जब भी कभी हम दिल्ली के विषय में या वहाँ घूमने , देखने की जगहों के विषय
में बात करते हैं तब बस कुछ गिने चुने नाम ही जहन में आते हैं जैसे लाल
किला , जंतर मंतर , क़ुतुब मीनार ! लेकिन सच कहा जाए तो दिल्ली में देखने को
इतना कुछ है कि आप विस्मित हो जायेंगे कि अरे ! इतना सब कुछ है यहाँ ,
इसके बारे में तो हमें पता ही नहीं था ! लेकिन इसमें आपकी कोई गलती नहीं है
, असल में हमारा ध्यान उधर ही जाता है जिधर सरकार चाहती है ! मतलब जिन
जगहों को सरकार ने सुधार दिया है , जहां व्यवस्था कर दी गयी है , जो
प्रचलित हैं हम वहीँ तक जा पाते हैं ! लेकिन अगर आप इंटरनेट पर सर्च करेंगे
तो एक बड़ा खजाना आपके हाथ लगेगा ऐसी जगहों का जहाँ आप एक बार जरुर जाना
चाहेंगे ! मैंने कोशिश करी है आपको ऐसी ही जगहों के विषय में बताने की और
आपको वहाँ तक इंटरनेट के माध्यम से ले जाने की ! आइये चलते हैं:
महाराज अग्रसेन की बावली :
पहले जमाने में राजा महाराजा पानी इकठ्ठा करने के लिए सीढ़ी दार कुँए बनवाया
करते थे जिनमें पानी को महीनों तक सुरक्षित रखा जा सके । इन्हीं सीढ़ीदार
कुओं को बावली कहा जाता है । पश्चिम भारत में यानि राजस्थान और गुजरात में
बहुत सी बावली आज भी हैं लेकिन दिल्ली में बहुत कम ! दिल्ली में खारी बावली
का नाम प्रचलित है , लेकिन दरयागंज के इलाके में स्थित यह बावली अब गायब
है ! लेकिन नाम चलता है खारी बावली ! अब वहाँ प्रकाशकों की दुकानें और
प्रतिष्ठान हैं ! एक है राजाओं की बावली जो दिल्ली के मेहरौली इलाके में है
, इसको बहुत ढूँढा लेकिन असफल रहा । बस फिर एक ही बावली मिली , महाराज
अग्रसेन की बावली ! ऐसा कहा जाता है कि इस बावली को महाराज अग्रसेन
(उग्रसेन भी कहा जाता है ) ने बनवाया था और चौदहवीं शताब्दी में अग्रवाल
समाज ने इसका पुनुर्द्धार कराया !
इस बावली तक पहुँचने के लिए बहुत बेहतर रास्ता मण्डी हाउस मेट्रो स्टेशन से
बाहर निकलकर बाराखम्बा रोड से निकलने वाले हैली रोड पर है । यह पूरा इलाका
नई दिल्ली के कनॉट प्लेस के आसपास का है । नजदीक ही जंतर मंतर है इसलिए
ढूंढने में ज्यादा परेशानी नहीं होती । सुन्दर जगह है आप को अच्छा लगेगा
वहाँ पहुंचकर , हालाँकि आजकल ये ऐतिहासिक स्थल से ज्यादा लव पॉइंट ज्यादा
मालुम पड़ता है ।
नेशनल म्यूजियम ऑफ़ नेचुरल हिस्ट्री :
मण्डी हाउस मेट्रो स्टेशन के ही नजदीक एक और स्थान है जो आपका मन मोह लेगा !
ये है नेशनल म्यूजियम ऑफ़ नेचुरल हिस्ट्री । ये म्यूजियम और दूसरे म्यूजियम
से कुछ हटकर है । इस म्यूजियम में आप जीवन से जुड़े तथ्य और आस पास की
जलवाऊ , पशु पक्षियों से मानव के रिश्ते को बहुत ही सटीक तरीके से प्रस्तुत
किया गया है ! इस म्यूजियम में वृक्ष बचाने के लिए हुए चिपको आंदोलन को भी
चित्रों के माध्यम से बेहतर तरीके से परिभाषित किया है !
मण्डी हाउस से निकलकर आप जैसे ही तानसेन मार्ग पर पहुंचेंगे तो सामने ही
आपको फिक्की बिल्डिंग दिखाई देगी , उसी बिल्डिंग में स्थित है ये अपने तरह
का विचित्र म्यूजियम । इस म्यूजियम को के के बिरला ने पूर्व प्रधानमन्त्री
श्रीमती इंदिरा गांधी के कहने पर बनवाया ! असल में सन 1972 ईस्वी में
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी , आज़ादी के 25 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष में कुछ
विशेष करना चाहती थीं और इसके लिए उन्होंने भारतीय जीवन और भारतीय व्यक्ति
के जंगल और वन्य जीवों से सम्बन्ध को दिखाने के लिए एक प्रोजेक्ट शुरू
करने के विषय में सोचा और उसका प्रतिफल है ये आज का म्यूजियम !
