Tuesday, July 18, 2023

भानगढ़

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भानगढ़ की रत्नावती से एक मुलाकात

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रात का भोजन करने के बाद मेल और फ़ेसबुक चेक किया और बिस्तर के हवाले हो गया। लम्बी यात्रा से थका हुआ होने के कारण पता नहीं कब नींद आ गई। विचित्र सी सुगंध से नींद खुली, आँखें खोल कर देखा तो कमरे में नीली रोशनी वाला बल्ब जल रहा था। कमरे की दीवारें नीली रोशनी से नहाई हुई थी। सुगंध मेरे समीप से ही आ रही थी, एक गहरी सांस लेकर मैने सुगंध को अपने फ़ेफ़ड़ों में भर लिया और आँखें बंद कर ली। सोचा कि घर के ईर्द गिर्द बहुत पेड़ पौधे हैं, हवा के किसी झोंके से चली आई होगी। कुछ देर बाद नथुनों में भरी सुगंध असहनीय होने लगी। मैने कंबल सिर पर ओढ कर नीचे दबा लिया। सभी तरफ़ से सुरक्षित हो गया। अब सुगंध नहीं आएगी सोच कर। धीरे धीरे फ़िर नींद के आगोश में जाने लगा लेकिन सुगंध का आना निरंतर जारी था।

कुछ देर बाद कानों में फ़ुसफ़ुसाहट की आवाज सुनाई देने लगी। मैने धीरे से एक तरफ़ का कंबल हटा कर देखा तो श्रीमती जी और बालक दोनो गहरी नींद में सोए हैं। मैने कंबल सरका लिया। सोने का यत्न करने लगा। फ़ुसफ़ुसाह फ़िर शुरु हो गई, आवाज अपष्ट थी, महिला कि है या पुरुष स्वर है, कुछ समझ नहीं आ रहा था। मैने अब बाईं तरफ़ से कंबल सरका कर चेहरा उघाड़ा, सामने बड़ी खिड़की थी। खिड़की के पार बिजली की चमक दिखाई देने लगी, बादलों की गड़गड़ाहट सुनाई देने लगी। अरे! ये कैसा  मौसम बनने लगा, बेमौसम बरसात होने लगी। रह रह कर बिजली की चमक खिड़की पर पड़ कर वातावरण को और भी रहस्यमय और संदिग्ध बना रही थी। 

नीले बल्ब की मद्धम रोशनी में बिजली की चमक और बादलों की गड़गड़ाहट कहर ढा रही थी। मैंने पुन: चेहरा ढक लिया, लेकिन फ़ुसफ़ुसाहट कम नहीं हुई। सोचने लगा कि ऐसा तो कभी हुआ नहीं, पहले तो खेतों के बीच सुनसान में खाट डाल कर अकेले सो जाया करता था। आज क्या हुआ? अब दिमाग सन्नाने लगा, मैने एक झटके से कंबल फ़ेंका और उठ कर बैठ गया। एक नजर सोए हुए बालक पर डाली और जैसे ही ड्रेसिंग टेबल की ओर मुंह धुमाया तो उसके सामने धवल वस्त्रों में स्टूल पर बैठी एक गौरवर्णा दिखाई दी। नीली रोशनी में वस्त्रों की सफ़ेदी कुछ अधिक ही चमक रही थी। उसकी पीठ मेरी ओर थी। चेहरा ड्रेसिंग टेबल के शीशे की ओर था। जीरो बल्ब के प्रकाश में स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा था। मैने आँखे फ़ाड़ कर गौर से उसकी तरफ़ देखा। कमरे के सारे दरवाजे और खिड़कियाँ बंद थे। 

ये कौन है जो कमरे में घुस आई है? मैने गरदन घुमाकर श्रीमती की तरफ़ देखा, वह मजे से नींद भांज रही थी। जैसे ही मैने ड्रेसिंग टेबल की तरफ़ गरदन घुमाई, सहसा बिजली जोर से कड़की और कमरे में फ़्लेश लाईट सी रोशनी हुई, उसका चेहरा दिखा, बस देखता ही रह गया। रोंए-रोंए खड़े हो गए, कड़ाके की ठंड में पसीना निकलना शुरु हो गया। बाहर कुत्तों के रोने के स्वर सुनाई देने लगे। कुत्ते एक स्वर में लय बद्ध रुदन कर रहे थे। वह स्टूल पर मूर्तिमान बैठी थी, हिल-डुल भी नहीं रही थी। उसने सिर पर पीली ओढनी डाल रखी थी, स्वर्ण जड़ित कांचली के साथ गोटे दार घाघरा पहन रखा था। हाथों में कोहनियों तक चूड़ियाँ, माथे पर बोरला, कानों में बड़े-बड़े झुमके, नाक में नथ, गले में नौलखा और भुजाओं में बाजुबंद पहने सोने से लदी हुई राजस्थानी वेशभूषा में सौंदर्य के प्रतिमान गढ़ रही थी।

पुन: बिजली कड़की और उसका चेहरा दिखा, चौड़ा माथा, माथे पर झूलती लटें, सुंतवा नाक, भरे-भरे होंठ, बड़ी-बड़ी पैनी आँखें जैसे मुझसे कुछ कहना चाहती हों। मेरी हालत पतली हो रही थी। बिजली चमकने के बाद नीले बल्ब की रोशनी में चेहरा दिखाई नहीं देता था। अब बिजली रह रह कर चमकने लगी, उसने चेहरा मेरी तरफ़ नहीं फ़ेरा, शीशे की तरफ़ मुंह किए ही बैठी रही, वह मुझे शीशे में देख रही थी, मैं उसे। बिजली की चमक के साथ बादल फ़िर जोर से गड़गड़ाए। मैने सारे शरीर की ताकत समेट कर पूछा - तुम कौन हो, यहाँ कैसे और क्यों आई हो? उसके ओंठ हिले, और बोली - भूल गए मुझे। कुछ दिनों पहले तो मुझसे मिलने आए थे, वही हूँ मैं, जिसकी खोज में इतनी दूर से चले आए थे। कितनी प्रतीक्षा की तुम्हारी, मुझे मालूम था एक दिन तुम अवश्य आओगे। हिलते हुए होठों से सिर्फ़ बर्फ़ सा सर्द स्वर निकल रहा था। इधर मैं पसीने से तर-ब-तर हो चुका था।

मुझे याद नहीं आ रहा तुम कौन हो, मैं तुम्हे जानता ही नहीं तो तुमसे मिलने क्यों जाऊंगा? मैने उससे प्रश्न किया। बिजली फ़िर कड़की, अब बरसात शुरु हो चुकी थी, विंडो कूलर की छत पर टपकती हुई बूंदों से भी स्वर उत्पन्न होने लगा। बूंदों का आघात रह-रह कर स्वर परिवर्तित करने लगा। आज की रात कयामत की रात में बदलते जा रही थी। जीवन में जो कभी घटा नहीं उसे प्रत्यक्ष देख रहा था। उसने शीशे में ही देखते हुए कहा - "मैं रत्नावती हूँ।" चेहरे पर कोई भाव नहीं, कोई सौम्यता नहीं, कोई कोई कोमलता नहीं। ठोस सर्द चेहरा, हल्के से हिलते हुए ओंठों से वह बुदबुदाई और बिजली ऐसे जोर से कड़की कि लगा छत का कांक्रीट तोड़ कर ही भीतर आ जाएगी। लगता था कहीं आस पास ही गिरी है। बिजली के कड़कते ही बिजली भी चली गई। कमरे में घुप्प अंधेरा छा गया।

