http://lalitdotcom.blogspot.com/2016/09/blog-post_3.html
शिल्पांकन में आलिंगन भेद - वृक्षाधिरूढकम
तीवरदेव विहार सिरपुर छत्तीसगढ़ की द्वार शाखा का शिल्पांकन नयनाभिराम है, इस पर इतने सारे रचना शिल्प अंकित किए गए हैं कि द्वार शाखा के शिल्प का बखान करते हुए ही एक किताब लिखी जा सकती है। जिसमें जातक कथाओं से लेकर पशुमैथुन तक को विषय बनाया गया है।
शिल्पकार शास्त्र विधान के अनुसार प्रतिमाओं का निर्माण करते थे। शिल्प को देखने के बाद यदि उसे शास्त्रों में ढूंढा जाए तो उसका मूल मिल जाएगा।
जैसे पहले पटकथा लिखी जाती है और उसके बाद उसका फ़िल्मांकन किया जाता है ठीक वैसे ही शास्त्रों से विषय लिए जाते थे फ़िर उनका शिल्पांकन किया जाता है।
शिल्पकार शास्त्र विधान के अनुसार प्रतिमाओं का निर्माण करते थे। शिल्प को देखने के बाद यदि उसे शास्त्रों में ढूंढा जाए तो उसका मूल मिल जाएगा।
जैसे पहले पटकथा लिखी जाती है और उसके बाद उसका फ़िल्मांकन किया जाता है ठीक वैसे ही शास्त्रों से विषय लिए जाते थे फ़िर उनका शिल्पांकन किया जाता है।
![]() |
| आलिंगन भेद - वृक्षाधिरूढकम |
उपरोक्त मिथुन चित्र में आलिंगनबद्ध चुम्बनरत नर-नारी दिखाई दे रहे हैं। यह आलिंगन भेद का एक प्रकार है। वात्स्यायन ने कुंवारे और विवाहित लोगों के आलिंगन भेद बताए हैं।
कहते हैं कि (तत्रासमागतयोः प्रीति लिंग द्योतनार्थमालिंगन चतुष्टयम्।स्पृष्टकम्, विद्धकम, उदधृष्टकम, प्रीडितकम्, इति।।) प्रेम को प्रकट करने के लिए स्पृष्टकम, विद्धकम, उदधृष्टकम, प्रीडितकम आदि चार तरह का आलिंगन होता है।
प्रदर्शित प्रतिमा शिल्प में आचार्य वाभ्रवीय द्वारा बताए गए आलिंगन के एक प्रकार "वृक्षाधिरुढ़कम" का प्रयोग किया गया है।
इस आलिंगन के प्रकार को विस्तार देते हुए कहते हैं - चरणेन चरणामाक्रम्य द्वितीयेनोरुदेशामाक्रमन्ती वेष्टयन्ती वातत्पृष्ठ सक्तैक बाहुद्विती येनां समवनमयन्ती ईषन्मन्द सीत्कृत कूजिता चुम्बनार्थ मेवाधिरोढुमिच्छेदिति वृक्षाधिरूढकम्।।
कहते हैं कि (तत्रासमागतयोः प्रीति लिंग द्योतनार्थमालिंगन चतुष्टयम्।स्पृष्टकम्, विद्धकम, उदधृष्टकम, प्रीडितकम्, इति।।) प्रेम को प्रकट करने के लिए स्पृष्टकम, विद्धकम, उदधृष्टकम, प्रीडितकम आदि चार तरह का आलिंगन होता है।
प्रदर्शित प्रतिमा शिल्प में आचार्य वाभ्रवीय द्वारा बताए गए आलिंगन के एक प्रकार "वृक्षाधिरुढ़कम" का प्रयोग किया गया है।
इस आलिंगन के प्रकार को विस्तार देते हुए कहते हैं - चरणेन चरणामाक्रम्य द्वितीयेनोरुदेशामाक्रमन्ती वेष्टयन्ती वातत्पृष्ठ सक्तैक बाहुद्विती येनां समवनमयन्ती ईषन्मन्द सीत्कृत कूजिता चुम्बनार्थ मेवाधिरोढुमिच्छेदिति वृक्षाधिरूढकम्।।
वृक्षाधिरूढकम - जिस तरह से पेड़ पर चढ़ते हैं उसी तरह वृक्षाधिरूढकम आलिंगन में स्त्री अपने एक पैर से पुरुष के पैर को दबाती हैं और अपने दूसरे पैर से पुरुष के दूसरे पैर को पूरी तरह से लपेट लेती हैं।
इसके साथ ही अपने एक हाथ को पुरुष की पीठ पर रखकर दूसरे हाथ से उसके कंधे तथा गर्दन को नीचे की तरफ झुकाती हैं और फिर धीरे-धीरे से पुरुष को चूमने लगती हैं और उस पर चढ़ने की कोशिश करती हैं।
इस आलिंगन को वृक्षाधिरूढकम आलिंगन कहा जाता है। इस तरह मंदिरों विहारों की भित्तियों पर अनेक शिल्पांकन प्राप्त होते हैं। काम कला की शिक्षा देने के उद्देश्य से इनका शिल्पांकन प्रमुख स्थान पर किया जाता था
आरंग का भांड देऊल जैन मंदिर
छत्तीसगढ अंचल में जैन धर्मावलंबियों का निवास प्राचीन काल से ही रहा है। अनेक स्थानों पर जैन मंदिर एवं उत्खनन में तीर्थंकरों की प्रतिमाएं प्राप्त होती हैं।
सरगुजा के रामगढ़ की गुफ़ा जोगीमाड़ा के भित्ति चित्रों से लेकर बस्तर तक जैन उपस्थिति दर्ज होती है। चित्र में दिखाया गया मंदिर रायपुर सम्बलपुर मार्ग पर 37 वें किमी पर रायपुर जिला स्थित आरंग तहसील का 11 वीं सदी निर्मित "भांड देऊल" मंदिर का है।
सरगुजा के रामगढ़ की गुफ़ा जोगीमाड़ा के भित्ति चित्रों से लेकर बस्तर तक जैन उपस्थिति दर्ज होती है। चित्र में दिखाया गया मंदिर रायपुर सम्बलपुर मार्ग पर 37 वें किमी पर रायपुर जिला स्थित आरंग तहसील का 11 वीं सदी निर्मित "भांड देऊल" मंदिर का है।
![]() |
| भांड देवल मंदिर आरंग |
ऊंची जगती पर बना पश्चिमाभिमुखी भाण्ड देवल" इस श्रृंखला में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। ताराकृत शैली में बने इस जैन मंदिर के गर्भगृह में 6 फ़ुट ऊंची पीठिका पर श्रेयांशनाथ, शांतिनाथ एवं अनंतनाथ तीर्थकंरों की ओपदार पालिश युक्त काले पत्थर से निर्मित तीन प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर की बाहरी भित्तियों पर अनेक प्रतिमाएं स्थापित हैं, जिनमें मिथुन मुर्तियों को प्रमुखता से स्थान दिया गया है।
![]() |
| जैन तीर्थंकर श्रेयांशनाथ, शांतिनाथ एवं अनंतनाथ |
आरंग जैन धर्म का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है। भांड देउल के अतिरिक्त सभी मंदिरों शैव, वैष्णव धर्म के देवों के साथ-साथ जैन तीर्थकंरों की प्रतिमाएं भी विद्यमान हैं। चण्डी मंदिर में 6 जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं भी हैं। हनुमान मंदिर की बाह्य भित्तियों पर सोमवंश कालीन ब्राह्मण प्रतिमाओं के साथ कायोत्सर्ग मुद्रा में एक जैन तीर्थंकर भी हैं।
आरंग में पारदर्शी स्फ़टिक प्रस्तर की तीन पद्मासन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं चांदी के सिंहासन पर स्थापित प्राप्त हुई हैं जो रायपुर के दिगम्बर जैन मंदिर में स्थापित हैं। उन्हें देखने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ है। इन प्रतिमाओं का निर्माण कुशल शिल्पी के द्वारा हुआ प्रतीत होता है।
आरंग में पारदर्शी स्फ़टिक प्रस्तर की तीन पद्मासन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं चांदी के सिंहासन पर स्थापित प्राप्त हुई हैं जो रायपुर के दिगम्बर जैन मंदिर में स्थापित हैं। उन्हें देखने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ है। इन प्रतिमाओं का निर्माण कुशल शिल्पी के द्वारा हुआ प्रतीत होता है।
![]() |
| मिथुनांकन |
आरंग प्राचीन काल से महत्वपूर्ण नगर रहा है और वर्तमान में भी ऐतिहासिक एवं पुरातत्वीय दृष्टि से महत्वपूर्ण बना हुआ है। क्योंकि यहां से कई उत्कीर्ण लेख प्राप्त हुए हैं जिनमें चौथी शताब्दी का ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण राजर्षितुल्य कुल के भीमसेन द्वितीय का गुप्त संवत 182 (501ई) ताम्रपत्र है तथा शरभपुरिया वंश के जयराज द्वारा अपने शासन काल में जारी ताम्रपत्र इसकी प्राचीनता की पुष्टि करता है।
किंवदन्तियों में इसे मोरध्वज की नगरी भी कहा जाता है। लोकगीतों में गाये जाने वाली प्रेम कहानी "लोरिक चंदा" का गृह भी आरंग को माना जाता है। जबकि यह प्रेम कहानी प्रदेश की सीमाओं से बाहर अन्य प्रदेशों में गाई जाती है। इस तरह प्राचीन काल में आरंग एक महत्वपूर्ण नगर एवं राजर्षितुल्य कुल की राजधानी रहा है
किंवदन्तियों में इसे मोरध्वज की नगरी भी कहा जाता है। लोकगीतों में गाये जाने वाली प्रेम कहानी "लोरिक चंदा" का गृह भी आरंग को माना जाता है। जबकि यह प्रेम कहानी प्रदेश की सीमाओं से बाहर अन्य प्रदेशों में गाई जाती है। इस तरह प्राचीन काल में आरंग एक महत्वपूर्ण नगर एवं राजर्षितुल्य कुल की राजधानी रहा है
मांग भरने की प्रथा के प्राचीन प्रमाण
मंदिरों में देवी-देवताओं के अतिरिक्त ग्राम्य जीवन की झांकी भी शिल्पांकित की जाती थी। जिससे पता चलता था कि उस काल का रहन सहन एवं पहनावा किस तरह का है।
वाण वंश के राजा विक्रमादित्य द्वारा 870-900 ईंस्वीं में निर्मित पाली जिला कोरबा छत्तीसगढ़ के शिवालय में करदर्पण देख कर मांग में सिंदूर भरती विवाहित स्त्री का मनोहर शिल्पांकन किया गया है।
इससे यह प्रमाण मिलता है कि उस काल में माँग भरने का प्रचलन था। वैसे तो वैदिक काल से विवाहित स्त्रियों को मांग में सिंदूर भरना अनिवार्य था।
वाण वंश के राजा विक्रमादित्य द्वारा 870-900 ईंस्वीं में निर्मित पाली जिला कोरबा छत्तीसगढ़ के शिवालय में करदर्पण देख कर मांग में सिंदूर भरती विवाहित स्त्री का मनोहर शिल्पांकन किया गया है।
इससे यह प्रमाण मिलता है कि उस काल में माँग भरने का प्रचलन था। वैसे तो वैदिक काल से विवाहित स्त्रियों को मांग में सिंदूर भरना अनिवार्य था।
![]() |
| पाली का शिवालय और मांग भरती स्त्री |
दरअसल इसके पीछे स्वास्थ्य से जुड़ा एक बड़ा वैज्ञानिक कारण बताया जाता है। सिर के उस स्थान पर जहां मांग भरी जाने की परंपरा है, मस्तिष्क की एक महत्वपूर्ण ग्रंथी होती है, जिसे ब्रह्मरंध्र कहते हैं।
यह अत्यंत संवेदनशील भी होती है। यह मांग के स्थान यानी कपाल के अंत से लेकर सिर के मध्य तक होती है। सिंदूर इसलिए लगाया जाता है क्योंकि इसमें पारा नाम की धातु होती है।
पारा ब्रह्मरंध्र के लिए औषधि का काम करता है। महिलाओं को तनाव से दूर रखता है और मस्तिष्क हमेशा चैतन्य अवस्था में रखता है।
विवाह के बाद ही मांग इसलिए भरी जाती है क्योंकि विवाहके बाद जब गृहस्थी का दबाव महिला पर आता है तो उसे तनाव, चिंता और अनिद्रा जैसी बीमारिया आमतौर पर घेर लेती हैं।
पारा एकमात्र ऐसी धातु है जो तरल रूप में रहती है। यह मष्तिष्क के लिए लाभकारी है, इस कारण सिंदूर मांग में भरा जाता है।
ज्ञात हो कि 10 वीं 11 वीं शताब्दी में इस शिवालय का जीर्णोद्धार कलचुरी शासक जाज्ल्लदेव ने कराया था।
यह अत्यंत संवेदनशील भी होती है। यह मांग के स्थान यानी कपाल के अंत से लेकर सिर के मध्य तक होती है। सिंदूर इसलिए लगाया जाता है क्योंकि इसमें पारा नाम की धातु होती है।
पारा ब्रह्मरंध्र के लिए औषधि का काम करता है। महिलाओं को तनाव से दूर रखता है और मस्तिष्क हमेशा चैतन्य अवस्था में रखता है।
विवाह के बाद ही मांग इसलिए भरी जाती है क्योंकि विवाहके बाद जब गृहस्थी का दबाव महिला पर आता है तो उसे तनाव, चिंता और अनिद्रा जैसी बीमारिया आमतौर पर घेर लेती हैं।
पारा एकमात्र ऐसी धातु है जो तरल रूप में रहती है। यह मष्तिष्क के लिए लाभकारी है, इस कारण सिंदूर मांग में भरा जाता है।
ज्ञात हो कि 10 वीं 11 वीं शताब्दी में इस शिवालय का जीर्णोद्धार कलचुरी शासक जाज्ल्लदेव ने कराया था।
प्राचीन प्रतिमा शिल्प में स्वर्ग की अप्सरा अंजना : खजुराहो
तीखे तीखे नयन…। नायिका के नयनों की सुंदरता का वर्णन करते हुए कवियों ने खूब कागज काले किए एवं इन्हें विभिन्न उपमाओं से विभुषित किया। आँखे ही वह रास्ता है, जहाँ से कामदेव का प्रवेश हृदय में होता है और रोम रोम रोमांचित हो जाता है, लग जाती है लगन। कवि बिहारीे सुंदरियों के ऐसे त्रिगुण आकर्षक नयनों का वर्णन करते हुए कहते हैं…
अमिय हलाहल मद भरे, सेत स्याम रतनार।
जियत, मरत, झुकि झुकि परत, जिहि चितबत एकबार।।
कवि ने आँखों के सफ़ेद भाग की तुलना अमृत से,काली पुतलियों की विष से एवं आंखों की हल्की लाली की मद से की है। कवि कहता है कि नायिका जिसकी ओर शांत भाव से ताकती है तो वह जी उठता है, जिस व्यक्ति की ओर घूर कर देखती है तो समझो उसका मरण ही है एवं जिसकी ओर अनुरागपूर्वक देखती है तो मानो वह प्रेम में मतवाला होकर झूमने लगता है। त्रिगुण वाले नयन आकर्षक माने गए हैं।
प्राचीन मंदिरों के प्रतिमा शिल्प में स्वर्ग की एक अप्सरा अंजना को सम्मिलित किया जाता है। यह प्रतिमा बहुधा मंदिरों की भित्ती संरचना में जड़ी हुई दिखाई दे जाती है। त्रिभंगी मुद्रा में एक स्त्री करदर्पण में मुखड़ा देखते हुए अंजन शलाका से आँखों में काजल आंजती हुई दिखाई देती है।
वैसे तो स्त्रियों के नेत्रों का वास्तविक शृंगार लज्जा को माना गया है, पर नयनों की सुंदरता बढाने के लिए आँखों में काजल आंजती हुई नायिका या अप्सरा को शिल्प में दिखाया जाना तत्कालीन काल में सौंदर्य के प्रति स्त्रियों के जागरुक होने का ही प्रमाण है।
शिल्पकारों ने अंजन शलाका से आँखों में काजल आंजती हुईै नायिका को अपने शिल्प में विशेष स्थान दिया है । पद प्रतिष्ठा के अनुसार सोने, चांदी, अष्टधातु या हाथी दांत की अंजल शलाकाएँ होती थी। उत्खनन में हाथी दांत की अंजन शलाकाएँ प्राप्त होती हैं।
नयनों को अलंकृत करने चलन प्राचीन काल से लेकर वर्तमान तक दिखाई देता है। आँखों में आंजने के लिए काजल बनाने विधि भी प्राचीन ग्रंथ बताते हैं, जिनमें काजल एक औषधि रुप में नयन दोष दूर करने के लिए प्रयुक्त होती है।
वर्तमान में अंजन शलाकाओं एवं काजल का स्थान शीश पेंसिल ने ले लिया है परन्तु नयनों के सौंदर्य के प्रति आज भी स्त्रियाँ चैतन्य हैं एवं काजल से अलंकृत नयनों की एक नजर ही हृदय में पैठने के लिए काफ़ी है। उपरोक्त चित्र खजुराहो के मंदिरों से लिए गए हैं।
खजुराहो के प्रतिमा शिल्प में शूल निवारण अंकन
खजुराहो के विश्वनाथ मंदिर में शिल्पकार ने स्त्री के पैर के तलुए में गड़ी शूल देखते एवं उसे निकालते हुए चिकित्सक का प्रदर्शन किया है। यह इस मंदिर का महत्वपूर्ण शिल्प है। घर-बार दैनिक जीवन में कार्य करते हुए शूल गड़ना सहज बात है, परन्तुं वह शूल किसी कोमलांगी को गड़ जाए तो उसकी वेदना उतनी ही अधिक होती है, जितनी महत्वपूर्ण रुपसी है।
पहले शिल्प में स्त्री पैर में गड़े हुए कांटे (शूल) का निरीक्षण कर रही है, शूल की पीड़ा उसके चेहरे से परिलक्षित हो रही है। शूल हृदय में गड़ा हो या पैर के तलुए में, चैन कहाँ लेने देता है, पीड़ा का निवारण कोई उपयुक्त पात्र ही कर सकता है। हृदय का शूल निकलना तो कठिन होता है, पर तलुए के शूल के लिए चिकित्सक आवश्यकता होती है।
अगले शिल्प में देवांगना चिकित्सक से शूल निवारण करवा रही है, इस शिल्प में उसका ध्यान शूल पर है और चेहरे से निराकरण का शांत भाव झलक रहा है। चिकित्सक भी आधुनिक ही है, वह औजार से कांटे को निकाल रहा है, इसके कंधे पर लटके बैग (चिकित्सक पेटी) से जाहिर होता है। वर्तमान में भी इस तरह के बैग का चलन बना हुआ है।
खजुराहो के मंदिर अनुपम का शिल्प : सद्यस्नाता
सद्यस्नाता नाभिदर्शना का खजुराहो के मंदिर शिल्पकला में अनुपम प्रदर्शन हैं। वह एक दौर था जब प्रतिमा शिल्प में देह सौष्ठव, वस्त्रादि अलंकरण एवं लावण्यता का विशेष ध्यान रखा जाता था।
मंदिर की भित्तियों पर दिनचर्या का विशेष तौर पर अंकन किया गया है। जिसमें स्नानोपरांत शृंगार से लेकर दिन ढलने पर आंगिक शिथिलतायुक्त अंगड़ाई तक को प्रदर्शित किया गया है।
उपरोक्त प्रतिमा शिल्प का त्रिआयामी अंकन किया गया है। जिसमें प्रतिमा का सौंदर्य एवं विषय उभर कर सामने आया है।
प्रथम चित्र में सद्यस्नाता स्त्री वेणी गुंथन के लिए केश राशि को निचोड़कर व्यवस्थित कर रही है और उससे झरती पानी की बूंदे शरीर पर दिख रही है। जिसे शिल्पकार ने कुशलता से प्रदर्शित किया है, साथ ही वस्त्रों पर की गई कारीगरी भी दिखाई दे रही है।
दूसरा त्रिआयामी चित्र भी इसका पार्श्व पक्ष दिखा रहा है। जिसमें स्त्री वेणी गुंथन के लिए केश राशि को निचोड़ रही है एवं नीचे दिखाई दे रहे हंस की ग्रीवा भी त्रिआयामी दिखाई दे रही है।
भित्तियों में स्थापित इन प्रतिमाओं की केश सज्जा भी उल्लेखनीय है। सभी प्रतिमाओं की केश सज्जा पृथक पृथक है। इससे ज्ञात होता है कि केश सज्जा का विशेष ध्यान रखा जाता था। एक शोध प्राचीन एवं वर्तमान केश सज्जा पर हो तो बहुत कुछ नया निकल कर सामने आएगा।
मोबाइल का अविष्कार चौदहवीं शताब्दी में
छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव जिले के गंडई ग्राम में फणी नागवंशीकालीन 13 वीं शताब्दी का प्रस्तर निर्मित शिवालय है। इसकी बाह्य भित्तियों में प्रतिमा अलंकरण है। भित्तियों में विभिन्न पौराणिक प्रसंगों को लेकर बनाई गयी प्रतिमाएँ जड़ी हुई हैं।
![]() |
| मोबाईल पर बात करती स्त्री |
इन प्रतिमाओं में से एक प्रतिमा मेरा ध्यान विशेष रुपये से आकर्षित किया। इस प्रतिमा में एक स्त्री पलंग पर तकिए का सिरहाना लिए लेटी हुई है और उसके पैर भित्ति पर रखे हुए हैं तथा बाएँ हाथ को कान पर लगा रखा है।
इस प्रतिमा को देखने से लगता है कि शिल्पकार कोई भविष्यवक्ता है जो आने वाली शताब्दी को अभिव्यक्त कर रहा है।
हाँ जी, लगता है शिल्पकार ने इक्कीसवीं शताब्दी के मोबाइल युग शिल्प माध्यम से दिखाने प्रयास किया है। वर्तमान में यह दृश्य बहुधा दिखाई दे जाता है जब कोई स्त्री या पुरुष पलंग पर लेटकर चलभाष से कानाबाती करती दिखाई दे जाता है।
खैर तत्कालीन प्रसंग कुछ इससे पृथक या भिन्न रहा होगा। परन्तु वर्तमान में तो यह चलभाष की कानाबाती दिखाई देती है। सुदूर ग्रामांचल में होने के कारण यहां पर्यटक कम ही पहुँचते हैं।
अगर खजुराहो जैसे मंदिरों में यह शिल्पांकन होता तो गाईड पर्यटकों को मोबाइल फोन की बातचीत बताकर रोमांचित अवश्य करते।
प्राचीन मंदिर की भित्ति में सांप एवं नेवले की लड़ाई का अंकन
सांप और नेवले की कहानी महाभारत से लेकर हितोपदेश तक उपलब्ध होती है। बचपन में सांप एवं नेवले की लड़ाई खूब देखी परन्तु वर्तमान में वन्य प्राणी कानून होने के बाद सांप एवं नेवले की लड़ाई दिखाने वाले दिखाई नहीं देते।
![]() |
| नारायणपुर (कसडोल-छत्तीसगढ़) के मंदिर की भित्ति में सांप एवं नेवले की लड़ाई का खूबसूरत अंकन |
नारायणपुर (कसडोल-छत्तीसगढ़) के मंदिर की भित्ति में सांप एवं नेवले की लड़ाई का खूबसूरत अंकन किया गया है। नेवला सांप का परम्परागत शत्रु है, कितना भी बड़ा एवं विषैला सर्प हो, अगर नेवला उसके पीछे पड़ गया तो प्राण लिए बिना छोड़ता नहीं है।
विदेशी वैसे भी भारत को सांपों एवं साधुओं का देश कहते हैं। इनके द्वारा खींचे गए स्नेक चार्मर्स के चित्र बहुधा मिलते हैं। सांपों के प्रति आकर्षण एवं भय दोनो रहता है। विदेशी मंत्र मुग्ध होकर सांपों का खेल देखते हैं।
शिल्पकार ने अपनी छेनी से मंदिर की भित्ति में इसी रोमांच का अंकन किया है।
