ फ़टते ही आँखे खुल गई, बालकनी से देखा तो आस-पास अंधेरा सा ही था, पर दूर पहाड़ की बर्फ़ जमी चोटी रश्मि स्नान कर रही थी। सूर्य की किरणें धवल बर्फ़ पर पड़ने के कारण स्वर्णाभा का दृश्य उत्पन्न कर रही थी। द्वार उन्मुक्त कर बाहर निकला तो ठिठुरा देने वाली ठंड थी। कैमरा विश्राम मोड में होने के कारण इस दृश्य को संजो नहीं सका। सिर्फ़ आंखो के द्वारा हृदय में ही उतार पाया। मोबाईल कैमरे से दो-चार चित्र लिए और भीतर आ गया। तभी द्वार पर दस्तक हुई और चाय वाला भी पहुंच गए। गर्मागर्म चाय की भाप से सिकती हुई अंतड़ियों को राहत मिली। कमरे से बाहर निकलने का जी नहीं कर रहा था।
पौ फ़टते ही आँखे खुल गई, बालकनी से देखा तो आस-पास अंधेरा सा ही था, पर दूर पहाड़ की बर्फ़ जमी चोटी रश्मि स्नान कर रही थी। सूर्य की किरणें धवल बर्फ़ पर पड़ने के कारण स्वर्णाभा का दृश्य उत्पन्न कर रही थी। द्वार उन्मुक्त कर बाहर निकला तो ठिठुरा देने वाली ठंड थी। कैमरा विश्राम मोड में होने के कारण इस दृश्य को संजो नहीं सका। सिर्फ़ आंखो के द्वारा हृदय में ही उतार पाया। मोबाईल कैमरे से दो-चार चित्र लिए और भीतर आ गया। तभी द्वार पर दस्तक हुई और चाय वाला भी पहुंच गए। गर्मागर्म चाय की भाप से सिकती हुई अंतड़ियों को राहत मिली। कमरे से बाहर निकलने का जी नहीं कर रहा था।
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| खिड़की से पर्वत दर्शन |
हम मैदानी इलाकों के रहने वालों के नित्य स्नान जरुरी है, स्नान के साथ ही दिनचर्या प्रारंभ होती है। स्नानाबाद ही लगता है कि आज फ़िर नया दिन निकला है, वरना दिन पुराना ही रहता है। रात की खुमारी भी नहीं उतरती। पता नहीं यहाँ के लोग कितने दिनों में स्नान करते होगें या फ़िर काग स्नान से ही काम चला लेते होगें। बाथरुम में न बाल्टी थी न मग्गा। पर छ: फ़ुटा बाथटब जरुर था। नल से गर्म पानी आना शुरु हो गया। आज बाथटब स्नान ही किया जाए। बाथटब लबालब भरने के बाद उसमें उतर गए और गर्म पानी से देह से भरपूर सिंकाई की। आनंद आ गया। अभी तक फ़िल्मों में नायिकाओं को बाथटब स्नान करते देखा था। आज हम खुद ही बाथटब में थे। पर कोई फ़ोटो लेने वाला नहीं था। एक बारगी तो फ़ोटो की कमी खली। :) फ़ोटो नहीं हुई वरना 6 पैक और 8 पैक सब दिख जाते।
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| सुबह की धूप का आनंद - ललित शर्मा, गिरीश पंकज, कृष्ण कुमार यादव एवं समर बहादुर वर्मा |
तैयार होकर लॉबी में पहुंचे तो सूनीता हांफ़ते हुए आ रही थी, जैसे 10-20 किलोमीटर की मैराथन दौड़ कर आ रही हो। बोलने के लिए मुंह खोलती तो शब्द भी जम रहे थे और उष्मा पाकर अटक-अटक पर पिघल कर बाहर निकल रहे थे। जमें हुए शब्द जब हम तक पहुंचे तो पता चला कि मोहतरमा मार्निंग वॉक करके आ रही हैं। फ़िर पता चला कि इनकी हार्दिक इच्छा यहाँ बाईक चलाने की है। बाईक तो मुझे कहीं दिखाई नहीं दी पर इन्होने कहा कि "मैं इंतजाम करती हूँ।" पता नहीं किसको बाईक के लिए कह कर आई और वह बाईक 3 दिनों में कहीं नजर नहीं आई। न ही बाईक की सवारी हुई। इनकी इच्छा अधूरी रह गई।
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| यही चिमनी है लोखन वाली |
टैरेस पर धूप आ गई, साथ ही यहाँ एक लोखन की चिमनी वाली सिगड़ी भी सुलग रही थी। जब मैं टैरेस पर पहुंचा तो कोई सज्जन नहीं आए थे। सिगड़ी में थोड़ी देर हाथ सेंक कर दस्ताने धारण कर लिए। हाथों का बचाव तो हो गया पर नाक और कान को ठंड लग रही थी। कान बंद करो तो सुनाई नहीं देगा और नाक बंद करो तो हरे राम, हे! राम हो जाएगा। तभी सर्जना शर्मा जी का पदार्पण हुआ। वे स्नानोपरांत ध्यान मोड में थी। ऐसे लग रहा था कि अनुलोम विलोम करते हुए ही चल रही हैं। उन्होने एक सोफ़े पर आसन जमा लिया और सूर्यमुखी होकर अनुलोम विलोम प्रारंभ कर दिया। स्वास-प्रस्वास की प्रक्रिया शरीर की ऊष्मा बनाए रखती है। जैविक हीटर शरीर की रक्षा के अनुसार ऊष्मा का उत्सर्जन प्रारंभ कर देता है।
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| योगाचार्या सर्जना शर्मा जी |
यहाँ सुबह की धूप कुछ अजीब ही तरह की चमकीली होती है और आंखों को चुभती है। गर्मी के मौसम में जिस तरह चिलचिलाती धूप पड़ती है, कुछ उस तरह की ही धूप थी। सूर्य की ऊष्मा भी ठंड को कम नहीं कर पा रही थी। यह तो प्रकृति की महान कृपा हम थी कि हवा नहीं चल रही थी। अगर हवा चलती तो कहर ढा देती। दस्ताने हाथ से बाहर निकालते ही अंगुलियाँ गायब हो जाती थी। नाश्ता भी लग चुका था, हमसे तो यहाँ का खाना ही नहीं खाया जा रहा था। पानी भी बहुत कम पीया जा रहा था। ठंडा पानी पीयो तो दांत कनकनाने लगते और गर्म पानी गले से नीचे नहीं उतरता। अजीब संकट में फ़ंस गए थे और इसका कोई हल भी नहीं था।