कमरे में सिर्फ़ हम दो ही थे, एक जीता जागता मनुष्य और दूसरी आभासी दुनिया से आई हुई प्रेतात्मा। सुगंध को पहचान लिया मैने। केवड़े की सुगंध थी। भानगढ़ में आज भी केवड़े की झाड़ियाँ हैं और रानी रत्नावती को केवड़े का ईत्र और सुगंधित तेल बहुत ही पसंद था। सुगंध से प्रमाणित हो गया यह रत्नावती की ही आत्मा है, जो भानगढ़ से मेरे पीछे पीछे चली आई है। बिजली रोशनी हुई और रत्नावती ने कहना शुरु किया - तुम्हारे दिमाग जो चल रहा है मैं सब जानती हूँ। अभिशप्त नगर की महारानी हूँ मैं। नगर के साथ मैं भी अभिशप्त हो गई। तुम्हें सदियों से जानती हूँ। तुम भानगढ़ के राजकवि थे, दरबार में तुम्हारे कवित्त झरोखे की ओट में बैठकर मैने सैकड़ों बार सुने। फ़िर न जाने कहाँ खो गए तुम। बहुत ढूंढा तुम्हें, सदियाँ बीत जाने पर अब मिले हो। तभी तुमसे मिलने चली आई।

मैं और राजकवि! नहीं नहीं, मैं तो एक ब्लॉगर हूँ जो लेखक होने का भ्रम पाल बैठा है। लोग दो-चार टिप्पणियाँ दे जाते हैं और जिन अखबारों को मुफ़्त में अपने पन्ने भरने होते हैं, वे मेरी ब्लॉग की पोस्ट से अपना अखबार भर लेते हैं। इससे लोगों को भी भ्रम हो गया है कि मैं लेखक हूँ - मैने हकलाते हुए कहा। रत्नावती कहने लगी - मैं तुम्हारे से मिलने खास प्रयोजन से आई हूँ, लेखक से अधिक खतरनाक ब्लॉगर होता है। वह बिना तथ्यों की छानबीन किए कुछ भी अनाप-शनाप लिख देता है अपने ब्लॉग़ पर। तुमने देखा होगा कि कई लोगों ने भानगढ़ के नाम से अफ़वाहे उड़ा रखी हैं। एक ने तो यहां तक लिख दिया कि भानगढ़ से जिंदा लौटकर आना ही मुश्किल है और जो लौटकर आया वह पागल हो जाता है।

मैं इसलिए आई हूँ कि तुम भानगढ़ की एवं मेरी कहानी को जाँच परख कर लिखोगे। जिससे लोगों के दिमाग में छाई हुई भ्रांतियाँ समाप्त हो जाएं। सारे भूत प्राण हरण नहीं करते और वो भी भानगढ़ में, कदापि नहीं। आज भी भानगढ़ के भूतों से लेकर जिंदों की भी इतनी हिम्मत नहीं कि वे मेरी हुक्म उदूली कर दें। डरो नहीं, मैं सिर्फ़ तुमसे मिलने आई थी क्योंकि तुम ही भानगढ़ के साथ न्याय कर सकते हो। अन्यथा तो अफ़वाहें इतनी अधिक उड़ा रखी है कि सत्य और असत्य का ही पता नहीं चलता।

तुम्हारे ब्लॉग पर निरंतर मेरी नजर है। वाणी गीत ने कहा था न "आप जैसे यायावार सारे रोमांच की ऐसी तैसी कर देते हैं :)" उन्हे मेरा निमंत्रण देना और कहना कि अपने साथ सारा गढ़ घुमाऊंगी, मान-मनुहार भी करुंगी और रोमांच खत्म नहीं होने दूंगी, ये मेरा पक्का वादा रहा है। अब मैं चलती हूँ, उसके इतना कहते ही फ़िर एक बार जोर से बिजली कड़की और उसके प्रकाश में मैने देखा कि स्टूल खाली था। केवड़े की सुंगध कमरे में बाकी थी। मैं बिस्तर पर बैठे हुए सुबह होने की प्रतीक्षा करता रहा । इस घटना को मैने किसी को भी नहीं सुनाया ……… आज ब्लॉग पर लिख रहा हूँ।  … इति भानगढ़ पुराण………:)
 

भानगढ के भूतों की सच्चाई

भानगढ़ का राजप्रासाद
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भानगढ़ राजस्थान के अलवर जिले में सरिस्का अभ्यारण के एक छोर पर स्थित है। इतिहास अधिक पुराना नहीं है। 16 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इसका जन्म होता है और 19 वीं शताब्दी में अवसान हो जाता है। इस समय दिल्ली पर मुगलों का शासन था और दिल्ली के तख्त पर अकबर गद्दीनशीं था। आमेर के कछवाहा राजपुत राजा भारमल ने गद्दी संभालने के बाद अकबर के दरबार में प्रवेश पाया और अपनी पुत्री हरखा बाई का विवाह अकबर से करना स्वीकार किया। विवाह के बाद राजपूतों ने इसे छोड़ दिया और हरखा बाई कभी लौट कर आमेर नहीं आई। भारमल के पुत्र राजा भगवंत दास ने संभवत: इस इलाके पर अपनी पकड़ बनाए रखने लिए इस किले का निर्माण 1573 में कराया। भारमल का प्रपौत्र एवं भगवंत दास के पुत्र राजा मानसिंह ने भी अकबर के दरबार में उच्च स्थान प्राप्त किया। 

राजप्रासाद के भग्नावशेष
भानगढ़ के बसने के बाद लगभग 300 वर्षों तक यह आबाद रहा। राजा भगवंत दास ने यह गढ़ अपने छोटे बेटे माधौ सिंह को दिया। माधौसिंह के बाद उसका पुत्र छत्र सिंह गद्दी पर बैठा। छत्रसिंह एवं उसके पुत्र 1630 के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। विक्रम संवत 1722 में इसी वंश के हरिसिंह ने गद्दी संभाली।इसके साथ ही भानगढ की चमक कम होने लगी। छत्र सिंह के बेटे अजब सिह ने समीप ही अजबगढ़ बनवाया और वहीं रहने लगा। यह समय औरंगजेब के शासन का था। औरंगजेब कट्टर पंथी मुसलमान था। उसने अपने बाप को नहीं छोड़ा तो इन्हे कहाँ छोड़ता। उसके दबाव में आकर हरिसिंह के दो बेटे मुसलमान हो गए, जिन्हें मोहम्मद कुलीज एवं मोहम्मद दहलीज के नाम से जाना गया। इन दोनों भाईयों के मुसलमान बनने एवं औरंगजेब की शासन पर पकड़ ढीली होने पर जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह ने इन्हे मारकर भानगढ़ पर कब्जा कर लिया तथा माधो सिंह के वंशजों को गद्दी दे दी।