संसार में दिखाई देने वाली छोटे छोटे को दृश्यों का शिल्पांकन कर शिल्पकार ने अपनी विवेकशीलता का परिचय दिया है। हितोपदेश में नेवले की कई कहानियाँ हैं, जिसमें एक कहानी नेवले के स्वामीभक्ति एवं परोपकार की भी है जो इस प्रकार है………
उज्जयिनी नगरी में माधव नामक ब्रा्ह्मण रहता था। उसकी ब्राह्मणी के एक बालक हुआ। वह उस बालक की रक्षा के लिये ब्राह्मण को बैठा कर नहाने के लिये गई। तब ब्राह्मण के लिए राजा का पावन श्राद्ध करने के लिए बुलावा आया। यह सुन कर ब्राह्मण ने जन्म के दरिद्री होने से सोचा कि "जो मैं शीघ्र न गया तो दूसरा कोई सुन कर श्राद्ध का आमंत्रण ग्रहण कर लेगा।
आदानस्त प्रदानस्त कर्तव्यस्य च कर्मणः।
क्षिप्रमक्रियमाणस्य कालः पिबति तद्रसम्।।
शीघ्र न किये गये लेन- देन और करने के काम का रस समय पी लेता है।
परंतु बालक का यहाँ रक्षक नहीं है, इसलिये क्या करुँ ? जो भी हो बहुत दिनों से पुत्र से भी अधिक पाले हुए इस नेवले को पुत्र की रक्षा के लिए रख कर जाता हूँ। ब्राह्मण वैसा करके चला गया। वह नेवला बालक के पास आते हुए काले साँप को देखकर, उसे मार कोप से टुकड़े- टुकड़े करके खा गया। वह नेवला ब्राह्मण को आता देख लहु से भरे हुए मुख और पैर किये शीघ्र पास आ कर उसके चरणों पर लोट गया।
फिर उस ब्राह्मण ने उसे वैसा देख कर सोचा कि इसने मेरे बालक को खा लिया है। ऐसा समझ कर नेवले को मार डाला। बाद में ब्राह्मण ने जब बालक के पास आ कर देखा तो बालक आनंद में है और सांप मरा हुआ पड़ा है तो उस उपकारी नेवले को देख कर मन में घबरा कर बड़ा दुखी हुआ।
कामः क्रोधस्तथा मोहो लोभो मानो मदस्तथा।
षड्वर्गमुत्सृजेदेनमर्जिंस्मस्त्यक्ते सुखी नृपः।।
काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार तथा मद इन छः बातों को छोड़ देना चाहिये, और इसके त्याग से ही राजा सुखी होता है।
खजुराहो की प्रतिमाओं में खुजली प्रदर्शन
खुजली एक ऐसी चीज है, जिसे ब्याधि माने या सुख, यह तय करना बहुत ही कठिन है। जितना सुख खुजाने में है उतना किसी बात में नहीं है। मीठा मीठा सुख, लगता है तो खुजाते रहो। खुजली शरीर के किसी भी अंग क्षेत्र में चल सकती है। जीभ से लेकर वर्ज्य प्रदेश तक। यह खुजली भी ऐसी चीज है कि कभी कभी ऐसे स्थान पर चलती है जहाँ तक आदमी की पहुंच नहीं होती। उसे आड़ा टेढ़ा होकर खुजाने के लिए कसरत करनी ही पड़ती है।
ऐसी ही कुछ पार्श्व प्रदेश में चलने वाली खुजली है। इस खुजली का सुंदर शिल्पांकन खजुराहो के लक्ष्मण मंदिर की भित्ति के शिल्पांकन में किया है। जिसमें अप्सरा त्रिभंगी मुद्रा में तन्मयता से अपनी पीठ खुजाते हुए दिखाई दे रही है तथा खुजाते हुए खुजली वाले स्थान पर खरोंचे भी पड़ गई हैं। पीठ खुजाने के लिए उसे शरीर को किसी जिमनास्टिक खिलाड़ी की तरह मोड़ना पड़ रहा है। शिल्पकार का शिल्पांकन भी अद्भुत है, उसने शरीर के सभी अंगो का लोच दिखाने में एवं चेहरे पर खुजली का सुख दिखाने में अपनी सारी कला का रस निचोड़ दिया।
इससे ज्ञात होता है कि खुजली सिर्फ़ आम आदमी को ही होती है। खुजली राजा, महाराजा, उच्चाधिकारियोँ एवं अप्सराओं तक को होती है तथा खुजली का खुजाकर शमन करना प्राथमिक कार्य माना गया है। खुजाने का सुख भी रतिदान के सुख से कम नहीं है। जब तक खुजा न लें तब तक मन को शांति नहीं मिलती। सबसे अधिक कठिनाई तो तब होती है, जब भरी महफ़िल में वर्ज्य क्षेत्र में खुजली होती है। ऐसी स्थिति में खुजाना भले ही असभ्यता समझा जाता है, परन्तु खुजाना तो पड़ता ही है।
खुजाल की ऐसी स्थिति में लज्जा एवं सभ्यता को त्याग पर रख कर खुजाना ही पड़ता है। बड़े-बड़े नेताओं द्वारा खुजली करते हुए चित्र यदा कदा मीडिया में आ जाते हैं। उपरोक्त शिल्प से हम यह मानकर चल सकते हैं कि खुजली वर्तमान की व्याधि/ व्यसन नहीं है। इस सुख के आकांक्षी प्राचीन काल में भी रहे हैं। इसलिए अगर खुजली हो तो इसे निर्बाध खुजाया जा सकता है। धन्य है वह शिल्पकार जिसने खुजली जैसे सुख का भी प्रवीणता एवं महीनता से अंकन किया है।
अब समस्या यह है कि खुजाल को व्याधि की श्रेणी में रखा जाए या आनंद की। अगर व्याधि की श्रेणी में रखते हैं तो खुजाने के आनंद का सुख जाते रहेगा। अगर आनंद की श्रेणी में रखते हैं तो खुजाते खुजाते एक दिन व्याधि बन जाएगा।
स्थिति बड़ी विकट है, इसलिए जब तक आनंद आ रहा है तब तक खुजाते रहें, जिस दिन खुजाते-खुजाते लहूलुहान होने लगें उस दिन चिकित्सा लेना अनिवार्य है। पर खुजाने का आनंद लेना हर नागरिक का परम धर्म मानना चाहिए।
प्राचीन शिल्प में वाद्ययंत्र एवं नृत्य : खजुराहो
बरसन लागे सावन, बूंदिया आवन लागे… गायन-वादन हमारी प्राचीन विद्या है। पता नहीं कितने हजारों वर्षों से बांसुरी की मधूर तान मनुष्य हृदय के तारों को तरंगित कर रही है। वैसे माना जाता है कि सभी वाद्य यंत्रों में बांसुरी एवं मृदंग का प्रयोग मानव ने पहले प्रारंभ किया। भारत से लेकर युरोप जर्मनी तक प्राचीन काल में बांसुरी की उपस्थिति मिलती है। लगभग 40,000 से 35,000 साल पहले की कई बांसुरियां जर्मनी के स्वाबियन अल्ब क्षेत्र में पाई गई, जो हड्डी की बनी हुई हैं।
![]() |
| मुरली वादन… लक्ष्मण मंदिर खजुराहो |
भारत के मुरलीधर, वेणुगोपाल, कृष्ण जग प्रसिद्ध हैं, जिनकी बांसुरी की मधुर तान पर चराचर जगत मोहित है। गायन एवं वादन का संबंध देह एवं देही की तरह हैं, एक के बिना दूसरा अधूरा हो जाता है। सुर ताल का संगम मनुष्य को किसी और ही दुनिया में ले जाकर स्वर्गिक आनंद दिलाता है। देवताओं से लेकर आम नागरिक तक को संगीत ने प्रभावित किया। गायन-वादन के साथ नृत्य भी जुड़ा हुआ है। बिना वाद्य के नृत्य की ताल नहीं बैठती। यह प्राचीन काल से वर्तमान तक मनोरंजन का साधन बने हुए हैं।
![]() |
| आलाप… लक्ष्मण मंदिर खजुराहो |
उपरोक्त चित्र खजुराहो के मंदिरों से लिए गए हैं। खजुराहो के मंदिरों का मूर्ति शिल्प इतना जीवंत एवं विविध विषयक है कि लगता है गागर में सागर समा गया है। जितना ढूंढो, उससे अधिक पाओ जैसे हालत हैं। प्राचीन शिल्प में तत्कालीन वाद्य यंत्रों एवं नृत्य का ज्ञान होता है। शिल्पकारों ने नृत्य की भाव भंगिमा को अपने शिल्प में बखुबी उतारा है।
![]() |
| नृत्य गणपति लक्ष्मण मंदिर खजुराहो |
भारतीय संगीत की अपनी समृद्ध परम्परा है, जो गुरु से शिष्य को मिलती है। चित्र में दिखाई गई स्थानक प्रतिमा में देवांगना मुरली वादन कर रही है तथा एक अन्य स्त्री बैठे हुए, कान पर हाथ लगाकर आलाप ले रही है। आलाप एवं मुरली की तान का मधुर कर्णप्रिय संगम प्रात: कालीन राग भैरव वातावरण में रस घोल रहा है। सोचिए वह सुबह कैसी होगी, जब आपकी आँखें खुले और कानों में मधुर संगीत की स्वर लहरियाँ सुनाई दे।
![]() |
| मृदंग वादन लक्ष्मण मंदिर खजुराहो |
दूसरा प्रतिमा शिल्प इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है, इसमें नृत्य गणपति दिखाई दे रहे हैं। नटराज शिव के अलावा गणपति ही ऐसे देव हैं जिनकी नृत्य करते हुए प्रतिमाएँ शिल्प में दिखाई देती हैं। मंगलमुर्ति गणेश की नृत्य प्रतिमा शुभ एवं मांगलिक मानी जाती है। जब हृदय प्रसन्न हो एवं आल्हाद के भाव उठ रहे हो तभी नृत्य के लिए पैर थिरकते हैं तथा प्रसन्न हृदय देवता से जो भी वरदान मांगा जाए वह मिलना निश्चित है।
![]() |
| ड्रम वादन लक्ष्मण मंदिर खजुराहो |
गणपति की प्रतिमा में बांए तरफ़ एक व्यक्ति नृत्य के साथ ताल मिलाने के लिए ड्रम बजाता दिखाई दे रहा है। जबकि ड्रम तो प्राश्चात्य वाद्य माना जाता है। इसका चलन भारत में लगभग अट्ठारवीं सदी में प्रारंभ हुआ, परन्तु यहाँ ड्रम का वादन हमें नवमीं शताब्दी में दिखाई दे रहा है। है न दिमाग पर जोर डालने की बात। गणपति के दूसरी तरफ़ एक वाद्यक मृदंग बजा रहा है। देखने से ऐसा लगता है कि गणपति भारतीय एवं पाश्चात्य वाद्य के फ़्यूजन पर नृत्य कर रहे हैं। कुल मिलाकर रस संगीत में ही है, बाकी जो है सो तो हैइए है
स्थापत्य एवं शिल्प के विषयों में बदलाव
समय के साथ स्थापत्य एवं शिल्प के विषयों में बदलाव आता है, जिससे उसके कालखंड की जानकारी मिलती है। छठवीं शताब्दी से लेकर अद्यतन हम देखते हैं तो शनै शनै बदलाव दिखाई देता है। जो शिल्प के लावण्य, शरीर सौष्ठव, वस्त्राभूषण आदि में परिलक्षित होता है। इस बदलाव को देखने के लिए मीमांसक का नजरिया चाहिए। जहाँ बड़ा बदलाव हो वह हर किसी को दिखाई देता है और अपना ध्यान आकृष्ट करता है।
![]() |
प्राचीन भारतीय परम्परागत वाद्य यत्रों में मृदंग, ढोल, नगाड़े, मुहरी, सिंगी वीणा, वेणु आदि दिखाई देते हैं। जिनमें स्थान विशेष एवं वादक की पसंद के हिसाब से बदलाव होता है। यह बदलाव शिल्प में भी दिखाई देते हैं। जिस तरह खजुराहो के लक्ष्मण मंदिर की भित्ति में स्थापित नृत्य गणपति के दांई तरफ़ ढोल एवं बांई तरफ़ ड्रम वादक दिखाई देता है। यहाँ ड्रम दिखाई देते ही हमें एकदम से बदलाव दिखाई देता है। क्योंकि ड्रम पश्चिम का वाद्य माना जाता है। परन्तु शिल्प से जाहिर होता है कि यहाँ ड्रम जैसा वादय पूर्व से ही उपस्थित था।
![]() |
| लक्ष्मण मंदिर खजुराहो के नृत्य गणपति प्रतिमा में अंकित ड्रम वादक |
कुछ ऐसा ही शिल्प में हमें बस्तर स्थित #दंतेश्वरी मंदिर में दिखाई देता है। गर्भगृह के दांई तरफ़ के प्रतिमा शिल्प में एक कुलीन स्त्री अपने कंधे पर पर्स लटकाए हुए है और उसके पीछे परिचारिका पंखा झल रही दिखाई देती है। यह शिल्प 14 वीं शताब्दी का माना जाता है। इस प्रतिमा में दिखाई गए पर्स (सौंदर्य पेटिका) का चलन वर्तमान में भी दिखाई देता है। आज भी हम बाजार में जाएंगे तो इस प्रकार की सौंदर्य पेटिका खरीद सकते हैं।
![]() |
| दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा बस्तर का चौदहवीं सदी का प्रतिमा शिल्प |
अब हम मुख्य विषय पर आते हैं, सुबह की पोस्ट में प्राण चड्डा जी ने जिज्ञासावश एक चित्र कमेंट बाक्स में पोस्ट किया। मुझे इस शिल्प चित्र को देखकर खुशी भी हुई। खुशी इसलिए हुई की छठवीं शताब्दी से लेकर वर्तमान में शिल्प में कितना बदलाव हुआ है, इस प्रतिमा शिल्प से पूर्णत: ज्ञात हो रहा है। यह प्रतिमा शिल्प सद्यनिर्मित अमरकंटक के जैन मंदिर का है।
![]() |
| सद्यनिर्मित अमकंटक के जैन मंदिर का प्रतिमा शिल्प |
इस प्रतिमा में स्त्री सम्पूर्ण भारतीय शृंगार से ओतप्रोत होकर वायलियन वादन कर रही है। जबकि वायलियन युरोप का प्रमुख वाद्य यंत्र है। कितनी सहजता से शिल्पकार ने अपने शिल्प में वायलियन जैसे वाद्य यंत्र को अंगीकार कर लिया। प्रतिमा के गले में दो लड़िया हार एवं कटिमेखला की चौड़ाई इस शिल्प में अधिक दिखाई दे रही है। यह आभुषणों में भी परिवर्तन है। यही समय के साथ बदलाव है। काल के अनुसार परिवर्तन अवश्यसंभावी है और सनातन चलता रहेगा।
शैव एवं वैष्णव सम्प्रदाय के मिलन का प्रतीक : हरिहर
शैवों एवं वैष्णवों पंथों के आपसी वर्चस्व की लड़ाई ने हिन्दू धर्म की बहुत हानि हुई। आपसी संघर्ष में भारी रक्तपात एवं एक दूसरे के पूजा स्थलों का नुकसान पहुंचाना भी सम्मिलित था। यह अनेकेश्वर वाद की देन प्रतीत होता है। वैसे तो हमारा दर्शन कहता है कि ईश्वर एक है, परन्तु इन पंथों की आपसी की वर्चस्व की लड़ाई ने अनेक देवता उत्पन्न कर दिए। एकेश्वर से बहुदेववाद चल पड़ा। हजारों वर्षों तक चले झगड़े में शैव एवं वैष्णव नामक दो धाराओं में खूब रक्तपात हुआ तथा इसी के चलते शाक्त धर्म की उत्पत्ति हुई। जिसने दोनो सम्प्रदायों में समन्वय का काम किया।
![]() |
| शैव एवं वैष्णव सम्प्रदाय के मिलन का प्रतीक संघाट नंदी एवं गज विट्ठल मंदिर हम्पी कर्णाटक |
जब आपस में मिलन हुआ तो वर्तमान में स्थिति यह है कि शैव, शाक्त एवं वैष्णवों में पता नहीं चलता कि कौन किस सम्प्रदाय का अनुशरणकर्ता है। कहा जाता है कि इनके समन्वय में अत्रिपुत्र दत्तात्रेय का प्रमुख स्थान है। इसके पश्चात में इनमें समन्व्य का कार्य आदि शंकराचार्य के हाथों हुआ। जब बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म के विस्तार के कारण हिन्दू धर्म का ह्रास हो रहा था। दीर्घावधि के प्रयास के पश्चात कालांतर में समन्यव ऐसा हुआ कि मंदिर निर्माण की पंचायतन शैली विकसित हुई। मूल देवता के मुख्य मन्दिर के साथ चारों कोनों में अन्य अनुषांगी देवों के मंदिर एक ही परिसर में बनने लगे। इसे पंचायतन शैली कहा गया। यह भी हम मान सकते हैं कि उत्तर एवं दक्षिण का मिलन हुआ।
![]() |
| हरिहर की संघाट प्रतिमा छत्तीसगढ़ पाली नवमी शताब्दी |
आज हम देखते हैं कि शिवालयों में भित्तियों पर वैष्णव पंथ के देवताओं की उपस्थिति दिखाई देती है। शिवालयों में गर्भगृह के द्वारपट पर दशावतारों का अंकन प्रमुखता से दिखाई देता है, जिसमें विष्णु के अवतारों को स्थान दिया जाता है। वैष्णव मंदिरों में शिव परिवार के गणपति की उपस्थिति प्रमुखता से दिखाई देती है तथा कार्तिकेय एवं कीर्तिमुख भी हमें वैष्णव मंदिरों में दिखाई देते हैं। जो कालांतर में शिल्प परम्परा का आवश्यक अंग बन गए। दश दिक्पाल, सप्तमातृकाएँ महिषसुरमर्दनी की प्रतिमाएँ भी प्राचीन शिवालयों में प्रमुखता से दिखाई देती है। इसके पश्चात पुराणों और स्मृतियों के आधार पर जीवन-यापन करने वाले लोगों का संप्रदाय बना जिसे स्मार्त संप्रदाय कहते हैं।
![]() |
| सपरिवार हरिहर मिलन राजा रवि वर्मा का चित्र |
प्रतिमा शिल्प में भी संघाट प्रतिमाओं का निर्माण प्रारंभ हुआ, जिसमें हरिहर, हरिहरार्क, त्रिदेव एवं हरिहरार्कब्रह्म की प्रतिमाएँ भी हमे मिलती हैं। छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले अंतर्गत मदकूद्वीप के उत्खनन में हम्रें स्मार्त लिंग प्राप्त होते हैं। पंकज दीक्षित जी Pankaj Dixit द्वारा लगाए गए चित्र ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया जिसमें गजारुढ़ विष्णु लक्ष्मी तथा नंदी सवार शिव पार्वती दिखाई दे रहे हैं। चित्रकार ने गज एवं नंदी को ऐसे चित्रित किया है कि दोनों के शीश आपस में मिले हुए हैं। ध्यान से देखने पर ही दोनो अलग दिखाई देते हैं। एक तरफ़ से गजमुख एवं दूसरी तरफ़ से नंदी मुख। यह दोनों सम्प्रदायों के मिलन के प्रतीक के रुप में देखा जा सकता है।
![]() |
| हनुमान द्वारा शिवार्चन फ़णीकेश्वर महादेव फ़िंगेश्वर छत्तीसगढ़ परवर्ती काल |
पंचायतन मंदिर शैली के अतिरिक्त में शिल्प में हरिहर की प्रतिमा हमें छतीसगढ़ के पाली स्थित शिवालय की भित्ति से प्राप्त होती है। राजिम फ़िंगेश्वर शिवालय फ़णीकेश्वर महादेव में भित्ति जड़ित एक प्रतिमा में हनुमान को शिवार्चना करते दिखाया गया है। मदकूद्वीप से हमें संघाट प्रतिमा के रुप में स्मार्त लिंग प्राप्त होता है। हम्पी के विट्ठल मंदिर एवं हजारा राम मंदिर में मुझे नंदी एवं गज की संघाट प्रतिमा मिलती है। यह सब शैव एवं वैष्णव सम्प्रदायों के सम्मिलन के प्रतीक चिन्ह हैं। जब दोनो सम्प्रदाय एकाकार हुए तब इस दर्शाने के लिए संघाट प्रतिमाओं का निर्माण प्रारंभ हुआ। हो सके यह आपको अन्य मंदिरों में भी दिखाई दे, जरा ध्यान दीजिएगा।
नारायणपुर के मंदिर की भित्ति में सांप एवं नेवले की लड़ाई
सांप और नेवले की कहानी महाभारत से लेकर हितोपदेश तक उपलब्ध होती है। बचपन में सांप एवं नेवले की लड़ाई खूब देखी परन्तु वर्तमान में वन्य प्राणी कानून होने के बाद सांप एवं नेवले की लड़ाई दिखाने वाले दिखाई नहीं देते।
नारायणपुर (कसडोल-छत्तीसगढ़) के मंदिर की भित्ति में सांप एवं नेवले की लड़ाई का खूबसूरत अंकन किया गया है। नेवला सांप का परम्परागत शत्रु है, कितना भी बड़ा एवं विषैला सर्प हो, अगर नेवला उसके पीछे पड़ गया तो प्राण लिए बिना छोड़ता नहीं है।
![]() |
| नारायणपुर (कसडोल-छत्तीसगढ़) के मंदिर की भित्ति में सांप एवं नेवले की लड़ाई |
शिल्पकार ने अपनी छेनी से मंदिर की भित्ति में इसी रोमांच का अंकन किया है। संसार में दिखाई देने वाली छोटे छोटे को दृश्यों का शिल्पांकन कर शिल्पकार ने अपनी विवेकशीलता का परिचय दिया है। हितोपदेश में नेवले की कई कहानियाँ हैं, जिसमें एक कहानी नेवले के स्वामीभक्ति एवं परोपकार की भी है जो इस प्रकार है………
उज्जयिनी नगरी में माधव नामक ब्रा्ह्मण रहता था। उसकी ब्राह्मणी के एक बालक हुआ। वह उस बालक की रक्षा के लिये ब्राह्मण को बैठा कर नहाने के लिये गई। तब ब्राह्मण के लिए राजा का पावन श्राद्ध करने के लिए बुलावा आया। यह सुन कर ब्राह्मण ने जन्म के दरिद्री होने से सोचा कि "जो मैं शीघ्र न गया तो दूसरा कोई सुन कर श्राद्ध का आमंत्रण ग्रहण कर लेगा।
आदानस्त प्रदानस्त कर्तव्यस्य च कर्मणः।
क्षिप्रमक्रियमाणस्य कालः पिबति तद्रसम्।।
शीघ्र न किये गये लेन- देन और करने के काम का रस समय पी लेता है।
परंतु बालक का यहाँ रक्षक नहीं है, इसलिये क्या करुँ ? जो भी हो बहुत दिनों से पुत्र से भी अधिक पाले हुए इस नेवले को पुत्र की रक्षा के लिए रख कर जाता हूँ। ब्राह्मण वैसा करके चला गया। वह नेवला बालक के पास आते हुए काले साँप को देखकर, उसे मार कोप से टुकड़े- टुकड़े करके खा गया। वह नेवला ब्राह्मण को आता देख लहु से भरे हुए मुख और पैर किये शीघ्र पास आ कर उसके चरणों पर लोट गया।
फिर उस ब्राह्मण ने उसे वैसा देख कर सोचा कि इसने मेरे बालक को खा लिया है। ऐसा समझ कर नेवले को मार डाला। बाद में ब्राह्मण ने जब बालक के पास आ कर देखा तो बालक आनंद में है और सांप मरा हुआ पड़ा है तो उस उपकारी नेवले को देख कर मन में घबरा कर बड़ा दुखी हुआ।
कामः क्रोधस्तथा मोहो लोभो मानो मदस्तथा।
षड्वर्गमुत्सृजेदेनमर्जिंस्मस्त्यक्ते सुखी नृपः।।
काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार तथा मद इन छः बातों को छोड़ देना चाहिये, और इसके त्याग से ही राजा सुखी होता है।
प्रतिमा शिल्प में बुद्ध की विभिन्न मुद्राएं