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| ब्लॉग़ भांति भांति के |
सुबह से ही मनोज पाण्डे जी ने आज के कार्यक्रम की लिस्ट एवं आवश्यक वस्तुओं के साथ एक फ़ोल्डर रुम में ही सबको थमा दिया। आज रिसोर्ट के मिटिंग हॉल में मुख्य कार्यक्रम था। थोड़ी देर में सभी दूल्हे की माफ़िक सजधजकर रुम से बाहर निकलने लगे। लगा कि फ़ैंसी शो जैसा ही कार्यक्रम होने वाला है। डॉ विनय दास जी ने पूर्ण भारतीय परिधान धारण कर लिया था। कटिवस्त्रम, अंगवस्त्रम, जैकेटम के साथ उत्तरीयम धारण कर भूटान की धरती पर पारम्परिक भारतीय परिधान गरिमामय दर्शन भूटानवासियों को करवाया। बाकी तो सभी कोट पैंट में ही थे।
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| कार्यक्रम में सिरपुर की कहानी |
आज के कार्यक्रम के अतिथि भूटान चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के महासचिव फूब शृंग, उप महासचिव चन्द्र क्षेत्री, सार्क समिति के महिला विंग तथा इन्टरनेशनल स्कूल ऑफ भूटान की अध्यक्षा थिनले ल्हामा का उपस्थित होना भी तय हो गया। कार्यक्रम 11 बजे प्रारंभ हुआ। अतिथियों के साथ डॉ नित्यानंद पाण्डे, गिरीश पंकज, कृष्ण कुमार यादव एवं रविन्द्र प्रभात मंचासीन हुए और कार्यक्रम संचालन की डोर सुनीता यादव ने थाम ली। एकदम झकास भारतीय अंग्रेजी में कार्यक्रम का संचालन प्रारंभ हुआ। वैसे भूटान के बड़े छोटे अधिकारी हिन्दी समझते और बोलते हैं क्योंकि इनका काम भी हिन्दी के बिना नहीं चलता। पर इन्हें अंग्रेजी की सुविधा हमारे मंच से विशेष तौर पर प्रदान की गई।
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| सिरपुर सैलानी की नजर से भेंट |
मंच के समक्ष ही समस्त सम्मानाधिकारी बैठे हुए थे और सभी के मोबाईल में कैमरे भी थे। नाम की पुकार होते ही सभी अपने मोबाईल फ़ोन लेकर सामने ही डट गए, अब पीछे बैठने वालों को कुछ दिखाई दे या न दे, उनकी बला से। वैसे भी जब से मोबाईल में कैमरे का चलन प्रारंभ हुआ है, लगभग सभी समारोहों में कमोबेश यही स्थिति रहती है। हायर किया गया फ़ोटोग्राफ़र पीछे रह जाता है और मोबाईल फ़ोटोग्राफ़र मुंह में भी कैमरा डाल कर फ़ोटो ले लेते हैं। फ़ेसबुक, वाट्सअप फ़ोबिया जो कराए वो कम है।
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| मंचासीन अतिथिगण |
ब्लॉगर सम्मेलन में परिकल्पना सम्मानों का वितरण किया गया। कृष्ण कुमार यादव को सर्वोच्च सार्क शिखर सम्मान, डॉ. राम बहादुर मिश्र को साहित्य भूषण सम्मान, रणधीर सिंह सुमन व डॉ. विनय दास को क्रमशः सोशल मीडिया सम्मान और कथा सम्मान, कुसुम वर्मा को लोक-संस्कृति सम्मान, डॉ. अशोक गुलशन को हिन्दी गौरव सम्मान, सूर्य प्रसाद शर्मा को साहित्य सम्मान तथा ओम प्रकाश जयंत व विष्णु कुमार शर्मा को क्रमशः साहित्यश्री सम्मान व सृजनश्री सम्मान, विश्वंभरनाथ अवस्थी को नागरिक सम्मान प्रदान किए गए।
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| श्री फ़ूब शृंग एवं ब्लॉगर |
इस ब्लॉगर सम्मेलन में परिकल्पना सार्क शिखर सम्मान से श्री कृष्ण कुमार यादव, श्री ललित शर्मा एवं श्रीमती सम्पत मोररका को सम्मानित किया गया। स्मृति चिन्ह एवं उत्तरीय के साथ 25 हजार की राशि भी देने की घोषणा की गई। इसके अलावा डॉ. राम बहादुर मिश्र को साहित्य भूषण सम्मान, रणधीर सिंह सुमन व डॉ. विनय दास को क्रमशः सोशल मीडिया सम्मान और कथा सम्मान, कुसुम वर्मा को लोक-संस्कृति सम्मान, डॉ. अशोक गुलशन को हिन्दी गौरव सम्मान, सूर्य प्रसाद शर्मा को साहित्य सम्मान तथा ओम प्रकाश जयंत व विष्णु कुमार शर्मा को क्रमशः साहित्यश्री सम्मान व सृजनश्री सम्मान, विश्वंभरनाथ अवस्थी, सुनीता प्रेम यादव, प्रकाश हिन्दुस्तानी, गिरीश पंकज, अल्पना देशपांडे, अदिति देशपांडे, सर्जना शर्मा, निशा सिंह, आलोक भारद्वाज आदि को भी विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान के लिए परिकल्पना सम्मान से नवाज़ा गया।
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| परिकल्पना का परचम थिम्पू में लहराया |
सम्मेलन में पाँच पुस्तकों - संपत देवी मुरारका की यात्रा वृत्त, कुसुम वर्मा की ह्रदय कँवल, सूर्य प्रसाद शर्मा निशिहर की संघर्षों का खेल, विष्णु कुमार शर्मा की दोहावली, अशोक गुलशन की क्या कहूँ किससे कहूँ और परिकल्पना समय पत्रिका के जनवरी अंक, परिकल्पना कोष वेबसाईट का लोकार्पण भी किया गया । इसके अलावा अल्पना देशपांडे की कलाकृतियों की प्रदर्शनी व कुसुम वर्मा के लोकगीत गायन का उपस्थित सभी जनों ने आनंद लिया एवं प्रशंसा की । मुख्यातिथि ने अपने भाषण में भूटान एवं भारत की सांस्कृति विरासत एवं चल रहे साझे कार्यक्रमों की जानकारी दी। साथ उपस्थित भारतीयों को भूटान राष्ट्र के विषय में मुख्य जानकारी भी अवगत कराया। भोजनावकाश तक समारोह समपन्न हो गया। कुल मिलाकर मामला आनंददायक ही रहा।