मंगला माता मंदिर
केशवराय मंदिर में स्थित शिलालेख में संवत १९०२ उत्कीर्ण है। इससे यह सत्यापित होता है कि १६७ वर्ष पूर्व अर्थात अंग्रेजों के आने के बाद तक यह नगर आबाद था| भानगढ़ के उजड़ने के पीछे आक्रमण या दुर्घटना जो भी कारण रहा होगा वह संवत 1902 के पश्चात का है। भानगढ़ उजड़ने के कई कारण किंवदंतियों के माध्यम से जनमानस में प्रचलित हैं। जिसमें सिंधु शेवड़े के प्रतिशोध की कहानी चटखारे लेकर सुनाई जाती है। रानी रत्नावती को सिंधु शेवड़ा पाना चाहता था और उसने तंत्र मंत्र का प्रयोग करके इस नगर को उजाड़ दिया। दूसरी जन श्रुति है कि 1720 में आमेर के राजा जयसिंह ने इसे अपने राज्य में मिला लिया था। मुगलों के दौर में राजस्थान में उनके आक्रमण हुए और भयानक युद्द भी हुए। लेकिन मुगलों का आक्रमण भानगढ़ पर हुआ दिखाई नहीं देता। नगर के भीतर जितने मंदिर हैं सभी सही सलामत हैं। अगर मुसलमानों का आक्रमण हुआ रहता तो मंदिर सलामत नहीं मिलते।

शेवड़ों का धूणा
तीसरी किंवदंती भानगढ़ को जयपुर विस्थापित करने के विषय में सुनाई जाती है। अंग्रेजों के शासन काल में जयपुर के राजाओं ने भानगढ़ नगर को जयपुर विस्थापित किया होगा। इस तर्क पर मैं सहमत हूँ, क्योंकि 18 वीं सदी में मराठों एवं पिंडारियों के आक्रमण के कारण राजपुताना त्रस्त हो गया था। इसलिए सारी शक्ति को एकत्र कर जयपुर में स्थापित करने की दृष्टि से भानगढ़ नगर का विस्थापन संभव है। पूर्ववर्ती राजाओं एवं बादशाहों द्वारा अपनी राजधानी को विस्थापित एवं स्थानांतरित करने के अनेकों उदाहरण इतिहास में मिलते हैं। इस तरह भानगढ़ के विस्थापन का कारण सामरिक कारण रहा होगा। तब से यह नगर उजड़ गया और यहाँ दुबारा कोई बसने नहीं आने के कारण देख रेख के अभाव में यह नगर खंडहर बन गया होगा। इस इलाके में पानी की कमी थी। जिसके कारण यहाँ अकाल की स्थिति बन जाती थी। कहते हैं कि 1783 में भयंकर अकाल पड़ा, जिसमें भूख प्यास से काफ़ी लोग त्रस्त होकर काल का ग्रास बन गए। अकाल के कारण फ़ैली महामारी से भानगढ़ उजड़ गया। यहाँ के निवासी भानगढ़ छोड़ कर चले गए।

असमाजिक तत्वों की उपस्थिति 
भानगढ़ उजड़ने के बाद यहाँ असामाजिक तत्वों का बसेरा हो गया। वीरान स्थान पर पहाड़ियों के बीच स्थित यह नगर अपराधियों के छिपने के लिए उत्तम था। उनके द्वारा ही यहाँ भूत प्रेतों की कहानियाँ गढ़ी गई होगीं। जिससे कि आस पास के क्षेत्र के लोग भानगढ़ के खंडहरों की तरफ़ न आए और उनकी गतिविधियाँ निर्विघ्न जारी रहें। गड़े धन के प्रति लोगों का लगाव सदैव रहा है। यहाँ पर भी गड़े खजाने की खोज में लोग आते होगें तथा खजाने को प्राप्त करने के लिए नान प्रकार की तांत्रिक क्रियाए करने के कारण भय का वातावरण निर्मित होता होगा। वर्तमान में भी असामाजिक तत्वों की उपस्थिति के चिन्ह भानगढ़ में दिखाई देते हैं। दारु की खाली बोतलें एवं डिस्पोजल गिलास यत्र तत्र बिखरे पड़े है। दिन रात समूचा किला तांत्रिकों एवं बाबाओं के हवाले रहने के कारण यहाँ भय का वातावरण बना रहता है।

चौकीदार से चर्चा
वर्तमान में मोस्ट हंटेड प्लेस (घोर भूतिया स्थान) में पर्यटकों की रुचि बढती जा रही है। चमत्कार एवं भूत प्रेतों से संबंधित कहानियाँ रोमांच पैदा करती हैं और पर्यटक रोमांचकारी स्थानों पर जाकर उस रोमांच को अनुभव करना चाहता है। मानव की जिज्ञासु प्रवृति होने के कारण वह ऐसे स्थानों पर सत्यता की परख करने लिए पहुंचता है। वर्तमान में पर्यटकों के शौक में बदलाव दिखाई दे रहा है। पूर्व में लोग तीर्थ स्थानों का पर्यटन करते थे तथा वर्तमान में प्राकृतिक दृष्यों के साथ कौतुहल वाले स्थानों पर सैर करने जाते हैं। जैसे हम भी भानगढ़ की सच्चाई की खोज में 15 सौ किलो मीटर की दूरी तय करके पहुंच गए। मुझे भानगढ़ में कोई भी भूतिया आभास  नहीं हुआ। जैसे अन्य स्थानों को देखा वैसा ही यह भी लगा। भूतों की कहानी सिर्फ़ वातावरण में तैरती है। जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता।

अनंत से आता प्रकाश
आधुनिक युग में जहाँ तक बिजली पहुंच गई है वहाँ तक के सारे भूत प्रेत अंधेरे क्षेत्रों की ओर पलायन कर गए हैं। भूत अंधेरे में ही लोगों को दिखाई देते हैं। क्योंकि लोगों की मानसिकता ही वैसी बन गई है। अंधेरा होते ही अज्ञात का भय उत्पन्न हो जाता है और उसे भूत प्रेत दिखाई देने के साथ विचित्र आवाजें भी सुनाई देने लगती हैं। यही स्थिति भानगढ़ की है। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहाँ झाड़ियों में जंगली जानवर विचरण करते हैं। किसी पर्यटक के साथ रात को कोई दुर्घटना न हो जाए इसलिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने यहाँ दिन ढलने के बाद प्रवेश पर पाबंदी लगा रखी है। सर्वे के 16 चौकीदार यहाँ कार्य करते हैं, किसी ने भी भूत प्रेतों को यहां पर नहीं देखा। इससे यही सत्यान्वेषण होता है कि व्यक्ति अपने भीरुपन को घर में छोड़ कर आए और उन्मुक्त होकर भानगढ़ के पुरावशेषों की सैर करे तो बहुत आनंद आएगा। 
 
 
 

भानगढ़ का मंदिर शिल्प

भूतिया कुंए का पानी पीते रतन सिंह जी
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सोमेश्वर मंदिर से दांई तरफ़ चलने पर घनी झाड़ियाँ है तथा इधर कोई रिहायसी निर्माण कार्य नहीं है। यहाँ पर शेवड़ों की मढियाँ और समाधियाँ है तथा एक भवन के बाहर शिवलिंग स्थापित है और भवन के भीतर गणेश जी। कहते हैं कि यहीं पर शेवड़े (शव साधक तांत्रिक) तांत्रिक उपासना करते थे। जो चेला दर चेला चली आ अही है। धूणे के पास एक छोटा सा कुंआ है, जिस पर डिब्बा और रस्सी रखी हुई थी। गढ में काम करने वाले मजदूर इसी कुंए से पानी पीते हैं। हमें भी प्यास लग रही थी। भरत सिंह ने पानी निकाला तथा हमने बारी-बारी से अपनी प्यास बुझाई। कुंए का जल शीतल होने के साथ मीठा भी था। इस दौरान चौकीदार हमारे साथ ही चल रहा था। झाड़ियों के बीच से हम रास्ता बनाते हुए टीले पर चढे। यह मंगला देवी का मंदिर था। यहाँ भी कोई प्रतिमा नहीं है। बलुए पत्थर से निर्मित मंदिर की कलात्मकता देखते ही बनती है। 