भारतीय शिल्पकला में हिन्दू एवं बौद्ध प्रतिमाओं में प्रमुखता से आसन एवं हस्त मुद्राएं अंकित की जाती है। हमें प्राचीन स्थलों पर आसनस्थ बुद्ध विभिन्न मुद्राओं में दिखाई देते हैं। जिनमें प्रमुख अभय मुद्रा, ध्यान मुद्रा, धर्म चक्र मुद्रा, एवं भूमि स्पर्श मुद्रा है। इसके साथ ही बज्र मुद्रा, वितर्क मुद्रा,ज्ञान मुद्रा, करण मुद्रा तथा बुद्ध के महानिर्वाण को भी शिल्प में स्थान दिया गया है। कुछ बुद्ध प्रतिमाएं विभिन्न मुद्राओं में देखिए।
![]() |
| भूमि स्पर्श मुद्रा बुद्ध, राजिम छत्तीसगढ़ |
![]() |
| भूमि स्पर्श मुद्रा थिम्पू भूटान |
![]() |
| अभय मुद्रा, धौली भुवनेश्वर उड़ीसा |
![]() |
| धम्म चक्र परवर्तन मुद्रा- धौली भुवनेश्वर उड़ीसा |
![]() |
| पद्मासन ध्यान मुद्रा- सिरपुर छत्तीसगढ़ |
![]() |
| वज्र मुद्रा- कान्धार शैली |
प्राचीन काल के प्रतिमा शिल्प में आभूषण अलंकरण
स्त्री एवं पुरुष दोनों प्राचीन काल से ही सौंदर्य के प्रति सजग रहे हैं। स्त्री सौंदर्य अभिवृद्धि के लिए सोलह शृंगार की मान्यता संस्कृत साहित्य से लेकर वर्तमान तक चली आ रही है। कवियों ने अपनी कविताओं में नायिका के सोलह शृंगार का प्रमुखता से वर्णन किया है तो शिल्पकार भी क्यों पीछे रहते, उन्होंने भी प्रतिमा शिल्प में सौंदर्य वृद्धि की सभी युक्तियों को कुशलता के साथ उकेरा है। मंदिरों की भित्तियों में स्थापित जब हम प्रतिमा शिल्प को देखते हैं तो नख-शिख अलकंरण दिखाई देता है, जिसमें वस्त्राभूषण अलंकरण प्रमुखता से उकेरे गए हैं।
![]() |
| पायल धारिणी (राजा रानी मंदिर भुवनेश्वर उड़ीसा) फ़ोटो ललित शर्मा |
गुप्तकाल से मंदिर शिल्प योजना में भित्तियों में प्रतिमा शिल्प का प्रयोग दिखाई देता है। इसके पश्चात के काल में प्रतिमा शिल्प के अलंकरण में भिन्नता स्पष्ट दिखाई देती है। वस्त्रों के छापे, पहने का ढंग एवं आभूषणों की बनावट भी पृथक दिखाई देती है। इन प्रतिमाओं में हम देखते हैं कि पुरुष सौंदर्य की वृद्धि के लिए केश विन्यास, वस्त्र, माला, बाजूबंद पहने दिखाई देते हैं। जबकि स्त्रियों के आभूषण अलग दिखाई देते हैं। जिस तरह वर्तमान काल में वस्त्रों एवं आभूषणों में बदलाव फ़ैशन के आधार पर होता है उसी तरह प्राचीन काल में बदलाव दिखाई देता है।
![]() |
| संध्या काल ( सूर्य मंदिर कोणार्क उड़ीसा) फ़ोटो ललित शर्मा |
लगभग तीस वर्षों के भ्रमण काल में मैने विभिन्न कालों में निर्मित मंदिरों के स्थापत्य एवं प्रतिमा शिल्प को देखा है। आप प्रतिमा अलंकरण को देखकर उसके निर्माण काल का अंदाजा लगा सकते हैं। आभूषण (आभरण) प्राचीन काल से ही अलंकरण का साधन रहे हैं। भारत के निवासी प्राचीन काल से आभूषन प्रिय रहे हैं जो आभूषण केश से लेकर पैरों तक धारण करते थे। केशों में चिमटी, माथे पर बेन्दा, कानों में कुंडल, गले में हार, बाजू पर बाजूबंद, कलाई में चूड़ी, कमर में कमरधनी, उंगली में अंगूठी एवं पैरों में पायल का अलंकरण होता था। वर्तमान में इन आभूषणों का प्रयोग उसी रुप में विद्यमान है।
![]() |
| संध्या काल ( शिवालय देवर बीजा, जिला बेमेतरा छत्तीसगढ़) फ़ोटो ललित शर्मा |
प्रतिमाओं के शीर्ष पर कीरीट मुकुट दिखाई देता है। स्त्री एवं पुरुष कानों को समान रुप से विभूषित करते थे। तत्कालीन साहित्य में कुंडल एवं कर्णिका का वर्णन होता है। विविध धातुओं से निर्मित रत्नकर्णिका, दारुकर्णिका, त्रपुकर्णिका कहलाती थी। इसके अतिरिक्त आमुक्तिका आभूषण का उल्लेख मिलता है। इसमें कुंडल, आधुनिक झुमके, कर्णिका, बाली एवं आमुक्तिका को टॉप्स माना जा सकता है। घोंघे की खोल जैसे टॉप्स वर्तमान में भी दिखाई देते हैं।
![]() |
| नर्तकी (गणेश मंदिर हम्पी कर्नाटक) फ़ोटो ललित शर्मा |
समकालीन साहित्य में कंठ में पहने जाने वाले विभिन्न प्रकार के हारों का उल्लेख है। जिसमें सुवर्ण सूत्र, कंठ सूत्र, अर्ध हार, हार के साथ मुक्ता हारों में नील मुक्ताहार, लोहित मुक्ताहार एवं श्वेत मुक्ताहार तथा विभिन्न धातुओं से निर्मित रत्नहार, रुचक हार, हिरण्यहार, सुवर्णहार, दंतहार, काषार्पण हार चन्द्रहार प्रमुख हैं, इसके परवर्ती राजपूत काल में नौलखा हार की खूब धूम रही। कंठ आभूषणों में वनमाला का उल्लेख भी आवश्यक है। अधिकतर विष्णु की मूर्ति में वनमाला का अंकन मिलता है। बाजू में धारण करने वाले आभूषण वलय, केयूर एवं अंगद नाम से जाने गए। वलय हाथीदांत से युक्त होता था, केयूर स्वर्ण से बनता था तथा अंगद स्वर्ण एवं रजत के तारों से बनाया जाता था।
![]() |
| कलश धारिणी देवी (जराय का मठ बरुआ सागर उत्तर प्रदेश) फ़ोटो ललित शर्मा |
चूड़ियों को कटक वलय यादि कहा जाता था, इन्हें विभिन्न धातुओं से एवं आकारों में बनाया जाता था। अंगुली में पहने के लिए अंगुलिमुद्रा एवं मुद्रिका या अंगुलीयक होती थी। कई प्रतिमाओं में तो कई अंगुलियों में अंगूठी धारण किए हुए दिखाया गया है। इसके साथ ही मेखला कमर का आभूषण था इसे स्त्रियाँ धारण करती थी, यह रत्न एवं ताम्रयुक्त होती थी। इसे करधनी, किंकणी, कटक, सुवर्णसूत्र, रशना, कांची मेखला आदि कहा जाता है। घुंघरुयुक्त बजने वाली करधनी को कांचीगुण कहा गया है। पैरों में पैजनी, पायल इत्यादि धारण की जाती थी, यह लघुघंटिकायुक्त रजत एवं कांसे से निर्मित की जाती थी।
![]() |
| नदी देवी गंगा ( देऊर मंदिर मल्हार जिला बिलासपुर छत्तीसगढ़) फ़ोटो ललित शर्मा |
प्रतिमा शिल्प में अप्सराओं, नायिकाओं एवं देवियों को भिन्न भिन्न तरह के आभूषणों से अलंकृत किया जाता था तथा उनके अनुचरों, परिचारको एवं परिचारिकाओं के शरीर पर आभूषण कम दिखाई देते हैं। उस काल में भी बड़े लोग स्वर्ण, रजत एवं बहुमुल्य रत्न जड़ित आभूषणों का प्रयोग करते थे। जिनके पास (दास दासियाँ) अधिक धन नहीं होता था वे रजत, कांसे एवं तांबे के आभूषण धारण करते थे। वर्तमान में यही परिपाटी दिखाई देती है। आभूषण हमेशा उच्चकुल एवं धनवानों के ही होते हैं।
![]() |
| शाल भंजिका ( मुक्तेशर मंदिर समूह भुवनेश्वर उड़ीसा) फ़ोटो ललित शर्मा |
आभूषणों का महत्व सौंदर्य वृद्धि के साथ धार्मिक भी है, जिस प्रकार विवाहित स्त्रियां बेन्दा (टीका) धारण करती हैं, कुछ स्थानों पर मंगलसूत्र विवाहित एवं सौभाग्य का सूचक माना गया है। इसी तरह पुरुष भी ताबीज इत्यादि धारण करते थे। उत्खनन के दौराण अर्ध मूल्यवान रत्न अधिक प्राप्त होते हैं, जिनका आभूषणों में प्रयोग किया जाता था। स्वर्ण एवं रजत के आभूषणों में पत्थर भी जड़े जाते थे, जिन्हें रत्न कहा जाता है। गोमेद, जम्बुमणि, स्फ़टिक, सेलखड़ी, हाथी दांत, शीशा आदि जड़े जाते थे। इसके अतिरिक्त मिट्टी के मनके भी धारण किए जाते थे।
![]() |
| चंवर धारिणी ( विट्ठल मंदिर हम्पी कर्नाटक) फ़ोटो ललित शर्मा |
उपरोक्त आलेख के लिए मैने भारत के चारों ओर के विभिन्न मंदिरों की भित्तियों में जड़ित प्रतिमाओं के चित्रों को जुटाया है। इनमे एक चीज समान है, वह है कि किसी भी प्रतिमा की नाक में छिद्र नहीं है अर्थात प्राचीन काल में नाक में नथ, कील, लौंगादि आभूषण धारण नहीं किए जाते थे। कुछ विद्वानों का मत है कि कुषाण काल तक की प्रतिमाओं में नाक का आभूषण प्राप्त नहीं होता। मेरे द्वारा खींचे गए चित्रों में आठवीं शताब्दी से लेकर चौदहवी एवं पन्द्रहवी शताब्दी तक की प्रतिमाएँ जुटाई गई है। जिसमें किसी ने भी नाक का आभूषण नहीं पहना है।
![]() |
| क्षीर सागर में शेष शैया पर भगवान विष्णु एवं देवी लक्ष्मी (लक्ष्मीनारायण मंदिर ओरछा) फ़ोटो ललित शर्मा |
अब प्रश्न यह उठता है कि महिलाओं द्वारा नाक में आभूषण कब से पहने जाने लगा। इसका जवाब भी मंदिरों से प्राप्त होता है। जब मैं ओरछा भ्रमण कर रहा था तब लक्ष्मीनारायण मंदिर की भित्तियों पर अठारवीं शताब्दी की भित्ति चित्रकारी दिखाई थी। इस चित्रकारी में रामायण के प्रसंगों से लेकर अंग्रेजों के साथ युद्ध तक को प्रदर्शित किया गया है। इन भित्ति चित्रों में कृष्ण राधा के उपवन विहार का प्रसंग भी दिखाई देता है, इस चित्र में सभी महिलाओं ने नाक में नथ पहन रखी है। शेष शैया पर विश्राम करते विष्णु के चित्र में भी लक्ष्मी की नाक में नथ पहनाई गई है। इससे स्पष्ट होता है कि नाक में आभूषण पहनने की परम्परा मुगल काल में प्रारंभ हुई और अद्यतन जारी है।
मानव का पक्षी प्रेम एवं शुक सारिका प्रसंग
पक्षियों से मनुष्य का जन्म जन्मानंतर का लगाव रहा है। पक्षियों का सानिध्य मनुष्य को मन की शांति प्रदान करता है तो बहुत कुछ सीखने को उद्यत करता है। कुछ पक्षी तो ऐसे हैं जो मनुष्य से उसकी बोली में बात करते हैं और इन्होंने सामान्य नागरिक के गृह से लेकर राजा महाराजाओं के महलों के अंत:पुर एवं ॠषियों की कुटियों में भी स्थान पाया है। शुक एवं काग ऐसे पक्षी हैं, जो ॠषियों के सानिध्य में ज्ञानार्जन कर शुकदेव एवं कागभुसुण्डि के नाम से लोक में प्रतिष्ठित हुए। शुक के सम्बंध में एक धारणा यह भी है कि वह बहुत बुद्धिमान होता है। एक पौराणिक आख्यान के अनुसार शुक ने शिवजी का समस्त ज्ञान श्रवण द्वारा आत्मसात कर लिया था। वही अध्यात्म-पारंगत शुकदेव रूप में अवतरित हुआ। इतिहास आलेख शुक सारिका
![]() |
| शुक सारिका खजुराहो |
विरहणी के एकांत के संगी के रुप में तोता-मैना लोक प्रसिद्ध हैं। अंत:पुर की विरह व्याकुल रमणी के द्वारा इन पक्षियों के संवाद से संस्कृत साहित्य भरा पड़ा है। तोता-मैना का लोक प्रसिद्ध कहानी एवं संवाद एक समय में यह युवा एवं युवती के मुंह से सुना जा सकता था। शुक-सारिका को लेकर बहुत ही कथाएं प्रचलित हैं, इन्हीं का लोक कथाओं में रूपान्तर ‘किस्सा तोता-मैना’ के नाम से हुआ जिसके विविध संस्करण बाजार में उपलब्ध हैं। ये दोनो पक्षी मनुष्य की बोली में बोलने की क्षमता के कारण प्राचीनकाल से लेकर वर्तमान तक मनुष्य के साथी बने हुए हैं।
ऐसे में ये पक्षी शिल्पकार की दृष्टि से कैसे ओझल हो सकते थे। तोता-मैना को शिल्पकारों में अपने शिल्प में शुकसारिका के रुप में स्थान दिया। प्राचीन मंदिर स्थापत्य में शुकसारिका का शिल्पांकन प्रमुखता से दिखाई देता है। शिल्पकारों ने शुकसारिका को अपने शिल्प का विषय बनाया, जिससे युगों युगों तक पक्षी एवं मनुष्य के सानिध्य, प्रेम एवं सहवास को आने वाली पीढियाँ जान सकें। मुझे भारत में आठवीं नवमी शताब्दी से लेकर चौदहवीं शताब्दी तक के स्थापत्य में शुक सारिका का शिल्पांकन दिखाई देता है। ऐसे में शुक सारिका के शिल्पांकन से खजुराहो के मंदिर कैसे अछूते रह सकते हैं। जहाँ कामसूत्र का शिल्पांकन हो वहाँ शुक सारिका का शिल्पांकन अवश्य मिलता है क्योंकि कामसूत्र में शुक सारिकाओं के साथ आलाप करने कराना की क्रिया को चौसठ कलाओं में गिना गया है।
लोक में तोता ही एक ऐसा पक्षी एवं जीव है जो मनुष्य की वाणी का अनुकरण कर सकता है। इसे बोलना सिखाना पड़ता है या यह किसी भी बोलते हुए मनुष्य का अनुकरण कर रटता है, परन्तु मैना स्वत: बोलती है। बस्तर की पहाड़ी मैना इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से उनकी आवाज में बात करके अचंभित कर दिया था। शुक सारिका लोक प्रसिद्ध हैं, शुक ख्याति तो ऐसी है कि इसे पालने वाले सबसे पहले राम राम, सीता राम बोलना सिखाना है। किसी के घर के शुक की वाणी सुनकर उस परिवार के आचार विहार का आंकलन किया जा सकता है कि परिवार कितना सुसंस्कृत एवं सभ्य है।
![]() |
| मुक्तेश्वर मंदिर समूह भुबनेश्वर की शुक सारिका |
साहित्य में शुक ने प्रमुख स्थान पाया है, इसकी उपस्थित संस्कृत साहित्य से लेकर वर्तमान तक प्राप्त होती है। जायसी के ‘पद्मावत’ में तोते को गुरु और मार्गदर्शक का पद प्राप्त है। ‘हीरामन’ नाम से वह रत्नसेन और पद्मावती को परामर्श भी देता है और उनके मिलन में सहायक भी होता है। रचना के अन्त में उसके बारे में स्पष्ट लिखा है—सूआ सोई जे पंथ दिखावा। बिनु गुरु जगत को निर्गण पावा।
मुंशी प्रेमचंद की कहानी आत्माराम में वेदीग्राम का सुनार महादेव तोते के साथ अपने एकाकीपन को बांट लेता है। तो प्राचीनकाल के अंत:पुर की रमणियाँ भी शुक के साथ संवाद कर अपने एकाकीपन को दूर करती थी। छत्तीसगढ़ के लोकगीतों में सुआ प्रमुख स्थान रखता है। यहाँ यह विरहणी का संवदिया बनता है और सुआ गीत एवं सुआ नृत्य के रुप में लोक में स्थापित एवं प्रतिष्ठित हो जाता है।
तोते की चोंच (शुक चंचू) जैसी किंचित टेढ़ी नासिका सौंदर्य का प्रतीक बनती है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने साकेत में लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला की शुकनासिका और बिम्ब अधरों का बहुत ही आकर्षक चित्र खींचा है। एक तोते को उर्मिला के नाक के मोती पर होंठों की कान्ति पडऩे के कारण अनार के दाने की भ्रान्ति हुई। फिर नाक को देखकर सोचता है यह दूसरा तोता कहां से आ गयाकवियों ने तोते का अनेक रूपों में चित्रण किया है। बड़े शौक से पाला हुआ तोता भी कभी उपेक्षा का शिकार हो जाता है और काले कौवों को सम्मान मिलता है। बिहारी ने अन्योक्ति के रूप में इसका चित्रण किया है।
मरत प्यास पिंजरा पर्यो सुआ समै के फेर।
आदर दै दै बोलियत वाईसु बलि के बेर॥
शुक-सारिका तो अनादिकाल से ही घरों एवं आश्रमों की शोभा बढ़ाते रहे हैं। जगज्जनी जानकी की विदा के समय उनके द्वारा पाले हुए ये पक्षी इतने दुःखी हुए कि इन्होंने परिजनों को भी अधीर कर दिया—
सुक सारिका जानकी ज्याये। कनक पिंजरन्ह राखि पढ़ाये॥
व्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुवि धीरजु परिहरह न केही॥
शुक सारिकाएँ राज महलों या किसी विलासी नागरिक के बहिर्द्वार तक ही नहीं मिलती थी इनकी उपस्थिति तपोवन में ॠषि निवासों में भी होती थी। सुप्रसिद्ध वाणभट्ट ने अपने पूर्व पुरुष कुबेर भट्ट का परिचय देते हुए गर्व से लिखा है कि उनके गृह के शुकों एवं सारिकाओं ने समस्त वांग्मय का अभ्यास कर लिया था और यजुर्वेद एवं सामवेद का पाठ करते समय पद पद पर ये पक्षी विद्यार्थियों की गलतियां पकड़ा करते थे। कालांतर में तो शुक इतने प्रबुद्ध हो गए कि शास्त्रार्थ तक करने लगे। शास्त्रार्थ-दिग्विजय के लिए निकले आचार्य शंकर ने पनिहारिनों से मंडन मिश्र का घर पूछा तो उन्होंने यही तो कहा था—
स्वतः प्रमाणं परतः प्रमाणं कीरांगना यत्र गिरो गिरन्ति।
द्वारस्थ नीडान्तर सन्निरुद्धः जानाहितं मण्डन मिश्र धामम्॥
![]() |
| मुक्तेश्वर मंदिर समूह भुबनेश्वर में लेखक |
राष्टकवि दिनकर ने कहा था कि पक्षी और बादल। ये भगवान के डाकिये हैं। जो एक महादेश से। दूसरे महादेश को जाते हैं। हम तो समझ नहीं पाते हैं। मगर उनकी लाई चिट्ठियां/पेड़, पौधे, पानी और पहाड़ बांचते हैं। प्राचीन काल से लेकर अद्यतन पक्षियों एवं मनुष्य का साथ बना रहा और पक्षियों के माध्यम से मनुष्य ने अपनी वाणी को विस्तार दिया। इन पक्षियों ने अपनी नैसर्गिक प्रतिभा के कारण साहित्य एवं शिल्प में महत्वपूर्ण स्थान भी पाया। प्रकृति के साथ जुड़े मनुष्यों का भविष्य में भी इनसे साथ बना रहेगा। इति शुक सारिका प्रकरणम्।
प्राचीन भारतीय मूर्तिकला में केश विन्यास एवं अलंकरण
सौंदर्य के प्रति मानव प्राचीन काल से ही सजग रहा है, देह के अलंकरण में उसने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी एवं नख सिख से लेकर गुह्यांग तक अलंकरण करने के लिए नवोन्मेष किए। सौंदर्य वृद्धि के लिए किए गए भिन्न भिन्न अलंकरण हमें तत्कालीन प्रतिमा शिल्प में दिखाई देते हैं।
![]() |
| क्या मुखड़ा देखे दर्पण में…… सर्वांग अलंकृत स्त्री - राजा रानी मंदिर भुबनेश्वर उड़ीसा। |
पुरुष एवं स्त्री दोनो ही सौंदर्य प्रसाधनों का प्रयोग करते दिखाई देते हैं। जिनमें केश सज्जा एवं आभुषण अलंकरण प्रमुख है। मोहन जोदड़ो से लेकर वर्तमान तक केश विन्यास की कलाकारी दिखाई देती है। आर्य सभ्यता जब अपने उत्कर्ष पर थी तब से लेकर वर्तमान तक भारतीय कवियों, चित्रकारों एवं शिल्पकारों ने केश विन्यास को प्रमुखता से प्रदर्शित किया है।
पुरुषों में स्त्रियों की तरह लम्बे केश रखने की प्रथा थी, जिसका वे भिन्न भिन्न प्रकार से अलंकरण करते थे। श्रमशु (दाढी) एवं मूंछ युक्त चेहरे भी शिल्प में दिखाई देते हैं। जिसमें छोटी दाढी एवं लम्बी दाढी का प्रचलन दिखाई देता है, लहरदार तनी हुई तलवारी मूंछे भी प्रचलन में रही है।
![]() |
| चित्र में दाढी एवं मूंछ युक्त पुरुष ने जूड़ा बांधकर उसे पुष्पादि से अलंकृत किया है। चित्र - खजुराहो। |
देवाकृतियों में छोटी एवं लच्छेदार घुंघरवाली दाढी भी दिखाई देती है। पुरुषों में कई प्रकार के केश विन्याश का प्रचलन था। खुले केश, टोपीदार जूड़ा, एवं गेंदनुमा जूड़ा प्रतिमा अलंकरण में दिखाई देता है।
स्त्रियाँ अपने केशों के प्रति सदा से सजग रही हैं, लम्बे केश सौंदर्य के प्रतिमान माने जाते थे। उन्हें भिन्न प्रकार से जूड़े में गूंथ कर पुष्पादि एवं चिमटियो से अलंकृत किया जाता था तथा बालों के बिठाकर विभिन्न आकृतियां प्रदान करने के लिए मैन (मोम), गोंदादि के प्रयोग का भी उल्लेख मिलता है।
केश प्रक्षालन के पश्चात उसे सुगंधित धुम्र से सुवासित किया जाता था, उसके बाद जूड़ा गुंथा जाता था। केश संवारने के लिए कई तरह की कंघियों का प्रयोग होता था। उत्खनन में हाथी दांत की कंघियां हमें मिलती हैं। जिन्हें अलंकृत किया जाता था। बिहारी कवि कहते ने केश सौंदर्य का वर्णन करते हुए कहा है कि
कच समेटि करि भुज उलटि, खए सीस पट डारि।
काको मन बाँधै न यह, जूडो बाँधनि हारि॥
![]() |
| पुष्पादि एवं मैन से अलंकृत केश - खजुराहो |
समय के साथ बाल बांधने एवं जूड़े की सजावट में परिवर्तन होता रहा। सिंगारपट्टी झुमर आदि आभुषणों को बालों में गूंथ कर शिरोधार्य करने का चलन भी प्रतिमा शिल्प में दिखाई देता है।
मौर्यकाल से लेकर गुप्तकाल तक प्रतिमा शिल्प में जूड़ा बांधने का चलन दिखाई देता है। उसके पश्चात गुंथित वेणी का चलन दिखाई देने लगा एवं चोटी अधिक लोकप्रिय हो गई। कवियों ने इसे नागिन की उपमा दे डाली और नायिका सौंदर्य वर्णन में कई स्थानों पर नागिन सी लहराती वेणी का उल्लेख मिलता है…