भूटानी मुद्रा और टॉकिन : भूटान यात्रा 4
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भूटान की मार्केट में भारतीय मुद्रा उसी तरह स्वीकार की जाती है जिस तरह भारत में। परन्तु वे भारतीय मुद्रा रुपए के बड़े नोट लेकर भूटानी (नोगंत्रोम) मुद्रा वापस करते हैं। भूटानी नोटों का काजग अच्छा है, नेपाली मुद्रा जैसे गंदे नोट नहीं है। नेपाल के नोट तो जेब में रखने की इच्छा ही नहीं होती। वैसे भी नेपाल में भारत के 500 एवं 1000 के बड़े नोट प्रतिबंधित हैं। परन्तु भूटान में ऐसा नहीं है। वैसे मुद्रा का यह खेल ध्यान देने योग्य है। भूटान में तो भूटानी मुद्रा चलती ही है। परन्तु भारत के सीमांत क्षेत्र में भूटानी मुद्रा का काफ़ी प्रचलन है। भूटानी नोट तो देखने मिले, लेकिन सिक्के कहीं दिखाई नहीं दिए। वैसे विदेशी मुद्रा के प्रति मेरा आकर्षण नहीं के बराबर है और नहीं मैं विदेशी मुद्रा अपने पास रखने की कोशिश करता हूँ।
भूटान की मार्केट में भारतीय मुद्रा उसी तरह स्वीकार की जाती है जिस तरह भारत में। परन्तु वे भारतीय मुद्रा रुपए के बड़े नोट लेकर भूटानी (नोगंत्रोम) मुद्रा वापस करते हैं। भूटानी नोटों का काजग अच्छा है, नेपाली मुद्रा जैसे गंदे नोट नहीं है। नेपाल के नोट तो जेब में रखने की इच्छा ही नहीं होती। वैसे भी नेपाल में भारत के 500 एवं 1000 के बड़े नोट प्रतिबंधित हैं। परन्तु भूटान में ऐसा नहीं है। वैसे मुद्रा का यह खेल ध्यान देने योग्य है। भूटान में तो भूटानी मुद्रा चलती ही है। परन्तु भारत के सीमांत क्षेत्र में भूटानी मुद्रा का काफ़ी प्रचलन है। भूटानी नोट तो देखने मिले, लेकिन सिक्के कहीं दिखाई नहीं दिए। वैसे विदेशी मुद्रा के प्रति मेरा आकर्षण नहीं के बराबर है और नहीं मैं विदेशी मुद्रा अपने पास रखने की कोशिश करता हूँ।
| भूटानी 100 रुपया |
भूटानियों के नाम बहुत कठिन लगे, उच्चारण एवं याद रखने में। मुझे जो भी भूटानी मिले, उनमें किसी का भी नाम याद नहीं और न ही मैं याद रखने के लिए दिमाग पर जोर डाला। मुझे कौन सा यहाँ बसना है, जो इतनी माथापच्ची करुं। यहाँ दुकानों के दरवाजे बड़े नहीं होते। भारत में जैसे घर के दरवाजे 3 फ़ुट चौड़े होते हैं वैसे ही यहाँ दुकानों के द्वार भी होते हैं। एक दुकानदार से चर्चा हुई, वह अच्छी हिन्दी बोलता था। उसने मुझे रुपए एवं भूटानी मुद्रा के खेल के विषय में बताया कि भारत और भूटानी मुद्रा नोंगत्रम में कोई खास अंतर नहीं है और जो अंतर है वह आम आदमी की समझ में नहीं आता। भारत के सीमांत क्षेत्र में धड़ल्ले से भूटानी मुद्रा का चलन होता है।
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| स्ट्रीट मार्केट |
पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी क्षेत्र के बेलपाड़ा, नांगड़ाकाटा, तेलीपाड़ा, बीनागुड़ी, दालगांव और इथेबाड़ी इत्यादि स्थानों में भूटानी मुद्रा का भारतीय मुद्रा की तरह ही चलन है। भूटान की सीमा फ़्यूशलिंग के इस पार जयगाँव में भूटानी मुद्रा के 500 और 1000 के नोटों का चलन नहीं है। अगर आप किसी दुकानदार देगें भी तो वह नहीं लेगा। लेकिन जयगाँव से 25-30 किलोमीटर दूर बसे गाँव एंव कस्बों हासीमआरा, अलीपुर द्वार, कालचीनी, कालपाड़ा, हाशिमआरा, नंगड़ाकाटा और बानरहाटा में भूटानी नोट आराम से चल जाते हैं। यहाँ के लोग इन नोटों से व्यापार व्यवहार कर लेते हैं। इन नोटों के चलन के पीछे बड़ा गिरोह भी हो सकता है जो काले धन को एक नम्बर का बनाने का काम करता है।
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| रेड वाईन "टॉकिन" |
जबकि भारत में अन्य किसी देश की मुद्रा में व्यापार एवं व्यवहार करना कानूनन अपराध है, परन्तु सीमा क्षेत्र में मांग के अनुसार व्यापारियों को भूटानी मुद्रा में लेन देन करना पड़ता है। अन्यथा उनका व्यापार ठप्प हो जाएगा। ग्राहक जो भी मुद्रा दें, उसे स्वीकार करना उनकी मजबूरी है। हमने थिम्पू में भारतीय मुद्रा से ही खरीदी की। दुकानों का संचालन अधिक औरते ही करती हैं और टीवी पर भारतीय गानों के फ़िल्में भी देखती हैं। इसके कारण उन्हें हिन्दी बोलने एवं समझने में कोई अत्यधिक परेशानी नहीं होती।
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| भूटानी दुकान के समक्ष ब्लॉगर |
थिम्पू के बाजार में शराब के लिए कोई अलग से दुकान नहीं है। किराने की दुकानों में शराब मिलती है। कोई भी बालिग व्यक्ति शराब खरीद सकता है। लोग राशन के साथ शराब खरीदते हैं। भूटान की लोकल शराब "टॉकिन" है, जिसमें अल्कोहल 16% है। रेड वाईन जैसी इस शराब का प्रचलन अधिक है और इसे बिना पानी या सोडा के इस्तेमाल किया जाता है। कुछ कुछ आयूर्वैदिक आसव जैसा स्वाद है। साथ ही सस्ती भी है। 750 एम एल की एक बोतल 140 रुपए मे मिल जाती है। मेरे सामने ही कुछ भूटानी महिलाएं राशन के साथ एक-एक बोतल टॉकिन खरीद कर ले गई।