मंगला माता मन्दिर
भानगढ़ के मंदिरों में मुझे कहीं पर भी मिथुन  मूर्तियाँ दिखाई नहीं दी। जिस तरह अन्य प्राचीन मंदिरों में दिख जाती है। किसी भी प्राचीन मंदिर बहुत सारी नहीं तो एक मिथुन मूर्ति मिलती ही है। अगर मानव मिथुन मूर्तियाँ नहीं प्राप्त होती तो उनकी जगह पशु मिथुनरत मूतियाँ उत्कीर्ण होती हैं। प्रतीत होता है कि पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में मिथुन मूर्तियों का निर्माण शिल्पकारों ने बंद कर दिया होगा। जबकि प्राचीन काल में मिथुन मूतियों के निर्माण के पीछे मान्यता थी कि मंदिरों में मिथुन प्रतिमाएं बनाने के कारण उस पर तड़िक प्रकोप नहीं होता तथा वे मिथुन मूर्तियों को मंदिर में उत्कीर्ण कर जनता के लिए एक कौतूक पैदा करना चाहते थे। मिथुन मूर्तियों के निर्माण के पीछे अन्य कारण भी बताए जाते हैं। यहाँ मिथुन मूर्तियों के न होने से लगता है कि मिथुन दृश्यों का कौतुक जन सामान्य की निगाह में समाप्त हो गया था।

केशवराय मंदिर के पार्श्व में मंगला माता मंदिर
मंगला देवी मंदिर के गर्भगृह की प्रतिमा गायब है। इसके वितान पर 16 वाद्यकों का चित्रण है। संगीत में प्रयोग में आने वाले तत्कालीन वाद्यों का चित्रण शिल्प की समृद्धता का परिचायक है। इसके द्वार पर भी प्रतिहारों का अंकन है. इस मंदिर से थोड़ी दूर पर केशव राय का मंदिर है, इस मंदिर के गर्भ गृह में भी प्रतिमा नहीं है। गर्भ गृह के द्वार पर दंडधारी प्रतिहारों का ही अंकन है. इस मंदिर में कोई विशेष शिल्पकारी नहीं है। कहते हैं कि इन मंदिरों की प्रतिमाएं तत्कालीन राजा जयपुर ले गए थे। यहाँ पर हमने कुछ देर विश्राम किया। चौकीदार ने चर्चा के दौरान बताया कि यहाँ आर्कियोलाजी के 16 चौकीदार 4-4 की पाली में काम करते हैं। किसी को भी कभी कोई भूत प्रेत नहीं दिखाई दिया और न ही कोई आवाजें सुनाई दी। उसका कहना है कि लोगों ने इस तरह की अफ़वाहें उड़ा रखी हैं। उसने बताया कि एक बार मंगला माता के मंदिर तरफ़ आते हुए उसे शेर मिल गया था। हाथ में लालटेन लिए दो चौकीदार साथ थे और मंगला माता के मंदिर तरफ़ जा रहे थे। अचानक झाड़ियों में से शेर निकल कर सामने आ गया। उनकी तो घिघ्गी बंध गई। थोड़ी देर बाद शेर चला गया। यहाँ भूत प्रेतों की बजाए जंगली जानवरों का अधिक डर है।

भानगढ के यात्री
इस किले में 5 द्वार हैं जिन्हें हनुमान द्वार, फ़ुलवारी द्वार, अजमेरी द्वार, दिल्ली द्वार तथा लुहारी द्वार के नाम से जाना जाता है। 5 शताब्दी पूर्व भानगढ़ के समीप से अजमेर और दिल्ली जाने वाला मार्ग रहा होगा। इसलिए इन द्वारों का दिल्ली और अजमेरी द्वार नामकरण किया गया होगा। लुहारी द्वार से संबंधित कथानक है कि इस द्वार के समीप लुहारों की बस्ती थी। इस स्थान पर आज भी लौह मल के बड़े बड़े ढेर पड़े हैं। राजा को आयुधों के निर्माण के लिए सिद्धस्थ लुहारों की आवश्यकता होती है। इसलिए उन्हे अलग बस्ती बनाकर बसाया गया होगा। इन लुहारों के वशंज समीप के गांवों में रहते हैं। गढ की प्राचीर के ये द्वार दूर-दूर स्थित हैं। भानगढ का क्षेत्र काफ़ी बड़ा है, इसे एक दिन में देख पाना संभव नहीं। जंगली जानवरों की आमद के कारण यहाँ पर रात्रि में भ्रमण करने अनुज्ञा नहीं दी जाती तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण रात्रि में किसी भी संरक्षित स्मारक में जाने की अनुमति नहीं देता। इसमें भानगढ़ की कोई विशेष बात नहीं है। 

चलते चलते यात्रा समापन  चित्र
भानगढ़ से भ्रमण कर हम अब वापस जयपुर की ओर चल पड़े। मुझे अलवर से खैरथल जाना था और अन्य साथियों को जयपुर। चौकीदार से चर्चा होने पर उसने बताया कि 5 बजे आश्रम एक्सप्रेस दौसा से खैरथल जाने के लिए मिल सकती है। अगर आप 5 बजे तक दौसा स्टेशन तक पहुंच गए तो खैरथल जाने के लिए यह बढिया साधन है। भानगढ से दौसा लगभग 22 किलो मीटर की दूरी पर है। प्रदीप जी ने जल्दी ही मुझे दौसा स्टेशन पहुंचा दिया। यहाँ से मैने खैरथल की टिकिट ली। क्योंकि अगले दिन मुझे अलवर का बाला किला देखना था। एक घंटे प्रतीक्षा करने के पश्चात आश्रम एक्सप्रेस प्लेट फ़ार्म पर लगी। अंधेरा हो चुका तथा थोड़ी ठंड भी बढ चुकी थी। यह समय राजस्थान में अच्छी ठंड का था और मैने छत्तीसगढ़ के वातावरण के हिसाब से एक पतली सी स्वेटर ले रखी थी। खैरथल पहुंचते तक सिकुड़ कर आधा रह गया था। .
 