ज़हाज महल :
ज़हाज़ महल वास्तव में मुसाफिरों के लिए एक सराय के रूप में बनाया गया था !
महरौली इलाके में स्थित ज़हाज़ महल को 1452 से लेकर 1526 ईस्वी तक चले लोधी
सल्तनत में बनवाया गया ! उस वक्त अफगानिस्तान , अरब , इराक आदि मुस्लिम
देशों से हिन्दुस्तान आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए रुकने के स्थान के
रूप में बनवाया गया जहाज महल , इसके चारों ओर बने जलाशय में इसकी परछाई
जहाज की तरह की दीखती थी , इसलिए इसे जहाज महल कहा गया ।
ज़हाज़ महल , हर साल अक्टूबर में होने वाले प्रोग्राम "फूल वालों की सैर " के
लिए भी विख्यात है । इस कार्यक्रम में फूल विक्रेता फूलों से बने पंखों को
सजाकर महरौली से यात्रा प्रारम्भ करते हैं और सर्वप्रथम योगमाया के मंदिर
में श्रद्धा पूर्वक फूलों से बना पंखा अर्पित करते हैं, वहाँ से चलने के
बाद ये यात्रा हज़रत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की मज़ार पर चादर और फूल
अर्पित करने के साथ समाप्त होती है ! इस यात्रा को अकबर शाह द्वितीय ने सन
1820 में शुरू कराया लेकिन सन 1942 में अंग्रेज़ों ने इस पर प्रतिबन्ध लगा
दिया ! फिर सन 1961 ईस्वी में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इस प्रथा को
दोबारा शुरू किया जो बदस्तूर जारी है । इस कार्यक्रम में अक्टूबर में
विभिन्न प्रदेशों के लोक कलाकार अपनी अपनी प्रस्तुति जैसे नृत्य , नाटक और
कवालियों का कार्यक्रम पेश करते हैं !
इस जगह तक आसानी से पहुँचा जा सकता है ! राजीव चौक मेट्रो स्टेशन से येलो
लाइन जो गुडगाँव तक जाती है , वो मेट्रो लीजिये और छतरपुर मेट्रो स्टेशन
उतरिये ! लगभग 10 मिनट की वाल्किंग डिस्टेंस पर है ज़हाज़ महल ! इस जगह को
अंधेरिया मोड़ भी कहते हैं !
तो आज बस इतना ही ! कुछ और जगहें आएँगी इस लिस्ट में थोडा इंतज़ार करिये !
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| दिल्ली के आईटीओ पर लगी हनुमान जी की मूर्ति |
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| महाराज अग्रसेन की बावली |
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| महाराज अग्रसेन की बावली |
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| महाराज अग्रसेन की बावली |
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| महाराज अग्रसेन की बावली |
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| नेशनल म्यूजियम ऑफ़ नेचुरल हिस्ट्री में एक सींग वाला गैंडा |
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| जानवरों की खाल से बने कपडे , जिन्हें पहनकर हम इतराते हैं |
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| अपने स्वार्थ के लिए हमने पेड़ों को भी नहीं बक्शा |
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| चिपको आंदोलन को दिखाते चित्र |
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| चिपको आंदोलन को दिखाते चित्र |
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| ज़हाज महल |
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| ज़हाज महल |
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ज़हाज महल
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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरु से पढ़ने के लिये
यहाँ करें
कभी कभी जब बाहर
घुमक्कडी करने के लिये समय न मिले तो अपने आसपास के स्थानों को भी देख आना
चाहिये ! 1 मई को पत्नी को एम्स के डॉक्टरों ने ऑपरेशन के लिये भर्त्ती तो
कर लिया लेकिन ऑपरेशन नही किया ! 2 मई भी इसी इंतज़ार में चला गया और जब ये
पता चला कि अब सोमवार यानि 5 मई को ही ऑपरेशन हो सकेगा तो उठाया अपना कैमरा
और निकल लिया दिल्ली के दिल देखने ! बहुत तेज धूप थी, असहनीय ! दिल्ली में
ठण्ड भी कड़ाके की पड़ती है और गर्मी भी कड़ाके की ! लेकिन जब जाना है तो
जाना ही है !
आदम खान का मकबरा :
मोबाइल
में मैप देखा तो महरौली इलाके में स्थित आदम खान का मक़बरा ज्यादा नजदीक लगा
! यानि क़ुतुब मीनार मेट्रो स्टेशन पर उतरकर थोड़ा ही पैदल चलना पड़ेगा !