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| एक दृश्य |
रिसोर्ट में आने के बाद हम लोगों का भोजन बन कर तैयार हो गया था। भोजन करने के उपरांत हमने अपने बिस्तर की शरण ली। बाहर ठंड बढ रही थी। रिसोर्ट के केयर टेकर कह रहे थी कि आज की रात पारा - 14 पार कर जाएगा। ब्लू पाईन की लकड़ी से रुम का फ़र्श एवं दीवारे बने होने के कारण रुम गर्म था तथा वाताकूलन की व्यवस्था भी थी। बैड के गद्दे में लगे हीटर का बटन चालु करके सो गए तो रात को रजाई में पसीने आ गए। कुल मिला कर ठंड से बचने का इंतजाम उम्दा था। मैदानी लोगों को पहाड़ की ठंड बर्दास्त नहीं होती। अब बाकी कल देखा जाएगा। आज की रात तो गुलजार हो कर गुजर रही है।
भूटान में पहला दिन : भूटान यात्रा 3
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मिड टाऊन होटल पांच मंजिला था। रुम औसत दर्जे के ही थे। हमारे पहुंचने तक गरम पानी आना बंद हो गया था। होटल के साथ बार रुम भी अटैच था और उसके पीछे तरणताल भी। उपर कमरे की खिड़की से तरण ताल का पानी नीला और सुंदर दिखाई दे रहा था। कुछ बच्चे पानी में उछल कूद कर रहे थे। उनके साथ दो-चार बड़े बच्चे भी थे। मेरी इच्छा तरणताल में कुछ समय गुजारने की थी परन्तु वातावरण में ठंडक थी और सांझ ढलने के साथ टेम्परेचर भी मायनस में जाने वाला था। पर कुछ जुगाड़ लगा कर मैने तरणताल में छलांग लगा ही दी। ओह … पानी इतना ठंडा था कि एक बार तो सांस बंद होने को आ गई। जल्दी जल्दी पानी में हाथ पैर मारे और इस कोने से उस कोने तक 5 बार तैराकी की। शरीर में कुछ गर्माहट बनी। पर पानी बर्फ़ जैसा ही रहा।
मिड टाऊन होटल पांच मंजिला था। रुम औसत दर्जे के ही थे। हमारे पहुंचने तक गरम पानी आना बंद हो गया था। होटल के साथ बार रुम भी अटैच था और उसके पीछे तरणताल भी। उपर कमरे की खिड़की से तरण ताल का पानी नीला और सुंदर दिखाई दे रहा था। कुछ बच्चे पानी में उछल कूद कर रहे थे। उनके साथ दो-चार बड़े बच्चे भी थे। मेरी इच्छा तरणताल में कुछ समय गुजारने की थी परन्तु वातावरण में ठंडक थी और सांझ ढलने के साथ टेम्परेचर भी मायनस में जाने वाला था। पर कुछ जुगाड़ लगा कर मैने तरणताल में छलांग लगा ही दी। ओह … पानी इतना ठंडा था कि एक बार तो सांस बंद होने को आ गई। जल्दी जल्दी पानी में हाथ पैर मारे और इस कोने से उस कोने तक 5 बार तैराकी की। शरीर में कुछ गर्माहट बनी। पर पानी बर्फ़ जैसा ही रहा।
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| होटल मिड टाऊन एवं गगन शर्मा जी |
हमारे साथी मुझे पानी में तैरते देख कर उत्साहित हो गए। पूछने लगे पानी कैसा है? मैने कह दिया कि गुनगुना है और थोड़ा जलकिलोल करके दिखाया तो उन्हे विश्वास हो गया। अब वे भी धड़ाम धड़ाम। कूदते ही उनकी नानी याद आ गई। बहुत ठंडा पानी है, आपने धोखा दिया है शर्मा जी। अरे मैने तुम्हें कहा धोखा दिया। अगर मैं कहूंगा तो तुम बिल्डिंग से कूद जाओगे क्या? जब तक व्यक्ति के मन में इच्छा का अंकुरण नहीं होता तब तक वह किसी काम को नहीं करता। तुम्हारे मन में थी स्वीमिंग पुल में नहाने की इच्छा। बस उसे मैने थोड़ी सी हवा दी है। इतनी देर में तरणताल का केयर टेकर आ गया और चिल्लाने लगा कि यहाँ तैरने के लिए ड्रेस कोड है, आप लोग कुछ भी पहन कर कूद गए पानी में। भाई हमने तो अंडर वियर पहन रखी है, अब बिकनी वाला कास्ट्यूम ये लोग कहां से लाएं। इसी में काम चलाओ। ठंड के कारण अधिक देर पानी में नहीं रहे। मै तो रुम में आकर बिस्तर में घुस गया और एक नींद जम कर ली। अगलों की राम जाने।
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| फ़्यूसलिंग की सुहानी सांझ |
जब नींद खुली तो सूरज अस्ताचल की ओर जा रहा था। होटल की बालकनी से नदी के किनारे डूबता हुआ सूरज बहुत ही खूबसूरत छटा बिखेर रहा था। शनै: शनै: रात हो रही थी। खाने के समय तक गिरीश पंकज जी भी आ चुके थे। उनका कहना था कि उत्तर प्रदेश वालों की ट्रेन 9 घंटे विलंबित है इसलिए मुझे बस से भेज दिया। रात को ठंड बढ चुकी थी और केटरिंग वाले ने सब्जी, दाल सब में मीठा डाल दिया था। एक तरह का गुजराती खाना बना दिया। मेरा मन नहीं था खाने का। होटल का रेस्टोरेंट भी बंद हो चुका था। अब खाने में कोई मजा नहीं रहा। मैने अपने पास रखे कुछ फ़ल खाए और बिस्तर के हवाले हो गए। रात को सोना भी जरुरी है। आगे के सफ़र का कुछ पता नहीं था। हमें सोने के पहले बता दिया गया था कि सुबह 7 बजे यहां से बस थिम्पू के लिए रवाना हो जाएगी। सभी को समय पर ही तैयार रहना है।