 
 
 

भूतों का भानगढ़

मोडा सेठ की हवेली
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भानगढ़ के उजड़ने के पीछे कई कहानियाँ है, जिनमे सिंधु शेवड़े और भूतों की कहानी अधिक प्रसिद्ध हो गई। मैं भानगढ को भिन्न नजरिए से देख रहा था। लोग यहाँ भूतों की तलाश में आते हैं। वो भूत जिन्हें किसी ने देखा नहीं, सिर्फ़ किस्से बनकर रह जाते हैं। भानगढ़ को जितना अधिक नुकसान जिंदे भूतों ने पहुंचाया, उतना किस्से कहानियों में प्रचलित भूतों ने नहीं। भानगढ़ कोई अधिक पुराना कस्बा नहीं है, 16 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इसे राजा भगवंत दास ने बसाया था। इसके बाद राजा मान सिंह के भाई माधो सिंह ( अकबर के दीवान)  ने अपनी रियासत की राजधानी बनाया। जब कोई राजा राजधानी बसाता था तो उस स्थान को सामरिक दृष्टि से सुदृढ़ मान कर ही निर्माण कार्य करवाता था। क्योंकि पड़ोसी राजाओं की कब साम्राज्यवादी नीति का शिकार हो जाए, कब राजधानी पर आक्रमण हो जाए इसका पता नहीं चलता था। क्योंकि ये युद्ध बैर, विद्वेश की दृष्टि से नहीं होते थे, साम्राज्य विस्तार की दृष्टि से किए जाते थे।

त्रिपोलिया द्वार
भानगढ़ खंडहर हो चुका है, लेकिन यहाँ के सभी मंदिर सुरक्षित हैं और अपनी गरिमा के साथ खड़े हैं। इससे प्रतीत होता है कि कभी मुसलमानों ने इस पर आक्रमण नहीं किया। अगर मुसलमान आक्रमण करते तो मंदिर को सबसे पहले हानि पहुंचाते। इसके उजड़ने का कारण हिंदु राजाओं की ही आपसी प्रतिद्वंदिता रही होगी। जिन्होने गढ पर आक्रमण कर उसे धराशायी किया होगा तथा दैवीय आपदा के भय से मंदिरों को नहीं छेड़ा होगा। दूसरी श्रेणी के सुरक्षा घेरे के मुख्य द्वार को त्रिपोलिया द्वार कहते हैं। इस द्वार से आगे बढने पर दांई तरफ़ बलुआ पत्थर से नागर शैली में ऊंचे अधिष्ठान पर निर्मित गोपीनाथ जी का मंदिर दिखाई देता है। इस मंदिर में गर्भ ग़ृह में कोई भी देव प्रतिमा नहीं है। गर्भ गृह के निर्माण को देख कर प्रतीत होता है कि यहाँ विष्णु के ही किसी अवतार का विग्रह रहा होगा।

गोपीनाथ जी का मंदिर
मंदिर शिल्प मनमोहक है। मंडप के वितान सुंदर पद्माकृति का अंकन के साथ १६ तरह के वाद्यों के साथ वाद्यकों का भी चित्रण किया गया है। द्वार पट पर विष्णु के दशावतारों का अंक है, तथा शीर्ष पर गणेश जी विराज मान हैं तथा नीचे की चौखट में कल्प वृक्ष का अंकन है। बाईं तरफ़ के झरोखे में उमामहेश्वर को स्थान दिया गया है, इस मूर्ति के आधार पर नागरी लेख है और दाईं तरफ़ के झरोखे में गणेश जी की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के द्वार पर सुंदर वल्लरियों, लता पुष्पों का अंकन है तथा सिरदल पर हाथी, घोड़ों एवं ऊंटों को स्थान दिया गया है। विग्रह नहीं होने के कारण मंदिर में पूजा नहीं होती। इस मंदिर से आगे बढने पर भग्नावशेषों में एक छतरी दिखाई देती है। चारों तरफ़ की दीवालों में आले बने हुए हैं तथा छतरी के उपर स्थानक मुद्रा में महावीर की प्रतिमा दिखाई देती है। इससे प्रतीत होता है कि यह जैन मंदिर रहा होगा तथा महल के प्रांगण में स्थित होना इसे विशिष्ट बनाता है। जाहिर है कि राजा ने जैन व्यापारियों को अपने राज्य में विशिष्ट स्थान दे रखा होगा।

घरठ
जैन मंदिर से महल की ओर आगे बढने पर एक घरठ दिखाई देती है। कभी इसका उपयोग निर्माण कार्य में चूना मिलाने के लिए किया गया होगा। लेकिन यह अभी तक यथावत है। कई स्थानों पर इसे हटा दिया जाता है तथा घरठ का गोल पत्थर ही मिलता है। प्रतीत होता है कि नगर उजड़ने से पूर्व तक यहाँ निर्माण कार्य जारी था। यहाँ पर्यटकों ने पत्थर के छोटे-छोटे घरों के प्रतीक बना रखे है।मान्यता कि जिसका मकान नहीं होता वे ऐसी मनौती करते हैं जिससे खुद का मकान हो जाता है। महल में प्रवेश करने पर बारहदरी दिखाई देती है। जिनके समक्ष कमरे बने हुए हैं। किवंदन्ती है कि यह महल सात मंजिला था, महल के पीछे पहाड़ी स्थित है। निर्माण विधि के अनुसार यह महल सातमंजिला नहीं दिखाई देता। उस काल में राज प्रसादों में कई चौक हुआ करते थे, जिनसे गुजरने के बाद  ही रनिवास तक प्रवेश किया जाता था। हो सकता है कि इस महल के 7 खंड रहे हों। जिसके कारण इसे सतखंडा महल कहा जाने लगा हो।

राजमहल का प्रवेश एवं पार्स्व में राजमहल
महल के उपर की मंजिल में रनिवास था, रनिवास के चिन्ह अभी भी मिलते हैं। रनिवास में कमरों के साथ शौचालयों का निर्माण हुआ है। उपर की मंजिल पर जाने के बाद बाईं तरफ़ रत्नावती का मंदिर बताया जाता है। इस मंदिर में कोई विग्रह नहीं है। लेकिन धुंवे से दीवारे काली हो चुकी है। अवश्य ही कोई तांत्रिक प्रयोग यहाँ पर होता दिखाई देता है। सिंदुर और पूजा की सामग्री हमें यहां पर मिली। रनिवास में स्थित इस मंदिर में अवश्य ही राजपरिवार की कुल देवी का मंदिर रहा होगा। क्योंकि राजा अपनी कुलदेवी का स्थान निवास में ही रखते थे। राजस्थान एवं अन्य प्रदेशों में मुख्य निवास में देवी का "थान" बनाने की परम्परा दिखाई देती है। मूर्तियों के चोरों ने मंदिर के विग्रह को चुरा लिया होगा इसलिए कालांतर में जन सामान्य में रत्नावती के मंदिर का नाम प्रचलित हो गया होगा।

महल के भग्नावशेष एवं रत्नावती का मंदिर
महल के निचले तल में तहखाना है, जहाँ घोर गुप्प अंधकार रहता है। हमने इस तहखाने की भी पड़ताल की। तहखाने की पैड़ियों पर बहुत सारी कबूतरों की बीट पड़ी थी। अंधेरा इतना गहरा है कि दो पैड़ियों के बाद रास्ता दिखाई नहीं देता। इस स्थान के विषय में अफ़वाहें फ़ैलाई गई है कि यहाँ पर कैमरे का शटर काम नहीं करता। किन्ही कारणों से यहाँ मैग्नेटिक फ़िल्ड का निर्माण होने से वह कैमरे को प्रभावित करता है इसलिए उसका शटर काम नहीं करता और फ़ोटो नही लिए जा सकते। इसके कमरों में भूतों की आवाजें आने की कहानियाँ चटखारे लेकर सुनाई दी जाती हैं, परन्तु हमें तो कोई आवाज सुनाई नहीं थी तथा न ही भय का अहसास हुआ। अगर किसी स्थान पर नकारात्मक शक्ति होती है तो वह अवश्य ही मनुष्य की चेतना को प्रभावित करती है और अपनी उपस्थिति का अहसास दिलाती है। यहाँ मुझे किसी भूत प्रेत के अस्तित्व का अहसास नहीं हुआ।