लटकति ललित पीठ पर चोटी, बिच-बिच सुमन सँवारी।
देखे ताहि मैर सो आवत, मनहुँ भुजंगिनी कारी॥
![]() |
| कोणार्क की भित्ति में स्थापित पुरुष प्रतिमा का केश विन्यास |
उत्तर भारत की अपेक्षा दक्षिण भारत में केश विन्यास अधिक भव्य दिखाई देता है। प्रतीत होता है कि दक्षिण भारत में केश सज्जा एक कला के रुप में विकसित हुई। प्राचीनकाल में सारनाथ मथुरा सहित उत्तर भारत में अलकावलि, मयुरपंखी आदि प्रकार के केश विन्यास प्रचलित थे।
अलकावलि विधि में बालों को घुंघराले बनाकर गर्दन एवं माथे पर छोड़ दिया जाता है। मयुरपंखी में बालों को केवड़े इत्यादि के पत्रों से अलंकृत कर इस प्रकार से बांधा जाता था कि मयुर पंख का आभास होता था। अहिक्षत्र का अर्थ है सर्प का फ़न। बालों के जूड़े को शीश के मध्य इस तरह से बांधा जाता था जिससे सर्प के फ़न का भान होता था।
इन प्रतिमा शिल्पों को देखने ज्ञात होता है कि भारतीय नारियों को केश विन्यास कला का अच्छा ज्ञान था। आप मंदिरों की भित्तियों में जड़ी हुई अप्सराओं एवं देव प्रतिमाओं के केश विन्यास पर ध्यान देंगे तो आपको सभी में भिन्नता दिखाई देगी। परन्तु काल के अनुसार केश विन्यास का चलन एक सा दिखाई देता है।
वर्तमान में भी केश विन्यास के प्रति स्त्री एवं पुरुषों दोनों में जागरुकता दिखाई देती है। समय एवं काल के अनुसार केश विन्यास एवं अलंकरण में परिवर्तन होता रहता है, परन्तु सलीके से संवारे हुए केश सौंदर्य वृद्धि करने में कोई कसर नहीं रखते।
![]() |
| सर्वांग सुंदर अलंकरण का पार्श्व - खजुराहो |
स्त्री पुरुष सौंदर्य अलंकरण वृहद विषय है, इस पर जितनी चर्चा की जाए कम है। आशा है कि अब आप जब किसी प्राचीन मंदिर के दर्शन करने जाएँगे तो वहाँ स्थापित प्रतिमाओं के केशादि अलंकरण पर अवश्य ध्यान देंगे।
प्राचीन प्रतिमा शिल्प में आखेट अंकन
शिकार द्वारा मनोरंजन वैदिक काल से समाज में विद्यमान रहा है एवं प्राचीन काल के मनोरंजन के साधनों का अंकन मंदिरों की भित्तियों में दिखाई देता है। मंदिरों की भित्तियों में अंकित प्रतिमाओं से ज्ञात होता है कि प्राचीन काल के समाज में किस तरह के मनोरंजन के साधन प्रचलित थे। देखा जाए तो सभी आयु वर्ग के लिए पृथक मनोरंजन के साधन होते थे। इसमें आखेट भी मनोरंजन का एक साधन था।
![]() |
| हजारा राम मंदिर हम्पी कर्नाटक की भित्ति में हिरण के शिकार का दृश्य |
धनुर्विद्या में क्षत्रिय युवाओं का कुशल होना अत्यंत ही आवश्यक माना जाता था तथा युवा मल्लयुद्ध कला, तीरंदाजी एवं आखेट की ओर अधिक आकर्षित होते थे। क्योंकि तत्कालीन समय की मांग यही थी। मल्ल युद्ध कला से शारीरिक सुदृढता आती थी और तीरंदाजी एक अच्छा सैनिक बनाती थी। तीरंदाजी का अभ्यास करने के लिए आखेट भी आवश्यक ही था, जिस तरह वर्तमान में सुरक्षाबलों के लिए निशानेबाजी का अभ्यास चाँदमारी में किया जाता है।
![]() |
| हजारा राम मंदिर हम्पी कर्नाटक की भित्ति में अंकित शुकर शिकार का दृश्य। |
ललित विस्तर में युवाओं के रंगमंडल का उल्लेख मिलता है। जहाँ शारीरिक परिश्रम वाले खेलों का आयोजन होता था। युवाओं में शक्ति अधिक होने के कारण कूदने फ़ांदने एवं दौड़ने वाले खेलों में रुचि लेते थे। जिससे शारीरिक व्यायाम भी हो जाता था।
![]() |
| विश्वनाथ मंदिर खज्रुराहो की भित्ति में अंकित हिरण के शिकार का दृश्य। |
धनुर्विद्या का सामान्यत: किशोरो में अधिक आकर्षण होता था। पौढ शिकार हेतु जंगल में जाया करते थे, इसका उल्लेख तत्कालीन साहित्य में भी मिलता है। मांस के लिए शिकार करना आम बात थी, परन्तु राजा सेना सहित शिकार के लिए वन गमन करते थे।
![]() |
| स्वान सहित दो लोग मिलकर एक बड़े शुकर का शिकार कर रहे हैं। |
मंदिरों में स्थापित प्रतिमाओं से ज्ञात होता है कि सामन्यत: शुकर एवं हिरण प्रजाति का शिकार किया जाता था। इसके मांस के प्रति लोगों का अधिक आकर्षण था। जब कोई शेर या बाघ आदमखोर हो जाता था तो प्रजा एवं पशुधन की रक्षा के लिए राजा को उसका शिकार करना पड़ता था। इसके लिए हांका कर सामुहिक आखेट की व्यवस्था की जाती है।
![]() |
| विरुपाक्ष मंदिर हम्पी कर्णाटक की भित्ति में शेर को हिरणो का शिकार करते दिखाया गया है। |
तत्कालीन समय में शेर का आखेट रोमांच के लिए किया जाता है। खजुराहो के कंदारिया महादेव मंदिर की भित्ति में एक बड़े शुकर का शिकार कई लोग मिलकर करते दिखाई दे रहे हैं, जिसमें उनका स्वान विशेष रुप से सहभागी है। प्रतिमा शिल्प से ज्ञात होता है कि तत्कालीन समय में आखेट भी समाज के मनोरंजन का एक प्रमुख साधन रहा है।
प्राचीन प्रतिमा शिल्प में अंकित तत्कालीन स्त्री मनोविनोद
प्राचीनकाल के मंदिरों की भित्ति में जड़ित प्रतिमाओं से तत्कालीन सामाजिक गतिविधियाँ एवं कार्य ज्ञात होते हैं। शिल्पकारों ने इन्हें प्रमुखता से उकेरा है। इन प्रतिमाओं से तत्कालीन समाज में स्त्रियों के कार्य, दिनचर्या एवं मनोरंजन के साधनों का भी पता चलता है।
![]() |
| कंदुक क्रीड़ा कर मनोविनोद करती त्रिभंगी मुद्रा में नायिका : खजुराहो |
जिस तरह तेरहवीं शताब्दी के कोणार्क के सूर्य मंदिर में हाईहिल सेंडिल (खड़ाऊ) पहने युवती की प्रतिमा दिखाई देती है, यह उस जमाने बड़ी बात है। तेरहवीं सदी में स्त्री द्वारा ऊंची एड़ी की खड़ाऊ धारण करना क्रांतिकारी ही माना जाएगा। अभी तक तो पुरुषों द्वारा ही खड़ाऊ धारण की जाती थी।
पाश्चात्य युरोप के देशों में भी सोलहवीं सदी तक स्त्रियों द्वारा ऊंची एड़ी के जूते धारण करने की शुरुवात भी नहीं हुई थी। इससे एक बात तो निकल कर सामने आती है कि स्त्रियों को इस सदी तक पुरुषों के समान ही अधिकार प्राप्त थे तथा पुरुष उनके आदेश की अवहेलना नहीं कर सकते थे।
![]() |
| मुक्तेश्वर मंदिर भुवनेश्वर की भित्ति में अंकित कंदुक क्रीड़ा कर मनोविनोद करती नायिका। |
राजा लांगुल नृसिंह देव ने अपने खजाने से सूर्य मंदिर निर्माण करने का आदेश स्वमाता से ही पाया था और उसने मंदिर निर्माण पर अमल भी किया। प्रतिमाओं से एक बात और निकल कर सामने आती है कि स्त्रियों परदा नहीं करती थी। किसी भी प्रतिमा में परदा या घुंघट दिखाई नहीं देता।
प्रतिमा शिल्प की भाव भंगिमा से ज्ञात होता है कि गृहकार्य के पश्चात स्त्रियाँ विविध प्रकारों से मनोविनोद करती थी। पक्षी इस मनोविनोद में प्रमुख सहायक होते थे।
![]() |
| राधा कृष्ण के नवीन प्रतिमा शिल्प में राधा के कलश में चोंच डालकर जल ग्रहण करता हुआ मयूर। |
जैसे शुक सारिका प्रकरण में बताया गया है कि शुक सर्वाधिक प्रिय पक्षी था। किसी प्रतिमा के हाथ पर शुक बैठा है, तो किसी के कंधे पर। किसी प्रतिमा में कटोरे में दाने लेकर सारिका को चुगवाए जा रहे हैं।
पक्षियों में शुक, सारिका, मयूर, हंस इत्यादि पाले जाते थे। एक प्रतिमा में श्री कृष्ण एवं राधा है, राधा जी के जल कलश में मोर ने चोंच डाल रखी है। बड़ा ही सुंदर चित्रण शिल्पकार ने किया है।
![]() |
| खजुराहो के कंदारिया महादेव के भित्ति में मनोविनोद एवं अंत:पुर के साथी के रुप में हंस। स्द्यस्नाता स्त्री के केशों से टपकती हुई जल की बूंदों को मोती समझ कर ग्रहण करता हुआ। |
एक प्रतिमा में स्त्री अपने केश धोकर निचोड़ रही है और हंस केशों से टपकती जल की बूंदों को ग्रहण करते दिखाई दे रहा है। शुक सारिका का प्रयोग स्त्रियाँ प्रेम संदेश लाने ले जाने में संवदिया के तौर पर करती हुई दिखाई देती है।
इन शिल्पों में कपोत कहीं दिखाई नहीं देता जिसे पत्रवाहक के तौर पर नियुक्त किया जाता था। कामसूत्र कहता है कि भोजनोपरांत शुक को बुलवाना, लावक चिड़ियों, मुर्गे एवं भेड़ों की लड़ाई मनोविनोद के लिए देखनी चाहिए। इन सब का अंकन प्रतिमा शिल्प में दिखाई देता है।
![]() |
| उड़ीसा के नवीन प्रतिमा शिल्प में सारिका को चुग्गा चुगाते हुए नायिका। |
खजुराहो के एक प्रतिमा शिल्प में त्रिभंगी मुद्रा में स्त्री के हाथ में गेंद दिखाई दे रही है, चेहरे के भावों से दिखाई देता है कि वह कंदुक क्रीड़ा का आनंद ले रही है।
भुवनेश्वर के मुक्तेश्वर मंदिर समूह के एक अन्य शिल्प में स्त्री के हाथ में टेनिस के बैट जैसी कोई चीज दिखाई दे रही है, उस पर वह गेंद उछाल कर कंदुक क्रीड़ारत है। इससे स्पष्ट होता है कि तत्कालीन समय में स्त्रियाँ गेंद का प्रयोग मनोरंजन के लिए करती थी।
![]() |
| राजा रानी मंदिर भुवनेश्वर के प्रतिमा शिल्प में सुग्गे के साथ मनोविनोदरत नायिका। |
अवदान शतक में पान गोष्ठी में झूल झूलकर मनोविनोद का उल्लेख है। झूला झूलते हुए गीत गाना वर्तमान काल में दिखाई देता है। प्रतिमाओं से स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ शांत प्रकृति के खेल खेलती थी।
इसके अतिरिक्त स्त्रियों के मनोविनोद का आकर्षक अंग वन विहार था। वन विहार के अंतर्गत पुष्प प्रचारिका, दोहद एवं सलिल क्रीड़ा इत्यादि आते हैं। पुष्प प्रचारिका क्रीड़ा में शाल भंजिका का अंकन प्रमुखता से मिलता है। पुष्प तोड़ती प्रसाधिका का उल्लेख भी शिल्पांकन में मिलता है।
![]() |
| मुक्तेश्वर महादेव भुवनेश्वर की भित्ति में अंकित वीणावादिनी |
काव्य प्रकाश ग्रंथ में वृक्ष में पाद प्रहार करना, आलिंगन करना, अन्य कार्य करना दोहद क्रीड़ा के अंतर्गत आता है। ऐसे मनोरंजन के लिए आम्र, कदम्ब, अशोक एवं ताड़ के वृक्ष उपयुक्त माने जाते थे। इसके साथ यह धारणा भी कि नायिका के बाएँ चरण प्रहार के बिना अशोक वृक्ष पुष्पित नहीं होगा।
सलिल क्रीड़ा में स्त्रियों द्वारा नौका विहार करना, नदी या झरने में स्नान करना तथा जल किलोल करना आता है। इसके लिए राज प्रसादों में पुष्कर्णियों का निर्माण कराया जाता था। तत्कालीन साहित्य में रानी एवं राजकुमारियों द्वारा पुर्णमासी की रात में पुष्करणी स्नान का उल्लेख मिलता है।
![]() |
| राजा रानी मंदिर भुवनेश्वर की भित्ति में अंकित शाल भंजिका अशोक वृक्ष पर पाद प्रहार करते हुए। तत्कालीन समय में यह धारणा भी कि नायिका के बाएँ चरण प्रहार के बिना अशोक वृक्ष पुष्पित नहीं होगा |
वैशाली की नगर वधू में सलिल क्रीड़ा का उल्लेख स्मरण आता है। इसके अतिरिक्त गायन, वादन एवं नृत्य भी मनोविनोद का एक साधन था। प्रतिमा शिल्प में वृक्ष के नीचे वीणा वादन करती स्त्री दिखाई देती है।
इस तरह प्रतिमा शिल्प के माध्यम से हमें तत्कालीन समाज के मनोविनोद के साधनों की जानकारी भी मिलती है। भले ही वर्तमान में मनोविनोद के साधनों में बदलाव आ गया हो परन्तु मनोविनोद आज भी होता है और भविष्य में भी होता रहेगा। इति स्त्री मनोविनोद प्रकरणम्।
प्राचीन काल के शिल्प में शय्या/खाट अंकन
प्राचीन शिल्प में विश्राम हेतु बाजवट/खाट या शय्या प्रयोग दिखाई देता है। खाट या शय्या का मनुष्य के दैनिक जीवन में कब से प्रवेश हुआ, इसकी जानकारी तो स्पष्ट रुप से नहीं है, परन्तु शिल्पांकन में अवश्य दिखाई देती है।
![]() |
| खजुराहो के लक्ष्मण मंदिर की भित्ति शिल्पांकन में शय्या। |
भूमि पर शयन करने से जहरीले कीटों के दंश का भय रहता है। इसलिए भूमि से कुछ दूरी बनाकर शयन करने के लिए शय्या का निर्माण हुआ। शय्या निर्माण करने वाले वर्धकी (बढ़ई) का उल्लेख कई स्थानों पर आता है।
मनुष्य अपने जीवन का एक तिहाई समय शयन कक्ष में व्यतीत करता है। इस बात को प्राचीन काल के मनुष्यों ने पहचाना, सुरक्षित एवं भय रहित निद्रा लेने के लिए उपयुक्त लकड़ी की पहचान की।
प्राचीन काल में काष्ठ शय्या बनाने के लिए बहुत सावधानी बरती जाती थी। विशेषत: हारिद्र, देवदारु, शाल, चंदन, स्यंदन के काष्ठ का प्रयोग शय्या निर्माण में किया जाता था तथा काष्ठ की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान रखा जाता था।
वृहत संहिता ग्रंथ कहता है कि शय्या के लिए काष्ठ चुनाव करते समय विशेष ध्यान रखा जाता था कि वह किसी ऐसे वृक्ष से न लिया गया हो जो वज्रपात से गिर गया हो, या बाढ़ के धक्के से उखड़ गया हो, या गजों प्रकोप से धूलिलुण्ठित हो गया हो, या वह ऐसी अवश्था में काटा गया था जब वह फ़ूल एवं फ़ल से लदा हो, या पक्षियों के कलरव से मुखरित था, या चैत्य या श्मशान से लाया गया था या सूखी लता से लिपटा हुआ था। उपरोक्त प्रकार के काष्ठ को अमंलकारी माना जाता था तथा इसे गृह के सुकुमार कक्ष में नहीं रखा जाता था।
![]() |
| कोणार्क के सूर्य मंदिर की भित्ति में शय्या एवं मच्छरदानी अंकन |
इससे आगे बढकर वराह मिहिर कहते हैं कि राज्य का सुख गृह है, गृह का सुख शयन कक्ष (कलत्र) एवं शयन कक्ष का सुख सुकोमल मंगलजनक शय्या है, इसलिए शय्या को गृह का मर्म स्थल माना गया है। चंदन काष्ठ की शय्या सर्वोत्तम मानी गई है।
मिश्रित काष्ठ से शय्या निर्माण के प्रति भी विशेष सावधानी बरती गई है। तिंदुक, शिंशपा, देवदारु एवं असन के काष्ठ अन्य वृक्षों के काष्ठ के साथ नहीं मिलाए जाते थे। शाल एवं शालक शुभ माने गए परन्तु चार से अधिक काष्ठों का मिश्रण सही नहीं माना गया।
शय्या में गजदंत लगाना शुभ माना जाता था, गजदंत का पत्र काटना बड़ा सावधानी का कार्य माना जाता था। गजदंत पत्र को काटते समय भिन्न भिन्न चिन्हों से मंगल एवं अमंगल काअनुमान किया जाता था। खाट के पायों में छेद या गाँठ बहुत अशुभ समझे जाते थे।
गरुड़ पुराण में पुरोहित को दान करने के लिए खाट का सुंदर वर्णन किया गया है, उसमें दान के लिए शीशम की सोने चांदी की झालर से अलंकृत एवं कोमल रेशम के तंतुओं से बुनी हुई खाट ही उपयुक्त मानी गई है। इस प्रकार एक सुख एवं मंगलकारी खाट का निर्माण कठिन समस्या ही हुआ करती थी।
कोणार्क के सुर्य मंदिर की एक प्रतिमा में जोड़े को सुंदर खाट पर मिथुनरत दिखाया गया है। इस खाट की पाटियां सुंदर पत्रावलियो एवं बेलबूटों से अलंकृत है तथा मच्छरदानी (कीट रक्षिका) का प्रयोग भी दिखाई देता है। शिल्पकार ने अपने शिल्प में दिखाया है कि तत्कालीन समय में लोग मच्छरदानी का प्रयोग करते थे। मच्छरदानी भी सुंदर सूत्र के गुच्छों से अलंकृत दिखाई देती है तथा उसके उपर दो चूहे भी घूमते दिखाई दे रहे हैं। यह शिल्पांकन का सबसे सुंदर पक्ष है।
![]() |
| गंडई छत्तीसगढ़ के प्राचीन मंदिर में शय्यारत स्त्री का शिल्पांकन। |
वृहत संहिता से यह भी पता चलता था कि सभी व्यक्तियों के लिए एक जैसी खाट या शय्या का निर्माण नहीं होता था। भिन्न भिन्न पद एवं मर्यादा के व्यक्तियों के लिए भिन्न भिन्न नाप की खाट बनती थी तथा शय्या के कुर्च थान (सिरहाने) पर व्यक्ति के इष्ट देव की कलात्मक प्रतिमा रखने का भी चलन था तथा खाट को पुष्पों से अलंकृत भी किया जाता था।
वर्तमान में इस ज्ञान का लोप हो गया। अब इस प्रकार के काष्ठ ही नहीं बचे कि शास्त्रों में निर्धारित किए गए मानों के आधार पर खाट का निर्माण हो।
मल्हार की मौर्यकालीन अद्भुत विष्णु प्रतिमा
मल्हार नगर छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में अक्षांक्ष 21 90 उत्तर तथा देशांतर 82 20 पूर्व में 32 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। बिलासपुर से रायगढ़ जाने वाली सड़क पर 18 किलोमीटर दूर मस्तूरी है।
वहां से मल्हार, 14 कि. मी. दूर है। मस्तुरी पहुंचने पर मल्हार जाने वाले मार्ग पर एक बड़ा द्वार बना हुआ है और यहीं से तारकोल की इकहरी सड़क मल्हार की ओर जाती है।
पुरातात्विक दृष्टि से मल्हार महत्वपूर्ण स्थान है। यहाँ कई एकड़ में फ़ैला हुआ मृदा भित्ति दुर्ग भी है। मल्हार के मृदा भित्ती दुर्ग (मड फ़ोर्ट) सर्वप्रथम जिक्र जे. डी. बेगलर ने 1873-74 के अपने भ्रमण के दौरान किया। परन्तु उन्होने इस मड फ़ोर्ट में विशेष रुचि नहीं दिखाई। उन्होने इस शहर में मंदिरों के 2 खंडहरों का जिक्र किया।
के. डी. बाजपेयी मानते हैं कि पुराणों में वर्णित मल्लासुर दानव का संहार शिव ने किया था। इसके कारण उनका नाम मलारि, मल्लाल प्रचलित हुआ।
यह नगर वर्तमान में मल्हार कहलाता है। मल्हार से प्राप्त कलचुरीकालीन 1164 ईं के शिलालेख में इन नगर को मल्लाल पत्त्न कहा गया है। इस तरह यह छत्तीसगढ़ का प्रमुख पुरातात्विक स्थल है।
एक अद्भुत प्रतिमा यहाँ के संग्रहालय में है। जिसे अध्येता विष्णु की प्रतिमा बताते हैं। जिसके एक हाथ से सीधी तलवार दबाई हुई है, शीष पर टोपी और कानों में कुंडल के शीश के बगल में चक्र दिखाई देता है।
पोषाक बख्तरबंद जैसी है तथा पैरों में लम्बे जूते (गम बूट) हैं। इस प्रतिमा के नाम निर्धारण पर गत संगोष्ठी में विवाद की स्थिति उत्पन्न थी, कुछ इसे विष्णु प्रतिमा मानते हैं, कुछ नहीं।
वैसे यह प्रतिमा किसी युनानी योद्धा जैसे दिखाई देती है। यह खोज एवं अध्ययन का विषय भी है। अगर किसी ने ऐसी प्रतिमा कहीँ और देखी हो तो बताईए।
![]() |
| मल्हार की मौर्यकालीन अद्भुत विष्णु प्रतिमा |
पुरातात्विक दृष्टि से मल्हार महत्वपूर्ण स्थान है। यहाँ कई एकड़ में फ़ैला हुआ मृदा भित्ति दुर्ग भी है। मल्हार के मृदा भित्ती दुर्ग (मड फ़ोर्ट) सर्वप्रथम जिक्र जे. डी. बेगलर ने 1873-74 के अपने भ्रमण के दौरान किया। परन्तु उन्होने इस मड फ़ोर्ट में विशेष रुचि नहीं दिखाई। उन्होने इस शहर में मंदिरों के 2 खंडहरों का जिक्र किया।
के. डी. बाजपेयी मानते हैं कि पुराणों में वर्णित मल्लासुर दानव का संहार शिव ने किया था। इसके कारण उनका नाम मलारि, मल्लाल प्रचलित हुआ।
यह नगर वर्तमान में मल्हार कहलाता है। मल्हार से प्राप्त कलचुरीकालीन 1164 ईं के शिलालेख में इन नगर को मल्लाल पत्त्न कहा गया है। इस तरह यह छत्तीसगढ़ का प्रमुख पुरातात्विक स्थल है।
एक अद्भुत प्रतिमा यहाँ के संग्रहालय में है। जिसे अध्येता विष्णु की प्रतिमा बताते हैं। जिसके एक हाथ से सीधी तलवार दबाई हुई है, शीष पर टोपी और कानों में कुंडल के शीश के बगल में चक्र दिखाई देता है।