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| फ़्युशलिंग का प्रवेश द्वार |
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| श्री ओमप्रकाश जयंत, डॉ राम बहादूर मिश्र, श्री बिसम्भर शर्मा, श्री गिरीश पंकज, श्री रणधीर सिंह सुमन, डॉ अशोक गुलशन, डॉ विनय दास, श्री समर बहादुर एवं निसिहर जी |
नाश्ते के उपरांत सभी का सामान बस में चढ़ा कर बांद दिया गया। सभी ने बस में अपना स्थान ग्रहण कर लिया। अब छत्तीसगढ़ एवं उत्तर प्रदेश को मिलाकर कुल 18 नग सवारियाँ हो चुकी थी, ट्रैवल एजेंट रजत मंडल हमारे साथ ही थे। इस तरह भूटान यात्रा के लिए कुल 19 लोगों का परमिट बना था जो थिम्पू और पारो की 15 जनवरी से 18 जनवरी तक 4 दिन की यात्रा करेगा। यह परमिट में दर्ज किया गया था। हमारी बस अब थिम्पू के लिए चल पड़ी। थोड़ी दूर जाने के बाद रास्ते में जांच चौकी आई। जहाँ हम सब के परमिट की जांच कर मुहर लगाई गई । अब इससे आगे बस चल पड़ी। बस में बहुत ही अधिक विस्फ़ोटक सामग्री भरी हुई थी। एक-एक कवि बड़े परमाणू बम की मारक क्षमता रखता है। :) सारे असलहा जांच बच गया :)। अगर भूटान के अधिकारियों को पता चलता कि कवि आ रहे हैं तो शायद परमिटानुमति ही नहीं मिलती। इतनी सारी विस्फ़ोटक सामग्री के सामने भूटान की क्या बिसात है? :)
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| भूटान के सहचर - कुछ जागते कुछ ऊंघते |
सफ़र के दौरान काव्य गोष्ठी का आयोजन भी कर लिया गया। जिसके संचालन की जिम्मेदारी मुझे सौंप दी गई। इस बहाने एक दूसरे के साथ परिचय भी हो रहा था और उनकी काव्य प्रतिभा का भी स्वाद मिल रहा था। ये सभी हिन्दी भाषा के साथ अवधि के भी अच्छे कवि थे। कार्यक्रम का प्रारंभ गिरीश पंकज जी की गजल से किया गया। इसके पश्चात ओमप्रकाश जयंत, डॉ अशोक गुलशन, डॉ विनय दास, श्री बिसम्भर शर्मा, निसिहर जी, कुसुम वर्मा, के साथ गगन शर्मा जी ने भी पुराने गीत गाए। अरविंद देशपांडे में भौंक कर कुत्ते की मिमिक्री कर के सबका मनोरंजन किया। मैने भी एक दो हिन्दी छत्तीसगढ़ी कविताएं मौका पाकर पेल दी। इस तरह मनोरंजन के साथ सफ़र कटते रहा। हमारा रास्ते का खाना पैक करके लाया गया था। एक स्थान पर सभी लोग खाना दिया गया। लोगों ने खाने बाद खाली पैकेट वहीं पर फ़ेंक दिए तो वहां रहने वाले भूटानी नाराज हो गए। उसने डिब्बा लाकर दिया और सारा कचरा उसमें फ़ेंकने कहा। यह भारत नहीं है कि कहीं भी हग दिए और मूत दिए।
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| चलित काव्य गोष्ठी में कुसुम वर्मा जी सोहर गाते हुए |
भूटान में पर्यावरण की तरफ़ विशेष ध्यान दिया जाता है। यहाँ सावर्जनिक स्थानों पर कचरा फ़ैलाने पर कठोर दंड दिया जाता है जिसमें जुर्माने के साथ सश्रम कारावास की भी सजा है। अब हमारे भोले साथियों को कौन सा भूटान के कानूनों का इल्म था। जहाँ खाए, वहीं फ़ेंके। आखिर में सभी ने अपना कचरा समेट कर डिब्बे के हवाले किया। भोजनोपरांत हम थिम्पू की ओर बढ़ चले। पहाड़ी रास्ते को किलोमीटर में नहीं, घंटे मे नापा जाता है। 4 घंटे के सफ़र के बाद सभी की बैटरी डाऊन हो गई और सीटों से लग गए। सफ़र लम्बा था। थिम्पू प्रवेश करने के पूर्व एक स्थान पर पुन: परमिट चेक किए गए और मुहर मार कर विदा किया गया। यहाँ पर जांच चौकी वाले देखते हैं कि पर्यटकों के अलावा कोई अवांछित तत्व भूटान में प्रवेश न कर जाए। मजदूर टाईप के व्यक्तियों को भूटान में प्रवेश नहीं दिया जाता। क्योंकि ये भूटान में आकर मजदूरी करने लगते हैं और यहाँ की नस्ल को भी बिगाड़ते हैं। भूटान का शासन अपनी नस्ल की शुद्धता के विषय में अत्यधिक जागरुक है।
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| हमारी बस का पायलट परम्परागत भूटानी वेष में, संग डॉ विनय दास जी |
आखिरकार हमने थिम्पू में प्रवेश कर लिया। उस समय सांझ हो रही थी। हमारा अस्थाई निवास एक ऊंची पहाड़ी पर बना वांगचुंग रिसोर्ट था। यह रिसोर्ट ताबा में स्थित है। सुंदर ब्लू पाईन के वृक्षों से घिरा रिसोर्ट बहुत ही सुंदर है। इसके साथ इसमें एक कांफ़्रेस हाल भी है। रिसोर्ट में पहुंचने के बाद हमें अपने-अपने रुम की चाबियाँ थमा दी गई। रुम भी बहुत सुंदर डेकोरेटेड थे। प्रत्येक रुम में हीटर वाला बेड एवं चाय की केटली के साथ आवश्यक सभी वस्तुए उपलब्ध थी। हमारे पहुंचने से पूर्व फ़्लाईट से आने वाले साथी भी पारो से आ चुके थे। पहुंचते ही शाम को नास्ते का इंतजाम था। इस दौरान ही अन्य पुराने साथियों से भेंट हुई, जिसमें संपत मुरारका जी, सुनीता यादव जी, कृष्णकुमार यादव जी, रविंद प्रभात जी एवं उनकी बेटी जवांई थे। इंदौर से प्रकाश हिन्दूस्तानी जी, दिल्ली से ब्लॉगर सर्जना शर्मा जी एवं सिलचर से प्रो नित्यानंद पाण्डे एवं उनकी धर्मपत्नी शुभदा पाण्डे जी भी थी। सभी से परिचयोपरांत बताया गया कि आज कोई कार्यक्रम नहीं है, शाम को आपको मार्केट घुमाया जाएगा, फ़िर खाना और सोना ही है, बाकी कार्यक्रम अगले दिन किया जाएगा।