सोमेश्वर महादेव मंदिर
राजमहल से बाहर निकलने पर कुंए दिखाई देते हैं, जो कि अब कचरे से पाट दिए गए हैं। इसके बाईं तरफ़ सोमेश्वर महादेव का मंदिर है। कहते हैं कि इसे सोमनाथ नाई ने बनवाया था। इस विशाल मंदिर के समीप कुंड बना हुआ है जहाँ पानी पहाड़ से रिसकर आता है। अभी इस पानी में गंदगी हो गई है, कभी यह कुंड निर्मल खनिज जल से भरा रहता होगा। इस मंदिर का निर्माण भी बलुई पत्थर से हुआ है। मंदिर में शिवपरिवार विराजित है तथा नंदी के साथ गणेश की सवारी मूषक महाराज भी विराजित हैं। नंदी संगमरमर पत्थर से बना है और मूषक काले पत्थर से। मैने पहली बार नंदी के साथ मूषक की स्थापना कहीं पर देखी है। इससे पहले नंदी के साथ मूषक की स्थापना  मुझे कहीं देखने नहीं मिलती। इस मंदिर का द्वार भी अलंकृत है। गढ में यह मंदिर सतत पूजित है।

सोमेश्वर महादेव मंदिर का गर्भ गृह
पहले राजा और सेठ जैसे धनी मानी लोग ही मंदिर, प्याऊ, तालाब \इत्यादि का निर्माण करवाते थे। यहाँ पर किसी नाई द्वारा मंदिर बनवाना हैरत में डालता है। सबसे बड़ी बात यह हैं कि मंदिर राजमहल की परिधि के भीतर है। बिना राजा की सहमति के इस स्थान पर मंदिर नहीं बनाया जा सकता। किसी नाई द्वारा महल परिसर में मंदिर बनाने के निर्णय से राजा की ठकुराई को भी ठेस पहुंच सकती थी। लेकिन इस मंदिर के निर्माण की अनुमति देने से राजा की सहिष्णुता का परिचय मिलता है। राजा अपनी प्रजा के लिए निष्ठावान एवं दयालु था। तभी इस स्थान पर सोमेश्वर नाई द्वारा मंदिर बनाया जा सका। भानगढ के समीप स्थित अजबगढ में सोमेश्वर नाई द्वारा निर्मित "सोम सागर" का जिक्र भी सुनाई देता है। इसी तरह छत्तीसगढ़ के खल्लारी (खल्वाटिका) में देवपाल नामक मोची ने विष्णु मंदिर बनवाया था। मोची द्वारा उस काल में मंदिर बनवाया जाना बड़ी घटना था। इससे शासकों की सामाजिक उदारता का पता चलता है। .
 
 
 
 

भानगढ़ की रत्नावती और सिंधु शेवड़ा

बाजार से आगे बढने पर पीपल के वृक्ष के पत्ते सरसराहट की आवाज के साथ इस गढ के वैभव की गाथा कहते हैं।मुख्य मार्ग के सुनसान बाजार के खंडहर बेबस स्तब्ध खड़े थे। समय की मार से कुछ भी नहीं बचा। सारी रौनक और वैभवता नष्ट हो गई है। जो बसा है उसे एक दिन उजड़ना भी होता है ये संसार का नियम है। धरा पर कोई स्थायी नहीं रह सका। किसी को प्रतिद्वंदिता ने उजाड़ दिया तो किसी को प्रकृति के कोप का सामना करना पड़ा। पूरी धरती को मानव ने पग पग नाप कर अपनी उपस्थिति के चिन्ह छोड़ दिए। इनकी बातें सुनने के लिए ध्यान लगा कर उस काल खंड में जाना होगा जब यहाँ प्रतिहार, अनुचर, दंडधारी विचरण करते थे। खड्गधारी एक आवाज में ही किसी का प्राण हरण करने के लिए तत्पर रहते थे। समय गुजर गया लेकिन पीपल आज भी उन गाथाओं को सुनाता है। 
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सुनसान भानगढ़ नगर
मैं पीपल की छांव में जाकर बैठ गया। मुझे बैठे देख कर उसने पत्ते फ़ड़फ़ड़ाए और कहने लगा। थक गए पथिक, चलते-चलते। तनिक विश्राम करो, तुम्हारी जिज्ञासा मुझ पर प्रगट है। तुम्हे वही कहानी सुनाता हूँ, जिसे सुनने की आकांक्षा लिए यहाँ आए हो। यह कहानी है, रानी रत्नावती की। हाँ! वही रानी रत्नावती, जिसके सौंदर्य के चर्चे वर्तमान में भी विद्यमान हैं। अप्रतिम सौंदर्य की स्वामिनी थी वह। उसके पिता ने विवाह के लिए स्वयंवर रचाया था। इस स्वयंवर में दूर देशों के नरेश तथा राजा आए थे। एक से बढ कर एक पराक्रमी, धनुर्धारी बल पौरुष के धनी रत्नावती का वरण करने की आकांक्षा से पधारे थे। स्वयंवर समारोह की चमक - दमक देखते ही बनती थी। स्वयंवर के मध्य व्यवधान की आशंका से राजा ने अपने सुदृढ़ एवं उद्भट सैनिकों को सुरक्षार्थ तैनात कर रखा था।

चलते फ़िरते प्रेत
मैने जम्हाई ली, चेहरे पर थोड़ी थकान दिख रही थी। उसने बोलना जारी रखा … तुम सुन रहे हो न राहगीर, अगर तुम्हारा ध्यान भटका तो वंचित रह जाओगे इस कथा से। मैने सिर हिला कर सहमति दी……वह कहने लगा… इन राजाओं में सिंधू देश का राजा भी रत्नावती के वरण की आकांक्षा लेकर आया था। स्वयंवर प्रारंभ हुआ, सभी राजाओं के चेहरे पर यह गुमान का भाव था कि रत्नावती उसका ही वरण करेगी। रत्नावती ने स्वयंवर सभा का एक चक्कर लगाया, सभी राजाओं पर भरपूर दृष्टि डाली और भानगढ़ नरेश के गले में वरमाला डाल दी। दूदूंभि बज उठी, पुष्प वर्षा होने लगी, हर्ष मिश्रित ध्वनियाँ परदों के पीछे से सुनाई देने लगी। ब्राह्मणियाँ मंगल गान करने लगी। साक्षात राम एवं सीता के स्वयंवर का दृष्य सजीव हो उठा। सभी राजा विवाह की प्रशंसा करते हुए अपने-अपने स्थानों को प्रस्थान कर गए। इधर दोनों का विवाह सम्पन्न हो गया।