पोषाक बख्तरबंद जैसी है तथा पैरों में लम्बे जूते (गम बूट) हैं। इस प्रतिमा के नाम निर्धारण पर गत संगोष्ठी में विवाद की स्थिति उत्पन्न थी, कुछ इसे विष्णु प्रतिमा मानते हैं, कुछ नहीं।
वैसे यह प्रतिमा किसी युनानी योद्धा जैसे दिखाई देती है। यह खोज एवं अध्ययन का विषय भी है। अगर किसी ने ऐसी प्रतिमा कहीँ और देखी हो तो बताईए।
प्राचीन विश्व में सूर्यपूजा
ओ3म् सूर्यो ज्योतिर्ज्योति: सूर्य: स्वाहा। मानव ने धरती पर जन्म लेकर सबसे पहले नभ में चमकते हुए गोले सूर्य को देखा। धीरे-धीरे उसने सूर्य के महत्व समझा और उसका उपासक हो गया। सूर्य ही ब्रह्माण्ड की धुरी है। जिसने अपने आकर्षण में सभी ग्रहों एवं उपग्रहों को बांध रखा है। इसका व्यवहार किसी परिवार के मुखिया की तरह ही है जो सभी परिजनों को स्नेह का समान वितरण करता है। प्राचीन पुरातात्विक अवशेषों एवं अभिलेखों से ज्ञात होता है कि धरती की सभी सभ्यताओं में सूर्य की उपासना प्रमुखता से होती थी। यूनान, मिश्र की सभ्यताओं से लेकर सिंधू घाटी की सभ्यता तक सूर्य प्रथम पूज्य हैं। राजाओं ने अपने कुल को अमरता प्रदान करने के लिए सूर्य के साथ जोड़ा और सूर्यवंशी कहलाए तथा विश्व की अनेको सभ्यताओं में भिन्न-भिन्न नामों से जाने वाले सूर्य की प्रतिमाओं का निर्माण हुआ। सूर्य मानव सभ्यता के लिए उर्जा का प्रथम स्रोत है, जब धरती अंधकार में डूब जाती है, तब सूर्य ही धरती पर आकर उजाला फ़ैलाता है, प्रकाश करता है।
वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। समस्त चराचर जगत की आत्मा सूर्य ही है। सूर्य से ही इस पृथ्वी पर जीवन है, यह आज एक सर्वमान्य सत्य है। वैदिक काल में आर्य सूर्य को ही सारे जगत का कर्ता धर्ता मानते थे। सूर्य का शब्दार्थ है सर्व प्रेरक.यह सर्व प्रकाशक, सर्व प्रवर्तक होने से सर्व कल्याणकारी है। ऋग्वेद के देवताओं कें सूर्य का महत्वपूर्ण स्थान है। यजुर्वेद ने "चक्षो सूर्यो जायत" कह कर सूर्य को भगवान का नेत्र माना है। छान्दोग्यपनिषद में सूर्य को प्रणव निरूपित कर उनकी ध्यान साधना से पुत्र प्राप्ति का लाभ बताया गया है। ब्रह्मवैर्वत पुराण तो सूर्य को परमात्मा स्वरूप मानता है। प्रसिद्ध गायत्री मंत्र सूर्य परक ही है। सूर्योपनिषद में सूर्य को ही संपूर्ण जगत की उतपत्ति का एक मात्र कारण निरूपित किया गया है। और उन्ही को संपूर्ण जगत की आत्मा तथा ब्रह्म बताया गया है।
सूर्योपनिषद की श्रुति के अनुसार संपूर्ण जगत की सृष्टि तथा उसका पालन सूर्य ही करते है। सूर्य ही संपूर्ण जगत की अंतरात्मा हैं। अत: कोई आश्चर्य नही कि वैदिक काल से ही भारत में सूर्योपासना का प्रचलन रहा है। पहले यह सूर्योपासना मंत्रों से होती थी। बाद में मूर्ति पूजा का प्रचलन हुआ तो यत्र तत्र सूर्य मन्दिरों का नैर्माण हुआ। भविष्य पुराण में ब्रह्मा विष्णु के मध्य एक संवाद में सूर्य पूजा एवं मन्दिर निर्माण का महत्व समझाया गया है। अनेक पुराणों में यह आख्यान भी मिलता है, कि ऋषि दुर्वासा के शाप से कुष्ठ रोग ग्रस्त श्री कृष्ण पुत्र साम्ब ने सूर्य की आराधना कर इस भयंकर रोग से मुक्ति पायी थी। प्राचीन काल में भगवान सूर्य के अनेक मन्दिर भारत में बने हुए थे। उनमे आज तो कुछ विश्व प्रसिद्ध हैं। वैदिक साहित्य में ही नही आयुर्वेद, ज्योतिष, हस्तरेखा शास्त्रों में सूर्य का महत्व प्रतिपादित किया गया है।
भगवान भास्कर की पूजा सिर्फ अपने देश में नहीं, बल्कि दुनिया के कई मुल्कों में अलग-अलग नाम, मान्यता और अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार होती है। प्राचीन इतिहास को खंगालें, तो हिंदू बौद्ध धर्म के अलावा यूनान, मिस्र, एजटेक (सेंट्रल मैक्सिको), चीन, तुर्की और इंका (दक्षिण अमेरिका) सभ्यता में भी सूर्य की पूजा होती थी। वर्तमान में पेरू, उरुग्वे, अर्जेंटीना, जापान आदि देश सूर्य को अपना राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में उपयोग करते हैं। वेद की ॠचाओं में ओ3म् सूर्यो ज्योतिर्ज्योति: सूर्य: स्वाहा कह कर सूर्य की आराधना की गई है। मित्र, मिहिर, सविता आदि शब्द सूर्य के पर्याय हैं। भारत के अलावा जापान, रुस, कोरिया, इंग्लैंड मैक्सिको में भी सूर्य मंदिर हैं। भारत में कोणार्क उड़ीसा, मार्तण्ड काश्मीर, झालरापाटण राजस्थान , रनकपुर राजस्थान , ओसियो राजस्थान , मोधेरा गुजरात इत्यादि अनेक स्थानों पर प्राचीन सूर्य मंदिर प्राप्त होते हैं।
पूर्वांचल के साथ अन्य प्रदेशों में सूर्य देवता की उपासना के लिए छठ पर्व मनाया जाता है। यह प्राचीन काल से चली आ रही सूर्योपासना की परम्परा ही है जो मानव को सूर्य के साथ संबद्ध करती है तथा सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का पर्व भी माना जा सकता है। छठ पर्व के दिन सभी को सूर्य आराधकों को ढेर सारी शुभकामनाएं।
बारसूर (बस्तर) की विनायकी प्रतिमा
बाणासुर की नगरी बारसुर (बस्तर छत्तीसगढ़) के संग्रहालय में गणेश की कई प्रतिमाएं रखी हुई हैं, इनकी फ़ोटो लेते वक्त मुझे स्त्री रुप में गणेश जी की प्रतिमा दिखाई दी। यहाँ गणेश की लगभग 20-25 प्रतिमाएँ होगीं तथा सबसे बड़ी गणेश प्रतिमा भी यहीं पाई जाती है। स्त्री गणेश प्रतिमा को देख कर जिज्ञासा हुई तो थोड़ी खोजबीन की गई। हम जानते हैं कि सनातन धर्म में भगवती ही मूल आदि शक्ति के नाम से विख्यात हैं। अलग अलग शक्तियों को स्त्री रूप में पूजा जाता है जैसे विद्या की देवी मां सरस्वती, धन की देवी महालक्ष्मी और समस्त शक्तियों की स्वामी देवी दुर्गा। महादेव को अर्धनारीश्वररूप में पूजा जाता है, तो श्री हरि ने भी जग की भलाई के लिए मोहिनी रूप धारण किया था।
भगवान गणेश के अनेकों नामों में से उनका एक नाम विनायकी भी है अर्थात गणेश-लक्षणों युक्त स्त्री। धर्म शास्त्रों में गणपति को स्त्री रूप में पूजते हुए उन्हें विनायकी, गजानना, विद्येश्वरी और गणेशिनी भी कहा गया है। ये सभी नाम गणेश जी के संबंधित नामों के स्त्रीलिंग रूप हैं। उनकी हाथी जैसी विशेषताओं के कारण, उन्हें आम तौर पर बुद्धि की हाथी जैसी सिर वाले भगवान- गणेश से संबंधित माना गया है, उनका कोई स्थिर नाम नहीं है और उन्हें विभिन्न नामों से जाना जाता है – जैसे गणेशी, विनायकी, गजानना, विघ्नेश्वरी और गणेशणी, ये सभी नाम गणेश के संबंधित नामों के स्त्रीलिंग रूप हैं । इन अभिचिह्नों से उन्हें शक्ति का रूप माना गया है यानी – गणेश का स्त्री रूप या उनसे मिलता-जुलता रूप ।
विनायकी को कभी-कभी चौसठ योगिनियों में से एक भी माना जाता है । बहरहाल, विद्वान कृष्णन का विचार है कि हाथी के सिर वाली देवी विनायकी, गणेश की ब्राह्मणी शक्ति है और तांत्रिक योगिनी तीन विशिष्ट देवियाँ हैं । एक स्वतंत्र देवी के रूप में, हाथीमुख देवी को जैन और बौद्ध परंपराओं में भी देखा जा सकता है । बौद्ध ग्रंथों में उन्हें गणपतिह्रदया कहा गया है । सबसे पहले ज्ञात हाथीमुख देवी की प्रतिमा रैढ़, राजस्थान में पाई गई । यह एक विकृत टैराकोटा फलक था जो पहली सदी बीसीई से लेकर पहली सदी सीई से संबंधित है । इस हाथीमुखी देवी की सूंड दाईं ओर मुड़ी है और उनके दो हाथ हैं । चूँकि उनके हाथों में प्रतीक और अन्य विशेषताएँ विकृत रूप में हैं, उन्हें देवी के रूप में अभिचिह्नित करना संभव नहीं है ।
हाथीमुखी देवी की अन्य मूर्तियाँ दसवीं सदी के बाद से पाई गईं हैं । विनायकी की एक सबसे प्रसिद्ध मूर्ति चौसठ योगिनी मंदिर, भेड़ाघाट, मध्य प्रदेश में इकतालिसवीं योगिनी के रूप में है । यहाँ इस देवी को श्री-ऐंगिनी कहा जाता है । यहाँ इस देवी के झुके हुए बाएँ पैर को एक हाथीमुखी पुरुष, संभवत: श्री गणेश ने सहारा दिया हुआ है । विनायकी की एक दुर्लभ धातु मूर्ति चित्रपूर मठ , शिराली में मिली है । वे गणेश की तरह नहीं, बल्कि इकहरी हैं । उन्होंने अपनी छाती पर यग्नोपवीत और गले में दो आभूषण पहना है । उनके हाथों में अभया और वरदा की मुद्राएँ बनी हैं । उनके दो कंधों पर तलवार और फंदा बना हुआ है । उनकी सूंड बाईं ओर मुड़ी हुई है । यह प्रतिमा संभवत: उत्तरी-पश्चिमी भारत (गुजरात / राजस्थान) से 10वीं सदी की लगती है और तांत्रिक गणपत्य धारा (जो गणेश को सर्वोच्च भगवान मानते हैं) या वामाचार देवी की पूजा करने वाले शाक्त धारा से संबंधित लगती है ।
बिहार की पाला विनायकी भी तोंदयुक्त नहीं हैं । यह चार हाथों वाली देवी गदा, घटा, परशु और संभवत: मूली लिए हुए है । प्रतिहारा चित्र में तोंदयुक्त विनायकी को दर्शाया गया है जिसमें उनके चार हाथों में गदा-परशु, कमल, एक पहचान-रहित वस्तु और मोदकों की थाली है जिन्हें उनका सूंड उठा रहा है । दोनों चित्रों में, सूंड दाईं ओर मुड़ा हुआ है । क्षतिग्रस्त चार हाथों या दो हाथों की विनायकी की प्रतिमाएँ रानीपूर झारियल (ओड़ीसा), गुजरात और राजस्थान में भी पाईं गई हैं । सतना में प्राप्त एक दूसरी प्रतिमा में विनायकी पाँच पशुरूपी देवियों में एक हैं । बीच में गौमुखी योगिनी, वृषभा अपने हाथों में बाल गणेश लिए हुए है । विनायकी जिनकी प्रतिमा छोटी है, तोंद लिए हुए है और गणेश की तरह हाथ में अंकुश लिए हुए है । श्री बालसुब्रमण्या स्वामी मंदिर, चेरियनाड, अलापुझा, केरल में भी विनायकी की प्रतिमा मिलती है।
गणेश जी के जन्म से संबंधित एक कहानी में, हाथीमुखी असुर मालिनी, पार्वती जो गणेश की माँ हैं, के स्नान का पानी पीने के बाद गणेश को जन्म देती है । स्कंद पुराण में, धन-संपत्ति की देवी लक्ष्मी को शाप दिया जाता है कि उनका सिर हाथी के जैसे हो जाए, जिससे वह प्रायश्चित करते हुए भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न कर छुटकारा पाती हैं । इन्हें विनायकी नहीं कहा गया है और माँ (मालिनी) या उसके समरूप (कुछ प्रतिमाओं में लक्ष्मी) के रूप में गणेश से बहुत कम संबद्ध किया गया । हरिवंश, वायु पुराण और स्कंद पुराण में भी हाथी मुखी मात्रिका, ग्रह और गणों का वर्णन किया गया है जिनके गजानन, गजमुखी और गजस्य जैसे नाम हैं । इसके बावजूद, कृशन ने इन मात्रिकाओं को ज्येष्ठा, दुर्भाग्य की देवी जिन्हें हाथीमुखी बताया गया है, से जोड़ा है ।
मत्स्य पुराण में वे एक मात्रिका हैं जिन्हें गणेश जी के पिता भगवान शिव ने राक्षसी अंधका को पराजित करने के लिए सृजित किया था । इस प्रसंग में, उन्हें गणेशजी के बजाय, शिव की शक्ति के रूप में देखा जा सकता है । केवल उनका नाम "विनायकी" जिसका अर्थ "विनायक/गणेश से संबंधित" है, उनसे संबंधित होने का संकेत करता है । लिंग पुराण में भी, शक्तियों की सूची में उनका नाम है । अग्नि पुराण पहला पुराण है जिसमें गणेश की शक्तियों को सूचीबद्ध किया गया है, तथापि, विनायकी उनमें नहीं है, न ही उनमें से कोई गजमुखी है, लेकिन, इसी पुराण में चौसठ योगिनियों की सूची में विनायकी अवश्य हैं ।
बहरहाल, उप-पुराण देवी पुराण में गणेश की शक्ति के रूप में गणनायिका या विनायकी का स्पष्ट उल्लेख मिलता है जिसमें उनके हाथीनुमा सिर और गणेश की तरह विघ्नों को दूर करने की क्षमता बताई गई है और उन्हें नौवीं मात्रिका के रूप में शामिल किया गया है । हांलाकि मूर्तियों और साहित्य में मात्रिकाओं की संख्या सात दर्शाई गई है, फिर भी पूर्वी भारत में नौ मात्रिकाएँ अधिक लोकप्रिय हैं । शास्त्रीय सात मात्रिकाओं के अलावा, आठवीं और नौंवी मात्रिका के रूप में क्रमश: महालक्ष्मी या योगेश्वरी और गणेशणी या गणेशा को शामिल किया गया है ।
मध्यकालीन नाटक गोरक्षसंहिता में विनायकी को गजमुखी, तोंदयुक्त, तीन आँखों और चार भुजाओं वाली देवी बताया गया है जिनके हाथ में परशु और मोडकों की थाली है । श्रीकुमार की सोलहवीं सदी की मूर्तिभंजक शोध प्रबंध पुस्तक शिल्परत्न में गणेश (गणपति) के स्त्री रूप का वर्णन है जिन्हें शक्ति-गणपति कहा गया गया है जो विंध्य में रहती थीं । इस देवी का सिर हाथी के जैसे था और उनके दो सूंड थे । उनका शरीर युवती का था, रंग सिंदूरी लाल था और दस भुजाएँ थीं । उनकी छोटी तोंद थी, स्तन विस्तारित थे और सुंदर श्रोणियाँ थीं । यह प्रतिमा संभवत: हिन्दू देवी की पूजा करने वाली धारा, शक्तिवाद से संबंधित थी । बहरहाल, दो सूंडों के कारण इस रूप को भी गणेश और उनकी शक्ति का संयोजन माना गया ।
बौद्ध साहित्य जिसे आर्यमंजुश्रीमुलकल्प कहा जाता है, में इस देवी को विनायक की सिद्धि कहा गया है । उनमें गणेश के कई अंतर्निहित अभिलक्षण हैं । गणेश की तरह, वे विघ्नों की दूर करती हैं, उनका सिर भी हाथी के जैसा है और एकदंत है । उन्हें भगवान शिव का एक रूप, भगवान ईशान की बेटी भी कहा गया है ।
प्राचीन मंदिरों के वास्तु शिल्प में नागांकन
सर्प एवं मनुष्य का संबंध सृष्टि के प्रारंभ से ही रहा है। यह संबंध इतना प्रगाढ एवं प्राचीन है कि धरती को शेषनाग के फ़न पर टिका हुआ बताया गया है। इससे जाहिर होता है कि धरती पर मनुष्य से पहले नागों का उद्भव हुआ। वैसे भी नाग को काल का प्रतीक माना जाता है। जो शिव के गले में हमेशा विराजमान रहता है। कहा गया है - काल गहे कर केश। इसके पीछे मान्यता है कि काल धरती के जीवों का कभी पीछा नहीं छोड़ता और हमेशा उसके गले में बंधा रहता है। इस मृत्यू के प्रतीक को मनुष्य ने हमेशा अपने समक्ष ही रखा और मानव जीवन में भी महत्वपूर्ण स्थान दिया।
![]() |
| राजा रानी मंदिर के द्वार पर स्थापित नागप्रहरी - भुवनेश्वर उड़ीसा |
शासकों के कुल भी नागों से चले, नागवंशी, छिंदक नागवंशी, फ़णीनागवंशी इत्यादि राजकुलों की जानकारी हमें मिलती है। इसके साथ ही हमें मंदिरों के द्वार शाखा एवं भित्तियों पर अधिकतर नाग-नागिन का अंकन मिलता है। वासुकि नाग एवं पद्मा नागिन का पाताल लोक के राजा-रानी के रुप में वर्णन मिलता है। नागों को एक दूसरे से गुंथित या नाग-वल्लरी के रुप में दिखाया जाता जाता है भारतीय शिल्पकला में इन्हें देवों के रुप में प्रधानता से स्थान दिया जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि मंदिर के प्रवेश के समय इनके दर्शन करना शुभ एवं सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
![]() |
| राजीवलोचन मंदिर राजिम छत्तीसगढ़ के मंडप स्तंभ पर अंकित नागपाश |
प्रागैतिहासिक शैलचित्र कला में नाग का चित्रण, मोहनजोदड़ो, हड़प्पा से प्राप्त मुद्राओं पर नागों का अंकन हुआ है, जो नागपूजा का प्राचीनतम प्रमाण माना जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि मानव प्राचीन काल से नागपूजा कर रहा है। नाग का भारतीय धर्म एवं कला से घनिष्ठ संबंध रहा है। कहा जाए तो नागपूजा हड़प्पा काल से लेकर वर्तमान काल तक चली आ रही है। इसके पुरातात्विक एवं साहित्य प्रमाण प्रचुरता में मिलते हैं। मंदिरों की द्वार शाखाओं पर नागाकृतियों का उत्कीर्ण किया जाना, विष्णु की शैय्या के रुप में, शिव के गले में, बलराम एवं लक्ष्मण को शेषावतार के रुप में प्रदर्शित किया जाना।
![]() |
| राजीवलोचन मंदिर राजिम छत्तीसगढ़ के मंडप के द्वार शीर्ष पर शेष शैया |
![]() |
| छत्तीसगढ़ के प्राचीन नगर सिरपुर से उत्खनन में प्राप्त जैन तीर्थांकर पार्श्वनाथ की प्रतिमा |
पूर्व मध्यकाल एवं उत्तरमध्यकाल से लेकर आज तक लगभग प्रत्येक ग्राम में नागदेवताओं की किसी न किसी रुप में पूजा की जाती है। इसकी प्रतिमाएं आज भी गांवों में मिलती है तथा नागपंचमी का त्यौहार तो वर्ष में एक बार मनाया ही जाता है। इस विषधर जीव की जितने मुंह उतनी कहानियां मिलती हैं। शायद मनुष्य ने भयभीत होकर इस काल के प्रतीक की पूजा प्रारंभ की होगी और कई परिवारों में इसे कुलदेवता के रुप में मान्यता मिली हुई है, मनुष्य आज तक इसके महत्व एवं उपस्थिति के साथ बल को नकार नहीं सका है।
पुरातत्व शास्त्र की वर्णमाला :मृदा भाण्ड
सभ्यता के विकास के साथ मानव चरणबद्ध रुप से दैनिक कार्य में उपयोग में आनी वाली वस्तुओं का निर्माण करता रहा है। इनमें भाण्ड प्रमुख स्थान रखते हैं। जिन्हें वर्तमान में बरतन कहा जाने लगा है। प्राचीन काल में मानव मिट्टी के बरतनों का उपयोग करता था। किसी भी प्राचीन स्थल से उत्खनन के दौरान लगभग सभी चरणों से मिट्टी के बर्तन प्राप्त होते हैं तथा उत्खनन स्थल पर एक बहुत बड़ा यार्ड इनसे बन जाता है। इस यार्ड में इन्हें वैज्ञानिक अन्वेषण के लिए क्रमानुसार रखा जाता है। छत्तीसगढ़ के डमरु में उत्खनन में अन्य पॉटरी के साथ कृष्ण लोहित मृदा भांड भी प्राप्त हुए। इन्हें देखकर मुझे ताज्जुब हुआ कि एक ही बरतन एक तरफ़ काला और एक तरफ़ लाल दिखाई दे रहा है। वैसे तो इन बरतन को रंग कर यह रुप दिया जा सकता था, परन्तु इन बरतनों को लाल और काला रंग पकाने के दौरान ही दिया गया था।
![]() |
| मृदाभाण्ड बनाने की तकनीक का निरीक्षण करते हुए लेखक |
कुम्हारों के द्वारा वर्तमान में किस तरह के बरतन बनाए एवं पकाए जा रहे हैं यह देखने के लिए हम समीप के गाँव में कुम्हार के भट्टे पर निरीक्षण करने के लिए गए। वहाँ कुम्हार से चर्चा की और उसके भाण्डों को भी देखा। इन भाण्डों में उत्खनन में प्राप्त भाण्डों जैसी स्निग्धता, चमक एवं मजबूती नहीं थी इससे साबित हुआ कि प्राचीन काल में भाण्ड निर्माण की प्रक्रिया वर्तमान से उन्नत थी और निर्माता भी समाज में उच्च स्थान रखता था। तभी तो सिरपुर स्थित तीवरदेव विहार के मुख्यद्वार की शाखा में शिल्पकार ने चाक सहित कुम्हार को स्थान दिया है। यह उनके सामाजिक मह्त्व को बताता है।
![]() |
| मृदा भाण्ड पकाने की वर्तमान तकनीकि |
पिछली शताब्दी में प्राचीन स्थलों का अन्वेषण एवं उत्खनन का लक्ष्य मात्र मुल्यवान एवं कलात्मक सामग्री की खोज करना था। मृदा भांडों एवं उनके टुकड़ों की गणना व्यर्थ समझी जाती थी। प्राय: उत्खननकर्ता इन्हें फ़ेंक देते थे अथवा इतना अनुमान लगाते थे कि उस समय की सभ्यता में लोग किन-किन बर्तनों का उपयोग करते थे, इनसे उस युग का आर्थिक जीवन जोड़ते थे, परन्तु उत्खनन की दृष्टि से इनका कोई महत्व नहीं माना जाता था।