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| कल के बिछड़े हुए हम आज यहाँ आ के मिले ( ललित शर्मा-सुनीता यादव-कृष्ण कुमार यादव) |
थिम्पू की मार्केट अधिक बड़ी नहीं है, होटल ताज से लेकर मुख्यचौराहे तक सड़क एक तरफ़ दुकाने बनी हुई हैं। जिनमें अधिकतर मालकिने ही दिखाई देती हैं। जैसी अन्य टुरिस्ट स्थानों पर दुकाने होती है वैसी ही मुझे यहाँ भी दिखाई दी। सामान का मुल्य भी सामान्य से अधिक दिखाई दिया। मेरा कैमरा काम नहीं कर रहा था इसलिए मुझे सेल लेने थे। आखिर मोल भाव करने के बाद मुझे 800 रुपए में 4 सेल लेने पड़े। मुझे कैमरा चालू करना बहुत ही आवश्यक था। बाजार में गर्म कपड़ों का मूल्य भी बहुत अधिक था। सुनीता ने एक-दो लेदर के जैकेट खरीदे। मुझे तो बच्चों का नाप ही याद नहीं रहता। इसलिए बाहर से कोई भी सामान खरीदने का रिस्क नहीं लेता। धीरे-धीरे बाजार घूमते हुए रात होने लगी और बस ड्रायवर का फ़ोन आने लगा। नई जगह में किसी तरह एक स्थान पर एकत्रित हुए और पुन: रिसोर्ट में आ गए।
चलती का नाम गाड़ी : भूटान
प्रारम्भ से पढ़ें
बचपन में भूटानी परियों की कहानियाँ पढते थे और इसे अब डेग्रन का देश कहा जाता है। इसे देखने की उत्सुकता तो अरसे से थी परन्तु चढे हुए दिमागी पारे ने रोमांच और उत्साह का बंटाढार कर दिया। कोच में पहुंच कर देखा तो ये तीन विराजमान थे। किसी के आने न आने का इन्हें कोई फ़िक्र ही नहीं था। मैने अरविंद से कहा कि अगर ये फ़ोन नहीं रही तो तुम तो जवाब दे सकते थे। तीन घंटे की प्रताड़ना से बना हुआ नजला गिरने लगा। मन हल्का होने का नाम ही नहीं ले रहा था। ज्यों ज्यों बात निकलते जा रही थी त्यों त्यों तापमान बढ़ते ही जा रहा था।
बचपन में भूटानी परियों की कहानियाँ पढते थे और इसे अब डेग्रन का देश कहा जाता है। इसे देखने की उत्सुकता तो अरसे से थी परन्तु चढे हुए दिमागी पारे ने रोमांच और उत्साह का बंटाढार कर दिया। कोच में पहुंच कर देखा तो ये तीन विराजमान थे। किसी के आने न आने का इन्हें कोई फ़िक्र ही नहीं था। मैने अरविंद से कहा कि अगर ये फ़ोन नहीं रही तो तुम तो जवाब दे सकते थे। तीन घंटे की प्रताड़ना से बना हुआ नजला गिरने लगा। मन हल्का होने का नाम ही नहीं ले रहा था। ज्यों ज्यों बात निकलते जा रही थी त्यों त्यों तापमान बढ़ते ही जा रहा था।
मैने भी ठान लिया कि अब सफ़र के दौरान से इनसे बात ही नहीं करनी है और जैसे अन्य अजनबी हैं वैसे ही व्यवहार इनके साथ भी किया जाए। रही बात वापसी की टिकिट की तो वह मैं तत्काल में भी बनवा लुंगा। अब इनके साथ जाना भी नहीं है सोच कर अपनी बर्थ पर सो गया। इन्होने कोई मेरी टिकिट मुफ़्त में तो कराई नहीं है। फ़िर इतना तमाशा करने की क्या जरुरत थी। बरसों का एक संबंध फ़ालतू की रार की भेंट चढ़ता जा रहा था।
सुबह आँख खुली तो किसनगंज दिखाई दिया। बिहार का यह वही किसनगंज है जो बंगलादेशी घूसपैठियों का स्वर्ग कहा जाता है। कौन बंगला देशी और कौन देशी, इसका यहाँ पता ही नहीं चलता। वातावरण में ठंडक थी। एक चाय पीने के बाद हिन्दी का अखबार खरीदा। बाहर कोहरा घना छाया हुआ था। इस हिसाब से लग रहा था कि हमारी ट्रेन न्यू जलपाई गुड़ी विलंब से पहुंचने वाली है। मैने अपना मोबाईल बंद कर पावर बैंक में चार्जिंग में लगा रखा था। हमारी भूटान यात्रा यहीं से प्रारंभ होने वाली थी। न्यू जलपाई गुड़ी आने से पहले मैने फ़ोन चालु किया तो उस पर किसी रजत मंडल का फ़ोन आया। उन्होने हमें प्लेट फ़ार्म से बाहर आने को कहा, जहाँ वे हमारा इंतजार कर रहे थे। फ़िर उन्होने दुबारा फ़ोन करके कोच नम्बर पूछा और स्वयं ही कोच पर आने का संदेश दिया।
अब हम बंगाल में थे। हमारे साथी गगन शर्मा जी ने जीवन के लगभग 35 वर्ष बंगाल में गुजारे हैं, इसलिए अच्छी बंगाली बोल लेते हैं। इसका फ़ायदा हमें मिला भी। पर पंजाबी टोन में बंगाली बोलने और सुनने का मजा भी कुछ और ही है। हम न्यू जलपाई गुड़ी पहुंच चुके थे। कोच से बाहर निकलते ही चियां (चिड़िया का बच्चा) चहचहाने लगा। फ़ोन उठाकर देखा तो रजत मंडल का ही फ़ोन था। वह मेरे सामने ही खड़ा था। साईन बोर्ड देख कर उसने मुझे पहचान लिया। हम अपना सामान लेकर स्टेशन के बाहर आ गए। वहाँ उसने एक क्वालिस गाड़ी तैयार कर रखी थी। ड्रायवर ने हमारा सामान कैरियर पर बांध लिया और रजत मंडल हमें नाश्ता करवाने ले चला।