मैट्रो स्मार्ट कार्ड हमेशा ही पॉकेट में होता है , तो न टिकेट के लिये
लाइन में लगने की दिक्कत और न कोई इंतज़ार ! क़ुतुब मीनार मैट्रो स्टेशन
पहुँचकर बाहर निकला और पता किया तो असलियत समझ आई कि बेटा इतना भी नजदीक
नहीं है कि तुम आदम खान के मक़बरे तक पैदल चले जाओ ! और वो भी इतनी गर्मी
में ! खैर क़ुतुब मीनार तक बस ले ली पाँच रूपये किराया लगा और फ़िर पैदल पैदल
ही निकल लिया आदम खान का मक़बरा देखने !
आदम खान का
मकबरा अगर कहा जाये तो क़ुतुब मीनार के बिल्कुल पीछे है लेकिन वहां तक आने
का कष्ट न सैलानी करते हैं और न भारत सरकार का एएसआइ ! इसलिए क़ुतुब मीनार
जितना सुन्दर लगता है आदम खान का मकबरा उतना ही गंधियाता है !
किसी के एक आँसू पर हज़ार दिल धड़कते हैँ
किसी का उम्र भर रोना यूं ही बेकार जाता है !!
इतिहास में थोड़ी सी
भी रुचि रखने वाले जानते हैं कि आदम खान , महामंगा का बेटा और अकबर का
सिपहसालार था ! लेकिन जब आदम खान ने अकबर के विश्वस्त अतगा खान की हत्या कर
दी तो अकबर ने उसे दो बार छत से फैंक कर मारने का फरमान जारी कर दिया ! और
ये खबर अकबर ने स्वयं महामंगा को सुनाई ! इस खबर के बाद महामंगा भी 40 दिन
के बाद स्वर्ग सिधार गयी !
ये
मक़बरा , दिल्ली के महरौली इलाके में स्थित विश्व प्रसिद्ध कुतुबमीनार के
उत्तर में स्थित है ! ज्यादातर स्थानीय लोग इसे भूलभुलैया के नाम से भी
जानते हैं ! सन 1561 ईस्वी में बने इस मकबरे में ही आदम खान और उस की माँ महामंगा की कब्रें बनाई गईं !
लेकिन सन 1830 में एक ब्लैक नामक अँगरेज़
ने मकबरे को अपना निवास बना लिया और कब्रों को वहाँ से हटवा दिया ,
जिस जगह पर आदम और महामंगा की क़ब्रें हुआ करती थीं उस जगह को ब्लैक ने
डाइनिंग हॉल बना लिया ! ब्लैक की मौत के बाद भी ये मक़बरा कभी पुलिस थाने के
रूप में और कभी डाकखाने के रुप में प्रयोग में लाया जाता रहा ! आखिर लार्ड
कर्जन के आदेश के बाद इस जगह को ख़ाली किया गया और आदम खान की कब्र को वापस
लाया गया ! लेकिन महामंगा की कब्र कभी नही आई !
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| आदम खान का मक़बरा |
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| आदम खान का मक़बरा |
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| आदम खान का मक़बरा , दूसरे कौण से |
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| आदम खान का मक़बरा , दूसरे कौण से |
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| आदम खान के मक़बरे का बाहरी हिस्सा |
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| आदम खान के मक़बरे का अंदरूनी हिस्सा |
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| कुतुब काम्प्लेक्स में पहले कभी समय बताने वाला डायल |
कुतुब काम्प्लेक्स में पहले कभी समय बताने वाला डायल
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आदम खान के मक़बरे से दिखाई देता कुतुबमीनार |
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शाम के समय में कुतुबमीनार का सुन्दर चित्र |
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आदम खान के मक़बरे से दिखाई देता कुतुबमीनार |
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शाम के समय में कुतुबमीनार का सुन्दर चित्र |
भारत की आज़ादी की लड़ाई में गाँव से लेकर शहर तक और अमीर से लेकर गरीब तक
सबने अपने अपने हिसाब और अपनी हिम्मत के साथ अपना योगदान दिया लेकिन आज अगर
इधर उधर कहीं भी नज़र उठा के देखिये तो आपको ऐसा लगेगा कि पूरी आज़ादी की
लड़ाई सिर्फ एक परिवार ने लड़ी हो , और उसी परिवार ने आज़ादी के बाद भारत पर
अघोषित कब्ज़ा भी कर लिया ! आप उस परिवार को कांग्रेस कह सकते हैं या गांधी
नेहरू परिवार कह सकते हैं ! मुझे दोनों में कोई अंतर नहीं मालुम पड़ता ,
शायद आपको कोई अंतर लगता हो !
पिछले सप्ताह कॉन्ग्रेसपुर दिल्ली में राजघाट सहित अन्य कांग्रेसी नेताओं
की समाधियाँ देखने का मौका मिला ! जितनी जगह और जितना पैसा इन पर खर्च हुआ
है , एक गरीब देश भारत के लिए बहुत गंभीर बात है ! लेकिन क्यूंकि ये देश एक
परिवार की जागीर रहा है तो उन्हें ये अधिकार मिल गया था कि वो जैसे चाहें
जनता के पैसे का इस्तेमाल करें ! अगर इनकी समाधी बनाने का इतना ही शौक और
इतना ही जरुरी था तो हर समाधि को अलग अलग बनाने की जगह एक साथ बनाया जा
सकता था !