| उत्खनन में पाप्त मृदाभाण्ड के टुकड़े - डमरु जिला बलौदाबाजार छत्तीसगढ़ |
सर्वप्रथम फ़्लिंडर्स पेट्री ने मिश्र में उत्खनन कार्य करते हुए अनुभव किया कि प्रत्येक काल में विभिन्न प्रकार के कौशल से निर्मित मृदाभांडों का प्रचलन रहता है और परम्परानुराग के कारण शीघ्र ही आमूल परिवर्तन नहीं होता। चर्म एवं काष्ठ की सामग्रियाँ जहां मिट्टी में दबे होने के कारण नष्ट हो जाती हैं, वहीं भांड हजारों वर्षों तक मिट्टी में दबे होने के बाद भी नष्ट नहीं होते। अत: पुरातत्व के अध्ययन में इनका महत्वपूर्ण उपयोग हो सकता है। पेट्री की इस दृष्टि ने पुरातन सभ्यताओं के अध्ययन में क्रांति ला दी। तब से मृदा पात्रों एवं भाण्डों का अध्ययन पुरातत्व शास्त्र का एक आवश्यक अंग माना जाने लगा।
![]() |
| कुम्हार के आवे पर- डॉ शिवाकांत बाजपेयी, डॉ जितेन्द्र साहू एवं करुणा शंकर शुक्ला |
आज मृदाभाण्डों को पुरातत्व शास्त्र की वर्णमाला कहा जाता है। जिस प्रकार किसी वर्णमाला के आधार पर ही उसका साहित्य पढा जाता है, उसी प्रकार मृदा भाण्ड अपने काल की सभ्यता सामने लाते हैं। इनके निर्माण की एक विशिष्ट शैली का प्रचलन एक काल का द्योतक होता है। उनको एक विशिष्ट शैली में निर्मित एवं रंगों में वेष्टित करते हैं। जैसे कभी अंगुठे के प्रयोग से बर्तन बने तो कभी मिट्टी की बत्तियों से बनाए गए तो कभी चाक से बनाए गए। यह विकास अलग-अलग काल को दर्शाता है तथा बरतनों के आवश्यकतानुसार नवीन प्रकार भी दिखाई देते हैं।
![]() |
| पॉटरी यार्ड - तरीघाट उत्खनन जिला दुर्ग छत्तीसगढ़ |
रंगों के संबंध में हम देखते हैं कि भारत में कभी कृष्ण लोहित मृदा भांड बने तो कभी चित्रित धूसर बने, तो कभी कृष्णमार्जित एवं कृष्णरंजित लोहित मृदाभांड बने। ये सारे न तो एक समय में बने है और न एक ही लोगों द्वारा बनाए गए हैं। अलग-अलग कालों में, भिन्न-भिन्न लोगों द्वारा पृथक रंगों के मृदा भाण्डों का विकास हुआ। इससे स्तरीकरण एवं इन मृदा भाण्डों के साथ प्राप्त सामग्रियों से कालनिर्धारण में सहायता मिलती है। अन्य सामग्रियों एवं अभिलेखों की अनुपलब्धता में उत्खननकर्ता मृदाभाण्डों का अध्ययन कर काल का निर्धारण कर सकता है। इसलिए मृदाभाण्ड काल निर्धारण के लिए मह्त्वपूर्ण रुप से सहायक होते हैं। मृदा भाण्डों का महत्व मानव सभ्यता के साथ सतत बना हुआ है और बना भी रहेगा।
इतिहास की खोई हुई कुंजी है शंख लिपि
विचारों को व्यक्त करने का माध्यम वाणी है, यह वाणी विभिन्न भाषाओं के माध्यम से संसार में प्रकट होती है। इन भाषाओं को दीर्घावधि तक स्थाई रुप से सुरक्षित रखने एवं एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने का कार्य लिपि करती है। कहा जाए तो भाषा को जीवंत रखने के लिए हम जिन प्रतीक चिन्हों का प्रयोग करते हैं, उन्हे लिपि कहते हैं। हम गुहा चित्रों, भग्नावशेषों, समाधियो, मंदिरो, मृदाभांडों, मुद्राओं के साथ शिलालेखो, चट्टान लेखों, ताम्रलेखों, भित्ति चित्रों, ताड़पत्रों, भोजपत्रों, कागजो एवं कपड़ों पर अंकित मनुष्य की सतत भाषाई एवं लिपिय प्रगति देख सकते हैं। इन सबको तत्कालीन मानव जीवन का साक्षात इतिहास कहा जा सकता है।
![]() |
| उदयगिरि मध्यप्रदेश |
सभ्यता और संस्कृति के विकास के साथ साथ भाषा एवं लेखनकला का विकास भी होता रहा। प्रारंभ में लिखने के साधन गुफाओं की दीवारें, र्इंट, पत्थर, मृद्पात्र एवं शिलापट्ट आदि थे। देश, काल एवं परिस्थिति अनुसार ये साधन बदलते गये और लिपि एवं भाषा परिस्कृत होती गई।विचारों की अभिव्यक्ति के लिए भाषा एवं लिपि प्रथम साधन है। लिपि के अभाव में अनेक भाषाएँ उत्पन्न होकर नष्ट हो गई । आज उनका नामो निशान तक नहीं रहा। लिपियाँ भी समाप्त हो गई, वे भी इससे अछूती नहीं रही। ललितविस्तर आदि प्राचीन ग्रंथों में तत्कालीन प्रचलित लगभग चौंसठ लिपियों का नामोल्लेख मिलता है, लेकिन आज उसमें में अधिकांश लिपियाँ अथवा उनमें लिखित साहित्य उपलब्ध नहीं है।
![]() |
| शंख लिपि उदयगिरि |
कुछ प्राचीन लिपियाँ आज भी एक अनसुलझी पहेली बनी हुई हैं। उनमें लिखित अभिलेख आज तक नहीं पढ़े जा सके हैं। आज हम देखते हैं कि भारत में बहुधा प्राचीन स्थालों, पर्वतों एवं गुफाओं में टंकित ‘शंख लिपि’ के सुन्दर अभिलेख प्राप्त होते हैं इनको भी आज तक नहीं पढ़ा जा सका है। इस लिपि के अक्षरों की आकृति शंख के आकार की है। प्रत्येक अक्षर इस प्रकार लिखा गया है कि उससे शंखाकृति उभरकर सामने दिखाई पड़ती है। इसलिए इसे शंखलिपि कहा जाने लगा।
![]() |
| शंखलिपि सरगुजा सीता लेखनी पहाड़ |
जब भी मैं प्राचीन स्थलों पर शंख लिपि को देखता हूं तो मन जिज्ञासा से भर उठता है, कि प्राचीन काल का मनुष्य इस लेख के माध्यम से आने वाले पीढी को क्या सूचना एवं संदेश देना चाहता था। परन्तु लिपि की जानकारी की अभाव में यह रहस्य स्थाई हो गया है। विद्वान गवेषक इन लेखों को पढने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन अभी तक योग्य सफलता नहीं मिल सकी है। आज भी विविध सिक्कों, मृद्पात्रों एवं मुहरों पर लिखित ऐसी कई लिपियाँ और भाषाएँ हमारे संग्रहालयों में विद्यमान हैं जो एक अनसुलझी पहेली बनी हुई है। समय को प्रतीक्षा है इन पहेलियों के सुलझने की। जब इनमें कैद इतिहास बाहर निकल कर सामने आएगा और नई जानकारियाँ मिलेगी।
सोलह शृंगार: कल और आज
किसी भी सुंदर वस्तु या व्यक्ति के सौंदर्य में अभिवृद्धि के लिए श्रृंगार या अलंकरण का पक्ष महत्वपूर्ण होता है। इसके लिए विभिन्न अलंकरणों के प्रयोग करने को शृंगार करना कहते हैं। शृंगार करने के पश्चात साधारण वस्तु या मनुष्य के सौंदर्य में अत्यधिक वृद्धि हो जाती है और वह मनमोहक, नयनाभिराम लगता है। उत्खनन से पता चलता है कि प्रतिमाओं का निर्माण हड़प्पा काल से हो रहा है, परन्तु उस समय मृण्मूर्तियाँ बनती थी। यही मृण्मूर्तियाँ मौर्यकाल में भी मिलती हैं तथा अलंकरण भी। परन्तु गुप्तकाल से प्रस्तर प्रतिमाओं का सफ़र प्रारंभ होता है तथा आगे चलकर कलचुरी कालीन मंदिरों की प्रतिमाओं में अलंकरणों की भरमार मिलती है। शिल्पियों ने देवी देवताओं से लेकर यक्ष गंधर्व अप्सराओं की प्रतिमाओं को सुंदर आभूषणों से सजा कर उसके सौंदर्य में वृद्धि करने का विशेष प्रयास किया है। इससे कलचुरीकालीन प्रतिमाएं अपने अलंकरणों से पृथक ही पहचानी जाती हैं।
![]() |
| यक्षणी - सिरपुर |
स्त्री सौंदर्य वृद्धि के लिए सोलह शृंगार (षोडश शृंगार) का विधान बताया गया है। इन्हीं अलंकरणों से विधानपूर्वक शिल्पी प्रतिमाओं को अलंकृत करते थे। शास्त्र के विधान के अनुरुप प्रतिमाओं का निर्माण करने का मार्गदर्शन शिल्पशास्त्र करते हैं। वैसे प्राचीन संस्कृत साहित्य में षोडश शृंगार की गणना अज्ञात प्रतीत होती है। षोड़श शृंगार की गणना वल्लभ देव कृत सुभाषितावली में प्रथम बार आती है। वल्ल्भदेवानुसार 12 वीं सदी में सोलह शृंगार इस प्रकार हैं - आद्यौ मज्जनचीरहारतिलकं नेत्राञ्जनं कुंडले, नासामौक्तिककेशपाशरचना सत्कंचुकं नूपुरौ। सौगन्ध्य करकङ्कणं चरणयो रागो रणन्मेखला, ताम्बूलं करदर्पण चतुरता श्रृंगारका षोड़श॥ अर्थात मज्जन, चीर, हार, तिलक, अंजन, कुंडल, नासामुक्ता, केशविन्यास, चोली (कंचुक), नूपुर, अंगराग (सुगंध), कंकण, चरणराग (महावर), करधनी तांबुल तथा करदर्पण (आरसी नामक अंगुठी) का वर्णन है।
![]() |
| मुख दर्शना (तेवर) जबलपुर |
कालानुसार सोलह शृंगार के लिए भिन्न वस्तुओं का प्रयोग किया जाता था। सोलहवीं सदी में श्री रुप गोस्वामी ने उज्वलनीलमणी में सोलह शृंगार को इस प्रकार व्यक्त किया है - स्नातानासाग्रजान्मणिरसितपटा सूत्रिणी बद्धवेणि: सोत्त सा चर्चिताङ्गी कुसुमितचिकुरा स्त्रग्विणी पद्महस्ता। ताम्बूलास्योरुबिन्दुस्तबकितचिबुका कज्जलाक्षी सुचित्रा। राधालक्चोज्वलांघि: स्फ़ूरति तिलकिनी षोडशाकल्पिनीयम॥ अर्थात, स्नान, नासा मुक्ता, असित पट (कृष्ण-काला दुपट्टा), कटि सूत्र (करधनी) वेणीविन्यास, कर्णावतंस, अंगों को चर्चित करना, पुष्पमाल, हाथ में कमल, केश में फ़ूल खोंसना, तांबुल, शरीर पर पत्रावली, मकरीभंग आदि का चित्रण, अलक्तक, तिलक इत्यादि षोडश शृंगार माना गया।
![]() |
| परिचारिका द्वार शाखा पातालेश्वर मंदिर मल्हार |
इस दोनो सूचियों में भिन्नता स्पष्ट है। हिन्दी के प्रसिद्ध कवि जायसी ने षोडश शृंगार का वर्णन इस प्रकार किया है - मज्जन, स्नान, (जायसी ने मज्जन, स्नान को अलग रखा है) वस्त्र, पत्रावली, सिंदूर, तिलक, कुंडल, अंजन, अधरों को रंगना, तांबुल, कुसुमगंध, कपोलों पर तिल, हार, कंचुकी, छुद्रघंटिका और पायल। इससे स्पष्ट हो रहा है कि 17 वीं शताब्दी तक अधररंग (लिपिस्टिक) का प्रयोग नहीं किया जाता था। 18 वीं शताब्दी में लिपिस्टिक एवं गालों पर कृत्रिम तिल बनाना षोडश शृंगार में सम्मिलित हो गया।
![]() |
| परिचारिका द्वार शाखा पातालेश्वर मंदिर मल्हार |
इसी प्रकार रीतिकाव्य के आचार्य केशवदास ने सोलह शृंगार की गणना करते हुए कहा है - प्रथम सकल सुचि, मंजन अमल बास, जावक, सुदेस किस पास कौ सम्हारिबो। अंगराग, भूषन, विविध मुखबास-राग, कज्जल, ललित लोल लोचन निहारिबो॥ बोलन हँसन, मृदुचलन, चितौनि चारु, पल पल पतिब्रत प्रन प्रतिपालिबो। 'केसोदास' सो बिलास करहु कुँवरि राधे, इहि बिधि सोरहै, सिंगारन सिंगारिबो। अर्थात उबटन, स्नान, अमल पट्ट (श्वेत, उज्जवल वस्त्र - दुपट्टा), जाबक (आलता), वेणीगूँथना, माँग सिंदूर, ललाट शौर (ललाट की शोभा बढाने वाला- तिलक), कपोलों पर तिल, अंग में केसर लेपन, मेंहदी, पुष्पाभूषण, स्वर्णाभूषण, मुखवास, दंत मंजन, तांबुल और काजल स्पष्ट है। इस काल में षोडश शृंगार मे कुछ वस्तुएं जुड़ गई और कुछ कम हो गई। इससे पता चल रहा है कि केसर तक नागरिकों की पहुंच हो गई थी और वे इसका महत्व जान चुके थे।
![]() |
| करधन घारिणी परिचारिका सिरपुर |
हिंदी विश्वकोश में इन शृंगारों की गणना इस तरह है -उबटन, स्नान, वस्त्रधारण, केश प्रसाधन, काजल, सिंदूर से माँग भरना, महावर, तिलक, चिबुक (ठोढी) पर तिल, मेंहदी, सुगंध लगाना, आभूषण, पुष्पमाल, मिस्सी लगाना, तांबूल, अधरों को रंगना। 19 वीं सदी में षोडश शृंगार में बिंदी, सिंदूर, काजल, मेंहदी, वस्त्र, मांग टीका, नथ, कर्णफ़ूल, हार, बाजूबंद, कंगन या चूड़ी, अंगुठी, करधन, बिछिया, पायल, महावर शामिल थे। विदेशों में रहने वाले भारतीयों के षोडश शृंगार में स्थानीय प्रभाव होने के कारण थोड़ा बदलाव आया है। लंदन में निवासी शिखा वार्ष्णेय कहती है -, शैम्पू, हेयर डाई, बाली, छल्ले (hoops), मालाएँ, टैटू, क्रीम, काजल, लिपिस्टिक, पर्फ़्यूम, ब्लशर, बेल्ट, ब्रेसलेट, घड़ी, मोबाईल, जींस टॉप, पायल (एक पैर में) बिछिया (एक पैर की एक अंगुली में) शृंगार के तौर पर उपयोग में लाए जा रहे हैं।
![]() |
| सौंदर्य पेटिका धारी वनवासिनी दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा बस्तर |
वर्तमान में देखें तो भारत में भी षोडश शृंगार में सम्मिलित कुछ वस्तुओं में परिवर्तन हुआ है। विदेशों की अपेक्षा अत्यधिक परिवर्तन तो यहाँ दिखाई नहीं देता। झरिया निवासी शालिनी खन्ना बताती है - कामकाजी महिलाओं में समय की कमी एवं कार्य स्थल के आवा-गमन को लेकर बदलाव आया है। वर्तमान में विवाहित महिलाएँ शैंपू, परफ़्यूम, बिंदी, लिपिस्टिक, काजल, यारुज, सिंदूर, चूड़ी, मंगलसूत्र, पायल, बिछिया, बाली, मोबाईल, घड़ी, वस्त्र (सलवार कुरती, जींस टॉप) गॉगल का प्रयोग करती हैं। काल परिवर्तन कितना भी हो जाए पर सौंदर्य के प्रति जागरुकता हमेशा बनी रहेगी। इससे पता चलता है कि षोडश शृंगार की कोई निश्चित परिभाषा या सूची नहीं है, देश काल के अनुसार उसमें बदलाव होता रहता है। वर्तमान जब कोई शिल्पकार या चित्रकार अपनी छेनी या कूंची उठाएगा तो अधिक नहीं सिर्फ़ कुछ बदलाव ही दिखाई देगें। जो भविष्य में निर्माण के समय और काल को सूचित करेगें।
शिवालयों में कीर्तिमुख अलंकरण
शिवालयों में द्वारपट, स्तंभों, भित्तियों में एक भयावह मुखाकृति बनी दिखाई देती है। इस आकृति को शिल्पकार अपनी कल्पना शक्ति के अनुसार भयावह निर्मित करते थे। देखने से प्रतीत होता है कि किसी राक्षस की प्रतिमा है। भक्तजन इस मुखाकृति को प्रणाम कर आगे बढ जाते हैं। परन्तु उनके मन में हमेशा इस मुखाकृति के प्रति कौतुहल बना रहता है। कुछ मित्र मुझसे इस आकृति के विषय में हमेशा चर्चा कर अपनी जिज्ञासा शांत करते हैं। उनका प्रश्न रहता है कि इस आकृति को शिवालयों में क्यों निर्मित किया जाता है? यह आकृति शिवालयों के साथ जैन मंदिरों के शिल्प में भी पाई जाती है। खजुराहो के पार्श्वनाथ मंदिर में भी इस मुखाकृति को मंदिर शिल्प में स्थान दिया गया है।
![]() |
| कीर्तिमुख (भीमा-कीचक) मल्हार छत्तीसगढ़ |
इस मुखाकृति को कीर्तिमुख कहा गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इसका जीवंत निर्माण लंका के प्रवेशद्वार पर शुक्राचार्य द्वारा किया गया था। वर्णन है कि शुक्राचार्य ने "रुद्र कीर्तिमुख" नाम का दारुपंच अस्त्र लंका के प्रवेशद्वार पर स्थापित किया, बाहर होने वाली प्रत्येक गतिविधि इस पर चित्रित होकर दिखाई देती थी। इसके मुख से अग्नि का गोला निकल कर शत्रु का संहार करता था। लंका में कीर्तिमुख का अस्त्र के रुप में प्रयोग किया गया। वर्तमान में हम घरो, दुकानों एवं अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर सी सी टी वी कैमरों का इस्तेमाल करते हैं, इसी तरह कीर्तिमुख अस्त्र का निर्माण कर प्रयोग किया गया था।
कीर्तिमुख के विषय में एक कथा मत्स्य पुराण अ 251 में आती है - अंधकासुर के वध के समय भगवान शंकर के ललाट से पृथ्वी पर जो स्वेद बिंदू गिरे उनसे एक भयानक आकृति का पुरुष प्रकट हुआ। जिसने अंधकगणों का रक्त पान किया, परन्तु अतृप्त ही रहा। अतृप्त होने के कारण वह भगवान शंकर का ही भक्षण करने चल दिया। इस कारण महादेवादि देवों ने इसे पृथ्वी पर सुलाकर वास्तु देवता के रुप में प्रतिष्ठित किया और उसके शरीर में सभी देवताओं ने वास किया। इसलिए यह वास्तु पुरुष या वास्तु देवता कहलाने लगा। देवताओं ने वास्तु को गृह निर्माण, वापी, कूप, तड़ाग, गरी, मंदिर, बाग बगीचा, जीर्णोद्धार, यग्य मंडप निर्माणादि में पूजित होने का वरदान दिया। तब से यह वास्तु देवता के रुप में पूजित एवं प्रतिष्ठित है।
![]() |
| कीर्तिमुख (ताला) छत्तीसगढ़ |
एक अन्य कथा में बताया गया है कि प्राचीन काल में जलंधर नामक एक महाशक्तिशाली दैत्य उत्पन्न हुआ जिसने अपनी तपस्या के बल पर ब्रह्मा को खुश करके कई वरदान प्राप्त कर लिये। इसने जंगल के मध्य अपने लिए एक भव्य भवन का निर्माण कराया और एक राक्षसी सेना भी तैयार कर ली। इससे इसकी ताकत बहुत बढ़ गई और मन में अहंकार भी समा गया। अब वह प्रतिदिन संध्या समय एक सुंदर रथ पर सवार होकर भ्रमण के लिए निकलता था और ऐसे-ऐसे कार्यों को अंजाम दे डालता था जिससे प्रजा त्राहि-त्राहि कर उठती थी।
इसी क्रम में एक दिन जलंधर रथ पर सवार होकर घूम रहा था कि एक मादक सुगंध उसके नाक में समा गई जिससे वह चकित हो उठा और चतुर्दिक दृश्यों को निहारने पर एक अद्वितीय सुंदर नारी जंगल में घूमती हुई दिखाई दी। तब वह चौंका – कौन है यह नारी? इस सुन्दरी के अंदर तो सृष्टि की सारी सुघड़ता सिमटी जैसी दिखाई दे रही है। ‘यह कैलासपति शिव की पत्नी पार्वती है’, एक सेवक ने उत्तर दिया तो वह हंस पड़ा, ‘भला उस बूढ़े शिव के साथ इस अनुपम सुन्दरी का क्या काम? मैं इसे अपनी पटरानी बनाऊंगा।’ दैत्य ने मन में ठान लिया और बेचैन होकर महल में वापस लौट आया फिर अपने एक सेवक को दूत बनाकर शिव के पास भेजा।
![]() |
| कीर्तिमुख पंचायतन शिवालय सुरंग टीला सिरपुर छत्तीसगढ़ |
इस सेवक का नाम रोनू था। वह कैलास पर्वत पर पहुंचा तो भोलेनाथ योगसाधना में मगन थे। इससे रोनू तनिक सहमा किंतु शीघ्र अपनी राक्षसी प्रवृत्ति के अनुकूल जोर-जोर से चिल्लाने लगा, ‘आप पार्वती को तुरंत हमारे हवाले करें क्योंकि दैत्यपति जलधर को वह पसंद आ गयी है।’ शिव कुछ सुन नहीं पाये क्योंकि उनकी आंखें मुंदी थीं और पूरा शरीर एकदम स्थिर था। मगर रोनू का हठ तो पराकाष्ठा पर पहुंच गया और अपनी बात चिल्ला-चिल्ला कर बताने लगा। उसकी चिल्लाहट से शिव की तंद्रा टूट गयी और और उन्होंने रोनू की तरफ लाल-लाल आंखों से देखा फिर क्रोध से अपने त्रिनेत्र खोल लिये। इस त्रिनेत्र के खुलते ही आक्रोश की एक रक्तिम धारा बहने लगी जिससे एक विचित्र जीव पैदा हो गया।
इस जीव के चेहरे का आकार बाघ पशु के समान चौड़ा एवं मजबूत था जबकि हाथ-पैर रस्सी की भांति पतला तथा छिन्न। यह जीव जन्म लेते ही भूख-भूख चिल्लाने लगा और रोनू की ओर लपका। वह शिव के चरणों में गिर पड़ा और प्राण रक्षा के लिए गुहार लगाने लगा। रोनू के गिड़गिड़ाने से शिव को दया आ गयी और उन्होंने माफ कर दिया, पर उस जीव की भूख को मिटाना आवश्यक था। इससे शिव सोच में पड़ गये किंतु शीघ्र ही इस जीव का नामकरण कीर्तिमुख किया फिर प्रेमपूर्ण दृष्टि से निहारते हुए समझाया – पुत्र कीर्तिमुख, जब तक भोजन का प्रबंध नहीं होता तब तक अपने ही हाथ-पैर खाकर भूख मिटा लो।
![]() |
| कीर्तिमुख कंसुवा शिवालय कोटा (फ़ोटो - रिंकेश अग्रवाल कोटा) |
बस फिर क्या कहना था, कीर्तिमुख अपने ही हाथ-पैर पर टूट पड़ा और पेट-पीठ भी खा गया। इसके बाद गर्दन की ओर बढ़ा तो शिव ने रोकते हुए कहा पुत्र कीर्तिमुख, तुम्हारा जीवित रहना आवश्यक है ताकि मेरी कुटिया की सुरक्षा होती रहे अत: तुम द्वार पर नियुक्त हो जाओ। शिव से आदेश पाकर कीर्तिमुख इनके द्वार का प्रहरी बन गया और अपने जीवन को धन्य कर लिया। इस जीव के अंदर शिव-मस्तिष्क का कल्याण समाहित है, इसलिए शिवालयों में इसकी दैत्यनुमा आकृति बनाने की परम्परा है और यह भी मान्यता है कि जो व्यक्ति कीर्तिमुख की पूजा करके शिवालय में प्रवेश करता है उसकी प्रार्थना शिव तुरंत सुनते हैं। इसी मान्यता स्वरुप शिवालयों में कीर्तिमुख का निर्माण किया जाता है।