न्यू जलपाई गुड़ी स्टेशन के बाहर निकलते ही थोड़ी दूर पर छोटे छोटे भोजनालयों की कतार बनी हुई है। जिसमें सभी तरह का भोजन मिलता है। हमें एक भोजनालय में ले जाया गया। वहाँ नाश्ते में पुरी, दाल और छोले थे। हम तो हमारे यहाँ मिलने वाला नाश्ता सोच कर आए थे। हमारे यहाँ तो पूरी दाल, सब्जी चावल इत्यादि भोजन की श्रेणी में आता है। झक मार कर हमें यही भोजन करना पड़ा। मेरे पास घर से लाए हुए मटर के पराठे। जिसे बेटी ने बड़े ही स्नेह के साथ तैयार किए थे। मैने डेढ पराठा खाया और बाकी साथियों को दे दिया। दही पराठा खा कर आत्मा तृप्त हो गई। अब हम आगे का सफ़र करने लायक हो गए थे। हमने गाड़ी होटल के समीप ही मंगवा ली और लगभग साढ़े दस बजे न्यू जलपाईगुड़ी से फ़्यूशलिंग (Phuentsholing) की ओर प्रस्थान कर गए। यह हमारा पहला था दल, अभी अन्य यात्रियों का दूसरा दल उत्तर प्रदेश से पहुंचने वाला था।
हमारी यात्रा प्रारंभ हो गई, हम सड़क मार्ग से फ़्यूशलिंग की ओर जा रहे थे। सड़क के किनारे चाय के बगान दिखाई दे रहे थे तथा पथरीली नदियां भी रास्ते में दिखाई दे रही थी। हमारा ड्रायवर भी नेपाली मूल का युवक था। बात चीत से पता चला कि वह भी पहली बार फ़्यूशलिंग जा रहा है। ड्रायवर भी नया था और हम भी। दोनो का नयापन एक सा था। इसलिए कोई खतरा भी नहीं। कुछ घंटे चल कर हम जयगाँव पहुंचे। यह भारतीय सीमावर्ती कस्बा है और खूब चहल पहल दिखाई देती है।
रेल्वेक्रासिंग पर ट्रेन आने के कारण गेट बंद दिखाई दिया। कुछ देर के लिए हमें यहाँ रुकना पड़ा। हमारी गाड़ी के समीप ही नीली ट्री शर्ट पहने कुछ मोटरसायकिल सवार भी रुके। उनकी टी शर्ट पर "से नो टु ड्रग" लिखा था। यह अपील करने वाले संगठन का नाम जयगाँव वेलफ़ेयर आर्गेनाईजेशन भी लिखा था। भूटान प्रवेश करने वाले सीमावर्ती कस्बे के प्रारंभ में ही भनक लग गई कि इस सीमा पर भी अनैतिक कार्य हो रहे हैं और यहाँ के युवा ड्रग डीलरों एवं पैडलरों की चपेट में हैं। सीमाक्षेत्र में पहुंचने पर चारों तरफ़ कोलाहल सुनाई दिया। नेपाली बंगाली दलालों की भीड़ ग्राहक फ़ंसाने के हथकंडे अपना रही थी। इस गांव में होटल भी बहुत सारे दिखाई दिए। सोच कि समय मिलने पर ड्रग की महामारी के संबंध में स्थानीय लोगों से चर्चा की जाएगी।
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| भारतीय सीमा से भूटान का प्रवेश द्वार |
जयगांव से ही एक द्वार के माध्यम से भारत एवं भूटान सीमा में प्रवेश किया जाता है। हमें एक रात फ़्यूशलिंग के होटल में रुकना था और अन्य साथियों के आने के पश्चात ही सबको थिम्पू की ओर रवाना होना था। सीमा पर एक युवक अपनी कार से हमें होटल मिडटाऊन तक पहुंचाने के लिए राजी हो गया। उसके पीछे पीछे हमने प्रवेश द्वार से फ़्यूशलिंग कस्बे के माध्यम से भूटान में प्रवेश किया। प्रवेश द्वार के दोनो तरफ़ डेग्रन के चित्र हमारा स्वागत कर रहे थे। अब हम विदेशी धरती पर थे। अचानक लगा की भूटान में प्रवेश करते ही सब कुछ बदल गया। वेशभूषा के साथ वातावरण भी। चारों तरफ़ साफ़ सफ़ाई एवं शांति दिखाई दी। कोलाहल का कहीं नाम ओ निशान नहीं। जबकि प्रवेश द्वार के उस पार मच्छी बाजार सा कोलाहल सुनाई दे रहा था। साफ़ समझ में आता है कि निजाम के साथ सब कुछ बदल जाता है। हम होटल मिडटाऊन में पहुंच चुके थे। ...
सैर कर गाफ़िल … भूटान
सैर कर गाफ़िल दूनिया की, जिन्दगानी फ़िर कहाँ …… सैलानियों के लिए यह आदर्श वाक्य हो गया है। देशाटन और पर्यटन करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति का मन करता है परन्तु इसके रास्ते में रोड़े भी बहुत अधिक हैं। घर द्वार से निकलते निकलते भी कोई न कोई काम आ ही जाता है जो आपकी यात्रा को प्रारंभ ही नहीं होने देगा। ऐसी स्थिति में नफ़ा-नुकसान देखे बिना गाफ़िल हो कर ही यात्रा को अंजाम देना पड़ता है। बस सब तरफ़ से आँखें बंद कर लो और चल पड़ो अपने मनचाहे स्थान की ओर, तभी यात्रा सम्पूर्ण होती है। वरना जीवन में पहेलियों के इतने जंजाल होते हैं कि एक को सुलझाते ही उसमें से दूसरी उलझन जन्म लेती दिखाई देती है।
मेरी पुस्तक "सरगुजा का रामगढ़" प्रकाशन के अंतिम दौर पर थी, तभी रविन्द्र प्रभात जी का फ़ोन आया कि अबकि बार ब्लॉग़र सम्मेलन भूटान में हो रहा है और आपकी स्वीकृति चाहिए। भूटान का नाम सुनकर मैने अपनी स्वीकृति दे दी। क्योंकि कई महीनों से बिकास और मेरे बीच भूटान भ्रमण को लेकर मंथन चल रहा था। जाना वह भी चाहता था और मैं भी। परन्तु कोई "साईत" नहीं निकल रहा था। रविन्द्र जी के फ़ोन से हमें भूटान यात्रा को लेकर गंभीरता से सोचना पड़ा। मैने जल्दबाजी में ही पुस्तक पूर्ण की एवं उसका प्रकाशन भी हो गया। अब मुद्दा विमोचन को लेकर टंगा हुआ था। इस पुस्तक का विमोचन हमारे मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के द्वारा होना पूर्व में ही तय हो गया था। अब उनकी तरफ़ से तिथि का निर्धारण होना था। समय धीरे धीरे सरकता जा रहा था।