आइये इनके विषय में थोड़ा जानकारी ले लेते हैं ! राजघाट पहले पुरानी दिल्ली (
शाहजहानाबाद ) का यमुना नदी के किनारे ऐतिहासिक घाट हुआ करता था और इसी के
नाम से दरयागंज के पूर्व का स्थान राजघाट गेट कहलाता था ! बाद में जब
महात्मा गांधी की समाधि बनाई गयी तो इसे राजघाट नाम दे दिया गया !
नाम समाधि का नाम क्षेत्रफल (एकड़ में )
महात्मा गांधी राजघाट 44. 35
जवाहर लाल नेहरू शान्तिवन 52. 60
लाल बहादुर शास्त्री विजय घाट 40 . 0
संजय गांधी ------------- --------------
इंदिरा गांधी शक्ति स्थल 45 . 0
जगजीवन राम समता स्थल 12. 5
चौ. चरण सिंह किसान घाट 19 . 0
राजीव गाँधी वीर भूमि 15. 0
ज्ञानी जैल सिंह एकता स्थल 22 . 56
और लोगों की भी समाधियाँ वहां हैं लेकिन वो सब ऐसे लोग हैं जो कभी न कभी या
तो कांग्रेस के चमचे रहे हैं या फिर अपनी इज्जत ईमान सब छोड़कर सत्ता के
लालच में कांग्रेस का पट्टा अपने गले में डाल कर घूमते रहे ! लेकिन मेरे
कैमरे की बैटरी ख़त्म हो गयी तो मैं वापिस आ गया !
महाभारत काल की कथा सबको पता है कि जब गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य को धनुर
विद्या सिखाने के लिए मना कर दिया तब एकलव्य ने गुरु द्रोण की मिट्टी की
प्रतिमा बनाकर उसके समक्ष ही , उस प्रतिमा को साक्षात् गुरु मानकर तीर
चलाने की शिक्षा ली ! पिछले दिनों मुझे उसी गुरु द्रोण की नगरी दनकौर जाने
का अवसर प्राप्त हुआ ! शनिवार और रविवार दो दिन की कॉलेज की छुट्टी थी तो
सोचा मौसम भी अच्छा है , देख कर आया जाए !
दनकौर बहुत छोटा सा क़स्बा है ! दिल्ली से करीब 40 किलोमीटर और ग्रेटर
नॉएडा से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर बसा ये क़स्बा आम भारतीय कस्बों जैसा
ही शांत दीखता है ! ग्रेटर नॉएडा और नॉएडा उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर
जनपद में आते हैं और दनकौर भी इसी जनपद में है ! जाने के लिए आप ग्रेटर
नॉएडा के परी चौक से कासना होते हुए जा सकते हैं या फिर अगर अपना व्हीकल है
तो आगरा जाने वाले यमुना एक्सप्रेसवे से जाना ज्यादा बेहतर है ।
एक्सप्रेसवे से गलगोटिया यूनिवर्सिटी के सामने से कट लीजिये और बस कुछ ही
दूर दनकौर पहुँच जाइये । दनकौर ऐसा स्थान है जहां आप 2 घंटे में ही पूरा
क़स्बा आराम से देख लेंगे ।
असल में ये द्रोण सिटी नहीं है , यहाँ एकलव्य ने मूर्ती की स्थापना
करके गुरु द्रोण को साक्षात् मानकर धनुर विद्या सीखी थी इसलिए मुझे लगता है
इसका नाम एकलव्य सिटी होना चाहिए था लेकिन द्रोण सिटी ही कहते हैं ! इस
कसबे को पर्यटन स्थल बनाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे श्री पंकज कौशिक
कहते हैं कि असल में जब एकलव्य यहाँ शिक्षारत था तब एक बार गुरु द्रोण अपने
शिष्यों के साथ इधर से निकल रहे थे , उनके रास्ते में एक कुत्ता उन पर
भौंक रहा था । एकलव्य वहीँ कहीं जंगल में था , वो गुरु द्रोण को पहिचानता
था , उसे ये देखकर बहुत गुस्सा आया कि एक कुत्ता उसके गुरु पर भौंक रहा है
तो उसने अपने बाणों से उस कुत्ते का मुंह भर दिया जिससे उस कुत्ते का मुंह
खुला का खुला रह गया । इसी मान्यता को सिद्ध करता हुआ एक गाँव भी है पास
में जिसका नाम है मुँहफाड़ । उसी घटना के बाद गुरु द्रोण को एकलव्य और उसकी
धनुर विद्द्या के विषय में पता चला ।
दनकौर में गुरु द्रोण को समर्पित एक खूबसूरत मंदिर है जहां गुरु
द्रोणाचार्य की वो मूर्ति भी है जो एकलव्य ने बनाई थी लेकिन ये मूर्ति
मिट्टी की नहीं पत्थर की है ! मंदिर परिसर में ही एकलव्य पार्क भी है जो
रखरखाव की उपेक्षा झेल रहा है । हालाँकि उसके दरवाजे बंद रहते हैं लेकिन
फिर भी एक कोशिश करी कि कुछ फ़ोटो ले लिए जाएँ ! मेरे साथ मेरा साथी राजेश
रमन भी था और मेरा स्टूडेंट कुशाग्र कौशिक भी था । कुशाग्र दनकौर का ही है
इसलिए उसे पहले ही सूचित कर दिया था जिससे वो हमारी कुछ मदद कर सके और उसने
सच में पूरी मदद करी । धन्यवाद कुशाग्र
दनकौर में एक पीर बाबा की मज़ार है , जैसा कि कुशाग्र ने बताया कि उर्स
के समय यहाँ बाहर के देशों तक से भी जायरीन आते हैं और जो मन्नत इस पीर पर
मांगी जाती है पूरी होती है । मेरी कोई मन्नत ही नहीं है तो क्या मांगता ?