विश्राम के पल - सिंह त्रयी (भरत सिंह, प्रदीप सिंह, रतन सिंह)
स्वयंवर स्थल पर ही भानगढ के विनाश के बीज पड़ गए… समझ रहे हो न? उसने मुझसे प्रश्न किया। आगे बताओ कहानी रोचक होती जा रही है, मैने कहा। तो सुनो- सिंधु देश का राजा रत्नावती की  सुंदरता पर मोहित था, उसने रत्नावती के सौंदर्य के चर्चे पहले ही सुन रखे थे। लेकिन भानगढ़ के राजा जैसा सामरिक दृष्टि से सक्षम नहीं था। रत्नावती से विवाह करने की आकांक्षा को लेकर वह उससे युद्ध नहीं कर सकता था। क्योंकि युद्ध में उसकी हार निश्चित थी। वह मन मसोस कर रह गया। लेकिन रत्नावती को पाने की उसकी कामना प्रबल होती गई। वह सिंधु देश में जाकर सिर्फ़ यही चिंतन करने लगा कि रत्नावती को कैसे प्राप्त किया जाए। उसे अपने महल की शोभा कैसे बनाए? शारीरिक बल काम न आने पर व्यक्ति तंत्र बल-छल की ओर प्रयाण करता है। यही सिंधु राजा ने भी किया।

शिवालय एवं शेवड़ों का धूणा
कुछ इतिहास में घटी घटनाओं का जिक्र करना चाहुंगा। जो इस गाथा से जुड़ी हुई हैं। एक बार राजा भगवंत दास यहाँ शिकार खेलते हुए आए। उन्हे यह स्थान अपनी राजधानी बनाने लिए सुरक्षित और उपयुक्त लगा। इस स्थान पर एक प्राचीन शिवालय था जहाँ कुछ शेवड़े अपनी तांत्रिक साधना करते थे। यह स्थान शेवड़ों के धूणे के नाम से प्रसिद्ध था। राजा ने अपना विचार शेवड़ों के गुरु को बताया। उसने राजा से कहा कि - तुम यहाँ राजधानी बना सकते हो, हमें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन तुम्हारा महल इतनी दूर होना चाहिए कि उसे धूणे की धुंवा छू न पाए। राजा ने सहमति दे दी एवं यहाँ गढ का निर्माण किया। राजा अपने राज काज में लग गया और शेवड़े अपने धूणे में मस्त हो गए। एक दिन खूब आँधी आई और धूणे की धुंवा राजमहल तक पहुंच गई। बस इसी दिन से भानगढ़ के विनाश की नींव पड़ गई।

पहाड़ी पर सिंधु शेवड़े की छतरी (चित्र पर क्लिक करके देखें)
प्यास लगने लगी थी, मैने एक घूंट पानी की ली और आगे सुनने लगा। सुन रहे हो न … सिंधु राजा रत्नावती को भूल नहीं पा रहा था। अब उसने तांत्रिकों का सहारा लेना शुरु किया। उसने सोचा कि रत्नावती को प्राप्त करने का सिर्फ़ तंत्र मंत्र का ही एक रास्ता बचा है। उसने भानगढ़ की पहाड़ी पर डेरा जमा लिया। वो देखो उपर छतरी … दिखाई दे रही है न। वहीं सिंधु राजा रहने लगा। उसने डेरे के शेवड़ों से तंत्र मंत्र सीखे और उन्हे सोधने में लगा रहा। मनुष्य की कामना प्रबल होती है, वह उसका उत्कर्ष भी कर सकती है तो पतन भी। बस यही कुछ भानगढ़ पर भी मंडरा रहा था। मंत्र सोधते सोधते एक दिन सिंधु राजा सिद्ध हो गया और सिंधु शेवड़ा कहलाने लगा। बस अब समय आ गया था रत्नावती पर तंत्र मंत्र का प्रयोग करने का। 
कभी इन गलियारों में रौनक थी
उपर पहाड़ी पर बैठा सिंधु शेवड़ा गढ की भीतर हो रही सारी गतिविधियों को जानता था। रत्नावती की एक दासी सुंगधित तेल लेने बाजार तक आती थी जिसे उसके बालों में लगाती थी। सिंधु शेवड़ा नगर में प्रवेश कर गया और दासी कटोरे में तेल लेकर महल की ओर जा रही थी। उसने तेल देखने लिए अपने हाथ में लेकर तंत्र-मंत्र का प्रयोग किया और पहाड़ी पर पुन: चढ गया। इधर दासी को विलंब होने का कारण रत्नावती ने पूछा। तो उसने रास्ते में एक शेवड़े के मिलने का कारण बताया। रानी ने दासी के हाथ से कटोरा लेकर देखा तो उसमें तेल घूम रहा था। उसे कुछ भान हुआ और उसने तेल का कटोरा एक बड़ी शिला पर फ़ेंक दिया। शिला पर तेल गिरते ही वह शिला उड़ने लगी। रानी समझ गई कि तेल में शेवड़े ने तंत्र का प्रयोग किया है।

गढ के झरोखे से
जैसे ही तेल शिला पर गिरा, उधर शेवड़े को मंत्र शक्ति से पता चला कि तेल का प्रयोग हो गया है। उसने आदेश दिया कि उपर आ जाओ, आदेश मिलते ही शिला पहाड़ की ओर उड़ चली। सिंधु शेवड़ा शयन मुद्रा में था, शिला देख कर उसने सोचा कि रानी शिला पर बैठी है, उसने आदेश दिया कि मेरी वक्ष पर ही बैठो। शिला जब नीचे उतरने लगी तो उसे रानी दिखाई नहीं दी और सिंधु शेवड़ा समझ गया कि शिला उसकी छाती पर गिरेगी और उसकी मृत्यु निश्चित है। तो उसने मंत्र से शिला के दो टुकड़े कर दिए और श्राप दिया कि रात दूसरे पहर तक यह नगर नष्ट हो जाएगा यहाँ कुछ भी नहीं बचेगा। इस नगर में आज के बाद कोई भी आबाद नहीं पाएगा। आधी शिला सिंधु शेवड़े के वक्ष पर गिरी और वह मृत्यु को प्राप्त हुआ। आधी शिला नगर के उपर भ्रमण करने लगी। रत्नावती को अनिष्ट का अहसास हो गया और उसने नगर वासियों को अर्ध रात्रि तक नगर खाली करने का आदेश दे दिया।

खंडहर हुआ रानी रत्नावती का महल
नगर खाली हो गया सिंधु शेवड़े के श्राप से। कथा कहते हुए पीपल ने एक लम्बी सांस ली, तब से लेकर आज तक यह नगर फ़िर कभी आबाद नहीं हुआ। कईयों ने कोशिश की लेकिन श्राप के भय से कोई भी इस नगर में पुन: बसने को तैयार नहीं हुआ। खजाने के चोरों ने पूरा गढ़ खोद डाला। जो कुछ मिला सब उठा ले गए। घरों एवं महल के दरवाजों को भी नहीं छोड़ा। सब उखाड़ ले गए। वीरान पड़ा है यह नगर। इसे देख देख मैं खून के आँसू रोता हूँ। कितना वैभव था इस नगर का। कभी यह स्वर्ण नगरी से कम नही था। आज जंगली जानवरों का बसेरा हो गया। मैं ही बूढा बच गया हूँ इसकी गाथा कहने को, मेरे बाद शायद कोई और गाथा कहने वाला न मिले। इस नगर का इतिहास समय की गर्त में दफ़न हो जाए। तुम सुन रहे हो न…  मैने हुंकारु भरी, आँसूओं की दो बूंदे मेरी पेशानी पर टपकी। पीपल सुबक रहा था…
 
 
 
 
 
 