कुंआ: मानव सभ्यता की पहचान
जल ही जीवन है, क्षितिज, जल, अग्नि, गगन एवं हवा आदि पंच तत्वों में अनिवार्य तत्व जल भी है। बिना जल के जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। मानव ने सभ्यता के विकास के क्रम में जल की अनिवार्य आवश्यकता की पूर्ति हेतु नदियों एवं प्राकृतिक झीलों के किनारे अपना बसेरा किया। वह नदियों एवं झीलों के जल से निस्तारी करता था। जब मानव समूह विशाल रुप लेने लगे तो गाँव एवं नगर बसने लगे। निवासियों के लिए जल उपलब्ध कराने की दृष्टि से कुंए, तालाब इत्यादि निर्मित किए जाने लगे। आवागमन के मार्गों पर जल की व्यवस्था कुंए एवं प्याऊ के रुप में की जाने लगी। इस तरह भू-गर्भ जल की उपस्थिति को मनुष्य ने जान लिया और मानवकृत जल के संसाधन विकसित होने लगे।
![]() |
| हड़प्पाकालीन नगर लोथल (गुजरात) के कुंए का निरीक्षण करते हुए विनोद गुप्ता जी के साथ |
पेयजल की उपलब्धता के लिए प्राचीन काल से मानव ने कुंए, बावड़ियों एवं तालाबों का निर्माण किया। पुरातात्विक स्थलों के उत्खनन के दौरान प्राचीन नगर बसाहटों में कुंए मिलते हैं। हड़प्पा काल में नगर के मध्य एवं व्यापारिक केन्द्रों में पक्के कुंए होते थे। मोहन जोदड़ो, हड़प्पा, लोथल इत्यादि स्थानों पर उत्खनन के दौरान पक्के कुंए प्राप्त हुए हैं। इसी तरह छत्तीसगढ़ अंचल के सिरपुर में पक्के प्राचीन कुंए उत्खनन में प्राप्त हुए हैं, जिनमें अभी भी मीठा जल उपलब्ध है। इसके साथ ही प्राचीन व्यापार मार्गों पर भी कुंओं के अवशेष मिलते हैं।
तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में रावण की वाटिका वर्णन करते हुए लिखा है - बन बाग उपवन वाटिका, सर कूप वापी सोहाई। जल के बिना जीवन नहीं है, अत: रावण की लंका में भी कूप, वापी सरोवरों की बहुतायता पाई गई। स्नान के लिए सरोवर, पेयजल की प्राप्ति के लिए कूप एवं सिंचाई तथा पशुओं की निस्तारी के लिए बावड़ियों का निर्माण कराया गया था। राज्य द्वारा प्रजा की सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए जल की उत्तम व्यवस्था की जाती थी।
संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध कवि बाण अपनी कृति कादंबरी (सातवीं शताब्दी) में पोखर-सरोवर खुदवाने को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मानते थे. लोक-कल्याण हेतु इस प्रकार के खुदवाए गए जलकोष को चार वर्गों में विभाजित किया गया है- 1.कूप जिसका व्यास 7 फीट से 75 फीट हो सकता है और जिससे पानी डोल-डोरी से निकाला जाए, 2. वापी, छोटा चौकोर पोखर, लंबाई 75 से 150 फीट हो और जिसमें जलस्तर तक पाँव के सहारे पहुँचा जा सके, 3.पुष्करणी, छोटा पोखर, गोलाकार, जिसका व्यास 150 से 300 फीट तक हो, 4.तड़ाग पोखर, चौकोर, जिसकी लंबाई 300 से 450 फीट तक हो.।
जल की व्यवस्था हमारे समाज के लिए कभी मजबूरी रही होगी परन्तु कालांतर में इसने परम्परा का रुप ले लिया। पोखर की चर्चा ऋग्वेद में भी है. गृह्मसूत्र के अनुसार, किसी भी वर्ग या जाति का कोई भी व्यक्ति, पुरूष या स्त्री पोखर खुदवा सकता है और यज्ञ करवाकर समाज के सभी प्राणियों के कल्याण-हेतु उसका उत्सर्ग कर सकता है. आज भी यह काम पुण्य कमाने का समझा जाता है। कुंआ पोखर आदि निर्माण करने को प्रोत्साहित करने के लिए शास्त्रों द्वारा महिमा मंडन किया गया, कहते है - जो धनी पुरुष उत्तम फल के साधन भूत ‘तडाग’ का निर्माण करता है और दरिद्र एक कुआँ बनवाता है, उन दोनों का पुण्य समान होता है। जो पोखरा खुदवाते हैं, वे भगवान् विष्णु के साथ पूजित होते हैं।
महाभारत में भीष्म पर्व के माध्यम से वेदव्यास ने कोई तालाब कितने समय के लिए पानी संचित रख सकता है उसके अनुरूप उनका विभाजन किया है। उन्होंने इस तरह के तालाबों के निर्माण से मिलने वाले पुण्य की भी व्याख्या की है। हिन्दू संस्कृति में इस तरह के जल-स्रोतों का निर्माण एक धार्मिक कृत्य माना जाता रहा है और इसे अपनी कीर्ति रक्षा का सबसे सहज उपाय भी बताया गया है। कूप या कुएं इस श्रृंखला की सब से छोटी इकाई हुआ करते थे जो कि न केवल पेय जल के स्रोत थे वरन उनके आकार के अनुसार उनसे सिंचाई की भी संभावनाएं बनती थीं।
![]() |
| सिरपुर के बाजार क्षेत्र के मध्य कुंआ |
कवि केशवदास ने कविप्रिया में नगर वर्णन करते हुए लिखा है - खाई कोट अट ध्वजा, वापी कूप तड़ाग, वार नारी असती सती, वरनहु नगर सभाग। पदमावत में जिक्र है कि वारी सुफ़ल आहि, तुम बालापन में ही फ़ल गई, मध्यकाल में वाटिका लगाने के बाद उसका विवाह किया जाता था। तब तक लगाने वाला उसका फ़ल न खाता था। वाटिका लगाने एवं फ़लने के बाद वापी कूप तड़ाग का विवाह करने के बाद ही स्वामी उनका उपभोग करता था। व्यंग्य करते हुए कहा है कि - तुम्हारी वाटिका तो कुंवारी ही फ़ल गई।
कुंओं का निर्माण करना साधारण कार्य नहीं था। भू-गर्भ से जल निकालने के लिए भू-तल तक उत्खनन करना पड़ता था। कुंओं का निर्माण करने के लिए शिल्पशास्त्रों ने विधान बताया है। शिल्पशास्त्र मयमतम के रचयिता कहते हैं - ग्राम आदि में यदि कूप नैऋत्य कोण में हो तो व्याधि एवं पीड़ा, वरुण दिधा में पशु की वृद्धि, वायव्य कोण में शत्रु-नाश, उत्तर दिशा में सभी सुखों को प्रदान करने वाला तथा ईशान कोण में शत्रु का नाश करने वाला होता है । ऐसा कहा गया है ॥१-२॥ वराह मिहिर ने कहा है - यदि ग्राम के या पुर के आग्नेय कोण में कूप हो तो वह सदा भय प्रदान करता है तथा मनुष्य का नाश करता है । नैऋत्य कोण में कूप होने पर धन की हानि तथा वायव्य कोण में होने पर स्त्री की हाने होती है । इन तीनों दिशाओं को छोड़कर शेष दिशाओं में कूप शुभ होता है ॥४-५॥
स्थान चयन के लिए परम्परागत साधनों से भू जल की उपस्थिति जांचने के बाद समस्त देवताओं का आहवान एवं पूजन करके कूप का निर्माण निश्चित किया जाता था। सही मुहूर्त में कूप का निर्माण प्रारंभ किया जाता था। भूमि के आधार पर कुंओं को खोदने के पृथक पृथक निर्माण विधि प्रयोग में लाई जाती थी। जहाँ मिट्टी मजबूत होती थी वहाँ वांछित गहराई तक कुंआ खोदने के पश्चात उसे ईंटों या पत्थरों से पक्का बांधा जाता था। जहाँ रेत पाई जाती है वहाँ जमीन पर ही कुंओं की चिनाई करके बाद उसके नीचे की रेत धीरे-धीरे सावधानीपूर्वक निकाली जाती है। इसे स्थानीय भाषा में "कोठी गलाना" कहते हैं। यह विधि खतरनाक भी है क्योंकि यहाँ कुंओं में जल सामान्य से अधिक उत्खनन के पश्चात निकलता है। कभी कभी ईटों के भसकने के कारण मजदूरो के दब जाने से जान लेवा दुर्घटनाएँ हो जाती हैं।
शास्त्रकार कूप निर्माणकार के प्रोत्साहन की दृष्टि से नारद पुराण कहता है- एकाहं तु स्थितं पृथिव्यां राजसन्तम। कुलानि तारयेत् तस्य सप्त-सप्त पराण्यपि।।65।। अर्थात्-जिसकी खुदवाई हुई पृथ्वी में केवल एक दिन भी जल स्थित रहता है, वह जल उसके सात कुलों को तार देता है। दीपालोक प्रदानेन वपुष्मान् स भवेन्नरः। प्रेक्षणीय प्रदानेन स्मृतिं मेधां च विंदति।।66।। अर्थात्- ‘दीप दान’ करने से मनुष्य का शरीर उत्तम हो जाता है और जल के दान के कारण उसकी स्मृति और मेधा बढ़ जाती है। -बृहस्पति स्मृति।
शास्त्रों में नृपों के लिए स्पष्ट निर्देश देकर जल प्रदुषित एवं जल साधन नष्ट करने वाले के लिए दंड का विधान किया गया है। लिखित स्मृति कहती है- पूर्णे कूप वापीनां वृक्षच्छेदन पातने। विक्रीणीत गजं चाश्वं गोवधं तस्य निर्द्दिशेत्।। अर्थात्- जो मनुष्य कुआँ या बावड़ी को पाट देता है, वृक्षों को काट कर गिरा देता है तथा हाथी या घोड़े को बेचता है, उसे ‘गौ के हत्यारे’ के समान मानकर दण्डित करना चाहिए। ‘तडाग देवतागार भेदकान् घातयेन्नृपः।।‘ ‘अग्नि पुराण’ में राजाओं के लिए स्पष्ट निर्देश है कि यदि कोई व्यक्ति जलाशय या देवमंदिर को नष्ट करता है तो राजा उसे ‘मृत्युदण्ड’ से दण्डित करे। स्कंद पुराण के माहेश्वर खण्ड में कहा गया है कि जो व्यक्ति पोखरा को बेच देते हैं, जो जल में मैथुन करते हैं तथा जो तालाब और कुओं को नष्ट करते हैं, वे ‘उपपातकी’ हैं। ऐसे व्यक्ति जब दुबारा जन्म लेते हैं तो वे अपने ‘हाथों’ से वंचित होते हैं।
![]() |
| सिरपुर के प्राचीन बाजार क्षेत्र के मध्य कुंआ |
जल सर्वकाल में मानव एवं चराचर जगत के लिए जीवन का स्रोत है, इसके महत्व को प्राचीन काल के मानवों ने समझा तथा जल की समुचित व्यवस्था की ओर ध्यान देते हुए जल के संसाधनों के रुप में कूप, तालाबों का निर्माण करवाया। हरियाणा, राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश के हरितक्षेत्र में कुंआ पूजन का विधान है। पुत्र जन्म होने पर स्त्रियाँ सद्य: प्रसुता से कुंए की समारोह पूर्वक पूजा करवाती हैं। यह जल संसाधन के प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता प्रकट करने का सामाजिक नियम निर्मित किया गया है। इस तरह कुंए प्राचीन काल से मानव सभ्यता एवं प्राणी जगत की जलापूर्ति का साधन बने हुए हैं। बढती हुई जनसंख्या के समक्ष जलापूर्ति एक विकराल समस्या के रुप में सामने आ रही है। भू-जल का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है। पर्जन्य से जितना जल पृथ्वी पर आता है उसे बचाकर भू-गर्भ के जल की वृद्धि करने का प्रयत्न करना चाहिए।
कौड़ी, तू कितने कौड़ी की?
प्राचीन स्थलों पर उत्खनन के दौरान अन्य वस्तुओं के साथ कौड़ियाँ, शंख, सीप भी पाई जाती हैं। इससे जाहिर होता है कि ये मानव जीवन का अहम हिस्सा थी। शंखों से चूड़ियाँ बनाई जाती थी तो सीप और छोटी शंखियाँ आभुषण के रुप में प्रयुक्त होती थी। इनमें कौड़ियों का अहम भूमिका थी। मानव ने जीवन के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए समाज का निर्माण किया और समूहों में रहने लगा। जीवनोपयोगी आवश्यकताओं की वस्तु के लिए चोरी डकैती करने की बजाए उसने विनिमय के तौर पर वस्तुओं का आदान-प्रदान किया। स्वयं के पास आवश्यकता से अधिक कोई वस्तु उपलब्ध होने पर अन्य आवश्यक वस्तु से बदला किया। वस्तु विनिमय में बहुत जटिलताएं थी, वस्तु के योग्य मूल्य नहीं मिल पाता था तथा संचयन आदि की आवश्यकता को देखते हुए विनिमय के लिए मुद्रा की आवश्यकता हुई, तब उसने कौड़ियों का इस्तेमाल विनिमय के लिए प्रारंभ किया होगा।
ऐसा नहीं है कि कौड़ियाँ उन्हे सहज ही उपलब्ध हो जाती थी। प्राप्त करने के लिए श्रम करना पड़ता था। कौड़ी जल में पाए जाने वाले जीव (घोंघा) की एक प्रकार की जाति गैस्ट्रोपोडा की उपजाति प्रोसेब्रैकिया है। कौड़ी इस जीव का अस्थिकोश है। यह कुबड़ा खोल रंगीन एवं चमकीला होता है तथा विभिन्न आकृतियों में पाया जाता है। कौड़ियाँ प्राय: हिन्द एवं प्रशांत महासागर के तटीय जल में पाई जाती हैं। रंगीन कौड़ी को प्रशांत महासागर क्षेत्रीय राजा आभुषण के तौर धारण करते थे तथा अफ़्रीका एवं भारत में मुद्रा के तौर पर प्रचलित थी। कौड़ियों की खास पहचान होती है, कौड़ियों के 165 प्रकारों में कुछ प्रयोग ही मुद्रा के तौर होता था। सिर्फ़ "मनी कौड़ी" एवं "रिंग कौड़ी" मे से मनी कौड़ी पीली या हल्के पीले रंग की होती है। भारत एवं एशिया में इसका ही मुद्रा के तौर पर चलन था।
कौड़ियों के विनिमय का मापदंड तय करके लागु किया गया। जिसे विभिन्न कालों में पृथक-पृथक नामों से जाना जाता था। लगभग 3000 से 4500 वर्ष पहले, मध्य चीन में कौड़ी को मुद्रा का प्रारंभिक रूप माना जाता है, मार्कोपोलो ने अपनी चीन यात्रा के दौरान कौड़ियों का प्रयोग मुद्रा के तौर पर होते देखा। अफ़्रीका तथा युरोप के देशों में मुद्रा के तौर पर कौड़ियों का चलन रहा है। मालद्वीप को "कौड़ियों का देश" कहा जाता था इस स्थान से जहाजों भर कर कौड़ियाँ युरोप के देशों में ले जाई जाती थी। यदि मालदीव कौड़ियों को इकठ्ठा करने का केंद्र था तो भारत उनके वितरण का केंद्र था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के ज़माने में भारत में हर वर्ष चालीस हजार पौंड के मूल्य की कौड़ियों का आयात किया जाता था। मुद्रा के तौर पर इसका चलन भारत में 20 वीं शताब्दी में सन् 1939 ईस्वीं तक था।
प्रारंभिक मुद्रा के रुप में कौड़ियों का प्रचलन था। धातू के सिक्के आने के बाद इसके मानक तय किए गए। भविष्य पुराण में मजदूरों को पारिश्रमिक देने का उल्लेख मिलता है। उस काल में मजदूरी "पण" मुद्रा के रुप में दी जाती थी। बीस कौड़ी की एक कांकिणी और चार कांकिणी का एक "पण" माना गया। मेवाड़ राज्य में २० भाग = १ कौड़ी, २० कौड़ी = आधा दाम, २ आधा दाम = १ रुपया माना जाता था। सर जॉन माल्कन के अनुसार ४ कौड़ी = १ गण्डा, ३ गण्डा = १ दमड़ी, २ दमड़ी = १ छदाम, २ छदाम = १ रुपया (अधेला), ४ छदाम = १ रुपया = ९६ कौड़ी मुद्रा मान था। छत्तीसगढ़ में सदियों से कोरी का मान चलता है, जिससे कौड़ी का भ्रम होता है। पर एक कोरी का मान 20 है और सारी गणना इसके आगे पीछे ही चलती है, जैसे दू आगर 10 कोरी = 202 या फ़िर पाँच कम 10 कोरी = 95 की संख्या होती है।
कौड़ियों ने मानव की सभ्यता के साथ एक लम्बा सफ़र तय किया है। इसके प्रचलन के बाद ही धातुओं के सिक्के विनिमय के लिए प्रयोग में आए। तांबे, चाँदी एवं सोने ने सिक्के का रुप लेकर मुद्रा का स्थान प्राप्त कर लिया और कौड़ी चलन से बाहर हो गई। परन्तु इसका प्रयोग वर्तमान में भी मांगलिक कार्यों एवं श्रृंगार के तौर पर हो रहा है। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचल में आज भी कौड़ियों का उपयोग होता है। अहिर जाति इसे अपने अंग वस्त्रों में लगाकर सौंदर्य वृद्दि करती है वहीं आदिवासी अंचल में नृत्य के समय कलाकार कौड़ियों के आभुषण धारण कर सौंदर्य वृद्धि करते हैं। भारत के अन्य प्रदेशों में भी कौड़ियों का प्रयोग होता है। किसी न किसी तरह से कौड़ी मानव की जीवन यात्रा में भौतिकता के इस दौर में भी सम्मिलित है।
कहावतों में कौड़ियाँ भी ढल गई, दो कौड़ी का आदमी, इससे तात्पर्य है वह आदमी किसी काम का नहीं है। दौ कौड़ी में भी मंहगा है, अर्थात अनुपयुक्त है, कोई काम का नहीं है। फ़ूटी कौड़ी एवं कानी कौड़ी आदि कहावतों से जाहिर होता है विनिमय के लिए फ़ूटी कौड़ी एवं कानी (छिद्र युक्त) कौड़ी को दोषपूर्ण माना जाता था। जिस तरह वर्तमान में खोटा सिक्का या कटा फ़टा नोट समझा जाता है। दूर की कौड़ी लाना अर्थात कोई महत्वपूर्ण वस्तु, सुझाव या जानकारी लाना। इससे जाहिर होता क्षेत्र के अलावा अन्य कहीं दूरस्थ स्थान से बेहतरीन स्तर की कौड़ी भी लाई जाती थी। इस तरह कई तरह की कहावतों में कौड़ियों का इस्तेमाल हुआ है।
कौड़ी से पासे का खेल खेला जाता था और खेला भी जाता है। अभी भी गावों में समय व्यतीत करने एवं मनोरंजन के लिए कौड़ियों से तीरी-पासा खेला जाता है। कौड़ी एवं सीपों अब घर सजाने के लिए विभिन्न तरह के सजावटी बंदनवार, तोरण, हैंगर इत्यादि बनाए जाने लगे हैं। कौड़ी को लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। त्यौहारों में विवाहादि मांगलिक अवसरों पर कौड़ी का चलन अब भी कायम है। भले ही कौड़ी मुद्रा के रुप में चलन से बाहर हो गई हो पर कहावतों एवं लोकसंस्कृति में लोक के जनमानस में अभी भी श्रद्धा की पात्र बनी हुई है।चाहे कितना भी सांस्कृतिक बदलाव आ जाए पर कौड़ी प्राचीन काल से लेकर अब तक मानव के साथ जुड़ी हुई है। कौड़ी से बिछुड़ने की सोचना भी दूर की कौड़ी है।
खोपड़ी: महापाषाण कालीन सभ्यता का साक्षी
भूगोल में किसी एक प्रदेश या भूखंड में सभ्यताएं स्थाई नहीं रही। प्रकृति के चक्र के साथ नया बनता गया तो पुराना उजड़ता गया। जब आर्यावर्त की सभ्यता डंके सारे विश्व में बजते थे तब आज के शक्तिशाली राज्य अमेरिका नामो निशान भी नहीं था। महाभारत के युद्ध में सब कुछ गंवा देने के बाद आर्यावर्त में नई सभ्यता का उदय हो रहा था। तब इस काल में मिश्र की सभ्यता उत्कर्ष पर थी और हम पुन: विकास की ओर बढ रहे थे। इन सभ्यताओं के उदय एवं पतन के साक्ष्य धरती पर पाए जाते हैं, प्राचीन काल के मानव एवं उसकी सभ्यता को जानने के लिए पुरातत्व पर आश्रित होना पड़ता है। पुरातत्ववेत्ता तकनीकि प्रमाणों के आधार पर प्राचीन सभ्यता को सामने लाते हैं।
![]() |
| माला चा गोटा |
अध्ययन की दृष्टि से इतिहास को कई कालखंडों में विभाजित किया गया है। इसमें एक काल खंड मेगालिथिक पीरियड (महापाषाण काल) कहलाता है। भारतवर्ष में विशाल पाषाणखंडों से बनी कुछ समाधियाँ (मृतक स्मृतियाँ) प्राप्त होती हैं जिन्हें महापाषाणीय स्मारक के नाम से सम्बोधित करते हैं। जिस काल में इनका निर्माण हुआ उसे महापाषाण काल कहते हैं। महाराष्ट्र प्रदेश के विदर्भ अंचल में नागपुर से 45 किलोमीटर की दूरी पर कुही कस्बा है। इस क्षेत्र में महापाषाण कालीन अवशेष पाए जाते हैं। जिसके उत्खनन की जानकारी मुझे डेक्कन कॉलेज के डॉ कांति पवार सहायक प्राध्यापक डेक्कन कॉलेज द्वारा प्राप्त हुई थी। उनके सहयोगियों एवं विद्यार्थियों द्वारा इस उत्खनन कार्य को अंजाम दिया जा रहा था। इस महापाषाण कालीन स्थल पर उत्खनन हो रहे उत्खनन कार्य को मैं देखना चाहता था।
![]() |
| माला चा गोटा |
मुंबई से लौटते हुए उत्खनन निदेशक कांति पवार को फ़ोन करने के पश्चात ज्ञात हुआ कि वे कुही में ही हैं। आज गर्मी बहुत अधिक थी, लू भी चल रही थी। पारा सातवें आसमान पर था, परन्तु उत्खनन स्थल पर पहुंचने की ललक ने तपते हुए सूरज का अहसास नहीं होने दिया। नागपुर से उमरेड़ मार्ग पर पाँच गाँव से बाँए हाथ को कुही के लिए रास्ता जाता है। इस रास्ते पर पत्थर की खदाने भी दिखाई देती हैं। जिनमें अभी उत्खनन जारी है। प्रारंभ में तो रास्ता धूल घक्कड़ से भरा हुआ है परन्तु आगे बढने पर ग्रामीण वातावरण की झलक दिखाई देने लगती है। हम लगभग भोजन के समय ही कुही पहुंचे। डॉ कांति पवार भोजन के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे। हमने साथ ही भोजन किया और साईड देखने चल पड़े।