खैर ! अगर आप दिल्ली या आस पास से हैं तो कुछ घंटे का सफ़र तय करके यहाँ तक
आसानी से पहुंचा जा सकता है ! और अगर आपके पास समय है तो थोड़ी ही दूर यानि
करीब 10 -12 किलोमीटर की दूरी पर रावण के पिता द्वारा स्थापित शिवलिंग भी
है जहां एक मंदिर भी है ! इस गाँव का नाम बिसरख है !
आइये फोटो देखते हैं :
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| एकलव्य द्वारा बनाई गयी गुरु द्रोण की मूर्ति |
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| गुरु द्रोण की मूर्ति |
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| गुरु द्रोण की आरती |
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| गुरु द्रोण का मंदिर |
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| मंदिर परिसर में लगी एकलव्य की प्रतिमा |
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| ग्रेटर नॉएडा का पारी चौक |
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| ग्रेटर नॉएडा का पारी चौक |
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| ग्रेटर नॉएडा के परी चौक पर सुन्दर परी |
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| ग्रेटर नॉएडा के परी चौक पर सुन्दर परी |
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बिसरख गाँव में रावण के पिता द्वारा स्थापित शिव मंदिर |
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| बिसरख गाँव में रावण के पिता द्वारा स्थापित शिव लिंग |
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दनकौर में स्थित एक सुन्दर मजार |
" ये दिल्ली " देखी है आपने ?
जब भी कभी हम दिल्ली के विषय में या वहाँ घूमने , देखने की जगहों के विषय
में बात करते हैं तब बस कुछ गिने चुने नाम ही जहन में आते हैं जैसे लाल
किला , जंतर मंतर , क़ुतुब मीनार ! लेकिन सच कहा जाए तो दिल्ली में देखने को
इतना कुछ है कि आप विस्मित हो जायेंगे कि अरे ! इतना सब कुछ है यहाँ ,
इसके बारे में तो हमें पता ही नहीं था ! लेकिन इसमें आपकी कोई गलती नहीं है
, असल में हमारा ध्यान उधर ही जाता है जिधर सरकार चाहती है ! मतलब जिन
जगहों को सरकार ने सुधार दिया है , जहां व्यवस्था कर दी गयी है , जो
प्रचलित हैं हम वहीँ तक जा पाते हैं ! लेकिन अगर आप इंटरनेट पर सर्च करेंगे
तो एक बड़ा खजाना आपके हाथ लगेगा ऐसी जगहों का जहाँ आप एक बार जरुर जाना
चाहेंगे ! मैंने कोशिश करी है आपको ऐसी ही जगहों के विषय में बताने की और
आपको वहाँ तक इंटरनेट के माध्यम से ले जाने की ! आइये चलते हैं:
महाराज अग्रसेन की बावली :
पहले जमाने में राजा महाराजा पानी इकठ्ठा करने के लिए सीढ़ी दार कुँए बनवाया
करते थे जिनमें पानी को महीनों तक सुरक्षित रखा जा सके । इन्हीं सीढ़ीदार
कुओं को बावली कहा जाता है । पश्चिम भारत में यानि राजस्थान और गुजरात में
बहुत सी बावली आज भी हैं लेकिन दिल्ली में बहुत कम ! दिल्ली में खारी बावली
का नाम प्रचलित है , लेकिन दरयागंज के इलाके में स्थित यह बावली अब गायब
है ! लेकिन नाम चलता है खारी बावली ! अब वहाँ प्रकाशकों की दुकानें और
प्रतिष्ठान हैं ! एक है राजाओं की बावली जो दिल्ली के मेहरौली इलाके में है
, इसको बहुत ढूँढा लेकिन असफल रहा । बस फिर एक ही बावली मिली , महाराज
अग्रसेन की बावली ! ऐसा कहा जाता है कि इस बावली को महाराज अग्रसेन
(उग्रसेन भी कहा जाता है ) ने बनवाया था और चौदहवीं शताब्दी में अग्रवाल
समाज ने इसका पुनुर्द्धार कराया !