इसी बीच छत्तीसगढ़ के अन्य मित्र भी इस यात्रा में सम्मिलित हो रहे थे। जिनमें गगन शर्मा, गिरीश पंकज, अल्पना देशपान्डे इत्यादि। मैं भूटान यात्रा सड़क मार्ग से तय करना चाहता था इसलिए पाबला जी को फ़ोन लगाया। तो उन्होने बताया कि पापा की तबियत ऊक-चूक रहती है, अगर ठीक लगा तो चलेगें। अर्थात तय नहीं था उनका जाना। रविन्द्र जी ने परमिट के फ़ार्म भेज दिया। इधर अल्पना भी सपरिवार तैयार हो रही थी। उसका सही जवाब नहीं आ रहा था और टिकिट करवाने में विलंब होता जा रहा था। मैने गगन शर्मा जी को टिकिट करवाने कह दिया और अल्पना को अल्टीमेंटम दे दिया। फ़ार्म भेजने के बाद टिकिट करवाने की जिम्मेदारी उसकी थी। मुझसे यहीं पर बड़ी चूक हो गई। अपनी टिकिट अलग ही करवानी थी। यही चूक आगे चल कर मानसिक यंत्रणा का कारक बन गई।
हमारी यात्रा रायपुर स्टेशन से हावड़ा मुंबई मेल द्वारा 12 जनवरी 2015 को शाम को प्रारंभ होनी थी। सब कुछ तय समय के हिसाब से चल रहा था। परन्तु कुछ न कुछ व्यवधान मानव जीवन में आते ही रहते हैं। छोटे भाई कीर्ति की एक महीने से तबियत ठीक नहीं थी। शाम को उसको टेबलेट लेने के लिए ध्यान दिलाना पड़ता था। वरना भूल जाता था। नगर पंचायत के चुनाव भी चल रहे थे और एक साप्ताहिक समाचार पत्र के सम्पादक का दायित्व भी इसी दौरान संभालना पड़ा। कुल मिला कर उलझने बढती ही जा रही थी। नगर पंचायत चुनाव में ताऊ जी के पुत्र पार्षद का चुनाव जीत चुके थे और उन्हें 13 तारीख को उपाध्यक्ष के लिए चुनाव लड़ना था। उनका कहना था कि 13 को शाम की फ़्लाईट से कलकत्ता चले जाना, जिससे अपने साथियों से मिल जाओगे और यहाँ का चुनाव भी निपट जाएगा।
मैने अल्पना को वर्तमान स्थिति से अवगत करवा दिया और कह दिया कि शाम की फ़्लाईट से चल कर दार्जलिंग मेल के समय पर सियालदाह स्टेशन पर मिल जाऊंगा। उसने नाराजगी जाहिर की और मैने अपनी सफ़ाई दी। यहीं से बात से बिगड़नी प्रारंभ हो गई। उसके बाद मैने इन्हें सैकड़ों बार कॉल किया लेकिन फ़ोन पर कोई जवाब नहीं आया। 13 तारीख को दोपहर 1 बजे भाई के विजय होने का समाचार आ गया और छोटा भाई कीर्ति, भतीजा, छोटू और बेटा उदय मुझे एयरपोर्ट छोड़ने आ गए। शाम 4/15 के इंडिगो विमान से सफ़र तय कर 5/40 को दमदम हवाई अड्डे पर पहुच गया। यहाँ पहुच कर भी अल्पना को फ़ोन लगाया तो कोई जवाब नहीं आया। क्योंकि मेरी आगे की टिकिट तो उनके साथ ही सम्मिलित थी। न ही उन्होने मुझे कायदे से मेरा सीट नम्बर दिया। इसके पीछे मुझे सिर्फ़ अपनी अहमियत सिद्ध करने का भाव ही समझ में आया। आएगा साला खुद पड़ गिर और ढूंढेगा अगर साथ जाना है तो।
मैं हवाई अड्डे से टैक्सी लेकर सियालदाह स्टेशन की ओर चल पड़ा। मेरा टैक्सी ड्रायवर हिन्दी भाषी और बिहार के गया जिले का निवासी था। बहुत अच्छी हिन्दी बोलता था और पढने लिखने का शौकीन था। उससे चर्चा करते हुए 22 किलोमीटर का रास्ता कट गया और सियालदाह स्टेशन पहुंच गया। इस स्टेशन पर बहुत ही भीड़ भाड़ थी। सामान ढोकर थोड़ा आगे बढने पर पता चला कि कल संक्राति है और गंगासागर जाने वालों का मेला लगा हुआ था। इसलिए अत्यधिक भीड़ दिखाई दे रही थी। सारे तीरथ बार बार, गंगासागर एक बार। स्टेशन पहुंचा तो 7 बजे थे। मैने एटीएम के पास अपना डेरा लगा लिया। क्योंकि मेरे पास टिकिट भी नहीं थी जो प्लेटफ़ार्म पर पहुंच सकता। मैने एक प्लेटफ़ार्म टिकिट खरीदी और इनका इंतजार करने लगा। इन लोगों ने मुझे इस तरह से बांध दिया था कि मैं मानसिक प्रताड़ना का शिकार हो रहा था। गुस्से का स्तर शनै शनै बढते जा रहा था।
आठ बजे मैने गगन शर्मा जी फ़ोन लगा कर वस्तु स्थिति बताई तो उन्होने कहा कि वे 9 बजे प्लेटफ़ार्म पर पहुंच जाएगें। इस बीच मैने घर से लाया हुआ भोजन कर लिया। वादे के अनुसार गगन शर्मा जी नौ बजे पहुंच गए। हमारी ट्रेन दार्जलिंग एक्सप्रेस दस बजे थी। गगन शर्मा जी ट्रेन एवं टिकिट की स्थिति देखने गए और मैं अपने स्थान पर ही बैठा रहा। आज अपने आप को बहुत ही मजबूर समझ रहा था। अब दिमाग सनकने के कगार पर था। चार्ट लगने में थोड़ा समय था। चार्ट लगते ही हमने देखना शुरु किया तो मेरा नाम ही नहीं दिखाई दिया। अब मैने तय किया की सामान्य टिकिट लेकर ट्रेन में ही सीट की व्यवस्था कर लुंगा। मै सामान्य टिकिट लेकर लौटा तो गगन शर्मा जी ने बताया कि मेरी टिकिट बी-3 में है और उन लोग अपनी सीट पर बैठ चुके हैं। अब पारा और अधिक चढ गया। इधर सामान्य टिकिट के पैसे फ़ालतु लग गए। मैने दौड़ कर टिकिट कैंसिल कराई और किसी तरह अपने कोच में पहुंचा। इसे कहते हैं कर भला तो हो बुरा…




































































































































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