![]() |
| महापाषाण कालीन स्मारक |
कुही कस्बे से थोड़ी दूर पर "माला च गोटा" नामक महापाषाण कालीन स्थल है। देखने से प्रतीत होता है कभी यह घन घोर वन क्षेत्र रहा होगा। सड़क के बांई तरफ़ बड़े पत्थरों का गोला बना हुआ है। जिसका ब्यास लगभग 15 मीटर होगा। इसे मेगालिथिक सर्कल (महापाषाण कालीन वृत) कहते हैं। इस सर्कल में सफ़ेद पत्थरों का प्रयोग किया गया है। शायद आस पास कहीं इन पत्थरों की उपलब्धता हो। पत्थरों का आकार बड़ा होने से ज्ञात होता है कि इस स्थान पर दफ़्न किया गया व्यक्ति सामाजिक दृष्टि से उच्च स्थान एवं सम्मान का पात्र होगा। अन्य स्थानों पर मेगालिथिक सर्कल मिलते हैं पर बड़े आकार के पत्थर मेंरी दृष्टि में देखने में नहीं आए। अगर इन पत्थरों को ध्यान से देखें तो "स्टोंन हेंज" की संरचना सामने आती है। उसमें गढे हुए पत्थर हैं और ये अनगढ़, बस फ़र्क इतना ही है। स्टोन हेंज एवं माला च गोटा दोनो को बनाने का प्रयोजन एक ही रहा होगा।
![]() |
| उत्खनन कार्य |
स्मृति शब्द से ही स्मरण रखने, करने का अर्थ निकलता है। वर्तमान में भी हम देखते हैं कि किसी की मृत्यू होने के पश्चात उसे याद रखने के लिए लोग मंदिर, धर्मशाला, प्याऊ, स्कूल एवं प्रतिमाओं का निर्माण करवाते हैं। यही याद रखने वाली एषणा मनुष्य की सभ्यता के साथ चली आ रही है। इस नश्वर लोक में व्यक्ति कुछ ऐसा कर जाना चाहता है कि जिससे उसे युग युगांतर आने वाली पीढियाँ याद कर सकें, स्मृति में संजोकर स्मरण कर सकें। महापाषाण काल में भी मृतकों के लिए स्मारकों का निर्माण किया जाता था। मृतक के अंतिम यात्रा स्थल पर स्मृति स्वरुप विशालकाय पत्थरों का प्रयोग किया जाता था। किसी कब्र के स्थान पर एक पत्थर प्राप्त होता है किसी स्थान पर स्मृति वृत बना हुआ प्राप्त होता है। मृतक के साथ उसकी दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुएँ एवं उसकी निजी प्रिय वस्तुओं को भी दफ़नाया जाता था। इस मैगालिथिक सर्कल में मुझे 3 बड़े गड्ढे दिखाई, जाहिर होता है कि "ट्रेजर हंटर्स" ने खजाने की खोज में इसे भी खोद डाला।
![]() |
| उत्खनन में प्राप्त मृदाभांड के टुकड़े |
मेगालिथिक सर्कल एक टीले पर बना हुआ है। इसके बांई तरफ़ एक नाला बहता है और नाले के उस तरफ़ भी ऊंचाई वाला स्थान है। यही उत्खनन कार्य चल रहा है। इस स्थल के समीप ही नाग नदी बहती है। हमने स्थल निरीक्षण किया और पाया कि इस स्थान पर अन्य मेगालिथिक प्रमाण भी उपस्थित हैं। उत्खनन स्थल "खोपड़ी" कहलाता है। इसे रीठी गाँव कहते हैं। रीठी गाँव से तात्पर्य है वीरान गाँव, जो कभी आबाद था और उजड़ गया। राजस्व रिकार्ड में खोपड़ी गाँव का नाम दर्ज है और उसका रकबा भी है। परन्तु स्थान पर कोई बसाहट नहीं है। प्राचीन काल में इस स्थान पर मानवों की बड़ी आबादी रही होगी। जिसके अवशेष उत्खनन में प्राप्त हो रहे हैं। 5 वर्ष पूर्व इस स्थान सर्वेक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पुराविद डॉ सुभाष खमारी ने किया था तथा वर्तमान में उत्खनन कार्य डेक्कन कॉलेज के उत्खनन निदेशक कांति पवार के निर्देशन में डॉ गुरुदास शेटे, डॉ रेशमा सांवत के द्वारा किया जा रहा है।
![]() |
| उत्खनन स्थल पर डॉ रेशमा सावंत, ललित शर्मा एवं किसान भाऊ |
डॉ कांति पवार ने बताया कि इस स्थान से उत्खन में भूतल के तीन स्तर पाए गए हैं, साथ ही अस्थियाँ, काले एवँ लाल मृदाभांड के टुकड़े एवं चित्रित मृदा भांड अवशेष, खाद्यान्न जमा करने के बड़े भांड, सिल बट्टा, लोहे का चीजल, लोहे की छड़ एवं अन्य सामग्री प्राप्त हुई है। जो इतिहास की नई परतें प्रकाश में ला रही हैं। महापाषाण काल की संस्कृति को लगभग 3500 वर्ष प्राचीन माना जाता है। उत्खनन धीमी गति से पर पुरातात्विय मानकों के आधार पर किया जा रहा है। जिससे की एक भी प्रमाण नष्ट न होने पाए। इस उत्खनन स्थल की 15 हेक्टेयर भूमि पे खेत हैं जिनमें गेंहू की फ़सल बोई गई थी। यह भूमि कुही के किसी जमीदार की है। उन्होने इसे उत्खनन कार्य के लिए सौंप दिया है। किसी को अपनी निजी भूमि पर उत्खनन कार्य कराने के लिए तैयार करना ही बड़ी बात होती है।
![]() |
| डॉ कांति पवार (सहायक प्राध्यापक डेक्कन महाविद्यालय पुणे) |
डॉ कांति पवार कहते हैं कि महापाषाण कालीन उपलब्धियों से कुही क्षेत्र समृद्द है। कुही ब्लॉक के 30 किलोमीटर के दायरे में अड़म, मांडल, पचखेड़ी, पोड़ासा, राजोला, लोहरा इत्यादि महापाषाण कालीन स्थल पाए जाते हैं। अड़म में डॉ अमरनाथ ने उत्खनन किया था जहाँ मध्य पाषाणकाल से लेकर सातवाहन काल तक के पुरावशेष प्राप्त हुए। मांडल से वाकाटक नरेश प्रवर सेन का ताम्रपत्र प्राप्त हुआ। पचखेड़ी से मृतक स्तंभ प्राप्त हुआ है। इस तरह कुही क्षेत्र से पुरासम्पदाएँ प्रकाश में आने के कारण इतिहास की परते उघड़ रही हैं। डेक्कन महाविद्यालय का पुरातत्व विभाग इस क्षेत्र में अग्रणी हो कर कार्य कर रहा है।
सोलह शृंगार: कल और आज
किसी भी सुंदर वस्तु या व्यक्ति के सौंदर्य में अभिवृद्धि के लिए श्रृंगार या अलंकरण का पक्ष महत्वपूर्ण होता है। इसके लिए विभिन्न अलंकरणों के प्रयोग करने को शृंगार करना कहते हैं। शृंगार करने के पश्चात साधारण वस्तु या मनुष्य के सौंदर्य में अत्यधिक वृद्धि हो जाती है और वह मनमोहक, नयनाभिराम लगता है। उत्खनन से पता चलता है कि प्रतिमाओं का निर्माण हड़प्पा काल से हो रहा है, परन्तु उस समय मृण्मूर्तियाँ बनती थी। यही मृण्मूर्तियाँ मौर्यकाल में भी मिलती हैं तथा अलंकरण भी। परन्तु गुप्तकाल से प्रस्तर प्रतिमाओं का सफ़र प्रारंभ होता है तथा आगे चलकर कलचुरी कालीन मंदिरों की प्रतिमाओं में अलंकरणों की भरमार मिलती है। शिल्पियों ने देवी देवताओं से लेकर यक्ष गंधर्व अप्सराओं की प्रतिमाओं को सुंदर आभूषणों से सजा कर उसके सौंदर्य में वृद्धि करने का विशेष प्रयास किया है। इससे कलचुरीकालीन प्रतिमाएं अपने अलंकरणों से पृथक ही पहचानी जाती हैं।
![]() |
| यक्षणी - सिरपुर |
स्त्री सौंदर्य वृद्धि के लिए सोलह शृंगार (षोडश शृंगार) का विधान बताया गया है। इन्हीं अलंकरणों से विधानपूर्वक शिल्पी प्रतिमाओं को अलंकृत करते थे। शास्त्र के विधान के अनुरुप प्रतिमाओं का निर्माण करने का मार्गदर्शन शिल्पशास्त्र करते हैं। वैसे प्राचीन संस्कृत साहित्य में षोडश शृंगार की गणना अज्ञात प्रतीत होती है। षोड़श शृंगार की गणना वल्लभ देव कृत सुभाषितावली में प्रथम बार आती है। वल्ल्भदेवानुसार 12 वीं सदी में सोलह शृंगार इस प्रकार हैं - आद्यौ मज्जनचीरहारतिलकं नेत्राञ्जनं कुंडले, नासामौक्तिककेशपाशरचना सत्कंचुकं नूपुरौ। सौगन्ध्य करकङ्कणं चरणयो रागो रणन्मेखला, ताम्बूलं करदर्पण चतुरता श्रृंगारका षोड़श॥ अर्थात मज्जन, चीर, हार, तिलक, अंजन, कुंडल, नासामुक्ता, केशविन्यास, चोली (कंचुक), नूपुर, अंगराग (सुगंध), कंकण, चरणराग (महावर), करधनी तांबुल तथा करदर्पण (आरसी नामक अंगुठी) का वर्णन है।
![]() |
| मुख दर्शना (तेवर) जबलपुर |
कालानुसार सोलह शृंगार के लिए भिन्न वस्तुओं का प्रयोग किया जाता था। सोलहवीं सदी में श्री रुप गोस्वामी ने उज्वलनीलमणी में सोलह शृंगार को इस प्रकार व्यक्त किया है - स्नातानासाग्रजान्मणिरसितपटा सूत्रिणी बद्धवेणि: सोत्त सा चर्चिताङ्गी कुसुमितचिकुरा स्त्रग्विणी पद्महस्ता। ताम्बूलास्योरुबिन्दुस्तबकितचिबुका कज्जलाक्षी सुचित्रा। राधालक्चोज्वलांघि: स्फ़ूरति तिलकिनी षोडशाकल्पिनीयम॥ अर्थात, स्नान, नासा मुक्ता, असित पट (कृष्ण-काला दुपट्टा), कटि सूत्र (करधनी) वेणीविन्यास, कर्णावतंस, अंगों को चर्चित करना, पुष्पमाल, हाथ में कमल, केश में फ़ूल खोंसना, तांबुल, शरीर पर पत्रावली, मकरीभंग आदि का चित्रण, अलक्तक, तिलक इत्यादि षोडश शृंगार माना गया।
![]() |
| परिचारिका द्वार शाखा पातालेश्वर मंदिर मल्हार |
इस दोनो सूचियों में भिन्नता स्पष्ट है। हिन्दी के प्रसिद्ध कवि जायसी ने षोडश शृंगार का वर्णन इस प्रकार किया है - मज्जन, स्नान, (जायसी ने मज्जन, स्नान को अलग रखा है) वस्त्र, पत्रावली, सिंदूर, तिलक, कुंडल, अंजन, अधरों को रंगना, तांबुल, कुसुमगंध, कपोलों पर तिल, हार, कंचुकी, छुद्रघंटिका और पायल। इससे स्पष्ट हो रहा है कि 17 वीं शताब्दी तक अधररंग (लिपिस्टिक) का प्रयोग नहीं किया जाता था। 18 वीं शताब्दी में लिपिस्टिक एवं गालों पर कृत्रिम तिल बनाना षोडश शृंगार में सम्मिलित हो गया।
![]() |
| परिचारिका द्वार शाखा पातालेश्वर मंदिर मल्हार |
इसी प्रकार रीतिकाव्य के आचार्य केशवदास ने सोलह शृंगार की गणना करते हुए कहा है - प्रथम सकल सुचि, मंजन अमल बास, जावक, सुदेस किस पास कौ सम्हारिबो। अंगराग, भूषन, विविध मुखबास-राग, कज्जल, ललित लोल लोचन निहारिबो॥ बोलन हँसन, मृदुचलन, चितौनि चारु, पल पल पतिब्रत प्रन प्रतिपालिबो। 'केसोदास' सो बिलास करहु कुँवरि राधे, इहि बिधि सोरहै, सिंगारन सिंगारिबो। अर्थात उबटन, स्नान, अमल पट्ट (श्वेत, उज्जवल वस्त्र - दुपट्टा), जाबक (आलता), वेणीगूँथना, माँग सिंदूर, ललाट शौर (ललाट की शोभा बढाने वाला- तिलक), कपोलों पर तिल, अंग में केसर लेपन, मेंहदी, पुष्पाभूषण, स्वर्णाभूषण, मुखवास, दंत मंजन, तांबुल और काजल स्पष्ट है। इस काल में षोडश शृंगार मे कुछ वस्तुएं जुड़ गई और कुछ कम हो गई। इससे पता चल रहा है कि केसर तक नागरिकों की पहुंच हो गई थी और वे इसका महत्व जान चुके थे।
![]() |
| करधन घारिणी परिचारिका सिरपुर |
हिंदी विश्वकोश में इन शृंगारों की गणना इस तरह है -उबटन, स्नान, वस्त्रधारण, केश प्रसाधन, काजल, सिंदूर से माँग भरना, महावर, तिलक, चिबुक (ठोढी) पर तिल, मेंहदी, सुगंध लगाना, आभूषण, पुष्पमाल, मिस्सी लगाना, तांबूल, अधरों को रंगना। 19 वीं सदी में षोडश शृंगार में बिंदी, सिंदूर, काजल, मेंहदी, वस्त्र, मांग टीका, नथ, कर्णफ़ूल, हार, बाजूबंद, कंगन या चूड़ी, अंगुठी, करधन, बिछिया, पायल, महावर शामिल थे। विदेशों में रहने वाले भारतीयों के षोडश शृंगार में स्थानीय प्रभाव होने के कारण थोड़ा बदलाव आया है। लंदन में निवासी शिखा वार्ष्णेय कहती है -, शैम्पू, हेयर डाई, बाली, छल्ले (hoops), मालाएँ, टैटू, क्रीम, काजल, लिपिस्टिक, पर्फ़्यूम, ब्लशर, बेल्ट, ब्रेसलेट, घड़ी, मोबाईल, जींस टॉप, पायल (एक पैर में) बिछिया (एक पैर की एक अंगुली में) शृंगार के तौर पर उपयोग में लाए जा रहे हैं।
![]() |
| सौंदर्य पेटिका धारी वनवासिनी दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा बस्तर |
वर्तमान में देखें तो भारत में भी षोडश शृंगार में सम्मिलित कुछ वस्तुओं में परिवर्तन हुआ है। विदेशों की अपेक्षा अत्यधिक परिवर्तन तो यहाँ दिखाई नहीं देता। झरिया निवासी शालिनी खन्ना बताती है - कामकाजी महिलाओं में समय की कमी एवं कार्य स्थल के आवा-गमन को लेकर बदलाव आया है। वर्तमान में विवाहित महिलाएँ शैंपू, परफ़्यूम, बिंदी, लिपिस्टिक, काजल, यारुज, सिंदूर, चूड़ी, मंगलसूत्र, पायल, बिछिया, बाली, मोबाईल, घड़ी, वस्त्र (सलवार कुरती, जींस टॉप) गॉगल का प्रयोग करती हैं। काल परिवर्तन कितना भी हो जाए पर सौंदर्य के प्रति जागरुकता हमेशा बनी रहेगी। इससे पता चलता है कि षोडश शृंगार की कोई निश्चित परिभाषा या सूची नहीं है, देश काल के अनुसार उसमें बदलाव होता रहता है। वर्तमान जब कोई शिल्पकार या चित्रकार अपनी छेनी या कूंची उठाएगा तो अधिक नहीं सिर्फ़ कुछ बदलाव ही दिखाई देगें। जो भविष्य में निर्माण के समय और काल को सूचित करेगें।
शिवालयों में कीर्तिमुख अलंकरण
शिवालयों में द्वारपट, स्तंभों, भित्तियों में एक भयावह मुखाकृति बनी दिखाई देती है। इस आकृति को शिल्पकार अपनी कल्पना शक्ति के अनुसार भयावह निर्मित करते थे। देखने से प्रतीत होता है कि किसी राक्षस की प्रतिमा है। भक्तजन इस मुखाकृति को प्रणाम कर आगे बढ जाते हैं। परन्तु उनके मन में हमेशा इस मुखाकृति के प्रति कौतुहल बना रहता है। कुछ मित्र मुझसे इस आकृति के विषय में हमेशा चर्चा कर अपनी जिज्ञासा शांत करते हैं। उनका प्रश्न रहता है कि इस आकृति को शिवालयों में क्यों निर्मित किया जाता है? यह आकृति शिवालयों के साथ जैन मंदिरों के शिल्प में भी पाई जाती है। खजुराहो के पार्श्वनाथ मंदिर में भी इस मुखाकृति को मंदिर शिल्प में स्थान दिया गया है।
![]() |
| कीर्तिमुख (भीमा-कीचक) मल्हार छत्तीसगढ़ |
इस मुखाकृति को कीर्तिमुख कहा गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इसका जीवंत निर्माण लंका के प्रवेशद्वार पर शुक्राचार्य द्वारा किया गया था। वर्णन है कि शुक्राचार्य ने "रुद्र कीर्तिमुख" नाम का दारुपंच अस्त्र लंका के प्रवेशद्वार पर स्थापित किया, बाहर होने वाली प्रत्येक गतिविधि इस पर चित्रित होकर दिखाई देती थी। इसके मुख से अग्नि का गोला निकल कर शत्रु का संहार करता था। लंका में कीर्तिमुख का अस्त्र के रुप में प्रयोग किया गया। वर्तमान में हम घरो, दुकानों एवं अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर सी सी टी वी कैमरों का इस्तेमाल करते हैं, इसी तरह कीर्तिमुख अस्त्र का निर्माण कर प्रयोग किया गया था।
कीर्तिमुख के विषय में एक कथा मत्स्य पुराण अ 251 में आती है - अंधकासुर के वध के समय भगवान शंकर के ललाट से पृथ्वी पर जो स्वेद बिंदू गिरे उनसे एक भयानक आकृति का पुरुष प्रकट हुआ। जिसने अंधकगणों का रक्त पान किया, परन्तु अतृप्त ही रहा। अतृप्त होने के कारण वह भगवान शंकर का ही भक्षण करने चल दिया। इस कारण महादेवादि देवों ने इसे पृथ्वी पर सुलाकर वास्तु देवता के रुप में प्रतिष्ठित किया और उसके शरीर में सभी देवताओं ने वास किया। इसलिए यह वास्तु पुरुष या वास्तु देवता कहलाने लगा। देवताओं ने वास्तु को गृह निर्माण, वापी, कूप, तड़ाग, गरी, मंदिर, बाग बगीचा, जीर्णोद्धार, यग्य मंडप निर्माणादि में पूजित होने का वरदान दिया। तब से यह वास्तु देवता के रुप में पूजित एवं प्रतिष्ठित है।
![]() |
| कीर्तिमुख (ताला) छत्तीसगढ़ |
एक अन्य कथा में बताया गया है कि प्राचीन काल में जलंधर नामक एक महाशक्तिशाली दैत्य उत्पन्न हुआ जिसने अपनी तपस्या के बल पर ब्रह्मा को खुश करके कई वरदान प्राप्त कर लिये। इसने जंगल के मध्य अपने लिए एक भव्य भवन का निर्माण कराया और एक राक्षसी सेना भी तैयार कर ली। इससे इसकी ताकत बहुत बढ़ गई और मन में अहंकार भी समा गया। अब वह प्रतिदिन संध्या समय एक सुंदर रथ पर सवार होकर भ्रमण के लिए निकलता था और ऐसे-ऐसे कार्यों को अंजाम दे डालता था जिससे प्रजा त्राहि-त्राहि कर उठती थी।
इसी क्रम में एक दिन जलंधर रथ पर सवार होकर घूम रहा था कि एक मादक सुगंध उसके नाक में समा गई जिससे वह चकित हो उठा और चतुर्दिक दृश्यों को निहारने पर एक अद्वितीय सुंदर नारी जंगल में घूमती हुई दिखाई दी। तब वह चौंका – कौन है यह नारी? इस सुन्दरी के अंदर तो सृष्टि की सारी सुघड़ता सिमटी जैसी दिखाई दे रही है। ‘यह कैलासपति शिव की पत्नी पार्वती है’, एक सेवक ने उत्तर दिया तो वह हंस पड़ा, ‘भला उस बूढ़े शिव के साथ इस अनुपम सुन्दरी का क्या काम? मैं इसे अपनी पटरानी बनाऊंगा।’ दैत्य ने मन में ठान लिया और बेचैन होकर महल में वापस लौट आया फिर अपने एक सेवक को दूत बनाकर शिव के पास भेजा।
![]() |
| कीर्तिमुख पंचायतन शिवालय सुरंग टीला सिरपुर छत्तीसगढ़ |
इस सेवक का नाम रोनू था। वह कैलास पर्वत पर पहुंचा तो भोलेनाथ योगसाधना में मगन थे। इससे रोनू तनिक सहमा किंतु शीघ्र अपनी राक्षसी प्रवृत्ति के अनुकूल जोर-जोर से चिल्लाने लगा, ‘आप पार्वती को तुरंत हमारे हवाले करें क्योंकि दैत्यपति जलधर को वह पसंद आ गयी है।’ शिव कुछ सुन नहीं पाये क्योंकि उनकी आंखें मुंदी थीं और पूरा शरीर एकदम स्थिर था। मगर रोनू का हठ तो पराकाष्ठा पर पहुंच गया और अपनी बात चिल्ला-चिल्ला कर बताने लगा। उसकी चिल्लाहट से शिव की तंद्रा टूट गयी और और उन्होंने रोनू की तरफ लाल-लाल आंखों से देखा फिर क्रोध से अपने त्रिनेत्र खोल लिये। इस त्रिनेत्र के खुलते ही आक्रोश की एक रक्तिम धारा बहने लगी जिससे एक विचित्र जीव पैदा हो गया।
इस जीव के चेहरे का आकार बाघ पशु के समान चौड़ा एवं मजबूत था जबकि हाथ-पैर रस्सी की भांति पतला तथा छिन्न। यह जीव जन्म लेते ही भूख-भूख चिल्लाने लगा और रोनू की ओर लपका। वह शिव के चरणों में गिर पड़ा और प्राण रक्षा के लिए गुहार लगाने लगा। रोनू के गिड़गिड़ाने से शिव को दया आ गयी और उन्होंने माफ कर दिया, पर उस जीव की भूख को मिटाना आवश्यक था। इससे शिव सोच में पड़ गये किंतु शीघ्र ही इस जीव का नामकरण कीर्तिमुख किया फिर प्रेमपूर्ण दृष्टि से निहारते हुए समझाया – पुत्र कीर्तिमुख, जब तक भोजन का प्रबंध नहीं होता तब तक अपने ही हाथ-पैर खाकर भूख मिटा लो।
![]() |
| कीर्तिमुख कंसुवा शिवालय कोटा (फ़ोटो - रिंकेश अग्रवाल कोटा) |
बस फिर क्या कहना था, कीर्तिमुख अपने ही हाथ-पैर पर टूट पड़ा और पेट-पीठ भी खा गया। इसके बाद गर्दन की ओर बढ़ा तो शिव ने रोकते हुए कहा पुत्र कीर्तिमुख, तुम्हारा जीवित रहना आवश्यक है ताकि मेरी कुटिया की सुरक्षा होती रहे अत: तुम द्वार पर नियुक्त हो जाओ। शिव से आदेश पाकर कीर्तिमुख इनके द्वार का प्रहरी बन गया और अपने जीवन को धन्य कर लिया। इस जीव के अंदर शिव-मस्तिष्क का कल्याण समाहित है, इसलिए शिवालयों में इसकी दैत्यनुमा आकृति बनाने की परम्परा है और यह भी मान्यता है कि जो व्यक्ति कीर्तिमुख की पूजा करके शिवालय में प्रवेश करता है उसकी प्रार्थना शिव तुरंत सुनते हैं। इसी मान्यता स्वरुप शिवालयों में कीर्तिमुख का निर्माण किया जाता है।












































































































No comments:
Post a Comment
Note: Only a member of this blog may post a comment.