इस बावली तक पहुँचने के लिए बहुत बेहतर रास्ता मण्डी हाउस मेट्रो स्टेशन से
बाहर निकलकर बाराखम्बा रोड से निकलने वाले हैली रोड पर है । यह पूरा इलाका
नई दिल्ली के कनॉट प्लेस के आसपास का है । नजदीक ही जंतर मंतर है इसलिए
ढूंढने में ज्यादा परेशानी नहीं होती । सुन्दर जगह है आप को अच्छा लगेगा
वहाँ पहुंचकर , हालाँकि आजकल ये ऐतिहासिक स्थल से ज्यादा लव पॉइंट ज्यादा
मालुम पड़ता है ।
नेशनल म्यूजियम ऑफ़ नेचुरल हिस्ट्री :
मण्डी हाउस मेट्रो स्टेशन के ही नजदीक एक और स्थान है जो आपका मन मोह लेगा !
ये है नेशनल म्यूजियम ऑफ़ नेचुरल हिस्ट्री । ये म्यूजियम और दूसरे म्यूजियम
से कुछ हटकर है । इस म्यूजियम में आप जीवन से जुड़े तथ्य और आस पास की
जलवाऊ , पशु पक्षियों से मानव के रिश्ते को बहुत ही सटीक तरीके से प्रस्तुत
किया गया है ! इस म्यूजियम में वृक्ष बचाने के लिए हुए चिपको आंदोलन को भी
चित्रों के माध्यम से बेहतर तरीके से परिभाषित किया है !
मण्डी हाउस से निकलकर आप जैसे ही तानसेन मार्ग पर पहुंचेंगे तो सामने ही
आपको फिक्की बिल्डिंग दिखाई देगी , उसी बिल्डिंग में स्थित है ये अपने तरह
का विचित्र म्यूजियम । इस म्यूजियम को के के बिरला ने पूर्व प्रधानमन्त्री
श्रीमती इंदिरा गांधी के कहने पर बनवाया ! असल में सन 1972 ईस्वी में
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी , आज़ादी के 25 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष में कुछ
विशेष करना चाहती थीं और इसके लिए उन्होंने भारतीय जीवन और भारतीय व्यक्ति
के जंगल और वन्य जीवों से सम्बन्ध को दिखाने के लिए एक प्रोजेक्ट शुरू
करने के विषय में सोचा और उसका प्रतिफल है ये आज का म्यूजियम !
ज़हाज महल :
ज़हाज़ महल वास्तव में मुसाफिरों के लिए एक सराय के रूप में बनाया गया था !
महरौली इलाके में स्थित ज़हाज़ महल को 1452 से लेकर 1526 ईस्वी तक चले लोधी
सल्तनत में बनवाया गया ! उस वक्त अफगानिस्तान , अरब , इराक आदि मुस्लिम
देशों से हिन्दुस्तान आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए रुकने के स्थान के
रूप में बनवाया गया जहाज महल , इसके चारों ओर बने जलाशय में इसकी परछाई
जहाज की तरह की दीखती थी , इसलिए इसे जहाज महल कहा गया ।
ज़हाज़ महल , हर साल अक्टूबर में होने वाले प्रोग्राम "फूल वालों की सैर " के
लिए भी विख्यात है । इस कार्यक्रम में फूल विक्रेता फूलों से बने पंखों को
सजाकर महरौली से यात्रा प्रारम्भ करते हैं और सर्वप्रथम योगमाया के मंदिर
में श्रद्धा पूर्वक फूलों से बना पंखा अर्पित करते हैं, वहाँ से चलने के
बाद ये यात्रा हज़रत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की मज़ार पर चादर और फूल
अर्पित करने के साथ समाप्त होती है ! इस यात्रा को अकबर शाह द्वितीय ने सन
1820 में शुरू कराया लेकिन सन 1942 में अंग्रेज़ों ने इस पर प्रतिबन्ध लगा
दिया ! फिर सन 1961 ईस्वी में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इस प्रथा को
दोबारा शुरू किया जो बदस्तूर जारी है । इस कार्यक्रम में अक्टूबर में
विभिन्न प्रदेशों के लोक कलाकार अपनी अपनी प्रस्तुति जैसे नृत्य , नाटक और
कवालियों का कार्यक्रम पेश करते हैं !