भानगढ़ की नर्तकियाँ

आरम्भ से पढ़ें 
भानगढ़ पहुंचने से पहले मैने आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के एक मित्राधिकारी को फ़ोन लगाया। कम से कम भानगढ़ में पुरातत्व विभाग के कोई अधिकारी मिल जाते तो हमें सहूलियत हो जाती। थोड़ी देर में उन्होने सब लाईनअप कर दिया और मिस्टर हरिनारायण का नम्बर दे दिया और कहा कि ये आपको साईट पर ही मिल जाएगें। भानगढ़ के किले की ओर जाने से पहले एक गाँव है, जहाँ बहुत सारे शिल्पकारों के परिवार रहते हैं। वे मार्बल की मूतियाँ बनाते हैं। देखने से ही लगता है कि इस गाँव में सिर्फ़ शिल्प का ही काम होता है। कारखानों के सामने बड़े बड़े पत्थरों को छीलते काटते हुए शिल्पकार दिखाई देते हैं। कुछ जगहों पर संगमरमर के बड़े-बड़े हाथी खड़े थे। पूछने पर पता चला कि मायावती की सरकार के समय इनको बनाने का आदेश दिया था। जब से मायावती की सरकार चली गई तब से हाथियों की कोई पूछ नहीं है। हमारी मजदूरी इन हाथियों के रुप में दरवाजे पर पड़ी है। 
जन पत्रकार (ब्लॉगर) - रतन सिंह शेखावत, प्रदीप सिंह शेखावत, ललित शर्मा
हमारे सामने से एक खुली जीप में रंग बिरंगी कैपरी पहने लफ़ाड़ूओं का एक झुंड हो हल्ला करते जा रहा है। उनकी निगाह हमारी तरफ़ पड़ी तो वे चुपचाप निकल लिए। अन्यथा रतनसिंह जी तो हमारे साथ ही थे, फ़िर वे कहीं के नहीं रहते। खेतों से होकर गुजर रही सड़क पे हम चल रहे थे। रास्ते में एक दुकान से कोल्ड ड्रिंक, पानी एवं कुछ स्नेक्स लिए, क्योंकि गढ़ में से तो कुछ मिलने से रहा। थोड़ी दूर सामने पहाड़ियों के बीच गढ़ दिखाई देने लगा। गढ़ की सुरक्षा के लिए मजबूत प्राचीर बनी है। इसके मुख्य द्वार पर हनुमान जी का मंदिर है। यहां कुछ लोगों की भीड़ दिखाई दी, कोई जाजम बिछा रहा था तो कोई कड़ाही उठा रहा था। लगता था आज लाल लंगोटे वाले के रोट की तैयारी हो रही है। आज मंगलवार का ही दिन था। गाँवों में बजरंग बली का रोट करने की परम्परा है। 
उत्खनन में प्राप्त हलवाई की भट्टी
भानगढ़ तीन तरफ़ पहाड़ियों से सुरक्षित है। सामरिक दृष्टि से किसी भी राज्य के संचालन के यह उपयुक्त स्थान है। सुरक्षा की दृष्टि से इसे भागों में बांटा गया है। सबसे पहले एक बड़ी प्राचीर है जिससे दोनो तरफ़ की पहाड़ियों को जोड़ा गया है। इस प्राचीर के मुख्य द्वार पर हनुमान जी विराजमान हैं। इसके पश्चात बाजार प्रारंभ होता है, बाजार की समाप्ति के बाद राजमहल के परिसर के विभाजन के लिए त्रिपोलिया द्वार बना हुआ है। इसके पश्चात राज महल स्थित है। किसी जमाने में त्रिपोलिया द्वार सुदृढ सुरक्षा रही होगी। फ़ोन लगाने पर हरिनारायण जी ने मुख्यद्वार से आगे आने कहा तथा गेट पर मिला चौकीदार भी साथ आ गया।

प्रथम द्वार स्थित हनुमान मंदिर और भक्तगण
एक स्थान पर उत्खनन हो रहा था। वहाँ काफ़ी मजदूर कार्य कर रहे थे, यहीं हमारी मुलाकात हरिनारायण जी से  हुई। उत्खनन के स्थान को हमने देखा। उत्खनन में पॉटरी मिल रही थी, यह बाजार का क्षेत्र होने के कारण आज हलवाई की दूकान का उत्खनन हो रहा था। उत्खनन भट्ठियाँ और मृदा भांड निकले हुए दिखाई दिए। समीप ही एक खंडहर संचरना भी दिखाई दी। जिसे मोडा सेठ की हवेली कहा जा रहा था। राजस्थान हरियाणा में मोडा "घर छोड़ सन्यासी" को कहा जाता है। मोडा सेठ नाम के पीछे लगता है किसी ने बचपने में इसका नाम बिगाड़ दिया होगा। मोडा मोडा करते मोडा ही रुढ़ हो गया होगा। वरना मोडा को हवेली बनाने की क्या जरुरत है? मोडा की तो वैसे ही मौज रहती है। एक कहावत है " गाछी, बाछी और दासी, तीनों संतों की फ़ांसी।"
मोडा सेठ की हवेली
बाजार क्षेत्र के प्रारंभ में नर्तकियों की हवेली दिखाई देती है। यहाँ आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया ने सूचना पट लगा रखा है। महल क्षेत्र से अलग बाजार में नर्तकियों की उपस्थित होने का तात्पर्य है कि इन्हें यहाँ विशुद्ध मनोरंजन के लिए बसाया गया होगा तथा तत्कालीन समाज में इनका उच्च स्थान था। अन्यथा ये नर्तकियाँ वर्तमान की तरह गली-कूचों की ही जीनत रहती। हवेली काफ़ी बड़ी है तथा प्रस्तर निर्मित है। अनुमान है कि यह भी बहुमंजिली रही होगी। मनोरंजनार्थ आवश्यकता पड़ने पर राजा इन्हें रनिवास में आमंत्रित करते होगें तथा मुख्य मार्ग पर इनकी हवेली होने से यह भी अनुमान लगता है कि राज्यातिथियों का स्वागत नृत्यादि एवं पुष्प वर्षा से होता होगा।  
नर्तकियों की हवेली
यहाँ से हमारा भानगढ़ का भ्रमण प्रारंभ हुआ। हनुमान द्वार से सीधी सड़क मुख्य बाजार के मध्य से होकर राजमहल तक जाती है। मार्ग के दोनो तरफ़ स्थित दुकानों का निर्माण बलुए पत्थर से हुआ है। वास्तु की दृष्टि से यह निर्माण उत्तम है। मेहराबों के आधार पर सभी दुकानें दुमंजिला हैं। जिनकी छतों को पत्थर के किरचों एवं चूने से बनाया गया है। ये छतें इतनी मजबूत हैं कि आज भी ज्यों की त्यों विद्यमान हैं। दुकानों में पैड़ियाँ बनी हुई हैं। पैड़ियों को आधार देने के लिए उनके नीचे मेहराब बने हैं। सभी दुकानों में एक परछी, एक अंतराल एवं एक गर्भ गृह है। सामान रखने के लिए ताक बने हैं। बाजार क्षेत्र को देखने से लगता है कि कभी इसकी रौनक बुलंदी पर होगी। बाजार का निर्माण सुव्यवस्थित तरीके से योजनानुसार किया गया है। जिससे उस काल खंड के वास्तुविदों की प्रवीणता का परिचय मिलता है।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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