इस जगह तक आसानी से पहुँचा जा सकता है ! राजीव चौक मेट्रो स्टेशन से येलो
लाइन जो गुडगाँव तक जाती है , वो मेट्रो लीजिये और छतरपुर मेट्रो स्टेशन
उतरिये ! लगभग 10 मिनट की वाल्किंग डिस्टेंस पर है ज़हाज़ महल ! इस जगह को
अंधेरिया मोड़ भी कहते हैं !
तो आज बस इतना ही ! कुछ और जगहें आएँगी इस लिस्ट में थोडा इंतज़ार करिये !
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| दिल्ली के आईटीओ पर लगी हनुमान जी की मूर्ति |
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| महाराज अग्रसेन की बावली |
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| महाराज अग्रसेन की बावली |
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| महाराज अग्रसेन की बावली |
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| महाराज अग्रसेन की बावली |
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| नेशनल म्यूजियम ऑफ़ नेचुरल हिस्ट्री में एक सींग वाला गैंडा |
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| जानवरों की खाल से बने कपडे , जिन्हें पहनकर हम इतराते हैं |
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| अपने स्वार्थ के लिए हमने पेड़ों को भी नहीं बक्शा |
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| चिपको आंदोलन को दिखाते चित्र |
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| चिपको आंदोलन को दिखाते चित्र |
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| ज़हाज महल |
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| ज़हाज महल |
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| ज़हाज महल |
कॉन्ग्रेसपुर दिल्ली
भारत की आज़ादी की लड़ाई में गाँव से लेकर शहर तक और अमीर से लेकर गरीब तक
सबने अपने अपने हिसाब और अपनी हिम्मत के साथ अपना योगदान दिया लेकिन आज अगर
इधर उधर कहीं भी नज़र उठा के देखिये तो आपको ऐसा लगेगा कि पूरी आज़ादी की
लड़ाई सिर्फ एक परिवार ने लड़ी हो , और उसी परिवार ने आज़ादी के बाद भारत पर
अघोषित कब्ज़ा भी कर लिया ! आप उस परिवार को कांग्रेस कह सकते हैं या गांधी
नेहरू परिवार कह सकते हैं ! मुझे दोनों में कोई अंतर नहीं मालुम पड़ता ,
शायद आपको कोई अंतर लगता हो !
पिछले सप्ताह कॉन्ग्रेसपुर दिल्ली में राजघाट सहित अन्य कांग्रेसी नेताओं
की समाधियाँ देखने का मौका मिला ! जितनी जगह और जितना पैसा इन पर खर्च हुआ
है , एक गरीब देश भारत के लिए बहुत गंभीर बात है ! लेकिन क्यूंकि ये देश एक
परिवार की जागीर रहा है तो उन्हें ये अधिकार मिल गया था कि वो जैसे चाहें
जनता के पैसे का इस्तेमाल करें ! अगर इनकी समाधी बनाने का इतना ही शौक और
इतना ही जरुरी था तो हर समाधि को अलग अलग बनाने की जगह एक साथ बनाया जा
सकता था !
आइये इनके विषय में थोड़ा जानकारी ले लेते हैं ! राजघाट पहले पुरानी दिल्ली (
शाहजहानाबाद ) का यमुना नदी के किनारे ऐतिहासिक घाट हुआ करता था और इसी के
नाम से दरयागंज के पूर्व का स्थान राजघाट गेट कहलाता था ! बाद में जब
महात्मा गांधी की समाधि बनाई गयी तो इसे राजघाट नाम दे दिया गया !
नाम समाधि का नाम क्षेत्रफल (एकड़ में )
महात्मा गांधी राजघाट 44. 35
जवाहर लाल नेहरू शान्तिवन 52. 60
लाल बहादुर शास्त्री विजय घाट 40 . 0
संजय गांधी ------------- --------------
इंदिरा गांधी शक्ति स्थल 45 . 0
जगजीवन राम समता स्थल 12. 5
चौ. चरण सिंह किसान घाट 19 . 0
राजीव गाँधी वीर भूमि 15. 0
ज्ञानी जैल सिंह एकता स्थल 22 . 56
और लोगों की भी समाधियाँ वहां हैं लेकिन वो सब ऐसे लोग हैं जो कभी न कभी या
तो कांग्रेस के चमचे रहे हैं या फिर अपनी इज्जत ईमान सब छोड़कर सत्ता के
लालच में कांग्रेस का पट्टा अपने गले में डाल कर घूमते रहे ! लेकिन मेरे
कैमरे की बैटरी ख़त्म हो गयी तो मैं वापिस आ गया !
गाँधी दर्शन
जैसा कि पहले भी बात हो चुकी है कि दिल्ली में अगर आपने घूमने का प्रोग्राम
बनाया है तो आप अपने दिल को इस बात के लिए तैयार रखिये कि आप दिल्ली में
ज्यादातर दो तरह की जगहों के दर्शन करेंगे ! एक मुगलिया और एक गांधी !
दिल्ली में जैसे इनके सिवाय कुछ है ही नहीं ? है बहुत कुछ , लेकिन भारत
वर्ष के प्रथम प्रधानमंत्री और तथाकथित प्रथम परिवार ने इसके अलावा किसी और
जगह को प्रमोट ही नहीं किया और न ही करने दिया ! और जब तक आप उस जगह के
बारे में जानेंगे नहीं , पढ़ेंगे नहीं तो आप जाएंगे भी नहीं ! और ये
सिलसिला अब तक जारी है लेकिन भला हो भारत की जनता जनार्दन का कि इस बार
निज़ाम बदला है , तो उम्मीद करी जा सकती है कि भारत में और दिल्ली में नए नए
स्थान जनता के सामने आएंगे ! आइये आज एक और गांधी स्थल यानी गांधी दर्शन
चलते हैं !
रिंग रोड पर यमुना किनारे बने महात्मा गांधी की समाधि राजघाट के पास ही एक
भी दिन प्रधानमंत्री के रूप में लोकसभा का मुँह न देख पाने वाले चौधरी चरण
सिंह का समाधी स्थल "किसान घाट " भी है लेकिन वहां तक शायद ही कोई जाता हो
! जाएगा भी क्यों ? समाधि के आसपास ऊँची ऊँची घास उगी हुई है , लगता ही
नहीं कि ये किसी पूर्व प्रधानमंत्री की समाधि है ! और यही हाल पूर्व लोकसभा
अध्यक्ष मीरा कुमार के पिता और जाने माने दलित कांग्रेसी नेता बाबू जगजीवन
राम की भी है ! वो भी बेचारे अकेले पड़े हैं। नितांत अकेले , इतने बड़े
जंगल में , अकेले , डर लगता होगा उनकी आत्मा को !
बाबू जगजीवन राम की बात चली है तो मुझे कुछ याद आ रहा है ! वो शायद
स्वास्थ्यमंत्री भी रहे हैं , और जब वो स्वास्थ्यमंत्री थे तब उन्होंने
अपने कार्यकाल में गांवों में एक स्वस्थ्य योजना चलाई थी ! जिसमें गांंव के
ही किसी आदमी को CHV ( community Health worker of village ) बनाया जाता
था ! मेरे पापा भी CHV हो गए और तनख्वाह जानते हैं कितनी मिलती थी ? 50
रुपये महीना , और वो भी छह छह महीने या साल के बाद ! लेकिन दवाईयाँ जरूर
मिलती थीं , उन्ही में एक लाल दवाई भी होती थी , वो शायद चोट मोच के लिए
होती थी ! बहुत चलती थी वो दवाई ! पापा की तनख्वाह कोई मायने नहीं रखती थी
लेकिन वो इस काम के साथ साथ इंजेक्शन भी लगाना सीख गए थे और उससे कुछ कमा
लेते थे ! लोगों का भरोसा भी था उन पर इसलिए तनख्वाह से ज्यादा इंजेक्शन
वगैरह से कमा लिया करते थे ! इन्हीं दवाइयों के साथ परिवार नियोजन यन्त्र
यानी निरोध भी आया करता था , मुझे याद नहीं पड़ता की कोई उन्हें लेने भी आता
था , लेकिन उनकी सप्लाई सबसे ज्यादा थी ! कोई लेने आये या न आये लेकिन वो
हमारे काम बहुत आते थे , हम उन्हें गुब्बारे की तरह फुलाते रहते और मजे
करते रहते ! गुब्बारे लेने की औकात तो थी नहीं हमारी इसलिए ये ही हमारे
गुब्बारे हो जाया करते थे और सच कहूँ तो ये बड़े मजबूत और लम्बे होते थे !
एक और बात याद आती है , साझा करना चाहूंगा ! गांव में उस वक्त एक वृद्ध
हरिजन महिला थीं ! उनका काम नालियों की सफाई करना होता था ! सरकार की तरफ
से नहीं , गांव वालों की तरफ से ! शायद रेणुका नाम था उनका लेकिन मैंने कभी
किसी को उन्हें इस नाम से पुकारते नहीं देखा , सब उन्हें रेनुकी ही कहते
और कभी कभी तो मेरी जैसी उम्र के बच्चे रेणुकी भी नही कहते बल्कि मेंढकी कह
कह के चिढ़ाते ! लेकिन मैंने उन्हें कभी चिढ़ते हुए भी नहीं देखा ! चिढ़ती भी
कैसे ? गुस्सा करती भी कैसे ? गुस्सा करती तो सफाई के बाद उन्हें हर घर
से जो 1 -1 , 2 -2 रोटी मिल जाती थी , वो भी बंद हो जाती ! किसी के घर में
बच्चा पैदा होता तो उनके बारे न्यारे हो जाते , उन्हें उम्मीद बन जाती कि
जच्चा बच्चा के गंदे कपडे धोने के बदले उन्हें कुछ सेर गेंहू और नयी नहीं
तो कम से कम एक पुरानी धोती ही मिल जायेगी !
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